Wednesday, December 21, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - २१

यादें _ सवाल की ! 
भाग - २१
Hindi language _ हिंदी भाषा

ये क्या हो गया ? 

गांव मे हमारे पडोसी बुजुर्ग का स्वर्गवास हुआ था . मुझे दो - तीन दिन बाद खबर मिली . गांव मे हर घर , हर व्यक्ति कोई न कोई रिश्ते से बॅंधे रहते है . जान पहचान , पडोसी यह शब्द गांव मे गौण रहते है.. रिश्ते का शब्द मुख्य होता है ! 
अत: तेरहवी मे पहुंचना जरूरी था . वैसे मेरा गांव आना - जाना बहुत कम रहता है . हां , गोवर्धन पूजा के दिन जाना हर साल पक्का है . बाकी कार्यक्रम , समारोह , शादी - ब्याह के कारण जाना होता है . 
मै जिस दिन तेरहवी के लिए जाने वाला था , उसी दिन गांव से १५ कि.मी. दूर एक गांव मे मेरे जान - पहचान के व्यक्ति के यहॉं भी तेरहवी थी . मै सुबह ही नागपुर से निकला और पहले दूर के गांव गया . उस गांव पहुंचा तो वहॉं किर्तन चालू था . काफी समय बाद वह खत्म हुआ . सिर मुंडाया परिचित मेरे पास आया . मैने सांत्वना दी.. उनके स्वर्गवासी पिता को श्रध्दांजली अर्पण की और परिचित से विदा ली . 
मै तेज कार चलाते हुए गांव पहुंचा.. काफी समय हुआ था . पहले घर गया और बाद मे तेरहवी मे पहुंचा . बाहर गांव से आए काफी रिश्तेदार चले गये थे . गांव के लोग ज्यादा थे . मै औपचारिकता पूर्ण कर पानी पीने के लिए गया . मै पानी पी ही रहा था की जिन के यहॉं तेरहवी थी उनके पडोस वाली काकी ने मुझे गौर से देखते हुए पूछा , ' सुरेश बापू होय का ? ' ( सुरेश हो क्या ? ) . गांव मे मुझे ' सुरेश बापू ' या केवल ' बापू ' नाम से संबोधित करते है . 
' हो काकू..' ( हां काकी ) मैने कहा . 
वह काकी उॅंचाई में मुझ से छोटी थी . वह अचानक एक छोटे से बच्चे की तरह मेरे छाती पर सिर रख कर रोने लगी ....
' ये , क्या हो गया ? ' काकी रोते हुए बस यही सवाल दोहरा रही थी . सब लोग मेरी ओर देख रहे थे . मै उन्हें हलके हलके थपथपा रहा था ... 
काकी के पति का कोरोना के प्रथम चरण में देहान्त हुआ था , यह मुझे पता था . कोरोना के चलते मै गांव नही गया था . 
' पति की मृत्यू के बाद काफी दिन बिमार रही है... ' बगल में खडे व्यक्ति ने जानकारी दी . 
' तुला माहिती आहे का ? हे काय झाले ? तुझे काका गेले रे..' ' ( तुझे ज्ञात है क्या ? ये क्या हो गया ? तेरे चाचा गये रे...)
और लगातार रोती रही..
' हा , मुझे ज्ञात हुआ था , लेकीन कोरोना की वजह से नहीं आ सका था... ' मैने सांत्वना देते हुए कहा . 
सादे सरल स्वभाव की काकी रो रही थी.. मुझे ज्यादा औपचारिक बोलना भी नही आ रहा था.. मेरे ऑंसू भी अपने आप झर रहे थे . काफी लोग इकट्ठा हो गये . कुछ बाई लोग काकी को समझाने लगी . एक ने काकी को पानी दिया . 
सबसे विदा ले कर मै गांव से लौटा . लेकीन अब एक सवाल मेरे साथ चल रहा था , ' ये क्या हो गया ? '. 
इस सवाल के दर्द को मै अपने भीतर महसूस कर रहा था.. वह दर्द था एक पत्नी का , एक मॉं का , एक चाची का और एक स्त्री का ! 
एक स्त्री अपनें जीवन काल में कितनी बार टूटती है.. बिखरती है.. फिर समेटती रहती है अपने अस्तित्व का तिनका - तिनका ! अपरिमित दु:ख सह कर भी सूखने नही देती ममता की गंगा को.. मंगल करने दुनिया का ! कौनसी अलौकिक मिट्टी से बनती है स्त्री ? 
_ चाची, उतने लोगों के बीच नही बोल पाया मै कुछ... भावना के बवंडर में शब्दों का रुकना मुश्किल ही था . ... केवल , ' शांत रहो.. शांत रहो ' कहता रहा , क्यो की आपकी वेदना को शब्द रूप से मै लिख नही पा रहा हूं.. बहुत अदनासा शब्द कोष है मेरा.. लेकीन दिल - दिमाग से समझता हूं , महसूस करता हूं.. ' ये क्या हो गया ?' इस सवाल के जवाब की पीड़ा !!!! ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, December 17, 2022

आशा. ( मराठी कविता ). Marathi language _ मराठी भाषा

आशा
Marathi language _ मराठी भाषा

कंठी तृष्णा
शुष्क ओठ
दृष्टी लोट
मृगजळाचा ....

सत्य नी स्वप्न
दोन तीर
केंद्र शरीर
प्रवाहाचा...

भाळी आठी
कराग्रे पद्म
भाग्य छद्म
करतलाचा...

चाकोरीत पाय
मनी धाडस
भित्रं पाडस
हरिणीचा...

क्षितिजापार
विहंग झेप
कवच लेप
नव आशेचा....

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, December 14, 2022

म्हरी उभयी गो तोर. ( भोयरी कविता ). Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

म्हरी उभयी गो तोर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

म्हरी उभयी गो तोर
डोरा घाडो आयो पूर
म्हरो घास को सपन
भयो बापा चूर - चूर ।धृ।

लाल्यो पराटी पर को
बोंड अरी को बी मार
खेत म क अगास म
रोये चंदर की कोर ।१।

संतरा क बगिच्या म
लिंबू सरखा संतर
घाम क च वलीत को
चुक्यो कहान तंतर ।२।

घेंग गयी गो सोला ला
चिमी बटाना की वर
साजवनी क दिन को
रुस्यो भाऊ मोह्यतूर ।३।

हर जलम च दादा
पासअ लागस इ घोर
कोनअ दुस्मान कन् जी
म्हरो डिठाये सिवार ।४।

कास्तकार को जलम
इठू नाम को गज्यर
सिवार म वारी वानी
म्हरो चलस बखर ।५।

संबा पाराबती म्हरा
दादा गनगोत थोर
हात पाय इ माती का
वोला पानी जसो जोर ।६।

म्हरा बोट कोम्बावस
चित हिवरो पदर
माती माय क कोरा म
पिकवूस गो भाकर ।७।

म्हरो सिक्स्यन माती को
वुभा आडवा काकर
धरतरी क वटा म
म्हरा हिवरा अक्स्यर ।८।

हमी भाव को गनित
कोनअ येडा को मंतर
चाल चालता सपे नी
मुंडो पेट को अंतर ।९।

मला ग्यान नको पाजू
तोरी चोट्टा की नजर
जोड गुना की भावना
भाग घटाव बेपार ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, December 10, 2022

निर्माण - भाग १९

निर्माण - भाग १९
Hindi language _ हिंदी भाषा

दिवाली नजदीक आ रही थी.. साइट पर थोडासा अफरातफरी का माहौल था . ठेकेदार अपनें अपनें अधुरे काम रात - दिन एक कर पूर्ण करने की कोशिश कर रहे थे.. कुछ हमारा भी दबाव था . क्यों की मै भी बिल में ज्यादा से ज्यादा मेझरमेंट्स चढाने की कोशिश में था . 
दिवाली की छुट्टियां कहने को १५ दिन की होती है , लेकीन सभी मजदूर साइट आते आते एक - दो महिने लग जाते है . मजदूर इन छुट्टियों में धान कटाई , घर की मरम्मत , शादी - ब्याह के लिए लडका - लडकी देखना यह सब काम निपटा कर ही साइट आते है.. साइट के काम की परिस्थिती , डॉंट डपट का उन पर कोई असर नही होता... यह तो हर साल , हर साइट की कहानी ! 
अच्छा , काम एक का रहेगा पर उस गॉंव का कोई भी मजदूर नही आएगा .
 छत्तीसगढ की लोक परंपरा में ' मितान ' यह वैशिष्ट्य पूर्ण प्रथा है . मितान यह ऐसी परंपरा है , जिस में दोस्ती रिश्ते में बदल जाती है . और इस दोस्ती में जाति - धरम की रुकावट भी नहीं होती . मितान एक दुसरे का नाम भी नहीं लेते . पुरुष मितान को मितान या महाप्रसाद कहते हैं , तथा स्त्री मितान को मितानिन , महाप्रसाद , भोजली , गजामूंग , गंगाजल कहते है . बच्चें पिता के मितान को फूलददा तथा मितान की पत्नी को फूलदाई कहते है . जितना सरल इन का जीवन होता है , उतनी ही सरल ' मितान ' विधि होती है . 
जमीन पर चावल के आटे का चौक पूर कर उस पर दो पीढ़ा रखते है . मितान बनने वाले / वाली पीढ़े पर खडे हो कर एक - दुसरे पर दूबी से जल के छ़ींटें मारते है . तिलक निकाल कर फूल और धुला या पीला चावल छ़िड़कते है . कान पर फूल , दूबी या जंवारा खोंस कर फूलमाला पहनाते है . एक - दुसरें को नारियल भेंट कर गले मिलते है . मितान भाई की सभी जिम्मेदारी निभाता है . और यह रिश्ता मितान की मृत्यू पर खत्म नही होता.... पीढ़ी दर पीढ़ी यह रिश्ता बना रहता है...
जहॉं भाई ही भाई का दुश्मन बनता है , वहॉं मितान की यह लोक परंपरा मानवीय रिश्तें की अनोखी खूशबू समाज में बिखेरता है . 
मितान के घर कोई कार्य होने से समझ लिजीए की साइट के १० - २० मजदूर एक साथ छुट्टी लेने वाले है . 
मैने हर राज्य के मजदूरों के साथ काम किया है.. पर काम की सफाई , सादगी और भोलापन , सरलता और निश्छलता छत्तीसगढ के लोगो जैसी किसी में नही पाई !!! मेरे दिल में बाकियों से कुछ ज्यादा ही आदर - सम्मान उन के लिए है.. 
दिवाली के सप्ताह में ही वरुण देव अतिप्रसन्न हुए . धुॅंआधार बारिश... सब तरफ बाढ ही बाढ ! ठेकेदार , मजदूर , स्टाफ और खुद मै बारिश का रौद्ररूप देख कर विस्मित भी थे और परेशान भी ! सडक मार्ग बंद ... अब घर जाए तो जाए कैसे ?
 सभी का हिसाब - किताब , लेन - देन हो गया था . अपना अपना सामान बॉंध कर दिवाली के लिए घर जाने के लिए सब तैयार थे.. पर साधन नही !!!!!
साइट से सात - आठ कि.मी. दूर एक छोटासा रेल्वे स्टेशन था . टैक्टर और जीप से मजदूरों को रेल्वे स्टेशन पहुंचाया . दोपहर तक वही काम था.. मजदूर पहुंचाने का . जब सब चले गये तब चौकीदार को छोड हम भी रेल्वे स्टेशन पहुंचे . स्टेशन पर मेला लगा था .  सुबह से भेजे गये मजदूर भी वही बैठे थे . छोटा स्टेशन होने से यहॉं कोई ट्रेन रुकती नही थी... कुछ मालगाडियॉं लाइन क्लियर नही मिलने से ही रुकती थी . शाम के पहले एक मालगाडी रुकी.. लोगों के झुंड ने मालगाडी पर कब्जा कर लिया . रेल्वे स्टेशन के स्टाफ की कौन सुनने वाला था... वे असहाय से वह नजारा देख रहे थे . बहुत देर तक मालगाडी रुकी रही... ठेकेदारों ने मेरी व्यवस्था गार्ड के छोटेसे डिब्बे में कर दी . अंत में मालगाडी चल पडी और सब लोग उत्साह से चिल्लाने लगे . शाम को मालगाडी रुकी.. लेकीन वहॉं न स्टेशन न गॉंव ! लेकीन नदी क्रॉस हो चुकी थी . सब उतरे और पटरी की किनारे से चलने लगे . 
चलते चलते रात में बडे स्टेशन का उजाला दिखा.. सब के जान में जान आई . अब यहाँ से सडक मार्ग और रेल्वे मार्ग दोनों उपलब्ध थे . सब के चेहरे पर दिवाली की खुशी चमक रही थी.. दिन भर की तकलीफ गायब हो गयी थी उस रोशनी में...... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, December 9, 2022

आज्ञा और जिम्मेदारी. Hindi language _ हिंदी भाषा

* आज्ञा विशिष्ट है... एकदिश है...यह हमेशा बड़ों द्वारा छोटों को किसी काम के लिए कहना है..
* जिम्मेदारी का पटल विस्तृत है.. इस के दायरे में छोटें - बडें सभी आते है .. यह बहुदिश है..
* आज्ञाकर्ता का स्थान एक विशेष स्तर में होता है...
* जिम्मेदारी निभाने वाले हर स्तर में होते है..
* दोनों के आयाम को देखते हुए ' आज्ञा ' देना सरल दिखता है , पर यह शत प्रतिशत सच नही होता.. 
* आज्ञा देने का स्थान पाना यह अपनें आप में कठीण है . तथा आज्ञा का निर्माण कई कर्म संस्कार के बाद ही कर सकते हैं . 
* निष्कर्ष : आज्ञा देना जितना सरल दिखता है , उसकी पार्श्वभूमी उतनी ही दुष्कर होती है . 
* जिम्मेदारी निभाना हर समय ,हर स्तर पर मुश्किल होता है . यह ना सरल दिखती है ना सरल होती है . !!
* जिम्मेदारी में उचित कर्म निहित है . यह अपनें व्यक्तित्व की परीक्षा लेती है . 
* जिम्मेदारी को सफलता - असफलता के मापदण्ड लगा सकते है.. इसे तौला जा सकता है ..
* आज्ञा विशिष्ट व्यक्ति देता है..
जिम्मेदारी हर किसी को निभानी होती है ( उसकी क्षमता हो या न हो..) .. इस परिप्रेक्ष्य में जिम्मेदारी निभाना ही मुश्किल लगता है..

_ लेखक :  सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, December 7, 2022

मधुर वेदना ( मराठी कविता ). Marathi language _ मराठी भाषा

मधुर वेदना
Marathi language _ मराठी भाषा

पापण्यांचे भिरभिरते पक्षी
गालांवर अश्रू रेखिते नक्षी

विस्कटलेली भांगेची वाट
अडखळणारी केसांची लाट

भाळी कुंकवाची रवि प्रतिमा
कपोलांवर उषेची लालिमा

भुवयांचे क्षितिज वर्तुळ
नभी स्मृतीमेघांची वर्दळ

नासिकाग्र लालबुंद जीवघेणा
अंत:करणात मधुर वेदना

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, December 2, 2022

मनाला स्पर्शून गेला ( मराठी कविता )

मनाला स्पर्शून गेला
Marathi language _ मराठी भाषा

एक बोल
उबदार
मनाला स्पर्शून गेला .
कहाणी _ 
जी अपूर्ण होती
ती पूर्ण झाली ,
अधरांवर एक
नवीन लकेर
तरंगून गेली . ....

एक चेहरा
हुरहूर
मनाला लावून गेला . 
पापणी _
कस्तुरीगंध
स्वप्न मार्गातून
मधासारखी नितळ ,
सलज्ज
हळूच खुलली.....

एक कटाक्ष
नयनशर
मनाला भेदून गेला .
मनी _
आनंदाने तारका
धारण केल्या , 
हवेत तरंगती
गुलाबी सावल्या...

एक मृग
तृष्णेचा तर
मनाला स्पर्शून गेला....

