यादें _ सवाल की !
भाग - २१
Hindi language _ हिंदी भाषा
ये क्या हो गया ?
गांव मे हमारे पडोसी बुजुर्ग का स्वर्गवास हुआ था . मुझे दो - तीन दिन बाद खबर मिली . गांव मे हर घर , हर व्यक्ति कोई न कोई रिश्ते से बॅंधे रहते है . जान पहचान , पडोसी यह शब्द गांव मे गौण रहते है.. रिश्ते का शब्द मुख्य होता है !
अत: तेरहवी मे पहुंचना जरूरी था . वैसे मेरा गांव आना - जाना बहुत कम रहता है . हां , गोवर्धन पूजा के दिन जाना हर साल पक्का है . बाकी कार्यक्रम , समारोह , शादी - ब्याह के कारण जाना होता है .
मै जिस दिन तेरहवी के लिए जाने वाला था , उसी दिन गांव से १५ कि.मी. दूर एक गांव मे मेरे जान - पहचान के व्यक्ति के यहॉं भी तेरहवी थी . मै सुबह ही नागपुर से निकला और पहले दूर के गांव गया . उस गांव पहुंचा तो वहॉं किर्तन चालू था . काफी समय बाद वह खत्म हुआ . सिर मुंडाया परिचित मेरे पास आया . मैने सांत्वना दी.. उनके स्वर्गवासी पिता को श्रध्दांजली अर्पण की और परिचित से विदा ली .
मै तेज कार चलाते हुए गांव पहुंचा.. काफी समय हुआ था . पहले घर गया और बाद मे तेरहवी मे पहुंचा . बाहर गांव से आए काफी रिश्तेदार चले गये थे . गांव के लोग ज्यादा थे . मै औपचारिकता पूर्ण कर पानी पीने के लिए गया . मै पानी पी ही रहा था की जिन के यहॉं तेरहवी थी उनके पडोस वाली काकी ने मुझे गौर से देखते हुए पूछा , ' सुरेश बापू होय का ? ' ( सुरेश हो क्या ? ) . गांव मे मुझे ' सुरेश बापू ' या केवल ' बापू ' नाम से संबोधित करते है .
' हो काकू..' ( हां काकी ) मैने कहा .
वह काकी उॅंचाई में मुझ से छोटी थी . वह अचानक एक छोटे से बच्चे की तरह मेरे छाती पर सिर रख कर रोने लगी ....
' ये , क्या हो गया ? ' काकी रोते हुए बस यही सवाल दोहरा रही थी . सब लोग मेरी ओर देख रहे थे . मै उन्हें हलके हलके थपथपा रहा था ...
काकी के पति का कोरोना के प्रथम चरण में देहान्त हुआ था , यह मुझे पता था . कोरोना के चलते मै गांव नही गया था .
' पति की मृत्यू के बाद काफी दिन बिमार रही है... ' बगल में खडे व्यक्ति ने जानकारी दी .
' तुला माहिती आहे का ? हे काय झाले ? तुझे काका गेले रे..' ' ( तुझे ज्ञात है क्या ? ये क्या हो गया ? तेरे चाचा गये रे...)
और लगातार रोती रही..
' हा , मुझे ज्ञात हुआ था , लेकीन कोरोना की वजह से नहीं आ सका था... ' मैने सांत्वना देते हुए कहा .
सादे सरल स्वभाव की काकी रो रही थी.. मुझे ज्यादा औपचारिक बोलना भी नही आ रहा था.. मेरे ऑंसू भी अपने आप झर रहे थे . काफी लोग इकट्ठा हो गये . कुछ बाई लोग काकी को समझाने लगी . एक ने काकी को पानी दिया .
सबसे विदा ले कर मै गांव से लौटा . लेकीन अब एक सवाल मेरे साथ चल रहा था , ' ये क्या हो गया ? '.
इस सवाल के दर्द को मै अपने भीतर महसूस कर रहा था.. वह दर्द था एक पत्नी का , एक मॉं का , एक चाची का और एक स्त्री का !
एक स्त्री अपनें जीवन काल में कितनी बार टूटती है.. बिखरती है.. फिर समेटती रहती है अपने अस्तित्व का तिनका - तिनका ! अपरिमित दु:ख सह कर भी सूखने नही देती ममता की गंगा को.. मंगल करने दुनिया का ! कौनसी अलौकिक मिट्टी से बनती है स्त्री ?
_ चाची, उतने लोगों के बीच नही बोल पाया मै कुछ... भावना के बवंडर में शब्दों का रुकना मुश्किल ही था . ... केवल , ' शांत रहो.. शांत रहो ' कहता रहा , क्यो की आपकी वेदना को शब्द रूप से मै लिख नही पा रहा हूं.. बहुत अदनासा शब्द कोष है मेरा.. लेकीन दिल - दिमाग से समझता हूं , महसूस करता हूं.. ' ये क्या हो गया ?' इस सवाल के जवाब की पीड़ा !!!! ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर