Monday, January 31, 2022

सी को कह्यर ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सी को कह्यर
( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

हात पाय ठाठऱ्या गो
सेकूस आगटी क जवर
बरफवानी ठंडी सातरी
चेता चेता च राम पह्यर ।१।

बांध्या कानपट कस कन्
दुय दुय घाल्यास सूटर
रात कन् आवस लयीन
चालू करन की स मोटर ।२।

पह्यलच करोना को भेव
वोमअ सी को बाहाडे कह्यर
आंग पाय भया पुरा ठंडा
सरदी खोखला की लह्यर ।३।

कफ त बाहाडे च बाहाडे
सुई गोली देस डाकटर
आसुक न बी माऱ्योच हात
बाची - खुची निकारी कसर ।४।

फुट्या हात पाय उल्यो मुंडो
सी न करीस असी खातर
पुस्या इतवार येता पूंज्या
देनअ बापा सी की मातर ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, January 28, 2022

अजब गजब - ८६ : मठ ख्याला , जयसलमेर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ८६ : मठ ख्याल , जैसलमेर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पवन ही जोग पवन ही भोग , पवन इ हरै छतीसौ रोग ।
या पवन कोई जाणे भव् , सो आपे करता आपे दैव ।
ग्यान सरीखा गिरु ना मिलिया , चित्त सरीखा चेला 
मन सरीखा मेलु ना मिलिया , ताथै गोरख फिरै अकेला ।।

राजस्थान क जयसलमेर जिला म म्याजलार पासीन ८ कि. मी. दूर , भारत - पाकिस्तान हद जवर मठ ख्याला स . जयसलमेर पासीन ११० कि. मी. दूर येन मठ ख्याला की किरती दुनिया भर म स . मध्य जुग म खूब बाहाडे नाथ संप्रदाय को इ येक पावन तीरथ ! 
परमार वंसी सोढा राजपूत क आस्था को इ मुख्य केंद्र स . भाटी राजपूत , सिंधी लोहाणा अन इलाखा क लोगना को सरधा को मठ ख्याला भारत आन् पाकिस्तान म घाडो परसिध्द स . 
# इतिहास अन् मान्यता : * मठ ख्याला की आदिगद्दी को स्थान रतेकोट , जि. सांघड , सिंध - पाकिस्तान म स . 
* बि. स. १८८५ म सोढा सरदार क संग गुरू सेहजनाथ जी बयसाखी तीरथ , जयसलमेर यातरा पर रतेकोट ( पाकिस्तान ) सिन आयाता . नाथजी की महिमा आयक कन् भाटी महारावल वून क दरस्यन साठी आया . राज म दुय साल पासीन अकाल पड्योतो . राजा न कह्ये , ' नाथजी किरपा करो .'  नाथजी क सिध्दी कन् राज म बरसाद भयी ... अकाल मिट्यो . तब म्याजलार म धूणा की थापना भयी . 
* इ.स. १९७१ क भारत - पाकिस्तान लढाई म पाकिस्तान क फऊज न मठ ख्याला पर हमलो कऱ्यो . मठ क धूणा म को चिमटो काहाडन की कोसिस करी . चिमटो त जागा पर च रह्यो , पर वोम का कयी सयनिक अंधरा भय गया... भगवान भोलेनाथ की लीला देख कन् बाकी बाच्या खुच्या सयनिक असा भाग्या क दुनन वून न पासऽ मुड कन् बी नी देख्यो . 
* मठ ख्याला क गादी प महंत सेहजनाथ , महंत सच्चानाथ , महंत सूरजनाथ , महंत शंभूनाथ , महंत बादलनाथ भया . आब महंत गोरखनाथ स . 

# मठ रतेकोट ( पाकिस्तान ) , मठ ख्याला क येक मठ बाडमेर म स . मठ की हरिद्वार ( भारत ) अन् गड हिंगलाज ( सिंध - पाकिस्तान ) म धरमस्याला स . 
# मठ ख्याला किला सरीखो मोठो आन् पिवरऽ दगड कन् बांध्येस . कयी कमरा अन् हॉल स . मठ ख्याला म गौशाला , उंट - घोडा बी स . 
# मठ ख्याला म चन्दा को रिवाज नहाय . जे ला जी दान करन को होयेन वू करो ... ना लिखापढी ना परचार ! 
# मठ ख्याला म आवनी वाला भगत की रव्हन , खान - पेन की येवस्था मठ किथिन मुफत म होस . 
# महासिवरातरी पासीन च्यार दिन को यहान मेलो भरस . अमरकोट - सिंध ( पाकिस्तान ) पासीन त भारत क कोना कोन्टा मिन हजारो भगत लोग दरस्यन साठी आवस . च्यार दिन  महापरसाद , भजन - किरतन को गजर रव्हस . 
# धुड्डी ( धुलेंडी ) क दिन मठ ख्याला म स्नेह मिलन को आयोजन होस . 
जय आदिनाथ.. जय भोलेनाथ... हर हर महादेव....

( सहयोग : इंजि . जालम सिंह सोढ़ा , जोधपुर ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, January 21, 2022

अजब गजब - ८५ : मांडू म पर्व को मांडो. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ८५ : मांडू म पर्व को मांडो
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मांडू ( मध्य प्रदेस ) की थापना ६ व सदी म भयी , असी मान्यता स . ८ व सदी सीन १३ व सदी वरी मांडू आन् मालवा पर परमार वंस को राज होतो . वोन बेराच यहान कला अन् साहित्य को फयलाव बाहाडे . 
मांडू ला च मांडवगड , मंडपदुर्ग , मंडपाचल , मंडपगिरी , मंडपाद्री , मंडपशैल असा नाव बी स . 
मांडू ला मध्य भारत को कास्मिर कोस . समुंदर क पातरी पासीन ६३४ मीटर उच्ची , १०९ चवरस कि .मी. आराजी को , विंध्य क येक आखरी सेला प बस्ये मांडू ला परमार राज की राजधानी होती . आराजी क हिसाब कन् मांडू किल्लो आसिया म पह्यलऽ नंबर प स . 
धार - मांडू या आपली वयभलस्याली विरासत स . तेक साठी च इ.स. २०१० पासीन " धार - मांडू दरस्यन यातरा " की चलन बी पाडीती . आब लोगना खुद होय कन् च वहान जावन ला लाग्यास , या खूसी की बात स . 
मांडू म ३० डिसेंबर २०२१ पासीन ३ जानेवारी २०२२ वरी पाच दिन , मध्य प्रदेस सरकार क ' राज्य पर्यटन विकास महामंडल ' न ' मांडू महोत्सव ' भराये . अलम दुनिया म मांडू को डंको बाजे पाह्यजे , तेक साठी मांडू को इतिहास , संस्कृति , बेगबेगरी कला , खेल - तमास्यो  , खानपान  , गाव खेडा की जिंदगी असऽ नाना रूप को मांडो च यहान डायेतो . येन पाच दिन क संस्कृति मेला म महाराष्ट्र , गुजरात , मध्य प्रदेस असा कयी राज्य क लोगना न खुद होय कन् च मोठऽ परमान म हाजरी लगायती . पुरानऽ साल की बिदाई आन् नवऽ साल को स्वागत , असो साजरो संजोग येन महा मेला मिन जुड्यो . 
हॉट येयर बलून , सायकलिंग टूर , हेरिटेज अन् मांडू इंस्टाग्राम टूर , तंबू ( कनात ) म रव्हन को अनुभव , कला - शिल्पकला , नाच - गानो , खानपान  , गाव खेडा को रहन सहन , साहसिक खेल , मांडू क वयभव ला देखनो ... येतरा सारा की रेलचेल होती . 
रेवा कुंड पर नरबदा माय क आरती कन् पुरो इलाखो भाराय गयो . फ्यासन सो म मोठी मोठी कंपनी आयीती . धार जिला म क नाच - गानो आन् संगीत लोगना ला घाडो च साजरो लाग्यो . डायनासोर पारक म रात कन् चान्नीना देखन की मजा आयी . 
४०० पासीन ६०० चवरस फुट नाप का ६५ तंबू यहान आवनी वाला साठी बनायाता . 
मांडू महोत्सव को उद्घाटन म . प्र . की पर्यटन मंतरी उषा ठाकूर क हात कन् भयोतो . 
मध्य प्रदेस सरकार क येन संस्कृति जतन क रंगारंग महोत्सव अन् काम ला दुय हात जोड कन् नमन !

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, January 13, 2022

पुन्य सलिला ( सरोसती ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पुन्य सलिला ( सरोसती )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

इमं मे गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्णा असिक्न्या मरूदूधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमयां ।
_ ऋग्वेद : नदी सुक्त

नदी दवडस - धावस पहाड परीन खलतऽ , कुदत - फांदत सीधी उतार परीन बेपरवा नान्ही सी भोरी पोटी सरखी ! वोक कलकल क हासन को आवाज भरमावस आपरंगच . देऊर क घंटी को नाद गुंजस वोकऽ पायपट्टी वानी . वा लाजस आन् चाल पडस आघ किलोल करत आपलच मस्ती म.. आपलच धुंद म .
येकदम कोचंबस वा आघ पहाड क खलतऽ को लवन देख कन् .... जवान पोटी वानी वा ठीकठाक करस खुद ला आन् येक येक पाय धरस मोठऽ सलीका कन् .... अचंभा कन् देखस चारी आंग आपलऽ जोस ला लगाम लगाय कन् . वोला आदत नी होती असो चालन की . खेलकूद करती तरंगिनी होय जास उलिसी समझदार . तोड्डीना आब हलकी हलकी बाजस . जरासो वजन बी बाहाडेस वोको सायद . 
देखता - देखता रफाड म आय जास वा सरल सकवार पोटी . कयी सोबतीन , सखी - सहेलीना बी आय जास गोस्टीमाता करन साठी . संग चाल - चाल कन् मिर जास येक दुसरी म ..... साजरी आंग म भरस वा आपसूकच .... हरु हरु चालत जास गजगामिनी सरिता.... चारु चंदर क वानी सोरा कला वाली . 
मोठ - मोठा घाट आन् लोगना क भीड को मावरो पड जास तटिनी ला . इ सबन देख कन् माय वानी हिरदो भर कन् आवस तरनी को ...
येकदम गजब हुंकार आयकन ला आवस वोला . ... कादा - चिक्खल म धसत जास वोका पाय .... चिढ कन् बगर जास वोको पानी.... बुनत जास पानी को जारो . 
कोचंब कन् थांबस वा.... भेबारस बी येतरो मोठो समुंदर देख कन्.......
तडफड कन् मिर जास समुंदर ला... मजबूरी कन् . 
कवि कल्पना की लह्यरना नी देख सकत वोका आसू !
पर येला येक अपवाद बी स नदीतमा को ! आपलऽ मवजुदगी ला डाव पर लगाय कन् लुक गयी वा धरती माय क कोरा म .....
वेदवती को करम अन् धरम बी बेगरो पावन....
वेद स्मृति की महिमा मनभावन....
हरहवती.... माय सरोसती... अमरित पानी सरी उदकवती...
नी लवन नी मरन , पुन्य सलिला हे अन्नवती .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

पुण्य सलिला. Hindi language _ हिंदी भाषा

पुण्य सलिला
Hindi language _ हिंदी भाषा

इमं मे गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्णा असिक्न्या मरूदूधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमयां ।
_ ऋग्वेद : नदी सुक्त

नदी दौडती.. उछलती पहाडों से नीचे , कुदते - फांदते सीधी खडी ढ़लानों से बेपरवाह अल्हड किशोरी की तरह ! उस के कलकल की खिलखिलाहट मुग्ध कर देती है अनायास ही.... तीर्थ की घंटियों का निनाद गुंजते रहता उस की नुपूर जैसा . वह सकुचाती और फिर बढ़ जाती आगे अठखेलियां करते हुए . 
- अचानक ठिठक जाती है वह तराई को देख कर .... सोनजुही ठीकठाक करती अपने आप को और रखती है एक एक कदम बडी नजाकत से .... कौतुहल से निहारती है चारों ओर आवेग को लगाम लगा कर . आदत नही थी उस को ऐसा चलने की . उछल - कुद करती तरंगिनी थोडी समझदार हो जाती है . मंजीर अब धीमे धीमे बजती है... शायद वजन भी कुछ बढ़ गया है . 
देखते देखते मैदानी प्रदेश मे पहुंच जाती है मुग्धा ! कुछ सहेलियां भी आकर बतियाती है उस से ... साथ चलते चलते एकाकार हो जाती है एक दुसरे में .... स्थूलता बढ़ती जाती अपने आप .... हौले हौले मार्गक्रमण करती जाती गजगामिनी सरिता . चारु चंद्र की सोलह कलाओं से युक्त वह . 
विस्तृत घाट और लोगों की भीड की अभ्यस्त हो चुकी प्रवाहिनी . यह सब देख , मातृत्व की अनुभूति होती है तरिणी को....
- अचानक अलग ही हुंकार सुनाई देती है उसे ... गाद में धंसते जाते पैर ... झल्लाहट से बिखर जाती है उस की धाराएं.. बनाते जाती पानी का जाल ...
ठिठक जाती वह...सहम जाती वह... अर्णव की विशालता देख कर .कसमसाती वह समा जाती रत्नाकर मे... असहाय - सी.....
कविकल्पना की लहरें देख नही पाती उस के आंसू ! 

लेकीन एक अपवाद नदीतमा का ! अपने अस्तित्व को दांव पर लगा कर तिरोहित हो गयी धरती मॉं के आंचल मे... 
वेदवती का कर्म और धर्म भी निराला पावन..
वेद स्मृति की महिमा मनभावन...
हरहवती... मॉं सरस्वती... मधुर जल सरी उदकवती
न क्षार न क्षरण , पुण्यसलिला हे अन्नवती....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, January 9, 2022

नवो साल ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

नवो साल ( भोयरी कविता ) 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मोठी उम्मीद लेकन
आयो आयो नवो साल
वोमिकरान दिखाडे
रोज रोज नवो ताल ।१।

भयी दादा गारपीट
खसी घर की मयाल
सोयो गहू गऱ्या संतरा
कास्तकार गा बेहाल ।२।

दुय लाट आयी गयी
आबऽ तीसरी की चाल
असी भेबारी जिंदगी
भयो जगनो मुहाल ।३।

भेवाडस हर दिन
लेई लस गतसाल
जास घाव देय कन्
नवो भरोसा को साल ।४।

काय की येतरी बानी
काह्ये करस गो हाल
तोरा फुट्यास का डोरा
म्हरऽ इट्ठल गोपाल ।५।

मोह्यतूर ला च नाट
आब च येतरा हाल
न्हाय सहीन जोगती
बाचाडो जी महाकाल ।६।

लागी उठानी जिंदगी
सारो बह्यक्यो गा ताल
दुय ठेंब किरपा का
बापा मुंडा म त घाल ।७।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, January 4, 2022

सरवा - भाग २७. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

सरवा - भाग २७
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

पाह्यता पाह्यता आखरी सेमीस्टर आलं . सरवायनं इंटरनसिपसाठी कंपन्या पाहाले सुरवात केली . परभ्याचा इचार नाप्पूरातल्या कंपनीत इंटरनसिप कराचा व्हता . सुनील मुंबईत करनार व्हता . निधी आन् कनक अवरंगाबादलेच पाह्यनार व्हते , पन नायी जमलं त पुन्याले जानार व्हते . आता सारे सोबती फानोफान व्हनार व्हते . 
जीवाची चित्तरकथा बी अजबच हाये . कायी दिवस कुठं बी राह्यला क तिथंच अकुराले लागते . ... मोठा व्हते तिथंच्या मातीच्या मायत . फुटते नवे कोंभं... जलमते नव्या फानट्या ! आपरंगच पसारा वाहाडाले लागते . 
कितीक घाती येते न् जाते , पर येक मूर मातर पकडून राह्यतेच जलमगावच्या नारंची माती . दुसरीकडच्या पसाऱ्याच्या गुताड्यात किती बी हिलगलं तरी उलीसा का नसन , पन् जीव राह्यतेच गावात . सिकस्यन - पान्यासाठी , पोटासाठी सुटते गाव , पर सात - बारा वर राह्यतेच नाव ! 
हे गोस्टं त सिरफ साहाच मह्यन्याची व्हती . त्याच्या बाद बी त नवकरी - पान्यासाठी जिकडं भेटन तिकडं जा च व्हतं ! सिकस्यनाचे दिवस कंदी सरावच नायी , असं वाटते .... पर सरत्या येरले न् पान्याच्या धारंले थांबवनं आपल्या हाती थोडीच राह्यते . 
परभ्याले नाप्पूरातल्या येका कंपनीनं बलावलं . त्याले आता आपला बाड - बिस्तरा घिवून गावाले जाचं व्हतं . सुनील बदलापूरले गेलता . परभ्यानं दाआजीले अवरंगाबादले बलावलं . परभ्याले खूसी बी व्हती आन् दुख बी ! त्यानं नाप्पूरले जा चं हाये मनून फोन करून निधीले सांगतलं . निधीनं परभ्याले घरी बलावलं . झाक पडल्या थो निधीच्या घरी गेला . आज परभ्याले पाहुनचार व्हता . निधी गुपचापच व्हती . परभ्यानं निंगाच्या येरी निधीच्या माय - बाबाचे पाय लागले . 
' आठवण ठेवशील रे बाळा ...' निधीच्या मायनं येक क्यारीब्याग परभ्याले देत मनलं . 
' हे कशाला ?' परभ्यानं कोचमून मनलं . 
' असू दे..' निधीच्या बाबानं परभ्याची पाठ थापटत मनलं . 
निधी आन् परभ्याची झुंझुरकावरी च्याटींग चालू व्हती . दोघायचा यी जीव येकमेकात गुतला व्हता . सकारी - सकारी परभ्याचा डोरा लागला . 
दरवाज्यावर टकटक झाली . दरवाजा उघडला त् पुढं निधी ! परभ्यानं दरवाजा लावला तसी निधी त्याले बिलंगली आन् लडाले लागली . लोन्यावानी इरत गेली थे परभ्याच्या कवट्यात ! परभ्या त् पह्यले दांदरला . आता पावतर दोघायनं बी आपल्या मनाची गोस्ट मनातच लपवली व्हती , पर ताटातूटीच्या भेवानं दाबून ठिवली थे भावना येकदम उफांडून आलती . होठं मुके व्हते पन् डोऱ्यावाटं बरसून राह्यल्या व्हत्या थ्या दोघायच्या बी . परभ्यानं हरु हरु तिले थापटलं आन् कपाराचा मुका घिवून बसवलं . निधीचे डोरे झरझर गरून राह्यले व्हते . 
' निधी , रडू नकोस... अगं किती समंजस आहे तू... नेहमी तूच मला सांभाळून घेतलं , जपलं , समजावलं... माझी जिवलग आहेस तू आणि राहशील ... अगदी मृत्यूपर्यंत ! ' परभ्यानं निधीचे आसू पुसत पह्यल्या डाव आपलं मन उघडं केलं . 
परभ्याच्या तोंडावर बोट ठिवत नजरनच दटावलं तिनं . येकमेकाच्या खांद्यावर डोकसं ठिवून दोघं बी लडले पोटभरून ... दोघायचे बी खांदे वलेचिप झालते आसवायच्या गंगा यमुनानं ! वल्या गरम सासानं पिघरून गेले थे येकमेकात . दोघायनं बी जिंदगी भर संगंमंगं राहाची आन घेतली ‌. 
परभ्या पुस्तकं - सामान सुमान काहाडून निधीजवर देत व्हता आन् निधी खोख्यात , ब्यागमंदी बराबर भरत व्हती . आता सिरफ कपडेच भराचे राह्यले व्हते . 
निधीले घरून फोन आला . 
' प्रभाकर , मला जायला हवे . आईचा फोन आहे . आणि हो.. तुझ्यासाठी ही छोटीशी भेट .' निधीनं परभ्याले हातघडी देत मनलं .
' तूच घालून दे आता...' परभ्यानं मनलं . 
' तू पण ना...' निधीनं लाडानं रागावून मनलं . 
' Thank you....  थांब , तुझ्यासाठी पण एक भेटवस्तू आहे...' परभ्यानं पेंडट नेकलेस निधीले देत मनलं . 
' अहं... हे तूच घालून द्यायला हवे...' निधीनं मनलं . 
परभ्यानं निधीले आरस्यापुढं नेलं , आन् नेकलेस घालून देल्ला . 
' Thank you... चल येते मी... बाय..' निधीनं मनलं . 
' Welcome ...' परभ्यानं मनलं .
परभ्या गेट पावतर निधीले सोडाले आला . 
कायी येरानं परभ्याचे दाआजी आले . दोघं बी क्यांटीनमंदी जेवले . परभ्यानं कपड्याची ब्याग भरली . 
बसमंदी परभ्या रातभर झोपला नायी . याडमिसन पासून आजपावतरचे येकेक दिवस त्याच्या डोकस्यात घुमून राह्यले व्हते , थो मनानं अजून बी अवरंगाबादमंदीच व्हता . 
दुपारी थे गावाले आले . इस्ट्यांडवर गडी ब्यागा घ्यासाठी आलता . आवारात सेजार - पाजारच्या बाया बसल्या व्हत्या . माय त दाठ्ठ्यातच उभी व्हती . 
परभ्या आन् दाआजीनं आंग धुतलं न जेवाले बसले . 
' पोरगं थकलं हाय .. आराम करू द्या त्याले .' दाआजीनं हात धूत मनलं . 
परभ्या झोपला त येकदम दिवाबत्तीच्या येरलेच उठला . सद्या न वस्या पडवीत परभ्याच्याच उठाची वाट पाहात व्हते . जेवनयेर पावतर तिघायच्या गोस्टीमाताच चालू व्हत्या . 
' जेवून घ्या रे पोर हो ...' मायनं आवाज देल्ला . 
दोन - च्यार दिवस आराम करून परभ्या नाप्पूरले आला आन् इंटरनसिप चालू केली .  ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, January 2, 2022

सरवा - भाग २६. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

सरवा - भाग २६
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

परभ्या सुक्करवारीच नाप्पूरसाठी निंगाला . गावाले कवा जातो न् कवा नायी , असं त्याले झालं व्हतं . सनवारी सकारीच थो नाप्पूरले पोहोचला , मंग गावाले आला . आवारात लाह्यनी जोडी न् लाल्या बयील येकटाच खुट्याले बांधून व्हता . परभ्यानं ब्याग ठिवली न लाल्याची मान कवटारून त्याचा लाड कराले लागला . रिकाम्या खुट्याकडं पाहून दोघायच्या यी डोऱ्यातून आसू गरुन राह्यले व्हते . सद्या न वस्या बी आले . परभ्याले पाहून मायले बी दुख आटपलं नायी . परभ्याले कवटारून थे बी लडाले लागली . 
दाआजीच्या फटफटीचा आवाज आला . माय पानी आनाले रान्नीत गेली . 
' आला का बटा....' परभ्याले पाह्यताच दाआजीनं मनलं . 
परभ्यानं दाआजीचे पाय लागले आन् त्यायले बिलंगून लडाले लागला . 
' लडू नको.. आंगपाय धू आन् जेवून घे पह्यलं .' दाआजीनं परभ्याले थापटत मनलं . 
परभ्यानं जबरदस्तीनं सद्या न वस्याले बी जेवाले बसवलं . जेवल्यावर तीघायची वरात वावराकडं निंगाली . पांढऱ्या बयलाले बांधोडीजवरच समाधी देलती . त्याच्यावर येक मोठाजात कारा पास्यानी चिरा उभा केलता . सेंदरानं सेंदरी झालंल्या थ्या चिऱ्याले तीघायनं बी सेंदूर लावलं . उदबत्ती आन् कापूर लावून पाया पडले . 
सिवारातले मांडवं खाली झालते . वाघाच्या भेवानं साऱ्यायनं आपल्या गाई मसी घरी नेलत्या . रातच्या जागलीले बी गडीमानसं जाले भेवत व्हते . रातीचं सोडा पन दिवसा बी जवरपासच्या गावाच्या सिवारात काम कराले लोकं काचले व्हते . आता सिवारात त येकट्या दुकट्याची जाची हिम्मतच नायी व्हती . बगिच्याचा सोकारी बी रखवालीचं काम सोडून गेलता . लाखा - लाखाचे संतऱ्याचे बगिचे भगवान भरोसेच व्हते . 
' आपल्या गावाकडं कंदी व्हते का गा वाघं? सरकार आनून सोडते मनते बावा वाघं इकडे . कायच्या साठी सोडते त काऊन ची बीन ! मी त बावा गावाजवर सडकीच्या सूलपानंच बकऱ्या चारतो . ' सद्यानं मनलं . 
' फारेस्टवाले आलते न वावरात पंचनाम्यासाठी .' वस्यानं सांगतलं . 
' थे येतेच वरातीमांगून ... कागदं कारे केले क झाली त्यायची डिवटी . त्यायले कायची सरदीगरमी हाये बे , जीव त आपला जाते नं .' सद्यानं मनलं . 
इतवारी परभ्या नाप्पूरले आन् सोम्मारी सकारी अवरंगाबादले पोहोचला . दोन- च्यार दिवस परभ्या आपल्याच गुताड्यात व्हता ... हासनं नायी बोलनं नायी.
आज निधीचा वाढदिवस व्हता . परभ्यानं दुपारी क्यांटीनमंदी केक बलावला . निधी जसी क्यांटीनमंदी आली , तसंच साऱ्या पोरी - पोरायनं , ' बार बार ये दिन आये.....' हे गानं जोरानं मनाले सुरवात केली . क्यांटीनभर येकच कल्ला ! परभ्यानं निधीले बसवलं आन् तिच्यापुढं टेबलावर केक ठिवला . निधी पार कोचंबून गेलती . पोट्ट्यायचं खानं कमी न् धिंगानाच जास्त .
कलास सुटल्यावर निधी परभ्याजवर आली . 
' धन्यवाद केक बद्दल , परंतु कॉलेजमध्ये कशाला आणलास ?' निधीनं जरास्या नाराजीनंच मनलं . 
' काय झाले..... चुकलो असेल किंवा तुला आवडले नसेल तर माफ कर ....' परभ्यानं मनलं आन् होस्टेलकडं जा साठी फिरला . 
' अरे रागावला का ? तुला दुखवायचा हेतू नाही माझा.... तुला आपल्या क्लास मधली मुलं कशी आहे ते माहित आहे ना... Any way . पुन:श्च आभार , आणि हो तू आणि सुनील आज रात्री घरी या . छोटीशी पार्टी आहे . आणि कारणं नकोत हं... येशील ना रे ? ' निधीनं मनलं . 
' बघतो...' परभ्यानं खालच्या माननं मनलं .
' बघतो काय ? यायलाच हवं ... माझ्याकडे बघ...' निधीनं परभ्याच्या हनोटीले हात लावून चेहरा फिरवत मनलं . 
टपकन् परभ्याचा आसू तिच्या मनगटावर पडला . निधी गसपटून गेली . 
' काय झालं प्रभाकर ?.... माझ्या बोलण्यामुळे का ?' निधीनं इचारलं . 
' नाही ग... माझ्या बावळटपणामुळे ...' परभ्यानं डोरे पुसत मनलं . 
' नाही.. माझं बोलणं तुझ्या मनाला फार लागलं ना... आम्हाला फार मर्यादा असतात रे.. please , रागाऊ नकोस , माफ कर.. ' निधीनं कान पकडून मनलं . 
' नाही.. leave it... पुन्हा एकदा तुला वाढदिवसाच्या हार्दिक शुभेच्छा ! ' परभ्यानं मनलं . 
' येतोय ना घरी ? मी location पाठविते तुला... नक्की ये हं... बाय . ' निधीनं मनलं . 
येकडावची परीकस्या झाली . आता उलीसी निचनताई होती . 
' रविवारी चलतेस का , वेरुळ फिरून येऊ या..' परभ्यानं निधीले इचारलं .
' रविवारी तर शक्यच नाही.. आणि कारणं तर विचारुच नकोस ... भरपूर आहेत .' निधीनं हासत जवाब देल्ला . 
' मग कधी ?' परभ्यानं इचारलं . 
' आई - बाबांची परवानगी , हा मोठा issue आहे . मी शुक्रवारी सांगते .' निधीनं मनलं . 
' Ok.. हरकत नाही...' परभ्यानं मनलं . 
परभ्याच्या मनात धाकधूकच व्हती . निधीचं जमनार नायी , असंच त्याले वाटत व्हतं . 
शुक्रवारी आल्या आल्या दोघांची भेट झाली . 
' हाय..' निधीनं मनलं . 
' हाय... काही खूषखबर आहे की नाही ?' परभ्यानं इचारलं . 
' नक्कीच आहे... पण किती convey करावं लागलं , काय सांगू तुला... शनिवारची परवानगी मिळाली आहे , काही अटींवर . घरून डबा न्यायचा , बाहेरचे काहीही खायचे नाही आणि ५ वाजेपर्यंत घरी परतायलाच लागेल . ' निधीनं सांगतलं . 
' सब शर्ते मंजूर है जहापनाह...' परभ्यानं निधीसंगं हासत मनलं . 
आज परभ्याच्या डोऱ्यात झोप कायी याले तयार नोती . थो पह्यल्या डावच जगपरसिध्द येरुळ पाह्यनार व्हता , थे बी निधीसरख्या सोबतीनीसंगं ! परभ्याच्या जीवन पुस्तकाचे पानं फडफडाले लागले . पन् त्यायच्यावर काय लिवलं हाये , हे कोनालेच ठाव नोतं . 
' कोनाले बी फसवते जीवनाचे गुताडे ,
गुतून जीव त्याच्यात सोताच तडफडे .' 
सकारीच परभ्या न् सुनील निधीच्या घरी गेले . कनक याचीच व्हती . निधीच्या बाबानं परभ्याची इचारपूस केली . सरवायनं नास्ता केला . निधीच्या मायनं डबा देल्ला . कनकचा आतापावतर याचा पत्ताच नोता . निधीचे फोन वर फोन चालू व्हते . येकडावची कनक आली आन् मंग पोहा निंगाला महादेवा ! 
कनकच्या गाडीवर निधी बसली अन् निधीची गाडी परभ्यानं घेतली . कनकची गाडी पुढं आन् मांगं मांगं परभ्या . देवगिरी किल्ल्याजवर कनकनं गाडी थांबवली . निधी परभ्याले येका दुकानात घिवून गेली . 
' उन्हाचं डोक्यावर काही नको का ? ' निधीनं दुकानातल्या क्याप पाहात परभ्याले मनलं . 
ओढनीनं चेहरा झाकलेल्या निधीच्या डोऱ्यावरून , थे रागानं मनून राह्यली क लाडानं , हे कायी परभ्याले समजलं नायी . 
' मी नाही घालत कॅप ...' परभ्या मास्कच्या आडून पुटपुटला . 
' नाही घालत म्हणजे ? ... ती कॅप द्या दादा.. ' निधीनं क्याप घेत मनलं . 
जबरदस्तीनं त्याले क्याप घातली . 
' आधी किल्ला बघूया , नंतर लेणी ... ठीक आहे..' निधीनं मनलं . 
निधी अन् कनकचं हे पाह्यनीतलंच व्हतं . फक्त परभ्या न् सुनीलच पह्यल्या डाव आलते . 
किल्ला चढता - उतरता सारे घामाजोकर झालते . पान्याच्या च्यार बाटला खतम झालत्या . भूकीजले पन् व्हते थे . येका हटेलात चवघायनं डबा खाल्ला . परभ्यानं जांबा घेतल्या . 
आता लेन्यायचा नंबर व्हता . परभ्या पह्यल्या डावच हे दगडातलं नवलाचं साजरपन पाहात व्हता . निधी परभ्याले येकेका लेनी आन् मूरतीची माहिती सांगत व्हती . महादेव पाराबतीच्या लग्नाची मूरती पाहून त् नव्या जिंदगानीच्या सपनाचे कोंभं परभ्याच्या इचारात फुटाले लागले . परभ्या भारल्यावानी कंदी मूरतीकडं अन् कंदी निधीकडं पाहात व्हता . तिनं सांगतच राहाव... बोलतच राहाव अन् आपन आयकतच राहाव , असं परभ्याले वाटलं . आज पह्यल्या डाव परभ्याचं आंग कयी येरा निधीच्या मुलाम आंगाले लागलं व्हतं ..... ढेकलावानी इरून राह्यला व्हता थो ! दिवसभऱ्यात किती डाव आंगावर काटे आले , हे त्याच्या बी गिनतीत नोतं . दिवऱ्याच्या सुगंधावानी मह्यकून राह्यलं व्हतं तिचं आंग ...‌ परभ्या सासा - सासात भरून घेत व्हता थो सुगंध ! कयलास लेन्यात हरीखला थो... पास्यानातल्या कोरीव कामाची सावली त्याच्या आंगावर पडली .... त्याचं यी मन कोराले लागलं आपली दुनिया ! 
' चार वाजले... निघायला हवे ..' निधीनं अयलान केलं . 
परभ्याची तंद्री तुटली . त्याचं मन निंगालेच तयार नोतं . 
फटुवायनं फुल्ल झालंली ग्यालरी पाह्यता पाह्यता रात सरून गेलती . त्यानं थे सारे ल्यापटाप मंदी सेव्ह केले . झुंझुरका सुनील उठला त् परभ्या ल्यापटापवरच ! 
' झोपला नाही अजून ? ' सुनीलनं मांगून परभ्याच्या खांद्यावर हात ठिवत इचारलं . 
परभ्या दचकला आन् स्यरमला बी !
' झोपतो.. झोपतो..' परभ्यानं पटकन ल्यापटाप बंद करत मनलं . 
पन् परभ्याचं मन कुठं थाऱ्यावर व्हतं !!
सुनील गालातल्या गालात हासत व्हता .....
( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर