Saturday, December 10, 2022

निर्माण - भाग १९

निर्माण - भाग १९
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दिवाली नजदीक आ रही थी.. साइट पर थोडासा अफरातफरी का माहौल था . ठेकेदार अपनें अपनें अधुरे काम रात - दिन एक कर पूर्ण करने की कोशिश कर रहे थे.. कुछ हमारा भी दबाव था . क्यों की मै भी बिल में ज्यादा से ज्यादा मेझरमेंट्स चढाने की कोशिश में था . 
दिवाली की छुट्टियां कहने को १५ दिन की होती है , लेकीन सभी मजदूर साइट आते आते एक - दो महिने लग जाते है . मजदूर इन छुट्टियों में धान कटाई , घर की मरम्मत , शादी - ब्याह के लिए लडका - लडकी देखना यह सब काम निपटा कर ही साइट आते है.. साइट के काम की परिस्थिती , डॉंट डपट का उन पर कोई असर नही होता... यह तो हर साल , हर साइट की कहानी ! 
अच्छा , काम एक का रहेगा पर उस गॉंव का कोई भी मजदूर नही आएगा .
 छत्तीसगढ की लोक परंपरा में ' मितान ' यह वैशिष्ट्य पूर्ण प्रथा है . मितान यह ऐसी परंपरा है , जिस में दोस्ती रिश्ते में बदल जाती है . और इस दोस्ती में जाति - धरम की रुकावट भी नहीं होती . मितान एक दुसरे का नाम भी नहीं लेते . पुरुष मितान को मितान या महाप्रसाद कहते हैं , तथा स्त्री मितान को मितानिन , महाप्रसाद , भोजली , गजामूंग , गंगाजल कहते है . बच्चें पिता के मितान को फूलददा तथा मितान की पत्नी को फूलदाई कहते है . जितना सरल इन का जीवन होता है , उतनी ही सरल ' मितान ' विधि होती है . 
जमीन पर चावल के आटे का चौक पूर कर उस पर दो पीढ़ा रखते है . मितान बनने वाले / वाली पीढ़े पर खडे हो कर एक - दुसरे पर दूबी से जल के छ़ींटें मारते है . तिलक निकाल कर फूल और धुला या पीला चावल छ़िड़कते है . कान पर फूल , दूबी या जंवारा खोंस कर फूलमाला पहनाते है . एक - दुसरें को नारियल भेंट कर गले मिलते है . मितान भाई की सभी जिम्मेदारी निभाता है . और यह रिश्ता मितान की मृत्यू पर खत्म नही होता.... पीढ़ी दर पीढ़ी यह रिश्ता बना रहता है...
जहॉं भाई ही भाई का दुश्मन बनता है , वहॉं मितान की यह लोक परंपरा मानवीय रिश्तें की अनोखी खूशबू समाज में बिखेरता है . 
मितान के घर कोई कार्य होने से समझ लिजीए की साइट के १० - २० मजदूर एक साथ छुट्टी लेने वाले है . 
मैने हर राज्य के मजदूरों के साथ काम किया है.. पर काम की सफाई , सादगी और भोलापन , सरलता और निश्छलता छत्तीसगढ के लोगो जैसी किसी में नही पाई !!! मेरे दिल में बाकियों से कुछ ज्यादा ही आदर - सम्मान उन के लिए है.. 
दिवाली के सप्ताह में ही वरुण देव अतिप्रसन्न हुए . धुॅंआधार बारिश... सब तरफ बाढ ही बाढ ! ठेकेदार , मजदूर , स्टाफ और खुद मै बारिश का रौद्ररूप देख कर विस्मित भी थे और परेशान भी ! सडक मार्ग बंद ... अब घर जाए तो जाए कैसे ?
 सभी का हिसाब - किताब , लेन - देन हो गया था . अपना अपना सामान बॉंध कर दिवाली के लिए घर जाने के लिए सब तैयार थे.. पर साधन नही !!!!!
साइट से सात - आठ कि.मी. दूर एक छोटासा रेल्वे स्टेशन था . टैक्टर और जीप से मजदूरों को रेल्वे स्टेशन पहुंचाया . दोपहर तक वही काम था.. मजदूर पहुंचाने का . जब सब चले गये तब चौकीदार को छोड हम भी रेल्वे स्टेशन पहुंचे . स्टेशन पर मेला लगा था .  सुबह से भेजे गये मजदूर भी वही बैठे थे . छोटा स्टेशन होने से यहॉं कोई ट्रेन रुकती नही थी... कुछ मालगाडियॉं लाइन क्लियर नही मिलने से ही रुकती थी . शाम के पहले एक मालगाडी रुकी.. लोगों के झुंड ने मालगाडी पर कब्जा कर लिया . रेल्वे स्टेशन के स्टाफ की कौन सुनने वाला था... वे असहाय से वह नजारा देख रहे थे . बहुत देर तक मालगाडी रुकी रही... ठेकेदारों ने मेरी व्यवस्था गार्ड के छोटेसे डिब्बे में कर दी . अंत में मालगाडी चल पडी और सब लोग उत्साह से चिल्लाने लगे . शाम को मालगाडी रुकी.. लेकीन वहॉं न स्टेशन न गॉंव ! लेकीन नदी क्रॉस हो चुकी थी . सब उतरे और पटरी की किनारे से चलने लगे . 
चलते चलते रात में बडे स्टेशन का उजाला दिखा.. सब के जान में जान आई . अब यहाँ से सडक मार्ग और रेल्वे मार्ग दोनों उपलब्ध थे . सब के चेहरे पर दिवाली की खुशी चमक रही थी.. दिन भर की तकलीफ गायब हो गयी थी उस रोशनी में...... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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