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, December 1, 2022

भाव पस्तुरी ला आयो. Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भाव पस्तुरी ला आयो
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

माल मोंडा को निलाम
वाया दलाली म गयो
जुगाड क तंतर न
भाव पस्तुरी ला आयो ।

सारो उरफाटो न्याव
साव कयीद म गयो
चोट्टाना ला हार तुरा
भाव पस्तुरी ला आयो ।

सीधा सरखा ला भेव
जीव टांगनी लगायो
उखलेस भरवसो
भाव पस्तुरी ला आयो ।

सेक चुल्हा क भोग ला
डल्लो वूला न दबायो
कल्लो गली येटार म
भाव पस्तुरी ला आयो ।

कापूर क बट्टी वानी
जीव खप कन् गयो
अधरयेल माया न
भाव पस्तुरी ला आयो ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, November 23, 2022

अजब गजब - ९९ : जलालखेडो ( किल्लो ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९९ : जलालखेडो
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति 
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

नागपुर पासीन ८० कि.मी. दूर काटोल क आघ नरखेड तहसील म स जलालखेडो . मालवो आन् दक्खन क मंझार या जागा खास स . येनअ मोक्का क जागा प वरधा आन् जाम्ब नदी को संगम स . या संगम की जागा हेर कन् इ.स. ४०० क आघ पासअ वाकाटक राज्या न यहान भुईकोट किल्लो बांध्यो . किल्ला की मांडन असी क वो क मोक्का पर तीन गाव को तिरकोन बनस . तिरकोन क तीन कोन बिंदू पर तीन गाव _ १. आमनेर २. मुक्तापुर ३. जलालखेडो . ( तेकन च इतिहास म कयी जागा प येला ' आमनेर ' किल्लो बी कव्हस . ) 
* आबअ येनअ किल्ला की ' सोमेस्वर देवस्थान किल्लो ' असी वरख पडीस . 
* इतिहास : # इ.स. ४०० क आसपास वाकाटक राज्या न इ किल्लो बांध्ये . 
# वाकाटक राज क बाद रास्ट्रकूट राज आयो .
# इ.स. १२०० वरी यहान राजो सोमेस्वर तिरिभुवमल राज करत होतो . 
# सोमेस्वर राज्या क बास्त देवगिरी क यादव राज्या क हात खलतअ इ किल्लो आयो . 
# मुघल का मांडलिक देवगढ का गोंड राज्याना को राज आयो . 
# अल्लाउद्दिन खिलजी पासीन यहान मुसलमानी राज आयो . ( जलालखेडा को नाव पह्यलअ दुसरो होयेन , मुसलमानी राज म येनअ गाव को नाव जलालखेडो धरे होयेन , असो म ला वाटस . ) 
# इ.स. १७३८ म नागपुर को राज्यो रघुजी भोसले न गोंड राज्या ला हाराय कन् इ किल्लो जित्यो आन् तब पासीन यहान मराठी राज सुरू भयो . 
# इ.स. १८२० म यहान अंगरेजी अंमल चालू भयो , ती इ.स. १९४७ वरी !
# इ.स. १९७० म यहान क ' सोमेस्वर देऊर ' को नवो बांधकाम भयो . 
# आमनेर ( जलालखेडा ) को किल्लो आन् भोयर : इ किल्लो मालवो आन् दक्खन क मंझार स . बेपार पानी येनअ रस्ता कन् होत होतो . मुसलमानी राज क कह्यर म येनअ किल्ला न भोयर वंस ला आसरो देये . येनअ किल्ला क दक्सीन बाजू किथीन भोयर समाज का गावना चालू होस ती सीधा कारंजा - भोरगड - जामगड वरी . गोंड राज आन् भोसला राज क बेरा म भोयर समाज येनअ पट्टी म बसे . तेकन भोयर संस्कृति म ' आमनेर - जलालखेडा किल्ला ' को महत्त्व बेगरो च स . येनअ किल्ला क फऊज म काम कऱ्यो आन् वकी भेटी जमीन पर कास्तकारी करी . कयी भोयर लोगना ला मालगुजारी बी भेटी . 

* रचना :
# वाकाटक राज्या क इंजिनियर न या भौगोलिक , आर्थिक आन् बचाव क हिसाब कन् मोक्का की जागा किल्ला साठी खोजी . 
वरधा - जाम्ब नदी क संगम कन् दुय आंग को बचाव आपरंग च होतो . वून न संगम पर की २५ येकड  जागा हिंद्यानी आन् येक मोठ्ठो नालो ( खंदक ) खंद कन् दुय नदीना जोड देयी . आबअ या २५ येकड की जागा येक असो टापू बन्यो , जेकअ चारी आंग नदी बाहात होती . बचाव को येतरो पुख्ता इंतजाम भयो . सूर्व्यामुखी किल्ला को मुख्य दरुजो स . दरुजा पर गनेसपट्टी दिसस . बाकी साजरपन सिमिट  पलस्तर क खलअ दब गयेस . येनअ दरुजा पासीन दुय बाजू किल्ला की दीवाल ( भीत ) नदी क काठ काठ कन् बनीस . येनअ दीवाल म ८ बुरुज स . बुरुज ५५ हाथ उच्ची आन् २० हाथ चवडा स .  बुरुज ला कारअ पास्यानी दगड कन् बांध्येस . हर दगड म खोबन स , जेमअ लोहा की पट्टी स . या पट्टी वरतअ क आन् खलतअ क दगुड ला कप्पी पकड कन् धरस . येतरअ बरस क पानी - बाढ की मार झेल कन् बी वूभो रह्यो इ बुरुज मानुस की मार नी झेल सक्या ! येनअ किल्ला म लोग खेती करन लाग्या आन् इतिहास क सोना क पत्ता कातर - कातर कन् खाय गया . सारो किल्लो बरबाद कर डायेस . 
* किल्ला पर सोमेस्वर देऊर क आघ हत्तीखानो होतो ... मोठो बांध्यो तलाव होतो , वो ला सिमिट कन् मयदान बनायेस . बालेकिल्ला पर चेंगन क बेरा डाखअ हाथ प भीर दिसस . नान्ह मुंडा की येनअ भीर ला आब बी पानी स . यासीन पानी की पाइपलाइन दिसस , ज्या खपरैल क पाइप कन बनीती . 
* सोमेस्वर महादेव को देऊर जुनोच होयेन पर आब जी सिवलिंग दिसस ती चिमाजी अप्पा भोसला न नेपाल परीन ल्याईती , असी मान्यता स . पुरानअ जमाना म यहान सोना को सिवलिंग होतो , असी बी मान्यता स .
* यहान क काली मंदिर को दिवो आस्टी गाव परीन दिसस . 

# उत्सव : नवरातरी , रिसीपंचमी , सरावन मह्यनो , महासिवरातरी ला यहान मेलो भरस . 
* इलाखा का लोगना यहान च दसवो करस . 

_ भोयर की कर्मभूमी रही येनअ किल्ला आन् सोमेस्वर महादेव ला नमन !!

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, November 17, 2022

तरंग ( मराठी कविता ). Marathi language _ मराठी भाषा

तरंग
Marathi language _ मराठी भाषा

हिरण्यगर्भाची अक्षय्य उर्जा
लेवून पंखात
घेतली भरारी
नील आकाशात
शशांक वर्तुळ
दृष्टीपथात
विचरतो आहे मन विहंग ।

शांत अथांग सागराची चकाकी
घेऊन डोळ्यात
नवीन उभारी
रोमारोमात
आकाशगंगा
पूर्ण कह्यात
लहरती आहे जल तरंग ।

वास्तवाची दाहक सत्यं
रेखून डोक्यात
आणी शिसारी
घन अंधारात
केशरी उषा
गुलाबी स्वप्नात
विखुरली आहे रात्र अभंग ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, November 12, 2022

आवर्त ( मराठी कविता ). Marathi language _ मराठी भाषा

आवर्त
Marathi language _ मराठी भाषा

झळाळते मृगजळ
झाकोळते भोळे डोळे
चित्त पंकमय तळे
कसा यशस्वी मी पार्थ ?

गुंफून हावरा कोळी
काळे पातकाचे जाळे
आत स्वतः तळमळे
कसा सफळ मी सार्थ ?

नात्या - नात्यांमध्ये जाळ
सत्य - असत्य हे खुळे
रक्त एकच साकळे
कसा मनी धारातीर्थ ?

अपुरे हे गंगाजळ
अधांतरी दीप जळे
चहुबाजू ढग काळे
कसा पावन मी तीर्थ ?

झाले स्वप्नांचे आभाळ
छळे सौदामिनी जाळे
मार्ग दिशांना ना कळे
कसा भेदू मी आवर्त ?

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, November 10, 2022

किसना सुदामा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

किसना सुदामा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

लिख्या पढ्या संग संग
अवंतिका महाधामा
गुरू सांदिपनी का चेला
दोस्त किसना सुदामा ।१।

देव किसना की रानी
रुखमनी सत्यभामा
राजो येनअ दुनिया को
दोस्त किसना सुदामा ।२।

नांदो लगायो सुसीला
जावो दवारका धामा
संग देया दही पोहा
दोस्त किसना सुदामा ।३।

धरी पयदल बाट
कलपी अंतरातमा
गयो कोचम सोबती
दोस्त किसना सुदामा ।४।

खायो पोहो परसाद
नहीं रिस्ता ला उपमा
करी वरसार देव
दोस्त किसना सुदामा ।५।

भयो अखजी क दिन
चमत्कार अनुपमा
मांग्या बिगर किरपा
दोस्त किसना सुदामा ।६।

असो दोसती को नातो
भारी न्यारी च महिमा
गंगा वानी निरमल
दोस्त किसना सुदामा ।७।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, November 8, 2022

निर्माण : भाग - १८

निर्माण : भाग - १८
Hindi language _ हिंदी भाषा

आज सुबह कुछ धूप खिली थी.. सूर्य भगवान के दर्शन तो नहीं हो रहे थे , पर उजाला जरूर था.. बारिश भी थम गयी थी.. हल्की बूॅंदा बॉंदी हो रही थी.. सब ने राहत की सॉंस ली . बाढ़ का जलस्तर भी धीरे धीरे कम होने लगा . खदान के सडक का पुलिया दिख रहा था . हालांकि अभी भी पानी उस के ऊपर से बह रहा था.. हमारे ड्रायव्हर ने पानी में जीप उतारी और साइट की ओर आने लगा . साइट आ कर पहले उस ने रकम मेरे हवाले की.. मैने कुछ रुपये अपने पास रखें और बाकी अकाऊंटंट को सौंपे.. 
मै ड्रायव्हर के साथ शहर आया , जहॉं मजदूर अस्पताल में भर्ति था . डॉक्टर से मिल कर हिसाब किताब किया . कुछ रकम मजदूर की पत्नी को दी . तब तक ड्रायव्हर एक टैक्सी ले कर आया . मजदूर और उस के परिवार को उन के गांव रवाना किया . फिर मेरी क्लासमेट के घर जा कर उन के पैसे दिये . 
' चलो , आता हूं.. बहुत बहुत धन्यवाद अंकल.. ' मैने क्लासमेट के पापा से कहा . 
' अरे बेटा , खाना खा कर जाओ.. बडी मुसीबत से बचे हो आप लोग.. और कोई कारण से आना होता है.. ना मत कहो..' अंकल ने आग्रह किया..
खाना खा कर हम साइट पर आये . सभी ठेकेदारों का हिसाब किया और पेमेंट की . सभी मजदूर नदी की बाढ़ देखने गये थे . 
हम भी वहॉं पहुंचे.. दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें थी . सडक किनारे अस्थाई रेस्टॉरंट खुल गये थे . यहॉं तो मेले का माहौल बन गया था ! 
नदी किनारे  उॅंचे उॅंचे बबूल के पेडों पर कुछ मृत तो कुछ मुर्छित सांप लटके थे.. बाढ़ के रौद्र रूप को देख कर बदन में झुरझुरी - सी दौड गयी.. जीप बाढ़ के पानी से नजदीक ही थी.. बाढ़ का मंजर देख ही रहे थे की सुपरवाइझर चीखा . 
' साहब , यहॉं सांप है..' उसने कहा . 
' कहॉं है ?' मैने पूछा . 
' जीप के टायर पर..' उस ने दूर से दिखाते हुए कहा . 
' ये कब आया ? ' ड्रायव्हर ने आश्चर्य से कहा . 
अब जीप के पास भीड इकठ्ठा हो गयी . बेचारे उस सांप में ताकत ही नही बची थी.. मजदूरों ने लंबी लंबी लकडियों से उसे दूर फेंका . 
हम वापस साइट आये . 
कल यहॉं से निकलना था . 
' मै परसो ट्रक भेजूगा.. सारा सामान लोड करना . बचेगा तो और ट्रक बुलाना . ट्रैक्टर के साथ पहले टैंकर भेज दो और बाद मे मिक्सर मशीन भेजना . ' मैने कहा . 
' ठीक है साहब..' साइट इंजिनिअर ने कहा . 
' और जिन्हें घर जाना है , वे अभी छुट्टी ले लो.. कौन कितने दिन के लिए जा रहा है _ यह अभी बताना..' मैने कहा . 
_ एक साइट का काम इस तरह खत्म हुआ था... !!! खौफ और हादसों से...!! ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, October 31, 2022

चाकोरी

चाकोरी
Marathi language _ मराठी भाषा

आज माझ्या स्कूटरखाली पिटुकली खारुताई चेंगरून ठार झाली . ... भेदरलेली खार सडक पार न करता माझ्याच चाकोरीने पळायला लागली . ती चाकोरी सोडेल , असा माझा अंदाज होता _ म्हणून मी  हॅन्डल न वळवता सरळच चालवत होतो . कदाचित मी वळतानाच ती पण वळेल , अशी पण भीती ! 
प्रथम माझ्या डोक्यात ती खार सडक पार करेलच _ असे का यावे ?
' सडक मानवासाठी आहे , खारीसारख्या क्षुद्र जीवाला त्याची काय आवश्यकता ?' , अशी सुप्त अहंकारी स्वामित्वाची जाणीव आधी झाली . 
नंतर भूतदया जागृत झाली ... चक्रव्यूहात फसल्यानंतर , जेथे मला ' जर - तर ' शी तडजोड करावी लागली . परंतू ती अयशस्वी ..
आणि ह्या शोकगर्भ क्षणिकेचा अखेर झाला खारीच्या मृत्यूत !
माझ्या वरचढपणाचा पराक्रम मी त्या दुबळ्या जीवावर असा गाजवला ( ? ). मी वेळीच थांबून व खारीची दिशा ओळखून वाहन चालवू शकलो असतो . मग हा निर्णय मला त्वरित का घेता आला नाही ? माझी एकांगी निर्णयशक्ती एका जीवाच्या हकनाक बळीला कारणीभूत ठरली . 
माझ्या चाकोरीत शिरण्याची तिची चूक की मी माझं चाकोरी न सोडता चालणे ; ह्यात माझी चूक ?
_ पश्चातापाची शिक्षा तर मला झालीच आहे......९६

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

यादें _ सवाल की ! भाग - १८

यादें _ सवाल की !
भाग - १८

कुछ सवाल दिल में टीस पैदा करते है जिंदगी भर ! ' गलती किसकी ?' इस सवाल का जवाब तकलीफदेह होगा.. यादें कसक भरी !
आज मेरी स्कूटर से एक नन्ही सी गिलहरी जान गयी . डरी हुई गिलहरी सडक पार करने की बजाए दौडती रही स्कूटर के आगे आगे..वह रास्ता छोड कर सडक पार करेगी , ऐसा मेरा अनुमान था . ... इस लिए मै हैंडिल न घुमा कर सीधा चला रहा था . मेरे स्कूटर मोडते ही वह भी दिशा न बदल ले _ यह भी डर था . 
सबसे पहले वह गिलहरी सडक पार करेगी ही , यह बात मेरे दिमाग मे क्यों आई ? ' सडक इन्सान के लिए है , गिलहरी जैसे जीवजंतू को उसकी क्या जरुरत ? ' ऐसी सुप्त अहंकारी स्वामित्व की भावना पहले आई . 
बाद में भूतदया जाग्रत हुई . चक्रव्यूह में फंसने के बाद मुझे ' अगर - मगर ' से समझौता करना पडा . ... लेकीन यह समझौता असफल ! और आखिर इस शोकगर्भ क्षणिका का अंत हुआ गिलहरी की मृत्यू में . 
मेरे प्रभुत्व का पराक्रम मैने उस निरीह प्राणी के प्राण पर दिखाया . मै उसी समय रुक कर और गिलहरी की दिशा पहचान कर स्कूटर चला सकता था..फिर यह निर्णय मै शीघ्र क्यों नही ले पाया ? मेरा एकतरफा निर्णय एक निश्छल जान की बली के लिए कारण बना . 
मेरे रस्ते से उसका चलना , यह उसकी गलती या मैने मेरा रास्ता न छोड कर चलना _ मेरी गलती ?
आत्मग्लानि की सजा तो मुझे मिल ही गयी है.....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, October 30, 2022

स्मृती चिन्ह

स्मृती चिन्ह
Marathi language _ मराठी भाषा

दग्ध व्याकूळ नयन
आहे बेलगाम मन
जाळे गुरफटलेले
प्रश्नचिन्हांचे जीवन ।

काळी गडद रजनी
धुरकट सूर्यबिंब
आशा विषण्ण हृदयात
छिन्नभिन्न प्रतिबिंब ।

भूतकाळी बघताना
येतसे भरुनी डोळे
ओठांवर अंकित ग
तुझ्या प्रीतीचे सोहळे ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, October 29, 2022

बगळ्यांची फुले

बगळ्यांची फुले
Marathi language _ मराठी भाषा

तुझ्या उष्ण श्वासाचे तरंग हेलकावित असते मला
कवटाळतो मजला स्निग्ध बाहुपाशाचा रेशमी झूला ।

आभाळाच्या ओल्याचिंब मिठीत हिरवळली दग्ध भूमी
अलौकिक अनुभूती पल्याड सखे अद्वय तू अन् मी ।

तुझ्या अनघ हृदयातून प्रीतिसुधा अविरत वाहते
माझ्या स्वप्नाचे क्षितिज हे तुझ्या डोळ्यात विस्तारत जाते ।

ह्याच डोळ्यातील स्वप्नाने भातुकलीलाच जीवन केले
मनाच्या मिलनाने जन्मोजन्मीचे वचन दिले - घेतले ।

फिरुनी भातुकली , तीच पावसाळी वेडी कागदी होडी
चिमुकल्या मुठीतील जिक्कन जीवनास देतसे गोडी ।

असेच ओलेचिंब दिवस , ओल्या वाळूत घर बांधणे
इवल्या इवल्या नखांवर ही बगळ्यांची फुले मागणे ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर ( ०२ )

Friday, October 28, 2022

निर्माण : भाग १७

निर्माण : भाग - १७
Hindi language _ हिंदी भाषा

३ दिन ढलाई का काम चला . आसमान में बादल घुमडने लगे थे . मुझे इस साइट का Bill बना कर दुसरे साइट जाना था . ढलाई खत्म होने के बाद दुसरें दिन ही मैने बाहरी शटरिंग खोलने के लिए बताया ... हल्की बारिश चालू थी. Bill बन रहा था . 
दवाखाने से ठेकेदार वापस आया . उसने एक मजदूर अस्पताल में रखा था मरीज के पास . मरीज की बीवी भी अस्पताल में आई थी . अस्पताल में और पैसे भेजने थे . सभी ठेकेदारों का हिसाब कर पेमेंट करनी थी . सब सामान और मशिनरी दुसरे साइट शिफ्ट करनी थी . 
रात में मुसलाधार बारिश शुरू हुई . हम रात भर जागते रहे . बारिश थमने का नाम ले रही थी . कोयला खदान से दो कि.मी. दूर बडी नदी थी . और खदान के रास्ते मे एक नाला था . लगातार हो रही बारिश से नदी खतरे के निशान से उपर बह रही थी . पुल के उपर से बाढ का पानी बह रहा था . खदान के रास्ते वाले नाले का पानी नदी की बाढ की वजह से रुक गया था... नाले के उपर का पुलिया भी जलमग्न हुआ था . नदी की भयंकर बाढ से छोटे - बडे नालों का पानी समुंदर की तरह खदान की चारों ओर फैल गया था . खदान की निकली मिट्टी का बांध ही खदान को बचाए रखा था . साइट एक टापू में बदल चुकी थी . आने - जाने के सारे रास्तें बंद थे . 
हम पैदल नाले तक जाते और वापस साइट पर आते थे . आज बारिश का तीसरा दिन था . खदान की चारों ओर पानी ही पानी था . मिट्टी की दिवार पानी को रोके थी . बारिश नही रुकी और मिट्टी की दिवार ढह गयी तो खदान , साइट और हमारा क्या होगा ??
नाले के उस पार हमारी जीप आई थी . ड्रायव्हर के पास ही साइट के पैसे भी थे . हम दूर से उसे देख सकते थे !! लेकीन...
डिपार्टमेंट के मजदूर और स्टाफ भी खदान में ही फंसा था . इतनी बारिश और बाढ आज तक नही आई थी . अगर खदान डूब गयी तो !!! सब चिंता में थे . साइट पर सब के लिए चाय बन रही थी.. लेकीन सब को खाना खिलाना मुश्किल था . 
बाढ की खबर फैल जाने से सब के घरवाले चिंतित थे . बिजली गुल थी ... खदान का जनरेटर चालू था , पर कितने दिन चल पाएगा !!!
सडक पर वाहनों की लंबी कतार थी.. डिपार्टमेंट ने एक आलू और चावल का ट्रक खोज लिया था . लेकीन आलू और चावल के बोरे खदान तक कैसे पहुंचाएं , यह बडी समस्या थी . 
पांचवे दिन एक  राफ्ट खदान की ओर आते दिखा . डिपार्टमेंट के सेफ्टी विभाग का दल था . वे कुछ अफसरों को ले कर गये और वापसी में आलू और चावल के बोरे ले कर आए . बडे - बडे बर्तनों में खाना पकने लगा . चाय - बिस्कुट बटने लगी . जलस्तर और बढने से राफ्ट का आना रुक गया . 
बचे लोगों के लिए आलू चावल दावत के समान था . खदान में रखे बडे बडे लकडी के खंबे जलाने के काम में आ रहे थे . सब चारों ओर बैठ कर किस्से कहानी साझा कर रहे थे . इस जलप्रलय ने सबको इकठ्ठा बांध रखा था .
 एक दिन दोपहर को हेलिकॉप्टर से खाद्यसामग्री गिराई गयी . सब मजदूरों ने उसे ऑफिस में जमा की . खदान के मैनेजर अभी भी खदान में ही रुके थे . उन्होंने अपने और हमारे मजदूरों को समान मात्रा में खाद्यसामग्री बांटी . यहॉं फंसे हुए सब अपने थे.... कोई पराया नही था !!!!
बारिश कुछ कम हुई लेकीन जलस्तर ज्यों का त्यों था . 
रेत के बोरे भरे जा रहे थे . जहॉं भी आशंका होती , वहॉं मिट्टी के बांध पर उन्हें रखा जा रहा था . सब मिट्टी की दिवार की निगरानी कर रहे थे .. अब पानी और हमारे बीच केवल यह मिट्टी की दिवार ही थी..... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, October 19, 2022

महा तिवार दिवारी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

महा तिवार दिवारी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

नान्ही सी च दिवनाल
पडी अंधार ला भारी
आयी चान्नीना ले कन
महा तिवार दिवारी ।

लक्षुमी को वरदान
भयी खंडीनअ जवारी
आंब्या बार को संतरो
महा तिवार दिवारी ।

गायगोंधन को खेल
डोयरा की आयी बारी
धुमधडाल फटाका
महा तिवार दिवारी ।

वोवारनी भाऊबीज
फरार आन् सुवारी
खानपेन की स मज्या
महा तिवार दिवारी ।

माय को हिरदो मोठो
बांधस नव नवारी
दाआजी को लाड प्यार
महा तिवार दिवारी ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, October 18, 2022

यादें _ सवाल की ! - १६

यादें _ सवाल की ! - १६
Hindi language _ हिंदी भाषा

दिव्य अस्त्र की तरह अनचाहे - अकल्पित सवाल सनसनाते हुएं धन्य कर जाते हमारे कर्णपटल को... और झनझना उठते है मस्तिष्क के तार... ऐसे अनपेक्षित सवाल का तात्काल जवाब भी नहीं होता है हमारे तूणीर में ! 
मै एक स्कूल मे अपना स्पर्धा कार्यक्रम " Express in a minute " के संचालन और " motivational speaker " के तौर पर आमंत्रित था . स्पर्धा संपन्न हुई .. मैने विजेताओं की घोषणा कर उन्हें पुरस्कार और प्रमाणपत्र बॉंटे . इसके पश्चात मैने अपनी speach दी . संपूर्ण कार्यक्रम होने के बाद मै निकल रहा था , तब बच्चों ने मुझे घेर लिया . अपनी queries पूछने लगे .. मै यथासंभव जवाब देने की कोशिश कर रहा था . 
मेरा परिचय देते हुएं मुख्याध्यापक सर ने मेरी qualifications और वर्तमान में चल रही पढाई तथा व्यवसाय की जानकारी विद्यार्थियों को दी थी . 
मै कार में बैठ ही रहा था , तब एक विद्यार्थी दौडते हुएं आया और मैने speach मे History की पढाई का जो तरीका बताया था , उसे विस्तार से पूछने लगा.. मैने उसकी जिज्ञासा की पूर्ति करने की कोशिश की.. फिर अंत में दनदनाता हुआ सवाल किया , ' सर , आप अभी भी " टाइमपास " के लिए पढाई कर रहे है क्या ?' 
नववी कक्षा के उस विद्यार्थी को क्या जवाब दू !?
' आप ऐसा क्यो सोच रहे हो...? ' मैने पूछा . 
वह झेंप गया.. 
' बस् , कुछ नहीं सर..:' वह सिर झुका कर बोला..
मै स्कूल से निकल कर नागपुर की ओर आ रहा था.. लेकीन उस विद्यार्थी का सवाल मेरे साथ ही आ रहा था.. टाइमपास !!!
ज्ञान अर्जन = टाइमपास ... यह equation अब दिमाग में भी तांडव कर रहा था...
फिर मेरे आगे के कार्यक्रमों में ज्ञानार्जन के महत्त्व का मुद्दा जुड गया.. महिने - साल बिते.. कार्यक्रम चलते रहे...
फिर ' कोरोना युग ' आया.. दो वर्ष भय में कोरे ही गुजरे..
रात के आठ बज रहे थे शायद . मै स्टडी रूम में PhD course work का assignment लिख रहा था . मुझे हॉल में आने के लिए आवाज लगाई गयी . अभी कौन आया होगा , यह सोचते सोचते मै नीचे आया . हमारी कालोनी की सोसायटी के एक बुजुर्ग सदस्य और एक वयस्क व्यावसायिक बैठे थे . मैने पधारने का प्रयोजन पूछा . कालोनी की कुछ समस्याएं थी और उसका निवेदन महानगरपालिका को देना था , उसे लिखवाने के लिए वे आए थे . मैने महानगरपालिका के नाम से एक पत्र लिखा और सब कालोनीवासियों के हस्ताक्षर लेने के लिए कहा . 
वयस्क इंजिनिअर व्यावसायिक ने मुझे  कहा की , आप भी साथ चलिए. 
' मै अभी assignment लिख रहा हूं , इस लिए क्षमा किजीएगा .' मैने कहा .
' अभी कौनसा assignment लिख रहे हो ? ' उन्होंने अचरज से पूछा . 
' जी .. PhD course work का...' मैने जवाब दिया . 
' आप का व्यवसाय है.. फिर PhD क्यो कर रहे हो ? टाइमपास के लिए..' उन्होंने सवाल दागा . 
तीन साल पहले का वही सवाल मेरा पीछा छोडने तैयार नही था !!!!
' टाइमपास ? आप ऐसा सोचते हो...' मैने सयंत स्वर में कहा.
' नही.. आप का बिझनेस है.. आप इंजिनिअर भी है.. आप नौकरी करने से तो रहे... फिर PhD का क्या फायदा ? उन्होंने अपना तर्क बताया . 
' पढाई , ज्ञानार्जन यह आपको टाइमपास लगता है और इस में फायदा - नुकसान भी खोजते हो...' मैने कहा . 
बुजुर्ग सदस्य पशोपेश मे थे...
' साहब , हम आते है.. आज जितने हस्ताक्षर मिलते है , वह लेते है और बचे कल ले लेंगे.. राम राम जी..' खडे हो कर बुजुर्ग सदस्य ने कहा . 
मै उन्हें छोडने गेट तक गया.. 
वापस आया तो वह सवाल मेरे साथ ही आया.... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, October 13, 2022

निर्माण _ भाग - १६

निर्माण _ भाग - १६
Hindi language _ हिंदी भाषा

सुबह - सुबह ऑंख लगी... सब नाश्ता कर के साइट पर गये...
' साहब , चाय लिजीए... ' खानसामा ने मुझे जगाते हुए कहा . 
' टाइम क्या हुआ ? ' मैने ऑंख मलते हुए पूछा . 
' दस बजने वाले है.. ' उसने टेबल पर चाय और पानी रखते हुए कहा . 
मै नहा - धो कर साइट पर पहुंचा . ड्रॉइंग के हिसाब से सरिया चेक कर रहा था.. कुछ गलतियां थी . साइट इंजिनिअर को बता कर कुछ सरिया और डालने के लिए बोला और नाश्ता करने वापस गया . 
आखरी सेक्शन होने की वजह से heavy reinforcement था . ३२ मि.मि.और ४० मिमि diameter की सरिया थी . एक एक बार ही ६०/७० कि.ग्र. का था . काम खत्म होने की कगार पर था और बरसात का मौसम भी शुरु होने वाला था , इस लिए हर ठेकेदार के पास बहुत कम मजदूर बचे थे . क्यों की काफी सारे मजदूर अपने अपने गांव चले गये थे . अब जितने मजदूर थे , उन्ही से काम चलाना था . 
डिपार्टमेंट के इंजिनिअर भी आ गये . अब reinforcement का measurements ले कर ढलाई ( concreting ) करनी थी . हम चाय पी रहे थे , तभी नीचे से जोर जोर से आवाज आने लगी . मुझे कुछ जबरदस्त गडबड होने की आशंका हुई . हम दौडे दौडे साइट पहुंचे . आखरी सेक्शन के स्लैब पर मजदूरों की भीड थी . सुपरवाइझर हॉंफते हॉंफते उपर आ रहा था . 
' क्या हुआ ? ' मैने पूछा . 
' साहब एक मजदूर सरिया के साथ नीचे गिरा है.. मै आपको बताने के लिए ही आ रहा था . ' सुपरवाइझर ने कहा . 
' हे भगवान !!!.... चलो नीचे...' मैने कहा . 
मुझे देख कर सब बाजू हुए.. लोहे वाले ठेकेदार का एक आदमी कंक्रिट की दिवार के बाहर गिरा था . कुछ मजदूर उसे निकालने के लिए वहॉं उतरे थे . मैने सभी मजदूरों को उपर भेजा और सबको शांत रहने की हिदायत दी . मजदूर कम होने से केवल तीन आदमी एक भारी सरिया ले कर आए थे . दो मजदूर दो कोने पर और एक ने बीच में सरिया को पकडा था . वह एक ' C ' आकार की सरिया थी . दो मजदूर इस काम के अभ्यस्त थे पर एक कोने वाला मजदूर नया था . सरिया रखते समय दो अभ्यस्त मजदूरों ने सरिया नीचे रखने के लिए छोड दी , जब की नया मजदूर उसे पकड कर ही रहा . जब भारी भरकम सरिया एक तरफ से गिरी तो दुसरी बाजू पकड कर रहने से उछली . सरिया के उछलते ही वह नया मजदूर हवा में फेंका गया और सीधा निचे गिरा . 
मजदूर उसे उपर ले कर आए . वह बाए हाथ के बल गिरा था . वह हाथ फ्रैक्चर हुआ था . साइट पर टू व्हीलर के अलावा कोई साधन नही था . मैने तुरंत अपनी स्कूटर निकाली . उस मजदूर के साथ उसके ठेकेदार को स्कूटर पर बिठा कर मै उन्हें शहर ले आया और दवाखाने मे भर्ति कराया . रात भर की थकान और यह हादसा... मै मानसिक और शारिरिक तौर पर टूट रहा था . मैने डॉक्टर से बात की , ठेकेदार को समझाया.. तब तक साइट इंजिनिअर और सुपरवाइझर वहॉं पहुंचे . मै सुपरवाइझर और ठेकेदार को वही छोड कर साइट इंजिनिअर को ले कर वापस आया . साइट आ कर डिपार्टमेंट के इंजिनिअर के साथ measurements लिए और ढलाई शुरु की . डिपार्टमेंट के इंजिनिअर को आज दिन भर साइट पर रुकने के बोला . और मै वापस दवाखाने मे पहुंचा . 
' ऑपरेशन करना होगा...' डॉक्टर ने कहा . 
' जी , आपको जो उचित लगता हो , उस हिसाब से treatment किजीए...' मैने कहा . 
' आपको अभी ५०,०००/ रुपया जमा करना होगा..' डॉक्टर ने कहा . 
' जी , मै एक घंटे के भीतर पैसे जमा करता हूं.. आप ऑपरेशन किजीए..' मैने कहा . 
अभी मेरे पास इतने पैसे नही थे.. उस शहर में मेरी एक क्लासमेट रहती थी .. वही एक उम्मीद की किरण थी . 
मै एक बार ही उसके घर गया था , इस लिए location साफ साफ याद नहीं आ रही थी.. फिर भी निकल पडा.. काफी जद्दोजहद के बाद उसका घर मिला . मुझे देख कर उसे आश्चर्य हुआ . मैने सारी राम कहानी बताई . उसने पिताजी से बात की . उसके पिताजी मेरे साथ बैंक आए .. और मुझे रकम निकाल कर दी . फिर हम दोनों अस्पताल आए . वह डॉक्टर उन से परिचित थे . हमने रकम जमा की और डॉक्टर से बातचीत की . मैने क्लासमेट के पिताजी को घर छोडा और वापस साइट पर आया . ढलाई चल रही थी . मेरे आते ही डिपार्टमेंट के इंजिनिअर ने विदा ली.. मुझे कुछ अच्छा नही लग रहा था.. शायद बुखार भी आया था.. मै साइट ऑफिस आया और कुर्सी पर बैठे बैठे ही सो गया... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, October 12, 2022

शापित यक्ष

शापित यक्ष
Marathi language _ मराठी भाषा

माझ्या स्वप्नातील इंद्रधनु तू पापणीवर झेलतेस _
अनाहुत सर ही बरसून जाते तुझ्या पापणीखाली
मग कळतं आपल्या गुलाब ताटव्याची कापणी झाली .

माझ्या डोळ्यातील उष्ण आसवे तू हृदयाने शोषतेस _ 
साथ जन्मोजन्मीची तरीही विरह अग्नी वाट्याला आली
हात रक्ताळल्यावर कळतं की धार ही काट्याला आली . 

माझ्या हृदयाची स्पंदने रोज स्व भाळावर कोरतेस _ 
रंगवून जांभळी पहाट चित्रात का अशी सांज ओली
चरणी निर्माल्य झाल्यावर कळतं वेदना वांझ झाली .

माझीच चैत्रपालवी तू रोमारोमांवर मिरवतेस _ 
परंतु मी अनिकेत तरीही कुशीत जगवून गेली
मग शापित यक्षाला कळतं ही प्रीत तगवून गेली . 

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, October 10, 2022

पारंबी होजो लेका. ( वऱ्हाडी कविता )

पारंबी होजो लेका
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

डागेल बीज नायी
निसवजो गा चोखा
चोचीले देजो दाना
बेकीले देजो धोका ।

वलीताच्या डांडाचं
पानी होजो लेका
कुपाची होजो काटी
आधार देजो लोका ।

खोट्याले सोडचिठ्ठी
खऱ्याचा घेजो ठेका
चोट्ट्यायले दनके
सावाचा होजो नाका ।

पाखरावानी राज्या
गंगनी घेजो झोका
पाय ठिव मातीचे
रुजाले देजो मोका ।

झाड मोठं वाढलं
पारंबी होजो लेका
सांजच्याले मातर
वडाले देजो टेका ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
( आगामी ' वरधामायच्या कोऱ्यात ' कवितासंग्रहातून ) 

Sunday, October 9, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - १५

यादें _ सवाल की ! भाग - १५
Hindi language _ हिंदी भाषा

प्रश्नचिन्हों का जीवन ! सुख दुःख के हिंडोले पर झूलते पल.... जीवन रस की बहती कलकल..
जन्म से मृत्यू तक का यह जीवन सफर भिन्न भिन्न रंग लिए बुनते जाता रिश्तों का जाल . सफलता - असफलता , खुशी - गम , दर्द - राहत , दोस्ती - दुश्मनी , होनी - अनहोनी , विपन्नता - संपन्नता , संतुष्टी - असंतुष्टी , प्यार - क्रोध , उपकार - फरेब ऐसी अनगिनत सीढियॉं पार करते है हम ! 
कोई भी नकारात्मक बातें - घटनाएं  जब हमारे साथ होती है , तो एक सवाल ईश्वर से हम जरूर पूछते है , " हे भगवान .. ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? " 
संपूर्ण ब्रम्हांड में सबसे भोलेभाले और सरल हम ही होते है , हमारी दृष्टि से ! हमारे साथ ही बुरा क्यो होता है , यह यक्षप्रश्न आज तक अनुत्तरित है . 
हमारी किताब ले कर जाने वाला उसे कभी वापस नही करता , हम ने किसी को पैसे की मदद की , वो पैसे लौटाता नही , कोई सहायता मांगे तो हमें बहाने बताना नही आता है , हमारा दिल जल्दी पसीजता है , हम जी तोड़ मेहनत करते है पर सफलता नही मिलती , हम सब के काम आते है पर हमारे काम कोई नहीं आता है , गलत आदत से दूर और सात्त्विक भोजन के बाद भी हम ही बीमार क्यो होते है ..... अनंत सवालों की शृंखला का सरताज _ " ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? " 
बच्चे हमारी बात नही मानते और ज्येष्ठ हमें सुनना नही चाहते... 
दुर्घटनाएं हमारे इंतजार में ! हम स्वाभिमान से सराबोर _ कटेंगे लेकीन झुकेंगे नही ! 
हम किसी दुर्घटना के शिकार हुए तो तत्काल यही सवाल बडा सा प्रश्नचिन्ह ले कर हमारे सम्मुख खडा हो जाता है... 
मै इतना दान - पुण्य करता हूं... सुबह - शाम ईश्वर की आराधना करता हूं.. फिर भी , ' ऐसा मेरे साथ ही क्यों ? ' यह प्रश्न उभरता है मनमस्तिष्क में ! हम अबोध बालक की तरह दोहराते रहते इस प्रश्न को .... 
किसी ज्योतिष बताने वाले या शुभचिंतक के पास जा कर अपनी समस्या बताते ही , वह पहले हमें ' हमारे सीधेसादे होने का प्रमाणपत्र ' प्रदान करता है .... फिर धीरे धीरे हमारी नब्ज टटोलता है और फिर हमारी दुखती रग पर हाथ रखता है... हम उसके मुरीद हो जाते है..आखिर हमें समझने वाला कोई तो है ! हम ऑंखें मूंद कर विश्वास करते है..
उसकी बातें हमें सत्य और अच्छी लगती है...
हमारा जीवन काल कभी भी सीधी रेखा नही होता.. जीवन मार्ग कभी भी चिकना और समतल नही होता... प्रश्न आसान और समस्या सरल नही होती .. यह हम भी समझते है लेकीन...!!!
इस सवाल में दो संभावनाएं होती है.. पहली संभावना की हम एकमेवाद्वितीय है ! दुसरी संभावना की यह आम बात है . और दुसरी संभावना के दायरे में हम आते है..
' ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? ' इस सवाल की पीडा से उपजी ग्लानि तार तार कर देती है विश्वास को... तिनका भी सहारा महसूस होता है..
इस सवाल की आत्मग्लानि से बाहर निकलना आवश्यक है.. यह मेरे साथ ही नही हो रहा है... असंख्य भुक्तभोगी है इस के !! अच्छा - बुरा जो भी होता है हमारे साथ , यह जीवन का हिस्सा ही है... स्याह और श्वेत पहलू निखारते है हमारी सोच - समझ को.. परिपक्व करते जाते विचार और मुसीबत की अग्नि में तप कर ही हमारा सुवर्ण व्यक्तिमत्त्व निखरता है कुंदन सा ! 
संघर्ष की आंच में तप कर ही मनुष्य ' मनुष्य ' बनता है... ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, October 8, 2022

मरगळ ( मराठी कविता )

मरगळ
Marathi language _ मराठी भाषा

अंगणी निवांत पहुडलेली दुपार
काळ जरा थांबलेला
वारा मही पांगलेला
मिहिर ही टांगलेला
कणाकणात चैतन्याचा कोण बडविल पणव ?

अंगणी भ्रांत अवघडलेली रांगोळी
रंग चुरगळलेला
सडा मरगळलेला
का बहर हा गळलेला
ठिपक्यात नक्षत्रांची ही कोण फुलविल पुनव ?

अंगणी श्रांत कोमेजलेली लक्ष्मी वृंदा
सुगंध हरवलेला
कंदील मंदावलेला
बंध हा भारावलेला
पर्णापर्णात माधवाची कोण रुजविल कणव ?

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, October 7, 2022

परंपरा ( मराठी कविता )

परंपरा
Marathi language _ मराठी भाषा

दूरवर पसरले ओसाड माळरान
मध्ये विद्रुप आणि उदास खडीची खाण ।

अकाली पावसाचे आत साचलेले पाणी
कदाचित उद्ध्वस्ततेची साश्रू ही कहाणी ।

खडीभरड यंत्राचे भग्नावशेष नक्षी
कधीकाळी नांदलेल्या जीवनाची ही एक साक्षी ।

राष्ट्रीय हमरस्त्याची किनार गर्द काळी
उकरलेल्या अंगणातली जशी रांगोळी ।

सुकलेली झुडपे , करपलेली धरती
एखादीच हिरवीकंच बाभूळ परकी ‌।

रिक्त धरणीची कूस , मी व्याकूळ अभियंता
खेकड्याच्या पिल्लावळीत मी पण करंटा ।

तरीही वसंतात लेवून लालजर्द तुरा
निष्पर्ण पळस सांभाळतो आहे परंपरा ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर



Thursday, October 6, 2022

वाट ( मराठी कविता )

वाट
Marathi language _ मराठी भाषा

स्थिर वाटेलाही प्रचंड असतो वेग
फक्त वाटसरूच्या पायी हवा आवेग ।

दृष्टीपथात काही टप्पे ही तरळते
अचानक पायवाट बाजूला वळते ।

हरवलेल्या टप्प्याची मनी हुरहुर
आटलेल्या यमुनेला कसा यावा पूर ।

वाटेत येणारे काही थांबे अकल्पित
संकल्पनेत ही कधी हार कधी जीत ।

गवसलेल्या मरूद्यानाची हिरवळ
                                                      दिशाहीन वारू वाटेला का हळहळ ।

वावटळीत उडालेला उद्देश पत्ता
वाटेवर आकाशाची निरंकुश सत्ता ।

कधी निवडुंग कधी फुलांचा ताटवा
भुलवित असतो आकांक्षेचा चकवा ।

पायाखालच्या वाटेला ना आदि ना अंत
वाटसरुची वाटचाल ही मात्र सान्त ।

दिशाहीन हेतूला क्रमणाचीच दिशा
सुरुवात सकाळी परंतु अंती निशा ।

भरगच्च स्वप्ने पण रिकामे ललाट
अगतिकपणे शून्याकडे जाते वाट ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर




Saturday, October 1, 2022

निर्माण : भाग - १५

निर्माण - भाग १५

मंझधार में फंसी नैय्या जैसी मेरी हालत थी . तूफान की तीव्रता बढ़ती जा रही थी... और पर्याय मात्र दो ही थे , आगे या पीछे , जीत या हार ! 
जो भी हो , मैने आगे जाना तय किया . अब ऑंधी - तूफान , कडकडाती बिजलियां , और बारिश के बीच चेतक स्कूटर ही साथ थी.. नक्सलियों से भरा जंगली रास्ता ! ज्यादा सोचने की बिमारी चरम पर . ऑंधी तूफान से नक्सली जंगल से निकल कर सडक पर आये तो ? पीछे हुए हादसे की तरह आज स्कूटर पंक्चर हुई तो ? पेट्रोल पंप के पहले ही पेट्रोल खतम हुआ तो ? स्कूटर फिसल कर accident हुआ तो ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर नही थे मेरे पास ! 
सडक सूखे - हरे पत्तों से ढ़क गयी थी . मै बारिश से नखशिखांत गीला हो गया था . तूफानी हवा स्कूटर को आडी तिरछी पीछे धकेल रही थी . मौसम में आया यह बदलाव अनपेक्षित था . मै ठंड से ठिठुर रहा था . एक तो इस जंगली रास्तें से रात में १७५ कि.मी. जाना यही साहस ( ? ) की बात थी... लेकीन अब मेरे साहस की अग्निपरीक्षा प्रारंभ हुई . 
दूर कही बल्ब टिमटिमाते दिखे . मन में विश्वास जगा . तूफान की तीव्रता शनै: शनै: कम हो रही थी . रोशनी नजदीक आ रही थी . अब बारिश की तकलीफ होनी बंद हुई . वह अपनी गति से बरस रही थी , मै अपनी गति दौड रहा था ! जंगल का इलाका समाप्ति की कगार पर था , पर सडक सुनसान थी . आख़िरकार टंकी में बचे हुए पेट्रोल से मै पेट्रोल पंप पहुंचा . रात के बारह बज रहे थे . टंकी फुल कराई.. एक समस्या से निजात पाई . पेट्रोल पंप के बगल में ढाबा था . वहॉं मै अकेला ग्राहक ! गिलास भर चाय मंगाई.. लेकीन बैठा नही . गर्म भट्टी के पास खडे हो कर खुद को गर्म करने कोशिश करने लगा . गरमागरम चाय गले से उतरी और अब तक के आधे सफर की थकान कुछ कम हुई . दिमाग भी थोडा शांत हुआ . यही कही लॉज या होटल में ठहरने का विचार भी मन कौंधा . उसे मैने निश्चय से दूर किया . अब रुकना नही.. बस् ! 
शरीर की कंपन कुछ कम हुई थी . चेतक को किक मारी और निकल पडा बरसात में अपने गंतव्य की ओर ! दस कि.मी. तक चाय और भट्टी की गरमी असर रहा... लगातार हो रही बारिश अपना कमाल दिखा रही थी . फिसलने के भय से स्पीड भी नही बढ़ा सकता था . हेडलाइट की रोशनी लालटेन जितनी ! परेशानी कभी अकेली नही आती ... वह अपना पूरा कुनबा ले कर तांडव नृत्य करती है ! 
अब कंपकंपी बढ़ने लगी . हाथ से हैंडिल पकडना मुश्किल हो रहा था . बारिश की बूॅंदें सीधी ऑंखों से टकरा रही थी . अब मेरा यह निर्णय खुद मुझे पागलपन लगने लगा . क्या जरूरत थी ऐसे मूर्खता की ? जंगल के रास्ते से बच गया था.... आगे का किसे पता था ? अनहोनी घटने के लिए एक पल काफी है ! मै स्कूटर चलाते चलाते सोचने लगा . 
हर माईलस्टोन और साइनबोर्ड को स्कूटर रोक कर पढ़ रहा था ... Distance देखने के लिए ! बारिश ने पीछा नही छोडा . मै बची खुची उर्जा बटोर कर गंतव्य की ओर बढ़ रहा था . रात के करीब तीन बजे साइट की रोशनी दिखी... शरीर में नव उर्जा का संचारण हुआ . मै लगातार सात घंटे से चल रहा था . 
जैसे तैसे साइट पहुंचा . चौकीदार ने  टॉर्च की रोशनी मेरी ओर डाली और उठ खडा हुआ . कुत्ते भौंकने लगे . स्टाफ की नींद खुल गयी . सब बाहर आए . 
' साहब , इतनी रात और बारिश में ? ' साइट इंजिनिअर ने कहा . 
खानसामा दौड कर टॉवेल ले कर आया . 
' आप पहले कपडे उतार लिजीए... तब तक गर्मागर्म चाय बनाता हूं ' खानसामा ने टॉवेल देते हुंए कहा . सुपरवाइझर एक नाइट पैंट ले कर आया . चौकीदार ने एक घमेले में लकडी जलाई और मेरे पास ले कर आया . एक ने कंबल लपेट दिया . सब घमेले के चारों ओर बैठे . गिलास भर कर अदरक - काली मिर्च की चाय आई . 
स्टाफ मुझे नसीहत दे रहे थे... और मै गुपचुप चाय पी रहा था..... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, September 19, 2022

निर्माण : भाग - १४

निर्माण : भाग - १४
Hindi language _ हिंदी भाषा

दोपहर को आए फोन काल ने मुझे कश्मकश में डाल दिया . फोन काल थी दुसरी साइट की , जो लगभग १७५ कि.मी. दूर थी ! 
संध्या की चाय पे सभी स्टाफ इकठ्ठा हुए थे . मैने दुसरी साइट की समस्या उन्हें बताई . सभी मौन थे . 
' साहब , आप खाना खा कर जायेंगे या कैसे ?' खानसामा ने बीच में टोका . 
' तुम थोडी देर तक चूप रहो.. समझे ..' अकौंटंट ने खानसामा को डांटते हुए कहा . 
' साहब , जीप सर्व्हिसिंग के लिए नागपुर गयी है . इतनी दूर आप कैसे जाओगे ? ' सुपरवाइझर ने चिंतायुक्त स्वर में पूछा . 
' देखो , incline का आखरी slab section casting है . कल डिपार्टमेंट को reinforcement चेक करा कर measurements लेने है , तभी slab casting हो पाएगी . बारिश के दिन है . अगर देरी की और शटरिंग में दिक्कत हुई या किनारे की मिट्टी slide हुई तो बहुत नुकसान होगा . जाना जरुरी है.. केवल कैसे जाना यही समस्या है..' मैने अपनी बात रखी . 
' साहब इस जंगल मे अपने पास और कोई जुगाड नही है...' स्टोर कीपर ने कहा . 
' वैसे सफर तो सिर्फ ३ घंटे का ही है ... स्कूटर से हो जाएगा ना..‌' मैने कहा . 
' साहब , अभी मौसम तो साफ है , लेकीन ७० कि.मी. रास्ता जंगल और नक्षलग्रस्त इलाके का है... यह सोचने वाली बात है. आपने पीछले हादसे के बाद रात में स्कूटर से नहीं जाने की कसम खाई थी..‌.' सुपरवाइझर ने कहा . 
' आप तडके रवाना हो जाइए.. दोपहर तक पहुंच जाएंगे... कोई तकलीफ भी नहीं होगी..' अकौंटंट ने सुझाव दिया . 
' बात तो सही है.. पर आधे दिन में reinforcement चेक करा कर measurements लेना संभव नही होगा.. ' मैने कहा . 
' स्कूटर में पेट्रोल ज्यादा नही है.. ' स्टोअर कीपर ने कहा . 
' आप अभी सचमुच जाना चाहते है..‌' सुपरवाइझर ने पूछा . 
' हां , सोच तो वैसे ही रहा हूं.. ' मैने हल्की मुस्कान के साथ कहा . 
 खानसामा चाय के कप लेने के लिए आया..
' सुनो , साहब अभी निकल रहे है , तुम जल्दी खाना लगाओ..' सुपरवाइझर ने खानसामा को कहा . 
' ठीक है.. मै वही तो पूछ रहा था..' खानसामा ने कहा . 
मैने दो तीन दिन का काम समझा दिया . खाना खाया और स्कूटर को किक मारी . सूर्यास्त हुआ था.. लेकीन संधीप्रकाश का थोडा उजाला था . 
जंगल का ५ कि.मी. का रास्ता तय किया और मुख्य सडक से मैने रफ्तार पकडी.. कुछ ही दूर गया तो , मेरा निर्णय गलत साबित होने की संपूर्ण तैयारी कर रहा था ! मौसम ने अचानक करवट बदली और तुफानी हवा बहने लगी . उसकी तीव्रता इतनी ज्यादा थी की , स्कूटर सडक की एक बाजू से दुसरी तरफ जा रही थी.. मैने हैंडिल कस कर पकडा था ‌ . तभी गायों का विशाल झुंड आया . तुफानी हवा की वजह से वो भी आडी - टेढी दौड रही थी . मै एक जगह रुक गया . लेकीन झुंड अनियंत्रित था . दो - तीन गाय तेजी से स्कूटर से उछली.. और मै स्कूटर ले कर नीचे गिर गया . 
मेरा निर्णय तो गलत साबित हुआ था.‌‌ परेशानी यह थी की , स्कूटर में इतना ही पेट्रोल था की मै पेट्रोल पंप तक जा सकता था या लौट कर साइट जा सकता था...  अगर लौट कर साइट गया तो सुबह पेट्रोल टंकी खाली... फिर दुसरी साइट कैसे जा सकता था !!!!
यह परीक्षा की घडी थी... मन विचलित था... कर्तव्य सामने था.. और पेट्रोल की परेशानी तो अलग ही मसला था....
क्या करें ??????  आगे जाएं या पीछे ??? ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

उलंगला गावगाडा. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

उलंगला गावगाडा
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

दोन पाये च्यार पाये
वाघं करते बेजार
घेते नड्डीचाच घोट
झालं जगनं उधार ।१।

भायी पयदले रानी
भेबारले कास्तकार
तीन लोक दाही दिस्या
लागे त्यायले बेकार ।२।

किड्या - मुंगीवानी गत
केलं राज्याले लाचार
उलंगला गावगाडा
गेलं झोपी सरकार ।३।

फसलीच्या इमल्याचं
ताल तुंब्याच जुकार
घेते लावून गा फासी
जीत्यापनाले नकार ।४।

सीद्यासाद्या मानसाले
नायी आकार उकार
तरहाती घोगल्यात
सारे सपले इकार । ५ ।

झाले मानसाचे आता
अजबच जनावर
करे गरीबगुद्याची
दिवसानीच सिकार । ६ ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, September 10, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - १३

यादें _ सवाल की ! 
भाग - १३

सफर यह हर मनुष्य , जीव जंतू की जरूरत है.. कुछ जगह जानी पहचानी होती है तो कुछ डगर.. कुछ नगर अनजाने ! अपरिचित जगह ढूंढने के Google map का सहारा रहता है.. लेकीन वह हर जगह , हर बार कारगर रहेगा ही इसकी गॅरंटी नही.. location map पर चलने के बावजूद भी हम निश्चित स्थान पहुंचेंगे या नही _ विश्वास नही रहता . और सही जा रहे है , फिर भी किसी राहगीर , व्यक्ति को पूछे बगैर तसल्ली नही मिलती !
ऐसी ही दुविधा में फंसे कोई जनाब या मोहतरमा से वही चिरपरिचित सवाल आ धमकता है.. रुकी हुई स्कूटी / बाइक से.. नीचे उतरे कार के शीशे से.. या राहगीर से..... ' भाई , ये सडक कहॉं जाती है ?'
अचानक आ धमके इस सवाल से हमारे दिमाग के कंपास की सुईयां भी काम करना बंद कर देती है.. पहले हमें ही तय करना पडता है की हम कहॉं खडे है ! पहले हम जिस कार्य में व्यस्त थे , उससे संबंध तोड कर नक्शे की दुनिया में कदम रखते है . प्रथम पूरब दिशा दिमाग मे लाते है और बची तीन दिशाओं ९० - ९० % का कोन बनाते है.. फिर दिमाग का हिला कंपास ठिकठाक कर एक हात सडक की एक दिशा दिखाते हुए मुख से ज्ञान के मोती झरते है... ' जी , यह उत्तर दिशा में जाती है..' 
सवालकर्ता / कर्ती थोडे हिलते है.. झुंझलाहट की तरंगे छिपाते है.. गर्दन को क्षितिज समांतर हिला कर हल्की मुस्कान का तोहफा देते हुए फिर पूछते है.. ' अ हं... किस एरिया , नगर , गांव की ओर जाती है यह सडक ?' 
हम ज्ञात स्थान का नाम बताते है.. लेकीन प्रश्नकर्ता के मुखमंडल पर वही प्रश्नचिन्ह हमें दर्शन देता है.. प्रश्नकर्ता अगल बगल देखता है , की कोई दुसरा समझदार ( ? ) बंदा दिख / मिल जाए . हमारे सिर पर चढा सेवा भाव पीछे हटने को तैयार नही . 
' आपको जाना कहॉं है ?' उत्तरदाता का सवाल . 
' अलानी फलानी.. जगह.' बेरुखी से आया जवाब . 
' तो ऐसा पूछीए ना... बस अगले चौराहे से बाए.. फिर आगे छोटी सडक से दाए... ' 
वैसे सडक स्थायी.. उसने कहॉं जाना है ?!!!
एक स्नेही के घर जाना था.. Google बाबा की सेवा ली . उसने गली कूंचों से शॉर्ट कट ले कर पहुंचा दिया एक नाले किनारे ! वहॉं पहुंचा कर Google बाबा ने सेवा बंद कर दी . नाले के उस पार एक जगह चहल पहल दिख रही थी . लेकीन सडक नदारद थी . सामने एक घर था , वहॉं पूछा , ' ये सडक कहॉं जाती है ?!!!!' उसने सिर खुजालाया... कुछ सोचा और कहा , " कही नही !' 
अब सोचने की बारी मेरी थी !!! कार वही खडी की .
रात के अंधेरे में कुदते फॉंदते नाला पार किया और पहुंच गये भाई गंतव्य स्थान तक !!!!
ज्ञान प्राप्त हुआ.. सडक कही नही जाती... जाना तो हमें ही है !!! ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, September 7, 2022

दगडं पूंजत हाये. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

दगडं पूंजत हाये
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

हाथरल्या सातरीत
सपनं निजत हाये
पांघरल्या घोंगड्यात
दव बी भिजत हाये ।१।

भुकेजल्या लेकरात
आसवं खिजत हाये
सातरल्या वरनात
भरोसा सिजत हाये ।२।

उतरल्या जिंदगीत
ठिगरं रुतत हाये
नागरल्या वावरात
फसल कुथत हाये ।३।

अंधारल्या सामटीत
कंदील इझत हाये
भंगरल्या खंडाऱ्यात
मयाली झिजत हाये ।४।

खंगरल्या बगिच्यात
हिंमत कुजत हाये
चेंदरल्या नसीबात
दगडं पूंजत हाये ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, August 30, 2022

यादें _ सवाल की !

यादें _ सवाल की ! 
भाग - १२

दुनिया में अल्पसंतुष्ट लोगों की तादाद नगण्य है... पृथ्वी के समस्त जीव जंतू में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है , जिस की अभिलाषा असीमित होती है . 
६ लाख का पैकेज मिला.. _ इतने से क्या होगा ? 
९० प्रतिशत अंक मिले.... _ इतने से क्या होगा ? 
१००० रुपये चंदा मिला... _ इतने से क्या होगा ?
१० लाख रुपये दहेज दिया.. _ इतने से क्या होगा ? 
१२० रुपये किलो सब्जी को दाम मिला... _ इतने से क्या होगा ? 
दो हाथ को काम मिला...... _ इतने से क्या होगा ? 
७५ % एडवांस पेमेंट मिला..._ इतने से क्या होगा ? 
२ बेडरूम का घर मिला......._ इतने से क्या होगा ?
२ समय का खाना मिला....   _ इतने से क्या होगा ? 
' इतने से क्या होगा ?' यह सवाल चिंता निर्माण करता है और सकारात्मक दृष्टि से विचार करें तो " और " के लिए प्रोत्साहित भी करता है . कभी कभी यह ' और ' खोजता है शॉर्ट कट ! येन केन प्रकारेण लालच की पगडंडी पर दौडते है... कुछ पाते अथाह संपत्ती और कुछ खो जाते लोभ तृष्णा के मृगमरीचिका में ! 
' इतने से क्या होगा ? ' यह सवाल पाता है भिन्न भिन्न आयाम.. सकारात्मक भी और नकारात्मक भी ! 
सुदामा के मुठ्ठी भर चावल प्रतीक थे दोस्ती के... यहॉं ' भाव ' ही महत्त्वपूर्ण था . 
छत्रपती शिवाजी महाराज के भरण पोषण के लिए पुणे और चाकण की जागीर थी . लेकीन उन के बाल मन में प्रश्न कौंधा... ' इतने से क्या होगा ?' अब प्रश्न केवल उन के भरण पोषण का नही था... प्रश्न भारत जितना विशाल और स्वराज्य का था... प्रजा के मानसम्मान का था . 
आम इन्सान के पीछे भी यह सवाल दौडते रहता है . 
एक याचक पर भगवान प्रसन्न हुए.. बोले , ' तुम सुबह तक जितनी जमीन पर चलोगो , वह तुम्हारी हो जाएगी.. तथास्तु ! 
याचक दौडता रहा.. सोचता रहा , ' इतने से क्या होगा ?' और दौडता रहा सुबह तक अविराम ! सुबह होते होते अतिश्रम से उसकी मृत्यू हुई ... 
' इतने से क्या होगा ?' इसका कौन सा आयाम हमें चुनना है , यह हमारे विवेक पर निर्भर है . वैयक्तिक चुनाव और सार्वजनिक चुनाव यह भी एक महत्वपूर्ण भेद है .  अंतहीन जरूरतों और चाहत का सिलसिला तो थमने से रहा ! ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, August 26, 2022

हिरवळली धरणी. Marathi language _ मराठी भाषा

हिरवळली धरणी
Marathi language _ मराठी भाषा

खेळ उन सावलीचा
हिरवळली धरणी
अडखळत्या मेघांत
विद्युल्लतेची हरिणी ।१।

सुमधुर कलरव
वाहे खळखळ पाणी
बासरीवर भैरवी
आळवतो चक्रपाणि ।२।

सळसळणारा वारा
रानभूल ही करणी
घुटमळती कंपने
दव भिजल्या चरणी ।३।

मृदू निर्मळ तरळ
परिमळते त्रिवेणी
आभाळाच्या पाठीवर
इंद्रधनुष्याची वेणी ।४।

प्रतिबिंब हे स्वप्नांचे
नितळ आरसपानी
रुणझुणती पैंजण
स्तब्ध अवखळ चानी ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, August 24, 2022

भाव पस्तुरीले आला. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

भाव पस्तुरीले आला
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

माल मोंड्याचा बजारी
वाया दलालीत गेला
जुगाडाच्या तंतरानं
भाव पस्तुरीले आला ।१।

सारा उरफाटा न्याव
साव जेलामंदी गेला
चोट्ट्यायले हार तुरे
भाव पस्तुरीले आला ।२।

सीध्या सरख्याले भेव
जीव टांगनी लागला
उसवून भरवसा
भाव पस्तुरीले आला ।३।

सेक चुलीच्या भोगाले
उल मारते गा डल्ला
कल्ला गल्ली गल्लीतून
भाव पस्तुरीले आला ।४।

कापराच्या बट्टीवानी
जीव उपवून गेला
अधरयेलाच्या गुनानं
भाव पस्तुरीले आला ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, August 23, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - ११. Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें _ सवाल की ! 
भाग - ११
Hindi language _ हिंदी भाषा

पहली कक्षा से बारहवी कक्षा तक एक सवाल , कुछ अपवाद छोड , सभी के लिए तक़लीफ़देह साबित होता है . अच्छा , इस सवाल को स्थल - काल बंधन नही है... उलटा यह सवाल पूछने वाले के लिए आनंददायी और औपचारिक होता है . उत्तरदाता इस सवाल से बचने की कोशिश करें तो करें कैसे ? प्रश्नकर्ता वरीष्ठ , रिश्तेदार , पहचान वाले और प्रश्न पूछने में माहिर होते है . प्रश्नकर्ता सोचता है की , इस प्रश्न द्वारा वह ब्रम्हांड के राज खोलने की क्षमता रखता है . 
प्रश्नकर्ता के सवाल से ज्यादा खतरनाक होता है उनके तुलनात्मक अध्ययन से चिरफाड करने की कुशलता ! तथा प्रकाश गति से इस राज का प्रसार ! 
माता पिता के लिए यह प्रश्न गौरव का कम और अपमान का ज्यादा लगता है . अंतिम सांस तक संग्राम की तर्ज पर दो - चार सबल कारण बता कर , हीन भावना से उबरने की भरकस कोशिश करते है ....
इस प्रश्न का उत्तर वैयक्तिक न रह कर कौटुंबिक इज्जत का परचम बन जाता है . 
' सवाल कौन सा है ? ' ....
रुको जरा , सबर करो.... 
यह जानलेवा सवाल है , " और , कितने परसेंट ( प्रतिशत ) मार्क्स मिले ? ' 
जिनका रिझल्ट आया है , उनके हिसाब से कम से कम ५ से १० % कम मिले है . ९२ % पाने वाले की अपेक्षा रहती है कम से कम ९८ - ९९ % की ! और ९० % के नीचे वालों की हालत तो इन से भी खराब . 
घर में आये मेहमान , परिचित का यह सवाल प्रथम कर्तव्य जैसा होता है .  और मॉं भी पानी ले कर हमें ही भेजती है . रणांगण में रचित चक्रव्यूह के आज  अभिमन्यू बन जाते है हम ! पहले हम चक्रव्यूह में फंसते है... अपराधबोध से ग्रस्त हम हथियार डाल देते है . हमारे संपूर्ण पराजय के बाद परिचर्चा प्रारंभ होती है , जिस में हमारे पालक मजबूरन सामील होते है . हमारे प्राप्त अंको पर मंथन चालू होता है . चर्चा में प्रश्न कर्ता का तुलनात्मक अध्ययन इतना गहरा होता है की , माता पिता की दलीलें उसे पाट नही सकती . हम अपराध बोध से इतने ग्रसित हो जाते हैं की , लगता है _ हे धरती मॉं मुझे भी समा ले सीता माता की तरह अपने भीतर ! 
सवाल कर्ता के जाने के बाद घर की आबोहवा में तुरंत परिवर्तन होता है . ऐसे लगता मानो हमें सब हेय दृष्टि से देख रहे है ....
फिर सत्संग और प्रवचन प्रारंभ होता है , जिसे सुनने या सहने की ताकत ही नही बचती . हम अपने कमरे में जा कर तकीये से दोस्ती कर उसे ऑंसूओं से भिगो देते है . 
अभी इस सवाल का , भोथरा ही सही , लेकीन हमले को कुछ देर तक रोकने की क्षमता वाला हथियार हमारे पास उपलब्ध है .... और वह है , जवाब में CGPA or percentile बताना !!!
करते रहो calculations ...... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर




Wednesday, August 17, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग १०

यादें _ सवाल की ! 
भाग - १० 
Hindi language _ हिंदी भाषा

हर कोई अपने - अपने तरीके से , ढंग से जीवन यापन करता है . जीवन के हर पडाव पर जीवन यापन का परिमाण और सोच भिन्न भिन्न होती है . बालक अबोध होते है . विद्यार्थी जीवन पढ़ाई में व्यतीत होता है . फिर करीअर की दौड शुरू ! यह दौड कैसे न कैसे पूर्ण करने पर विवाह... बच्चे ... बच्चों की शिक्षा - दिक्षा.. उनका करीअर.. उनका विवाह.. नाती - पोती... जीवन का संध्या काल ! 
यहॉं जीवन प्रवाह के हर मोड के अलग ढंग - अलग रंग ! 
लेकीन _ इस जीवन प्रवाह में एक चिरपरिचित सवाल हर परिचित से आता है आपकी ओर ! लेकीन जीवन अंत तक इस चिरपरिचित सवाल का सही सही जवाब क्या दे , यह समझ में नहीं आता है ! और यह सवाल है , " और , क्या चल रहा है ? "
यह सवाल औपचारिकता , आत्मियता , सद्भावना और दुर्भावना के तडके के साथ प्रस्तुत होता है . उसका हल्का सा स्वाद भी महसूस होता है . पर जवाब तो औपचारिक ही देना है . नही तो अनचाही डिग्री और खिताब गले पडने को तैयार ! 
विद्यार्थिओं से यह सवाल टकराये तो , ' पढाई ' यह जवाब देना अटपटा लगता है.. गरदन झुकाए रुक रुक कर जवाब आता है , ' जी , स्कूल / कालेज चल रहा है .' 
बेरोजगार को यह सवाल इतना चुभता है की , उनका दर्द वही जानते है . चलने - चलाने की कोशिश जारी है भाई ! अब ऐसी स्थिती में क्या जवाब दे ? आप क्या सोच रहे है , इसे प्रमाणित करने का रास्ता नही . और सोच या प्रयास को , इस सवाल के जवाब में अपेक्षित नही ....
नौकरी या व्यवसाय / व्यापार में करीअर बनाने के बाद झिझकते ही सही , लेकीन जवाब आता है _ बस् , चल रहा है... 
विवाहित स्त्री - पुरुष इस सवाल के जवाब में , अपनी बात छोड कर बच्चों का हालचाल बताते है... यहॉं से मै गुप्त / लुप्त हो जाता है . जो भी चल रहा है _ वह बच्चों का ही चल रहा है ! और आगे इस सवाल के जवाब में बच्चों के विस्तारित परिवार का चलना आता है . 
' और , क्या चल रहा है ? ' इस सवाल की बडी महिमा है . हर घर में विराजमान छोटे screen ( TV ) की विज्ञापन दुनिया में भी इस सवाल का वाणिज्यिक उपयोग हुआ है . याद आया वह विज्ञापन .... तणाव भरी सीमा पर तैनात दो फौजी.. एक फौजी का दूसरे फौजी को अलग तडके में यही सवाल पूछता है , " और, क्या चल रहा है ? " 
_ तो दोस्तों , क्या चल रहा है ? यह सवाल जिंदगी भर आपसे टकराता रहेगा . अब मैने आपको आगाह कर दिया हैं . जनाब , तैयार रखिए अपने सतरंगी  - अतरंगी जवाब हर तडके के जवाब के लिए ! 
_ और , क्या चल रहा है ???????

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, August 16, 2022

निर्माण : भाग १३

निर्माण : भाग १३
Hindi language _ हिंदी भाषा

खदान के उपरी मुंहाने पर सेंटर लाईन और लेवल की मार्किंग थी . और इस मार्किंग के ऊपर से पटरी जा रही थी . मैने कुछ सोचा और साइट इंजिनिअर को बुलाया . थिअओडोलाइट , रेंजिंग रॉड , स्टाफ , पेंट , टेप साइट पर लाने को कहा . पटरी के नीचे के सेंटर प्वाइंट को दोनों तरफ १.५ मीटर शिफ्ट किया . थिओडोलाइट से ९० ° पर मार्किंग की , और पेंट से पटरी के दोनों तरफ लाइन खिंची . गणन कर के , उस लाइन से RCC box का outer मार्क किया . 
' सर , यह बात मेरे दिमाग मे ही नही आई . ' साइट इंजिनिअर ने कहा . 
' कोई बात नहीं.. ठेकेदार को बुलाओ . ' मैने कहा . 
सब साइट पर आए . उन्हें समझा दिया और मै नाश्ता करने  गया . 
' दो दिन में raft का लोहा बांधना है ... तीसरे दिन कंक्रिटिंग करना है... समझे ? '  मैने ठेकेदार और साइट इंजिनिअर से कहा . 
' दो दिन में कैसे होगा साहब ... कम से कम ५ दिन तो लगेंगे..' ठेकेदार ने कहा . 
' नही , इतना समय नही है मेरे पास . दिन रात काम करना होगा . ढलाई ( casting ) काम करने वाले ठेकेदार के आदमी खाली है , उन्हें भी काम पर लगाओ . ' मैने कहा . 
' उन मजदूरों को लोहे का काम नही आता . और उनका ठेकेदार अपने मजदूर देगा ? ' लोहा ठेकेदार ने कहा . 
' उन्हें लोहा ढुलाई और बाइंडिंग के काम में लगाओ . बाइंडिंग का काम समझा दो , सब हो जाएगा . उनके ठेकेदार से मै बात करता हूं . ' मैने कहा . 
सुपरवाइझर को ठेकेदार को बुलाने के लिए कहा . ठेकेदार को सारी बातें समझायी . 
अब युद्ध स्तर पर काम चल रहा था . ५ महिला मजदूर को केवल नाश्ता , चाय , खाना बनाने के लिए कहा . साइट पर काम और उत्साह की बयार बह रही थी . काम की गति देख कर डिपार्टमेंट के इंजिनिअर खूश हुएं ! 
' सर , काया पलट दी आप ने साइट की ! यह साइट आप ही पूर्ण किजीए..' डिपार्टमेंट के इंजिनिअर ने कहा . 
' ऐसा कुछ नहीं सर , हमारा काम ही है यह . बाकी साइट भी देखनी होती है , इस लिए एक साइट पर एक हफ्ते से ज्यादा नही रुक सकता , लेकीन आना - जाना रहेगा . आप को काम में कोई शिकायत का मौका नही मिलेगा . ' मैने कहा . 
आखिर RCC ढलाई का दिन आया . पूजा पाठ के बाद  कंक्रिट मिक्सर मशिन की आवाज जंगल मे गूॅंज रही थी , साथ में मजदूरों का कोलाहल भी ! आज साइट पर उत्सव का माहोल था . सिमेंट लदे दो ट्रक साइट पर खडे थे . दुसरे साइट से मैने और एक मिक्सर मशिन बुलाई थी . खदान की दोनों बाजू से कंक्रिट ढलाई का काम चल रहा था . 
दो दिन और दो रात में raft casting का काम पूर्ण हुआ . आगे का काम समझा कर मै जीप मे बैठा . सभी मजदूर , ठेकेदार , स्टाफ जीप को घेरे खडे थे . 
' मै हर हफ्ते  visit करूंगा ... दिल से काम करो...' मैने कहा . 
' जरूर आते रहना साहब...' सभी कह रहे थे...
' चलो..' मैने ड्रायव्हर को कहा . 
धूल मिट्टी उडाते हुंए जीप जंगल के रास्ते निकल पडी . ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


गंगा वावरी नाचली. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

गंगा वावरी नाचली
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

काकरात हिरवाई
गंगा वावरी नाचली
बुचकडून पान्यात
मान मालानं टाकली ।१।

दोन सिरव्याची आस
फासी झडीची लागली
कास कुंदा तनकट
करे फुकाची चुगली ।२।

मुऱ्या बूड कुइजले
पानं पिवरी फिफोली
पीकपान्याच्या जुव्यात
भाऊ जिंदगी हारली ।३।

मातीतल्या फसलीची
खूसी पान्यानं इरली
झर्र पाझरा वावरी
माती उनाले झुरली ।४।

कवा येईन वरानी
आता उम्मीद सरली
वावरातली गा गंगा
डोऱ्यातून बी झरली ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, August 14, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - ९. Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें _ सवाल की !
भाग - ९
Hindi language _ हिंदी भाषा

कुछ सवाल मीठे , प्यारे , भोले होते है... जवाब देना भी जरूरी होता है.. क्यों की सवाल सपनों की दुनिया से आते है अपेक्षाओं के बादल होते हुए... गलत जवाब से बादल गरज सकते है.. बरस सकते हैं या फट भी सकते है... !! 
संचार कौशल , समयसूचकता , दूरदर्शीता , वक्त की नजाकत भॉंपने की क्षमता , मृदूता , स्तुति करने और सफेद झूठ बोलने की क्षमता , तर्क शक्ति के बलबूते ऐसे सवाल की वैतरनी पार कर सकते है...
भूमिका बहुत हुई.. असल मुद्दा है , कौनसा सवाल ! 
तो सवाल हाजिर है _ 
' कैसे लग रही हूं मै ? '
हमारे पास ३ degrees की सीमित अभिव्यक्ती होती  है _ positive , comparative & superlative ! 
सवाल कर्ता के खजाने और अपेक्षा में कम से कम ३० !!!
हमारी ऑंखें तीन चार रंग देख कर भी पढ़ाई अनुसार सात रंग का इंद्रधनुष्य मानते है . सवाल कर्ता उसी इंद्रधनुष्य 🌈 में ७० रंग देखने की क्षमता रखता है !!! ३ primary और ‌३ secondary रंग तक हमारा ज्ञान और चक्षु क्षमता !! सवाल कर्ता का रंग ज्ञान अनंत !!!!!!
सवाल जवाब का यह मुकाबला एकतरफा है . लेकीन अभ्यास से इस की बीच की दूरी को थोडाबहुत कम कर सकते है . जवाब देते समय अचरज भरी body language और बोलने में उद्गार वाचक शब्दों का आधिक्य अनिवार्य है . 
अब आप ने सवाल कर्ता को जान लिया होगा !
यह चक्रव्यूह सा सवाल आता है बहन , सखी , सहकर्मी और अर्धांगिनी से...
सबसे घातक सवाल अर्धांगिनी का मानते है... 
मेरी राय पूछ रहे हो...  जाओ , मैने नही बताना !
व्यंग की बात छोड दे तो , सभी अच्छी ही लगती है . हर भेष में.. हर रूप में ! 
Degree पूछ रहे हो.. superlative से भी ऊपर !!!!!! ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, August 10, 2022

निर्माण : भाग १२

निर्माण : भाग १२
 Hindi language _ हिंदी भाषा

आज साइट पर रौनक थी . मै खदान के मुंहाने के पास कुर्सी लेकर बैठा . सब अपने अपने काम में जुटे थे . मै drawings देख कर इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश कर रहा था . लोहा ठेकेदार को कटिंग समझाई और कुछ हिदायतें दी . साइट इंजिनिअर से dumpy level मंगाया . ५ - ५ मीटर की मार्किंग करवा कर gradient के point दिए और ठेकेदार को उस हिसाब से dressing करने के लिए कहा . Safety manager आया . 
' सर , आपके मजदूर के पास कोई भी safety का इंतजाम नही है . Helmet , gumboot भी नहीं . मै ऐसी हालत में इन्हें काम करने की इजाजत नही दे सकता . Mine's manager साहब आए तो , मुझे notice देंगे.. आप काम रोक दिजीए ..' safety manager ने कहा . 
' सर आज शाम तक सभी सामान आ जाएगा.. बडी मुश्किल से आज काम शुरू किया है , उसे ना रोकिए.. manager साहब आए तो मै बात कर लूंगा ..' मैने उन्हें समझाते हुए कहा . 
ड्रायव्हर को आवाज लगाई . उसे सामान की सूचि और पैसे दे कर रवाना किया . स्टोर से कुछ पुराने हेल्मेट और गमबूट मंगाए और dressing कर रहे मजदूर को देने के लिए कहा . 
कुछ समय बाद department के इंजिनिअर आए . 
' पडे पडे इस लोहे की सरियों में बहुत जंग लगा है.. इन का diameter और वजन भी कम हुआ होगा . आप ने इसकी कटिंग भी शुरू कर दी . ऐसे नही चलेगा . इसे वापस कर आप नया लोहा लाए.. ' इंजिनिअर ने आते ही अपना रौब झाडा . 
' सर , एक महिना पहले मैने लोहा तो नया ही भिजवाया था . और हर lot का एक एक मीटर का सैम्पल भी टेस्ट होगा , जिस में strength , diameter , wt per metre भी आएगा . आप टेस्ट में आए weight के हिसाब से calculation किजीए.. क्या दिक्कत है.. काम रोकना बहुत आसान है , काम करना और करवाना मुश्किल है . आप सहयोग और मार्गदर्शन नही करेंगे तो काम कैसे चलेगा ? ' मैने कहा . 
' बडे साहब ने बोला था , मैने केवल आप को बताया .' उन्होंने कहा . 
' मै बात कर लूंगा साहब से.. आप निश्चिंत रहे..' मैने कहा . 
तब तक चाय आई.. 
' कल PCC होगा . जरा जल्दी आइएगा .' मैने कहा . 
' ठीक है..' उन्होंने चाय पीते हुए कहा . 
शाम को ठेकेदार को बुलाया . 
' आज आधा हिस्सा dressing हुआ है ,  कल उसकी PCC करनी है . लेकीन काम सुबह छह बजे से शाम छह बजे तक करना है . दिन भर में ४ घंटे खदान की वजह से बरबाद होते है . उन्हें कव्हर करना जरूरी है . ' मैने कहा .
' ठीक है साहब .' ठेकेदार ने कहा . 
दुसरे दिन आधे हिस्से का PCC ( प्लेन सिमेंट कंक्रिट ) हुआ . बाद में बचे हिस्से का dressing और PCC हुआ . 
Gradient तो सही था , लेकीन size random था . Steel binders को accurate marking लगती है . अब इसकी सेंटर लाईन कैसे मार्क करे , यह समस्या थी . क्यो की बीच में trestle पर पटरी बिछी हुई थी . कल किसी भी तरह सेंटर लाईन मार्क करनी ही है , यह ठान लिया . 
खदान से खडखड की आवाज आ रही थी.. ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, August 8, 2022

अजब गजब - ९८ : वीरांगना तीलू रौतेली. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९८ : वीरांगना तीलू रौतेली
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
धन धन छै तु गढ़ की नारी
जै जै हवेली तेरी तीलू रौतेली ।

उत्तराखंड क गढ़वाल प पवार / परमार को राज रह्यो आन् कुमाऊँ प कत्यूरी को राज रह्यो . येनअ दुइ राज म सरप - नेवला सरीखी दुसमनी रही . 
' गोरला रावत ' इ.स. ७६० म गुजरात परीन गढवाल क पवार / परमार राजपुत क स्यरन म आया . गढवाल क पौडी जिला क चांदकोट इलाखा क गुरार ( गुराड ) गांव म वूई बस्या . गांव क नाम परीन गुजरात क येनअ पवार पाती को नाव पड्यो ' गुरला / गोरला ' . रावत या उपाधी भेटी तेकन भया गोरला रावत ! 
गोरला रावत कित गढ राज की सूर्व्यामुखी आन् राकसमुखी हद की जिम्मेदारी होती . गोरला रावत भूपसिंह जी गढवाल नरेश राज का परमुख सभासद होता . गोरला रावत भूपसिंह ला दुइ पोटुना क बास्त ८ अगस्त १६६१ म पोटी भयी . आदिमाया को रूप येनअ पोटी को नाव , ' तीलू रौतेली ( तिलोत्तमा देवी ) ' ! भगतु ( भगतसिंह ) आन् पत्वा ( फतहसिंह ) इ दुइ तीलू रौतेली का वीर भाई ‌. येनअ दुइ भाईना न कत्युरी फऊज क सरदार ला जंग म हाराये . दुइ भाईना ला जंग म ४२ - ४२ घाव लाग्या . राजा न दुइ भाईना ला ४२ - ४२ गांव की जागीर देयी . फतहसिंह न परसोली / पडसोली ( पट्टी गुजडू ) आन् भगतसिंह न सिसई ( पट्टी खाटली ) ला आपरो ठिकानो बनायो . 
तीलू रौतेली की सगाई १५ बरस क उमर भयी . इडा गांव का सिपाही नेगी भुप्पासिंह को पोरग्यो भवानी नेगी तीलू रौतेली को मंगेतर . 
कत्युरी को अनखिन हमलो भयो . इ हमलो घातक ठह्यऱ्यो . तीलू रौतेली क पिताजी ला येनअ जंग म वीरगति भेटी . मंगेतर आन् दुइ भाईना न बलिदान देयो .
 तीलू रौतेली नान्हीसी होती . वोनअ माय जवर कांडा क कौथिग मेला म जान की बात कही . माय न वोला कह्ये क मेला म जाय कन् का करेन ? कही जान को होयेन त , आपलअ दादा ( पिताजी ) आन् दुइ भाईना को बदलो लेन ला जा ! नान्हीसी तीलू रौतेली क जीव ला या बात लागी . वा मरदानी होती . गुरु शीबू पोखरियाल न वोला जंग का , राज का सारा तंतर मंतर पढायाता . वोनअ १५ बरस क उमर म राजपाट संभाल्यो . गुरु शीबू पोखरियाल आन् बेल्लु - देवकी सोबतीनना ला संग लेयो . फऊज की कमान मराठा सेनापती गुरू गौरीनाथ क हाथ म दी . 
तीलू रौतेली क आंग म आग लागीती . वोकी तलवार इज सरीखी बरस पडी दुस्मन प ! येक क बाद येक गढ - किल्ला जीतत गयी . खैरागढ , उमटागढी , सल्ड महादेव पासीन चवखुटिया वरी गढ राज की हद बनाई . देघाट परीन वापस आवता बेरा कालिंका खाल म मोठी जंग भयी . सराईखेत म कत्युरी फऊज ला हाराय कन् वोनअ आपलअ भाईना क बलिदान को बदलो लेयो . यहान वोला येक नुकसान भयो . जेकअ पाठ पर बस कन् इज ( बिजली ) की फूरती कन येतरी जंग जितीती , वा बिंदुली घोडी घायल भयी . आन् थोडी बेरा ( समय ) म वोनअ साथ सोड्यो . रनरागिनी तीलू रौतेली उमर क १५ बरस पासीन २२ बरस वरी खतम करत रही येक येक बैरी ला ! गढ राज म हर जागा पर तीलू रौतेली को जयजयकार होत होतो . ७ साल म नान्हीसी तीलू रौतेली न खैरागढ , टकौलीगढ , इंदियाकोट , भौंखल , उमरागढी , सल्ड महादेव , मसीगढ , सरायखेत , उकरयीखल , कालिंकाखल , दुमैलगढ , भालंगभौन , चवखुटिया असा १३ गढ फते कऱ्या . 
पवार की पोटी न गढवाल राज को मान बढायो . जंग जित कर वापस आवन क बेरा तीलू रौतेली कांडा गांव क खलतअ क नयार नदी प पानी पेन ला थांबी . दुइ तलवार खलअ धर कन् वा पानी पेन लागी . येकदम पाठ पासीन कत्युरी को फऊजी रामू रजवार न हमलो कऱ्यो . वीर तीलू रौतेली न तलवार खलअ धरीती . दुस्मन की तलवार आरपार भयी . वीर तीलू रौतेली न कम्बर ला हाथ लगायो आन् कट्यार काढ कन् पासअ पलटी . येक घाव कन् दुस्मान की गरदन काटी . १५ मई १६८३ ला नान्हीसी वीर तीलू रौतेली वीरगति पाई . 
लोकनायिका तीलू रौतेली ( तिलोत्तमा देवी ) का थड्या गीत आबअ बी गढवाल म गावस....
वो कांडा का कौथिग उर्यो
वो तीलू कौथिग बोला
धकीं धे धे तीलू रौतेली धकीं धे धे
द्वी वीर मेरा रणशूर व्हेन
भगतु पत्ता को बदला लेक कौथिग खेलला
धकीं धे धे तीलू रौतेली धकीं धे धे....
कालिका की देवी , लंगूरिया भैरो
तडासर देव , अमर तीलू सिंगनी शार्दुला
जब तक भूमि , सूरज आसमान
तीलू रौतेली की तब तक याद रैली
धकां धै धै तीलू रौतेली धकां धै धै.....
_ दुनिया क इतिहास म आज वरी तीलू रौतेली जसी वीर सिंगनी नी भयी . 
कुर की लाज राखी , गढवाल को राजपाट संभाल्यो , १५ बरस क उमर पासीन २२ बरस की उमर वरी १३ गढ जित्या , पिताजी - भाई - मंगेतर क बलिदान को बदलो लेयो .. असी उमर कन् नान्ही पर सारी दुनिया म जेकअ वीरता ला तोड नहाय , असी पवार / परमार की पोटी तीलू रौतेली माय ला बारम्बार नमन ..

( सहयोग :  इंजि. जालमसिंह जी सोढा , बिकानेर ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, August 7, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - ८

यादें _ सवाल की !
भाग - ८
Hindi language _ हिंदी भाषा

कुछ सवाल मानसिक और सामाजिक तौर पर विचलित करते है . क्रोध विनय को निगल लेता है और हम असहाय से दर्शक या भुक्तभोगी बन कर रह जाते है . 
ऐसे ही एक अनुचित सवाल से हर किसी का पाला पडता है , और वह सवाल है  _ ' दिखता नही क्या ?' 
एक ' T point ' से मै दाये मुडने लगा... इंडिकेटर जलाया.. लेकीन ट्रैफिक देख कर मै रुक गया ... दो कारें निकल गयी.. पीछे से स्कूटी आ रही थी.. मै रुका हुआ ही था... स्कूटी पर सवार लडकी मेरे कार के आगे से क्रॉस करने लगी.. पता नहीं क्या हुआ , वह स्कूटी ले कर कार के आगे गिर गयी.. मै अपनी जगह पर रुका हुआ.. वह स्कूटी को वैसी ही छोड कर मेरे पास आई . मैने कांच नीचे की . 
' दिखता नही क्या ? ' लडकी ने तमतमाते हुए कहा . 
' क्या देखना है मैम ? मै तो रुका हूं.. आप ही आए और कार के आगे गिर गए..' मैने कहा . 
' पहले नीचे उतर.. ' लडकी ने गुस्से से कहा . 
मुझ से ८ - १० साल छोटी उस लडकी की बात सुन कर मेरा माथा ठनका . चौक से दो - चार लडके दौड कर आए और स्कूटी को उठाया . उसकी बात सुन कर मै नही उतरा...लडकों ने स्कूटी हटाई और मै निकल गया . कानों से सांय सांय की आवाज आने लगी . दिमाग सुन्न हो गया . क्या बिना वजह अपरिचित से ऐसी बात करना उचित है ? दिन भर दिमाग मे वही सवाल गूॅंजता रहा , ' दिखता नही क्या ? ' 
सिग्नल लाल था . मुझे बाए जाना था . कार डिव्हाडर से दुसरी पंक्ति में थी . मेरे बाए टू व्हीलर्स खडी थी . एक बुजुर्ग व्यक्ति सायकल पर थे . पीछे से मस्ती करते हुए दो बाइक स्वार आए . उनकी सायकल वाले बुजुर्ग व्यक्ति से कुछ कहासुनी हुई . वे बाइक खडी कर उस बुजुर्ग से हाथापाई करने लगे . गालीगलौच के बीच केवल एक ही वाक्य समझ आ रहा था , ' दिखता नही क्या ?' 
सिग्नल हरा हुआ . वाहनों का रेला आगे बढ़ा . उस रेलें मे मै भी ! रुकने के लिए जगह कहा ! 
दिन भर उन लडकों की उदंडता और कुकृत्य के बारे में सोचता रहा . घर के बाहर की दुनिया इतनी शुष्क भावना और विचार से ! 
रात के ग्यारह बज रहे थे . बारिश का मौसम ! झमाझम बारिश हो रही थी .  सडक बहते नाले में तब्दील ! मेट्रो स्टेशन के नीचे तो तालाब.. आगे एक बाइक पर लडका और लडकी सवार . उनके आगे और एक कार . संभवतः जितनी कम गति से कार चल सकती है , उस गति से चल रहा था . बाइक को जैसे ही क्रॉस किया , लडकी के चिखने की आवाज आई . शायद उन पर कुछ ना कुछ पानी उडा होगा . आगे की कार के पीछे पीछे मै चल रहा था . अचानक कार के पीछे से कुछ टकराने की आवाज आई . मिरर में देखा तो वह बाइक कार और डिव्हाडर की बीच की संकरी जगह से आ रही थी .. वह बाइक सवार हाथ से कार को मार रहा था और वही सवाल उग्र रूप में पीछा कर रहा था , ' दिखता नही क्या ?' 
कुछ आगे जाने पर वही बाइक बाए बाजू से बराबर में आई . 
' xxxxx दिखता नही क्या... xxxxx दिखता नही क्या ?? ' गालियों की पूंछ बन कर वही सवाल बारिश की आधी रात में तांडव कर रहा था . कालोनी के लिए मुडने तक बाइक सवार और वह सवाल पीछा करता रहा...
_ यह तीन वाकये केवल प्रातिनिधिक तौर पर बताए.. इस सवाल की शृंखला अनंत है..... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, August 1, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - ७. Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें _ सवाल की ! 
भाग - ७
Hindi language _ हिंदी भाषा

महाराष्ट्र एक सॅन्डविच स्टेट है . उत्तर भारत की नैसर्गिक सीमा विंध्याचल / नर्मदा नदी तक मानी जाती है . नीचे दक्षिण पथ ! दक्षिण भारतीय की हिसाब से महाराष्ट्र दक्षिण भारत में नही आता . हां दिशा की हिसाब से महाराष्ट्र पश्चिमी राज्य है . लेकीन उत्तर - दक्षिण में कहॉं ? यह प्रश्न है . और यह सवाल हर जगह पीछे पीछे आता है ! 
महाराष्ट्र के सुदूर तेलंगणा की सीमा के नजदीक काम करते हुए यह सवाल पीछे से आगे आ कर खडा होता और मुझे विचित्र परिस्थिती का सामना करना पडता था . 
मै स्टाफ और ड्रायव्हर के साथ रोड किनारे एक घरनुमा रेस्टॉरंट मे लंच के लिए रुका . यह रेस्टॉरंट एक तेलुगू परिवार चलाता था . आदमी काउंटर पर और सर्विस के लिए उसकी पत्नी और बच्चे ....
मै एक टेबल पर बैठा और बाकी स्टाफ दुसरे टेबल पर ....कोई जल्दबाजी नही थी ... सब इत्मिनान से भोजन का आनंद ले रहे थे . वह महिला कुछ परोसने के लिए मेरे टेबल आई . परोसते परोसते वह बहुत ही धीमी आवाज में मुझे कुछ पूछ रही थी या बता रही थी . मैने बहुत गौर से सुनने की कोशिश की , लेकीन सफल नही हुआ . इसके दो कारण थे : एक तो बहुत धीमी आवाज और दुसरा वह शायद तेलुगू में बोल रही थी . वैसे यह इलाका नक्षलग्रस्त था . अनजान व्यक्ति से दूरी रखते थे . एक अजीब डर दिमाग पर छाया रहता था . वह महिला जितनी बार परोसने आती , कुछ न कुछ बोलती ही थी , लेकीन मेरे पल्ले कुछ नहीं पड रहा था . अंत मे जब वह बिल लेकर आई तब हिंदी मे पूछा गया सवाल मुझे समझ आया . 
दक्षिण भाषा के टोन में उसने पूछा , ' तुम्म साऊथ इंडियन है ? ' 
अब हडबडाने की बारी मेरी थी और जवाब का दायित्व भी ! 
' मै महाराष्ट्र का ही हूं.... लेकीन जब से आप कुछ बोल रहे थे , मेरी समझ में कुछ नही आया... क्या बोल रहे थे आप ? ' मैने कहा एक सवाल के साथ ! 
उसके चेहरा निर्विकार हो गया . जुबान को ताला ! उसने झट् से प्लेट उठाई और बिना कुछ बोले तेजी से चली गयी . 
आख़िर समस्या क्या थी _ मेरा साऊथ इंडियन न होना , मुझे तेलुगू भाषा नही आना , मेरा महाराष्ट्र का होना !!!!!!!
मै मुंबई मे कॉटन ग्रीन एरिया में एक टेंडर के सिलसिलें में गया था . दोपहर को ऑफिस का लंच टाईम हुआ . मै भी ऑफिस से निकल कर सडक पर आया और एक रेस्टॉरंट देख कर लंच करने गया . चार पाच टेबल का छोटासा रेस्टॉरंट था . एक सज्जन लंच कर रहे थे . मैने लंच ऑर्डर दिया और आराम से निरिक्षण करने लगा . यथावकाश लंच आया . मै अपनी ही धून में था . 
' Excuse me , तुम्म साऊथ इंडियन है ? ' उस सज्जन ने मेरी टेबल के पास आ कर पूछा . 
मेरे हाथ रुक गये.. दिमाग दौडने लगा ... इस सवाल का और मेरा रिश्ता समझने की कोशिश करने लगा .. औचित्य समझने की चेष्टा करने लगा . फिर खुद को ही बोला , '  ज्यादा सोचा मत कर... कुछ बातें बिना सोचे ही अच्छी होती है...' 
' Sorry bro... I am Maharashtrian....' मैने हंसते हुए कहा ...
विदेश यात्रा में यह सवाल लुप्त हो जाता है... अपने आप ही !!!
वहॉं जब कोई भी हंस कर पूछ लेता है , ' Indian ? ' 
मै विस्तारित मुस्कान के साथ जवाब देता हूं , ' Yes sis / bro.... I am Indian !

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

निर्माण : भाग ११. hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण : भाग ११
Hindi language _ हिंदी भाषा

वेस्टर्न कोल इंडिया का और एक टेंडर मिला था . जंगल मे एक नई भूमिगत कोयला खदान शुरू हुई थी . जमीन स्तर से खदान के मुंह तक incline RCC box structure का काम था . साइट कैम्प , मजदूर , ठेकेदार , स्टाफ , मशिनरीज् , मटेरियल पहुंच गया था . एक महिना हो गया , काम का श्रीगणेशा नही हुआ था . 
एक दिन मै ड्रायव्हर को साथ लिए उस साइट पर पहुंचा . डिपार्टमेंट के इंजिनिअर शिकायत करने लगे . काम टर्मिनेट करने की धमकी देने लगे . मैने उन्हें जैसे तैसे समझाया और कैम्प पहुंचा . साइट पर पहुंचते ही सभी ने घेर लिया .. शिकायत पर शिकायत ! मै ऑफिस मे बैठा और एक एक ठेकेदार को बुलाने ने लिए कहा . पहले ढलाई काम वाला ठेकेदार आया . 
' साहब , हमें दुसरे साइट पर भेज दिजीए... एक महिना हो गया . घर से लाया चावल भी खत्म हो गया . यहॉं कोई काम धाम है नही . कितने दिन बैठ के खाएगे साहब .....' ठेकेदार ने कहा .
' मै साइट चालू कर के ही जाऊंगा... टेन्शन मत लो..' मैने कहा . 
एक एक सभी ठेकेदार आए और वही बात दोहराई . 
अब स्टाफ की बारी थी . 
' काम चालू क्यो नही किया अब तक.. यहॉं क्या खाने और सोने के लिए आए हो ? ' मैने साइट इंजिनिअर से पूछा . 
' साहब , खदान का खुदाई कार्य शुरू है . हमें जहॉं काम करना है , उस के बीच में से मिट्टी ढुलाई के लिए पटरी बिछाई है . हर आधे - एक घंटे में मिट्टी के डिब्बे खदान से उपर आते है . सेफ्टी ऑफिसर डिब्बे उपर आने के बीस मिनट पहले सब मजदूर को बाहर निकालता है . फिर डिब्बे खदान के भीतर जाने तक मजदूर बिना काम के बैठे रहते है . डिपार्टमेंट के इंजिनिअर भी co operate नही करते . काम कैसे करें साहब ? ' मेरे सवाल पर साइट इंजिनिअर ने प्रश्न चिन्ह लगाया . 
मै साइट पर गया . मुआवना किया . और कुछ समय बाद डिपार्टमेंट के ऑफिस गया . इस काम के लिए नियुक्त ज्युनिअर इंजिनिअर थे . मैने साइट की समस्या बताई . उन्होंने हाथ खडे कर दिए . खदान की खुदाई का काम एक सेमी गवर्नमेंट कंपनी कर रही थी . उनका नियंत्रण कंपनी के मायनिंग डिपार्टमेंट के हाथ में था . कंपनी मे मायनिंग डिपार्टमेंट और सिविल डिपार्टमेंट का रिश्ता सास - बहू का ! 
' आपकी सब बातें सही है ... लेकीन आपके सहकार्य के बिना यह काम नही हो सकता .. मै आया हूं और काम प्रारंभ कर के ही जाऊंगा... धन्यवाद .' मैने कहा . 
कैम्प ऑफिस आ कर work chart बनाया . सुपरवाइझर को सुबह से शाम तक कितनी बार और कितने समय के लिए मिट्टी के डिब्बे आते है , इसका निरिक्षण करने के लिए कहा . साइट इंजिनिअर को raft और wall steel की मेजरमेंट निकालने के लिए कहा . ठेकेदार को बुला कर कंक्रिट मिक्सर मशीन उचित जगह पर शिफ्ट करने लगाया . Steel ठेकेदार को लोहा सीधा करने बताया . शटरिंग ठेकेदार को शटरिंग की सफाई और मेकिंग के लिए बोला . 
कैम्प में आज थोडी रौनक लग रही थी . मुझे नींद नही आ रही थी . मिट्टी ढोने वाले डिब्बे , पटरी की खडखड की आवाज दिमाग मे हथौडे के माफ़िक़ गूॅंज रहे थे . 
तभी मंदरहा की थाप सुनाई दी . 
मजदूर के कैम्प के आगे अलाव के चारों ओर मजदूर बैठे थे . एक मंदरहा बजाने लगा . बाकी कुछ मजदूर छत्तीसगढी लोकगीत गाने लगे ....
खुनुर खुनुर सुर में बाजे , चुटकी चटक बोले रे...
बैरी पैरी ल छी , बैरी पैरी ल चिटको
सरम नइ लागे , पैरी ल चिटको
सरम नइ लागे , खुनुर खुनुर सुर में बाजे.....

रुनझुन रुनझुन सुनगुन सुनगुन
थिरक थिरक के बोले , थिरक थिरक के बोले
रुनझुन रुनझुन सुनगुन सुनगुन
थिरक थिरक के बोले , थिरक थिरक के बोले
मांदर  थाप थाप सुन नाचे , मांदर थाप
मांदर थाप थाप सुन नाचे , मांदर थाप
नवरस नवरंग घोले रे बैरी पैरी ल छी
खुनुर खुनुर सुर में बाजे.. खुनुर खुनुर....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, July 29, 2022

अंधारा को पांडू भासो ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अंधारा को पांडू भासो
( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पड्यो उतानो उबडो
उठ्यो बावा कसोबसो
इज्जत को भासपालो
अंधारा को पांडू भासो ।१।

तोल तोल कन चाल्यो
पर करम को फासो
तंगड कन् घसऱ्यो गो
अंधारा को पांडू भासो ।२।

कारी निस्यानी बोट ला
जसो सिकार को ससो
इलेक्सन को बजार
अंधारा को पांडू भासो ।३।

गयो उपव उजिड
घर मंझार तमास्यो
हातपाय लटपट्या
अंधारा को पांडू भासो ।४।

रोग भस्म्यो नेताना ला
पेट भरेन गो कसो
दुइ घास ला मोताद
अंधारा को पांडू भासो ।५।

पोट्टा बाट्टाना को कल्लो
कितअ जाय कन् घूसो
जागा नही लुकन ला
अंधारा को पांडू भासो ।६।

दिवो लगायो सूर्व्या को
भयो ढग येडो पिसो
फुको तंतर मंतर
अंधारा को पांडू भासो ।७।

गयो कुईज उजिड
लाग्यो धक्को गा उलीसो
भयी चान्नी फानोफान
अंधारा को पांडू भासो ।८।

कोनुडा म दिवनाल
उजिडस येक पसो
वारो खेटस जोत ला
अंधारा को पांडू भासो ।९।

सटवाई की लेखन
भाग लिखस गो कसो
कसी पूंजी बा पाचवी
अंधारा को पांडू भासो ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, July 27, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - ६

यादें _ सवाल की ! 
भाग - ६

स्कूल - कॉलेज के बाद हमें लगता है , अब परीक्षा से छुट्टी ! यह अंधश्रद्धा बहुत घातक होती है... आगे और इतनी परीक्षाओं से गुजरना होता है की , सभी भगवान याद आते है . जॉब के लिए भी written exam , viva , interviews और न जाने क्या क्या ! फिर promotion , specialisation के लिए परीक्षा ... साथ साथ ही सामाजिक परिवेश मे अलग ही प्रश्नपत्र हमारे इंतजार मे होते है.. 
कोई दूर के रिश्तेदार घर मे आते ही हमारी विकेट लेते है . उनके सवाल की गुगली इतनी अनपेक्षित होती है की , सिर चकरा कर आउट होना , यही परिणाम १०० फिसदी तय ! और वह सवाल होता है , ' पह्यच्यान कौन ? ' .
स्कूल - कॉलेज तक दूर के रिश्तेदारों से मिलना - जुलना रहता नही . पढाई के नाम पर पारिवारिक कार्यक्रम मे हमारी हिस्सेदारी नगण्य रहती है . जब मेलमिलाप ही नही तो पहचानेंगे कैसे ? 
' पह्यच्यान कौन ? ' इस सवाल का जवाब देने के लिए मॉं - पिताजी जो टिप्स देते है , वह सिर के ऊपर से निकल जाती .  झूठ - मुठ में ही हां में हां मिलाते और खिसक लेते . दिमाग को खंगालने के बाद भी कोई नतीजा नही निकलता .‌‌ कुएं में ही नही तो बालटी में कहॉं से आएगा ! 
कई बार चेहरा याद आता है , लेकीन नाम - गांव भूल जाते है . 
कई बार पीठ पर पहले थपकी पडती और बाद मे सवाल की मिसाइल स्मृतिघातक हमला करती , ' पहचाना क्या ? ' 
Smile line को थोडा चौडा और लंबा कर के हम हाथ मिलाते . उसकी ऑंखों में वही सवाल अब भी तैरता हुआ नजर आता है . हमारे शर्म से डुबने की हालात का वे मंद मंद मुस्कुरा कर आनंद लेते है . उनकी शारीरिक भाषा विजयी मुद्रा की .. सिकंदर जैसी और हम बगलें झॉंकते हुए पराजित मुद्रा में.. पोरस की तरह ! चेहरा कुछ कुछ याद आता है , लेकीन नाम ! स्मृति दगा दे जाती है . और एक रामबाण और रखा रहता है उनकी तरकश में ...  ' बडा आदमी बन गया.. अब क्यो पहचानेगा ...' 
' बडा आदमी ' कैसा होता है , यह हमें आज तक पता नहीं .  पर वह उस अनजान श्रेणी में हमें डाल कर स्वर्ग सुख का लेता है .      ' इधर कुंआ , उधर खाई _ जाए तो जाए कहा भाई !' हम अपने आप को कोसते रहते...
अब यह बात चेहरे पर आ कर अटक गयी . यहॉं तक ठीक है.. आगे के सवाल कर्ता और दस पायदान ऊपर ! इनकी आवाज भी memory में store करनी होती है !!!!
आपकी फोनबुक में save नही किया हुआ अनजाना नंबर वही सवाल के तीर चलाता है , ' पह्यच्यान कौन ?' app's की भरमार की वजह से caller ID app download नही किया हो तो , सोने पे सुहागा ! 
मै गाने सुन कर singers को नही पहचान पाता . अब इस दस - बीस साल पुरानी आवाज को किस क्षमता के बलबूते पहचान पाऊगा . ' नही पहचाना ' , ऐसा बोलना शिष्टाचार संमंत नही . कई कि.मी. दूर बैठे उस शख्स ने शिष्टाचार में भ्रष्टाचार किया है .... इस के लिए हम क्या कर सकते है ! 
यह ऐसी परीक्षाएं है , जिस में हमारे फेल होने की संभावना शत प्रतिशत होती है . अंकसूचि में मिले अंडे से ज्यादा खतरनाक और डरावना वह लांछन होता है , ' बडा आदमी बन गया.....' 
इस सवाल से आसान तो स्कूल - कॉलेज की परीक्षा के प्रश्न पत्र रहते थे !! 
( सहमत हो तो बजाओ ताली !).    क्रमशः ....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


Tuesday, July 26, 2022

अंधाराचा पांडू भासा. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

अंधाराचा पांडू भासा
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

झाला उताना उबडा
उठला गा कसाबसा
इज्जतीचा भाजीपाला
अंधाराचा पांडू भासा ।१।

तोला तोलानच चाल्ला
पन करमाचा फासा
तंगडून चीतपट
अंधाराचा पांडू भासा ।२।

लावे निस्यानी बोटाले
जसा सिकारीचा ससा
हातपाय गराटले
अंधाराचा पांडू भासा ।३।

पत्ता नायी उजिडाचा
घरीदारी अवदसा
इलेक्सनचा बजार
अंधाराचा पांडू भासा ।४।

नेत्यायले भस्म्या रोग
रोज खाये भसाभसा
इथं आंगाचं चिपाड
अंधाराचा पांडू भासा ।५।

पोट्टे बायको कावते
कुठं बी जाऊन धसा
जागा नायीच लपाले
अंधाराचा पांडू भासा ।६।

दिवा टांगला सूर्व्याचा 
ढग झाला येडापिसा
फुका तंतर मंतर
अंधाराचा पांडू भासा ।७।

कुईजल्या उजिडाले
धक्का लागला जरासा
झाल्या चान्न्या फानोफान
अंधाराचा पांडू भासा ।८।

कोनाड्यात दिवनाल
उजिडते येक पसा
खेटे येता जाता वारा
अंधाराचा पांडू भासा ।९।

सटवाईची लेखन
भाग लिवते गा कसा
कसी पूंजली पाचवी
अंधाराचा पांडू भासा ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, July 24, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग ५

यादें _ सवाल की ! 
भाग - ५

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर ..‌ घर में मराठी में बोलचाल तो घर के बाहर निकलते ही हिंदी का बोलबाला ! हर गली , हर नुक्कड , हर स्टॉप पर आटो रिक्षा की धूम ! सडक पर भी यह मुक्त पंछी की तरह विचरण करते है..‌ ना ट्रैफिक सिग्नल से लेन देन , ना यातायात नियम से कोई रिश्ता... हां , यातायात पुलिस की वक्र दृष्टी से यह आजाद पंछी कैसे बचे रहते यह यक्षप्रश्न ! शालीनता के रंगरूप से भी यह चालक अनजान होते है..  लेकीन इनकी नजर गिध्द की भांति शिकार खोजने में कुशल होती है... आपको ही पता नहीं होता है की , बर्डी जाए , महल जाए , गांधीबाग जाए या इतवारी . ( यह नागपुर के मार्केट प्लेस है .) आप सोचते रहते है तब अचानक कोई आटो रिक्षा बगल में खडे पाते है... और दनदनाता सवाल आपकी सोच साधना को भंग करता है , " कहॉं जाना है ? " 
" कहॉं जाना है ? " इस सवाल से बचने की आप ने कोई उपाय योजना की नही होती... आप हडबडा जाते है... वह इसी सवाल को दोबारा दागे , आप के मुंह से अनायास ही निकल पडता है , ' कही नही...'  तब वह ऐसी हिकारत भरी नजर से घूरता है की उसके मन के विचारों को आप स्पष्ट पढ़ सकते है ._ फिर यहॉं क्यो खडे हो ? ... आटो रिक्षा को देने के लिए पैसे नही , बस से जाएगा या मेट्रो से जाएगा कंजूस ... खालीपिली टैम बरबाद किया... पैदल चलने का शौक चर्राया है... कहॉं कहॉं से आ जाते है...‌नाट लगा दी बोहनी को... ज्यादा शायना दिखता है . .. 
मै पार्किंग में कार लगा कर , उंगली में सुदर्शनचक्र की भांति चाबी घुमाते हुए दस कदम भी नही चलता _ सनसनाता वर्षा बाण कानों में गुंजता है , ' कहॉं जाना है ? ' मै शर्म , लाचारी से भिग जाता ... दोनों हाथ जोड कर प्रणाम करते हुए बोलता हूं , ' महोदय , अभी आया हूं , कही भी जाने को काफी समय है... क्षमा करें..' वह अजीब नजर से घूरते हुए नौ दो ग्यारह होता है . मै अपना सुदर्शनचक्र जेब मे रखता हूं... मै अकेला रहा तो यह हाल है . लेकीन पत्नी साहिबा के साथ रहा तो महाभारत की जंग छिड जाती है... कार पार्किंग से लेकर वांछित दुकान में पहुंचने तक और वापसी यात्रा में ' कहॉं जाना है ? ' इस सवाल के इतने अस्त्र , शस्त्र , अग्निबाण कान , दिमाग को बिंधते है की , कौन से दुकान में जाना था और कार पार्किंग यही भूल जाते है . हम ठहरे अभिमन्यू ! चक्रव्यूह को भेद सकते है , लेकीन बाहर आने की विद्या ज्ञात नही ! 
कई बार सोचता हूं , इन लोगो के लिए कितने नाकारा है हम . इनकी हेय दृष्टि को झेलना कोई खेल मजाक थोडे ही है . 
एक दिन सोचा की , आज आटो रिक्षा से ही सफर करूंगा . मै कालोनी के मेन गेट के पास खडा हो गया . आधा घंटा हो गया , लेकीन कोई आटो रिक्षा प्रसन्न नही हुआ . बाद में एक देवता प्रसन्न हुए... आटो रिक्षा की गति कम हुई.. मुस्कुराता सवाल आया , ' कहॉं जाना है ?' मैने चेहरे पर दीनता के भाव ला कर कहा _ गांधीबाग . वह बिना मेरे तरफ देखे , जितनी गति से आया था ; उसकी दोगुनी रफ्तार से और मुझे मंझधार में छोड कर चला गया.. एक घंटा इंतजार साधना की . फल नही मिला . वापिस घर आया . गाडी निकाली और गांधीबाग पहुंचा . कार पार्क कर के सुदर्शन चक्र चलाते हुंए मै मार्केट की ओर बढा ही था की , कौरव दल का सनसनाता हुआ अमोघ शस्त्र आया , ' कहॉं जाना है ? ' ...
मै ' हत् गांडिव.....' 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, July 22, 2022

निर्माण : भाग १०. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण : भाग १०
Hindi language _ हिंदी भाषा

हम दोनों की सिट्टी - पिट्टी गुम हो गयी थी . सर्द रात में भी पसीन छूट गये थे . आधे तक आये थे , आधी दूरी और तय करनी बाकी थी . स्कूटर की लालटेन जैसी हेडलाइट ! पांच फिट के आगे का कुछ भी नहीं दिखता था ... बाकी घना अंधेरा... सुनसान रास्ता ... बाघ कहॉं होगा.. किधर होगा ... अगर सामने आया तो क्या.. बगल से या पीछे से आया तो क्या ????? अनुत्तरित प्रश्नों की अनेक घंटियॉं दिमाग में  बज रही थी , लगता था उस आवाज से दिमाग ही फट जाएगा... डर का बवंडर भूतकाल , वर्तमान काल और भविष्य काल की सैर करा रहा था . उपाय का कोई रास्ता नजर नही आ रहा था . अगर हेडलाइट बंद करते है तो अनंत अंधकार में राह और हम , दोनों खोने का खतरा . हेडलाइट चालू रखते है तो बाघ महाराज को न्योता ! 
मन ही मन में भगवान से कहा , हे प्रभू आज किसी भी तरह साइट कैम्प तक पहुंचा दो . आगे से कभी रात में इस जंगल के रास्ते से नहीं आयेंगे ... बस , इस बार क्षमा कर दो......
सोचते सोचते एक मोड पर आये.. जैसे ही मुडे , कुछ दूरी पर अंधेरे में चार ऑंखें टिमटिमा रही थी . बाघ का जोडा तो नही ! सुपरवाइझर अब केवल मेरे पीठ पर बैठने का ही बाकी था , इतना पीछे से सट गया . मैने उपलब्ध साधनों में एक सुरक्षित जगह खोज ली थी.. कारगर होना , नही होना बाद की बात थी . मुसीबत आने पर हैंडिल और सीट की बीच की जगह मैने दिमाग मे फिट कर ली.. 
मैने अंधेरे में भी थोडी सी इंजिनिअरिंग लगाई . हमारा चलना जारी था , लेकीन वह चार ऑंखें वही पर रुकी थी . उन ऑंखों की उंचाई स्कूटर की हैंडिल से काफी उंची दिख रही थी.. बाघ इतना उंचा तो नही हो सकता ! अब इंजिनिअरिंग गलत थी या समय ! _ यह तो कुछ ही पल में तय होने वाला था . मै अंधेरे में ऑंखें गडाए उन्हें समझने की भरपूर चेष्टा कर रहा था.. जैसे ही हम नजदीक पहुंचे , वह चारों ऑंखें हिली.. और जंगल मे गुम हो गयी . जाते जाते जो अस्पष्ट झलक दिखी , उस से वह साम्भर जैसी लगी . साम्भर थे , इस लिए उनकी ऑंखों की उंचाई ज्यादा थी ! हम दोनों ने राहत की सांस ली . अब केवल एक चौथाई दूरी बची थी ...
राम... राम का अखण्ड जाप चालू था . धूल से पीले और पसीने से गीले हो गये थे . अब रफ्तार और बढाई . स्कूटर को खिंचते हुए हम लगभग दौड ही रहे थे . दोनों मौन थे..‌ घने अंधेरे में हमारी ऑंखें केवल कैम्प की रोशनी को ही ढुंढ रहे थे . 
मैने पसीने से भिगी शर्ट उतार ली . सुपरवाइझर को बोला की , अब तुम हैंडिल पकडो . 
' मै धक्का ही मारता हूं साहब.. आप ही हैंडिल पकडे..' सुपरवाइझर ने कहा . 
आगे रह के मुसीबत कौन मोल लेगा ? उसकी जगह वह भी ठीक ही सोच रहा था !!
दूर कैम्प की टिमटिमाती रोशनी दिखी ‌ . जान में जान आ गयी . बची खुची ताकद लगा कर हम दौडने लगे . थोडा एक्सीलेटर भी बढाया . इस भागदौड में मेरा दाया पैर जोर से फूटरेस्ट से टकराया . बस्स.. स्कूटर का , मेरा और सुपरवाइझर का ऐसा संतुलन बिगडा की नीचे स्कूटर और उस पर हम औंधे मुंह गिरे ! हमारें मुंह मिट्टी में धस गये . सुपरवाइझर झट् से उठा ... मेरे दाये पैर में दर्द की तीखी लहर दौडी . स्कूटर की पायदान ने घुटने के नीचे गहरी चोट लगाई थी . सुपरवाइझर ने स्कूटर उठाई और मेरे पास आया . मै पैर पकड कर बैठा था . उसने मेरी पैंट उपर उठाई और चोट पर कस के रुमाल बांधा . 
अब मजबूरन उसने हैंडिल पकडा . मै लंगडा कर चल रहा था . जैसे तैसे कैम्प पहुंचे . हमारी हालत देख कर स्टाफ घबरा गये . उन्होंने मेरे कपडे उतारे . गरम पानी में टॉवेल डुबा कर उस से बदन पोंछ दिया . जख्म पर बंधा रुमाल हटाया . फर्स्ट एड बॉक्स से पट्टी , मरहम , दवाईयां निकाली . चोट को बेटाडिन से साफ कर के मरहम लगाया और पट्टी बांध दी . सभी मजदूर , ठेकेदार देखने के लिए आए . 
' सब ठीक है... आप लोग आराम करो...' मैने कहा . 
खाना खा कर मैने एंटिबायोटिक टैबलेट ली...
सुपरवाइझर सब को बडी गम्भिरता से यह वाकया सुना रहा था...
मै नींद की आगोश मे समाता गया.....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, July 20, 2022

गारगोटी ( वऱ्हाडी कविता ). varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

गारगोटी
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

वाडा खसून वायला
सयील झाल्या मुठी
बाप्पू अटकली खुटी
आता जासीनच कुठी ।१।

तुले येवढं खंदून
सापडली काय लोटी
तांदरीच्या नादानं भौ
फालतूची आटाआटी ।२।

गहू पेरला तावानं
उपडून तू पराटी
अकलीच्या कांद्यावानी
गोस्टं तुही उरफाटी ।३।

खाल्लं रिकामं बसून
झाल्या इकून इस्टेटी
इंधनकाडी सरली
आता जारतं तुराटी ।४।

याले त्याले खेटून तू
जातं म्याहाडाच्या वाटी
बह्याडाचीच भरती
लावे धुऱ्याले बी काटी ।५।

डोकस्यावर त बाप्पू
करमाची सेनपाटी
सांड्यावानी डखरून
करतं मुजोरी मोठी ।६।

गेला जमाना गंगनी
तुही कोरी हाये पाटी
हिऱ्याच्या खदानीतला
जसा निरा गारगोटी ।७।

गेल्या मयाली वाकून
तुही रग्गेली बी खोटी
गेले तसमे फाकून
लाज दाठ्ठ्याले गा मोठी ।८।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, July 19, 2022

आयो सरावन मास. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

आयो सरावन मास
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मोह्यतूर बहुड्डा को
नागपंचमी ला खास
खेले बारिस उघाड
आयो सरावन मास ।१।

नान्हा मोठा राजीखुसी
धऱ्या सोम्मार उपास
जीव सिव की महिमा
आयो सरावन मास ।२।

पोह्यती की सबन च
बहिनना ला जी आस
निभावन ला धरम
आयो सरावन मास ।३।

धट्टी पेहरी हिवरी
सातरंगी चंद्रहास
सिरावन ला बहुड्डो
आयो सरावन मास ।४।

कानुबा को जागरन
दही लाही को उल्हास
खांदसेकनी पोरा को
आयो सरावन मास ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर