डायरी - २०२२
लिफ्ट : भाग - ५
नाशिक के ' अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलन - २०२१ ' मे , मै एक दोस्त के साथ कार से गया था . वापसी मे हम शिर्डी पहुंचे . रात हो गयी थी . कार पार्किंग मे लगा कर हम मंदिर की ओर जा रहे थे की , बैग लिए एक युवक ने हमें रोका .
' साहब , आप नागपुर जा रहे हो क्या ? अगर गाडी मे जगह हो तो मै सकता हूं ? ' उस युवक ने पूछा .
हम दोनों एक दुसरे को प्रश्नार्थक मुद्रा से ताकने लगे . मै लिफ्ट का कोई झमेला पालने के मूड मे नही था . लेकीन मेरे दोस्त ने हां कर दी . मंदिर मे entry fee थी . पास लेने की कतार में मुझे ही लगना पडा . वह अजनबी युवक और मेरा दोस्त बाहर खडे ऐसे बतिया रहे थे , मानो बचपन से परिचित हो ! मेरे गुस्से ने रेंगना शुरू किया . मै आया और सब के हाथ में पास थमा कर दर्शन की कतार में लगे . दर्शन कर मै और मेरा दोस्त बाहर आये . वह अजनबी युवक नदारद !
अब इसे कहॉं खोजे ? झुंझलाते हुए मै वही खडा रहा . मेरा दोस्त उसे खोजने गया . आधे घंटे बाद दोस्त वापिस आया .
' कैसे बंदे को हां बोल दिया यार ! यह तो शुरूवात से ही मुसीबत है .' मैने कहा .
हमें भोजन भी करना था .
' चलो छोडो... चलते है..' मैने पार्किंग की ओर चलते हुए कहा .
' अरे रुको... देखो , वह आ रहा है .' दोस्त ने कहा .
मैने मुड कर देखा तो , दोनों हाथ में सामान लेकर वह आ रहा था .
' अजीब आदमी हो तुम...' मैने कहा .
' माफ कर दो.. सामान खरीदने में देरी हो गयी... चलो .' मेरा वाक्य बीच में काटते हुएं उसने कहा .
हम भोजन गृह गये . कुपन लेकर प्रसाद ग्रहण किया . खाना खाने से सुस्ती आ रही थी , लेकीन सफर लंबा था... निकलना जरूरी था . मैने गाडी निकाली . दोस्त बगल की सीट पर बैठा . कुछ समय बाद उसे नींद आने लगी .
' तुम पीछे जाओ और उसे सामने भेजो..' मैने दोस्त से कहा .
अब वह अजनबी युवक बगल की सीट पर बैठा . कुछ समय बाद वह भी सोने लगा .
' यहॉं सोना नही.. मेरे साथ बात करते रहो.समझे?.' मैने कहा .
' जी..' उसने सर हिला कर कहा .
लेकीन उस पर तो नींद का सुरूर था... बीच बीच में खर्राटे भी गुंजने लगे . मुझे गुस्सा आ रहा था . मैने कार रोकी . पानी पीया और दोस्त को जगाया . उन दोनों पर नींद हावी थी . मैने दोनों को पिछली सीट पर भेजा , और सावधानी से ड्राइव्ह करने लगा . मेरी ऑंखें भी असहकार आंदोलन करने पर तूली थी . मैने शेगाव तक गाडी खिंचने की ठानी . शेगाव के भक्तनिवास में कार पार्क की . गाडी रुकते ही दोनों ने पूछा , ' क्या हुआ ?'
' उतरो , यहॉं हम विश्राम करेंगे और सवेरे नागपुर के लिए रवाना होंगे .' मैने डिकी खोलते हुएं कहा .
मै बैग लेकर बुकींग काउंटर ढुंढने लगा . पीछे पीछे मेरा दोस्त भी आ रहा था . मै काउंटर पर पहुंचा , दोस्त भी आ गया .
' वह नमुना कहा है ?' मैने पूछा .
' पता नहीं , मेरे पीछे ही आ रहा था .' दोस्त ने जवाब दिया .
' उसके लिए कमरा लेना है की नही ?' मैने कहा .
' उसके लिए भी ले लो..' दोस्त ने आलस देते हुएं कहा .
' लेकीन उसके पैसे कौन देगा ?' मैने पूछा .
' अभी दे दो.. मै उससे ले लूंगा .' दोस्त ने कहा .
हम दोनों कमरे बुक कर उनका बिल्डिंग नंबर खोजने लगे . जैसे ही हम बिल्डिंग नंबर खोज कर जीने से चढ़ने लगे , वह अजीब अजनबी हमारे पीछे आया .
' क्या लुकाछीपी खेल रहे हो... कभी दिखते हो , कभी गायब हो जाते हो ..' मैने डांटते हुएं कहा .
वह नीचे सर किये चुपचाप हमारे पीछे आया . तीनों अपने अपने कमरें में सो गये . सुबह जाने के पहले, उसी संकुल में हम नाश्ता करने गये . वह बंदा फिर गायब ! हम दोनों का नाश्ता आया वैसे ही वह कही से टपक पडा . मेरे दोस्त ने उसके लिए भी नाश्ता मंगवाया . बिल का भूगतान तो मुझे ही करना था ! नाश्ता कर हम श्री गजानन महाराज के दर्शन करने गये . दर्शन कर आये तो वह बंदा फिर शिर्डी जैसा अंतर्धान हो गया . हम कार के पास इंतजार करते करते थक गये .
' यार , उस से कमरे के किराये के पैसे लो और यहॉं से उसे छोड दो..' मैने दोस्त से कहा .
' ले लेंगे.. चिंता मत करो..' दोस्त ने कहा .
लंबे इंतजार के बाद उस लिफ्ट वाले महाशय के दर्शन हुएं . दोनों हाथ में केरीबैग पकडे तेजी से आ रहा था .
' तुम आदमी हो पजामा... तुम हमारे हिसाब से चलोगे या , हम तुम्हारे हिसाब से चलें..' मैने गुस्से से कहा .
' डिकी खोल दो...' दोस्त ने कहा .
उस अजनबी ने डिकी से अपना सामान निकाल कर पिछली सीट पर रखा , और बैठ गया . अमरावती पहुंचने मे दोपहर हो गयी . मैने एक ढ़ाबे के आगे कार रोक दी . तीनों ने खाना खाया . मैने इशारें से दोस्त को पैसे के लिए कहा . वह अजनबी युवक तो कार के पास जा कर खडा था . मजबूरन मुझे ही पेमेंट करना पडा . आते समय मैने दोस्त से पैसे के बारें मे बात की . कार मे बैठते ही दोस्त ने उसे पैसे के लिए टोंका .
' हां , देता हूं..' कह कर उसने चुप्पी साध ली .
रास्ते में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का गुरूकुंज मोझरी ग्राम आया . नागपुर यहॉं से महज ९० कि.मी. दूर था .
' यहॉं दर्शन के लिए रुको ना..' उस अजनबी ने मेरे दोस्त से कहा .
' नही , हमें सीधा नागपुर जाना है.' मैने कहा .
' please , पांच मिनट में आता हूं.' वह गिडगिडाया .
मैने जैसे ही कार रोकी , वह अपनी बैग लेकर उतर गया . हम कार मे ही बैठे रहे . राह देखते देखते आधा घंटा बीत गया .
' वह नही आने वाला..' मैने दोस्त से कहा .
' मै देख कर आता हूं..' दोस्त ने कार से उतरते हुएं कहा .
अब दोस्त आधे घंटे के बाद अकेले आते हुएं दिखा .
' वो कही दिखा नही.' दोस्त ने कहा .
' क्या करें ?' मैने पूछा .
' थोडा इंतजार कर लेते है..' दोस्त ने कहा .
' दिन भर रुकने पर भी फायदा नही.. वो नही आने वाला..' मैने कहा .
और आदा घंटा इंतजार करने के बाद भी वह नही आया .
आखिरकार हम अपने गंतव्य की ओर रवाना हुएं... एक अजीबोगरीब अनुभव ले कर !
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर