Saturday, October 31, 2020

अजब गजब - २४ : आम्बा वाली माता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २४ : आम्बा वाली माता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्यप्रदेस क इंदौर म ' आम्बा वाली माता ' को चमत्कारी देऊर स . राजेंद्र नगर भाग क दत्तनगर म आम्बा वाली माता को दरबार स . दूर दूर सिन भक्त लोग यहान नवस बोलन साठी , दरस्यन साठी आवस . दुनिया म संतान सुख सिन मोठो दुसरो सुख नहाय . गोदभराई साठी माय बहिनना , बू बेटीना माय क दरबार म आवस . यहान आवनी वाला भक्त मन्नत पुरी भया पर आम्बा क झाड ला पाच नारेल की तोरन बांधस . 
आम्बा वाली माता क दरबार म ' पूरन सिंग परमार जी ' पुजारी स .
माय क दरबार म दुय बी नवरातरी ला मोठो भंडारो रव्हस . नवरातरी क पह्यले आम्बा क झाड पर की सबन नारेल की तोरन काढस . टरक दुय टरक नारेलना निकरस . कयी नारेलना हवन साठी बापरस आन् बाकी नारेल भुंजकन् वोको परसाद बनावस . 
देऊर क आघऽ प्रवेसद्वार स . वासिन जेवनऽ हाथ प देऊर आन् डाखऽ हाथ प लोखंडी खूब मोठी कढय स . 
१. आरती , उत्सव : * आम्बा वाली माता की मंगरवार ला खास आरती रात क १२ बाजता आन् बाकी दिन की आरती रात म १०:३० बाजता होस .
* दुय नवरातरी ला लाखों लोगना दरस्यन साठी आवस . 
* हर मंगरवार ला बाईलोग गोदभराई ( वटी )  साठी आवस .
* नवरातरी क अस्टमी ला माय की भव्य आरती होस . अस्टमी ला माय की ज्या पूंजा होस वोला , ' कुकू नहान पूंजा ' कोस . अस्टमी क दिन माय रातभर दरस्यन देस . 
२. मन्नत ( नवस ) राखन का नियम : 
* मन्नत ( नवस ) को दिन मंगरवार रव्हस . नवस करनी वाला / वाली ला ३ नारेल आन् पूंजापाती को सामान चढावनो जरुरी स .
* पूंजा क सामानकन् बन्यो धागो आरती भया बाद लाईनकन् लेनो पडेन .
* जेनऽ नवस करेस वोनऽ नवस क धागा ला जेवनऽ हाथ म नी त गरा म बांधकन् पाच मंगरवार माय क दरबार म आयकन् हर डाव २१ परिकरमा करनी लागेन . 
* नवस कबुलनी वाला / वाली ला संकल्प लेनो लागस क नवस पुरो भया बास्त वूई कायको परसाद चढायेन . 
* नवस क बेरा लेयो संकल्प , नवस पुरो भया पर वोला पुरो करनोच लागस . 
* जेनऽ नवस बोले होयेन , वोको कोनी कारनकन् मंगरवार ला माय क दरबार म आवनो नी होत , वोला मंगरवार को उपास धरकन् अरधी रात भया पर ( उपास ) सोडनो पडेन .
जय आम्बा वाली माता......


लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर.

Friday, October 30, 2020

सात आसरा को कथा गान - ३. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सात आसरा को कथा गान - ३
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

उठे अवधूत धाड कन्
दिसे नी सवासिन बहिनना
कान गयी पटील की मैना
कुद्यो पानी म ढुंढे निस्यानी ।२०।

गयो पातार म अवधूत
कोंडी देखी सात बहिनना
तोड्यो तालो सोड्या बंधनना
आया घर पाखरू वानी ।२१।

गंगा आयी देव इंदर संग
टुट्यो तालो उघडो दरुजो
देव इंदर को जऱ्यो कारजो
चमकायी इच पाडे पानी ।२२।

महापूर खड्डे खेत गाव ला
बह्या मानुस ढोर डंगर
सुख ला लागी पापी नजर
रोये दाठ्ठो रोये गा वरनी ।२३।

सऱ्या उपाव हारी आसरा
गंगा संग गयी सवासिन
अवधूत बी चाले पासीन
आया सारा महादेव चरनी ।२४।

गंगा जी देव इंदर संग
भोलेनाथ ला समझे सारो
इंदर ला कह्ये राग बारो
साती आसरा गा तोरऽ पोटी वानी ।२५।

इंदर कह्ये गलती भयी
आसिरवाद देऊस दान
आब भेटेन दुनन मान 
जागा तुमारी जहान पानी ।२६।

बंधू बने अवधूत झोटिंग
सात आसरा देव को मान
पोटुबाटुना को  धरो ध्यान
तुमारऽ पाय फसल पानी ।२७।

सवासिन ला देवो आसिस
पानी की करो जी रखवाली
आड खेडा की तुमीच वाली
महादेव की तथास्तु बानी ।२८।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

सात आसरा को कथा गान - २. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सात आसरा को कथा गान - २
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कमलावती तबलजी प 
प्रेम भावना की पडी छाया
सूर ताल की त सपी माया
फुट्यो तबलो भयी जी हानी ।१०।

देव देवता नाराज भया
देव इंदर ला आयो राग
देयो सराप नरक भोग
लागी रोवन ला सात झनी ।११।

तबलजी लटलट कापे
भयी गलती उस्याप मांग्यो
बारा बरस नरक भोगो
वोक बाद नवी जिंदगानी ।१२।

भोग्यो नरक लेयो जी जलम
वांझोटी क पेट जीव सात
किडो गोबर को भोई उत्मात
तबलजी की धूरधानी ।१३।

विधवा क पेट तबलजी
लेयो जलम अवधूत
कह्ये गा झोटिंग कोनी भूत
जसी करनी उसी भरनी ।१४।

सात आसरा ला परनायी
सासू ससरा समझदार
सुखी संसार लाडा को प्यार
सात आसरा लयच गुनी ।१५।

इंदर देव कह्ये गंगा ला
नदी नाला को आटव पानी
अकाल लाये डोरा म पानी
गंगा मांगे सात सवासिनी ।१६।

बोली कमलावती आमी सात
गंगा जवर जाऊस आमी
नदी नाला म भरेन पानी
लोगना की नी होयेन हानी ।१७।

बने अवधूत धुरकरी
सात बहिन न पूंजा करी
जागी गंगा खुसी क मारी
आये पूर भरे पानीच पानी ।१८।

कोंडे गंगा न पातारलोक
सात बहिन ला कारावास 
जांभुर खल भूत निजेस 
लागे पाय ला ठंडो गा पानी ।१९।
( क्रमशः ) 

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

सात आसरा को कथा गान - १. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सात आसरा को कथा गान - १
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Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सात आसरा सात यी झनी
इंदर घर की इंद्रायनी ।धृ।

देव तेत्तीस कोटी मोठा
देव इंदर सोच बिचारे
कसा काय परसन्न करे
कमलावती ल्यायी जी पानी ।१।

नाच गायन बाज्या वादन
सात आसरा रूप साजरा
लेयो साज घाल्यास गजरा
पुसे कोनतऽ चिंता म धनी ।२।

असो खेलो खेल पाडो भूल
देये आवतन देवताना ला
म्हरऽ वस म राखन ला
तुमी लगावो कला की बानी ।३।

चार दिन भया सुध खोया
देव खेल म गुतत गया
दान अरधो महाल कह्या
फसी इंदर देव जबानी ।४।

करी देवना क लाडी साठी
दिन पाचवो नारद कली
चाल पाप वासना की चली
डोले सेसनाग हाले धरनी ।५।

गोलो राग को धाडे देवीना
सात बहिनना आंग धोये
तबलजी न धरम खोये
लुकाया लुगडा किस्न वानी ।६।

आसरा ला धरम संकट
मांगे कमलावती ला बचन
बिह्या करो सोडो अडचन
तबलजी की या मागनी ।७।

आन पानी की तुमी लेकन
संग निभावो लाडी धरम
आसरा का फुट्या गा करम
कारो भयो जी पांढरो पानी ।८।

उंबर खलतऽ धऱ्या लुगडा
साहा आसरा आघऽ निकरी
कमलावती की आस सरी
फरी नारद जी की करनी ।९।

( क्रमशः ) 

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, October 29, 2020

अजब गजब - २३ : अंबामाई , धारूड. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २३ : अंबामाई , धारूड
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मध्यप्रदेस क बयतूल जिला म आठनेर तहसील म धारूड ( धारूल ) गाव स . आठनेर पासिन ६० कि.मी. प सतपुडा क दाटदुट जंगल म महाराष्ट्र क हद जवर अंबामाई को दरबार स . ३ कि.मी. उच्ची पहाड प पास्यानी गुफा म १०० फिट अंदर अंबामाई की स्वयंभू मूरती स . इ स्थान रहस्यमयी आन् चमत्कारी स. गुफा क चट्टान मिन साल भर पानी टपकत रव्हस . 
बयतूल क जंगल मिन यात्रा सुरू करी त रस्ता म नहालदेव बाबा को देऊर लागस . बाबा क दरस्यन कन् रस्ता की बाधा दूर होस . यासिन ३ कि.मी. की अंबामाई क दरबार की खडी पहाडी स .
१. अंबामाई क दरबार की खोज : महाराष्ट्र क परतवाडा म मनेरी बिकनी वाली मंगलाबाई होती . वा सिध्दी की अवस्था म इत उत घुमत होती . वा ज्यान बी जात होती , लोगना वोला हाकलत होता . फिरत घुमत वा सालबरडी म गयी . वहान भगवान भोलेनाथ की वून पर किरपा भयी . येक रात भगवान भोलेनाथ वून क सपना म आया आन् सांगे क , तुमी धारूड ला जावो... अंबामाई क दरबार म...
मंगला बाई न भगवान भोलेनाथ न सांगे ती स्थान खोजन साठी सालबरडी सोडी . सतपुडा को दाटदुट जंगल , जंगली जनावर को भेव , मानुस बाई को दरस्यन नहाय असऽ हालत म मंगला बाई दरबार ला सोधत रही . इ. स. १९७० म घुमत घुमत मंगला बाई खडी चट्टान क गुफा जवर आयी . गुफा क अंदर अंबामाई को दरस्यन भयो . वहान मंगला बाई न घोर तपस्या करी . अंबामाई क आसिरवादकन् वून ला सिध्दीना भेटी . अंबामाई को वाहन बाघ संगऽ मंगला बाई रव्हत होती . मंगला बाई सिरफ झाडपालो , कंद फल च खात होती . वून अंधारा कोई , बिचु काटा को भेव नी लागत होतो . 
वोन विरान जंगल म मंगला बाई न येकलीच रह्यकन् जपतप करे . हरु हरु लोगना ला वून क बारा म मालुम भये . इक्का दुक्का लोगना आवन ला लाग्या . मंगला बाई क मुंडा कन् साक्षात अंबामाई च बोलत होती . मंगला बाई ज्या बी बात कव्हती - सांगती वा बात सोरा आना खरी रव्हत होती. वून क सांग्या - बोल्या नुसार च घडत होतो . वून भूत - भविस्य को ग्यान होतो . मंगला बाई जवर दिव्य स्यक्ती होती .  महाराष्ट्र आन् मध्यप्रदेस म अंबामाई आन् मंगला बाई क चमत्कार की बात हवा सरखी फयली आन् अंबामाई को दरबार परसिध्द भये . 

२. इतिहास आन् मान्यता : * अंबामाई क भुवान क जवर २५५ गुफा की खोज भयी . येनऽ गुफाना म मानुस का पूर्वज रव्हत होता . वून का चट्टान प  काढ्यास ती चितरंगना आब बी स . येनऽ चितरंगना को काल आज पासिन १५०० - २५००० बरस पह्यलो क स . आब बी खोज चालू च स. 
* अंबामाई क दरबार मिन कोनी बी खाली हातकन् नी जात . अंबामाई क दरस्यन कन् मनोकामना पुरी होस . वांझोटी की कूस उजवस , असी मान्यता स . 
* मंगला बाई यहान इ.स. १९७० म आयी आन् इ. स. १९८४ ला वून को सर्गवास भयो . येनऽ चवदा बरस भर मंगला बाई न उपास करे . 
* पुरान कऽ अनुसार यहान माता सती की चुनरी पडीती . मंदिर क पुजारी ला कहान बी साफ सफाई म , खोद खाद म माता सती की लाल चुनरीना च सापडीस . तेकन येनऽ स्थान ला ' चुनरी वालो दरबार ' कोस . 
* विदर्भ क राजा की या अंबामाई कुलदेवी होती , असी मान्यता स . 
* आठनेर गाव म सुनील बोबले नाव को ९ साल को पोरग्यो होतो . वोला माता रानी सपना म कोनतो तरी स्थान दिखाडत होती आन् बाद म पलंग परिन पाडत होती . या बात रोज रोज होन लागी . माय बाप परेस्यान भया . वून ला वाटे क , आपलऽ पोरग्या ला भूत - प्रेत लागेस . जादू टोनो , जंतर मंतर लय करकन् देख्या पर आराम पडन को नावच नी होतो . वून की बात वहान क अंबामाई को भक्त सिरी घोडके सिन भयी . वून न सांगे क तुमारऽ पोरगा प भूत - प्रेत नहाय त , माय को आसिरवाद स . वोला ढुंढो त पोरग्या ला आराम पडेन . माय बाप सुनील ला लेकन सपना म को स्थान ढुंढन ला लाग्या . तीन बरस घुम्या बास्त वून ला धारूल को अंबामाई को दरबार सापडे . सुनील ला सपना म दिखनी वाली जागा याच होती . सुनील न माय बाप ला घरऽ धाडे आन् सोता वहान च अंबामाई क सेवा साठी थांबे . असो करता करता १२ बरस भया . अंबामाई क दरबार म बाघ बाघीन आन् वून का चार पिल्ला बी सुनील संग रव्हत होता . नान स सुनील ला वून को भेव नी लाग्ये . 
सुनील की बहिनना बिह्या लाइक भयी . येक दिन सुनील अंबामाई को सिंगार कर रहेतो . वोका माय बाप पासीन देख रयाता . जसो सिंगार पुरो भयो , सुनील क माय न वोको हात अंबामाई क डोकसा प राखे आन् घर चलन को बचन लेये . सुनील अंबामाई जवर लय रोया . वोला अंबामाई ला सोडकन् जान को नी होतो . तब अंबामाई न सुनील ला कह्ये क तू आपलऽ जलम देन वाली माय क जवर जा . बहिन क बिह्या साठी , घर चलावन साठी माय बाप ला मदत कर . म्हरी मूरतीना घडायकन् आपलो गुजारो चलाव . मु हरदम च तोरऽ जवर रहून . तोरी बनायी मूरतीना ला तोड नी रहेन . दुखी मन कन् सुनील घर आयो . वोनऽ आन् वोक खानदान म कोनी न मूरती नी घडायती . सुनील न अंबामाई की मूरतीना बनावन ला सुरवात करी . बिना मूरती कला क ग्यान कन् सुनील न असी मूरतीना घडायी , जी मोठा मोठा सिक्या पढ्या मूरतीकार बी नी घडाय सकस . सुनील की बनायी मूरतीना भोपाल , बयतूल , इटारसी आन् देस भर म लागीस . 

