Thursday, July 29, 2021

अजब गजब - ७४ : रतनगढ़ वाली माता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७४ : रतनगढ़ वाली माता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

ॐ जय अम्बे मैय्या , जय जगदम्बे मैय्या 
माता रतनगढ़ वाली , पार करो नैय्या 
जय माडुला मैय्या ।

मध्य परदेस म रामपुरा गाव पासिन ५ कि.मी. आन् दतिया पासिन ५५ कि.मी. प रतनगढ़ वाली माता को परसिध्द मंदिर स , उसो च माता को भाई ' कुंवर महाराज ' को मंदिर स . मध्य परदेस , राजस्थान , उत्तर परदेस अन् देसभर  म माता जी ला माननी वाला लाखो भगत स . 
जंगल मंझार येक उच्ची पहाडी पर रतनगढ़ वाली माता को मंदिर स , पर वहान आब कोई गाव नहाय . यहान रतनगढ़ किल्ला को खंडारो स . रतनगढ़ क पहाडी ला तीन आंग कन् सिंध नदी न घेरेस . किल्लो बांधन साठी या साजरी जागा होती . गढ़ को बांधकाम पत्थर कन् करेतो . येक येक दिवाल १२ फीट चवडी ! 
यासिन ८ मयील दूर देवगढ़ को किल्लो स , जेकी हालत आब बी ठीकठाक स . 
१ . इतिहास : * आज पासिन ४०० बरस पह्यले यहान परमार राजो रतनसिंग महाराज को राज होतो . वून ला ७ पोटू अन् येक पोटी होती . राजकुमारी मांडुला ( माडुला ) खूबसुरत अन् गुनवान होती . 
* अलाउद्दीन खिलजी की पापी नजर रतनगढ़ पर पडी . वोनऽ पह्यले सेंवढा सिन रतनगढ़ आवनी वालो पानी बंद कऱ्यो . राजकुमारी मांडुला अन् राजकुमार कुंवर गंगाराम देव न येपर नाराजगी जताई अन् विरोध कऱ्यो . अलाउद्दीन खिलजी की नजर रतनगढ़ रियासत अन् राजकुमारी मांडुला प होती . वोन रतनगढ़ प भारी फऊज लेकन हमलो कऱ्यो . रतनगढ़ नानी सी रियासत होती पर परमार वीर देस साठी जीव देन ला आघ पासऽ नी देखत होता . घनघोर लढाई सुरू भयी . येनऽ लढाई म ६ राजकुमार ला वीरमरण आयो . राजकुमारी मांडुला न ७ वो राजकुमार कुंवर गंगाराम देव तिलक कर लढाई म पठायो . दुसमन की फऊज खूब मोठी होती . आखरी उपाव सोच कन् राजकुमारी मांडुला अन् राजकुमार कुंवर गंगाराम देव न खाई म कुद कन् इज्जत बाचाडी . 
* रतनगढ़ बरबाद भयो . रतनगढ़ बाद म नांद्यो च नी . रात कन् वहान कोनी च ठह्यरत नी होता . रतनगढ़ प राजकुमारी मांडुला अन् राजकुमार कुंवर गंगाराम देव जी की समाधी बांधी , आन् रतनगढ़ सिध्दपीठ बन्यो . राजकुमार कुंवर गंगाराम देव जी क चबुतरा ला  ' कुंवर साहब को चबुतरो ' कोस .
जवर च स्मारक हजीरा स . यहान हजारों मुसलमान ला गाडेस . 
* छत्रपती सिवाजी महाराज ला जब अवरंगजेब न आगरा म बंदी बनायाता , तब रामदास स्वामी रतनगढ़ वाली माता क दरबार म आयाता . वून नि नवस ( मन्नत ) कऱ्यो . रतनगढ़ वाली माता क आसिरवाद कन् छत्रपती सिवाजी महाराज आगरा परिन महाराष्ट्र म आया . नवस ( मन्नत ) कबुल्योतो अन् रतनगढ़ वाली माता को आसिरवाद बी भेट्येतो , तेकन छत्रपती सिवाजी महाराज न इ भव्य मंदिर बनायो . मुसलमान पर विजय की या निस्यानी होय ! 
* १६ अक्तुबर २०१५ ला यहान १९३५ कि.ग्र. की पितरी घंटी लगाइस . या देस म सब सिन भारी - वजनी घंटा स ! येन घंटी की येक खासियत स क , वोला ४ बरस पोटू पासिन ८० बरस क बुजरूक वरी कोनी ला बी बजावता आवस . 

२. मान्यता : * राजकुमार कुंवर गंगाराम देव जी सिध्दपुरूस होतो . जब वूई जंगल मिन जात होता तब जह्यरी जनावर आपरो जह्यर बाहर निकार कन् धरता . जेन मानुस - बाई , जनावर ला सरप बिचू डसस , वून ला कुंवर साहब क नाव कन् बंध लगावस . बंध लगाया कन् जह्यर  फयलत नी अन् जीव बाचस . इ बंध धागा को नी रव्हत , सिरफ कुंवर साहब की आन देय कन् डस्या जागा क भवताल उंगल फेर देस , येला च ' बंध ' कव्हस . 
* राजकुमारी मांडुला अन् राजकुमार कुंवर गंगाराम देव जी म खूब आपसी माया होती . रतनगढ़ म कारतिक उजरी दूज ( भाईदूज) ला यातरा भरस . उसो त नवरातरी पासिन च भगत लोग रतनगढ़ ला आवनी चालू होस . नवरातरी म नव दिन मातारानी की सेवा होस . नवस ( मन्नत ) का बोया ती जवारा अन् परसाद मातारानी ला चढावस . नवरातरी पासिन इ पर्व चालू होस . भाई दूज , पांडव पंचमी पासिन खूब भीड बाहाडस . २५ लाख लोगना रतनगढ़ क दरबार म आवस . 
* कुंवर साहब का जिन ला बंध लगायतो ती तमाम मानुस - जनावर भाईदूज क दिन बंध काटन ला रतनगढ़ आवस . इ बंध जब पुजारी काटस तब बंध वाला ला झ्येंडू ( मूर्च्छा ) आवस . लोगना पकडकन् वून ला कुंवर साहब क चबुतरा की परदकसिना करावस . वोक बास्त वूई ठीक होस आन् वून ला घर जान देस . 
* बुंदेलखंड क हर गाव म येक चबुतरो रव्हस , जेपर दुय इटना धरस . येला कुंवर साहब को चबुतरो कोस . बुंदेलखंड म कुंवर साहब की लोक देवता क रूप म पूंजा होस . 
* रतनगढ़ को भाई दूज को मेलो ( यातरा ) बहिन भाई क अमर आपसी प्रेम की निस्यानी स !
* ८२ बरस उमर का पं. धनीराम कटारे मातारानी क दरबार म पुजारी स . आब वून की या ५ वी पीढी स . 

ॐ जय रतनगढ़ वाली माता की 
ॐ जय कुंवर साहब की..

( सहयोग : इंजि. जालमसिंह जी सोढा , जोधपुर ) 

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर



Monday, July 26, 2021

अजब गजब - ७३ : वीर कुंवर चैन सिंह जी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७३ : वीर कुंवर चैन सिंह
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शहिदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशॉं होगा ।

मध्य परदेस क राजगढ़ जिला म ३०० बरस पुरानो अन् भोपाल पासिन ८३ कि.मी. दूर नरसिंहगढ़ स . दीवान परसराम म इ.स. १६८१ म यकी स्थापना करीती . नरसिंहगढ़ रियासत पर उमठ परमार वंस को राज होतो . 
* शहीद वीर कुंवर चैन सिंह जी उमठ परमार वंस क नरसिंहगढ़ रियासत का राजकुमार होता . भोपाल पासिन ३५ कि.मी. दूर पसचिम म भोपाल - इंदौर सडक प अंगरेज की फऊज छावनी होती . वूई अगल बगल क रियासत ला घाडाच तरास देत होता अन् पेंसन क बदला म रियासत सोडन ला कव्हत होता . नरसिंहगढ़ रियासत वून को आयकत नी होती . जनरल मैडॉक अन् जानसन न नरसिंहगढ़ ला कयी डाव इतल्लो पठायतो  . तब नरसिंहगढ़ का युवराज वीर कुंवर चैन सिंह जी भेटन ला गया . वून क संग हरदम हिम्मत खान , बहादुर खान अन् लाडलो सेरू नाव को कुतरो रव्हत च होता . हिम्मत खान अन् बहादुर खान इ सारंगपुर जवर क गाव धनौरा का सग्गा भाई होता . बयठक भयी पर कोनतोच नतिजो नी निकऱ्यो . 
* अंगरेज न अऊर निरोप धाड्यो . तब वीर कुंवर चैन सिंह जी न वून सिन टक्कर लेन की सोची . तब वीर कुंवर चैन सिंह जी की उमर सिरफ २३ बरस होती . वीर कुंवर चैन सिंह जी कायी जागीरदार , हिम्मत खान - बहादुर खान , सेरू अन् ४३ सयनिक लेकन चाल पड्या देस क दुसमन सिन बगावत करन साठी ! जिन को वंस आघ नी बाहाडेतो , वून ला वीर कुंवर चैन सिंह जी न पासऽ धाडे . वून ला मालूम होतो क लढाई म बाचन की गुंजाईस नहाय ... वून ला लढाई म मरनो कबुल होतो पर अंगरेज की गुलामी कबुल नी होती . अंगरेज क फऊज क आघ वूई चिंटी सरखा होता पर देसभक्ती को जजबो हत्ती सरखो होतो ! 
* २४ जुलाई १८२४ ला वीर कुंवर चैन सिंह जी अंगरेज क छावनी कितऽ रवाना भया . लाला भागीरथ क हाथ कन् इतल्लो पठायो . वीर कुंवर चैन सिंह जी अन् जनरल मैडॉक की भेट भयी . जनरल मैडॉक न वून क तलवार की तारीफ कर कन् येक तलवार लेय डाली . वोन अऊर दुसरऽ तलवार की तारीफ करी . वीर कुंवर चैन सिंह जी समझ गया क जनरल मैडॉक क मन म खोट स . वीर कुंवर चैन सिंह जी न बिजली क फुरती कन् वोपर हमलो कऱ्यो . अंगरेजी फऊज पह्यले पासिन च लढाई साठी तयार होती . घनघोर लढाई भयी . या लढाई दिवा अन् तुफान को मुकाबलो होतो ! वीर कुंवर चैन सिंह जी न अंगरेज क अस्टधातु कन् बनी तोप प तलवार कन् वार कऱ्यो . तलवार कन् तोप त कटी पर वून की तलवार वोम फस गयी . आन् यहान च घात भयो . तोपची न सीधऽ वीर कुंवर चैन सिंह जी क गरदन प वार कऱ्यो . वून को मुंडो वहान च कट कन पड्यो . वून को घोडो वीर कुंवर चैन सिंह जी क धड ला लेकन नरसिंहगढ़ आयो . वीर कुंवर चैन सिंह जी का सबन संगी साथी ला  वीरगती भेटी , येम सेरू बी आयो ! 
* वीर कुंवर चैन सिंह जी स्यहीद भया , असी खबर कुंवरानी जी ( राजावत जी ठिकाना मुवालिया )  ला भेटी . वून न तब पासिन अन्नत्याग कऱ्यो . सारऽ जिंदगी भर वून न झाडपत्ती अन् कंदमुर - फर पर च गुजारो कऱ्यो . परसुराम सागर जवर वून न देऊर बनायो , जेला कुंवरानी मंदिर कोस . 
* वीर कुंवर चैन सिंह जी की येक समाधी सीहोर - इंदौर सडक प लोटिया नदी काठऽ दसरा वाला मयदान पासिन २ कि.मी. दूर स . ( यहान लढाई भयीती .)  दुसरी समाधी नरसिंहगढ म स . स्यहीद वीर कुंवर चैन सिंह जी की देव रूप म पूंजा होस . वून क समाधी प कंकड धर कन् नवस मानस . 
* आमाला इ.स. १८५७ की अंगरेज सिन की लढाई मालुम स . पर वोक ३३ बरस पह्यले च वीर कुंवर चैन सिंह जी न स्वतंत्रता क होम म आपली आहुति देयीती . अंगरेज क खिलाफ स्वराज साठी , देस साठी पह्यलो स्यहीद , वीर कुंवर चैन सिंह जी स . 
* इ.स. २०१५ पासिन सिहोर क छतरी ( समाधी ) प सरकार किथीन ' गार्ड ऑफ ऑनर ' सुरू भयो . 
२४ जुलाई ला सिहोर अन् नरसिंहगढ़ क छतरी प हर साल सरकार किथीन ' गार्ड ऑफ ऑनर ' देना म आवस . 
२४ जुलाई ला ' बलिदान दिवस ' क रूप म मनावस . 
' जय स्यहीद वीर कुंवर चैन सिंह महाराज जी की ..'

( सहयोग : इंजि . जालमसिंह सोढा जी जोधपुर ) 
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Tuesday, July 20, 2021

भोयरी संस्कृति - ४३ : वाघाटा की भाजी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ४३ : वाघाटा की भाजी
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Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

आस्याढक क मह्यना म खेत क धुरा प , कुप प येक काटावाली येल ( बेल ) दिसस . वोला लिंबू येतरा मोठा फर ( फल ) आवस . वका फोतराना ठोकर रव्हस अन् मंझार म बी रव्हस ; येलाच वाघाटा कोस . या येक परकार की रानभाजी च स . पर येको बी बेगरो च महिमो स ! 
* वाघाटा को स्यास्तर को नाव ' Capparis zeylanica ' स . वाघाटा ला ' गोविंद फर (फल ) ' बी कोस . संस्कृत म यको नाव व्याघ्रनखी , कराम्भा , तपसप्रिय स . येला गुलाबी फुलना आवस . 
* वाघाटा म दवाई गुन स . थायराईड , चमडी की बिमारी , कफ , वात , पित्त , भगंदर , पेटदुखी , आसुक , हागी , सूजन पर वाघाटा की पत्ती , मुर आन् फर दवाई को काम करस . 
* वाघाटा की भाजी करन साठी पह्यले वका बीज निकारस . मंग ठोकर फोतरना ला वाफाय लेस नी त उकड लेस . मंग वून ला बघारकन् मोकरी भाजी करस . 
* आब येन भाजी म नवल की बात का स ? .....
_ आस्याढी येकादसी को उपास रव्हस . आन् दुसरऽ दिन बारस ला उपास सोडस . त बारस क दिन आस्याढी येकादसी को उपास सोडन साठी पाची पकवान संग च ' वाघाटा क भाजी ' को बी नेम होतो . आब की येक दुय पिढी ला त या भाजी बी मालूम नहाय ; आन् कोनी आंगुन कन् खात बी नही . 
( बेगबेगरऽ जिला म वाघाटा क भाजी को नाव बी बेगबेगरो होयेन . वूसाच नेम नियम बी बेगरा होयेन . या वरधा अन् नागपूर जिला पुरती मला मालूम स . ) 

( सहयोग : सौ. पार्वतीबाई देशमुख ) 
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

दिंडी चालली पंढरी. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

दिंडी चालली पंढरी
 Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

दिंडी चालली पंढरी
दरस्यनाले आतुर
दुमदुमली पांढरी
वारा सुवासे कापूर ।१।

परपंचाचे झमेले
आता राह्यले गा दूर
झाले येव्हारात येले
मांगं सरले काहूर ।२।

येड्या बांगड्याची सेवा
साधेसुधे गा दस्तुर
गोड मानून घे देवा
आला भरूनिया ऊर ।३।

तीर भिवरेचा लाल
सारे भजनात चूर
नभी अबीर गुलाल
तुका ग्यानबाचे सूर ।४।

माथा टेकू दे पायासी
रुनझुनु दे नुपूर
बोल बोल रे माह्यासी
मुक्या स्यबद नुपुर ।५।

भावभगतीचा पूर
मनामंदी हुरहुर
रूप गोजिरे इठूचे
काय वरनू मी नूर ।६।

रुंजगुंजते मनात
धुंद बासरीचे सूर
आमी जित्रब रानात
नादावतो चवखुर ।७।

हर हरी येकरूप
तालासुराचा तंबूर
रूप देवा अपरूक
काटे काढाया आंबूर ।८।

पुंडलिका पांडुरंगा
आभा गाभ्याची टिपूर
भुलवसी सीरीरंगा
रंग रंगाले फितूर ।९।

इठुमाई रखुमाई
जीवा सिवाचे गा धूर
मायमावली इठाई
नाम हिरद्या मधुर ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, July 17, 2021

माह्या वावराची माती. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

माह्या वावराची माती
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

तिच्या आंगोपांगी फुले
दादा अनाजाचे मोती
साऱ्या जगाले पोसते
माह्या वावराची माती ।१।

उन वाऱ्या पान्यामंदी
होये धडधड छाती
घास देये लेकराले
माह्या वावराची माती ।२।

बरसादीत लक्सुमी
मंग लंका पाराबती
उन सावलीत खेले
माह्या वावराची माती ।३।

तिच्या आंगचा सुगंध
दिवऱ्याची उदबत्ती
आस सासात रुजते
माह्या वावराची माती ।४।

मोठा हरीखे वावर
भाऊ पेरणीच्या घाती
लडे उघाड पडल्या
माह्या वावराची माती ।५।

पोट ज्याच्याच्यानं भरे
त्याची दूरदस्या किती
नाही डागेल डुगेल
माह्या वावराची माती ।६।

झिजे भागाच्या रेघोट्या
नाही खडकू बी हाती
भिजे घामा आसवानं
माह्या वावराची माती ।७।

किती पिढ्या जगवल्या
आता इझल्या गा वाती
बेइमानीनं लुटली
माह्या वावराची माती ।८।

साध्या वावराले भोये
बेपाऱ्याच्या कुरापती
किती फाकन फाकन
माह्या वावराची माती ।९।

तुमी गनिताचे पक्के
सुद्या मांगं साडेसाती
इठु मावलीचा गंध
माह्या वावराची माती ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, July 16, 2021

अजब गजब - ७२ : महारानी सईबाई. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७२ : महाराणी सईबाई
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अजब  गजब ७० म फलटन रियासत की जानकारी लिखीती . निंबराज ( पह्यलो ) परमार ( पवार ) न मालवा मिन आय कन् फलटन रियासत की इ.स. १२८४ म  स्थापना करी . येन राज कुर ला ' नाईक निंबाळकर ' , ' फलटनकर ' नाव कन् वरखस . 
येन राज कुर क १२ व पिढी म का ' वणगोजी नाईक / जगपाल राव ' न ४० बरस राज कऱ्यो . इन को येतरो आसकारो होतो क मराठी म येक कहावत पडी , " राव वणंगपाल , बारा वजीर को काल "! महापराक्रमी वणगोजी नाईक को पोरग्यो ' मुधोजी नाईक ( दुसरो ) ' . 
* मुधोजी राजे नाईक निंबाळकर की येकली येक पोटी ' सईबाई ' . सईबाई क माय को नाव , रेऊबाई . 
२९ अक्तुबर १६३३ म सईबाई को जलम भयो . 
* फलटन रियासत क नाईक निंबाळकर घराना को भोसला घरानासिन पुरानोच नातो होतो . मायसाहेब जिजाबाई की माय म्हालसाबाई अन् सासुबाई उमाबाई या फलटन क च नाईक निंबाळकर घराना म की होती . 
* येक डाव राजे मुधोजी नाईक रियासत क काम सिन राजगड ला गयाता . संग सईबाई अन् दुसरा पोटुबाटूना बी होता . राजे मुधोजी की मायसाहेब जिजाबाई संग गोस्टीमाताना भयी , आवबिचार भयो . वोक बास्त राजे मुधोजी आराम करन ला गया . मायसाहेब जिजाबाई न आंगना म खेल रह्या पोटुना ला देखे . वोम येक पोटी खूबच साजरी अन् गुनवान दिस रहीती . वून न जानकारी काढी त वा  राजे मुधोजी की पोटी सईबाई निकरी . वून न राजे मुधोजी ला बलावनो धाड्यो . राजे मुधोजी ला अचंबो वाटे . आब च त मिर कन् आया , अनखिन कोनतो काम होयेन बटो ! राजे मुधोजी वापिस भेटन ला गया . 
' आमारऽ तुमारऽ खानदान को लय लेनोदेनो चलस . आब मु येक गोस्ट मांगूस .' मायसाहेब जिजाबाई न कह्ये .
' मु न कब मना करी . .... सांगो जी .' राजे मुधोजी न कह्ये . 
' हव कोवन क बास्त मुकरनो नी . मंजूर स ? ' मायसाहेब जिजाबाई न पुसे .
' मंजूर स जी...' राजे मुधोजी न ताडकन् कह्ये . 
' आमारऽ घर पोटी नहाय . आमारऽ सिवबा साठी सईबाई देवो जी .' मायसाहेब जिजाबाई न कह्ये . 
' मला मंजूर स .... बिह्या की तारीख निकारो...' राजे मुधोजी न खुसी कन् कह्ये . 
* स्यहाजी महाराज दकसिन क लढाई म गुत्याता . वून न उमाबाई ला पठायो . मायसाहेब जिजाबाई की माताजी म्हालसाबाई बी पुगी . मायसाहेब जिजाबाई को लय भार कम भयो . १६ मई १९४० ला पुना क लालमहाल म सिवबा अन् सईबाई को बिह्या भयो . बिह्या क बेरा सईबाई की उमर ७ बरस आन् सिवबा की उमर १० बरस होती . सईबाई लक्षुमी वानी साजरी , गुनवान होती . तलवार बाजी म त चांगला चांगला ला  पानी पाजन की कुवत होती . 
तत्कालीन कवी परमानंद क ' सिवभारत ' पोथी म येन बिह्या को वरनन स .
सईबाई निंबाळकर आब सईबाई भोसले बनी !
* महारानी सईबाई मायसाहेब जिजाबाई क मोठऽ लाड की होती . छत्रपती सिवाजी महाराज साठी त साकस्यात लक्षुमी ! वून ला हरदम वाटे क महारानी सईबाई क पायगुन कनच आपन ला यस भेट रह्येस . 
* महारानी सईबाई ला पह्यले तीन पोटीना भयी . १४ मई १६५७ म राजे संभाजी को जलम भयो . 
* संभाजी महाराज क जलम क बाद महारानी सईबाई बिमार पडी . हवापालट साठी मायसाहेब जिजाबाई संग महारानी सईबाई राजगड परीन परतापगड प आई , पर आराम नी लाग्यो . राजगड की हवा मानत नी तेकन , वून साठी छत्रपती सिवाजी महाराज न सिवापाटन ला बाडो बांध्यो . दवाई पानी भयी , वयीद हकीम भया , देवधरम कऱ्यो पर महारानी सईबाई क तब्येत ला आराम नी पड्यो . पुरा दुय बरस भया . बिमारी बाहाडत च गयी . 
* ५ सितंबर १६५९ ला महारानी सईबाई देव क घर गयी . तान्ह संभाजी महाराज ला मायसाहेब जिजाबाई न संभारे . छत्रपती सिवाजी महाराज क दुख ला त हद च नी रह्यी . 
असी मान्यता स क जब छत्रपती सिवाजी महाराज जी की आखरी सास चाल रहीती तब वून क मुंडा मिन ' सई ' स्यबद निकऱ्योतो . 
* महारानी सईबाई की दुय समाधीना स . येक पदमावती देऊर क आघ आन् येक राजगड क पायथा जवर क पाल खुर्द गाव ला गुंजवने नदी काठऽ . 
* छत्रपती सिवाजी महाराज जी आन् महारानी सईबाई को १९ बरस को संसार रह्ये . स्वराज को जोतो वून न संगमंग बांध्ये . 
# पवार वंस की पोटी महारानी सईबाई ला कोटी कोटी प्रणाम !

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, July 12, 2021

अजब गजब - ७१ : छतरपुर रियासत. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७१ : छतरपुर रियासत
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छतरपुर रियासत या बुंदेलखंड म होती . भोयरी बोली म क्रियापद क भूतकालीन रूप प बुंदेलखंड क बुंदेली बोली को असर सपस्ट दिसस . जसो : थो , हट्यो , भयो , गयो . वूसोच ' तृतीय पुरूस ' सर्वनाम प बी बुंदेली को असर दिसस . जसो : वू , वा , वुई ...
भोयरी बोली प इ बुंदेली बोली को असर त दिसस च , पर आमारऽ कयी तिवार प बी बुंदेलखंड को सपस्ट असर स . बहुड्डा ,  भुजलिया को तिवार , आठवी को तिवार इ मुख्य स ! 
* बुंदेलखंड बोल्या प ' महाराजा छत्रसाल बुंदेला ' को नाव आपरंग च आवस . 
तोडादार घोडादार
वीरनि सों प्रीति करी
साहस सों जीति जंग
खेत ते न चालियौ
होय जो नरेस देस
रैहे न कलेस रेस
मेरो कह्यो पालियौ ।
महाराजा छत्रसाल बुंदेला साठी या वरना परसिध्द स !
* इ.स. १६७१/७२ म दिलेरखान क छावनी मिन , बुरानपुर सिन महाराजा छत्रसाल बुंदेला छत्रपती शिवाजी महाराज ला भेटन साठी लुक कन् आया . येक मह्यना संग रह्या . तब छत्रपती शिवाजी महाराज न वून ला सांगे क , चाकरी सोडो अन् बुंदेलखंड म आपरो राज चलावो . 
* महाराजा छत्रसाल बुंदेला न बुंदेलखंड प इ.स. १७३१ वरी राज कऱ्यो . वून क वंसज को राज इ.स. १७८५ वरी टिक्यो . इ.स. १७७५ म वून न महाराजा छत्रसाल बुंदेला क नाव पर ' छतरपुर ' बस्याडो , आन् छतरपुर ला राजधानी करी . 
* इ.स. १८०६ म कुंवर सोने सिंह पवार ( सौनेजू )  न छतरपुर राज जित्यो . आन् छतरपुर राज ला ' पवार राज ' बनायो . 
* कुंवर सोने सिंह : इ.स. १७८५ - १८१६
* परताब सिंह : इ.स. १८१६ - १८५४ . इन ला राजा की उपाधी भेटी . 
* जगतराज : इ.स. १८५४ - १८६७ . परताब सिंह को पोरग्यो जगतराज जब ८ बरस को होता , तब वूई राजगादी प बस्या . जगतराज जी नाना होता , तेकन राजपाट को काम , परताब सिंह की दुसरी लाडी ( रानी ) न देख्यो .
* विश्वनाथ सिंह : इ.स. १८६७ - १८९५ .
* विश्वनाथ सिंह ( दुसरो ) : इ.स. १८९५ - १९३२ 
* भवानी सिंह : इ.स. १९३२ - १९४७ .
# इ.स. १९४७ म छतरपुर रियासत को बुंदेलखंड क संग विंध्य परदेस म विलय भयो . 
# इ.स. १९५६ म विंध्य परदेस को मध्यपरदेस म विलय भयो . 
# छतरपुर रियासत २९०० वर्ग किमी की होती . इ.स. १९०१ क सिरगनती क नुसार छतरपुर रियासत की आबादी १,५६,१३९ होती . 

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .
 . 

Saturday, July 10, 2021

अजब गजब - ७० : फलटन रियासत. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७० : फलटन संस्थान
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

९ वऽ सदी म धारानगरी म परमार राज की मेढ़ गडी . ११ वऽ सदी पासिन मुसलमान राजायनऽ मारकाट मचाई . कयी पुराना राज दानोफान भया . येनऽ धामधूम म इ.स. १२४० म निंबराज ( पह्यलो ) परमार मालवा परीन महाराष्ट्र म फलटन जवर क भगवान महादेव क जंगल म आया . निंबराज ( पह्यलो ) परमार जेन गाव म रह्यो , वको नाव ' निंबळक ' . इ.स. १२७० पासिन वून न ११ बरस घोर तप कऱ्यो . वून पर देवी माय परसन्न भयी अन् वून ला ' मोरवेल ' को हार वरदान म देयो . इ.स. १२८४ म निंबराज (पह्यलो ) परमार न ' फलटन राज ' की स्थापना करी . वून न इ.स. १२९१ वरी राज कऱ्यो . 
* निंबराज (पह्यलो ) परमार इ फलटन क निंबाळकर / नाईक घराना को मूल पुरुस !
१. निंबाळकर / नाईक वंस 
* निंबराज (पह्यलो ) को पोरग्यो पोखडला जगदेवराव उर्फ धारावत राव :  १२९१ - १३२७
* निंबराज ( दुसरो ) : इ.स. १३२७ - १३४९ . पदवी नाईक . 
* वणंगभूपाल : इ.स. १३४९ - १३७४ 
* वणंगपाल : इ.स. १३७४ - १३९४
* वणगोजी : इ.स. १३९४ - १४०९ . इन क डोरा की पापनीना लंबी होती , तेकन नाव पड्यो , ' पलख वणगोजी '! इन क राज म १२ बरस को दुरगादेवी को अकाल पड्यो . वणगोजी न अकाल म आपलऽ लोगना की साजरी देखभाल करी . अकाल खतम होन क येक साल बास्त वून को सर्गवास भयो . 
* मालोजी ( पह्यलो ) : १४०९ - १४२०
* बाजी साहेब : १४२० - १४४५
* पवारराव नाईक : १४४५ - १४७० .
* बाजी साहेब नाईक ( दुसरो ) : १४७० - १५१२
* मुधोजी नाईक ( पह्यलो ) : इ.स. १५१२ - १५२७ 
* बाजी धारराव : इ.स. १५२७ - १५६०
* मालोजी ( दुसरो ) : इ.स. १५६० - १५७०
* वणगोजी ( दुसरो ) नाईक उर्फ जगपाल राव : इ.स. १५७० - १६३० .  वणगोजी बीस बरस क उमर म राजगादी प बस्या . इ.स. १५९०/९२ म इन न आदिलस्याहा संग लढाई बी करीती . 
* मुधोजी नाईक ( दुसरो ) : इ.स. १६३० - १६४४ . इन की पोटी ' सईबाई निंबाळकर ' को बिह्या इ.स. १६३९ म बिजापूर यहान छत्रपति शिवाजी महाराज संग भयो . 
* बजाजी नाईक ( पह्यलो ) : इ.स. १६४४ - १६७६ . इन क नानो पोरग्यो महादजी को बिह्या , छत्रपति शिवाजी महाराज की पोटी सखुबाई संग भयो . 
* वणगोजी ( तीसरो ) : इ.स. १६७६ - १६९३ 
* जानोजी नाईक ( पह्यलो ) : इ.स. १६९३ - १७४८
* मुधोजी नाईक ( तीसरो ) : इ.स. १७४८ - १७६५
* मालोजी नाईक ( तीसरो ) : इ.स. १७७४ - १७७७
* जानराव नाईक उर्फ जानोजी ( दुसरो ) : इ.स. १७७७ - १८२५ . २२ येपरिल १८२० म जानोजी न अंगरेज कंपनी सरकार संग तयनाती फऊज को करार कऱ्यो . 
* साहेबजी बाई निंबाळकर : इ.स. १८२५ - १८५३ . साहेबजी बाई जानोजी की लाडी . जानोजी को सर्गवास भया बास्त इन न राजपाट चलाये . 
* मुधोजी राव उर्फ बापूसाहेब नाईक निंबाळकर : इ.स. १८५३ - १९१६
* मालोजी राव उर्फ नानासाहेब निंबाळकर : इ.स. १९१६ - १९४७ . पदवी ' राजा '.
* इ.स. १९४८ म स्वतंत्र भारत म विलिनीकरन की पह्यली घोसना फलटन रियासत न करीती . 
# निंबळक गाव परीन येन वंस को नाव ' निंबाळकर ' पड्यो . ' नाईक ' या पदवी भेटीती . 
# फलटन रियासत की आराजी ९३६ . ३२ चौ.कि.मी. होती . इ.स. १९४१ म येन रियासत की आबादी ७१ , ४७३ अन् सालाना कमाई १५ लाख रुपया होती . फलटन रियासत क महादेव मुखी पुनो , पसचिम दकसिन म सातारा , पूरब म सोलापूर होतो . 

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


Thursday, July 8, 2021

अजब गजब - ६९ : राजगढ़ रियासत. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ६९ : राजगढ़
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्यप्रदेस म नेवाज अन् पारबती नदी क मंझार , मान्यागढ़ पहाडी क तलहटी बसेस राजगढ़ को किल्लो . छतरपुर पासिन राजगढ़ ५९ कि.मी. दूर स . 
१. इतिहास : * राजगढ़ को पुरानो नाव झंझनीपुर / झंडेपुर होतो . वोला उमाठवारा बी कव्हत होता . राजगढ़ ला इ.स. १६४० म  रावत मोहन सिंह क कार म बसायतो . तब वकी आबादी ३००० होती . 
* रावत छतरसिंह को वंस परमार अन् उपवंस उमठ होतो . उमठ परमार को पहलो राज ' उमावाडा ' होतो . इ.स. १४८८ म इन ला रावत उपाधी भेटीती . 
* राजधानी पह्यले दुपारिया ( शाजापुर जिलो )  , बाद म डुंगरपुर , बाद म रतनपुर अन् बाद म राजगढ़ बनी . 
रावत छतरसिंह ला मोहन सिंह अन् परसरामजी असा दुय पोटुना होता . ( कयी जागा प तीन पोटुना जिकर आवस . 
* इ.स. १६४५ म राजमाता ( रावत छतरसिंह जी की रानी ) क अनुमती कन् दीवान अजबसिंह महाल बनायो , जेला पाच दरुजा होता . इतवारिया , भुडवारिया , सूरज पोल , पनराडिया , नवो दरवाजो ; असा नाव का इ पाच दरुजा . राजगढ़ म राजेश्वर मंदिर , चतुर्भुज नाथजी मंदिर अन् नरसिंह मंदिर असा तीन पुराना देऊर स . 
* राजगढ़ का दुय हिस्सा स , येक ला बडामहल अन् दुसरा ला राजमहल कोस . बडा महल को बांधकाम इ.स. १६४५ म चालू भयो त् राजमहाल को बांधकाम इ.. १९३१ म चालू भयो . 
* ३०० बरस पुरानऽ राजगढ़ किला की राजपुर , मुगल , मालवा ' शैली ' स !
* रावत छतरसिंह क बाद रावत मोहन सिंह ( मोठो पोरग्यो ) राजो बन्यो . रावत मोहन सिंह को राज इ.स. १६३८ पासिन १६९७ वरी होतो . इ.स. १६८१ म  रावत मोहन सिंह ला राजगढ़ रियासत अन् रावत परसराम ला नरसिंगगढ़ रियासत भेटी . 
* १ जनवरी १८८६ , रावत बलभद्र सिंह क जमाना म , " राजा " या उपाधी भेटी . 
* रावत विरेंद्र सिंह को सर्गवास २६ अक्तुबर १९३६ म भयो . वून क बाद राजा विक्रमादित्य न १४ जनवरी १९३७ पासिन राज कऱ्यो . 
* इ.स. १९४८ म राजगढ़ रियासत को भारत देस म विलय भयो . वोन बेरा राजगढ़ की आबादी  ८८ , ३७६ होती . ११ तोफ की सलामी होती . राजस्व रु . ४५०००० अन् प्रिवीपर्स  रु. १४०००० होतो . 

( सहयोग : इंजि . जालम सिंह सोढा जी , जोधपुर )

लेखक : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, July 4, 2021

उघाड. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

उघाड
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

आला जी मिरुग , हासला आखाड
झाला जी बह्याड , अरदडा ।१।

इत्तुकले जीव , धकवे पहाड 
दोनी हात जोड , अकुरले ।२।

हिरवे चऊक , वावरा रफाड 
येई लय लाड , देखुनिया ।३।

गेला पुक कोड्डा , पडली उघाड 
नसीब गोट्याड , का लिवले ।४।

मुलमुल पाह्ये , चिम्ले माल झाड 
दोन ठेंब धाड , त्हानेसाठी ।५।

हमेस्या आमच्या , नसीबी उघाड
रिकामे भदाड , सपनाचे ।६।

सपे आस सास , वावर उजाड
हालाचे पहाड , सिरावरी ।७।

भर बरसादी , कोड्डे नाले आड
डोरे बी म्याहाड , बिना आसू ।८।

कसा वाचवू रे , फसलीचा गड 
टपले गिधाड , चारी आंग ।९।

इज चमकव , करि कडकड
आता तरी पाड , पानी बाप्पा ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

उघाड ( भोयरी अभंग ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

उघाड ( भोयरी अभंग )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

बरसे मिरुग , हासस आखाड
भयेस बह्याड , अरदडा ।१।

नाना नाना जीव , माती ला धकाड
दुय हात जोड , अकुऱ्यास ।२।

हिवरा चऊक , खेत क रफाड
मन आये लाड , देखकन् ।३।

गयो पुक कोड्डो , पडीस उघाड
नसीब गोट्याड , काहे लिखे ।४।

मुलमुल देखे , चिम्या माल झाड
दुय ठेंब धाड , तिसा साठी ।५।

हमेस्या आमारऽ , भाग म उघाड 
रिकामा भदाड , सपना का ।६।

भर बरसादऽ , कोड्डी भीर आड 
डोरा बी म्याहाड , बिना आसू ।७।

टुटी आस सास , खेत बी उजाड
बिपदा पहाड , डोकसा प ।८।

कसो बाचाडनो , फसल को गड 
टप्यास गिधाड , चारी कितऽ ।९।

इज चमकाव , कर कड कड 
आब तरी पाड , पानी बाप्पा ।१०।

रचना : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, July 3, 2021

भोयरी संस्कृति - ४२ : घोंगडो. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ४२ : घोंगडो
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

घोंगडो पुरानऽ जमाना पासिन हाथरन , पांघरन क काम म आवस . घोंगडा ला मराठी म घोंगडी कोस . पुरान काल पासिन रुसी , मुनी , संत , महात्मा न घोंगडा की महती सांगीस . 
घोंगडा ला हिंदू धरम म पवितर मानेस . येला विधी पूर्वक सुध्द मानेस ... अन् घोंगडा ला राजवस्त्र , देववस्त्र की जागा भेटीस ! 
१. घोंगडा की महिमा :
* रुगवेद म घोंगडा की महिमा स... 
रुगवेद : १०/२६
प्रत्यधिंयद्ण्यानाम श्वहयोरथानाम ।
ऋषी: स योमनुहिंतो विप्रस्य यावत्सख : ।
आधीषमानाया : पति: शुचायाश्च शुचस्यच ।
वासोवायो विनां वासांसिमम्रजत ।।
* संत ग्यानेसर महाराज क अभंग ( मराठी ) म घोंगडा को रूपक स . 
तुझे घोंगडे येकचि चोख । दुजेपणाच वोळख अमंगळ ।।
दे धडुत न घोंगडे मोठे । खिरपटे जळो देवा ।।
रखुमादेविवरु उदार झाला । घडौता केला ज्ञानदेवो ।।
* संत तुकाराम महाराज क अभंग ( मराठी ) म घोंगडा को रूपक देखो ..
खेळो लागलों सुरकवडी । माझी घोंगडी हारपली ।।
कान्होबा तो मीच दिसे । लाविलें पिसे संवंगडीया ।।
* नवनाथ भक्तीसागर : काळी कांबळी गुंतून बुंथी . 
* छत्रपती सिवाजी महाराज क दरबार म घोंगडो अहेर करन को रिवाज होतो . 
* घोंगडा की महती आयुरवेद म बी सांगीस . कई बिमारीना घोंगडो बापऱ्याकन् दूर होस , असो आयुरवेद म सांगेस . 
* सनतिवार , महापूजा , पारायन , भंडारो , जागरन , गोंधर ( गोंधळ ) , सत्यनारायन अन् कयी देवधरम क पूंजा म / विधी म घोंगडा को मान स . बिह्या , साखरपुडा की बयठक घोंगडा पर करनो , येला मान समजत होता . वूसोच तब्येत पानी साठी बी घोगडो फायदा को मानेस . घर म आया पयी पावना ला बसन साठी घोंगडो देन की पुरानी परंपरा होती . 
** घोंगडा की अऊर येक खास खासियत स . घोंगडो बाराई काल बापरता आवस . उनारा म ठंढो , हिवारा म गरम ( तातो ) , बरसाद म जलरोधक असो घोंगडो बहुगुनी स . घोंगडा कन् सरप , बिचू , मोह्यरज की मासी , खटमल जवर नी आवत .  येतरो पवितर अन् बहुगुनी दुसरो कोनतोच कपडो नहाय . 

२. घोंगडा का रूप : 
* घोंगडो ' खड्डा माग ' प बुनस . येक घोंगडा ला तीन किलो क जवरपास मेंढरा की लोकर ( उन ) लागस . येक घोंगडो बुनन ला ३ दिन पासिन त् १२ दिन लागस . गाव म येक जागा प रह्यकन् घोंगडा बुननी वाला ला ' खुटेकर ' कोस . आन् जी मेंढरा संग घुमस वून ला ' हटकर ' कोस . 
* सबसिन मह्यंगो घोंगडो मेंढरा क बछडा क जावरा पासिन बनावस . इ घोंगडो मुलाम रव्हस . 
* येकेरी घोंगडा ला ' झुगुर ' कोस . दुय घोंगडाना ला जोडकन सिवस वोला ' कांबळी ' कोस . आठ घोंगडा नी त् चार ' कांबळी ' क जोड ला ' बोद ' कोस . दुय पट्टा को नी त् चवरस घोंगडा ला ' चवाळे ' ( चवारो ) कोस , जेपर पूंजा मांडस . जुना येकेरी घोंगडा ला पटकूर / फटकूर कोस . 
बरसाद म घोंगडा की खोर डोकसा परिन लेस , वोला घोंगतो / घोंगडगुंची कोस . नाना पोटुना नानऽ घोंगडा की खोर डोकसा परिन लेस , वोला ' घोंगसी ' कोस . 
घोंगडा की थयली / झोरो बनावस , वोला गलंगती कोस . 
गडी मानुस ला जेवनी ( पोरो , दिवारी ला )  जेनऽ घोंगडा म  देस , वोला ' खोर ' कोस . 

३. बोली भास्या म घोंगडा परिन वाक्प्रचार : 
* घोंगडा प डायो - मरन क आखरी बेरा प मानुस ला गादी परिन खलतऽ घोंगडा प डावनो .
* घोंगडो गरा म पड्यो - लचांड पास लाग्ये .
* गरीब का गया घोंगडा , गरीब पड्या उघडा - मानुस पुरो च कंगाल होनो . 

# कयी काम म आवनी वालो , मजबूत टिकाऊ लाख मोल क घोंगडा को इ ' घोंगडो पुरान ' !!

लेखक : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, July 1, 2021

अजब गजब - ६८ : अर्की. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ६८ : अर्की
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

हिमाचल परदेस क सोलन जिला म ' अर्की ' इ तहसील को ठिकानो स . अर्की सिमला पासिन ३८ कि.मी. दूर स . अर्की इ पहाडी राज बाघल की राजधानी होती . 
१ . इतिहास : * बाघल रियासत की स्थापना १३/१४ वी सदी म अजयदेव परमार न  करीती . तब वकी राजधानी धुन्धन अन् दाडला म होती . 
* अर्की प पह्यलो राज साहबसिंह परमार न करे . इनकी स्याखा वराह होती . येन स्याखा को राज पंजाब ( बाघल ) म बी होतो . 
* इ.स. १६४३ म सभाचंद परमार न अर्की नगर बस्याड्यो . 
* इ.स. १६५० म राणा सभाचंद परमार न अर्की ला बाघल राज की राजधानी घोसित करी . 
* इ.स. १८०० - १८०५ मंझार राणा सभाचंद परमार को वंसज राणा पृथ्वी सिंह परमार न अर्की को किल्लो ( गढ़ ) बांध्यो . 
* इ.स. १८०६ म येन राज प गोरखा फऊज न कब्जो कऱ्यो . राणा जगत सिंह न नालागढ़ म आसरो लेयो . 
* इ.स. १८१५/१६ म राणा जगत सिंह जी न , अंगरेज फऊज क सहारा कन् आपलो राज अन् अर्की गोरखा सिन वापिस लेयो . 
* इ.स. १८३० म राणा शिवशरण सिंह जी न ' दीवाने खास ' बांध्यो . 
* इ.स. १८४० पासिन १८६७ वरी राजो किशन सिंह न यहान राज कऱ्यो . वून न अर्की की ढंग कन् उन्नती करी . सडकना बांधी . वून ला ' राजा ' की उपाधी बी भेटी . 
* १५ येपरिल १९४८ म या रियासत हिमाचल परदेस म सामिल भयी . 

२. वास्तुकला : * अर्की किल्ला, महल क बांधकाम म राजपूत - मुगलई कारागीरी को मिसरो दिसस . भित पर का चितरंगना कांगडा सैली का दिसस . 

३. वर्तमान : * अर्की जवर च बातल गाव स , जेला नानी कासी कोस . अर्की जवर च दुरगा माता , लुटरू महादेव , शाखनी महादेव का परसिध्द देऊरना स . 
* आब अर्की गढ खंडारा मिन जी चांगलो भाग बाचेस , वोमऽ हेरिटेज होटल स . आन् राजाना का वंसज बी वहान च रव्हस . वर्तमान म इ होटल न गढ राजा राजेंद्र सिंह येन वंसज की इस्टेट स . 

# आमारऽ राज क जुनऽ गवरव की निस्यानी आन् वयभव की कथा - गाथा बाचिस . वून को जतन अन् दरस्यन करनु , इ आपरो काम स . 

( सहयोग : इंजि. जालमसिंह सोढा जी जोधपुर ) 
लेखक : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर