यादें _ सवाल की ! - भाग ३
Hindi language _ हिंदी भाषा
कॉलेज से ताजा ताजा इंजिनिअर बन के निकले थे . इधर उधर हाथ पैर मारने के बाद एक प्रायव्हेट कंपनी मे नौकरी मिली . कंपनी भी कोलकाता से नागपूर अभी अभी आई थी . नागपूर मे ही साइट !
इंटरव्ह्यू मे मुझे बोला गया की साइट पर कुछ गलती हुई है . ' वह गलती क्या है ?' इस सवाल का सही जवाब मै ढुंढ पाया तो , नौकरी पक्की !
' वह गलती क्या है ?' , यह सवाल मेरे जॉब का बंद मेन गेट बना . गलती ढुंढ नही पाया तो ! सिर मे दनादन हथौडे चल रहे थे . इस सवाल का जवाब मेरे भविष्य की कुंजी थी . यह तो क्षमता की अग्निपरीक्षा थी . पराजय का डर पहली बार महसूस किया .
चलो , श्रीगणेशा तो करते है ... आगे की आगे देखेंगे ... , मै अपने आप को समझा रहा था .
अब प्रेक्टिकल पढ़ाई शुरू हुई . साइट , डिपार्टमेंट के इंजिनिअर , स्टाफ , ठेकेदार यह सब मेरे गुरू . मै केवल निरीक्षण ही कर रहा था . दिन भर साइट के वर्किंग ड्राइंग पढ़ता , समझने की कोशिश करता और रात में घर मे building construction की किताब पढ़ता .
दो दिन में agreement , schedule , specifications पढ़ा . सब अपना काम करते , मै ' वह गलती क्या है ?' के उत्खनन मे लगा रहता . छोटी मोटी बातें तो पूछ लेता था , पर उस गलती पर पूछने की हिम्मत नही होती थी . अपने आप को underestimate क्यो करना ! उपर से संकोची स्वभाव !!
Foundation work चालू था . मै working drawings की एक एक लाईन , शब्द , मेजरमेंट को बडे गौर से देखता और कुछ क्लू मिल जाए _ यही खोजता रहता था . तीन दिन हो गये . गलती मेरे साथ लुकाछिपी खेल रही थी . मै हताश , परेशान उसे शिद्दत से ढुंढने की कोशिश में लगा था . निराशा के बादल मंडरा रहे थे . हिम्मत जवाब देने लगी थी , लेकीन सवाल का जवाब नही मिल रहा था . पहली जॉब शायद इस सवाल के चक्कर में शहीद हो जाएगी !
साइट पर एक हरफनमौला मजदूर था . वह इतने भिन्न भिन्न काम करता था , की उसका designation लिखना मुश्किल ! चौथे दिन उसको पकडा . टेबल पर plinth drawing फैलाया . गलती कही न कही कॉलम में ही होगी , ऐसा लग रहा था . उस मजदूर को टेप , लाईन डोरी लाने को कहा . सुपरवाइझर से सेंटर लाईन की खूॅंटियॉं साफ करवाई . अब आरपार की लड़ाई प्रारंभ हुई . साइट ही रणभूमी बनी . नौसिखिया सेनापती युद्ध की कमान थामे था . विपक्ष का हमला कभी भी हो सकता था . विपक्ष अनुभव संपन्न और होशियार था ! यह चींटी और हाथी की लड़ाई थी .
सभी इंद्रियॉं शस्त्रविहिन थी , केवल छठी इंद्रिय का ही सहारा था ! मैने साइट पर लाईनडोरी से चक्रव्यूह रचा . एक एक कॉलम को मिलिमीटर के हिस्से तक परख रहा था . उस हरफनमौला मजदूर ने बीच में बोलने की कोशिश की , मैने उसे इशारें से चूप कराया . अब मै और मेरी एकाग्रता के बीच , मै कोई भी व्यवधान नही चाहता था . अब " मिशन गलती " का बिगुल बज गया था .
लंच तक कॉलम की चार पंक्तियां लांघ चूका था , लेकीन ' गलती ' वाला महाशत्रु हाथ नही लगा था . सब लंच कर रहे थे . मेरे लिये तो खाना पीना हराम हो गया था . मै ' वह गलती क्या है ?' के मायावी जाल में फंस चूका था . जितना निकलने की कोशिश कर रहा था , उतना ही उलझ रहा था .
' चलो साहब .' सुपरवाइझर ने कहा .
हमारी टीम फिर से युद्ध के लिए रणभूमी मे उतरी . कॉलम की चार पंक्तियां और पार की ... नतीजा , ढ़ांक के तीन पात ! नौवी पंक्ति में मै हर कॉलम चेक कर रहा था , अचानक एक कॉलम की दिशा मे फर्क महसूस हुआ . मैने मजदूर से खाली ड्रम और ड्रॉइंग उस कॉलम के पास मंगाई . यहॉं सवाल के जवाब की गुंजाईश दिख रही थी . विजय समीप दृग्गोचर हुआ . जवाब में गलती ना रहे इस लिए मटके जैसा ठोंक बजा के देखा . यह कॉलम महाशय अपनी दिशा से भटके थे ! जाना था जापान , पहुंच गये चीन ! मजदूर को स्टोर से लाल पेंट लाने को कहा . और जिस सवाल के जवाब मे मै चार रात सो नही पाया था , उस गुस्से की पहली मार पडी सुपरवाइझर पर ! वह मजदूर पेंट ले कर भागते भागते आया . मैने उस कॉलम पर लाल पेंट से क्रॉस की विजयी निशानी लगाई .
' साहब , मुझे पता था यह कॉलम हुआ है . मैने बताने की कोशिश की तो आपने मुझे बोलने नही दिया .' मजदूर ने कहा .
' यह गलती मुझे खोजनी थी . कल इस कॉलम को तोडो . ' मैने सुपरवाइझर को बोला .
तभी कंपनी के MD साहब की गाडी आई .
' सवाल का जवाब मिला ?' MD साहब ने पास आकर पूछा .
' जी सर..इस कॉलम की orientation गलत है ' मैने कहा .
' congratulations...' MD साहब ने कहा और निकल गये .
( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर