Friday, July 29, 2022

अंधारा को पांडू भासो ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अंधारा को पांडू भासो
( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पड्यो उतानो उबडो
उठ्यो बावा कसोबसो
इज्जत को भासपालो
अंधारा को पांडू भासो ।१।

तोल तोल कन चाल्यो
पर करम को फासो
तंगड कन् घसऱ्यो गो
अंधारा को पांडू भासो ।२।

कारी निस्यानी बोट ला
जसो सिकार को ससो
इलेक्सन को बजार
अंधारा को पांडू भासो ।३।

गयो उपव उजिड
घर मंझार तमास्यो
हातपाय लटपट्या
अंधारा को पांडू भासो ।४।

रोग भस्म्यो नेताना ला
पेट भरेन गो कसो
दुइ घास ला मोताद
अंधारा को पांडू भासो ।५।

पोट्टा बाट्टाना को कल्लो
कितअ जाय कन् घूसो
जागा नही लुकन ला
अंधारा को पांडू भासो ।६।

दिवो लगायो सूर्व्या को
भयो ढग येडो पिसो
फुको तंतर मंतर
अंधारा को पांडू भासो ।७।

गयो कुईज उजिड
लाग्यो धक्को गा उलीसो
भयी चान्नी फानोफान
अंधारा को पांडू भासो ।८।

कोनुडा म दिवनाल
उजिडस येक पसो
वारो खेटस जोत ला
अंधारा को पांडू भासो ।९।

सटवाई की लेखन
भाग लिखस गो कसो
कसी पूंजी बा पाचवी
अंधारा को पांडू भासो ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, July 27, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - ६

यादें _ सवाल की ! 
भाग - ६

स्कूल - कॉलेज के बाद हमें लगता है , अब परीक्षा से छुट्टी ! यह अंधश्रद्धा बहुत घातक होती है... आगे और इतनी परीक्षाओं से गुजरना होता है की , सभी भगवान याद आते है . जॉब के लिए भी written exam , viva , interviews और न जाने क्या क्या ! फिर promotion , specialisation के लिए परीक्षा ... साथ साथ ही सामाजिक परिवेश मे अलग ही प्रश्नपत्र हमारे इंतजार मे होते है.. 
कोई दूर के रिश्तेदार घर मे आते ही हमारी विकेट लेते है . उनके सवाल की गुगली इतनी अनपेक्षित होती है की , सिर चकरा कर आउट होना , यही परिणाम १०० फिसदी तय ! और वह सवाल होता है , ' पह्यच्यान कौन ? ' .
स्कूल - कॉलेज तक दूर के रिश्तेदारों से मिलना - जुलना रहता नही . पढाई के नाम पर पारिवारिक कार्यक्रम मे हमारी हिस्सेदारी नगण्य रहती है . जब मेलमिलाप ही नही तो पहचानेंगे कैसे ? 
' पह्यच्यान कौन ? ' इस सवाल का जवाब देने के लिए मॉं - पिताजी जो टिप्स देते है , वह सिर के ऊपर से निकल जाती .  झूठ - मुठ में ही हां में हां मिलाते और खिसक लेते . दिमाग को खंगालने के बाद भी कोई नतीजा नही निकलता .‌‌ कुएं में ही नही तो बालटी में कहॉं से आएगा ! 
कई बार चेहरा याद आता है , लेकीन नाम - गांव भूल जाते है . 
कई बार पीठ पर पहले थपकी पडती और बाद मे सवाल की मिसाइल स्मृतिघातक हमला करती , ' पहचाना क्या ? ' 
Smile line को थोडा चौडा और लंबा कर के हम हाथ मिलाते . उसकी ऑंखों में वही सवाल अब भी तैरता हुआ नजर आता है . हमारे शर्म से डुबने की हालात का वे मंद मंद मुस्कुरा कर आनंद लेते है . उनकी शारीरिक भाषा विजयी मुद्रा की .. सिकंदर जैसी और हम बगलें झॉंकते हुए पराजित मुद्रा में.. पोरस की तरह ! चेहरा कुछ कुछ याद आता है , लेकीन नाम ! स्मृति दगा दे जाती है . और एक रामबाण और रखा रहता है उनकी तरकश में ...  ' बडा आदमी बन गया.. अब क्यो पहचानेगा ...' 
' बडा आदमी ' कैसा होता है , यह हमें आज तक पता नहीं .  पर वह उस अनजान श्रेणी में हमें डाल कर स्वर्ग सुख का लेता है .      ' इधर कुंआ , उधर खाई _ जाए तो जाए कहा भाई !' हम अपने आप को कोसते रहते...
अब यह बात चेहरे पर आ कर अटक गयी . यहॉं तक ठीक है.. आगे के सवाल कर्ता और दस पायदान ऊपर ! इनकी आवाज भी memory में store करनी होती है !!!!
आपकी फोनबुक में save नही किया हुआ अनजाना नंबर वही सवाल के तीर चलाता है , ' पह्यच्यान कौन ?' app's की भरमार की वजह से caller ID app download नही किया हो तो , सोने पे सुहागा ! 
मै गाने सुन कर singers को नही पहचान पाता . अब इस दस - बीस साल पुरानी आवाज को किस क्षमता के बलबूते पहचान पाऊगा . ' नही पहचाना ' , ऐसा बोलना शिष्टाचार संमंत नही . कई कि.मी. दूर बैठे उस शख्स ने शिष्टाचार में भ्रष्टाचार किया है .... इस के लिए हम क्या कर सकते है ! 
यह ऐसी परीक्षाएं है , जिस में हमारे फेल होने की संभावना शत प्रतिशत होती है . अंकसूचि में मिले अंडे से ज्यादा खतरनाक और डरावना वह लांछन होता है , ' बडा आदमी बन गया.....' 
इस सवाल से आसान तो स्कूल - कॉलेज की परीक्षा के प्रश्न पत्र रहते थे !! 
( सहमत हो तो बजाओ ताली !).    क्रमशः ....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


Tuesday, July 26, 2022

अंधाराचा पांडू भासा. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

अंधाराचा पांडू भासा
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

झाला उताना उबडा
उठला गा कसाबसा
इज्जतीचा भाजीपाला
अंधाराचा पांडू भासा ।१।

तोला तोलानच चाल्ला
पन करमाचा फासा
तंगडून चीतपट
अंधाराचा पांडू भासा ।२।

लावे निस्यानी बोटाले
जसा सिकारीचा ससा
हातपाय गराटले
अंधाराचा पांडू भासा ।३।

पत्ता नायी उजिडाचा
घरीदारी अवदसा
इलेक्सनचा बजार
अंधाराचा पांडू भासा ।४।

नेत्यायले भस्म्या रोग
रोज खाये भसाभसा
इथं आंगाचं चिपाड
अंधाराचा पांडू भासा ।५।

पोट्टे बायको कावते
कुठं बी जाऊन धसा
जागा नायीच लपाले
अंधाराचा पांडू भासा ।६।

दिवा टांगला सूर्व्याचा 
ढग झाला येडापिसा
फुका तंतर मंतर
अंधाराचा पांडू भासा ।७।

कुईजल्या उजिडाले
धक्का लागला जरासा
झाल्या चान्न्या फानोफान
अंधाराचा पांडू भासा ।८।

कोनाड्यात दिवनाल
उजिडते येक पसा
खेटे येता जाता वारा
अंधाराचा पांडू भासा ।९।

सटवाईची लेखन
भाग लिवते गा कसा
कसी पूंजली पाचवी
अंधाराचा पांडू भासा ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, July 24, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग ५

यादें _ सवाल की ! 
भाग - ५

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर ..‌ घर में मराठी में बोलचाल तो घर के बाहर निकलते ही हिंदी का बोलबाला ! हर गली , हर नुक्कड , हर स्टॉप पर आटो रिक्षा की धूम ! सडक पर भी यह मुक्त पंछी की तरह विचरण करते है..‌ ना ट्रैफिक सिग्नल से लेन देन , ना यातायात नियम से कोई रिश्ता... हां , यातायात पुलिस की वक्र दृष्टी से यह आजाद पंछी कैसे बचे रहते यह यक्षप्रश्न ! शालीनता के रंगरूप से भी यह चालक अनजान होते है..  लेकीन इनकी नजर गिध्द की भांति शिकार खोजने में कुशल होती है... आपको ही पता नहीं होता है की , बर्डी जाए , महल जाए , गांधीबाग जाए या इतवारी . ( यह नागपुर के मार्केट प्लेस है .) आप सोचते रहते है तब अचानक कोई आटो रिक्षा बगल में खडे पाते है... और दनदनाता सवाल आपकी सोच साधना को भंग करता है , " कहॉं जाना है ? " 
" कहॉं जाना है ? " इस सवाल से बचने की आप ने कोई उपाय योजना की नही होती... आप हडबडा जाते है... वह इसी सवाल को दोबारा दागे , आप के मुंह से अनायास ही निकल पडता है , ' कही नही...'  तब वह ऐसी हिकारत भरी नजर से घूरता है की उसके मन के विचारों को आप स्पष्ट पढ़ सकते है ._ फिर यहॉं क्यो खडे हो ? ... आटो रिक्षा को देने के लिए पैसे नही , बस से जाएगा या मेट्रो से जाएगा कंजूस ... खालीपिली टैम बरबाद किया... पैदल चलने का शौक चर्राया है... कहॉं कहॉं से आ जाते है...‌नाट लगा दी बोहनी को... ज्यादा शायना दिखता है . .. 
मै पार्किंग में कार लगा कर , उंगली में सुदर्शनचक्र की भांति चाबी घुमाते हुए दस कदम भी नही चलता _ सनसनाता वर्षा बाण कानों में गुंजता है , ' कहॉं जाना है ? ' मै शर्म , लाचारी से भिग जाता ... दोनों हाथ जोड कर प्रणाम करते हुए बोलता हूं , ' महोदय , अभी आया हूं , कही भी जाने को काफी समय है... क्षमा करें..' वह अजीब नजर से घूरते हुए नौ दो ग्यारह होता है . मै अपना सुदर्शनचक्र जेब मे रखता हूं... मै अकेला रहा तो यह हाल है . लेकीन पत्नी साहिबा के साथ रहा तो महाभारत की जंग छिड जाती है... कार पार्किंग से लेकर वांछित दुकान में पहुंचने तक और वापसी यात्रा में ' कहॉं जाना है ? ' इस सवाल के इतने अस्त्र , शस्त्र , अग्निबाण कान , दिमाग को बिंधते है की , कौन से दुकान में जाना था और कार पार्किंग यही भूल जाते है . हम ठहरे अभिमन्यू ! चक्रव्यूह को भेद सकते है , लेकीन बाहर आने की विद्या ज्ञात नही ! 
कई बार सोचता हूं , इन लोगो के लिए कितने नाकारा है हम . इनकी हेय दृष्टि को झेलना कोई खेल मजाक थोडे ही है . 
एक दिन सोचा की , आज आटो रिक्षा से ही सफर करूंगा . मै कालोनी के मेन गेट के पास खडा हो गया . आधा घंटा हो गया , लेकीन कोई आटो रिक्षा प्रसन्न नही हुआ . बाद में एक देवता प्रसन्न हुए... आटो रिक्षा की गति कम हुई.. मुस्कुराता सवाल आया , ' कहॉं जाना है ?' मैने चेहरे पर दीनता के भाव ला कर कहा _ गांधीबाग . वह बिना मेरे तरफ देखे , जितनी गति से आया था ; उसकी दोगुनी रफ्तार से और मुझे मंझधार में छोड कर चला गया.. एक घंटा इंतजार साधना की . फल नही मिला . वापिस घर आया . गाडी निकाली और गांधीबाग पहुंचा . कार पार्क कर के सुदर्शन चक्र चलाते हुंए मै मार्केट की ओर बढा ही था की , कौरव दल का सनसनाता हुआ अमोघ शस्त्र आया , ' कहॉं जाना है ? ' ...
मै ' हत् गांडिव.....' 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, July 22, 2022

निर्माण : भाग १०. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण : भाग १०
Hindi language _ हिंदी भाषा

हम दोनों की सिट्टी - पिट्टी गुम हो गयी थी . सर्द रात में भी पसीन छूट गये थे . आधे तक आये थे , आधी दूरी और तय करनी बाकी थी . स्कूटर की लालटेन जैसी हेडलाइट ! पांच फिट के आगे का कुछ भी नहीं दिखता था ... बाकी घना अंधेरा... सुनसान रास्ता ... बाघ कहॉं होगा.. किधर होगा ... अगर सामने आया तो क्या.. बगल से या पीछे से आया तो क्या ????? अनुत्तरित प्रश्नों की अनेक घंटियॉं दिमाग में  बज रही थी , लगता था उस आवाज से दिमाग ही फट जाएगा... डर का बवंडर भूतकाल , वर्तमान काल और भविष्य काल की सैर करा रहा था . उपाय का कोई रास्ता नजर नही आ रहा था . अगर हेडलाइट बंद करते है तो अनंत अंधकार में राह और हम , दोनों खोने का खतरा . हेडलाइट चालू रखते है तो बाघ महाराज को न्योता ! 
मन ही मन में भगवान से कहा , हे प्रभू आज किसी भी तरह साइट कैम्प तक पहुंचा दो . आगे से कभी रात में इस जंगल के रास्ते से नहीं आयेंगे ... बस , इस बार क्षमा कर दो......
सोचते सोचते एक मोड पर आये.. जैसे ही मुडे , कुछ दूरी पर अंधेरे में चार ऑंखें टिमटिमा रही थी . बाघ का जोडा तो नही ! सुपरवाइझर अब केवल मेरे पीठ पर बैठने का ही बाकी था , इतना पीछे से सट गया . मैने उपलब्ध साधनों में एक सुरक्षित जगह खोज ली थी.. कारगर होना , नही होना बाद की बात थी . मुसीबत आने पर हैंडिल और सीट की बीच की जगह मैने दिमाग मे फिट कर ली.. 
मैने अंधेरे में भी थोडी सी इंजिनिअरिंग लगाई . हमारा चलना जारी था , लेकीन वह चार ऑंखें वही पर रुकी थी . उन ऑंखों की उंचाई स्कूटर की हैंडिल से काफी उंची दिख रही थी.. बाघ इतना उंचा तो नही हो सकता ! अब इंजिनिअरिंग गलत थी या समय ! _ यह तो कुछ ही पल में तय होने वाला था . मै अंधेरे में ऑंखें गडाए उन्हें समझने की भरपूर चेष्टा कर रहा था.. जैसे ही हम नजदीक पहुंचे , वह चारों ऑंखें हिली.. और जंगल मे गुम हो गयी . जाते जाते जो अस्पष्ट झलक दिखी , उस से वह साम्भर जैसी लगी . साम्भर थे , इस लिए उनकी ऑंखों की उंचाई ज्यादा थी ! हम दोनों ने राहत की सांस ली . अब केवल एक चौथाई दूरी बची थी ...
राम... राम का अखण्ड जाप चालू था . धूल से पीले और पसीने से गीले हो गये थे . अब रफ्तार और बढाई . स्कूटर को खिंचते हुए हम लगभग दौड ही रहे थे . दोनों मौन थे..‌ घने अंधेरे में हमारी ऑंखें केवल कैम्प की रोशनी को ही ढुंढ रहे थे . 
मैने पसीने से भिगी शर्ट उतार ली . सुपरवाइझर को बोला की , अब तुम हैंडिल पकडो . 
' मै धक्का ही मारता हूं साहब.. आप ही हैंडिल पकडे..' सुपरवाइझर ने कहा . 
आगे रह के मुसीबत कौन मोल लेगा ? उसकी जगह वह भी ठीक ही सोच रहा था !!
दूर कैम्प की टिमटिमाती रोशनी दिखी ‌ . जान में जान आ गयी . बची खुची ताकद लगा कर हम दौडने लगे . थोडा एक्सीलेटर भी बढाया . इस भागदौड में मेरा दाया पैर जोर से फूटरेस्ट से टकराया . बस्स.. स्कूटर का , मेरा और सुपरवाइझर का ऐसा संतुलन बिगडा की नीचे स्कूटर और उस पर हम औंधे मुंह गिरे ! हमारें मुंह मिट्टी में धस गये . सुपरवाइझर झट् से उठा ... मेरे दाये पैर में दर्द की तीखी लहर दौडी . स्कूटर की पायदान ने घुटने के नीचे गहरी चोट लगाई थी . सुपरवाइझर ने स्कूटर उठाई और मेरे पास आया . मै पैर पकड कर बैठा था . उसने मेरी पैंट उपर उठाई और चोट पर कस के रुमाल बांधा . 
अब मजबूरन उसने हैंडिल पकडा . मै लंगडा कर चल रहा था . जैसे तैसे कैम्प पहुंचे . हमारी हालत देख कर स्टाफ घबरा गये . उन्होंने मेरे कपडे उतारे . गरम पानी में टॉवेल डुबा कर उस से बदन पोंछ दिया . जख्म पर बंधा रुमाल हटाया . फर्स्ट एड बॉक्स से पट्टी , मरहम , दवाईयां निकाली . चोट को बेटाडिन से साफ कर के मरहम लगाया और पट्टी बांध दी . सभी मजदूर , ठेकेदार देखने के लिए आए . 
' सब ठीक है... आप लोग आराम करो...' मैने कहा . 
खाना खा कर मैने एंटिबायोटिक टैबलेट ली...
सुपरवाइझर सब को बडी गम्भिरता से यह वाकया सुना रहा था...
मै नींद की आगोश मे समाता गया.....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, July 20, 2022

गारगोटी ( वऱ्हाडी कविता ). varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

गारगोटी
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

वाडा खसून वायला
सयील झाल्या मुठी
बाप्पू अटकली खुटी
आता जासीनच कुठी ।१।

तुले येवढं खंदून
सापडली काय लोटी
तांदरीच्या नादानं भौ
फालतूची आटाआटी ।२।

गहू पेरला तावानं
उपडून तू पराटी
अकलीच्या कांद्यावानी
गोस्टं तुही उरफाटी ।३।

खाल्लं रिकामं बसून
झाल्या इकून इस्टेटी
इंधनकाडी सरली
आता जारतं तुराटी ।४।

याले त्याले खेटून तू
जातं म्याहाडाच्या वाटी
बह्याडाचीच भरती
लावे धुऱ्याले बी काटी ।५।

डोकस्यावर त बाप्पू
करमाची सेनपाटी
सांड्यावानी डखरून
करतं मुजोरी मोठी ।६।

गेला जमाना गंगनी
तुही कोरी हाये पाटी
हिऱ्याच्या खदानीतला
जसा निरा गारगोटी ।७।

गेल्या मयाली वाकून
तुही रग्गेली बी खोटी
गेले तसमे फाकून
लाज दाठ्ठ्याले गा मोठी ।८।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, July 19, 2022

आयो सरावन मास. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

आयो सरावन मास
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मोह्यतूर बहुड्डा को
नागपंचमी ला खास
खेले बारिस उघाड
आयो सरावन मास ।१।

नान्हा मोठा राजीखुसी
धऱ्या सोम्मार उपास
जीव सिव की महिमा
आयो सरावन मास ।२।

पोह्यती की सबन च
बहिनना ला जी आस
निभावन ला धरम
आयो सरावन मास ।३।

धट्टी पेहरी हिवरी
सातरंगी चंद्रहास
सिरावन ला बहुड्डो
आयो सरावन मास ।४।

कानुबा को जागरन
दही लाही को उल्हास
खांदसेकनी पोरा को
आयो सरावन मास ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, July 18, 2022

बहुड्डो ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

बहुड्डो
 Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

दिसी चवरी कुंजर
लायो कवरो कुकुड्डो
नागपंचमी ला बोयो
बाई साजरो बहुड्डो ।१।

खेत म को भासपालो
गुनधरम को वड्डो
झाक कन् धरे बाई
सोनपिवरो बहुड्डो ।२।

झरझर पाझरेस
डुंगी जवर को बड्डो
भरभर बाहाडेस
कवतिक को बहुड्डो ।३।

आसुक खोकला कन्
जरजरेस नड्डो
चवरी क आघअ पूंज्यो
पोह्यती ला जी बहुड्डो ।४।

दिवाल पर लिख्योस
चितरंग को बहुड्डो
पूंज्या बाट्यास जवारा
सिराय कन् बहुड्डो ।५।

महोबा को इतिहास
किरत सागर कड्डो
चंदरावली न पूंज्यो
कजिलयन बहुड्डो ।६।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, July 17, 2022

वरसार ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

वरसार 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति 
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पयी पाव्हना को घर
करेस पाहुनचार
पोटी जवाई की बाई
दिन भर वरसार ।१।

आतो मावसी ननद
घर बलाये कसार
चोरी बंगडी को नेम
दिन भर वरसार ।२।

आया आम्बा का पाव्हना
भासा भासी तीन च्यार
धाबा प लगाये माच
दिन भर वरसार ।३।

तेलौता की सुगंध म
मह्यके गली येटार
रान्नी ला घाडो हरीक
दिन भर वरसार ।४।

हासे चवरी को दिवो
दाठ्ठा की माया अपार
गनगोत बड वानी
दिन भर वरसार ।५।

झोको बंगई को मन
चित सपरी उदार
हासी खुसी को दाह्यजो
दिन भर वरसार ।६।

लक्सुमी की आंगवन
करे असो चमत्कार
नांदे घर म गोकुळ
दिन भर वरसार ।७।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, July 15, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग ४. Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें _ सवाल की ! भाग ४
Hindi language _ हिंदी भाषा

' आप employee है या employer ? ' 
नागपुर में EMD department की साइट चालू थी . साइट के entrance की ओर से एक नाला आया था , जो साइट को पार कर दूसरी ओर निकलता था . Estimate में nala pitching and culvert का provision था . Culvert ( छोटासा पुलिया ) के लिए ६ Hume pipe और ४ coller लगनी थी . 
अब hume pipe कहॉं से मंगाए / लाए ? _ यह प्रश्न था . मै सुपरवाइझर को साथ ले कर industrial area में गया . वहॉं hume pipe factory की खोजबीन में लग गये . आखीरकार एक जगह hume pipe दिखे . वहॉं hume pipe की size और rate की enquiry की . वहॉं काम पर मजदूर थे . उनके अलावा कोई स्टाफ नही था . अब बात कैसे बनेगी ? मजदूर का ' पता नहीं ' का पहाडा चालू था . बडी मुश्किल से factory तो ढुंढ लिए पर यहॉं जानकारी का प्रचंड अंध:कार था . Factory के बाहर निकले और रोड पर खडे हो गये ...... फैक्टरी की बोर्ड को देखा तो अक्षर और रंग धूंधले हो गये थे.... पता नहीं कितने सालों से पेंटिंग नही की थी ! 
हमि बोर्ड के पास गये और बडे गौर से उसे पढ़ने की कोशिश करने लगे . नीचे धुंधला सा फोन नंबर दिख रहा था , उसे नोट किया . यह फोन नंबर लग जाए तो अच्छा होगा , नही तो और खोजनी पडेगी दूसरी फैक्टरी _ मैने मन ही मन सोचा . 
दूसरे दिन STD booth जा कर वह नंबर डायल किया . ४/५ कोशिश के बाद उधर से आवाज आई और मेरी जान मे जान ! 
' हैलो...' मैने अपनी बात की . 
' आप ऑफिस मे आइए...' उधर से न्योता मिला . 
मैने कंपनी का नाम पता नोट किया . 
दूसरे दिन मै सुपरवाइझर को साथ ले कर उस कंपनी का ऑफिस खोजने में जूट गया . आखीरकार एक छोटासा ऑफिस मिल गया . यहॉं के बोर्ड की हालत भी फैक्टरी के बोर्ड जैसी ही थी . ऑफिस मे दो सज्जन बैठे थे . 
मैने अपनी requirement बताई . उन्होंने रेट बताए . मै मोलभाव करने लगा . उनके चेहरे पर आश्चर्य था . मै पूरी शिद्दत से मोलभाव के मैदान में उतरा था . वे दोनों उलझन में ! 
' आप employee है या employer ? ' उन्होंने बाऊंसर डाला . 
अब मैं हडबडा गया . इस अनपेक्षित सवाल का क्या मतलब ? 
' मै employee हूं , लेकीन आप यह क्यों पूछ रहे हो ? ' मैने सावधानी से पूछा . 
' आप रेट में bargaining कर रहे है , इस लिए पूछा . Employer bargaining करते है और employee commission पूछते है . ' उन्होंने कहा .
' ओह ! यह बात है . जी मैं employee ही हूं , लेकीन साइट का इन्चार्ज भी हूं . हम यहॉं परिवार की भॉंति कार्य करते है . इस लिए हर चीज नापतौल कर लेना मेरी जिम्मेदारी है .' मैने स्पष्ट किया . 
वह मुझे ऐसे देखने लगा , जैसे मै एलियन हूं ! 
मैने रेट तय किया और उन्हे एडवांस की रकम अदा की . 
' आप employee है या employer ? ' यह सवाल अभी भी मेरे आसपास भटकते रहता है ! ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपुर

Wednesday, July 13, 2022

अजब गजब - ९७ : अर्धनारीश्वर ज्योतिर्लिंग , मोहगांव हवेली ( मध्य प्रदेश ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९७ : अर्धनारीश्वर ज्योतिर्लिंग , मोहगांव
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय
कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय ।
कर्पूरकांतिधवलाय जटाधराय
दारिद्रदु:खदहनाय नमः शिवाय ।।

देस म १२ ज्योतिर्लिंग का पावन तीरथ स , आन् येक अरधो ज्योतिर्लिंग स . मध्य प्रदेस म महाकालेश्वर अन् ओंकारेश्वर इ दुइ ज्योतिर्लिंग स . आन् साडेबारा ज्योतिर्लिंग म को अरधो ज्योतिर्लिंग बी मध्य प्रदेस म च स . 
छिंदवाडा जिला क सौंसर तहसील म , महाराष्ट्र अन् मध्य प्रदेस क हद जवर सरपा नदी क काठ पर मोहगांव हवेली गांव म ' अर्धनारीश्वर ज्योतिर्लिंग स . मोहगांव हवेली सौंसर पासीन ६ कि.मी. , छिंदवाडा पासीन ६२ कि.मी. अन् नागपूर पासीन ७५ कि.मी. दूर स . 
मोहगांव हवेली म भगवान भोलेनाथ अर्धनारीश्वर सरूप म बिराजमान स . 
१२ ज्योतिर्लिंग आन् तिरपुर सुंदरी क मंझार क हिंद्यान पर इ तीरथ स . स्यास्तर क नुसार साडेबारावो ज्योतिर्लिंग सरपानी नदी क थडी प स . नदी को आकार सरप जसो आन् ॐ सरीखो स , असी मान्यता स . असी च सर्पा नदी , देऊर क पसचीम दिस्या म  मोहगांव ला स . येनअ नदी म येक कुंड स , जे को आकार सिवलिंग जसो स . दयीत गुरू सुक्राचार्य न येनच सर्पा नदी क काठा प मोठो जप तप कऱ्योतो , असी मान्यता स . भगवान भोलेनाथ वून पर परसन्न भया . गुरु सुक्राचार्य ला दरस्यन देयो आन् अर्ध्दनारीश्वर रूप म परगट भया . 
मोहगांव हवेली क अर्धनारीश्वर ज्योतिर्लिंग को दरस्यन कऱ्या बिगर १२ ज्योतिर्लिंग क दरस्यन को पुन्य अधूरो रव्हस , असी मान्यता स . 
इतिहास : * अर्धनारीश्वर ज्योतिर्लिंग तीरथ पुराना जमाना पासीन स . पह्यलो देऊर को बांधकाम ८ वी सदी म , परमार काल म भयो . 
* दुसरो बांधकाम १३ वी सदी म हेमाद्री पंत न कऱ्यो . 
*  रघुजी राजो ( नागपुर ) , राजो भोसले , राजो दलपत स्या ( देवगढ ) न येनअ देऊर की मरम्मत करी . 

बांधकाम : * देऊर क चार आंग चार दरुजा स . गाभार क चारी आंग ३ - ३ दरुजा स . 
* देऊर ला ३ परदकसिना पथ स . पह्यलअ आन् दुसरअ रस्ता क मंझार १२ दरुजा स , जी १२ ज्योतिर्लिंग का परतीक स . दुसरअ आन् तीसरअ रस्ता क मंझार ४ दरुजा स , जी ४ धाम का परतीक हि . येनअ तीरथ पर १२ ज्योतिर्लिंग अन् चार धाम क यातरा को पुन्य भेटस , असी मान्यता स . 
* सिवलिंग अरधो कारो अन् अरधो गोरो चिट्टो स . सिवलिंग क येनअ रूप ला महादेव पाराबती को परतीक मानस . 
* माघ आन् कारतिक मह्यना म सूर्व्य भगवान आपलअ किरन ज्योति कन् सिवलिंग कोई अभिसेक करस . 
कालसरप दोस : सर्पा नदी को आकार सरप जसो स . तेकन येनअ तीरथ पर कालसरप दोस निवारन की पूंजा करस . 
पर्व : महासिवरातरी ला यहान मेलो भरस . हर तिवार प यहान पूंजा पाठ , हरि किरतन , दही लाही होस . 

येक नमन गवरा पारबती हर हर महादेव....  

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
 

Saturday, July 9, 2022

घेन्नं रे बापू. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

घेन्नं रे बापू
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

घेन्नं रे बापू
पेन्नं रे देसी
तावली मज्जा
घरी येकादसी ।१।

घेन्नं रे बापू
तन्नाव खाटी
माय लेकरं
उपासी पोटी ।२।

घेन्नं रे बापू
तू फटफटी
डवंडराची
हाउस मोठी ।३।

घेन्नं रे बापू
पे सिगारेटी
खंगरून जा
 मसनवटी ।४।

घेन्नं रे बापू
खाय नं बोटी
पाटीलकी तू
दाखव खोटी ।५।

घेन्नं रे बापू
कर नं चाटी
मोडून टाक
कुपाची काटी ।६।

घेन्नं रे बापू
उप्पड खुटी
हाती राह्यली
फक्त नरोटी ।७।

घेन्नं रे बापू
कटुरा वाटी
भीक मांगाले
सोड लंगोटी ।८।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, July 8, 2022

यादें _ सवाल की ! - भाग ३

यादें _ सवाल की ! - भाग ३
Hindi language _ हिंदी भाषा

कॉलेज से ताजा ताजा इंजिनिअर बन के निकले थे . इधर उधर हाथ पैर मारने के बाद एक प्रायव्हेट कंपनी मे नौकरी मिली . कंपनी भी कोलकाता से नागपूर अभी अभी आई थी . नागपूर मे ही साइट ! 
इंटरव्ह्यू मे मुझे बोला गया की साइट पर कुछ गलती हुई है . ' वह गलती क्या है ?' इस सवाल का सही जवाब मै ढुंढ पाया तो , नौकरी पक्की ! 
' वह गलती क्या है ?' , यह सवाल मेरे जॉब का बंद मेन गेट बना . गलती ढुंढ नही पाया तो ! सिर मे दनादन हथौडे चल रहे थे . इस सवाल का जवाब मेरे भविष्य की कुंजी थी . यह तो क्षमता की अग्निपरीक्षा थी . पराजय का डर पहली बार महसूस किया . 
चलो , श्रीगणेशा तो करते है ... आगे की आगे देखेंगे ... , मै अपने आप को समझा रहा था . 
अब प्रेक्टिकल पढ़ाई शुरू हुई . साइट , डिपार्टमेंट के इंजिनिअर , स्टाफ , ठेकेदार यह सब मेरे गुरू . मै केवल निरीक्षण ही कर रहा था . दिन भर साइट के वर्किंग ड्राइंग पढ़ता , समझने की कोशिश करता और रात में घर मे building construction की किताब पढ़ता . 
दो दिन में agreement , schedule , specifications पढ़ा . सब अपना काम करते , मै ' वह गलती क्या है ?' के उत्खनन मे लगा रहता . छोटी मोटी बातें तो पूछ लेता था , पर उस गलती पर पूछने की हिम्मत नही होती थी .  अपने आप को underestimate क्यो करना ! उपर से संकोची स्वभाव !! 
Foundation work चालू था . मै working drawings की एक एक लाईन , शब्द , मेजरमेंट को बडे गौर से देखता और कुछ क्लू मिल जाए _ यही खोजता रहता था . तीन दिन हो गये . गलती मेरे साथ लुकाछिपी खेल रही थी . मै हताश , परेशान उसे शिद्दत से ढुंढने की कोशिश में लगा था . निराशा के बादल मंडरा रहे थे . हिम्मत जवाब देने लगी थी , लेकीन सवाल का जवाब नही मिल रहा था . पहली जॉब शायद इस सवाल के चक्कर में शहीद हो जाएगी ! 
साइट पर एक हरफनमौला मजदूर था . वह इतने भिन्न भिन्न काम करता था , की उसका designation लिखना मुश्किल ! चौथे दिन उसको पकडा . टेबल पर plinth drawing फैलाया . गलती कही न कही कॉलम में ही होगी , ऐसा लग रहा था . उस मजदूर को टेप , लाईन डोरी लाने को कहा . सुपरवाइझर से सेंटर लाईन की खूॅंटियॉं साफ करवाई . अब आरपार की लड़ाई प्रारंभ हुई . साइट ही रणभूमी बनी . नौसिखिया सेनापती युद्ध की कमान थामे था . विपक्ष का हमला कभी भी हो सकता था . विपक्ष अनुभव संपन्न और होशियार था ! यह चींटी और हाथी की लड़ाई थी . 
सभी इंद्रियॉं शस्त्रविहिन थी , केवल छठी इंद्रिय का ही सहारा था ! मैने साइट पर लाईनडोरी से चक्रव्यूह रचा . एक एक कॉलम को मिलिमीटर के हिस्से तक परख रहा था . उस हरफनमौला मजदूर ने बीच में बोलने की कोशिश की , मैने उसे इशारें से चूप कराया . अब मै और मेरी एकाग्रता के बीच , मै कोई भी व्यवधान नही चाहता था . अब " मिशन गलती " का बिगुल बज गया था . 
लंच तक कॉलम की चार पंक्तियां लांघ चूका था , लेकीन ' गलती ' वाला महाशत्रु हाथ नही लगा था . सब लंच कर रहे थे . मेरे लिये तो खाना पीना हराम हो गया था . मै ' वह गलती क्या है ?' के मायावी जाल में फंस चूका था . जितना निकलने की कोशिश कर रहा था , उतना ही उलझ रहा था . 
' चलो साहब .' सुपरवाइझर ने कहा . 
हमारी टीम फिर से युद्ध के लिए रणभूमी मे उतरी . कॉलम की चार पंक्तियां और पार की ... नतीजा , ढ़ांक के तीन पात ! नौवी पंक्ति में मै हर कॉलम चेक कर रहा था , अचानक एक कॉलम की दिशा मे फर्क महसूस हुआ . मैने मजदूर से खाली ड्रम और ड्रॉइंग उस कॉलम के पास मंगाई . यहॉं सवाल के जवाब की गुंजाईश दिख रही थी . विजय समीप दृग्गोचर हुआ .  जवाब में गलती ना रहे इस लिए मटके जैसा ठोंक बजा के देखा . यह कॉलम महाशय अपनी दिशा से भटके थे ! जाना था जापान , पहुंच गये चीन ! मजदूर को स्टोर से लाल पेंट लाने को कहा . और जिस सवाल के जवाब मे मै चार रात सो नही पाया था , उस गुस्से की पहली मार पडी सुपरवाइझर पर ! वह मजदूर पेंट ले कर भागते भागते आया . मैने उस कॉलम पर लाल पेंट से क्रॉस की विजयी निशानी लगाई . 
' साहब , मुझे पता था यह कॉलम हुआ है . मैने बताने की कोशिश की तो आपने मुझे बोलने नही दिया .' मजदूर ने कहा . 
' यह गलती मुझे खोजनी थी . कल इस कॉलम को तोडो . ' मैने सुपरवाइझर को बोला . 
तभी कंपनी के MD साहब की गाडी आई . 
' सवाल का जवाब मिला ?' MD साहब ने पास आकर पूछा ‌ .
' जी सर..इस कॉलम की orientation गलत है ' मैने कहा . 
' congratulations...' MD साहब ने कहा और निकल गये . 
( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, July 6, 2022

अजब गजब - ९६ : बाबा रामदेव जी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९६ : बाबा रामदेव जी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
नमो भगवते नेतल नाथाय सकल रोग हराय सर्व सम्पति कराय ।
मम मनोभिलाषितं देहि देहि कार्यम् साधय , ॐ नमो रामदेवाय स्वाहा ।।

बाबा रामदेव जी का रामसा पीर , रामदेव जी , रामदेव पीर इ बी नाम स . बाबा रामदेव जी राजस्थान का परसिध्द लोक देवता स . बाबा रामदेव जी , लोकदेवता हडबू जी सांखला ( परमार ) को मावसभाई स . बाबा रामदेव जी की समाधि रामदेवरा ( जयसलमेर ) म पोकरन पासीन १० कि.मी. दूर स . 
बाबा रामदेव जी को जलम बि . स . १४०९ म भादवा क उजरी ( चांदनी ) दूज ला भयो . बाबा रामदेव जी का पिताजी अजमल जी तंवर '  रुणिचा ' का राजा होता . माय को नाव ' मैणादे ' आन् बडो भाई को नाव विरमदेव होतो . बाबा रामदेव जी ला दुइ बहिन होती , सगुना आन् लांछा नाव की . 
राजा अजमल जी नि : संतान होतो . भगवान किस्न देव की किरपा कन् वून ला पोटू बाटू भया . आन् भगवान न खुद बाबा रामदेव जी क रूप म जलम लेयो , असी मान्यता स . 
बाबा रामदेव जी क जलम क बेरा कयी चमत्कार भया . महाल म जेतरा पानी का बरतन होता वूई दूध कन् भर गया . आकासवानी भयी . आंगना म कुकू का पाऊंडना बन्या . देऊर की घंटी बाजन ला लागी . 
बाबा रामदेव जी को बिह्या अमरकोट ( पाकिस्तान ) को राज्यो दलपत जी सोढा परमार की पोटी नैतलदे ( निहालदे ) संग भयो . बाबा रामदेव जी का गुरू , गुरू बालीनाथ होतो . 
बाबा रामदेव जी न भयरव दयीत को वध कऱ्यो . 
रामदेवरा पासीन १० कि.मी. दूर पांच पीपली तीरथ स . यहान च बाबा रामदेव जी ५ मुसलमान साधु ला भेट्याता . बाबा रामदेव जी न आपलअ जीवन म २४ चमत्कार दिखाड्या . १५ सदी म जात पात , देव धरम घाडा कडक रिवाज का होता . पर बाबा रामदेव जी सबन जात धरम म सतसंग कऱ्यो आन् सामाजिक समरसता को संदेस देयो . सबन लोगना क भला साठी रामसरोवर खांद्यो . 
वूई हरदम आपलअ लीला नाव क पांढरअ घोडा की सवारी करत होता . 
बाबा रामदेव जी ला हर जातपात का , धरम का लोगना मानस . मुसलमान लोग वून ला रामसा पीर कोस ‌ . 
वि.स. १४४२ म बाबा रामदेव जी न जीतअ पन म समाधि लेई . बाबा रामदेव जी की परम भगत डाली बाई ला जब मालूम भयो क बाबा समाधि लेनी वाला स , तब डाली बाई न कह्ये क - बाबाजी तुमारअ पह्यले मु समाधि लेऊस . आन् वून न बाबा रामदेव जी क पह्यलअ समाधि लेई . 
रामदेवरा क देऊर म तीन समाधि स . मंझार म बाबा रामदेव जी , येक आंगअ बाबाजी को आजो रणसीजी आन् दुसरअ आंगअ माय मैणादे की समाधि स . बाबा रामदेव जी न समाधि लेई तब पासीन वहान अखंड जोत बर रहीस ‌. 
हर साल रामदेवरा म भादवा  मह्यना क उजरी दूज पासीन येकादसी वरी मोठो मेलो भरस . हर जाति धरम का १५ लाख लोगना बाबाजी क दरस्यन साठी आवस . 
महान समाजसुधारक , लोकदेवता बाबा रामदेव जी ला कोटी कोटी नमन ....

( सहयोग : इंजि . जालम सिंग सोढा , बिकानेर )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, July 5, 2022

दूर नदियॉं किनारे. Hindi language _ हिंदी भाषा

दूर नदियॉं किनारे
Hindi language _ हिंदी भाषा

पानी से खेलती शाखा
छिंद पर्ण अनियारे
बंटे रेखाएं तरल
दूर नदियॉं किनारे ।

किश्ती की उछल कूद
रंग तरंग नियारे
चहकते नभचर
दूर नदियॉं किनारे ।

झूले बया का घोंसला
छाया अपनी निहारे
पाए स्निग्ध शीतलता
दूर नदियॉं किनारे ।

मोड नदी का कुंडल
खूबसूरत नजारे
मनभावन एकांत
दूर नदियॉं किनारे ।

होते सजल नयन
खाते झकोले मुनारे
संध्या नारिंगी हिलोर
दूर नदियॉं किनारे ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, July 3, 2022

मेरे सपने , मेरे अपने. ( हिंदी कविता ). Hindi language _ हिंदी भाषा

मेरे सपने , मेरे अपने
Hindi language _ हिंदी भाषा

विचारों का समुद्र मंथन
लगा कूर्म , वासुकी कॉंपने
हलाहल के साथ अमृत
मेरे सपने , मेरे अपने ।

मंथन की उथल पुथल
लगा रत्नाकर तडपने
याद है कुछ भुले बिसरे
मेरे सपने , मेरे अपने ‌

सुर असुर की अभिलाषा
लगी मर्यादा को भी नापने
आकांक्षा की उॅंची उडान है
मेरे सपने , मेरे अपने ।

दिति अदिति की संतान में
महामेरू भी लगा चपने
सत्य को अनसुना करते
मेरे सपने , मेरे अपने ।

हर एक के ललाट पर
लगे गुट के नाम छपने
सौदागरों के हाथ लगते
मेरे सपने , मेरे अपने ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


Saturday, July 2, 2022

यादें , सवाल की - भाग २. Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें , सवाल की - भाग २
Hindi language _ हिंदी भाषा

घर लौट रहा था अपनी ही उधेड़बुन में ! क्या करू... क्या करू ? सातवी कक्षा का अदना सा दिमाग . पहले सोचा , प्रयत्न और भाग्य की परिभाषा क्या होनी चाहिए .. प्रयत्न कर्म का वर्तमान रूप है.. उसे अनुभव किया जा सकता है , देख सकते है , नाप तौल सकते है . लेकीन भाग्य ? उसका परिमाण ?  भाग्य की भी परिभाषा बनानी होगी . भाग्य पहले भी है और बाद मे भी है . मतलब , कर्म का भूतकाल और भविष्यकाल ही भाग्य है ! मै खुश हो गया . चलो मुद्दे के आसपास तो पहुंच गया... और घर भी पहुंच गया . 
खाना खाने के बाद सोचने लगा कल की योजना के बारें में . वैसे भी मैने आखरी मे ही बोलना था . सबके बचाव बिंदू / मुद्दे ही मेरे हथियार बन सकते थे . सोचते सोचते सो गया . 
सुबह से मैने स्पर्धा के बारे में सोचना बंद कर दिया . मेरा नंबर वैसे भी शाम के पहले आने वाला था . आराम से दोपहर को स्कूल गया . हॉल खचाखच भरा हुआ था . बाहर भी बहुत भीड थी . लाऊड स्पीकर की वजह से आवाज सुनाई आ रही थी . बाहर की भीड में मै सामील हुआ . ज्यादातर विद्यार्थी प्रयत्न की ओर से बोलने वाले ही थे . मै अब थोडा परेशान हुआ . स्टेज , डायस , वक्ता , परीक्षक , अतिथि , श्रोता के दर्शन मुझे नही हो रहे थे . बेफिकिरी का आलम ऐसा की अस्मादिक ( मै खुद ) कागज लाना भूल गया . अब विरूद्ध पक्ष के मुद्दे कैसे नोट करता ? बगल में खडे दो चार लोगों से पूछा . कई ने अनसुना कर दिया . कुछ समय बाद एक ने जेब मे से दो ST Bus की टिकट निकाल कर मुझे दी . डूबते को तिनके का सहारा ! पाव बित्ता वह कागज का टुकडा... उस में भी कंडक्टर के किए पंच . छोटे छोटे अक्षरों में मैने मुद्दे नोट किए . ( वह भी केवल मै ही पढ़ सकता था ! ) खडे खडे पैर दुखने लगे . ऐसी मुसीबत पहली बार ही झेल रहा था . हृदय की धडकने तेज हो गयी थी . पसीना भी छूट रहा था . मूड की ऐसी तैसी हो रही थी . वापिस घर जाने का विचार भी कुलबुला रहा था . लेकीन संकोच वश और इज्जत ( !) की खातीर ऐसा नही कर सका . 
टिकट का पृष्ठभाग भी बारीक बारीक अक्षरों से हाऊसफुल्ल हो गया . अब दिमाग के पन्ने पर नोट करना प्रारंभ किया . सोचा , मेरा मुद्दा ही बेकार है ! पुरस्कार तो मिलने से रहा . बेइज्जती होगी वह अलग ! अब बेचैनी बढ़ने लगी . निराशा के बादल मंडराने लगे . धैर्य का बांध टूटने की कगार पर आया . हॉल मे गुॅंजती तालियों की आवाज अब मुझे चिढ़ाने लगी . सब मुझे देख कर हंस रहे है , ऐसा मुझे आभास हो रहा था .
अंत मे मेरा नाम पुकारा गया . मै भीड़ से अंदर घूसने की कोशिश करने लगा . जैसे तैसे हॉल के भीतर पहुंचा . स्टेज की तरफ बढ़ा तो अतिथियों के साथ विराजमान फालके सर मेरी ओर देख कर मुस्कुराए . मै डायस की ओर बढ़ा और माईक को एडजस्ट किया . औपचारिकता के बाद मैने प्रयत्न और भाग्य की अपनी गढ़ी हुई परिभाषा बताई . तालियों की गुॅंज से मेरी परिभाषा का स्वागत हुआ . ज्यादातर विद्यार्थियों ने भाग्य को भगवान के प्रतिरूप में प्रस्तुत किया था . मैने उन की  इस गलती का भरपूर फायदा उठाया . टिकट के पीछे लिखे मुद्दे और जितने मुझे याद आ रहे थे , उन्हे एक एक कर , रणभूमी मे खडे शत्रू की भांति बेरहमी से, अपनी तर्क की तलवार से काटता गया . आवाज में जोश और शब्दों में आव्हान अपने आप ही पैदा हुआ ! सटीक वार करता गया . दिन भर की भडास शब्दों से प्रस्फुटित हो रही थी . श्रोता में हमारे मराठी के अध्यापक भी विद्यमान थे . कर्म के आगे और पीछे भाग्य का ऐसा शब्द जाल बुना की असहमती के लिए जगह ही न बचे ! वर्तमान के प्रयत्न के बीज और भूतकाल से भविष्य काल तक फैला भाग्य का वटवृक्ष ! वेदान्त , दार्शनिकों के उद्धरण , प्रतिस्पर्धियों की गलतियां उजागर करते तर्क से माहौल ही बदल गया . मेरी अपेक्षा से ज्यादा उत्स्फूर्त प्रतिसाद मिला . अपना भाषण समाप्त कर मै स्टेज से उतरा . श्रोताओं में बैठे देशमुख सर ने मुझे पास बुलाया . गोदी में बिठा कर मेरा सर चुमा . अध्यक्षीय भाषण में मेरा ही उल्लेख बार बार आ रहा था . मेरा भाग्य आज अच्छा था लगता !!!
पुरस्कारों की घोषणा हुई . अंत से प्रारंभ हुआ ‌. मेरा नाम नदारद था . मेरा दिल बैठा जा रहा था . अब भाग्य के हिंडोले पर , कभी उपर - कभी नीचे दोलायमान मै ! दुसरे क्रमांक पर भी मेरा नाम नही था . मैने मुड कर देशमुख सर की ओर देखा . उन्होंने मेरा सिर थपथपाया . अंत मे प्रथम क्रमांक की घोषणा करने के लिए खुद अध्यक्ष महोदय ने माइक थामा . हॉल शांत था . मै उदास था . प्रथम क्रमांक की घोषणा हुई.... सुरेश....
मै देशमुख सर की गोदी से नीचे उतरा . देशमुख सर ने मुझे उठाया और स्टेज तक ले आए . मैने सभी अतिथियों के और फालके सर के पैर छूये . फालके सर ने गले लगाया . हॉल तालियों की कडकडाट से गुॅंज उठा . मेरी ऑंखें अपने आप नम हो गयी . यही तो भाग्य था... सौभाग्य था !!!!!!! 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर