मेरे सपने , मेरे अपने
Hindi language _ हिंदी भाषा
विचारों का समुद्र मंथन
लगा कूर्म , वासुकी कॉंपने
हलाहल के साथ अमृत
मेरे सपने , मेरे अपने ।
मंथन की उथल पुथल
लगा रत्नाकर तडपने
याद है कुछ भुले बिसरे
मेरे सपने , मेरे अपने
सुर असुर की अभिलाषा
लगी मर्यादा को भी नापने
आकांक्षा की उॅंची उडान है
मेरे सपने , मेरे अपने ।
दिति अदिति की संतान में
महामेरू भी लगा चपने
सत्य को अनसुना करते
मेरे सपने , मेरे अपने ।
हर एक के ललाट पर
लगे गुट के नाम छपने
सौदागरों के हाथ लगते
मेरे सपने , मेरे अपने ।
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
No comments:
Post a Comment