Saturday, May 28, 2022

बेकरार बचपन

बेकरार बचपन

बचपन _
संग अनामिक डर
घर का अनुशासन
भविष्य की परवाह
वर्तमान उलझन ।

बचपन _ 
पढ़ाई के साथ साथ
छोटी - मोटी अनबन
घर के काम काज का
सिर पर है टेंशन ।

बचपन _ 
जिद प्रथम आने की
व्यक्तित्व का आलेखन
अच्छा बनने की राह
न रीति का उल्लंघन ।

बचपन _
विश्व सिमित दायरा
विशाल ख्वाब दर्पण
बडा होने की ललक
कचोटता बचपन ।

बचपन _
कुछ खट्टा कुछ मीठा
दायित्व का भी वजन
कुछ नादानियां भोली
परेशानियों का बन ।

बचपन _ 
गंभीरता की परत
मतलब की घुटन
छटपटाता भीतर
बेकरार बचपन ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, May 24, 2022

अजब गजब - ९३ : निलकंठेस्वर मंदिर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९३ : निलकंठेस्वर मंदिर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मस्तके शशि धारणं असुर जलंधर मर्दनं ।
हलाहल पीत्वा यत् प्रभु उच्यते ।।

परमार / पवार राजा आन् लोगना बी परम सिवभगत होता अन् स . आपलअ गवरवस्याली राजपाट क बखत वून न कई भगवान महादेव का देऊरना बांध्या . आन् जुनअ पुरानअ देऊरना को उध्दार बी कऱ्यो . 
मध्यपरदेस क विदिशा जिला म गंज बासौदा तहसील स . वासीन १६ कि.मी. दूर , बुंदेलखंड क हद प उदयपुर गांव स . चक्रवर्ती राजा भोज को वंसज राजा उदयादित्य को येनअ इलाखा पर राज होतो . राजा उदयादित्य परम सिवभगत . वून न उदयपुर ( उदयपुर नाव येनअ च राजा क नाव परीन पड्यो . ) म बि . संवत् १११६ पासीन ११३७ वरी ( इ.स. १०८० - ८१ वरी ) २१ बरस म निलकंठेस्वर मंदिर बांध्यो . वोनअ बेरा उदयपुर / गंज बासौदा उत्तर - दकसिन बेपारी रस्ता को मोठो ठानो होतो , मोठी पेठ होती . 
निलकंठेस्वर मंदिर ला च राजा उदयादित्य क नाव परीन " उदयेस्वर मंदिर " बी कव्हस . देऊर क आघ च वेधस्याला स . 
* मंदिर की रचना : + परमार कार क देऊरना म जास्ती ' भूमिजा शैली ' को बांधकाम दिसस . निलकंठेस्वर मंदिर बी ' भूमिजा शैली ' म च बांध्येस . खजुराहो देऊर सरीखी येनअ देऊर की नक्कासी स . 
+ निलकंठेस्वर मंदिर ला तीन आंगअ तीन मंडप आन् दरुजा स . गरभ घर क दरुजा प दुय आंगअ मानव रूप म माय गंगा अन् माय जमुना की मूरती स . भवताल दिक्पाल , दुरगा माय , गनपति बाप्पा , भगवान बरमा जी , भगवान बिस्नू जी , सिव गन , यकस्य , नटराज , कारतिक भगवान की मूरतीना स . 
+ निलकंठेस्वर मंदिर की उचाई ५१ फीट स . ( पाच तल्ला ) 
+ सिवलिंग की गोलाई ५'१" स . 
+ जमीन पासीन सिवलिंग ६'७" वरतअ स . 
+ जलहरी सवातीन फीट वर स . 
+ चवकोन जलहरी को नाप २२'४" स . 
+ भोजपुर क सिवलिंग सरीखो च इ सिवलिंग स . 
+ देऊर को नक्सो देऊर क हर खंड पर काहाडेस . 
+ देऊर अन् सिवलिंग की रचना असी करीस क सकार की सूर्व्य भगवान की पह्यली किरन 
बराबर सिवलिंग पर पडस आन् सिवलिंग सोना सरीखो झलारस . असो वाटस क सूर्व्य भगवान पह्यलो नमस्कार निलकंठेस्वर भगवान ला करस आन् बाद म दुनिया म घूमस .  
+ वोनअ बेरा खगोल - भूगोल , इंजिनिअरिंग , कलाकुसर , बांधकाम को केतरो उन्नत ग्यान होतो , यको अंदाजो इ देऊर देख कन् आवस . 
+ निलकंठेस्वर महादेव क सिवलिंग ला पीतरी कवच रव्हस . खास मवका पर च वोनअ कवच ला काहाडस . 
* मेला : महासिवरातरी ला निलकंठेस्वर देऊर म पाच दिवस को मेलो भरस . 
हर हर महादेव...

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, May 23, 2022

कास्तकार राज्या. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

कास्तकार राज्या
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

पुस्तकात वाचलं मी
कास्तकार राज्या हाये
दलिंदरी जलमाची
वावरात आजा हाये ।१।

खरं लिवल्यासारकं
असन त मज्या हाये
क लिवनीवाल्याच्या ह्या
खोट्याच गमज्या हाये ।२।

फासी घिवून मरते
असा कसा राज्या हाये
वाघं खाते मह्यन्याले 
असी काहून सज्या हाये ।३।

पिके कापूस खंडीनं
करजाचा बोज्या हाये
नेसू धोतर डांडाचं
कायच्यानं राज्या हाये ।४।

किती गा छाकटेगिरी
लिवतानी लाजा हाये
चिवत्याच बनवता
तुमालेच भेज्या हाये ।५।

किड्या मुंगीचं जगनं
उघडा दरुजा हाये
कोठी दिसली तिजोरी
करांडल्या बाजा हाये ।६।

ताम्ब गोचिडावानी
तुमची त मज्या हाये
पेता रगत दाबून
आमच्यात बेज्या हाये ।७।

नेते झाले राज्यावानी
बेपाऱ्याची मज्या हाये
कास्तकाराच्या नावानं
खोटा गाज्यावाज्या हाये ।८।

इस रुप्याची बाटल
पान्याची समजा हाये
गहू बी तेवढ्यालेच
हिसोबात वजा हाये ।९।

किती जुलूम करान
वर देव राज्या हाये
घडे भरले पापाचे
इतिहास ताजा हाये ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

खादोल ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

खादोल
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पाड पर आयो आम्बो
वोकअ सरीखो गोड नी
खादोल की चव ला 
अमरीत की तोड नी ।१।

माय को पालव सर्ग
वोला कोनतो जोड नी
बाप क पान्हयना की
सुताई मारझोड नी ।२।

माय बाप क रस्ता ला
कहासीन बी मोड नी
बरे धडधड सप्पा
जग म उसा खोड नी ।३।

जिंदगी भर दे छाया
जनक जसो झाड नी
कहान बी घर जसो
ममता को रफाड नी ।४।

आसीरवाद को हाथ
मतलब की बाड नी
बरसस चारी कार
उलीसी बी उघाड नी ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, May 22, 2022

निर्माण : भाग ७

निर्माण : भाग ७

जहॉं हादसा हुआ था , वहॉं भीड इकठ्ठा हो गयी . मजदूर हाथों से मिट्टी निकाल रहे थे.. फावडे / बेलचे का इस्तेमाल मिट्टी में दबे बुजुर्गों को चोट पहुंचा सकते थे . वृध्दा बार बार अपने पति को पहले निकालने के लिए बोल रही थी.. कुछ समय बाद उस बुजुर्ग की पीठ दिखी . वह मिट्टी भरने के लिए झुका था , और उसी अवस्था मे यह हादसा हुआ था . भगवान की कृपा से वह बुजुर्ग जीवित था . मेरे जान मे जान आई . दोनों को निकाल कर कालोनी स्थित लघु चिकित्सा केंद्र मे ले गये . मिट्टी की गर्मी से बुजुर्ग मजदूरों का शरीर लाल हो गया था.. मानो किसी भट्टी में भूने हो ! डॉक्टर ने कहा , घबराने की जरूरत नही.. कोई बाहरी या अंदरुनी चोट भी नहीं है ... हां , दो तीन दिन के आराम की आवश्यकता है . ठेकेदार के साथ उन दोनों मजदूर को लेबर कैम्प भेज , मै दवाईयां लाने गया . 
इस हादसे से मेरा दिमाग घूम गया था . अच्छा हुआ कोई जानमाल का नुकसान नही हुआ . अगर होता तो.... रात भर नींद नही आई . 
सुबह तैयार हो कर मै डिपार्टमेंट के ऑफिस गया . 
' कल के हादसे की खबर आपको मिली होगी . एक सेप्टिक टैंक आपको प्ले ग्राउंड की ओर लेना होगा . इस से खुदाई की गहराई बहुत कम हो जाएगी और मेन्टनेन्स के लिए भी सुविधा जनक होगा . मैने अधिक्षक अभियंता से कहा . 
' चलो , साइट पर चलते है .' अधिक्षक अभियंता ने कहा . 
हम हादसे वाली जगह पर पहुंचे . बाकी इंजिनिअर भी आये . साइट का मुआवना करने के बाद वे मेरा सुझाव मान गये . 
अब मुझे कोई खतरा मोल नही लेना था और समय की भी कमी थी . मैने खुदाई मशीन का इंतजाम किया . नये कार्य के हिसाब से लेवल ली , वर्किंग ड्राइंग बना कर approval लिया . तुरंत नये अलाइनमेंट , ग्रेडियंट फिक्स किये और खुदाई की मार्किंग की . सभी बिल्डिंग वर्क रोक कर सारे मजदूर , मिस्त्री इसी काम में लगा दिये . दो सप्ताह में सेनेटरी पाइप लाइन बिछ गयी . खुदाई मशीन से सभी नालियां पाट दी . अब केवल तीन सेप्टिक टैंक और मेनहोल्स का काम ही बचा था . अगले सप्ताह वह काम भी प्रारंभ किया . प्ले ग्राउंड के पास नये सेप्टिक टैंक का PCC वर्क चल रहा था . मै ऑफिस मे था . तभी उस काम पर गया सुपरवाइझर आया . 
' साहब , इंजिनिअर साहब आए थे , उन्होंने काम बंद करने के लिए कहा है..' उसने कहा .
' क्यों ?' मैने पूछा . 
' पता नहीं साहब .' सुपरवाइझर ने कहा .
' बिना कारण के काम बंद नही होगा . जाओ , काम चालू रखो .' मैने कहा . 
कुछ समय बाद इंजिनिअर मेरे पास आए . 
' मैने काम बंद करने के लिए बोला था . काम बंद नही किये !' उन्होंने कहा . 
' काम क्यों बंद करना है , यह तो बताईए..' मैने कहा . 
' बडे साहब ने बोला है.‌ ' उन्होंने बताया . 
' बडे साहब ने बोला है , ठीक है . पर कारण तो बताया होगा ?' मैने पूछा .
' नही . कारण नही बताया..' उन्होंने कहा . 
' तो क्या बिना मतलब काम बंद कर दे ?' मैने पूछा . 
' देखो , आपकी मर्जी...' उन्होंने जाते हुए कहा . 
एक समस्या सुलझती नही की , दुसरी मुसीबत तैयार रहती है... 
अगले माह से वर्षा ऋतू प्रारंभ होने वाला था..‌ इस महिने में काम पूर्ण करना जरूरी था .. लेकीन साहब लोगों की साहबगिरी सातवें आसमान पर ! ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, May 20, 2022

