Thursday, June 30, 2022

डवरनी ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

डवरनी
भोयरी कविता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

फसल म तनकन
करबोन डवरनी
मन म संगऱ्यो धुड्डो
कब करेन चारनी ।१।

पीक बाहाडन साठी
करबोन डवरनी
बयील ला मुस्का आन्
मुंडा की च फवारनी ।२।

खेत सफा करन ला
करबोन डवरनी
मन म चिक्खल कादो
गरे डोरा की वरनी ।३।

येक फेर दुय फेर
करबोन डवरनी
निंदा क रायता कन्
काहे भरस भरनी ।४।

माल जास्त बाहाड्या प
थांबाडबो डवरनी
चित म लुक्यो हिरस
कोनअ करी गा करनी ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

यादें _ सवाल की ! Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें , सवाल की ! 
Hindi language _ हिंदी भाषा

हरदम कुलबुलाता दिमाग मे एक सवाल . मेरी भागती जिंदगी के पीछे पीछे दौडता यह सवाल ... वास्तव से नजदीक , श्रध्दा के पास लेकीन भावना से दूर यह सवाल . अपने आप में गुत्थमगुत्था सवाल . ......
' भाई , आखिर सवाल कौन सा है ? ' पीछे से एक सवाल उछल कर मंच पर आया . 
' दोस्तों , सवाल है - प्रयत्न श्रेष्ठ या भाग्य ? ... जो बचपन से पीछा कर रहा है मेरा ! ' मैने जिज्ञासा का अंत करते हुए कहा .
' हम्म्म....' सवालकर्ता ने आश्चर्य और निराशा को एक साथ घोल कर बोला . 
बात है  सातवी कक्षा की . तहसील में हमारी स्कूल सबसे बडी . कक्षा पॉंचवी से बारहवी तक A , B , C, D , E , F ऐसे छह सेक्शन थे . हमारे स्कूल मे हर महिने कुछ ना कुछ स्पर्धा , विविध परीक्षा होती रहती थी . हमारा तो अलग ही ठाठ था . मै कोई भी स्पर्धा / परीक्षा के लिए अपना नाम नही लिखवाता था . आखरी दिन संबंधित शिक्षक मुझे बिना पूछे , मेरा नाम दर्ज कर देते थे . अपुन तो टेन्शन लेतेच नही थे ! जो उचित लगता , वह बोल / लिख कर आ जाता था...
बात सातवी कक्षा की हो रही है.. स्कूल छूटने के बाद मै अपनी ही धून घर जा रहा था . स्कूल के मेन गेट पर फालके सर ने मुझे पकडा . मराठा महासंघ ने तहसील स्तर पर वादविवाद स्पर्धा का आयोजन किया था . फालके सर तहसील के हर स्कूल जा कर स्पर्धकों के नाम लिख रहे थे . 
' तुझं नाव टाकले आहे स्पर्धेसाठी ... उद्या स्पर्धा आहे . कळलं ! ' सर ने कहा .
' सर , विषय काय आहे ? ' मैने पूछा . 
' प्रयत्न श्रेष्ठ की भाग्य ? ' सर ने बताया . 
' सर , मी प्रयत्न कडून बोलणार ..' मैने कहा . 
' नाही . अख्ख्या तहसील मधून फक्त ६ विद्यार्थी तयार झाले भाग्य विषयावर बोलायला . ७० विद्यार्थी प्रयत्न वर बोलणार आहे . तू भाग्य ह्या विषयावरच बोलायचे आहे.. नाही तर स्पर्धेला अर्थ काय ? ' सर ने अपनी समस्या बताई . 
' पण सर , मी भाग्यावर काय बोलणार ? ' मैने कहा . 
' तू काहीही कर.. तुला भाग्यावरच बोलायचे आहे..' सर ने कहा . 
' तुमचा आग्रहच असेल तर एक काम करा , मला सर्वात शेवटी बोलवा ..' मैने कहा . 
' ठीक आहे..' सर ने कहा . 
सर मेरी बैंड बजा कर चले गये . मै भाग्य इस विषय पर सोचते सोचते घर पहुंचा . दिमाग का दही बन गया था पर ढंग के मुद्दे नही सूझ रहे थे . फिर ट्यूब लाइट जली . मराठी के शिक्षक देशमुख सर याद आये . उन का घर काफी दूर था . मै पैदल ही उन के घर पहुंचा . उनका छोटा भाई हमारे ही स्कूल में था.. सिनियर भी था . मैने आने का कारण बताया . वह ठहाके मार कर हंसने लगा . बोला _ यह विषय क्यों लिया ? 
' भाई विषय मैने नही चुना . फालके सर ने जबरन थमाया है..' मैने कहा . 
' इस बार तो तू गया ....  सर बाहर गये है , तुम घर जाओ . ' उसने हंसते हंसते ही कहा . 
एक ही उम्मीद की किरण थी ! अब क्या करे ? _ मेरे सामने यक्षप्रश्न !  ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, June 28, 2022

करे बतल बतल ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

करे बतल बतल
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

करे बतल बतल
मुंडा ला घाडो च जोर
भुंज्यो पापड नी टूटे
बारा गाव को मुजोर ।१।

करे चबर चबर
डाये उबारा म तेल
दूर सीन हात सेके
देखे झगडा को खेल ।२।

करे थतल थतल
वोला ना स्येंडो ना बुड
बिना पेंडी कन् रचे
भाऊ कडबा को गुड ।३।

करे कटर कटर
पुरावस घाडो नांदो
घर म देखनु त जी
उंदराना को च वांदो ।४।

करे कतर कतर
दुसरा क मंझार म
पासअ बारा गाडा बोंब
पर आघअ येटार म ।५।

देवबाप्पा न देयेस
येक मुंडो दुइ कान
आवबिचार को भेज्यो
आन् आंग को मकान ।६।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, June 25, 2022

अजब गजब - ९५ : देवल गढ. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९५ : देवलगढ़
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

उत्तराखंड को गढवाल इलाखो . गढवाल पर ६० पवार / परमार राजाना न ९१५ साल राज कऱ्यो . इ.स. ८८७ पासीन इ.स. १५१२ वरी येनअ राज की राजधानी रही चांदपुर गढी , इ.स. १५१२ पासीन १५१७ वरी देवलगढ, इ.स. १५१७ पासीन सीरीनगर ( सीरीपुर ) आन् आखरी म इ.स. १८१६ पासीन १८६२ वरी  टिहरी ! 
देवलगढ रीसीकेस पासीन २१ कि.मी. आन् सीरीनगर ( पौडी गढवाल ) पासीन १९ कि.मी. दूर स . 
देवल रीसी को आसरम यहान होतो , तेकन येनअ जागा को नाव पड्यो ' देवलगढ ' . 
* इतिहास : * इ.स. ८८७ म मालवा को राजकुमार कनकपाल बदरीनाथ क तीरथ यातरा पर आयो . वोनअ बेरा चांदपुर को राजो होतो , राजा भानुप्रताप . राजा ला राजकुमार कनकपाल को सोभाव गुन भायी आवड्यो . वून न आपली पोटी को बिह्या राजकुमार कनकपाल सीन कऱ्यो . राजा भानुपरताप क सर्गवास क बास्त इ.स. ८८८ म राजकुमार कनकपाल राजो बन्यो . गढवाल क पवार / परमार वंस को संस्थापक राजो कनकपाल स . वून न इ.स. ८९८ वरी राज कऱ्यो . 
* इ.स. ११९१ म गढवाल पर नेपाली राजो असोक चल्ल न हमलो कऱ्यो . तब क पवार राजा आनंदपाल न वोला हारायो . 
* पवार राजा सोनपाल न भिलंग घाटी कबजा म लेई .
* पवार राजो लखन देव , आपला सिक्का चलावनी वाला पह्यला राजा हय . 
* इ.स. १४५५ म लिख्यो राजा जगतपाल को तांबा को पत्तर सापडेस . 
* दिल्ली को सुलतान ( इ.स. १४५१ - ८८ ) बहलोल लोदी न परमार राजो बलभद्र को ' शाह ' को खिताब देयो . 
* परमार वंस को ३७ वो राजो ' अजयपाल ' महान समराट होतो . इ.स. १४९० म वून गढवाल का सारा ५२ गढ जीत्या . सारो गढवाल वून क राज म आयो . 
* इ.स. १४९१ म कुमांऊ को राजो किरतीचंद न गढवाल पर हमलो कऱ्यो . राजा अजयपाल न वोला साजरो थेथऱ्यो आन् संधि करन ला भाग पाड्यो . 
* इ.स. १५१२ म राजा अजयपाल न राजधानी चांदपुर गढी सीन देवलगढ म ल्यायी . 
*: राजा अजयपाल न कत्युरी राजा ला हाराय कन् वोकअ सोना क सिंगासन प कबजो कऱ्यो . 
* राजा अजयपाल अफगानी राजो सिकंदर लोदी क समकालीन होतो . 
* राजा अजयपाल न केंद्रीय फऊज बनाई . आन् खानो बनावन साठी सरोला बामन धऱ्यो . 
* ठाकूर सूरवीर सिंग न लिखी ' सॉवरी ' नाव क पोथी म राजा अजयपाल ला ' आदिनाथ ' आन् ' महात्मा ' कह्येस . 
* राजा अजयपाल न राजराजेस्वरी देऊर बांध्यो . इ जागरुत सिध्दपीठ स . 
* येनअ महान वंस म च महारानी करनावती भयी . राजा महिपत स्याह क सर्गवास क बाद वा सति नी गयी . आपलअ ४ साल क पोरग्यो , राजकुमार पुरथी सिंग संगअ रह्य कन् वून न राजपाट संभाल्यो . स्याहजहान न नजाबत खान ला जब हमलो करन साठी पठायो तब महारानी करनावती न वोला हारायो आन् सबन मुघल फऊज की नाक काटी . लाज क माऱ्या नजाबत खान न आत्महत्या करी . 

# देवरगढ म माय गौरजा देवी , माय राजराजेस्लरी , खेत्रपाल देवल , कालनाथ भयरव देवता , बाबा सत्यनाथ कमलनाथ पीठ , सीरी लक्षुमी नारायन पीठ , सीरी दत्त असा कयी देऊरना स . गुरू गोरखनाथ को चेलो सत्यनाथ की गुफा स . सोम का भांडा ( डंडा ) स्मारक क दिवाल प कूटलिपि अंकित स . 
# येपरील मह्यना म माय राजराजेस्वरी को मोठो मेलो भरस . 

( सहयोग : इंजि . जालम सिंग जी सोढा , बिकानेर ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

येलाले बेलं. ( वऱ्हाडी कविता ). varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

येलाले बेलं
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

तंग निरुंद नजरा
अंदरुन सारं पोलं
उभ्या उभी धडकते
वल्ला सादर गा झोल ।१।

लोकायले गुरूग्यान
सोता पांघरते झुल
तोऱ्यात बयलावानी
पडे तोरनीची भूल ।२।

फिक्या पोऱ्याच्या झडत्या
जीभ झाली चवचाल
नस्या राजकारनाची
टाके बिघडून चाल ।३।

इके सस्ताईत खरं
आलं खोट्यालेच मोल
सीध्या सरख्या रस्त्यानं
जाते बावा कसा तोल ।४।

वरवरचा दांगडो
उगा बडवते ढोल
लावे येलालेच बेल
आन् परसाले फुल ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, June 18, 2022

पिस्टा ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पिस्टा ( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

खेती उम्मीद की बाडी
भऱ्या बाजरा का सिट्टा
केता झाक कन् धरू
घाडा पयद्यास चोट्टा ।१।

मिट्ठू पाखरू बांदरा
सारा वोरबाडे भुट्टा
दाना खाय कन् करे
पूरा कनीसना पिस्टा ।२।

कस्ट बाराई काल को
चारी किथीन च रट्टा
सुदसादअ मानूस ला
लागे केतरा जी बट्टा ।३।

थेथरन साठी टप्या
हर जागा सिलबट्टा 
उबज्यास आंग पर
बदनामी का जी चट्टा ।४।

कबअ भोयेन देखजे
आये म्हरा अडसट्टा
तब रोयेन भाग ला
हर धडी आन् दाट्ठा ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, June 17, 2022

निर्माण : भाग ९. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण - भाग ९
Hindi language _ हिंदी भाषा

रोज कोई न कोई छोटे - मोटे काम के लिए पास वाले गांव जाना ही होता था . जीप खराब थी . सुपरवाइझर बोला की , स्कूटर से जाएंगे . रात के समय इस जंगल से गुजरना ; मुसीबत मोल लेने जैसा था . उस गांव मे कई लोगों को मैने मुंह बांधे देखा था . ट्रैक्टर ड्रायव्हर लोकल था . उसने बताया की , यह लोग भालू के आक्रमण के भुक्तभोगी है . भालू बड़े बड़े नाखुनों से हमला कर नाक , कान , होठ , ऑंखें नोंच लेता है . यह बात सुनते समय ही सिहर उठा था मै खौंफ से ! 
रास्ते में दो नालें पडते थे . और गांववालों का कहना था की , भालू अकसर वहीं दिखाई देते है . बात यही खत्म नही होती ! हाल ही में इस जंगल मे एक बाघ का भी आतंक छाया हुआ था . 
ट्रैक्टर लोकल मजदूरों को घर छोडने गया था . और रात में ड्रायव्हर ट्रैक्टर को अपने घर लेकर जाता था . 
' साहब , जाना जरूरी है . स्टोर मे बाइंडिंग वायर और खिलें नही है . कुछ बासे का सामान भी लाना है . ' सुपरवाइझर ने कहा .
' बात तो सही है लेकीन स्कूटर से जाना ठीक नही रहेगा .' मैने कहा .
' साहब , हरी सब्जी भी ले आइएगा ...' खानसामा ने बाहर आते हुए कहा . 
' अरे , अभी जाने का पक्का नही है..' मैने कहा . 
' फिर अब सब्जी क्या बनाऊ ?' खानसामा ने मासुमियत से बोला . 
' गट्टा की या पापड की बना लो..' मैने कहा .
' बेसन भी नहीं और पापड ज्यादा नही है..' खानसामा ने अपनी ही धून में कहा . 
' चलो न साहब .... जल्दी जा कर आते है..' सुपरवाइझर ने बीच में ही तीर चलाया . 
' चलो...' मैने अनमने भाव से कहा . 
स्कूटर की हेडलाईट भी लालटेन जैसी ही थी . साइट से मुख्य सडक तक खदान की पीली मिट्टी डाल कर कच्चा रास्ता बनाया था . मिट्टी में धंसते - फिसलते हुए मुख्य सडक पर आए . गांव पहुंच कर सामान लिया और लौटे . पहला नाला आते ही भालू याद आया . अंधेरी रात..‌ घना जंगल.. सिर के ऊपर केवल सडक जितना ही आसमान , बाकी घना अंधेरा ! जैसे तैसे नाला पार किया . कुछ आगे गये ही थे की , स्कूटर पंक्चर ! बस् , यही एक मुसीबत बाकी थी ! अब पीछे तो जा नही सकते थे . हेडलाईट के लिए स्कूटर चालू रखा और स्कूटर को पैदल खिंचना शुरू ... पंक्चर होने से खिंचते समय नानी याद आ रही थी . हम दोनों धीरे धीरे बतिया रहे थे . 
अचानक सुनसान जंगल मे सन्नाटे को चीरती हुई बाघ की दहाड गुंजी.. उस दहाड से हमारा रोम रोम कांप उठा . सुपरवाइझर की हालत तो ज्यादा ही खराब थी . वो पहले स्कूटर को पीछे से धकेल रहा था.. वह अब मेरे पीछे साइड मे आया और बाजू से धकेलने लगा . उसके मुंह से शब्द नही फूट रहे थे . डर ने हमें भीतर तक हिला दिया था . दिमाग ने सोचना भी बंद कर दिया . अब क्या होगा ?        ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, June 14, 2022

इंद्रधनुष्य ( मराठी कविता ). Marathi language _ मराठी भाषा

इंद्रधनुष्य
Marathi language _ मराठी भाषा

लुप्त वैशाख वणवा
सुप्त ढग पाझरले
मृद्गंध परिमळ
तनामनात झरले ।१।

मृगसरीच्या स्पर्शास
मृग नाहक झुरले
कस्तुरीच्या सुगंधास
काळ्या मातीत पुरले ।२।

साद आर्त पाखरांची
नाद तृषार्त विरले
चिंब शीळ रानीवनी
देहभान विसरले ।३।

निळे सावळे आभाळ
मेघ काळे उतरले
कनवाळू पावसाच्या
जग मायेत तरले ।४।

नवसृजन सोहळा
उद्भव अवतरले
जळबिंदूच्या कपाळी
इंद्रधनुष्य उरले ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, June 13, 2022

भोयरी संस्कृति - ४५ : बड सावितरी

भोयरी संस्कृति - ४५ : बड सावितरी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

वटमूले स्थितो ब्रम्हा वटमध्ये जनार्दन: ।
वटाग्रे तु शिवो देवो देव: सावित्री वटसंश्रिता ।।

जेठ मह्यना की पुनो ला सवासिन बाई बड सावितरी को वरत करस . उत्तर भारत म इ वरत जेठ मह्यना क अवस ला करस . भोयरी संस्कृति म बड , पिपर , उम्बर , आम्बा , जाम्भुर क झाड को घाडो महत्त्व स . झाड झडुला म देव को बास रव्हस , असी मान्यता स . बड क मूरी म भगवान बरमा जी , खोड म भगवान बिस्नु जी अन् फानटीना ( डंगाल ) म भगवान महादेव को निवास स , असी बी मान्यता स . झाड झडुला क पूंजा कन् वून ला कोनी तोडत नी . 
बड क झाड ला अमर मानस . बड को झाड डंगालना की मूरी बनायकन् खूब बाहाडस . बड सरीखोच आपरो सुहाग अखंड रह्या पायजेन , घर संसार नाती नतरा - धनधान कन् फल्या फुल्या पायजेन _ येनअ सरधा को इ मोठो साजरो तिवार ! 
बड सावितरी की कथा : महाभारत क वनपर्व म सत्यवान सावितरी की कथा स . भद्र देस को राजो अस्वपति आन् रानी मालवी नि:संतान होता . माय सावितरी की किरपा कन् वून ला पोटी भयी . माय क नाव परीन वोको नाव धऱ्यो - सावितरी . सावितरी दिसन ला मोठी साजरी आन् गुनवान होती . चंदर क सरीखी वा मोठी भयी . सावितरी न अंतरमन कन् सत्यवान ला आपरो लाडो मान्यो . शाल्व देस क अंधरा राजा धृमत्सेन को सत्यवान इ पोरग्यो . लढाई म हाऱ्या कन् अंधरअ माय बाप संगअ सत्यवान जंगल म रव्हत होतो . माय बाप आन् नारद मुनी न सावितरी ला खूब समझायो पर सती सावितरी आपलअ बानी पर अडीती . नारद मुनी न सांगे क , सत्यवान आबअ येकच साल बाचेन . पर सती सावितरी को इरादो नी बदल्यो . बिह्या कर कन् वा लाडा संग जंगल म रव्हन लागी . अंधरअ सासू ससरा आन् सत्यवान की सेवा करत रही . सत्यवान क आयुक्स्य का तीन दिन बाच्याता . तब पासीन सावितरी न उपास धर कन्  वरत कऱ्यो . जंगल म इंधन काडी तोडन क बेरा सत्यवान ला चक्कर आयो . यमराज सत्यवान को जीव लिजान साठी आयो . सती सावितरी यमराज क पासअ पासअ जान लागी . यमराज न वोला घाडो समझायो , पर वा नी मानी . थक हार कन् यमराज न वोला तीन वरदान मांगन ला कह्यो . सती सावितरी न पह्यलो वरदान मांग्यो _ म्हरअ सासू ससरा क डोरा कन् दिसन दे . दुसरो वरदान मांग्यो _ वून को राजपाट वापिस देव . तीसरो वरदान मांग्यो _ मला संतान सुख भेट्या पायजेन . यमराज न कह्यो - तथास्तु ! सती सावितरी बोली क , लाडा बिगर पोटूना कसा होयेन ? यमराज आपलअ च बचन म फस गयो . आन् सत्यवान को जीव वापिस कऱ्यो . या घटना बड क झाड खलतअ घटी . सती सावितरी क पुन्य कन् सत्यवान को जीव बाच्यो आन् वूई सुख कन् नांदन लाग्या . 

भोयरी रितीरिवाज : कोनी सवासिन बाई तीन दिन को उपास धरस त कोनी जेठ मह्यना की बड पुनव क दिन च उपास धरस . सोरा सिंगार कर कन् बड की पूंजा करन साठी जास . या पेरनी की घात रव्हस . गहू की वटी , आम्बा , कच्चो सूत , तूप को दिवो - दिवनाल , कपडो , बिडा का पान , नारेल , फुल - अकसिद - हरद कुकू , आरती लेकन पूंजा करन साठी जास . कापूस को सूत वर कन् वोकअ सात गाठ ला हरद लगावस . बड की पूंजा करस . वोला वटी वाहस .  कच्चो सूत / मोली  हात म लेकन बड क झाड ला सात फेरा मार कन् वोला सूत गुंडारस . कमस कम पाच सवासिन बाई की वटी भरस .
लाडो , पोटूबाटूना , घर परपंच क सुख संग च धरती माय क अखंड हिवरअ स्यालू की कामना को इ खूब साजरो तिवार . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

खादोल ( वऱ्हाडी कविता ). varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

खादोल
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

पाडावर आला आंबा
त्याच्यावानी गोड नायी
खादोलीच्या चवीले त
अमरीत तोड नायी ।१।

मायचा पालव सर्ग
त्याले कोनी जोड नायी
सुद्यासाठी टेनपनं
कायी मारझोड नायी ।२।

मायबापाच्या रस्त्याले
कुठून बी मोड नायी
जरे धडधड सप्पा
जगी असा खोड नायी ।३।

जिंदगीभर दे छाया
बापावानी झाड नायी
कुठं बी घरासरखं
मायेचं रफाड नायी ।४।

आसीरवादाचा हात
मतलब आड नायी
बरसते चारी कार
उलीसी उघाड नायी ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, June 11, 2022

दीठ ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

दीठ
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

दुख दवडी ला भारी
आट्यो घटी म च पीठ
लागी नजर बुहारी
कसी काढबोन दीठ ।१।

घुप अंधारो नसीब
अगास बी कारोकिट
भयो नांदतअ गाव को
बापा सुनसान रीठ ।२।

भयी जिंदगी की वारी
हर रोज पायपीट
आबअ हलाव इट्ठल 
पाय खलतअ की इट ।३।

जीव आदमुस्या आयो
रोज आवस गा झीट
म्हरी अलोनी जिंदगी
सऱ्यो आसू को बी मीठ ।४।

आस सास उखड्यास
आबअ आखरी की बाट
रामनाम को गजर
धाम समस्यान घाट ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, June 10, 2022

रीठ ( वऱ्हाडी कविता ). varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

रीठ
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

दुख दवडीचं भारी
जात्या आटलं गा पीठ
असी लागली नजर
कसी काढाव बा दीठ ।१।

सारा अंधार भोगाले
अगास यी काराकिट
झालं नांदत्या गावाचं
देवा सुनसान रीठ ।२।

झाली जिंदगीची वारी
रोज रोज पायपीट
आता हालव इट्ठला
पायाखालची गा इट ।३।

जीव आदमुस्या झाला
येते रात दिस झीट
माही अलोनी जिंदगी
सरे आसवाचं मीठ ।४।

आस सास उखडले
आता आखरीची वाट
रामनामाचा गजर
धाम समस्यान घाट ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, June 8, 2022

ताप ( हिंदी कविता )

ताप
Hindi language _ हिंदी भाषा

रोज सिमटता रहा
कैसे अपने आप में
पहले मिटता रहा
विवेकी अनुताप में ।

तब उलझ रहा था
तकलीफ के खाप में
अब झुलस रहा हूं
गणतंत्र के ताप में ।

आम हरदम आम
सत्ता के अनुपात में
सपने बेदम खास
हर गिरते पात में ।

कभी तो शीतल चांद
सुधा पिलाये ताप में
कभी तो विकल मांद
हमें सुलाये नाप में ।

लुप्त सत्य की रोशनी
हरिश्चंद्र के शाप में
अश्वत्थामा पीछे शनि
गर्भनाश के पाप मे ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, June 3, 2022

फाटला अगास ( वऱ्हाडी कविता ). varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

फाटला अगास
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

असा करमाचा खेल
सारा फाटला अगास
उसवले नाते गोते 
लागे जिंदगीचा फास ।१।

ताल तितंबा पोट्याचा
बेजा त्यायचा तरास
घर फेराचा कायनं
झाला कवलाचा नास ।२।

घात पेरनीची आली
नाकी मातीचा सुवास
बीजाईचं डंडेगान
खुंदे उधारीचा तास ।३।

पीक गांजलं तनानं
उपवली सारी आस
फेर निंदन - डवरा
तरी माजला रे कास ।४।

झड आसवाची ओली
झाला मालकाचा दास
सरनाले ढोसासाठी
हाये तिरडीचा बास ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

निर्माण - भाग ८. hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण - भाग ८ 
 Hindi language _ हिंदी भाषा

दोपहर १ बजे वापिस सुपरवाइझर दौडा दौडा ऑफिस आया . 
' साहब , बडे साहब आए है . बहुत गुस्से में है और काम भी बंद कर दिया हैं .. आपको बुलाया है साइट पर...' सुपरवाइझर ने कहा .
' ठीक है , चलो .' मैने कहा . 
साइट पर काम बंद था . मजदूर बैठे थे . मुझे देख कर ही बडे साहब का गुस्सा फूट पडा . 
' मैने काम रोकने के लिए बोला था , फिर काम कैसे चालू रखे ?' बडे साहब ने तमतमाते हुए कहा . 
' लेकीन काम क्यों बंद रखना है , यह तो मुझे पता होना चाहिए ! ' मैने संयत स्वर में कहा . 
सुपरवाइझर को मैने कहा की , मजदूरों को खाना खाने की छुट्टी दे दो . 
' मैने बोला था काम रोकने के लिए... कारण की क्या जरूरत है ?' बडे साहब ने उंची आवाज में कहा . 
' मेरे पास पहले ही समय की कमी है .‌‌... आपने बोला ठीक है , लेकीन कारण बताने में क्या हर्ज है ?' मैने कहा .
' तुम उंची आवाज में बात कर रहे हो...' बडे साहब ने गुस्से से कहा .
' नही सर , मै नॉर्मल आवाज में बात कर रहा हूं ... आप उंची आवाज में बात कर रहे है..' मैने कहा .
बडे साहब गुस्से से आग बबूला हो गये . 
' मेरी बात का कोई महत्त्व नही ?' बडे साहब ने बोला .
' आपकी बात का महत्व है ... लेकीन कारण बताने में क्या परेशानी है ?' मैने पूछा . 
बडे साहब मेरे बर्ताव से बेचैन हो गये . 
' सर कारण बताइए , मै अभी तुरंत काम रोकता हूं . और कोई समस्या है तो उसका समाधान खोजने की पुरी कोशिश करूंगा .' मैने शांत स्वर में कहा .
साहब नरम पडे .
' GM साहब बोल रहे थे की , आपका सेप्टिक टैंक प्ले ग्राउंड की सीमा में है ...' बडे साहब ने कारण बताया .
' यह बात है ? आप चिंता न करे.. मै एक घंटे के भीतर प्ले ग्राउंड की सीमा मार्क करता हूं . फिर आप देख लिजीएगा .' मैने कहा .
' ठीक है..' बडे साहब बोले .
मैने सुपरवाइझर को स्पोर्ट्स इन्चार्ज को खोजने के लिए भेजा . आधे घंटे में स्पोर्ट्स इन्चार्ज आए . मैने समस्या बताई . हम ने टेप से नाप कर ग्राउंड की बाउंड्री मार्क की . मै बडे साहब के ऑफिस गया और उन्हें ले कर साइट आया . सेप्टिक टैंक बाउंड्री से १५ फीट बाहर थी . 
' ठीक है सर ?' मैने पूछा .
' हां ठीक है...' बडे साहब ने कहा .
मजदूर भी खाना खा कर आए थे . काम फिर से शुरू हुआ .
( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, June 2, 2022

अजब गजब - ९४ : वांकल माता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९४ : वांकल माता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

राजस्थान को पाकिस्तान सरहद ला लाग्यो जिलो स बाडमेर . बाडमेर क चौहटन तहसील म ढोक नाव को गांव स . यहान क कारअ भूरअ हरनी पहाड ( हिरण डुंगर ) आन् रेती क टिब्बा मंझार पांढरफट संगमरमर पर बेजोड नक्कासी वालो "  विरातरा धाम "  स . इ धाम बाडमेर पासीन ५५ कि.मी. आन् चौहटन पासीन १० कि.मी. दूर स . 
विरातरा धाम वांकल माय को ठानो ! वांकल माय का च वकरांगी , विरातरी , वकरायी , वांकूल , विरातरा , वांकल माता असा बी नाव स . राकसना को नास करन क बेरा माय की भंगिमा वक्र रव्हस . तेकन च ' असुरसंहारिणी " की गरदन टेढी रव्हस ! टेढी गरदन क कारन च माय को नाव पड्यो , ' वांकल माता विरातरा ' . 
यहान पहाडी ( भूरा भाखर )  क पायथा जवर खूब मोठो अन् साजरो इ देऊर स . आन् ११०० फीट उच्ची येनअ पहाडी पर स गढमंदिर आन् ठंडो पानी को कुंड . चोटी पर च आदुपुरा गुफा, पुरानो विरातरा देऊर , वैरथान माता मंदिर स . यहान क कुंड म बाराईकार पानी रव्हस . येनअ पहाडी पर चेंगन साठी १५५ पायरीना स . देऊर क चारी आंग खूब मोठो ' ओरण ' ( देवराई ) स . 
इतिहास अन् मान्यता : * वांकल माता भगवान बरमा जी की दत्तक पोटी स , असी मान्यता स .
 * देऊर क सिलालेख म इतिहास की जानकारी देईस . २००० साल पह्यले समराट विक्रमादित्य न पर मुलुख का हमलावर स्यक लोगना ला हारायो . आन् तब पासीन बिकरम संवत् सुरू कऱ्यो . येनअ युद्ध क बाद समराट विक्रमादित्य न सुदूर बलुचिस्तान पर विजय अभियान कऱ्यो . बलुचिस्तान क मकरान पहाडी म हिंगलाज माय को स्यक्तिपीठ स . यहान सति को मस्तक पड्योतो . राकस लोगना को नास करन साठी समराट विक्रमादित्य न हिंगलाज माय को आसीरवाद लेयो . आपरो विजय अभियान सफल करन क बाद समराट विक्रमादित्य न माय हिंगलाज की आराधना करी आन् माय ला कह्ये क तुमी आमारअ संग उज्जैन ला चालो . माय न कह्ये क , म्हरो आवनो नी होत . तुमी म्हरअ स्यक्तिपीठ ला लिजावो . पर येक अट स क , तुमी पासअ नी देखन को . अगर तुमी न पासअ देख्यो त , मु वहान च थांबून . 
* समराट विक्रमादित्य आन् लाव लस्कर हिंगलाज माय की मूरती लेकर वाहासिन निकऱ्या . ढोक गांव जवर दिन बुड्यो . या जागा मुक्काम करन साठी साजरी होती .यहान समराट विक्रमादित्य न रात कन् आराम कऱ्यो , तेकन जागा को नाव पड्यो , ' विरातरा '! रात कन् राज्या न मूरती ला आदुपुरा गुफा म धरीती . सकारी राजा ला दिस्या को भरम भयो आन् गलती कन् पसचीम म देख्यो . तब आकासवानी भयी , आब म्हरी थापना यहान च होयेन . राजा न वांकल माय की वहान च थापना करी आन् देऊर बांध्यो . 
* इ.स. १७५२ म जयसलमेर को राज्यो महारावल अमरसिंग न यहान वीर घंटा चढाई . 
* वांकल माता का पूजारी पवार राजपूत च स . 
* वांकल माय को येक देऊर उमरकोट ( पाकिस्तान - सिंध )  म बी स . 
* सिंध इलाखा सिन भोयर समाज को सम्बन्ध दुय हजार बरस पह्यलअ पासीन च स . 
 * वांकल माय ला हिंगलाज माय को च रूप मानस . 
मेला : * विरातरा धाम ला साल म तीन बेरा मेलो भरस . चईत , माघ , भादवा मह्यना क उजरी ( चांदन्यो ) १३ , १४ , १५ तिथि ला यहान मेलो भरस . मेला म दूर दूरीन भगत आवस . 

वांकल माय की आरती

जय वांकल माता , मैया जय वांकल माता ।
सब के घर में बिराजे , सुख सम्पति दाता ।।
ॐ जय वांकल माता ।टेर।
कोई कहे बंकेसवरी , कोई कहे बीसल माता ।
वांकल नाम से पुकारे , तू ही खडक माता ।।
ॐ जय वांकल माता ।
दीपली भाखरी में बिराजे , उम्मेदनगर में आता ।
एक बार दर्शन से , मन शान्ति पाता ।।
ॐ जय वांकल माता ।
हमारे घर की देवी , तू ही कुलदेवी माता ।
नवमी को जो पूजे , दुःख नही भरमाता ।।
ॐ जय वांकल माता ।
दया करो हे देवी , हमें कुछ नही आता ।
हम तुम्हारी शरण में , तुम ही कृपा दाता ।।
ॐ जय वांकल माता ।
वांकल माता जी की आरती , जो नियमित गाता ।
माताजी की शक्ति से , भक्ति मुक्ति पाता ।।
ॐ जय वांकल माता ।
जय वांकल माता की .
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर