Thursday, June 30, 2022

यादें _ सवाल की ! Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें , सवाल की ! 
Hindi language _ हिंदी भाषा

हरदम कुलबुलाता दिमाग मे एक सवाल . मेरी भागती जिंदगी के पीछे पीछे दौडता यह सवाल ... वास्तव से नजदीक , श्रध्दा के पास लेकीन भावना से दूर यह सवाल . अपने आप में गुत्थमगुत्था सवाल . ......
' भाई , आखिर सवाल कौन सा है ? ' पीछे से एक सवाल उछल कर मंच पर आया . 
' दोस्तों , सवाल है - प्रयत्न श्रेष्ठ या भाग्य ? ... जो बचपन से पीछा कर रहा है मेरा ! ' मैने जिज्ञासा का अंत करते हुए कहा .
' हम्म्म....' सवालकर्ता ने आश्चर्य और निराशा को एक साथ घोल कर बोला . 
बात है  सातवी कक्षा की . तहसील में हमारी स्कूल सबसे बडी . कक्षा पॉंचवी से बारहवी तक A , B , C, D , E , F ऐसे छह सेक्शन थे . हमारे स्कूल मे हर महिने कुछ ना कुछ स्पर्धा , विविध परीक्षा होती रहती थी . हमारा तो अलग ही ठाठ था . मै कोई भी स्पर्धा / परीक्षा के लिए अपना नाम नही लिखवाता था . आखरी दिन संबंधित शिक्षक मुझे बिना पूछे , मेरा नाम दर्ज कर देते थे . अपुन तो टेन्शन लेतेच नही थे ! जो उचित लगता , वह बोल / लिख कर आ जाता था...
बात सातवी कक्षा की हो रही है.. स्कूल छूटने के बाद मै अपनी ही धून घर जा रहा था . स्कूल के मेन गेट पर फालके सर ने मुझे पकडा . मराठा महासंघ ने तहसील स्तर पर वादविवाद स्पर्धा का आयोजन किया था . फालके सर तहसील के हर स्कूल जा कर स्पर्धकों के नाम लिख रहे थे . 
' तुझं नाव टाकले आहे स्पर्धेसाठी ... उद्या स्पर्धा आहे . कळलं ! ' सर ने कहा .
' सर , विषय काय आहे ? ' मैने पूछा . 
' प्रयत्न श्रेष्ठ की भाग्य ? ' सर ने बताया . 
' सर , मी प्रयत्न कडून बोलणार ..' मैने कहा . 
' नाही . अख्ख्या तहसील मधून फक्त ६ विद्यार्थी तयार झाले भाग्य विषयावर बोलायला . ७० विद्यार्थी प्रयत्न वर बोलणार आहे . तू भाग्य ह्या विषयावरच बोलायचे आहे.. नाही तर स्पर्धेला अर्थ काय ? ' सर ने अपनी समस्या बताई . 
' पण सर , मी भाग्यावर काय बोलणार ? ' मैने कहा . 
' तू काहीही कर.. तुला भाग्यावरच बोलायचे आहे..' सर ने कहा . 
' तुमचा आग्रहच असेल तर एक काम करा , मला सर्वात शेवटी बोलवा ..' मैने कहा . 
' ठीक आहे..' सर ने कहा . 
सर मेरी बैंड बजा कर चले गये . मै भाग्य इस विषय पर सोचते सोचते घर पहुंचा . दिमाग का दही बन गया था पर ढंग के मुद्दे नही सूझ रहे थे . फिर ट्यूब लाइट जली . मराठी के शिक्षक देशमुख सर याद आये . उन का घर काफी दूर था . मै पैदल ही उन के घर पहुंचा . उनका छोटा भाई हमारे ही स्कूल में था.. सिनियर भी था . मैने आने का कारण बताया . वह ठहाके मार कर हंसने लगा . बोला _ यह विषय क्यों लिया ? 
' भाई विषय मैने नही चुना . फालके सर ने जबरन थमाया है..' मैने कहा . 
' इस बार तो तू गया ....  सर बाहर गये है , तुम घर जाओ . ' उसने हंसते हंसते ही कहा . 
एक ही उम्मीद की किरण थी ! अब क्या करे ? _ मेरे सामने यक्षप्रश्न !  ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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