घाव ( वऱ्हाडी कविता )

घाव
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

येड्याबांगड्याच्या मनी
सादासुदा भक्तीभाव
नदी नाले दगडात
सिवारात त्याचा देव ।१।

सूर्व्य नारायना आंदी
येते आपरंग चेव
सडा सारोन करून
धुते अंतरीचा देव ।२।

संबा पाराबती रूप
पाप करमाचं भेव
घर वावराची माया
ढोरा वासरात जीव ।३।

उभा आडवा सारखा
त्याचा पान्यावानी भाव
कनसात मानसात
केला नाही भेदभाव ।४।

देते घासातला घास
सादाभोरा सदासिव
नाही ध्यानीमनी याच्या
जातीपातीची गा सीव ।५।

राजकारन्यायीचा डाव
उले धरमाचे पेव
गावगाड्याच्या मस्तकी
घाले कुराडीचे घाव ।६।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, May 16, 2022

डायरी - २०२२. लिफ्ट : भाग ५

डायरी - २०२२
लिफ्ट : भाग - ५

नाशिक के ' अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलन - २०२१ ' मे , मै एक दोस्त के साथ कार से गया था . वापसी मे हम शिर्डी पहुंचे . रात हो गयी थी . कार पार्किंग मे लगा कर हम मंदिर की ओर जा रहे थे की , बैग लिए एक युवक ने हमें रोका . 
' साहब , आप नागपुर जा रहे हो क्या ? अगर गाडी मे जगह हो तो मै सकता हूं ? ' उस युवक ने पूछा . 
हम दोनों एक दुसरे को प्रश्नार्थक मुद्रा से ताकने लगे . मै लिफ्ट का कोई झमेला पालने के मूड मे नही था . लेकीन मेरे दोस्त ने हां कर दी . मंदिर मे entry fee थी . पास लेने की कतार में मुझे ही लगना पडा . वह अजनबी युवक और मेरा दोस्त बाहर खडे ऐसे बतिया रहे थे , मानो बचपन से परिचित हो ! मेरे गुस्से ने रेंगना शुरू किया . मै आया और सब के हाथ में पास थमा कर दर्शन की कतार में लगे . दर्शन कर मै और मेरा दोस्त बाहर आये . वह अजनबी युवक नदारद ! 
अब इसे कहॉं खोजे ? झुंझलाते हुए मै वही खडा रहा . मेरा दोस्त उसे खोजने गया . आधे घंटे बाद दोस्त वापिस आया . 
' कैसे बंदे को हां बोल दिया यार ! यह तो शुरूवात से ही मुसीबत है .' मैने कहा . 
हमें भोजन भी करना था . 
' चलो छोडो... चलते है..' मैने पार्किंग की ओर चलते हुए कहा . 
' अरे रुको... देखो , वह आ रहा है .' दोस्त ने कहा . 
मैने मुड कर देखा तो , दोनों हाथ में सामान लेकर वह आ रहा था . 
' अजीब आदमी हो तुम...' मैने कहा .
' माफ कर दो.. सामान खरीदने में देरी हो गयी... चलो .' मेरा वाक्य बीच में काटते हुएं उसने कहा .
हम भोजन गृह गये . कुपन लेकर प्रसाद ग्रहण किया . खाना खाने से सुस्ती आ रही थी , लेकीन सफर लंबा था... निकलना जरूरी था . मैने गाडी निकाली . दोस्त बगल की सीट पर बैठा . कुछ समय बाद उसे नींद आने लगी . 
' तुम पीछे जाओ और उसे सामने भेजो..' मैने दोस्त से कहा . 
अब वह अजनबी युवक बगल की सीट पर बैठा . कुछ समय बाद वह भी सोने लगा . 
' यहॉं सोना नही.. मेरे साथ बात करते रहो.समझे?.' मैने कहा . 
' जी..' उसने सर हिला कर कहा . 
लेकीन उस पर तो नींद का सुरूर था... बीच बीच में खर्राटे भी गुंजने लगे . मुझे गुस्सा आ रहा था . मैने कार रोकी . पानी पीया और दोस्त को जगाया . उन दोनों पर नींद हावी थी . मैने दोनों को पिछली सीट पर भेजा , और सावधानी से ड्राइव्ह करने लगा . मेरी ऑंखें भी असहकार आंदोलन करने पर तूली थी . मैने शेगाव तक गाडी खिंचने की ठानी . शेगाव के भक्तनिवास में कार पार्क की . गाडी रुकते ही दोनों ने पूछा , ' क्या हुआ ?' 
' उतरो , यहॉं हम विश्राम करेंगे और सवेरे नागपुर के लिए रवाना होंगे .' मैने डिकी खोलते हुएं कहा . 
मै बैग लेकर बुकींग काउंटर ढुंढने लगा . पीछे पीछे मेरा दोस्त भी आ रहा था . मै काउंटर पर पहुंचा , दोस्त भी आ गया . 
' वह नमुना कहा है ?' मैने पूछा .
' पता नहीं , मेरे पीछे ही आ रहा था .' दोस्त ने जवाब दिया . 
' उसके लिए कमरा लेना है की नही ?' मैने कहा .
' उसके लिए भी ले लो..' दोस्त ने आलस देते हुएं कहा .
' लेकीन उसके पैसे कौन देगा ?' मैने पूछा .
' अभी दे दो.. मै उससे ले लूंगा .' दोस्त ने कहा .
हम दोनों कमरे बुक कर उनका बिल्डिंग नंबर खोजने लगे . जैसे ही हम बिल्डिंग नंबर खोज कर जीने से चढ़ने लगे , वह अजीब अजनबी हमारे पीछे आया . 
' क्या लुकाछीपी खेल रहे हो... कभी दिखते हो , कभी गायब हो जाते हो ..' मैने डांटते हुएं कहा .
वह नीचे सर किये चुपचाप हमारे पीछे आया . तीनों अपने अपने कमरें में सो गये . सुबह जाने के पहले, उसी संकुल में हम नाश्ता करने गये . वह बंदा फिर गायब ! हम दोनों का नाश्ता आया वैसे ही वह कही से टपक पडा . मेरे दोस्त ने उसके लिए भी नाश्ता मंगवाया . बिल का भूगतान तो मुझे ही करना था ! नाश्ता कर हम श्री गजानन महाराज के दर्शन करने गये . दर्शन कर आये तो वह बंदा फिर शिर्डी जैसा अंतर्धान हो गया . हम कार के पास इंतजार करते करते थक गये . 
' यार , उस से कमरे के किराये के पैसे लो और यहॉं से उसे छोड दो..' मैने दोस्त से कहा .
' ले लेंगे.. चिंता मत करो..' दोस्त ने कहा .
लंबे इंतजार के बाद उस लिफ्ट वाले महाशय के दर्शन हुएं . दोनों हाथ में केरीबैग पकडे तेजी से आ रहा था . 
' तुम आदमी हो पजामा... तुम हमारे हिसाब से चलोगे या , हम तुम्हारे हिसाब से चलें..' मैने गुस्से से कहा .
' डिकी खोल दो...' दोस्त ने कहा .
उस अजनबी ने डिकी से अपना सामान निकाल कर पिछली सीट पर रखा , और बैठ गया . अमरावती पहुंचने मे दोपहर हो गयी . मैने एक ढ़ाबे के आगे कार रोक दी . तीनों ने खाना खाया . मैने इशारें से दोस्त को पैसे के लिए कहा . वह अजनबी युवक तो कार के पास जा कर खडा था . मजबूरन मुझे ही पेमेंट करना पडा . आते समय मैने दोस्त से पैसे के बारें मे बात की . कार मे बैठते ही दोस्त ने उसे पैसे के लिए टोंका . 
' हां , देता हूं..' कह कर उसने चुप्पी साध ली .
रास्ते में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का गुरूकुंज मोझरी ग्राम आया . नागपुर यहॉं से महज ९० कि.मी. दूर था . 
' यहॉं दर्शन के लिए रुको ना..‌' उस अजनबी ने मेरे दोस्त से कहा .
' नही , हमें सीधा नागपुर जाना है.‌' मैने कहा . 
' please , पांच मिनट में आता हूं.‌' वह गिडगिडाया .
मैने जैसे ही कार रोकी , वह अपनी बैग लेकर उतर गया . हम कार मे ही बैठे रहे . राह देखते देखते आधा घंटा बीत गया . 
' वह नही आने वाला..' मैने दोस्त से कहा .
' मै देख कर आता हूं..' दोस्त ने कार से उतरते हुएं कहा .
अब दोस्त आधे घंटे के बाद अकेले आते हुएं दिखा . 
' वो कही दिखा नही.‌' दोस्त ने कहा .
' क्या करें ?' मैने पूछा .
' थोडा इंतजार कर लेते है..' दोस्त ने कहा .
' दिन भर रुकने पर भी फायदा नही.. वो नही आने वाला..' मैने कहा .
और आदा घंटा इंतजार करने के बाद भी वह नही आया . 
आखिरकार हम अपने गंतव्य की ओर रवाना हुएं... एक अजीबोगरीब अनुभव ले कर ! 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

अजब गजब - ९२ : ढोला मारू. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९२ : ढोला - मारू
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

राजस्थान क लोककथा म कयी प्रेमकथा परचलित स . पर इन म सबसीन परसिध्द स " ढोला - मारू " की प्रेम गाथा ! ८ वी सदी की येनअ कहानी को राजस्थान क लोककथा , लोकगीत पर येतरो असर स क , आबअ बी रूपवान लाडा - लाडी ला यहान ' ढोला - मारू ' की उपमा देस आन् कयी मवका प ' ढोला - मारू ' का गाना गावस . 
नरवर को राजो नल को पोरग्यो ढोला / साल्हकुमार . जांगलू देस ( बिकानेर ) क पूंगल ठिकाना को पवार / पुवार राजो पिंगल की पोटी मारवणी / मारूवणी . मारूवणी को नान्हो स्यबद रूप ' मारू '! 
ढोला को बिह्या नान्हपन म च मारवनी संग भयोतो . वोनअ बेरा ढोला की उमर होती ३ साल अन् मारू की देढ़ साल ! बिह्या भयो पर गवनो नी भयो . मोठो भया बास्त ढोला को बिह्या ' मालवणी ' संग भयो . नान्हपन म मारूवनी संग भया बिह्या ला ढोला बिसर गयोतो . इतअ पूंगल म मारूवनी जवान भयी . वोकअ रूपरंग की चरचा इलाखा म होन ला लागी . ढोला की दुसरी लाडी मालवनी ला मारूवनी क रूपरंग को हिरस वाटत होतो . 
मारूवनी क माय बाप न नरवर ला संदेसो लेय कन्  कयी दूत पठाया , पर ना दूत वापिस आया न संदेसा को जवाब ! राजा पिंगल पवार किथीन आया संदेसा ढोला की रानी मालवनी फाड कन् दूत ला मार डावती . कोई बी संदेसो ढोला वरी जात च नी होतो . 
इतअ राजकुमारी मारूवनी की हालत खराब होती . वोला सोता - उठता ढोला च दिसत होतो . वोला ना अनपानी गोड लागत होतो ना कोनतअ कामधंदा म मन लागत होतो . वोकी हालत देख कन् माय न राजा पिंगल ला अनखिन नरवर ला संदेसो पठावन साठी राजी कऱ्यो .राजा पिंगल न सोचबिचार कर कन् नयी तरकीब निकारी . दूत पठावन क जागा प वून न चतुर दाढ़ी ( ढोली ) ला पठायो . जब ढोली ( दाढ़ी ) नरवर जान साठी निकऱ्यो तब मारूवनी न वोला बलायो आन् वोला दोहा लिख कन् देया . दाढ़ी गाना गावन म वस्ताद होतो . वू नरवर पुग्यो . अन् राजा क ( ढोला ) महाल जवर जोर जोर कन् गाना गावन लाग्यो. रात भयी.. अगास म इज चमकन लागी... बरसाद बी चालू भयी... ढोली आबअ मल्हार राग म गाना गावन लाग्यो...
आखडिया डंबर भई , नयण गमाया रोय ।
क्यूं साजण परदेस में , रह्या बिंडाणा होय ।।
दुज्जन बयण न सांभरी , मना न वीसारेह ।
कूंझा लाल बचाह ज्यूं , खिण खिण चीतारेह ।।
जे थूं साहिबा न आवियो , सांवन पहली तीज ।
बीजळ तणे झबूकडै , मूंध मरेसी खीज ।।
नमणी , खमणी , बहुगुणी , सुकोमळी सुकच्छ ।
गोरी गंगा नीर ज्यूं , मन गरवी तन अच्छ ।।
गति गयंद , जंघ केळ ग्रभ , केहर जिमी कटि लंक ।
हीर डसण विप्रभ अधर , मरवण भ्रकुटी मयंक ।।
आदीता हूं , उजलो मारूणी मुख ब्रण ।
झीणां कपडा पैरणां , ज्यों झांकीई सोब्रण ।।
दाढी ( ढोली ) सारी रात गावत रह्यो . सकारी ढोला न वोला बलायो . दाढी न ढोला ला सारी हकीकत , करम कहानी सांगी . ढोला न आपली लाडी ' मारूवणी ' ला ल्यावन की तैयारी करी . पर हर डाव ढोला की दुसरी लाडी मालवनी अडंगो डावत होती . पर येक दिन ढोला आपलअ तेजतर्रार उट प सवार भयो . हवा क गति कन् ढोला पूंगल आयो . राजा पिंगल पवार जी न वून को मानपान कऱ्यो . ढोला ला देख कन् ' मारूवणी ' ला घाडी खुसी भयी . वोकअ मन को राजकुमार .... वोको लाडो ढोला , जेला सपना म च देख्योतो वू आबअ डोरा आघ होतो . ढोला - मारू कयी दिन वरी पूंगल म रह्या . ढोला ला मारूवणी ला लेय कन् नरवर ला वापिस आवन को होतो . राजा पिंगल पवार जी न ढोला - मारू ला बिदा कऱ्यो . 
रस्ता म मारूवणी ला पान लाग्यो . पर महादेव पाराबती न आय कन् मारूवनी ला जीवन दान देयो . मुसीबत यहान च खतम नी भयीती . आघअ उमरा - सुमरा मारूवणी प टप कन् च बस्याता . वून न ढोला ला अमल साठी आवतन देयो . मारूवनी उट पर च बस कन् रही . दाढी ( ढोली ) गाना गावत होतो . दाढ़ी ( ढोली ) क लाडी ला उमरा - सुमरा क मनसुबा की भनक लागी . वोनअ चुपचाप या बात उट प बसी मारूवनी ला सांगी . मारूवनी न उसीच उट ला टाच मारी . उट भागन ला लाग्यो . उट ला पकडन साठी ढोला धाय कन आयो . मारूवनी न वोला हकीकत सांगी . दुय झना उट पर बस कन् हवा सरीखा भाग्या . उमरा - सुमरा क घोडा क पकड म बी वूई नी आया . 
ढोला मारूवनी ला लेकन नरवर आयो . नरवर आय कन् मारूवनी आन् मालवनी ढोला संगअ हासी - खुसी कन् रव्हन लाग्या . 
८ वी सदी की येनअ प्रेमकथा ला ११ वी सदी म कवि कलोल न दोहा म लिखी ... 
सोरठियो दुहो भलो , भलि मरवणरी बात ।
जीवन छाई धण भली , तारां छाई रात ।।
_ असी राजस्थानी लोककथा / लोकगीत म ढोला - मारू की या अमर प्रेम कहानी !

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, May 11, 2022

दाआजी ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

दाआजी
 Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

आमी नान्हा , दाआजी खरा की मेढ
चांद सूर्व्या वानी पाथ म फिरनो
जवारी का कनीस हाथर कन
दाना निकरत वरी गा चुरनो ।

सुदा - बुदा बिचार उपनन ला
हवा देख कन तिवा ला मांडनो
दानो खरा म , भूसो दूर खेत म
असो अनुभव को ग्यान सांगनो ।

आरोधुरो जिंदगी को लिख कन
दाआजी की सुदी बाट दिखाडनो
दुय बात समझाय कन सांगी
नाव गाव ला नी होतो हेदाडनो ।

पहाड सरखा हिम्मत का कप्पा
अंधारी रात म चंदर चांदनो
रूप दुसरो भोरो भोल्यानाथ को
वून ला स्यबद म कसो बांधनो ।

वून् क जाना कन् सऱ्यो नान्होपन
मोठअ पन को जू खांदा प धरनो
हर घडी हर पल डोरा आघ
हात आबअ सिरफ याद करनो ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, May 9, 2022

पिताजी. Hindi language _ हिंदी भाषा

पिताजी

हम छोटे थे , पिताजी तो धुरी थे
भाग्य रेखाएं भी थी समसमान
चहकते भी थे , सहमते भी थे 
बगिया को सींचते थे बाग़बान ।१।

रुठी तकदीर टूटा आसमान
लाख मिन्नतें विफल भगवान
पिता का पावन साया हट गया
तकलीफ मे घरौंदा परेशान ।२।

बडा बना कर छीना बचपन
हुआ असीम हमारा नुकसान
बोझ असहनीय नन्हें कंधों पे
दया नही आई हे कृपानिधान ।३।

डूब गया मॉं के माथे का सूरज
गली कलाईयों की हुई वीरान
हर कोनें में महसूस करती
बिखरी यादों के अमीट निशान ।४।

सदा हृदय से हमें लगा कर
आंसुओं से कराती सचैल स्नान
दुनिया ही उजड गयी हमारी
छीन ली घर की आन - बान - शान ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर



Sunday, May 8, 2022

डायरी - २०२२. लिफ्ट : भाग ४

डायरी - २०२२
लिफ्ट : भाग ४
मै वैसे भी लिफ्ट देने के पक्ष में नहीं रहता हूं . मुझे अपनी ही धून में गाडी चलाना भांता है . न बातचीत.. न रोकटोक ! 
आखिरकार दाये हाथ पर तीसरा स्कूल भी आया . मैने राइट इंडिकेटर देकर बाइक स्कूल के गेट के पास रोक दी . इस सडक पर यह आखिरी स्कूल था . 
' उतरो..' मैने कहा .
' नही , यहॉं नही उतरना है.. और आगे जाना हैं.. please .' लडकी ने कहा . 
' अरे आगे का कोई नाम तो होगा ? देखो , अभी तुम परेशान कर रही हो...' मैने कहा .
' थोडा आगे जाना है....' लडकी ने कहा .
अब किसी अनजान भय से डरने की मेरी बारी थी . मुझे लडकी का रवैया भी ठीकठाक नही लग रहा था . मेरा विचारचक्र तेजी से घुमने लगा . आगे चौराहें पर १० - २० पुलिस का डेरा रहता था . चौराहे से आगे १ कि.मी. सडक सुनसान जगह से गुजरती थी . क्यो की यह जगह तालाब और जंगल के किनारे है . अगर इस लडकी ने चौराहे पर कोई हंगामा किया तो , मेरा पुलिस के चंगुल में फसना तय था . 
मैने तेजी से बाइक निकाली.. किसी भी हालत में मुझे वह पुलिसवाला चौराहा पार करना था . 
' देखो , तुम्हें कहॉं जाना है , यह तुम बता नही रही हो . मुझे साइट पर पहुंचना जरूरी है . अभी भी समय है ... सही सही बताओ , तुम्हें कहॉं जाना है ? ' मैने सख्त अंदाज में कहा . 
' चौराहे से लेफ्ट जाना है..' लडकी ने कहा . 
' मुझे सीधा जाना है..' मैने तेजी से चौराहा पार करते हुए कहा . 
फिर आगे जा कर सुरक्षित जगह पर बाइक रोक दी . 
' अभी तुम उतरो...' मैने सख्ती से कहा . 
' नही , मुझे चौराहे से लेफ्ट जाना था...' उसने गिडगिडाते हुए कहा .
' मुझे सीधा जाना है . मै तुम्हारे इशारों पर नही चलूंगा . और अब भी तुम्हे कहॉं जाना है , यह नही बताया.. पहले तुम नीचे उतरो . ' मैने गुस्से से कहा . 
' नही , मै यहॉं नही उतरुंगी.. मुझे जहॉं से लिफ्ट दी थी , वहॉं वापिस छोड दो . ' उसने कहा . 
' इतना समय नही है मेरे पास... उतरो नीचे .' मैने उसका बैग खिंच कर उसे उतारते हुए कहा . 
मै उस से जल्द ही छुटकारा पाना चाहता था . थोडा डरा हुआ भी था . 
' आपका नंबर तो दे दो...' उसने कहा .
' मेरे पास कोई नंबर वंबर नही है..' मैने बाइक पर बैठते हुए कहा . 
उसने पिछली सीट को कस कर पकड लिया . मैने बाइक रेस की..उसका हाथ छुट गया . मैने बिना पीछे देखे तेजी से बाइक दौडाई . साइट पर पहुंचा तो मै पसीने से तरबतर हो गया था . ऑफिस मे सुपरवाइझर और ठेकेदार बैठे थे .  मैने बाइक स्टैंड पर लगाई और ऑफिस मे गया . 
' क्या हुआ साहब ? ' सुपरवाइझर ने मेरा हाल देख कर पूछा . 
मैने सारी हकीकत बयान की . सुपरवाइझर ने पानी लाया . 
' लेकीन साहब , आज तो रविवार है... आज कौन सा स्कूल रहता है ! ' एक ठेकेदार ने कहा . 
' अरे हां.. यह बात मेरे दिमाग मे ही नही आई ....' मैने कहा . 
और सभी मेरी ओर अचरज से देखते हुए मुस्कुराने लगे ....( समाप्त ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

डायरी - २०२२. लिफ्ट : भाग ३

डायरी - २०२२
लिफ्ट : भाग ३ 

यामाहा बाइक मेरी जान थी . कभी कभी उसे भी साइट पर लेके जाता था . आज कार की चाबी की बजाए यामाहा की चाबी ली . उसे उंगलि में घुमाते हुए सुदर्शनचक्र की फील महसूस की.. जैसे मै साक्षात सुदर्शनचक्र धारी भगवान श्रीकृष्ण !
स्टार्ट करते ही उसकी आवाज कालोनी मे गुंजने लगी . हेल्मेट का शिरस्त्राण सर पर चढ़ाया और निकल पडा अपनी ही मस्ती में ! सवारी पहले पहुंची पेट्रोल पंप . पेट्रोल भर कर बाइक की टंकी को बडे प्यार से थपथपाया ; और ट्रैफिक देखते हुए सडक पार की. 
' टी प्वॉइंट ' पर स्कूल युनिफॉर्म पहनी एक लडकी लिफ्ट मांग रही थी . उस सडक पर तीन स्कूल थे . मैने सोचा स्कूल बस छूट गयी होगी , इस लिए यह लडकी लिफ्ट मांग रही होगी . वैसे मै लिफ्ट देना टालता हूं . लेकीन आज मूड अच्छा था . मैने बाइक उस के पास रोक दी . 
' कौन से स्कूल जाना है ? ' मैने पूछा . 
' बस , आगे ही जाना है . ' बाइक पर बैठते हुए लडकी ने जवाब दिया . 
मैने मन ही मन सोचा , चलो आज किसी के काम आया...
उस लडकी ने स्कूल बैग आगे हमारे बीच पकडा था . मै अपनी ही धून में बाइक चला रहा था . टोलनाका पार हुआ . यहाँ से आगे बस्ती बहुत ही कम थी . 
' बैग से आपको तकलीफ हो रही है क्या ?' लडकी ने पूछा . 
' नही तो . तुम इत्मिनान से बैठो..' मैने कहा . 
फिर भी उस लडकी ने बैग पीठ पर लटकाया और सामने सरक गयी ‌ . अब हडबडाने की बारी मेरी थी . मै सहम कर बाइक चलाने लगा . अब वह इतनी सट कर बैठी थी की बाइक की गति कम - ज्यादा होने पर उसका स्पर्श मेरी पीठ को हो रहा था . मेरा सोचना बंद हो कर अब सारा ध्यान लडकी की हरकतों पर था . 
बाये हाथ पर पहला स्कूल आया . मैने बाइक धीमी की . 
' इस स्कूल मे जाना है ना ? ' मैने पीछे देखे बिना पूछा . 
' नही , आगे जाना है.' उसने जवाब दिया . 
मैने सोचा , और दो स्कूल बचे है , उस में से कोई होगा . 
अब उस लडकी के हाथ कभी कंधें पर , कभी पीठ पर , कभी...
मै असहज महसूस कर रहा था.. मेरे अच्छे मूड की ऐसी तैसी हो गयी थी . 
' आप पुलिस मे है क्या ?' लडकी ने पूछा .
' नही..' मैने दो टूक जवाब दिया . 
आगे दाये हाथ पर दुसरा स्कूल आया . मैने राइट इंडिकेटर ऑन किया . 
' अरे नही... यहॉं नही उतरना है...' इंडिकेटर बझर की आवाज सुन कर लडकी ने कहा . 
मेरा माथा ठनका . 
' ठीक है.. और तुम ठीक से बैठो .' मैने झल्लाकर कहॉं .  ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, May 7, 2022

वाटस्याप. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

वाटस्याप
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

वाटस्यापचे गुरुप
पोस्टं धाडाची गा बानी
सांज सकारी हुरुप
सारे भलतेच ग्यानी ।१।

राजकारनाचा कट्टा
चाले दांगडो तुफानी
बसे रट्ट्यावर रट्टा
झगड्याची राजधानी ।२।

घेनं - देनं कायी नायी
अडान्याचं नस्यापानी
बिनकामी कोल्हेकुई
हयदोस मनी रानी ।३।

आलं इमोजीचं राज
स्यबदच मुक्यावानी
फारवरडेड माज
फुकटचं दानापानी ।४।

किती आवरा आवरा
अगा आगुटना कोनी
करे पराचा कावरा
खरं जाये उपवोनी ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, May 2, 2022

दिवठानी ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

दिवठानी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

रूप लक्षुमी को लाडी
सोभे गरा येकदानी
पाच जोत की झलारे
मांडव म दिवठानी ।१।

वोला हिलगाये पाड्डो
गाये दायजा कहानी
धऱ्यो पाड्डा प दायजो
पानदान खानदानी ।२।

पाच वान को दायजो 
नातागोता की निस्यानी
वोला देख देख कन्
डोरा म आवस पानी ।३।

जसी जोत थरथरे
तेज लह्यर क वानी
उसी पिवरअ खेंडा म
लाडी होस पानी पानी ।४।

बोह्यला पर को पीढ़ो 
ज्याने मन की कहानी
रंग हरद को सोनो
रचे नई जिंदगानी ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, May 1, 2022

राजकारनाचा पान. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

राजकारनाचा पान
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

येका मताच्या नंद्याले
येका दिवसाचा मान
खांदसेकनी करून
जुवाखाली त्याची मान ।१।

येका दिवसी वलीत
मांगे दारोदारी दान
पाच साल रदवून
नेते खुंदाडते रान ।२।

लोकसेवक नावाले
बादस्यावानीच स्यान
पाचा वरसात घेते
कोटी कोटीची उडान ।३।

पोट्टे वर्गनीत खूस
माय बाप हयरान
मोरच्यात दंगलीत
फुकटचे डंडे खानं ।४।

खांद्या रंगोरंगीचे झ्येंडे
जाती धरम नावानं
साद्या सुद्याले लागला
राजकारनाचा पान ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर