निर्माण - भाग ९
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रोज कोई न कोई छोटे - मोटे काम के लिए पास वाले गांव जाना ही होता था . जीप खराब थी . सुपरवाइझर बोला की , स्कूटर से जाएंगे . रात के समय इस जंगल से गुजरना ; मुसीबत मोल लेने जैसा था . उस गांव मे कई लोगों को मैने मुंह बांधे देखा था . ट्रैक्टर ड्रायव्हर लोकल था . उसने बताया की , यह लोग भालू के आक्रमण के भुक्तभोगी है . भालू बड़े बड़े नाखुनों से हमला कर नाक , कान , होठ , ऑंखें नोंच लेता है . यह बात सुनते समय ही सिहर उठा था मै खौंफ से !
रास्ते में दो नालें पडते थे . और गांववालों का कहना था की , भालू अकसर वहीं दिखाई देते है . बात यही खत्म नही होती ! हाल ही में इस जंगल मे एक बाघ का भी आतंक छाया हुआ था .
ट्रैक्टर लोकल मजदूरों को घर छोडने गया था . और रात में ड्रायव्हर ट्रैक्टर को अपने घर लेकर जाता था .
' साहब , जाना जरूरी है . स्टोर मे बाइंडिंग वायर और खिलें नही है . कुछ बासे का सामान भी लाना है . ' सुपरवाइझर ने कहा .
' बात तो सही है लेकीन स्कूटर से जाना ठीक नही रहेगा .' मैने कहा .
' साहब , हरी सब्जी भी ले आइएगा ...' खानसामा ने बाहर आते हुए कहा .
' अरे , अभी जाने का पक्का नही है..' मैने कहा .
' फिर अब सब्जी क्या बनाऊ ?' खानसामा ने मासुमियत से बोला .
' गट्टा की या पापड की बना लो..' मैने कहा .
' बेसन भी नहीं और पापड ज्यादा नही है..' खानसामा ने अपनी ही धून में कहा .
' चलो न साहब .... जल्दी जा कर आते है..' सुपरवाइझर ने बीच में ही तीर चलाया .
' चलो...' मैने अनमने भाव से कहा .
स्कूटर की हेडलाईट भी लालटेन जैसी ही थी . साइट से मुख्य सडक तक खदान की पीली मिट्टी डाल कर कच्चा रास्ता बनाया था . मिट्टी में धंसते - फिसलते हुए मुख्य सडक पर आए . गांव पहुंच कर सामान लिया और लौटे . पहला नाला आते ही भालू याद आया . अंधेरी रात.. घना जंगल.. सिर के ऊपर केवल सडक जितना ही आसमान , बाकी घना अंधेरा ! जैसे तैसे नाला पार किया . कुछ आगे गये ही थे की , स्कूटर पंक्चर ! बस् , यही एक मुसीबत बाकी थी ! अब पीछे तो जा नही सकते थे . हेडलाईट के लिए स्कूटर चालू रखा और स्कूटर को पैदल खिंचना शुरू ... पंक्चर होने से खिंचते समय नानी याद आ रही थी . हम दोनों धीरे धीरे बतिया रहे थे .
अचानक सुनसान जंगल मे सन्नाटे को चीरती हुई बाघ की दहाड गुंजी.. उस दहाड से हमारा रोम रोम कांप उठा . सुपरवाइझर की हालत तो ज्यादा ही खराब थी . वो पहले स्कूटर को पीछे से धकेल रहा था.. वह अब मेरे पीछे साइड मे आया और बाजू से धकेलने लगा . उसके मुंह से शब्द नही फूट रहे थे . डर ने हमें भीतर तक हिला दिया था . दिमाग ने सोचना भी बंद कर दिया . अब क्या होगा ? ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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