यादें _ सवाल की !
भाग - १२
दुनिया में अल्पसंतुष्ट लोगों की तादाद नगण्य है... पृथ्वी के समस्त जीव जंतू में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है , जिस की अभिलाषा असीमित होती है .
६ लाख का पैकेज मिला.. _ इतने से क्या होगा ?
९० प्रतिशत अंक मिले.... _ इतने से क्या होगा ?
१००० रुपये चंदा मिला... _ इतने से क्या होगा ?
१० लाख रुपये दहेज दिया.. _ इतने से क्या होगा ?
१२० रुपये किलो सब्जी को दाम मिला... _ इतने से क्या होगा ?
दो हाथ को काम मिला...... _ इतने से क्या होगा ?
७५ % एडवांस पेमेंट मिला..._ इतने से क्या होगा ?
२ बेडरूम का घर मिला......._ इतने से क्या होगा ?
२ समय का खाना मिला.... _ इतने से क्या होगा ?
' इतने से क्या होगा ?' यह सवाल चिंता निर्माण करता है और सकारात्मक दृष्टि से विचार करें तो " और " के लिए प्रोत्साहित भी करता है . कभी कभी यह ' और ' खोजता है शॉर्ट कट ! येन केन प्रकारेण लालच की पगडंडी पर दौडते है... कुछ पाते अथाह संपत्ती और कुछ खो जाते लोभ तृष्णा के मृगमरीचिका में !
' इतने से क्या होगा ? ' यह सवाल पाता है भिन्न भिन्न आयाम.. सकारात्मक भी और नकारात्मक भी !
सुदामा के मुठ्ठी भर चावल प्रतीक थे दोस्ती के... यहॉं ' भाव ' ही महत्त्वपूर्ण था .
छत्रपती शिवाजी महाराज के भरण पोषण के लिए पुणे और चाकण की जागीर थी . लेकीन उन के बाल मन में प्रश्न कौंधा... ' इतने से क्या होगा ?' अब प्रश्न केवल उन के भरण पोषण का नही था... प्रश्न भारत जितना विशाल और स्वराज्य का था... प्रजा के मानसम्मान का था .
आम इन्सान के पीछे भी यह सवाल दौडते रहता है .
एक याचक पर भगवान प्रसन्न हुए.. बोले , ' तुम सुबह तक जितनी जमीन पर चलोगो , वह तुम्हारी हो जाएगी.. तथास्तु !
याचक दौडता रहा.. सोचता रहा , ' इतने से क्या होगा ?' और दौडता रहा सुबह तक अविराम ! सुबह होते होते अतिश्रम से उसकी मृत्यू हुई ...
' इतने से क्या होगा ?' इसका कौन सा आयाम हमें चुनना है , यह हमारे विवेक पर निर्भर है . वैयक्तिक चुनाव और सार्वजनिक चुनाव यह भी एक महत्वपूर्ण भेद है . अंतहीन जरूरतों और चाहत का सिलसिला तो थमने से रहा ! ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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