३. उत्सव : * अंबामाई क दरबार म हर पुनव ला होम हवन होस . पाच हवन कऱ्या बास्त कामना पूरी होस , असी मान्यता स . 
* नवरातरी म नव दिन यहान मेलो आन् भंडारो लागस . नव दिन म अंबामाई नव रूप दिखाडस . 
* महासिवरातरी ला यहान मोठो मेलो भरस . 
* साल भर भक्त लोगना आपली तकलिफ लेकन , सरधा कन् दरबार म आवस आन् अंबामाई वून की मनोकामना पूरी करस . 

__ अंबामाई क गुफा खलतऽ २.५ कि.मी. प भुईकुंडी म नानी अंबामाई को देऊर स . अंबामाई क दरस्यन क पह्यले लोगना यहान पूंजा करस . गुफा क आघऽ मंगला माता की मूरती स . वोको दरस्यन कऱ्या बास्त भक्त लोग अंबामाई को दरस्यन लेस . 
गुफा म बारोमास पानी टपकस . वोन पानी को नानोसो कुंड बनेस . वहान अंबामाई , सिरी गनेस , भगवान भोलेनाथ , काली माता की स्वयंभू मूरतीना स . 
जय चुनरी वालऽ दरबार की...
जय अंबामाई की...
जय मंगला माता की....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, October 28, 2020

भोयरी संस्कृति - ३७ : सात आसरा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३७ : सात आसरा
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सात आसरा या गावदेवता स . अप्सरा को अपभ्रंस आसरा ! आसरा या जलदेवता स . आसरा भीर , तलाव , नदी असऽ पानी क ठिकान प रव्हस , तेकन वून ला जलदेवता मानस . आसरा ला सात आसरा , सती आसरा , साती आसरा , सात अप्सरा , सात माता , माहुली ( माऊली ) बी कोस . 
जमीन आन् पानी को बराबर बखत ला बराबर योग भयकन् फर , फुल , झाड , फसल उगवस . तेकन या देवता जमीन आन् पानी सिन सम्बधित स . 
सात आसरा या पानी की रखवाली करनी वाली देवता . सात आसरा देवता को सम्बध सिंधू संस्कृती पावतर जास . 
कोनी सात आसरा को सम्बध सप्तमातृका सिन बी दिखाडस . 
आसरा हरदम सात क आकडाकन् रव्हस , तेकन सात आसरा !
आसरा ला देवना की सोबतीन ना समजस . कहान कहान सात आसरा संग येक भाई / पोटु बी रव्हस . 
सात सेंदूर लगाया दगुडना , असो आसरा को रूप रव्हस . 
सात आसरा का नावना : १. मत्स्यी ( मच्छी क रूप म ) २. कूरमी ( कासू क रूप म ) ३. करकटी ( खेकडा क रूप म ) ४. दरदुरी ( मेंडकी क रूप म ) ५. जतुपी ६. सोमपा ७. मकरी ( मगर क रूप म ) 
पूंजा : *  खेत म चांगली फसल आवन साठी , भीर को पानी आट्या नी पाह्यजे तेक साठी , फसल प रोगराई नी आया पाह्यजे तेक साठी आसरा की पूंजा करस . अवस ला नारेल फोडस . 
* आसरा को सम्बध जास्त करकन् बाई अन् पोटुबाटुना सिन रव्हस . बाई को बारतपन चांगलो भया पायजेन , पोटुबाटुना की तब्येत चांगली रह्या पायजेन , येक साठी बी आसरा की पूंजा करस . 
मान्यता : *  जवान पोटी नी त् येक दुय पोटु वाली बाई न कोन कारनकन् पानी म जीव देये , त वून की आत्मा येन रूप कन् रव्हस , असी मान्यता स .
* अवस - पुनव ला कोनी मानूस पानी म डुबकन् मरे , त वोला आसरा न वोढेस , असी अंधसरधा स . 
* सर्ग म रव्हनी वाली बाईलोग ला अप्सरा कोस . अथर्व वेद म येकी जानकारी भेटस . रुगवेद क बाद क कार म भूलोक आन् खास करकन् झाड बी आसरा क संचार की जागा मानीस . उंबर आन् परस पर इन को निवास रव्हस , असी मान्यता स .
* कयी जागा पर गाय , महिस बेन्या पर वोको तीन दिन को चीक आसरा ला अरपन करस , नी त् दूध आटस , असी मान्यता स .
* ज्यान तीन रस्ता / येकपावल्या मिरस वहान बी आसरा रव्हस , असी मान्यता स . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 


Tuesday, October 27, 2020

अजब गजब - २२ : नानो महादेव. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २२ : नानो महादेव
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मध्यप्रदेस क छिंदवाडा पासिन ५६ कि.मी. दूर तामिया जवर परसिध्द " नानो महादेव " स. तामिया वन रेस्ट हाऊस पासिन १ कि.मी. पायरीकन् खलतऽ उतऱ्या पर नानो महादेव ( छोटा महादेव ) को भुवन दिसस . येनऽ पहाडी मिन कल - कल आवाज करतो , बारोमास बह्यनी वालो झरनो मन ला मोह लेस . यहान येक सुरदास बाबा की पुरानी समाधी स , जहान येक दगुड फेकन को रिवाज स . अंधरा बाबाजी सिवमंदिर को पुजारी होतो . चोर चोट्टाना न दानपेटी क पयसा साठी बाबाजी ला मार डाये . यासिन बंदरकुदनी नाव की नानी पहाडी दिसस . 
यासिन आघऽ गया बास्त पाराबती माय को देऊर , झरनो आन् गुफा को दरस्यन होस . पाराबती माय को देऊर जर्जर भयेस . देऊर क पास्यानी दिवाल ला लागकन् भगवान भोलेनाथ को देऊर स . वहान क झरना को पानी बेरु क सहाराकन् सिधो सिवलिंग पर आवस आन् वासिन यी पानी पाताल लोक म जास . 
* नानऽ महादेव पासिन ५० कि.मी. प पातालकोट स . यहान रामायन काल म रावन को पोरग्यो मेघनाथ न भगवान भोलेनाथ की आराधना करी आन् पाताललोक ला गये , असी मान्यता स .
* सरावन मह्यनो भगवान भोलेनाथ ला लय प्यारो स . आन् येनऽ मह्यना म जी बी वून की आराधना करस , वून की सबन इच्छा पुरी होस . तेकन सरावन मह्यना म नानऽ महादेव ला दरस्यन , पूंजापाती साठी लाखों लोगना जास . सरावन मह्यना म नानऽ महादेव ला मेलो लागस आन् भंडारो बी रव्हस . 
* संगरात ला बी नानऽ महादेव ला लोगना दरस्यन साठी जास . तब बी भंडारो रव्हस .
* महासिवरातरी ला यहान पाच दिन को मेलो लागस आन् भंडारो बी रव्हस .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, October 26, 2020

अजब गजब - २१ : टिहरी गढवाल. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २१ : टिहरी गढवाल
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टिहरी गढवाल उत्तराखंड को येक पवितर पहाडी जिलो स . टिहरी गढवाल नाव टिहरी आन् गढवाल ला मिरायकन् भयेस . ' त्रिहरी ' को अपभ्रंस टिहरी ! या जागा मनसा , वचसा आन् करमना येनऽ तीन परकार पाप ला धोवस . गढ को मतलब , देस को गड . पानी म डुब्ये परमार राजपाट की या अजब गजब कहानी ! 

इतिहास आन् मान्यता : * बरमांड की रचना करन क पह्यले भगवान बरमा जी न यहानच तपस्या करीती , असी मान्यता स .
* मालवा को परमार राजकुमार कनक पाल मालवा परिन सिरी बदरीनाथ जी क दरस्यन साठी यहान आयेतो . तब चमोली क भानुपरताप राजा संग वून की वोरख , जानपह्यच्यान भयी . राजा भानुपरताप ला राजकुमार कनक पाल को स्वभावगुन लय आवडे . राजा भानुपरताप न आपली पोटी को बिह्या कनक पाल सिन कऱ्यो आन् इ. स. ९८८ म वहान को सारो राजपाट कनक पाल ला देयो . कनक पाल आन् वून क वंसज न आपलऽ राज ला अऊर बहाडाये . इ.स. ९८८ पासिन इ.स. १८०३ पावतर ९१५ बरस येनच वंस को राज रह्ये . 
* इ.स. १८०३ म महाराजा परदुम्न स्याह गादी पर होतो . तब गोरखा राजा को हमलो भयो . येनऽ लढाई म महाराजा परदुम्न स्याह ला वीरमरन आये . पर वून क भरोसा वाला लोगना न राजा को पोरग्यो सुदरस्यन स्याह ला कसो तरी बाचाडे . १२ बरस सुदरस्यन स्याह आपलऽ राज साठी तडपत रह्या . बाद म वून न ईस्ट इंडिया कंपनी ला मदत मांगी . कम्पनी न पूरब को गढवाल खुद राखकन् पछ्छिम को गढवाल राजा सुदरस्यन स्याह ला देये , जेला टिहरी रियासत क नावकन् वोरख पडी . 
* २८ दिसंबर १८१५ ला महाराजा सुदरस्यन स्याह न आपली राजधानी भागिरथी आन् भिलंगना नदी क संगम पर बनायी , जेको नाव टिहरी होतो . वून क पोटुना न ( परताप स्याह , किरती स्याह , नरेंदर स्याह ) परताप नगर , किरती नगर आन् नरेंदर नगर ला राजधानी बनायी . इन क वंसज न इ.स. १८१५ पासिन इ.स. १९४९ पावतर राज करे . 
* इ.स. १९४९ म महाराजा मानवेंदर स्याह न आपली रियासत भारत सरकार ला देई . 
भारत को सबसिन उच्ची टिहरी धरन क कारन टिहरी पानी म डुब गयी.... वोक संग च परमार राजपाट की परंपरा आन संस्कृति की नाव निस्यानी पानी म समायी....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .

Sunday, October 25, 2020

अजब गजब - २० : किराडू. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २० : किराडू

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राजस्थान क बाडमेर जिला म हाथमा गाव जवर परसिध्द अचंबो " किराडू " स . 
किराडू थार क रेगिस्तान म बाडमेर पासिन ३५ कि.मी. आन् जयसलमेर पासिन १५७ कि.मी. स . 
यहान भगवान महादेव का १०८ आन् भगवान बिस्नूदेव को १ देऊर होतो , असी मान्यता स . आबऽ ठीकठाक हाल म ४ देऊरना भगवान महादेव आन् १ देऊर भगवान बिस्नूदेव को बाचेस .

१. इतिहास आन् मान्यता :  * किराडू पह्यले ' किराड कोट ' नाव कन् परसिध्द होतो . येला किराड राजपूत वंस न बसाडेतो . ६ व सदी पासिन ८ व सदी पावतर किराडू खूब आस्कारेतो . वोन बेरा पर मुलुख क लुटेरा - डाकूना ला किराडू को भायीच हिरस वाटत होतो . 
* किराड राजपूत गुजरात क चालुक्य राजा का सामंत होता . 
* ११ वी , १२ वी सदी म किराडू पर परमार राज होतो . परमार राजा सोमेश्वर जी न किराडू क चवतरफा उन्नती साठी खूब मेहनत करी आन् किराडू क वयभव ला इतिहास म समेटे . 
* इतिहासकार लोगना को कह्यनो स क , १३ वी - १४ वी सदी म तुरक डकाइतना न किराडू ला लुटे आन् खूब मारकाट करी . पर यहान का लोगना दुसरीच गोस्ट सांगस . 
* १२ वी सदी म येक साधू आपलऽ चेला चपाटा संग किराडू आया . लोगना न वून को मानपान करे . कयी दिन क बास्त साधू येकलो च घुमन ला गयो . वून का चेला वहान च थांब्या . थोडऽ दिन बाद किराडू म महामारी फयली . आपलच गुताडा म फस्या लोग साधू क चेलाना की देखभाल नी कर सक्या . येक मथारी कुम्भारीन न मातर जेतरी होयेन वोतरी देखभाल करी . तब च साधू बी वहान पुग्यो . किराडू की भयंकर हालत देखकन् साधू बी अचंबा म च पडे . चेलाना की दूरदस्या देखकन् साधू ला खूब राग आये . वोन रागतम म च साधू न सराप दे क , ' येन महामारी म किराडू क लोगना न वून क चेलाना की देखभाल नी करी , तेकन किराडू का सबन लोगना दगड बनेन .' मथारऽ कुम्भारीन ला साधू बाबा न कह्ये क् दिन बुडन क पह्यले तुमी किराडू सोड देव , नी त् तुमारो बी दगड बनेन . आन् अजून सांगे क जान क बेरा पासऽ देखन को नहाय , नी त पस्तावनो पडेन . भेबारी कुम्भारीन आपलऽ घर गयी आन् सामान सुमान बांधकन् निकरी . रस्ता म वोला साधू क सराप पर स्यक आये आन् पासऽ देखे . बस तुरुत च वा दगड बनी . किराडू जवर क सिंगनी गाव म वोकी दगड की मूरती स . 
तब पासिन येनऽ सराप को भेव लोगना म स . कोनी बी दिनबुड्या बाद किराडू म थांबत नी . 
* यहान इ.स. ११६१ को येक सिलालेख स जेमऽ परमार सिंधुराज पासिन सोमेश्वर राजा पावतर की वंसावरी लिखी स. इतिहासकार लोगना को कह्यनो स क , इ देऊरना ११ व सदी म परमार राजो दुलस्यालराज आन् वोकऽ वंसजना न बनायास . सबन देऊरना म सोमेश्वर को देऊर सबसिन मोठो स . 

किराडू की सराप की कथा हिम्मत वाला खोजी लोगना ला आपरंग च आपलऽ कितऽ वोढस . 
किराडू देऊरना की वास्तुकला अजब गजब च स . या कलाकारी मानुसना की नी होयकन् देवना की च होयेन , असो च कोनी ला बी वाटस . अदभूत कारागीरी की मूरतीना , नक्कासी वाला खम्बा , मंडप , गाभारो देखनी वाला ला अचंबा म च डावस . 
सराप कन् नी त् कोनी बी कारन कन् ९०० बरस पासिन रिठ्यो भयो किराडू अजब गजब च स ! 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Thursday, October 22, 2020

भोयरी संस्कृति - ३६ : मैंदी को गानो. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३६ : मैंदी गानो
 Bhoyar culture._भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect._ भोयरी बोली

सरावन मह्यना म गावन क येनऽ गाना ला सरावन का गाना ( सावन गीत ) कोस . मैंदी ( मेहंदी ) लगावन क बेरा भोयर बाईलोगना इ गानो गावस . येनऽ गाना ला मैंदी को गानो बी कोस . येमऽ मैंदी क पयदा भया पासिन त वोकऽ तोडनो , बिननो , बाटनो , लगावनो आन् रंगनो पावतर को वरनन स . भाऊज आन् देर मैदी लगावस . देर आपलो हात माय ला दिखाडस . भाऊज की मैदी देखनी वाला कोनीच नी होता . तब वा सिमनी ( चिमनी ) क हात कन् आपलऽ माय बाप , भाई , बहिन , भाऊज क नाव कन् येक येक करकन् इतल्लो धाडस . 

कहान सिन मैंदी उपजी बीरा सावन रे
कहान रे धऱ्यो अवतार गुलाबी रंग सावन रे
सर्ग सिन मैंदी उपजी बीरा सावन रे
धरती लेयो अवतार गुलाबी रंग सावन रे
नानो सो दिवडा लाडिलो बीरा सावन रे
मैंदी ला राखन जाय गुलाबी रंग सावन रे
लावो न भाऊज कोरी टोपली बीरा सावन रे
तोड्ये वो मैंदी का पान गुलाबी रंग सावन रे
तोडी खुडी डाल्ला भरी बीरा सावन रे
ले चल्या बयतूल बजार गुलाबी रंग सावन रे
ले दे वो सासू माय मैंदी बीरा सावन रे
मैंदी का मोठा मोठा पान गुलाबी रंग सावन रे
का वो टका तोरी बोह्यनी बीरा सावन रे
का वो सेर बेचाय गुलाबी रंग सावन रे
रुपया टका मोरी बोह्यनी बीरा सावन रे
दुय रुपया वो सेर बिकाय गुलाबी रंग सावन रे
कहान सिन लाऊ सील बट्टो बीरा सावन रे
कहान सिन लाऊ दोउ नीर गुलाबी रंग सावन रे
जमना सिन लाऊ सील बट्टा बीरा सावन रे
जमना सिन लाऊ दोउ नीर गुलाबी रंग सावन रे
घसमस मैंदी बाटती बीरा सावन रे
नथनी रे झोका खाय गुलाबी रंग सावन रे
घसमस मैंदी बाटती बीरा सावन रे
बाजूबंद झोका खाय गुलाबी रंग सावन रे
बाटी बटाई बटका भरी बीरा सावन रे
धर दी कोठी क मंझार गुलाबी रंग सावन रे
देर लगावय चिलिआंगठी बीरा सावन रे
भाऊज रचय दुय हात गुलाबी रंग सावन रे
कोठी प दिवल्या लेसंती बीरा सावन रे
परखय दुय दुय हात गुलाबी रंग सावन रे
भाऊज की रची कारी कोयल बीरा सावन रे
देवर की लाल गुलाल गुलाबी रंग सावन रे
देर सांगे वोकऽ माय ला बीरा सावन रे
भाऊज कोन ला सांगेन गुलाबी रंग सावन रे
सर्ग उडती चिडौली बीरा सावन रे
येक संदेस लेइ जाय गुलाबी रंग सावन रे
बाप मऱ्यो वोकी याद मुडी बीरा सावन रे
टूट्यो रे चौरी को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
सर्ग उडती चिडौली बीरा सावन रे
दुय संदेस लेइ जाय गुलाबी रंग सावन रे
माय मरी वोकी याद मुडी बीरा सावन रे
टुट्यो रे रैट्ट्या को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
सर्ग उडती चिडौली बीरा सावन रे
तीन संदेस लेइ जाय गुलाबी रंग सावन रे
भाई मऱ्यो वोकी याद मुडी बीरा सावन रे
टूट्यो रे भैसी को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
सर्ग उडती चिडौली बीरा सावन रे
चार संदेस लेइ जाय गुलाबी रंग सावन रे
भाऊज मरी वोकी याद मुडी बीरा सावन रे
टूट्यो रे डेहरी को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
सर्ग उडती चिडौली बीरा सावन रे
पाच संदेस लेइ जाय गुलाबी रंग सावन रे
भाई मऱ्यो वोकी याद मुडी बीरा सावन रे
टूट्यो रे चेंडू को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
सर्ग उडती चिडौली बीरा सावन रे
साहा संदेस लेइ जाय गुलाबी रंग सावन रे
बहिन मरी वोकी याद मुडी बीरा सावन रे
टूट्यो रे फुतरी को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
सर्ग उडती चिडौली बीरा सावन रे
सात संदेस लेइ जाय गुलाबी रंग सावन रे
रनिया मरी वोकी याद मुडी बीरा सावन रे
बेटा रे दानो दान गुलाबी रंग सावन रे
___ निरन्तर.............

स्त्रोत : सतपुडा की संस्कृति - २००१ , सम्पादक : वल्लभ डोंगरे , भोपाल
प्रस्तुति : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Wednesday, October 21, 2020

भोयरी संस्कृति - ३५ : जलम विधी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३५ : जलम विधी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

* नहानी : बारतपन भया बास्त नार ला सूत बांधकन् वरतऽ को भाग दातरा कन् ( इरा कन् ) कापस . घर म च नानोसो गड्डो करकन् जार आन् नार को भाग गाडस . वहानच नहानी साठी मोठो गड्डो खंदस . वोपर पाटीना धरकन् बारातीन की नहान की येवस्था करस . गाव म सुईन मनजे मांगीन . या बारतपन पासिन पूंजा पावतर सबनच काम करत होती . 
नहानी की पूंजा करस . दिवो , उदबत्ती , हरद कुकू लगावस . चार कोनटा पर सनकाडीना धरस . बारातीन आन् बाल्या / बाली ला घोंगडाकन् झाकस . बाज क भवताल केसारी की चराडी गुंडारस . बाल्या / बाली ला हिंग लगावस . दरुजा म भाकर पानी धरस . बारातीन बाई आन् बाल्या / बाली ला कारो धागो बांधस . तेल लगावनो , न्हायकन् देनो , धूप देनो असा खूब काम सुईन कितऽ रव्हत होता . वोला रोज वटी देन लागत होती . 
चार- पाच दिन म नार पड्या पर पुरो घर को हिवसो ( सितोडो ) लेस . नहानी बुजवस . वोमच नार गाडस . काडीना , फडो फेक देस . वठ्ठीन कपडा धोन ला लिजास . हिवसो ल्यापर घर ला हरद कुकू का पाच पाच बोटना लगावस . 

* पाचवी , सटवी : पाचवऽ दिन सोना / चांदी की पाचवी घडायकन् ल्यावस . वोकी पूंजा करस .वोला कारऽ धागा म ओयकन् बाल्या / बाली क गरा म घालस . पाचवी मनजे जलमदा नामक देवता . ( जिवती ) 
पाचवी क दिन च नी त् साव्व दिन सटवाई माय की पूंजा करस . वा कोनतऽ बी रूप मऽ आयकन् बाल्या / बाली को भाग लिखस , असी मान्यता स . घर की बुजरूक बाईलोग या पूंजा करस . सिल ( पाटा ) पर पाचवी , सटवी की पूंजा मांडस . 
' सटवी को लेखो जोखो , देवना ला बी नी चुक्यो !' 
+ आब दवाखाना म च बारतपन होस . तेकन नहानी पूंजा बाद भयी . साधऽ बारतपन ला पाचव ऽ साव्वऽ दिन सुट्टी भेटस . आपरेसन वालो बारतपन रह्ये त दवाखाना म जास्त दिन ठह्यरनो लागस . तेकन पाचवी , सटवी की पूंजा १० व दिन पावतर करता आवस . 
* बारावो दिन : बाराव दिन तान्ह ऽ पोटू ला कपडा पेहरवता आवस , नाव ठेवता आवस आन पारना म डावता आवस . कोनी कारनकन् दिन आघऽ पासऽ भया त बी वोला बारसो च कोस .
* बारसो :  बारसो मनजे नाव ठेवन को दिन . सवा मह्यना न बारसा को कार्यक्रम करस . नाव ठेवन साठी सवासिन बाईलोग , नातगोत आवस . सोनताग क दोर को पारनो बांधस . लंगोटी की चुंबर बारातीन बाई क डोकसा पर धरकन् वोपर गरम पानी को गडू आन् खांदा पर जेकन नार कापी वू दातरो धरकन् बुझायी वोनऽ नहानी जवर जास . गडू आन् दातरो वोपर धरस . दिवो , उदबत्ती लगावस . हरद कुकू , अकसिद कन् पूंजा करस . 
पारना ला हरद कुकू का पाच बोटना लगावस . बट्टा ( उरुटो ) ला लंगोटी को कपडो गुंडारस . वोला काजर , हरद कुकू लगावस . मंग वोला खेलवस . वोला येक बाई पारना क खलतीन लेस आन् दुसरऽ बाई ला वरतीन देस . बाईलोगना को गानो चालू होस , 
' राम ले बाई सीता लेइऽ 
लक्षुमन ले बाई भरत लेऽ ..' 

' राम ले बाई किस्न लेऽ
बलराम ले बाई स्यतरुघन ले ऽ..' 
वोला खेलायकन् पारना म डावस आन् झोका देस . 
तान्ह पोटु ला आन् वोकऽ माय ला नवीन कपडा पेहरवस . काजर लगावस आन् तान्हा ला पारना म डावस . पारना खलतऽ तोर / सोला की घुगरी आन् दकसिना धरस . आतो / मावसी तान्ह पोटू क कान म नाव सांगस . पाच नावना धरस . 
पारना ला झोको देस आन् पारनो कोस ....

पह्यलऽ दिन आनंद सारो
वासुदेव त नित च खरो
कान्हा ला लिजास गवरी घरऽ 
माय यसोदा को सजे दिवरो
जो बाळा जो रे जो ऽ 

दुसरऽ दिन दुसरो परकार
कंस मामा को दुस्ट बिचार
आठवऽ पोरग्या को काटून सिर
देवकी ला कस्ट भयंकर
जो बाळा जो रे जो ऽ....

तीसरऽ दिन कंस आये देखन ला
बालक कहान स पुसे देवकी ला
देवकी कह्ये पोटी च भयी
का सांगू भाऊ गा तोला
जो बाळा जो रे जो ऽ....

चवथऽ दिन पोटी ला धरकन्
दुय पाय उलटी फिरायकन्
पोटी बिजली अगास गयी
दुस्ट कंस की मवूत आयी
जो बाळा जो रे जो ऽ....

पाचवऽ दिन न्यारो च ठाठ
गवरनना जमी पन्नास साठ
पाचवी पूंजी पाचवी बांधी
नहानी पूंजा की धरीस बाट
जो बाळा जो रे जो ऽ....

साहाव्व दिन साहाव्वी करी
तान्ह किस्न की चुट्टी करी
राधा क मन म फुटी उकरी
जो बाळा जो रे जो ऽ...

सातवऽ दिन आयी गवरन
तानुला ला लेस सारी मिरकन्
बुडबुड गंगा नाहू घालकन्
साजरो दिसस काजर लगायकन्
जो बाळा जो रे जो ऽ.....

आठवऽ दिन भजन को रंग
हात म लेस टार मुरदंग
साधुसंत गावस अभंग
गोप गोपिका बालक संग
जो बाळा जो रे जो ऽ.....

नववऽ दिन नवल बाळ की
करी खुलस जसी कमळ की
जो बाळा जो रे जो ऽ....

दसवऽ दिन बोली माय उमा
तानुला क रूप की नहाय सीमा
असा बोल्यास महादेव भीमा
जो बाळा जो रे जो ऽ...

अकरावऽ दिन तान्हा की हालचाल
रूप साजरो फुग्यास गाल
खेल खेलस बाल गोपाल
जो बाळा जो रे जो ऽ....

बारावऽ दिन सज्यो घरदार
हरद कुकू कन् सोभे कपार
देवकी को तान्हो यसोदा घर
जो बाळा जो रे जो ऽ.....

स्त्रोत : सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख
प्रस्तुति : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, October 20, 2020

अजब गजब - १९ : धानी नगलाई. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - १९ : धानी नगलाई

Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

उत्तर परदेस क हरदोई जिला म स्याहाबाद तहसील म २३७ दाठ्ठा को  " धानी नगला " नाव को गाव स .
* " धानी नगला " गाव ला धानी नगलाई , धानी नगलाई धारनगर , धानी नगलाई गढी असो बी नाव स . 
* धानी नगलाई स्याहाबाद ( तहसील ) पासिन २६ कि.मी. आन् हरदोई ( जिला ) पासिन ६० कि.मी. दूर स . 

१. इतिहास आन् मान्यता :  * संवत् १३०५ म धारानगरी परिन आयकन् सिवपाल स्याह परमार राजा न उत्तरपरदेस क हरदोई , स्याहजहापूर , सीतापूर , लखनऊ क येनऽ भाग पर कब्जो कऱ्यो . वून न आपली जलमभूमी धारानगरी क आधार पर ' धारनगर ' बसाडे , गढी बनायी जेला आब " धानी नगलाई " कोस , असी मान्यता स . वून क संग हत्ती , घोडा सवार सेना , राय , भाट असा सबन होता , जी आज बी स . अलवर ( राजस्थान ) परिन वंसावली लेखक राय राव हरदोई ला आवस . आब वून क पोथी म परमार का यहान का २०० गाव दर्ज स , जिन को गोत्र वसिस्ठ स . 
* येक डाव उज्जैन को राजो सिवपाल सहाय परमार सिकार साठी यहान आया . वोन बेरा यहान जंगल होतो . वून न दगड माती को येक वट्टो आन् सिवलिंग देख्यो . वून न भक्तिभाव कन् पूंजापाती करी आन् वहान धानी नगला गाव बसाडे , असी बी मान्यता सऽ .
वोन सिवलिंग ला ' सिध्देश्वर नाथ ' कोस . हरु हरु सिध्देश्वर नाथ लोगना म परसिध्द भये आन् लोगना बी पूंजा पाती करन साठी आवन ला लाग्या . 

* कयी बरस पह्यले अलाहगंज का पंडित जगत परसाद बेमार पड्या . पंडित न सिध्देश्वर नाथ ला नवस बोले क , मु ठीक होय जावून त यहान मोठ्ठो देऊर बनाऊन . पंडित जगत परसाद ठीक भया . नवस क अनुसार वून क पोरग्यानऽ देऊर बनावन को काम सुरू करे .
देऊर बनावन क बेरा लोगना न सिवलिंग क जवर ९१० हाथ पावतर खोद्यो . वहान वून ला २२ गिराम का दुय सिक्का सापड्या . वोम को येक जानकारी काहाडन साठी दिल्ली ला पठाये . वासिन जवाब आये क येनऽ सिक्का पर धुरपदा ( द्रौपदी ) को नाव स . 
* धानी नगलाई गाव क जवर हाडहा गाव म हिडिंब राकस रव्हत होतो . बनवास क बेरा भीम न वोला मारे आन् वकी बहिन हिडिम्बा संग बिह्या करे , असी मान्यता स . 
२. उत्सव :  सिरी सिध्देश्वर नाथ देऊर सरावन मह्यना म भागवत कथा रव्हस आन् मोठो मेलो भरस , जेमऽ लाखो लोगना आवस . 
मह्यना भर भंडारो बी चालस . यहान क हनुमान मंदिर म सनवार आन् मंगरवार ला भगतना की भीड रव्हस . 

# यहान रामताल , हनुमान मंदिर स . धुरपदा ( द्रौपदी ) की रसोई स , ज्यान मोठा ५ झाड स . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, October 19, 2020

अजब गजब - १८ : सोमेश्वर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - १८ : सोमेश्वर
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महाराष्ट्र क चांदा जिला म राजुरा इ तहसील को ठिकान स . तेलंगु भास्या म ऊरा को मतलब स ' गाव ' . राज ऊरा को मतलब , राजा को गाव ! वरधा ( वसिस्ठा )  नदी क कोरा म राजुरा , आपलऽ वंस क महान इतिहास को हिस्सो स . आमारऽ वंस ला सिपरा , नरबदा , आदिगंगा ताप्ती , पूरना , वरदायिनी वरधा न पाले - पोसे . 
चहांद ( गडचांदुर ) राजुरा का मुख्य स्थान होतो . यहान मौर्य , सातवाहन , वाकाटक , चालुक्य , रास्ट्रकुट को राज रह्ये . ११ वी सदी म यहान आमारऽ वंस को राज होतो . चांदा परिन ४० कि.मी. आन् राजुरा परिन ९ कि.मी. प " सिध्देश्वर " नाव को १५० उंबरा को नानोसो गाव स . सिध्देश्वर गाव विरुळ पुलीस थाना क हद म आवस . सिध्देश्वर साठी जवर को रेलवे ठेसन बी विरुळ च स . 
सिध्देश्वर म ११ वी सदी क परमार राजाना न १२ सिवमंदिर बनायास , जिन ला परकोटो बी बांधेस . बगल म च साजरो तलाव बी स .
गडचांदुर क मानिकगढ किल्ला मिन वहान को राज चलत होतो . 
सिध्देश्वर क मुख्य देऊर म सोमेश्वर महादेव स . इ देऊर बी बाकी देऊरना सिन मोठो स . विदर्भ म जुना देऊरना हेमाडपंथी रचना च जास्त स . पर सोमेश्वर देऊर की रचना अनोखी स . सभामंडप म नंदी देव मूरती स . सभामंडप क येकेक खंबा पर असी कलाकारी , नक्कासी स क देखनी वाला ला अचंबो च वाटस . आन् सभामंडप की रचना असी क जी विदर्भ म दुसरऽ देऊर ला नी दिसत ! सभामंडप पर आयताकार छतरी येनच देऊर म दिसस . आयताकार छतरी राजपूत वास्तुकला की खासियत स . सभामंडप क आघऽ अंतराल ला सिखर , आमलक आन् करसो स . गाभारो खोल स . गाभारा को सिखर , आमलक अंतराल क सिखर सिन मोठो स . ३ फिट क घेरा की पिंड स. सिवलिंग नानोसो च स . राजपूत आन् हेमाडपंथी देऊर रचना क अनोखऽ संगम को सोमेश्वर देवस्थान अजब गजब च स . सोमेश्वर देऊर क अगल बगल म बाकी देऊरना आन् येक धरमस्यारा सरखी वास्तु स . देऊर क बाहिर की दिवाल आन् सिखर प देव देवता , यक्स्य - यक्स्यीनी , रिसी - मुनी क मूरती संगच युगल मूरतीना बी स . 
आमारऽ पुरवजना न जी गढ - किल्ला , देऊर , तलाव , घाट बांध्यास ... मूरतीना घडायी.. या आपली धरोहर स . या धरोहर आपली येतरी साजरी वयभवस्याली परंपरा की जबाबदारी निभावन की ताकद आन् सद् चरित्र - उच्च चरित्र निरमान की प्रेरना बी आपन ला देस .... 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Sunday, October 18, 2020

जीव सिव सिल बट्टो. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

जीव सिव सिल - बट्टो 
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जोडी दिखाडे तंतर
जीव सिव सिल - बट्टो
थोडो सिखाये मंतर
लागे नाव ला नी बट्टो ।१।

तेज जीब की मिरची
धरे अभिमान खोटो
दान दमडी नी खर्ची
पुन्य म घाडोच टोटो ।२।

भाग्या असत् क पासऽ
फोड्या टोंगरा न घोटो
भारे डोरा ला अगास
बोट ला ठेसे गा गोटो ।३।

मतलब को मसालो
बाटे गा पाटो उरुटो
असो थेथरेस कालो
पाजे काढा वालो ढोटो ।४।

सोडो गरव गुमान
नको करू खोटो नाटो
देवो गनगोत मान
माया ममता ला बाटो ।५।

परउपकार कांदो
सत् करम सिल- बट्टो
भाव लसन ला चेंदो
खुसी म नी आय घाटो ।६।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, October 17, 2020

अजब गजब - १७ : भोंडा सिवमंदिर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - १७ : भोंडा सिवमंदिर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

विदर्भ परमार को सुबो ( प्रांत ) होतो . ११ वी सदी म बी यहान आमारऽ वंस को राज होतो . आमारो वंस क्षत्रिय होन क कारन पुरानऽ राजयेवस्था को आमी हिस्सो होतो . वोन बेरा मह्यना की नगद तनखा नी भेटत होती . लायकी अऊर पराक्रम क हिसाबकन् जागीर भेटत होती . आधुनिकता आन् उद्योग धंदा क उन्नती क होड आघऽ बढतो विदर्भ पुरानऽ आन् इतिहास क नजर कन् कयी मायना म बेगरो स . इतिहास का अवसेस जागा जागा पर बगऱ्या पड्या स . 
नागपूर पासिन ८० कि.मी. दूर वरोरा स . वरोरा पासिन १६ कि.मी. दूर ' भटाला ' इ गाव स . येनऽ गाव को ५ कि.मी. को भाग इतिहास को पानो नी त् पूरी किताब च स ! भटाला गाव क अगल बगल गुफा , देऊरना की भरमार स . इन ला देखकन् पुरानऽ जमाना क वैभव को अंदाजो आवस . गाव पासिन २ कि.मी. प १८ गुफा स . इन को काल इ.स. ४०० सांगस . पहाड क मंझार तलाव क काठ कन् दुय बाजू या गुफाना मानुस की बनायी स . ९ गुफा साजरी हालत म स . इन गुफा म सिवलिंग स . वोन बेरा धनवान लोगना परीजन क पिंडदान क बाद असी गुफा बनावत होता . मह्यस्यासुर मरदिनी आन् नरसिंव्ह की मूरतीना टुटी फुटीस . गाव म जाता यी गनेस , हनुमान , सिवलिंग , वीरगल की मूरतीना जागा जागा पर पडी दिसस . गाव क बाहर भवानी मंदिर जवर क पहाडी पर देऊर का दगड घडावन को कारखानो सातवाहन , राष्ट्रकूट , चालुक्य , गोंड , परमार आन् भोंसला काल म होतो . वहान मंदिर का भाग , मूरतीना बगरी पडी स . 
भटाला गाव ला लागकन् पहाडी प मोठ्ठो सिवमंदिर स , जेला " भोंडा सिवमंदिर " कोस . येनऽ देऊर ला गुंबद आन् करसो नहाय . भोजपूर सिवमंदिर सरखोच येको बांधकाम स . इ देऊर परमार काल को होय . सिवलिंग ५ फिट उचो आन् पिंड को घेरो २० फिट स . जलहरी ८२ इंच की स . इ देऊर दुय मजला को स पर वरतऽ जान साठी पायरीना नहाय . भोंडा सिवमंदिर की लंबाई ५० फिट , चवडाई ३५ फिट आन् उचाई ४५ फिट स . देऊर क दरुजा क खंबा पर नक्कासी स . देऊर क तीन दिवाल पर बाह्यरिन सिव , पाराबती , कारतिकेय आन् भयरव की खूब साजरी मूरतीना स . 

आमारऽ संस्कृति की धरोहर असी देस क कोना कोना म बगरी पडीस . वोको दरस्यन आन् जतन को काम सबन भोजवंसी की जिम्मेदारी स . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Friday, October 16, 2020

भोयरी संस्कृति - ३४ : उन्ना - पूर्रा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३४ : उन्ना - पूर्रा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पुरानऽ जमाना पासिन भोयर समाज का तिज तिवार , ब्याह इ कोनऽ उत्सव सिन कम नी रव्हत होता . वोम बी ब्याह को उत्सव त १५ - १५ दिन चलत होतो . आब भागदवड क वातावरन म इ तीन दिन प आयो . तेकन कयी परंपरा , दस्तुर आब देखन ला नी भेटत . गाव खेडा म तरी बी कयी दस्तुर , परंपरा , रसम देखन ला भेटस . गाव न रसम , दस्तुर , परंपरा आन् बोली ला बाचाडकन् धरेस . 
स्यादी बिह्या की येक येक रसम , परंपरा म कोनतो न् कोनतो सबक रवस . काल क फेरा संग सबन ला च बदलनो पडस . पर बिह्या सरखी मंगल संस्था ला मजबूती देती ,  लाडा - लाडी क जलम जलम क अटूट बंधन ला बांधती आन् जिंदगानी जगन साठी सबक देती इ रसम , दस्तुर , परंपरा भोयरी संस्कृति की धरोहर - पह्यचान स ! 
लाडी क घर बिह्या की विधी होस . येक दुसरा ला हार घालकन् लाडा - लाडी येक दुसरा का होय जास . हार पह्यनायकन् येक दुसरा ला हार जास..... या हार वून क साठी उपहार बन जास . सात फेरा लेयकन् जिंदगी भर नी हारन को , असो संकल्प लेस . 

बिह्या भया बास्त लाडी लाडा क घर आवस... आब वूच वोको घर रव्हस ! यहान लाडा - लाडी क मंझार येक होड धरस  , जेला " उन्ना - पूर्रा " ( विस्यम - सम ) कोस .  बिह्या क बाद लाडो जब पह्यली बेरा लाडी ला आपलऽ घर ल्यावस तब इ ' उन्ना - पूर्रा ' 
को खेल होस . येन खेल कन् लाडा - लाडी ला हार जीत मज्या देखन ला भेटस . जिंदगी म चढ उतार , सुख दुख आत जात रव्हस .... येनऽ जिंदगी की सच्चाई को पह्यलो सबक उन्ना - पूर्रा खेलकन् लाडा - लाडी ला सिखन ला भेटस . 
उन्ना - पूर्रा क खेल म चिचोरा ( चिच का बीज ) ला बापरस . १,३,५,७,९..... ( विस्यम संख्या ) ला उन्ना आन् २,४,६,८ ...( सम संख्या ) ला पूर्रा कोस . लाडा - लाडी आपापलऽ मूठ म चिचोरा लुकायकन् धरस . आब दुसरा क मूठ म चिचोरा उन्ना स क पूर्रा , इ अंदाजा कन् वोरखनो लागस . लाडा - लाडी येक दुसरा ला पुसस , उन्ना क पूर्रा ? जी बराबर सांगस ती जीतस . आन् हारनी वाला क मूठ म का चिचोरा वोका होस . कब कब मुठ्ठी खाली धरकन् बी उन्ना - पूर्रा पुसस . गलत जवाब दे त आपलऽ जवर का ५ चिचोरा देनो लागस . येन खेल को पुरो परिवार मजा लेस . 
उसी त लाडी लाजत लाजत खेलस . लाडो दिलखुलास खेलस . अगर लाडी हारत होयेन त् लाडो खुदच हारन ला लागस . लाडी ला कोनी न चिडाये नी पाह्यजे , तेकऽ साठी लाडो खुद होयकन् हारस . इ खेल लाडा - लाडी क मन ला जोडन को काम करस . आपलऽ मानुस साठी हार कन् बी जीतनो , या बात इ खेल सिखावस . हारनो आपलऽ जिंदगी को हिस्सो स , वोला स्विकार कऱ्या पायजे , यी सबक उन्ना - पूर्रा खेल मिन भेटस . 
हासी - खुसी क माहोल म , पुरऽ परिवार क संग उन्नो - पूर्रा खेल खेलकन् मन ला मन जुडस आन् नवाडोपन बी दूर होस ... 
हजारों बरस पासिन चली आय रहीस उन्ना - पूर्रा जसो लाडा - लाडी को खेल  , भोयरी संस्कृति की पह्यचान स ...

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

अजब गजब - १६ : समिध्देश्वर मंदिर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - १६ : समिध्देश्वर मंदिर 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति 

करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसार पारं नतोऽहं ।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गंभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ।।

Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली 

राजा भोज मध्ययुगीन काल क मध्य भारत का सबसिन महान राजो होतो . ' मालवा चक्रवर्तिन ' राजा भोज वीर , मोठो पराक्रमी आन् वेद स्यास्तर ग्यानी होतो . राजा भोज देव को राज जमुना पासिन गोदावरी पावतर होतो . जेमऽ मालवा , राजस्थान को इलाखो , मध्यभारत , बस्तर , कोकन , खानदेस , विदर्भ , गुजरात को इलाखो होतो . राजा भोज न चंपूरामायन , युक्तिकल्पतरु , समरांगन सूत्रधार , सरस्वती कंठाभरन , शृंगार प्रकाश , शृंगार मंजरीकथा असी ८४ पोथीना लिखीस . 
राजा भोज न भोजशाला , राज मारतंड किल्लो , गढकालिका देऊर , भोजपूर सिव मंदिर , भोजताल असा कयी का बांधकाम कऱ्या आन् केदारेश्वर , सोमनाथ , सुंडीर , काल , अनल न रुद्र असा कयी देऊरना को पुनर निरमान कऱ्यो . माय वाग्देवी की मूरती घडायी आन् कयिक गढ किल्ला बांध्या . आन् इ सबन ला च मालूम स . येक मंदिर असो स , जेकी जानकारी लय कम लोगना ला स , वू मनजे चितोडगढ को " समिध्देश्वर " मंदिर ! 
दकसिन राजस्थान क चितोडगढ क बारा म येक कहावत मसहूर स , ' गढ म गढ चितोडगढ औ सब गड्डयां ' अरावली परबत माला को इ इलाखो . चितोडगढ बनवायो चित्रांगद मौर्य राजा न . वोकऽ नाव परिन येनऽ जागा को नाव पड्ये ' चित्रकूट ' ! चित्रकूट को अपभ्रंस भये ' चितोड ' . 
इ.स. ५६६ म राजा गुहील न मौर्य राजा ला हाराये आन् चितोडगढ प गुहीलवंसीय राज की स्थापना करी . भोयर समाज का काही कुर येनऽ वंस का स . महाराणा प्रताप आन् छत्रपती सिवाजी महाराज येनच वंस म भया ‌. 
राजा भोज क काल म चितोडगढ ला राजा सुची वरमा , राजा तार वरमा , राजा किरती वरमा भया . राजा भोज आन् गुहील वंस नातागोता म होता . 
चितोडगढ प चेंग्या पर पह्यलऽ पाडल पोल ( द्वार ) लागस . वोक बास्त भयरवल पोल , हनुमान पोल , गनेस पोल , जोडवा पोल क बाद मुख्य दरुजो राम पोल  आवस . वरतऽ गया बाद अगास म जातो १२२ फिट उचो ' विजयस्तंभ ' दिसस ! जवरच जेवनऽ हाथ प सिरी किस्न की भगत मीरा को मोठो साजरो देऊर दिसस . विजयस्तंभ क पासऽ महसती स्थल स . वासिन डाखऽ हाथ पर सफेतझक संगमरमर को येक अचंबो करनो लाइक नगिनो आपलो ध्यान खिंचस . आन् याच अदभूत कलाकृती होय ' समिध्देश्वर ' मंदिर की ! समिध्देश्वर देऊर की जागा बी खासच स . विजयस्तंभ आन् गायमुख कुंड क मंझार कौस्तुभ मनी सरखो झलारतो इ देऊर वास्तुकला आन् मूरती कला को बेजोड नमुनो राजा भोज देव की निरमिती स . इंग्रजी 
' T ' क आकार को सभामंडप आन् विमान की रचना , नानऽ नानऽ कयी नक्कासीदार सिखर कन् बनेस महासिखर . इंच इंच जागा पर कलात्मक नक्कासी , अलौकिक कमान ... देखता देखता समय थांबस.... स्यबदना गोठस.. मति की गति बी थांबस ! खुद चितोडगढ मेरु परबत समान ... विजयस्तंभ राजदंड समान आन् समिध्देश्वर देऊर मेरु परबत क मुकुट मनी सरखो दिसस . 
पुनव क चांदना सरखो दूधीयो संगमरमर , कल्पना ला बी भूल पडेन असी कलात्मक नक्कासी , देऊर साठी निवडी ती जागा .... राजा भोज देव क ग्यान , वास्तुकला की साजरी परख आन् अनोखी सिवभक्ती देख कन् महाकवि पंडित छितरप की वरना आपरंगच याद आवस .
अद्य धारा , सदा धारा सदा लम्बा सरस्वती ।
पंडिता: मंडिता: सर्वे भोजराजे भुवंगते ।।
देऊर म पाय धऱ्या बराबर वूई थांब जास . बाहिर क भाग ला तोड असी अंदर बी सजावट . देऊर का सुघड सिखर , करस सूर्व्यदेव क किरन संग खेलस त अंदर सितल संधिपरकास म मंगल योगमुद्रा को गाभारो ! गाभारा म सिवलिंग आन् वोक पासऽ क दिवाल प खूब मोठी सिवजी की त्रिमूर्ती ! या त्रिमूर्ती सत् , रज , तम गुन की प्रतिक . 
समिध्देश्वर मंदिर ला ' त्रिभुवन नारायण ' आन् ' भोज जगती ' बी कोस .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Thursday, October 15, 2020

अजब गजब - १४ : देसमुख कुरकथा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - १४ : देसमुख ( देशमुख ) कुर कथा

Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

* आडनाव की परथा ११ वी सदी पासिन चालू भयी आन् पेसवा क राज म बाहाडी , असी मान्यता स .
* देसमुख ( देशमुख ) इ उपनाम  ( कुर ) महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश , तेलंगणा , कर्नाटक , छत्तिसगढ आदि राज्य म दिसस . 
* देसमुख आन् देसमुखी इ वतन हजारों बरस पासिन परंपरागत राज येवस्था को येक अव्वल दरजा को अधिकार आन् जबाबदारी को पद होतो . देसमुख इ वून क  ' महाल ' ( जिला ) ,  ' परगना ' ( प्रांत ) नाव क महसूल ( revenue ) विभाग क मुखिया क रूप म कामकाज देखत होता . 
* देसमुख घराना क मोठऽ पोरग्याला च देसमुखी भेटत होती . देसमुख / देसमुखी वंसानुगत येवस्था होती . येकच खानदान म देसमुखी चलत होती . 
* लढाई क बेरा देसमुख न अमुक येतरी फऊज / सिपाई , घोडा राजा क सेवा म मदत साठी पठाया पाह्यजे , असो राजा संग करार होत होतो . 
* देसमुख क अधिकार म आवनी वालऽ इलाखा क हिसाब कन् देसमुख या पदवी , वतन  युरोपियन घरानास्याही क  " ड्युक " क बराबर होती . 
* देसमुख या पदवी / वतन या कोनऽ येक जात साठी नहीती .
* देसमुख यी आपलऽ इलाखा को सरकारच होतो . टैक्स की बसुली को हकदार देसमुख प पोलिस , कायदो कानून , बुनियादी सेवा ला बनायकन् राखन की जबाबदारी होती . 
* देसमुख क अधिकार ला रुसूम आन् भिकनो कोत होता . देसमुख क मदद साठी नाडकर्णी पद बन्यो . 
* महसूल ( tax ) म को २० % हिस्सो देसमुख को रव्हत होतो . 
* इंग्रज राज सप्या बास्त इ.स. १९५५ ला येक कायदो बने , जेकऽ अनुसार सबन वतनदारी च खतम भयी . देसमुख / देसमुखी गयी आन् देसमुख  उपनाम / आडनाव / कुर  रह्य गयो . 

# भोयर समाज मऽ का ' देसमुख ' को पुरानो वंस गुहिलौत , सिसोदिया स. महाराणा प्रताप जी येनच वंस का होता . इ वंस सूर्व्यवंसी स आन् गौतम गोत्र को स . देसमुख की कुलदेवी चण्डिका माय आन् कुलदेवता येकलिंग जी ( भगवान महादेव ) स.
देसमुख को झंडो लाल रंग को आन् वोपर सुनहरी सूर्व्यदेव को चिन्ह रव्हस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Wednesday, October 14, 2020

भोयरी संस्कृति - ३३ : भोयर कुर गोत्र. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३३ : कुर गोत्र
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७२ भोयर कुर की पदनामावली 

१. पदनाम : पडिहार , परिहार * प्राचिन वंस- प्रतिहार , स्याखा- १२ , वंस/उपवंस - अग्निवंस , गोत्र - कश्यप, भारद्वाज , कुलदैवत-चामुंडा , बिस्नु देव .
२. पदनाम : चिकनिया , देवासिया, धारफोडीया , रावत , हजारीया * प्राचिन वंस - चौहान , चाहमान * स्याखा - २४ * वंस / उपवंस - अग्निवंस - चौहान , सोनगरा चौहान , देवडा चौहान , खींची चौहान , हाडा चौहान * गोत्र - वत्स * कुलदेवी/ देवता - आस्यापुरी .
३. पदनाम : पठाडिया , गाडकिया , फरकाडिया , गिरहारिया , लबाड , डालू , ढोलिया , उकार , टोपरिया , लावरी , माटिया 
 * प्राचिन वंस -  प्रमार * स्याखा - ३५  * वंस / उपवंस : अग्निवंस - मौर्य , मौर्य , परमार , सोढा , सोढा , डोडिया , डोडिया , डोडिया , उमठ , गैहलडा , खैर , सांखला  * गोत्र - वसिस्ठ * कुलदेवी / देवता - दुर्गा 
४. पदनाम : बारंगा , किरंजकर , दुखी , खपरिया , डोंगरदिया , डिगरसिया  * प्राचिन वंस - सोलंकी , चालुक्य  * स्याखा - १६  * वंस / उपवंस : अग्निवंस - चालुक्य , चालुक्य , चालुक्य , चालुक्य , चालुक्य , चालुक्य  * गोत्र - भारद्वाज * कुलदेवी / देवता - काली
५ . पदनाम : रोलकिया , गकडिया , पाठा , चौधरी , मानमोडिया , देशमुख , हिंगवा , गोहितिया , गोनदिया , ढोटा  * प्राचिन वंस - गुहिलौत , सिसौदिया * वंस / उपवंस : सूर्यवंस - गुहिलोत / सिसोदिया ,  गुहिलोत / सिसोदिया ,  गुहिलोत / सिसोदिया , 
चुण्डावत ,  गुहिलोत / सिसोदिया ,  गुहिलोत / सिसोदिया ,  गुहिलोत / सिसोदिया ,  गुहिलोत / सिसोदिया ,  गोहिला /
गुहिलौत , गोधा / सिसोदिया . * गोत्र - गौतम  * कुलदेवी / देवता : चंडिका , एकलिंग * झंडा - लाल सुनहरी सूर्य का चिन्ह. 
६ . पदनाम : ढोंडी , कामडी , मुनी , कोडलिया , कालभुत , उकडलिया  *  प्राचिन वंस : कुशवाहा , कछवाहा  * वंस / उपवंस : सूर्यवंस - कुशवाहा / कछवाहा , कुशवाहा / कछवाहा , कुशवाहा / कछवाहा , कुशवाहा / कछवाहा , कुशवाहा / कछवाहा , कुशवाहा / कछवाहा  * गोत्र - गौतम  * कुलदेवी / देवता - कच्छपवाहिनी * झंडा - पंचरंगा ..
७ . पदनाम : गागरिया / घागरिया , रबडिया , पिनजारा , कनकर  * प्राचिन वंस - राठौर  * वंस / उपवंस : सूर्यवंस - राठौर , राठौर , राठौर , डांगी राठौर  . * गोत्र - गौतम * कुलदेवी / देवता - राठेश्वरी  * झंडा - पंचरंगा .
८ . पदनाम : गोरिया  * प्राचिन वंस -  गुजर  * वंस / उपवंस : सूर्यवंस - गुजर 
९ . पदनाम : गाडरी , कसाई  * प्राचिन वंस : गौड , गौर  * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - गौड / गौर , गौड / गौर  * गोत्र - भारद्वाज 
* कुलदेवी / देवता - महाकाली 
१० . पदनाम : सरोदिया , बोबडा  * प्राचिन वंस : तोमर , तंवर  * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - तोमर / तंवर , तोमर / तंवर 
* गोत्र - गर्ग * 
११ . पदनाम : बरगाडिया , बोगाना , बुहाडिया , बरखेडिया  * प्राचिन वंस  - भाटी  * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - भाटी , भाटी , भाटी , भाटी  * गोत्र - अत्रि * कुलदेवी / देवता - महालक्ष्मी 
१२ . पदनाम : बोबाट , खौसी  * प्राचिन वंस - बघेल  * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - बघेल , बघेल  * गोत्र - भारद्वाज * कुलदेवी / देवता : चण्डी , सिवजी 
१३ . पदनाम : नाडीतोड , खरगोशिया  * प्राचिन वंस - झाला , मकवाना  * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - झाला / मकवाना , झाला / मकवाना  * गोत्र - कश्यप * कुलदेवी / देवता : कालिका , महादेव .
१४ . पदनाम : ढुंडारिया  * प्राचिन वंस - गंगावंसी  * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - गंगावंसी  * गोत्र - काण्डवायन * 
१५ . पदनाम : बारबुहारा  * प्राचिन वंस - बाला , भल्ला  * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - बाला , भल्ला 
१६ . पदनाम : भादिया  * प्राचिन वंस - लबाना  * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - लबाना 
१७ . पदनाम : कडवा  *  प्राचिन वंस - उठेड * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - उठेड 
१८ . पदनाम : रमधम  * प्राचिन वंस - आजना * वंस / उपवंस : चंद्रवंस - आजना 
१९ . पदनाम : करदातिया  * प्राचिन वंस - जेठवा * वंस / उपवंस : ऋषीवंस - जेठवा 
२० . पदनाम : चोपडिया , लाडकिया , लोखडिया  * प्राचिन वंस - चोपडा , चावडा * वंस / उपवंस : ऋषीवंस - चोपडा / चावडा , चोपडा / चावडा , चोपडा / चावडा .
२१ . पदनाम : शेरकिया  * प्राचिन वंस - कनकपुरिया * वंस / उपवंस : ऋषीवंस - कनकपुरिया 
२२ . पदनाम : बडगरिया  * प्राचिन वंस - बडौदिया * वंस / उपवंस  : ऋषीवंस - बडौदिया 
२३ . पदनाम : टावरी , ठुस्सी  * प्राचिन वंस - टावरी , टांक  * वंस / उपवंस : ऋषीवंस - टावरी / टांक , टांक 
२४ . पदनाम : ढोबरिया  * प्राचिन वंस - दाहिमा * वंस / उपवंस - दाहिमा * कुलदेवी - दधीमाता 

# ७२ पदनामावली =        अग्निवंस   -. २४  + सूर्यवंस - २१ + चंद्रवंस - १८ + ऋषीवंस - ९ 

( संदर्भ :  ' Incredible युवा वार्षिकांक २०१२ '  , वंशावली लेखक : मदनसिंह मोरसिंह बडवाजी  मु . सिंगपुरा  , जिला - भिलवाडा - राजस्थान , संकलन : ठाकूर बि . एस . परिहार , मुलताई जि. बैतूल ) 

प्रस्तुति : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 
 
 
 
 
 
 
 
     

Tuesday, October 13, 2020

अजब गजब - १३ : मोगली bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - १३ : मोगली
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

जंगल - जंगल बात चली है पता चला है , चड्डी पहन के फूल खिला है..फूल खिला है......

' जंगल - जंगल बात चली है पता चला है , चड्डी पहन के फूल खिला है...' इ टि. वी. पर को गानो सबन ला याद होयेनच ! दूरदर्सन प जंगल बुक नाव की सीरियल आयीती , वोको यी टायटल गानो . सीरियल को मुख्य किरदार होतो , ' मोगली ' .
मध्यप्रदेस क सिवनी जिला म इंग्रज सरकार क बखत येक पोरग्यो जंगल म सापडेतो . जी कोलाना ( भेडिया ) संगऽ पल्यो बढ्योतो . वून क सोहबत क कारन वकी आदतना बी कोला सरखीच भयीती . वोकोच नाव मोगली ! सिवनी जिला को पेंच को जंगल मोगली को घर होतो . 

१. इतिहास : * सर विलियम हेनरी स्लीमन क ' येन अकाउंट आफ वाल्वस नरचरिंग चिल्ड्रन इन देयर डेन्स ' दस्तावेज म मोगली की जानकारी स. वोम लिखेस क सिवनी जिला क संतबावडी गाव म इ.स. १८३१ म येक नानो पोरग्यो जंगल मिन पकड्यो , जी कोलाना क संग गुफा म रव्हत होतो . 
* ' जंगल बुक ' को लेखक रुडयार्ड किपलिंग को जलम मुंबई म भयोतो . वोला लिखन को आन् घूमन को स्यवक होतो . वू जब घूमन ला मध्यप्रदेस क जंगल म आयो त् फारेस्ट रेंजर गिसबार्न न वोला मोगली की हकिगत सांगी . जंगली जनावर क संगत म रह्या कन् मोगली को सिकार करन को हुनर बी अजबच होतो , या बात सांगी . इंग्रज लेखक न मोगली क कारनामा की ' जंगल बुक ' किताब लिखी , ज्या पुरी दुनिया म परसिध्द स .
* ' जंगल बुक ' म लेखक रुडयार्ड किपलिंग न जी झाड - जंगल , नदी - नाला , टेकडी - पहाड को वरनन करेस ती सिवनी जिला क पेंच जंगल सिन पुरो मेल खास . 
* इ.स. १९८९ म येन ' जंगल बुक ' परिन जपान न पह्यल ऽ डाव ५२ येपिसोड की सीरियल बनायी . 
* इ.स. १९९० म येन जपानी सीरियल ला हिंदी म डब करकन् दूरदरसन प दिखाडी .
* येन सीरियल को टायटल गानो , ' जंगल जंगल बात चली है....' गीतकार गुलजार न लिखेतो आन् संगीत विशाल भारद्वाज न देयेतो .
* ' जंगल बुक ' किताब को प्रकासन इ.स. १८९४ म भयेतो . 
* डिजनी स्टुडिओ न १९६७ म ' जंगल बुक ' क आधार पर येनिमेसन सिनिमा बनायो . 

२. उत्सव : मध्यप्रदेस सरकार हर साल पोटुबाटुना साठी तीन दिन को ' मोगली उत्सव ' को आयोजन करस . वून ला जंगल , पहाडी , नदी दिखाडस . येन उत्सव आन् जंगल सफारी कन् पोटुबाटुना म पर्यावरन आन् जंगली जीव जंतू क बारा म माहिती भेटस आन् वून म जागरूकता बाहाडस .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Friday, October 9, 2020

अजब गजब - १२ : डोंगर देव. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - १२ : डोंगर देव
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयर म डोंगरे , डोंगरदेव , डोंगरदिये आडनाव ( कुर ) स . पर मध्यप्रदेस म चौरई क सांख जंगल म येक " डोंगर देव " नाव को धारमिक ठिकानो बी स !! छिंदवाडा पासिन सूर्व्यामुखी ३५ कि.मी. पर चौरई यी तहसील को गाव स . पेंच नदी क बगल म डोंगर देव इ निसर्ग क चमत्कार को अचंबो करनी लाइक मोठी मोठी चट्टान की पहाडी ! डोंगर देव बाबा दरबार यी डोंगर देव चट्टान की पहाडी च स . निसर्ग को इ अद्भुत रूप आन् निसर्ग की पूंजा करनी वाला लोग या डोंगर देव की खासियत स . यहान क दुय मोठी मोठी पहाडी सरखी चट्टान मिन निकरनो आन् धरम दरबार क चट्टान क खलतीन निकरनो कमाल को च काम स . ... आस्था को काम स ! डोंगर देव पहाडी प आबऽ माता देवी आन् हनुमान जी की स्थापना करीस . असो यी डोंगर देव बाबा आन् धरम को दरबार ! 
१ . मान्यता : * यहान क दुय चट्टान क मंझार मिन निकर कन् लोगना आपलऽ पाप ला धोस , असी मान्यता स . आन् येनऽ चट्टान मिन जी लोगना नी निकर सकस , वूई पाप का भागीदारी रव्हस , असी बी मान्यता स .
* यहान क चट्टान ला भगवान भोलेनाथ को आसिरवाद स , असी मान्यता स .
* जी चट्टान क मंझार म फस जास , वोकऽ नाव कन् यहान क माता मंदिर म नारेल चढाये त् फस्यो मानुस आपरंगच निकर जास , असी मान्यता स .
* डोंगर देव बाबा क दरबार म मन्नत पुरी होस , असी मान्यता स . 

२ . मेला :  * दिवारी क बाद ग्यारस पासिन डोंगर देव को १५ दिन को मेलो भरस .
* डोंगर देव मेला ला १०० बरस की परम्परा स . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, October 8, 2020

घटी ( भोयरी कविता ) bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

घटी 

Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

चले पल पल साठ
येक घटी नापे काल
दिन पायरऽ मह्यना
सर सर सरे साल ।१।

पीठ दरन क साठी
फिरे गन गन गोल
संग सुख दुख गाना
भाव भावना का बोल ।२।

माय माऊली को नातो
जसी घर की मयाल
घटी उखर मुसर
ज्याने मन को गा ताल ।३।

दरे भाग का जोंधरा
सांडे खुसी को गा मोल
सुटे घटी क खुटा ला
वोकऽ हातकन् वोल ।४।

फिरे अगास मऽ घटी
चांद पुनव को गोल
बगरायीस चान्नीना
न्यारो देवाजी को खेल ।५।

थांबी घरघर घटी
बुजे उखर यी खोल
आडा पर धरी रयी
गये मुसर को ताल ।६।

भया हातना मोकरा
हासी घर की दिवाल
लांघी धरती अगास 
वोकी पाखरू की चाल ।७।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

भोयर अन् नदी माय - ६ : पूर्ना. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयर अन् नदी माय - ६ : पूर्णा

Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

नर्मदा सरयूश्चैव तथा वेत्रवती नदी
तापी पयोष्णी चंद्रा च विपाशा कर्मनाशिनीम् ।४।
पुष्या पुर्णा तथा दीपा विदीपा सूर्यतेजसा
सहस्त्रवृषदानात्तु यत्फलं लभते ध्रुवम् ।५।
__ महादेव उवाच 
पद्मपुराण खण्ड ६ ( उत्तरखण्ड: ) अध्याय - ०२२

नदी सभ्यता आन् संस्कृति ला जलम देस . माय का सारा गुन नदी म रव्हस . तेकन नदी ला माय च कोस , वोकी पूंजा करस . भोयर संस्कृति बी नदी माय क सहारा कनच पयदा भयी , बाहाडी ! भोयरी संस्कृति मऽ पुर्ना माय ला खास मान स . 
* पूर्ना नदी का पयोष्णी , पयसानी , संपूर्णा , अन्नपूर्णा , चंद्रकला यी नावना स .
* मध्यप्रदेस क बयतूल जिला म भैंसदेही जवर कासी तलाव मिन पूर्ना माय को उद्गम भयो . 

१. इतिहास आन् मान्यता : * ' पूर्णा दर्शन ' म पूर्ना माय की जलम कथा सांगीस . पूर्ना माय क उगम जवर महकावती ( महिष्मति ) या रघुवंसी राजा गय की राजधानी होती . बाद म महिषासुर नाव पडे . आन् आब भैंसदेही नाव स . गय राजो निसंतान होतो . वून न दुरवास रिसी ला यी दुख सांगे . अठ्ठ्यासी हजार साधुसंत की रोज सेवा करन को उपाव वून न राजा ला सांगे . राजा न उसोच करे . येक दिन साधू लोगना न दूध मांगे . येतरा साधुसंत साठी दूध की येवस्था करनो मुसकिल च काम होतो पर साधुसंत ला नाराज बी नी करता आवत होतो . राजा न देवाधिदेव महादेव की आराधना करी . भोलेनाथ जी न येनऽ धरमसंकट मिन बचावन  साठी चन्द्रकला ला धरतीलोक प ल्यावन को उपाव राजा ला सांगे . चन्द्रकला न तमाम साधुसंत ला तृप्त करे पर बाद मऽ वून न दूध को अपमान करे . दूध पेकन बी वून क मन म चन्द्रकला साठी माय को भाव नी आयो . वून क मन म वासना पनपन ला लागी . चन्द्रकला ला राग आये न वा गायब भयी . चन्द्रकला क गायब भया प राजो चिंता म पडे . वून न करून ( करुण ) स्वर म चन्द्रकला साठी विलाप करे . ममतामयी माय चन्द्रकला को मन पिघले . वा दूधधारा क रूप म जमीन सिन निकरी , तेकन वोला ' पयोष्णी ' इ नाव पड्यो . वोकऽ तप बल कन् साधुसंत दगड बन्या . याच पयोष्णी आघऽ चलकन् पूर्ना क नाव कन् परसिध्द भयी .
* गनेस पुरान लिखनीवाला रिसी मुद्गल को आसरम पूर्ना माय क काठ पर रिनमोचन ला  स . 
* कासी तलाव प पूर्ना माय आन् सिध्देस्वर नाथ महादेव मंदिर स . येनऽ मंदिर क निरमान साठी राजा न वोन बेरा का परसिध्द इंजिनिअर नागर - भोगर ला बलायो . इ दुय भाईना केतरो बी मोठो काम रव्हन देव , येकच रात म पुरा करत होता . आन् वूई नाघोरा कन् काम करत होता . वून ला काम करन क बेरा कोनी न देखे त वूई गोटा बनत होता . नागर - भोगर भाई न काम चालू करे . जेवनबेरा प वून की बहिन सिदोरी लेकन गयी . वा गयी तब काम चालू च होतो . वोनऽ गलती कन् भाईना ला देख लेये . बस्स.... दुय बी भाईना दगड बन्या आन् देऊर को काम अपुरोच रहे , असी मान्यता स .
* सूर्व्यदेव की आन् पुनव क चांद की पह्यली किरन गाभारा ( गर्भगृह ) म पडस .
* नंदी ला जोरकन् हात लगाये त् घंटी सरखी आवाज आवस .
* पुरान कऽ अनुसार सिध्देस्वर नाथ ' उपज्योर्तिलिंग ' स . 
* पूर्ना को मतलब पुरो आन् पयोष्णी को मतलब अमरित स .
* रुखमनी हरन क बाद सिरी किस्न देव आन् रखुमाई पूर्ना काठ क ' रिनमोचन ' तीरथ प गयाता . 

२. तीरथ आन् उत्सव : * भैंसदेही पासिन ५ कि.मी. पर घोघामा गाव जवर कारतिक पुनव पासिन १५ दिन को पूर्ना मेलो भरस . जिन ला पोटुबाटु नी वूई लोग मन्नत मांगस . आन् वून की मन्नत पुरी भयी त् पोरग्यो नी त् पोटी ( जि बी भयी होयेन ) ला लेकन यहान आवस . वोला पारना म धरकन् पूर्ना माय क कोरा म डावस . 
* पूर्ना - सरोसती संगम प वामनी तीरथ स .
* रिनमोचन ( ऋणमोचन ) तीरथ पर पूर्ना माय सूर्व्यामुखऽ बाह्यस . यी तीरथ पुन्यकारक स . यहान पुस मह्यना क इतवार ला घाडोच महत्त्व सऽ . पुस मह्यना क हरेक इतवार ला यहान मेलो रव्हस . पुस मह्यना पासिन रथसपतमी पावतर रोज भंडारो रव्हस . गाडगे महाराज न यहान घाटना बांध्यास . 
* चांगदेव जवर पूर्ना माय सूर्व्य की लेक तापती ला भेटस . यहान योगी गुरू चांगदेव को देऊर स .
# जय पूर्ना माय #

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Wednesday, October 7, 2020

जलम चित्तरकथा ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

जलम चित्तरकथा
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Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

जलम चित्तरकथा
जगरा की गा गवरी
सुख दुख स बहिन
संगऽ आवरी जावरी

परपंच को सफर
लागे हरद पिवरी
अस्तुरी आंगऽ कस्तुरी
लाजे बावरी नवरी

जगजेठी को गुताडो
जडी लगायी कवरी
आंग आंग वरबाडे
जात मानुस हावरी

जिंदगानी को जलसो
जिद पाय ला भवरी
गन गन वोकी चाल
मऱ्या परच निवरी

रोज रोज को दांगडो
रोज रोये गा चवरी
कसो हारपे मानुस
सोड आबऽ तू तवरी

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, October 6, 2020

अजब गजब - ११ : बैतूल. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ११ : बैतूल
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दिल्ली - चेन्नई रेल लाईन पर भोपाल नागपूर क मंझार मध्यप्रदेस म बैतूल इ जिला को स्यहर स. पुरानऽ जमाना पासिन बैतूल बजार इ जिला को मुख्यालय रहेस . बैतूल देऊरना की नगरी , कयी कवि - लेखक को जलमस्थान आन् करमस्थान !! भक्तिभाव , साहित्य , उन्नत खेती , आजादी  की अलख , खूब पढ्या लिख्या लोगना , पुरातन काल पासिन को इतिहास असा कयी गुनना या बैतूल की वोरख स . 
१. इतिहास आन् मान्यता : * अकबर क नवरतन म को येक राजा टोडरमल क देखरेख म अखंड भारत की पेमाईस ( सर्व्हेक्षण ) भयी , वोनऽ पेमाईस को केंद्र बिंदू बैतूल ( बरसाली ) स . 
* बैतूल महाभारत काल पासिन आबाद होतो . 
* भोपाली तीरथ पर महासिवरातरी को मोठो मेलो लागस . यहान शिव गुफा आन् पारबती गुफा स . यहान च महाभारत काल म अरजून न गुप्त साधना करीती , असी मान्यता स .
* बैतूल क टिकारी भाग म रावन को पोरग्यो मेघनाद क नाव कन् मेलो भरस. आन् मेघनाद की पूंजा बी होस . 
* बैतूल क अगल बगल म लय किल्ला ( किला , गढ ) स. ७ कि.मी. क दूरी पर खेडला ( खेरला ) को गढ , जेला राजा ईल न बनाये , असी मान्यता स .
* स्याहगढ पासिन १४ कि.मी. पर भंवरगढ स.
* इ. स. १८५७ क बगावत साठी तात्या टोपे जी न बैतूल म आय कन् आजादी की अलख जगायीती .
* कस्तुरबा गांधी जी आन् महात्मा गांधी जी न बी बैतूल ला आय कन् आजादी को मंतर देयेतो . 
* इ.स. १९२२ म पह्यलो अखिल भारतीय न्यायालय बैतूल म बनायतो , जेका पंच पटेल भाईलोगना होता . 
* बैतूल पह्यलो जिलो स , जेनऽ ९ मार्च ला ' कवि दिन ' क रूप म मनावनो चालू करे .

२ . बैतूल की खासियत : *  बैतूल म उस ( गन्ना ) की फसल खूब होस . तेकनच यहान चारी आंग गुर ( गुड ) बनावन का कारखानाना दिसस . बैतूल ला गुर की नगरी बी कोस . यहान को गुर पुरऽ देस चव आन् मिठास साठी परसिध्द स .
* बैतूल को तिखाडी को तेल पुरी दुनिया म परसिध्द स आन् वोला ' बैतूल आईल ' क नाव कन् वोरखस . बैतूल को सागवान उच्ची दरजा ( कोटी ) को स . 
* बैतूल पासिन ९२ कि.मी. पर ' कुकरु ' नाव की जिला की सबसिन उच्ची पहाडी . येनऽ पहाडी भाग ला बी कुकरु च कोस . या जागा पचमढी सरखीच स . यहान कयी काफी बगान स . 
* बैतूल बजार आन् बैतूल म सव ( सेंबर )  क उपर देऊरना स . हरेक देऊर आन् जागा को आपलो येक इतिहास स आन् खासियत बी स .
* येक पुरानऽ जमाना की बावली ( बावडी ) स . वोकऽ काठ पर दुर्गा मंदिर स . 
* बैतूल म सागौन बाबा , पहलवान बाबा का ठाना बी स. 
* बैतूल बजार म देस को पाचवो धाम स , ' बालाजी पुरम ' ! बैतूल का सपुत , संसोधक ' सेम वरमा ' जी न आपली माय रुकमनी क याद म येला बनायेस . इ. स. १९९६ म वरमा जी सपरिवार तिरुपती बालाजी क दरसन साठी गयाता . वहान बालाजी दरसन क बाद म वून ला वाटे क आपलऽ जलमगाव म बालाजी धाम बन्या पायजे . वून न खुद का  पयसा अदला  लगायकन् यी परसिध्द धाम बनाये .  ४ बरस लाग्या बालाजी पुरम बनावनला !! २५० फुट लंबो , १०० फुट चवडो आन् १११ फुट उच्ची देऊर बनाये . आघऽ को द्वार २४ फुट उच्ची स . बालाजी पुरम मंदिर क बांधकाम म उत्तर भारत आन् दकसिन भारत की मंदिर बनावट को मिसरो  स . यहान ३०० फुट लंबो गंगा कुंड स . सेसनाग क पेट म गुफा , बाबा अमरनाथ असा कयी अचंबा यान बनायास . 

# बैतूल नगरी की येतरी खासियत स क वोपर पुस्तक च लिखनो पडेन . !!!!!
" जय जय भोलेनाथ "

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, October 5, 2020

भोयरी संस्कृति - ३२ : गह्यना. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३२ : गह्यना
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भोयरी म गह्यना ला बिसरो , भांडो , जेवर बी कोस .
बखत क साथ साथ पहनावो , बिचार , जरुरत, आवड निवड बी बदलत रव्हस . दुय तीन पीढी पह्यलो को पहनावो , रहन सहन आन् आज क पहनावा , रहन सहन म घाडोच फरक पडेस . 
# गह्यना 

१. मानुस ( आदमी ) का गह्यना : 
* कान - मूरकी , साकर 
* हाथ - बेर ( कडा ) 
* कंबर ( कमर ) - करदोडो 
* गरा ( गला ) - कन्ठो , गोफ , 
* उंगल - मुंदी , नग 
* कमीज - चांदी की गुदाम , साकर

२ . बाईलोग का गह्यना : 
* माथा - छवका , बिन्दिया 
* कान - तनुड , बिरी , बारी , रिंग , डुल , बुगडी 
* नाक - नथ , नथनी , लवुंग , चमकी 
* गरा - येकदानी , गरसोरी , कारलो डोरलो , हास , चंदनहार , सिक्का सल्ला , साकरी , हमेल 
* हाथ ( जेवनो ) - पाटली , गोलेटा , काकन , मस्तोरा 
हाथ ( डाखो ) - माटी , दोरा ( चांदी को ) , गोलेटा , पाटली , काकन , मस्तोरा 
* दंड ( बाजू ) - कोपरकडी , बाकड्या 
* कंबर ( कमर ) - करधनी , आकडो , मेखलो 
* उंगल ( जेवनऽ हाथ की ) - फेवल , मुंदी , जागीर 
* उंगल ( डाखऽ हाथ की ) - अंगूरदाना ( आंगठा म ) , मुंदी , आरसी , रुपया , चार आनी , नानी मुंदी 
* पाय - तोड्डी , पयजन , कडलय , रुल , कड्डी 
* पाय की उंगल - आंगठो , जोडवा , मच्छी , फूल ( हिरोंदी ) , मुंदी 

३.  विदर्भ भूषण सौ . पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख इन क ' उजळणी ' कविता संग्रह ( मराठी ) म की येक गह्यना पर की कविता - 

कानात तनुड

कानात तनुड 
हमेल गळाभर
कोपरकड्या शोभे
बाई दंडावर

आरसी अंगुळदाणा
जागीर मंधच्या बोटी
उजेड पडला
बंधुजीच्या ताटी

सरी साखळी 
शेवाच्या आडून
कपाळाचं कुकू
दिसते दुरून 

( साभार : सतपुडा की संस्कृति - सम्पादक : वल्लभ डोंगरे )

प्रस्तुती : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Sunday, October 4, 2020

भोयरी संस्कृति - ३१ : सीता देवी पूंजा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३१ : सीता देवी पूंजा
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भई प्रगट कुमारी भूमि - विदारी जनहितकारी भयहारी ।
अतुलित छबि भारी मुनि - मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी ।।
_ संत तुलसीदास जी

कास्तकारी म भोयर समाज न महारत हासिल करीस . कास्तकारी करकन् धरती माय की सेवा करनो रहे , नी त तलवार चलायकन्  आपलऽ धरती माय को रकस्यन करनो रहे ; भोयर समाज की हजारों पीढीना न आपलो धरम निभाये ... सनातन काल पासिन या भोयरी संस्कृति रही . 
कापूस ( पऱ्हाटी ) की फसल लेन म बी भोयर समाज आघच स . भोयर समाज म कोनतो बी काम बिना पूंजापाती क बिगर नी होत . धारमिक स्वभाव को भोयर समाज वोनऽ हरेक जीव जंतू , चर अचर को उपकार मानस ; जेकन वोला मदद भेटी होयेन !! 
कापूस बेचनो चालू करन को होयेन त् पूंजापाती त करेन च ! या पूंजा बी बाकी पूंजा सिन बेगरी रव्हस . कास्तकारी म बाईलोगना क कस्टऽ की , तकलिफ की सीमा नहाय . आन् बाईलोगना आपलऽ कस्ट , तकलिफ को नातो जोडस " सीता देवी " सिन !!!!
" सीता माय ले कस्ट झाले बहु , तिनऽ थे येचले गहू गहू " येनऽ येक मराठी वोवी म बाईलोगना आन् सीता माय क दुख दरद क नाता को दरसन होस . 
भोयर संस्कृति म पह्यलो कापूस बेचन ( येचन ) क बखत खेत मऽ होस " सीता देवी " पूंजा !!
१. इतिहास आन् मान्यता : * रुगवेद ( ऋग्वेद ) क अनुसार  " सीता " को मतलब होस जमीन पर नागर कन् पडस वा किर ( रेखा ) !
" सीता " मतलब ' भूमिजा ' .... ' जानकी '.
" सीता " मतलब खेती कास्तकारी की ' अधिष्ठात्री देवी ' .
> रुगवेद म केतो साजरो अर्थ सांगेस " सीता " को !

२ . सीता देवी : कापूस बेचन ( येचन ) क पह्यलऽ दिन करस ' सीता देवी '. दसरा पासिन कापूस येचनो चालू होस .
बाईलोग सीता देवी ( पूंजा ) करन साठी घर सिन पीठ ( कनिक ) को उंडो , हरद कुकू , अकसिद , उदबत्ती , दिवनाल , तेल , नारेल , साकर / गुर , पाच कोरा कपडा , तिखी ( राई ) , मीठ ( नमक ) , कापूर , निवद साठी दूध , दही , भात ( नांज ) संगऽ लेस . आंबाडी क ताग की दोरी करस . खेत म पराटी क फानटी ला वोन दोरी / रस्सी को पारनो ( झूलो ) बांधस . कोरऽ कपडा ला हरदकन् पिवरो करस . येक कपडा की खोर बनावस . वोम पीठ क उंडा की सीता देवी धरस . दुसरो कपडो  वोपर पांघरस आन् वोपर खेत म फुट्यो ती कापूस धरस .  पारना ला झोका देन साठी बी रस्सी बांधस . पारना क दुय आंगऽ दुय दगड का सिपाई ( पाह्यरेवान ) मांडस . वून ला बी कपडा पेहरवस . रस्सी आन् काडी कन् येक डांडी पाड्डो बनावस आन् वोला बी पराटी ( कापूस ) क फानटी ला हिलगावस .  येक पाड्डा म दगड आन् दुसरऽ पाड्डा म कापूस धरस . पारना क दुय बाजू आन् डांडीपाड्डा जवर उदबत्ती लगावस . आघऽ दिवनाल को दिवो बारस . सीता देवी , सिपाई , डांडीपाड्डो , नारेल ला हरद कुकू - अकसिद लगावस . दूध भात / दही भात को निवद धरस अन् पानी फिरावस . बाकी निवद खेत म झोकस . नारेल फोडकन् साकर / गुर ( गुड ) संग वोकी सेरनी बाटस . खेत म को च काडी कचरो जमा करकन् वोला बारस आन् वोम तिखी , मीठ , कापूर डावस . वोको तड् तड् आवाज होस ...
तब बाईलोगना कोस , जसो इ तड् तड् फूट रह्येस उसोच कापूस बी फुटन दे .... कोनी की दिठ नी लागन दे .
पारना ला झोको देत देत बाईलोगना गाना कोस , 
' कापूस येचूस तोर की वोर..
सीता देवी साठी करीस
रेसम की खोर ...'

३. विदर्भ भूषण सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख इन क ' उजळणी ' कविता संग्रह ( मराठी ) म की येक रचना :
कापूस वेचते
कापूस वेचते
तुरीची ओळ
सीता देवी साठी
केली रेशमाची खोळ ।

कापूस वेचते
मनी हरीकते
बोंड्या बाई कापसाच्या
कशा फुलारून येते ।

कापूस वेचते
खंडीनं भरते
तुम्ही करा घाई
बाई कापूस झुरते ।

कापूस वेचते
चंदर हासते
झाडा झाडावर
कशी चांदणी दिसते ।

कापूस वेचते
नख्याच उरते
काशी बाई माझी
गाठ लुगड्या बांधते ।

( सहयोग : सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Saturday, October 3, 2020

अजब गजब , भाग - १०: हनुमान मंदिर , जाम सावली. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब , भाग - १० : चमत्कारी हनुमान मंदिर , जाम सावली

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संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।।

मध्यप्रदेस म छिंदवाडा जिला क सौंसर ब्लाॅक म सौंसर - पांढुरना रस्ता प चमत्कारी हनुमान मंदिर , जाम सावली स . नागपूर - छिंदवाडा हायवे परिन २ कि.मी. आन् सौंसर परिन ७ कि.मी. की दूरी पर इ पावन धाम स . रामभगत , संकटमोचक हनुमान जी की मूरती यहान पिपर क झाड ला लागकन् स . या मूरती ' शयनमुद्रा ' म स . सनवार आन् मंगरवार ला यहान रोज सिन जास्तच भीड रव्हस . 
मध्य भारत क ' दण्डकारण्य ' म , सतपुडा - मैकल पहाडी म जाम नदी आन् सरपा ( सर्पिणी ) नदी क संगम पर सावली गाव म इ धाम स . नागपूर परिन जाम सावली ६६ कि.मी. स . जाम सावली हनुमान मंदिर पासिन १.५ कि.मी. दूर जाम नदी को परसिध्द घोगरा जलप्रपात आन् वहान क पहाडी प भगवान महादेव की मूरती स . 
१. इतिहास आन् मान्यता :  * १५ फीट उच्ची या हनुमान जी की मूरती ' स्वयंभू ' स , आन् पिपर क झाड मिसिन निकरीस , असी मान्यता सऽ .
* त्रेता जुग म बनवास क बखत भगवान सिरी राम जी जाम सावली धाम परिन गयाता , असी मान्यता सऽ .
* महाभारत काल म महाबली हनुमान जी न जाम सावली म भीम को ' गर्वहरण ' करेतो , असी मान्यता स .
* बुजरूक लोगना सांगस क , पह्यलऽ क जमाना मऽ या हनुमान जी की मूरती पिपर झाड जवर उभी होती . पिपर क झाड जवर गुप्तधन स , असो लोगना ला वाटत होतो . कयी बरस पह्यले कोनी लोगना इ गुप्तधन चोरन साठी पिपर क झाड जवर गया . तब वू गुप्तधन बाचाडन साठी हनुमान जी लेट गया . २० - २० बयील , घोडाना लगायकन् बी वा मूरती जागा परिन हाली बी नी आन् तब पासिन वा उसीच स , असी मान्यता स .
* रामायन काल म लक्सुमन जी साठी जब हनुमान जी संजिवनी बुटी को ' द्रोनागिरी ' परबत लाय रह्याता , तब जाम सावली म वून न आराम करे , असी मान्यता स .
* पटवारी रिकार्ड म येनऽ धाम की सिरफ सेंबर ( १०० ) बरस की च माहिती स . 
* हनुमान जी क नाभी ( बोंबली ) मिन हरमेस पानी निकरत च रव्हस . येनऽ पानी को भगतना तीरथ लेस . येकन चमडी की बिमारी खतम होस , असी मान्यता स .
* बुरी बला , भूत - परेत बाधित लोगना , मानसिक बिमारी का मरीज यहान ठिक होस . सवा मह्यनो ( ४१ दिन ) मरीज ला यहान रव्हनो लागस . रोज नितनेमकन् तीरथ जल लेनो लागस . सकार - झालपड्या की आरती करनो लागस . येन नेमकन् मरीज ला भूत पिसाच्च पासिन मुक्ती भेटस , असी मान्यता स .
* हनुमान जी क मूरती जवर बाई लोगना ला जान की मनाई स . 

# हनुमान मंदिर जाम सावली इ जागरीत धाम स . संकटमोचक हनुमान जी भगतना क नवस ला पावस , वून की मन्नत पूरी करस . परसिध्द हनुमान जी क दरसन साठी दूर दूर सिन लोगना आवस . हनुमान मंदिर जाम सावली क पावन धाम पर रोजच दरसन साठी हजारों लोगना आवस . यहान की येवस्था ट्रस्ट करस पन् पुलीस विभाग की जवकी बी स . हर मह्यना ला भगत लोगना २०/२५ लाख रुप्या को चढावो भक्तिभाव कन् देस . 
# हनुमान जयंती ला यहान मोठो उत्सव रव्हस .
जय हनुमान ग्यान गुन सागर
जय कपीस तिहुं लोक उजागर ।।

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Friday, October 2, 2020

अजब गजब, भाग ९: जगदंबा माय,ठानेगाव. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब , भाग - ९ : जगदंबा माता , ठानेगाव
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति

ॐ अस्य श्री दुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र मंत्रस्यनारायण 
ऋषि: अनुष्टुप् छन्द:श्री महाकाली महालक्ष्मी
महासरस्वत्यो देवता: श्री दुर्गा प्रीत्यर्थे सप्तश्लोकी दुर्गा पाठे विनियोग: ।

Bhoyari dialect _ भोयरी बोली 

वर्धा जिला क कारंजा तहसील म , नागपूर - अमरावती हायवे पर भोयरपट्टी म को येक गाव ' ठानेगाव ' स . कारंजा परिन नागपूर कितऽ ७/८ कि.मी. दूर इ गाव जगदंबा माता देवस्थान साठी परसिध्द स . ठानेगाव म सोम्मार को आठवडी बजार भरस . बजार ला लागकन् च देऊर को मोठो प्रवेसद्वार दिसस . वोकऽ दुय आंगऽ सिंव्ह की मूरतीना स . वोमिन अंदर गया बाद कारऽ पास्यानी दगडकन् बनायेस ती प्रवेस मंडप लागस . इ मंडप ठेंगनो स . आघऽ हनुमान जी को देऊर आन् प्रयागभारती महाराज की समाधी स . आघऽ गनपति को देऊर स . डाखऽ हात प आकामाय - बकामाय को नानोसो देऊर स . अंदर जान साठी ७ फुट खलतऽ पायरी कन् उतरनो पडस . आबऽ वहान भगवान बरमा जी , भगवान बिस्नूदेव , भगवान महादेव की मूरतीना आन् आघऽ पिंड स .प्रवेसमंडप पासिन खुली जागा पार कऱ्या बाद सिध म च सूर्व्यामुखी जगदंबा माय को देऊर स . पह्यलऽ सभामंडप , मंग अंतराल आन् गाभारो स . गाभारो ४ फुट खलतऽ स , जेम पायरीना कन् जाता आवस .उतऱ्या बराबर सिवजी की पिंड ( सिवलिंग ) दिसस , ज्या कारऽ पास्यान म च घडाईस . पिंड बराबर मंझार म स . पर आबऽ टाईलना कन् वोकी महादेव मुखी जलहरी दिवाल पावतर जोडीस तेकन घुमता नी आवत . सिवलिंग क आघऽ जगदंबा माय क मूरती प नजर डायी त् आपरंगच भक्तिभाव कन् हातना जुडस . दुसरो अचंबो असो क् माय का दुय मुखडा दिसस . येक आघऽ आन् दुसरो पासऽ पर जरा उचाई पर !! आघऽ को मुखडो मोठो आन् पासऽ को नानो स . दुय सोना का मुखोटा देवी माय क रूप का च स आन् वोको दिव्य तेज सारऽ गाभारा म झलारस . पासऽ चांदी को मखर स . येनऽ दुय मुखडाना बात असी स क जगदंबा माय की मूरती सिंव्ह पर होती . जगदंबा माय को मुखडो लगायो त सिंव्ह ला बी देवी माय को च मुखडो लगावन म आयो . तेकन जगदंबा माय का दुय मुखडा दिसस . देऊर क पासऽ तलाव सरखो कुंड स . आन् कुंड क पासऽ उत्तर वाहिनी नदी स . आवार म जेवनऽ हाथ प जूनी भीर बी स . 

१. इतिहास आन् मान्यता : * काटोल क चंडिका माय को देऊर , ठानेगाव को जगदंबा माय को देऊर आन् कारंजा जवर क येनगाव को जलामाय को देऊर राकसनान् येकच रात म बांध्ये , असी मान्यता सऽ .
* ११ सदी पासिन १३ व सदी पावतर विदर्भ पर देवगिरी क यादव वंस को राज रह्ये . यादव राजा को मुख्य परधान हेमाद्री पंडित होतो . ( हेमाद्री पंडित को जलम वर्धा जिला म च भयेतो .) वून न देऊर बांधन की जेनऽ कला ला बाहाडाये , वोला 
' हेमाडपंथी ' देऊर कोस . सबन हेमाडपंथी देऊरना सूर्व्यामुखी रव्हस . येनऽ वास्तुकला म उत्तर भारत की नागर , लतिना आन् भूमिज वास्तुकला को मिसरो रव्हस . पर जास्त परभाव भूमिज वास्तुकला को च दिसस . जगदंबा माय क देऊर की रचना 
' हेमाडपंथी ' देऊर की च स . यी देऊर ११ व सदी म बांधेस , असी मान्यता सऽ .
* यहान ' प्रयाग भारती ' नाव को भगत साधू रव्हत होतो . देऊर पासिन तलाव ( कुंड ) पावतर येक भूयार होतो आन् प्रयाग भारती महाराज वोमिन आंग धोन साठी जात होता , असी मान्यता सऽ .
* जगदंबा माय की मूरती ' स्वयंभू ' स आन् वोको पह्यलो नाव ' चंडिका माय ' होतो , असी मान्यता सऽ .
* पुरानऽ जमाना मऽ चंड - मुंड नाव क दुय दयीतना को खूब आतंक होतो . सारा लोगना परेस्यान भयाता . लोगना न जगदंबा माय ला सुमरे . तब चंड - मुंड दयीतना को वध करन साठी चंडिका माय न यहान ठान मांडे , तेकन येनऽ जागा / गाव को नाव ' ठानेगाव ' पडे , असी मान्यता सऽ .
* जगदंबा माय नवस ला पावस आन् संकट / इपदा क बखत बाचाडन साठी धावकन् आवस , असी मान्यता सऽ .

२. मंदिर की वास्तुकला :  जगदंबा माय को देऊर ' हेमाडपंथी ' वास्तुकला को नमुनो स . सूर्व्यामुख येन देऊर को प्रवेसमंडप , सभामंडप आन् गाभारो येक सिध म स , आन् सबन चवकोनी स . देऊर क बांधकाम साठी चुना - सिमिट सरखो मसालो दरजा भरन साठी नी बापरेस . हेमाडपंथी देऊर बांधन साठी दगड / फाडी म खोबन बनावस . दगडना तिरकोनी , चवकोनी , पाचकोनी , गोल , अरधो गोल असा घडावस . फाडीना असी घडावस क वा बराबर येकमेक म फसेन आन् चिपक कन् बसेन . कयी फाडी क खोबन म लोहा की ठोकर पट्टी दिसस . वोकन दुय दगडना म पकड बनावस . कहान फट रह्य गयी त् वोमऽ सिसो पिघलायकन् डावत होता . बिना चुना सिमिटकन् पन् खोबन की अडकन येकमेक म फसायकन् बांधन की हेमाडपंथी वास्तुकला आज बी अचंबोच स . देऊर को सिखर पायवा क दगड क धार / कोना पासिनच चालू होस . चारी बाजू किथिन येक सिखर क पासऽ दुसरो सिखर , पासऽ को सिखर उच्ची उच्ची होत जास चारी कोनटाना वरतऽ जायकन् आमलक को आधार बनस . वोपर आमलक आन् आमलक क वरतऽ करसो !
जगदंबा माय क देऊर क बाहिर की दकसिन दिवाल क खिडकी म काली माय की मूरती , पासऽ क खिडकी म लक्षुमी देवी की मूरती आन् महादेव मुखी खिडकी म सरोसती माय की मूरती स . दुय बाजू न भगवान सिवजी की बी मूरती स . आबऽ इठ्ठल रखुमाई , राह सीता को बी देऊर स . 

३. उत्सव , समारोह :  * चयीत आन् स्यारदीय नवरातरी म यहान मोठो उत्सव रव्हस . कारतिक मह्यना म काकड आरती , दिंडी आन् पुनव ला भंडारो रव्हस . 
* पंढरपूर ला जानी वाली पालखीना देऊर म आवस . गाव म सोभायातरा निकरस . भजन - पूजन - किरतन चालूच रव्हस . 
* जगदंबा माता देवस्थान ट्रस्ट क माध्यम कन् ठानेगाव आन् अगल बगल क गाव की पोटीना आन् जवाई को ' माहेर को अहेर ' कार्यक्रम होस . 

# भोयर पट्टी म जगदंबा माय को देऊर आस्था आन् भक्ति को धाम स . 
# मंदिर क खरचा पानी , रखरखाव , देखभाल साठी ठानेगाव क व्याघ्र कुटुम्ब न १६ येकट आन् घाडगे कुटुम्ब न चंदेवानी सिवार म ३२ येकट खेत दान करेस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर