Wednesday, December 21, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - २१

यादें _ सवाल की ! 
भाग - २१
Hindi language _ हिंदी भाषा

ये क्या हो गया ? 

गांव मे हमारे पडोसी बुजुर्ग का स्वर्गवास हुआ था . मुझे दो - तीन दिन बाद खबर मिली . गांव मे हर घर , हर व्यक्ति कोई न कोई रिश्ते से बॅंधे रहते है . जान पहचान , पडोसी यह शब्द गांव मे गौण रहते है.. रिश्ते का शब्द मुख्य होता है ! 
अत: तेरहवी मे पहुंचना जरूरी था . वैसे मेरा गांव आना - जाना बहुत कम रहता है . हां , गोवर्धन पूजा के दिन जाना हर साल पक्का है . बाकी कार्यक्रम , समारोह , शादी - ब्याह के कारण जाना होता है . 
मै जिस दिन तेरहवी के लिए जाने वाला था , उसी दिन गांव से १५ कि.मी. दूर एक गांव मे मेरे जान - पहचान के व्यक्ति के यहॉं भी तेरहवी थी . मै सुबह ही नागपुर से निकला और पहले दूर के गांव गया . उस गांव पहुंचा तो वहॉं किर्तन चालू था . काफी समय बाद वह खत्म हुआ . सिर मुंडाया परिचित मेरे पास आया . मैने सांत्वना दी.. उनके स्वर्गवासी पिता को श्रध्दांजली अर्पण की और परिचित से विदा ली . 
मै तेज कार चलाते हुए गांव पहुंचा.. काफी समय हुआ था . पहले घर गया और बाद मे तेरहवी मे पहुंचा . बाहर गांव से आए काफी रिश्तेदार चले गये थे . गांव के लोग ज्यादा थे . मै औपचारिकता पूर्ण कर पानी पीने के लिए गया . मै पानी पी ही रहा था की जिन के यहॉं तेरहवी थी उनके पडोस वाली काकी ने मुझे गौर से देखते हुए पूछा , ' सुरेश बापू होय का ? ' ( सुरेश हो क्या ? ) . गांव मे मुझे ' सुरेश बापू ' या केवल ' बापू ' नाम से संबोधित करते है . 
' हो काकू..' ( हां काकी ) मैने कहा . 
वह काकी उॅंचाई में मुझ से छोटी थी . वह अचानक एक छोटे से बच्चे की तरह मेरे छाती पर सिर रख कर रोने लगी ....
' ये , क्या हो गया ? ' काकी रोते हुए बस यही सवाल दोहरा रही थी . सब लोग मेरी ओर देख रहे थे . मै उन्हें हलके हलके थपथपा रहा था ... 
काकी के पति का कोरोना के प्रथम चरण में देहान्त हुआ था , यह मुझे पता था . कोरोना के चलते मै गांव नही गया था . 
' पति की मृत्यू के बाद काफी दिन बिमार रही है... ' बगल में खडे व्यक्ति ने जानकारी दी . 
' तुला माहिती आहे का ? हे काय झाले ? तुझे काका गेले रे..' ' ( तुझे ज्ञात है क्या ? ये क्या हो गया ? तेरे चाचा गये रे...)
और लगातार रोती रही..
' हा , मुझे ज्ञात हुआ था , लेकीन कोरोना की वजह से नहीं आ सका था... ' मैने सांत्वना देते हुए कहा . 
सादे सरल स्वभाव की काकी रो रही थी.. मुझे ज्यादा औपचारिक बोलना भी नही आ रहा था.. मेरे ऑंसू भी अपने आप झर रहे थे . काफी लोग इकट्ठा हो गये . कुछ बाई लोग काकी को समझाने लगी . एक ने काकी को पानी दिया . 
सबसे विदा ले कर मै गांव से लौटा . लेकीन अब एक सवाल मेरे साथ चल रहा था , ' ये क्या हो गया ? '. 
इस सवाल के दर्द को मै अपने भीतर महसूस कर रहा था.. वह दर्द था एक पत्नी का , एक मॉं का , एक चाची का और एक स्त्री का ! 
एक स्त्री अपनें जीवन काल में कितनी बार टूटती है.. बिखरती है.. फिर समेटती रहती है अपने अस्तित्व का तिनका - तिनका ! अपरिमित दु:ख सह कर भी सूखने नही देती ममता की गंगा को.. मंगल करने दुनिया का ! कौनसी अलौकिक मिट्टी से बनती है स्त्री ? 
_ चाची, उतने लोगों के बीच नही बोल पाया मै कुछ... भावना के बवंडर में शब्दों का रुकना मुश्किल ही था . ... केवल , ' शांत रहो.. शांत रहो ' कहता रहा , क्यो की आपकी वेदना को शब्द रूप से मै लिख नही पा रहा हूं.. बहुत अदनासा शब्द कोष है मेरा.. लेकीन दिल - दिमाग से समझता हूं , महसूस करता हूं.. ' ये क्या हो गया ?' इस सवाल के जवाब की पीड़ा !!!! ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, December 17, 2022

आशा. ( मराठी कविता ). Marathi language _ मराठी भाषा

आशा
Marathi language _ मराठी भाषा

कंठी तृष्णा
शुष्क ओठ
दृष्टी लोट
मृगजळाचा ....

सत्य नी स्वप्न
दोन तीर
केंद्र शरीर
प्रवाहाचा...

भाळी आठी
कराग्रे पद्म
भाग्य छद्म
करतलाचा...

चाकोरीत पाय
मनी धाडस
भित्रं पाडस
हरिणीचा...

क्षितिजापार
विहंग झेप
कवच लेप
नव आशेचा....

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, December 14, 2022

म्हरी उभयी गो तोर. ( भोयरी कविता ). Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

म्हरी उभयी गो तोर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

म्हरी उभयी गो तोर
डोरा घाडो आयो पूर
म्हरो घास को सपन
भयो बापा चूर - चूर ।धृ।

लाल्यो पराटी पर को
बोंड अरी को बी मार
खेत म क अगास म
रोये चंदर की कोर ।१।

संतरा क बगिच्या म
लिंबू सरखा संतर
घाम क च वलीत को
चुक्यो कहान तंतर ।२।

घेंग गयी गो सोला ला
चिमी बटाना की वर
साजवनी क दिन को
रुस्यो भाऊ मोह्यतूर ।३।

हर जलम च दादा
पासअ लागस इ घोर
कोनअ दुस्मान कन् जी
म्हरो डिठाये सिवार ।४।

कास्तकार को जलम
इठू नाम को गज्यर
सिवार म वारी वानी
म्हरो चलस बखर ।५।

संबा पाराबती म्हरा
दादा गनगोत थोर
हात पाय इ माती का
वोला पानी जसो जोर ।६।

म्हरा बोट कोम्बावस
चित हिवरो पदर
माती माय क कोरा म
पिकवूस गो भाकर ।७।

म्हरो सिक्स्यन माती को
वुभा आडवा काकर
धरतरी क वटा म
म्हरा हिवरा अक्स्यर ।८।

हमी भाव को गनित
कोनअ येडा को मंतर
चाल चालता सपे नी
मुंडो पेट को अंतर ।९।

मला ग्यान नको पाजू
तोरी चोट्टा की नजर
जोड गुना की भावना
भाग घटाव बेपार ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, December 10, 2022

निर्माण - भाग १९

निर्माण - भाग १९
Hindi language _ हिंदी भाषा

दिवाली नजदीक आ रही थी.. साइट पर थोडासा अफरातफरी का माहौल था . ठेकेदार अपनें अपनें अधुरे काम रात - दिन एक कर पूर्ण करने की कोशिश कर रहे थे.. कुछ हमारा भी दबाव था . क्यों की मै भी बिल में ज्यादा से ज्यादा मेझरमेंट्स चढाने की कोशिश में था . 
दिवाली की छुट्टियां कहने को १५ दिन की होती है , लेकीन सभी मजदूर साइट आते आते एक - दो महिने लग जाते है . मजदूर इन छुट्टियों में धान कटाई , घर की मरम्मत , शादी - ब्याह के लिए लडका - लडकी देखना यह सब काम निपटा कर ही साइट आते है.. साइट के काम की परिस्थिती , डॉंट डपट का उन पर कोई असर नही होता... यह तो हर साल , हर साइट की कहानी ! 
अच्छा , काम एक का रहेगा पर उस गॉंव का कोई भी मजदूर नही आएगा .
 छत्तीसगढ की लोक परंपरा में ' मितान ' यह वैशिष्ट्य पूर्ण प्रथा है . मितान यह ऐसी परंपरा है , जिस में दोस्ती रिश्ते में बदल जाती है . और इस दोस्ती में जाति - धरम की रुकावट भी नहीं होती . मितान एक दुसरे का नाम भी नहीं लेते . पुरुष मितान को मितान या महाप्रसाद कहते हैं , तथा स्त्री मितान को मितानिन , महाप्रसाद , भोजली , गजामूंग , गंगाजल कहते है . बच्चें पिता के मितान को फूलददा तथा मितान की पत्नी को फूलदाई कहते है . जितना सरल इन का जीवन होता है , उतनी ही सरल ' मितान ' विधि होती है . 
जमीन पर चावल के आटे का चौक पूर कर उस पर दो पीढ़ा रखते है . मितान बनने वाले / वाली पीढ़े पर खडे हो कर एक - दुसरे पर दूबी से जल के छ़ींटें मारते है . तिलक निकाल कर फूल और धुला या पीला चावल छ़िड़कते है . कान पर फूल , दूबी या जंवारा खोंस कर फूलमाला पहनाते है . एक - दुसरें को नारियल भेंट कर गले मिलते है . मितान भाई की सभी जिम्मेदारी निभाता है . और यह रिश्ता मितान की मृत्यू पर खत्म नही होता.... पीढ़ी दर पीढ़ी यह रिश्ता बना रहता है...
जहॉं भाई ही भाई का दुश्मन बनता है , वहॉं मितान की यह लोक परंपरा मानवीय रिश्तें की अनोखी खूशबू समाज में बिखेरता है . 
मितान के घर कोई कार्य होने से समझ लिजीए की साइट के १० - २० मजदूर एक साथ छुट्टी लेने वाले है . 
मैने हर राज्य के मजदूरों के साथ काम किया है.. पर काम की सफाई , सादगी और भोलापन , सरलता और निश्छलता छत्तीसगढ के लोगो जैसी किसी में नही पाई !!! मेरे दिल में बाकियों से कुछ ज्यादा ही आदर - सम्मान उन के लिए है.. 
दिवाली के सप्ताह में ही वरुण देव अतिप्रसन्न हुए . धुॅंआधार बारिश... सब तरफ बाढ ही बाढ ! ठेकेदार , मजदूर , स्टाफ और खुद मै बारिश का रौद्ररूप देख कर विस्मित भी थे और परेशान भी ! सडक मार्ग बंद ... अब घर जाए तो जाए कैसे ?
 सभी का हिसाब - किताब , लेन - देन हो गया था . अपना अपना सामान बॉंध कर दिवाली के लिए घर जाने के लिए सब तैयार थे.. पर साधन नही !!!!!
साइट से सात - आठ कि.मी. दूर एक छोटासा रेल्वे स्टेशन था . टैक्टर और जीप से मजदूरों को रेल्वे स्टेशन पहुंचाया . दोपहर तक वही काम था.. मजदूर पहुंचाने का . जब सब चले गये तब चौकीदार को छोड हम भी रेल्वे स्टेशन पहुंचे . स्टेशन पर मेला लगा था .  सुबह से भेजे गये मजदूर भी वही बैठे थे . छोटा स्टेशन होने से यहॉं कोई ट्रेन रुकती नही थी... कुछ मालगाडियॉं लाइन क्लियर नही मिलने से ही रुकती थी . शाम के पहले एक मालगाडी रुकी.. लोगों के झुंड ने मालगाडी पर कब्जा कर लिया . रेल्वे स्टेशन के स्टाफ की कौन सुनने वाला था... वे असहाय से वह नजारा देख रहे थे . बहुत देर तक मालगाडी रुकी रही... ठेकेदारों ने मेरी व्यवस्था गार्ड के छोटेसे डिब्बे में कर दी . अंत में मालगाडी चल पडी और सब लोग उत्साह से चिल्लाने लगे . शाम को मालगाडी रुकी.. लेकीन वहॉं न स्टेशन न गॉंव ! लेकीन नदी क्रॉस हो चुकी थी . सब उतरे और पटरी की किनारे से चलने लगे . 
चलते चलते रात में बडे स्टेशन का उजाला दिखा.. सब के जान में जान आई . अब यहाँ से सडक मार्ग और रेल्वे मार्ग दोनों उपलब्ध थे . सब के चेहरे पर दिवाली की खुशी चमक रही थी.. दिन भर की तकलीफ गायब हो गयी थी उस रोशनी में...... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, December 9, 2022

आज्ञा और जिम्मेदारी. Hindi language _ हिंदी भाषा

* आज्ञा विशिष्ट है... एकदिश है...यह हमेशा बड़ों द्वारा छोटों को किसी काम के लिए कहना है..
* जिम्मेदारी का पटल विस्तृत है.. इस के दायरे में छोटें - बडें सभी आते है .. यह बहुदिश है..
* आज्ञाकर्ता का स्थान एक विशेष स्तर में होता है...
* जिम्मेदारी निभाने वाले हर स्तर में होते है..
* दोनों के आयाम को देखते हुए ' आज्ञा ' देना सरल दिखता है , पर यह शत प्रतिशत सच नही होता.. 
* आज्ञा देने का स्थान पाना यह अपनें आप में कठीण है . तथा आज्ञा का निर्माण कई कर्म संस्कार के बाद ही कर सकते हैं . 
* निष्कर्ष : आज्ञा देना जितना सरल दिखता है , उसकी पार्श्वभूमी उतनी ही दुष्कर होती है . 
* जिम्मेदारी निभाना हर समय ,हर स्तर पर मुश्किल होता है . यह ना सरल दिखती है ना सरल होती है . !!
* जिम्मेदारी में उचित कर्म निहित है . यह अपनें व्यक्तित्व की परीक्षा लेती है . 
* जिम्मेदारी को सफलता - असफलता के मापदण्ड लगा सकते है.. इसे तौला जा सकता है ..
* आज्ञा विशिष्ट व्यक्ति देता है..
जिम्मेदारी हर किसी को निभानी होती है ( उसकी क्षमता हो या न हो..) .. इस परिप्रेक्ष्य में जिम्मेदारी निभाना ही मुश्किल लगता है..

_ लेखक :  सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, December 7, 2022

मधुर वेदना ( मराठी कविता ). Marathi language _ मराठी भाषा

मधुर वेदना
Marathi language _ मराठी भाषा

पापण्यांचे भिरभिरते पक्षी
गालांवर अश्रू रेखिते नक्षी

विस्कटलेली भांगेची वाट
अडखळणारी केसांची लाट

भाळी कुंकवाची रवि प्रतिमा
कपोलांवर उषेची लालिमा

भुवयांचे क्षितिज वर्तुळ
नभी स्मृतीमेघांची वर्दळ

नासिकाग्र लालबुंद जीवघेणा
अंत:करणात मधुर वेदना

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, December 2, 2022

मनाला स्पर्शून गेला ( मराठी कविता )

मनाला स्पर्शून गेला
Marathi language _ मराठी भाषा

एक बोल
उबदार
मनाला स्पर्शून गेला .
कहाणी _ 
जी अपूर्ण होती
ती पूर्ण झाली ,
अधरांवर एक
नवीन लकेर
तरंगून गेली . ....

एक चेहरा
हुरहूर
मनाला लावून गेला . 
पापणी _
कस्तुरीगंध
स्वप्न मार्गातून
मधासारखी नितळ ,
सलज्ज
हळूच खुलली.....

एक कटाक्ष
नयनशर
मनाला भेदून गेला .
मनी _
आनंदाने तारका
धारण केल्या , 
हवेत तरंगती
गुलाबी सावल्या...

एक मृग
तृष्णेचा तर
मनाला स्पर्शून गेला....

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, December 1, 2022

भाव पस्तुरी ला आयो. Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भाव पस्तुरी ला आयो
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

माल मोंडा को निलाम
वाया दलाली म गयो
जुगाड क तंतर न
भाव पस्तुरी ला आयो ।

सारो उरफाटो न्याव
साव कयीद म गयो
चोट्टाना ला हार तुरा
भाव पस्तुरी ला आयो ।

सीधा सरखा ला भेव
जीव टांगनी लगायो
उखलेस भरवसो
भाव पस्तुरी ला आयो ।

सेक चुल्हा क भोग ला
डल्लो वूला न दबायो
कल्लो गली येटार म
भाव पस्तुरी ला आयो ।

कापूर क बट्टी वानी
जीव खप कन् गयो
अधरयेल माया न
भाव पस्तुरी ला आयो ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर