Friday, October 29, 2021

काली अमावस रात. Hindi Language _ हिंदी भाषा

काली अमावस रात 
Hindi Language _ हिंदी भाषा

काली अमावस रात
रहे भरी दिखे खाली
सोंख लेती बरसात
जैसे जमीन रेतीली ।१।

काली अमावस रात
चंदा को भी निगली
छाया छोड गयी साथ
करे चांदनी चुगली ।२।

काली अमावस रात
कर बगावत डाली
दीप संग दीप साथ
खोज रोशनी निकाली ।३।

काली अमावस रात
पकवान सजी थाली
महल कुटीया साथ
खुशीयां बजाएं ताली ।४।

काली अमावस रात
जगमगाई दिवाली
सपनों भरी सौगात
आशा करें रखवाली ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, October 27, 2021

अजब गजब - ८० : मनी आर्डर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मनी आर्डर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भारतीय डाक विभाग न इ.स. १८८० म मनी आर्डर की सेवा चालू करी . मनी आर्डर क माध्यम कन् देस भर क १,५५,००० डाकखाना मिन देस भर कोना कोन्टा वरी लोगना ला घर बस्या आपलऽ सगा - सोयराना ला नगदी रुप्या पठावन की सुबिधा होती . 
मनी आर्डर पोस्ट आफिस किथिन जारी कऱ्यो ती असो आर्डर रव्हस , जी कोनी ला रुप्या क भुगतान साठी जारी करस , जेक नाव प पोस्ट आफिस क माध्यम कन् मनी आर्डर धाडस . पयसा वोला च भेटस , जे को नाव मनी आर्डर प लिख्यो रव्हस . मनी आर्डर को येक फायदो असो स क पयसा जे क नाव पर पठावस , वोला वूई घर पोसता भेटस . 
टेलिग्राम क वानी १३५ बरस पुरानी मनी आर्डर की  सेवा बंद भयी . 
आब मनी आर्डर को इलेक्ट्रॉनिक रूप चालू भयेस , EMO अन् IMO . 
EMO अन् IMO नाव की मनी आर्डर सरीखी सुबिधा डाक विभाग न चालू करीस , जेकन पयसा तुरुत पठावता आवस . 
EMO म १ रुप्या पासिन ५००० रुप्या पठावता आवस .
IMO म १००० रुप्या पासिन ५०, ०००/ रुप्या वरी रकम पठावता आवस . 
१९८६ म ५ देस संग IEMO सुबिधा चालू भयीती . आब ९७ देस म या सुबिधा स . 
भारत की २७ देस संग IEMO की सेवा येवस्था स . येम क नेपाल अन् भूटान संग दुय तरफा मनी आर्डर की सुबिधा स . बाकी २५ देस संग सिरफ आवन वाली च सुबिधा स . 
* मनी आर्डर की गोस्ट याद आईस खास कारन कन् ! भोयरी संस्कृति की दुय किताब वर्धा क अशोक पाठे साहेब न मंगाइती . येन दुय की रु. ३००/ की सहयोग रकम पाठे साहेब न EMO की सेवा बापर कन् धाडी . 
आब क मोबाइल बँकिंग , नेट बँकिंग क जमाना म बी डाक विभाग की १६० पुरानी मनी आर्डर की सेवा नवीन इलेक्ट्रॉनिक रूप म जिती स ! 
जय हो भारतीय डाक विभाग....
धन्यवाद पाठे साहेब....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, October 26, 2021

घर - भाग ७. Hindi Language _ हिंदी भाषा

घर - भाग ७
Hindi language _ हिंदी भाषा

रातभर किसी को नींद नही आई . अजय की पत्नी भी मुंह फुला के बैठी थी . ससुरजी ऐसा कुछ बोलेंगे या करेंगे इस की उसे उम्मीद ही नही थी . अजय के सर पर हथौडे चल रहे थे . सिंधू यहि अनपेक्षित वातावरण सह न सकी . उसे तेज बुखार चढ़ गया . मनोहरराव ने सिंधू को टैबलेट दी और माथे पर ठंडे पानी की पट्टीयां रखने लगे . आज किसी ने खाना नही खाया था . घर रणभूमी मे तब्दिल हो चुका था . 
सुबह सुबह सिंधू का बुखार कुछ कम हुआ और उसे गहरी नींद लगी . 
अजय आज जीम नही गया . मनोहरराव उठे और किचन मे आए . चाय और बिस्कुट लेकर टेरेस पर बैठे . सर भारी लग रहा था . चाय पिने से थोडी राहत मिली . उनका फोन बज उठा . वे तुरंत अपना वैलेट लेकर पार्किंग मे आए और कार लेकर निकल पडे . 
आज सुबह कुछ ज्यादा ही अस्तव्यस्त थी . बहुत कुछ बिखरा पडा था ...... यादें , सपने और रिश्तों के मतलब भी ! घर की दिवारें सहमी थी .... इटें कांप रही थी किसी अनामिक भय से ! 
अजय बेडरूम से किचन मे आया . डायनिंग टेबल पर चाय की खाली प्याली थी . खिडकी से देखा तो टेरेस पर कोई नही था . उसने हौले से पापा की बेडरूम का दरवाजा खटखटाया . सिंधू की नींद खुल गई ; देखा तो मनोहरराव नही थे . दरवाजा खोला तो सामने अजय खडा था . 
' बोलो बेटा .' सिंधू ने कहा .
' कुछ नही.... पापा कहां है ? ' अजय ने धीरे से पुछा . 
' पता नही... कमरे मे तो नही है ..' सिंधू ने बताया . 
अजय किचन मे गया और पिने के लिए पानी गर्म करने लगा . उदासी की हवा बह रही थी घर मे . अजय ने पत्नी को आवाज लगाई और . वह आई और चाय - नाश्ता बनाने लगी . 
सिंधू ने मनोहरराव को फोन किया . 
' हैल्लो... ' सिंधू ने कहा .
' हा सिंधू... जल्दी बोलो . ' मनोहरराव ने कहा .
' इतनी सुबह सुबह बिना बताए कहां गये हो ? ' सिंधू ने पुछा . 
' कुछ जरूरी काम है... दोपहर के भोजन तक घर आता हू और सब बताता भी हू.. चिंता न करो .' मनोहरराव ने जवाब दिया . 
अजय ने मॉं को आवाज लगाई . सिंधू किचन मे आई. 
' बैठो मॉं...' अजय ने गर्म पानी का ग्लास डायनिंग टेबल पर रखते हुए कहा . 
बहु चाय और नाश्ता लेकर आई . तीनों नाश्ता कर रहे थे , लेकिन ध्यान पापा की कुर्सी पर था . 
दोपहर मे मनोहरराव आए . सिंधू बेडरूम मे आराम कर रही थी . 
' तबीयत कैसी है अब ? ' मनोहरराव ने आते ही सिंधू के माथे को छु कर कहा . 
' ठीक है... कहां थे आप ?' सिंधू ने चिंता से पुछा .
' बताता हू बाबा...  जगदीश राव के बेटे का ऐक्सिडेंट हुआ है . उसे अस्पताल मे भर्ति कराया है. अभी जगदीश राव गांव से अस्पताल पहुंचे और मै घर आया हू...' मनोहरराव ने कहा . 
' क्या ?? आपने मुझे बताया भी नहीं ... अभी चलो अस्पताल ..' सिंधू ने सुबकते हुए कहा . 
' रोना नही सिंधू... हम भोजन करते है और तुरंत अस्पताल जाते है... चलो , उठो .' मनोहरराव ने सिंधू के आंसू पोंछ कर थपथपाते हुए कहा . 
जगदीश राव सिंधू का छोटा भाई था . उनका बेटा पुना मे होस्टेल मे रह कर इंजिनिअरिंग की पढ़ाई कर रहा था . सुबह क्लास जाते समय एक वाहन ने उस के मोटरसाईकिल को टक्कर मारी . हेल्मेट की वजह से सर तो बच गया था लेकिन दाहिने हाथ और पैर मे काफी चोंटे थी ‌. पैर मे सूजन थी . एक सज्जन ने उसे अस्पताल पहुंचाया . अस्पताल से ही उस ने मनोहरराव को किया था , और मनोहरराव तुरंत ही वहां पहुंचे थे . 
अजय बाहर गया था और बहु लैपटाप पर अपना काम कर रही थी . 
दोनों किचन मे आए . किचन मे हलचल सुन कर बहू आई . मनोहरराव को देख कर ठिठकी . 
' खाना गर्म कर दू ? ' बहू ने सिंधू स पुछा . 
' रहने दो बेटा ... मै कर लूंगा .' मनोहरराव ने बीच में बोला . 
' वह कर रही है ना... आप आइएं इधर ...' सिंधू ने कहा . 
भोजन पश्चात दोनों बाहर निकले .
' कही बाहर जा रहे है ? ' बहू ने पुछा .
' हां... अस्पताल जा रहे है ..' सिंधू ने जवाब दिया . 
दोनों अस्पताल पहुंचे . बहन को देख कर जगदीश राव उठे और सिंधू के पैर छुएं . 
' साहब ने बचा लिया आज बेटे को...' जगदीश राव रुआंसे स्वर मे हाथ जोड कर कहा . 
' अरे वह भी मेरे बेटे जैसा ही है...सब ठीक हो जाएगा , चिंता ना करो... चलो बेटे के पास .' मनोहरराव ने जगदीश राव के कंधे पर हाथ रख कर कहा .     ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, October 21, 2021

अजब गजब - ७९ : हीरई माता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७९ : हीरई माता 
 Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नमः ।
कल्याणै कामदायै च वृध्दयै सिध्दयै नमो नमः ।।


मध्यप्रदेस क खरगोन जिला म भीकनगांव पासीन सनावद सडक प २५ कि.मी. दूर हीरापुर स . यहान मन्नत पूरी करनी वाली कुलदेवी ' हीरई माता ' को देऊर स . 
देऊर म हीरई माता अन् भगवान शिवजी की थापना स . 
हिरई माता क नाव परीन च यहान बसे गाव ला ' हीरापुर ' इ नाव पड्यो . येन हजार बरस पुरानऽ देऊर को आवार खूब मोठो स . हिरई माय क देऊर म चवसठ योगिनि को बास स . आवार म भगवान गनेस, बिस्नु देव , दुरगा माय , हनुमान जी , लक्षुमी नारायन असी कयी मूरतीना स . इ देऊर पुरातत्त्व विभाग क अखत्यारी म स . सार आवार म परमार कार की दुरलभ मूरतीना स . 
हीरापुर क इलाखा म अंबा , बेडिया , भूलगांव , बांगरदा , बांसवा , कोटल्याखेडी , धरगांव , मालखेडा , नूरीयाखेडी म आब बी पंवार वंस क लोगना की बस्ती स . येन निमाड क इलाखा पर पंवार वंस न राज करेस . 
१. इतिहास अन् मान्यता : * यहान का पंवार सांगस क वूई माऊंट अबू परीन धार आया . वहान महाकाली देऊर जवर भयरव जी की थापना करी . वहा सिन अमझेरा आया . अमझेरा म अमका - झुमका माता को देऊर आन् बावडी बांधी . ११ वी / १२ वी सदी म अमझेरा सिन हीरापुर आया . यहान कुलदेवी हीरई माता को देऊर बांध्ये आन् हीरापुर गाव बसाडे . 
* नि:संतान की मनोकामना हीरई माता पूरी करस , असी मान्यता स . 
* येन इलाखा का पंवार हीरई माता की कुलदेवी क रूप म पूंजा करस . 
* इ.स. १९७२ म यहान की परमार कार की दुरलभ ४ मूरतीना की चोरी भयी . ( येम भगवान भोलेनाथ क कोरा म बसी पाराबती अन् दूध पेता भगवान गनेस की अति दुरलभ मूरतीना बी सामिल स .) 

२. पूजा / पर्व : * उसो त साल भर भगत लोगना को यहान आनो जानो चालूच रव्हस . पर नवरातरी म हीरई माता की खास पूंजापाती आन् अनुस्ठान होस . 
' जय हो हीरई माय ' 

( सहयोग : इंजि. जालमसिंह सोढा जी जोधपुर )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, October 20, 2021

गलती. Hindi Language _ हिंदी भाषा

गलती
Hindi Language _ हिंदी भाषा

सभी चाहते थे हमें बदलना
अपने मनमुताबिक.....
हम गढ़ते , ढ़लते गये उनकी चाहत अनुरूप
नखशिखान्त बदल गयी हस्ती !
अंत में झेलते है उलाहना --
आप काफी बदल गये , पहले तो ऐसे न थे...
अब हम सदमे मे , गलती किसकी ????

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, October 18, 2021

रोज सूर्व्यदेव नवो ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

रोज सूर्व्यदेव नवो
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पत्तो सकारकन को
पुसे नी कोनी ला कोनी
गड्या मुर्दाना उखाडे
पास जावन की बानी ।१।

नाव कुर को गुताडो
वोकी रमाईस धुनी
धुव्वो फुक फुक कन
डोरा चुरचुऱ्या ग्यानी ।२।

खंती खांद खांद कन
काय भेटे कोनजानी
घाव कुरुप बाहाडे
होस आमारी च हानी ।३।

भागादौडी देस देस
भरनला पेटपानी
सपी केतरी पीढीना
सरी गनती निस्यानी ।४।

गयो उनारो हिवारो
बरसाद को गा पानी
मन सदसद्यो असो
कब आयेन बरानी ।५।

जीव आये जीव जाये
दुय दिन जिंदगानी
रागलोभ को झमेलो
सतावस मनमानी ।६।

रोज सूर्व्यदेव नवो
रोज नवीन कहानी
लिखो खुद क पाना प 
गीता रामायन मानी ।७।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, October 16, 2021

घर - भाग ६. Hindi Language _ हिंदी भाषा

घर - भाग ६
Hindi language _ हिंदी भाषा

रास्ते मे मार्केट से कुछ सामान लेकर दोनों पुना पहुंच रहे थे . सिंधू सुकून महसूस कर रही थी . मोहनराव एफ एम के गानों पर इशारें कर कर सिंधू को सता रहे थे... मस्ती में थे .
दोपहर हुई थी . मनोहरराव ने सडक किनारे एक रेस्टॉरंट के आगे कार खडी की . दोनों खाना खाकर निकल पडे . 
पार्किंग मे कार आते ही चौकीदार ने बडे अदब से नमस्कार किया . मनोहरराव ने डिकी से बैग और गांव से दिया हुआ सामान बाहर निकाला . सिंधू कुछ सामान लेकर लिफ्ट मे गई . चौकीदार कार के पास आया . मनोहरराव और चौकीदार बाकी सामान लेकर फ्लैट मे आये . अजय बाहर था और बहू अपने कमरे मे ऑफिस के कार्य में व्यस्त थी . सिंधू किचन से चाय लेकर आई . मनोहरराव और चौकीदार हॉल मे बैठे थे . सिंधू ने चाय रखी और एक कप लेकर बहू के कमरे मे गई . 
'  आपने क्यो तकलिफ की.... मै ने अभी अभी चाय ली थी...' बहू ने लैपटाप हटाते हुए कहा . 
' और ले लो...' सिंधू ने मुस्कुरा कर कहा और वापिस मुडी . 
' अरे सिंधू , गांव से सामान आया है , उस में से कुछ इसे भी दे दो..' मनोहरराव ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा . 
' रहने दिजीए साहब... ' चौकीदार ने सकुचाते हुए कहा . 
' नही , दो मिनट रूको... गांव की चीजें बार- बार थोडे ही मिलती है...' सिंधू ने कहा .
कुछ संतरे , सब्जीयां एक थैली मे भर कर सिंधू ने चौकीदार को दी . 
शाम को अजय आया . मनोहरराव बाहर ओपन टेरेस मे बैठे थे . अजय पापा के पास गया . दोनों बातचीत कर रहे थे . दोनों को सिंधू किचन से देख रही थी . 
दुसरे दिन अजय शाम को लौटा तो कम्पाउंड पर लगी तख्ती पढ़ कर सकते मे आ गया . वह तेजी से उपर आया . मनोहरराव और सिंधू टहलने गये थे . अजय ने तख्ती वाली बात पत्नी को बताई . उसका भी माथा ठनका ! मनोहरराव और सिंधू घर आए और टेरेस मे बैठे . अजय तमतमाते हुए आया . 
' यह क्या चल रहा है पापा ?' अजय ने बगल की कुर्सी पर बैठते हुए कहा . 
' क्या हुआ ?' सिंधू ने पुछा . 
' बाहर ' पेईंग गेस्ट ' की तख्ती लगी है . हमारे पास जगह कहां है और परायों को हम घर मे क्यों रखेंगे ? वैसे जरूरत भी क्या है ?' अजय ने गुस्से से कहा . 
' बात जरूरत की नही है बेटा , समय की है . तुमने जो फ्लैट लिया है , वह किराये से चढ़ाया है . अगर तुम्हे यहाँ कुछ असुविधा महसूस होती है तो तुम वहां रहने के लिए जा सकते हो . नही तो वहां का किराया घर मे घरखर्चे के लिए उपयोग में लाओ . अभी एक बेडरूम खाली पडा है , उस मे पेईंग गेस्ट रखेंगे तो क्या दिक्कत है ?' मनोहरराव ने कहा . 
' यह क्या बात हुई ! हम उधर रहने गये तो आपकी देखभाल कौन करेगा ? और पेईंग गेस्ट रखा तो हमारी प्रायव्हसी का क्या होगा ? आपके पास तो इतने पैसे है.... यह सब करने की क्या जरूरत है ?' अजय ने सवालों की झडी लगा दी . 
' देखभाल ! यह बात तो रहने दो . मैने जो पर्याय बताए है, उन में से तुम्हे कौनसा ठीक लगता है , यह बताओ . ' मनोहरराव ने कहा .
' आप क्या बोल रहे है , मेरी समझ के बाहर है.... इसे सठीयाना कहते है..' अजय बुदबुदाया . 
' क्या बोल रहे हो अजय ? अपनी मर्यादा में रहो...' सिंधू ने डांटते हुए कहा . 
' क्या बोला ?..' मनोहरराव ने पुछा . 
' कुछ नही... आप शांत रहो..' सिंधू ने कहा . 
अजय जाने के लिए उठा . 
' रूको.. यह मेरा घर है... और तुम बेटे जैसे रहोगे तो ही यह घर तुम्हारा है... बदतमीज का हरगीज नही... ' मनोहरराव ने गुस्से से कहा . 
सिंधू उन्हे शांत करने की कोशिश करने लगी.... अजय तेजी से अंदर गया .    ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, October 11, 2021

घर - भाग ५. Hindi Language _ हिंदी भाषा

घर - भाग ५
Hindi language _ हिंदी भाषा

क्षितीज पर निली बैंगनी पर्वतमाला की लहरदार लकीर निले आकाश को प्राकृतिक तोरन प्रदान कर रही थी . अचानक मोहनराव ने कार की गति कम की और धीरे धीरे एक बडे होर्डिंग्ज के पास रोक दी . डैशबोर्ड से मोबाइल उठा कर होर्डिंग की तस्वीर खिंची . ... वहां बडे बडे अक्षरों में लिखा था , ' ज्येष्ठ सहनिवास कालोनी ' !
थर्मस से गरम पानी का एक घुंट लेकर मोहनराव ने इशारें से सिंधू को बोर्ड दिखाया . सिंधू के चेहरे पर बडा सा प्रश्नचिन्ह उलझन लिए खडा था !
' कुछ नहीं... ' मोहनराव बुदबुदाएं और इग्निशन स्टार्ट किया . 
कार थरथरा कर सडक पर आई और फिर हवा से बातें करने लगी . विविध भारती पर सुरीले नग्में बज रहे थे . 
' वैसे हम कहां जा रहे है ? ' सिंधू ने हौले से पूछा . 
' पहले गांव चलते है... फिर आगे की आगे...' मनोहरराव ने मजाकिया अंदाज में कहा . 
' गांव जा रहे है तो पहले बताना था ना.... इतने दिनों बाद जा रहे है , वह भी खाली हाथ ! ' सिंधू ने नाराज होते हुए कहा . 
' ओके बाबा... रास्ते मे कही रुक जाएंगे... ठीक ...' मनोहरराव ने अपनी ही मस्ती में जवाब दिया .
तभी मोबाइल की घंटी बजने लगी . मोहनराव ने ध्यान नही दिया . सिंधू ने मोबाइल उठाया और स्पिकर चालू किया . अजय का फोन था...
' हैल्लो ऽ... ' सिंधू ने कहा .
' कहां हो मॉं आप ? बिना बताएं कहां गये हो आप लोग ?' अजय ने नाराज होते हुए पुछा . 
' गांव जा रहे है बेटा...' सिंधू ने बताया .
' क्यों तुम्हारे परमिशन की जरूरत है क्या ?' मोहनराव ने डांटते हुए बोला . 
' नही पापा.... लेकिन बताते तो अच्छा होता...' अजय ने धीरे से कहां .
' अच्छे बुरे की समझ है हमें ... तुम बेवजह चिंता ना करो..' मोहनराव ने कहा और फोन काट दिया . 
सिंधू को कल से ही अटपटा लग रहा था . पर उसका मोहनराव पर इतना भरोंसा था की वह आंख मुंद कर उनकी बातें मान लेती थी . बेपनाह मुहब्बत करते थे मोहनराव सिंधू से ! सिंधू के एक एक आंसूओं को मोतीयों से तौला था उन्होंने ! वे सिंधू को कभी भी शोक , पीडा में नही देख सकते थे . सिंधू की घर की बताई बातों से उनका दिमाग घुम गया था ..... पर वह भाव उन्होंने चेहरे पर नही दिखने दिए . सदा हल्की मुस्कान लिए खडे रहते थे सिंधू के आगे . 
रास्ते मे छोटासा शहर आया . मनोहरराव ने मार्केट लाईन में कार पार्क की और सिंधू के दुकान मे गये . सिंधू ने कुछ कपडे और भेंटवस्तूएं ली .
हायवे से दाये हाथ पे छोटी सडक पर कार मुडी . कार अब धीमी गति से चल रही थी और मनोहरराव की यादें तेज रफ्तार से ! 
घर मे पहुंचते ही बाडे मे रौनक आ गयी . पुरा कुनबा इकठ्ठा हो गया... त्योहार सा माहौल ! रसोई की खुशबू ने मोहनराव की भूख बढ़ा दी . शाम के पहले दोनों और बच्चें खेत में टहलने गये. कितने वर्षों बाद वे खेत में आए थे....
रात देर तक गपशप चलती रही . 
सुबह मनोहरराव और सिंधू ने गांव से प्रस्थान किया . 
' अब कहां ? ' सिंधू ने पुछा . 
' वापिस पुना ..' मनोहरराव ने हंसते हुए कहा .
' आप भी अजीब है.. कह रहे थे ८-१० दिन के लिए जाना है.. आपको नही लगता यह अस्वाभाविक है !' सिंधू ने मोहनराव को गौर से देखते हुए कहा . 
मनोहरराव ने कार हायवे किनारे एक बडे से पेड की छाया मे खडी की . सिंधू को बाहर आने के लिए इशारा किया . सिंधू थर्मस लेकर आई . दोनों ठंडी छांव मे बैठे... मनोहरराव ने सिंधू का हाथ अपने हाथ मे लिया...
' कुछ कहना चाहते हो..' सिंधू ने पल्लू से मनोहरराव का चेहरा पोंछते हुए कहा .
' हां... बहुत कुछ... बहू का तुम्हारे साथ अभद्र व्यवहार मुझे कतई पसंद नही आया ... तू बहुत भोली है सिंधू . रिटायर्डमेंट के बाद भी बडी रकम घर मे आई थी , लेकिन उस वक्त इतनी उथल पुथल नही मची थी . अभी खेत के पैसे आने के बाद तो भूकंप ही आया.. घर मे तणाव महसूस कर रहा हूं . तुम्हारे साथ जो हो रहा है , वह मेरे साथ भी हो रहा है.. मैने तुम्हें बताया नही बस ! बच्चों के हिसाब से अब हमारी जिंदगी समाप्त हो चुकी है . क्या हम डुबते हुए सूरज को अपना जीवन अपने मनमुताबिक जीने का हक नही है ? उम्र निकल गयी नौकरी करते करते.. तुम्हारे साथ पल भर बैठ कर दिल की बात भी नही कर सका मै... घर , रिश्तेदारी , बेटे को तुमने अकेले संभाला... कभी कोई अपनी ख्वाहिश साझा नही की हम ने... बचपन में मुझे मॉं बाप ने संभाला... विवाहोपरांत तुमने मुझे ही नही , मेरी जिम्मेदारीयों को भी संभाला . हमारे सहजीवन मे मै ने कितना साथ दिया तुम्हारा ?... कुछ भी नहीं...' मनोहरराव ने भावुक स्वर मे कहा . 
सिंधू की आंखे भी छलछला उठी .
' ऐसा नही बोलते . आपने बहुत प्यार और सुख दिया है मुझे ... मुझे आपसे ना कभी शिकायत थी , ना रहेगी ... आप सोचते बहुत है . मै तो खुशनसीब मानती हूं अपने आप को , जो आप जैसा जीवनसाथी मुझे मिला ; और हर जनम में आप ही मेरे जीवनसाथी रहोगे . ' सिंधू ने मनोहरराव के कंधे पर सर रख कर कहा . 
मनोहरराव ने सिंधू का कपाल चुमा और आंसू पोंछने लगे .... दोनों के आंसू बह रहे थे.. अविरत ! दोनों एक दुसरे को नये सिरे से खोज रहे थे... बडे प्यार से !
' चलो चलते है... लोगबाग क्या सोचेंगे हमें देख कर..' सिंधू ने संयत होते हुए कहा और उठने लगी . 
' अरे बैठो... किसी को नही पडी है हमें देखने की... बस्स हमें ही ऐसा लगता है.. पानी दो जरा . ' मनोहरराव ने कहा . 
मनोहरराव ने पानी पीया . सिंधू सडक की ओर देख रही थी . 
' एक बात बोलू सिंधू ? ' मनोहरराव ने गंभीर स्वर मे कहा . 
' हां...' सिंधू ने कहा .
' तुमने मुझे पति कम और बच्चे जैसे ही जादा संभाला है ...' मनोहरराव ने कहा . 
' आप भी योग पति कम और बच्चे जैसे ही जादा हो ...' सिंधू ने मुस्कुरा कर कहा . 
दोनों के आंसू बह कर अब माटी का सुगंध लिए मासूम हंसी बिखर रही थी फ़िजा में ...दोनों मासूम बच्चों की तरह लिपट कर बैठे थे घनी छांव मे.. अब हायवे की ट्रैफिक भी उन्हें महसूस नही हो रही थी ... खोये थे अपनी ही दुनिया मे . 
- तभी एक ट्रक की हिंदी गाने के धून की हॉर्न बजने लगी...
' गोरी तेरा गांव बडा प्यारा ऽऽऽ.......'
' चलो अभी .' सिंधू ने झेंपते हुए कहा .
दोनों कार की ओर बढ़े .....( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, October 10, 2021

अजब गजब - ७८ : बीसहथ माता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७८ : बीसहथ माता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

यदुचितमत्र भवत्युररी कुरुतादुरुता पमपाकुरुते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

राजस्थान क जालौर किल्ला को नाव ' स्वर्णगिरी ' , अन् यहान परमार वंस को राज रह्ये . तब येन किल्ला म बीसहथ माता की थापना भयी . या बात स ८४३ बरस पह्यले की ! 
बीसहथ माता जैन समाज म कोचर , राजपूत समाज म परमार अन् राजपुरोहित समाज म सेवड़ गोत्र की कुलदेवी स . 
आब बीसहथ माता की ( जालौर किल्ला वाली ) मूरती जोधपुर क भैरूबाग जैन तीर्थ परिसर म बिराजमान स . 
बीसहथ माता सिंव्ह पर बसी स आन् दुय आंग भयरव की मूरतीना स . जेवनहाथ प पांढरो ( गोरो ) भयरव न डाख हाथ प कारो भयरव स . 
बीसहथ माता ला बीस हाथ स , तेकन नाव पड्यो , " बीसहथ माय " ! बीसहथ माय क हाथ म अक्षमाला , कुऱ्हाड , गदा , बाण , वज्र , कमल फुल , धनुस , कुंडिका , दंडस्यक्ति , तलवार , ढाल , स्यंख , घंटा , मधुपात्र , शूल , पाश , चक्र स . 
बीसहथ माय की सेवा - पूंजा पुजारी करस . पर माय को आंग धोवन को  , कपडा पेहरवन को काम बाई लोग च  करस . 

१. इतिहास अन् मान्यता : * जालौर पर परमार राज होतो . परमार राजो मदन ब्रम्हदेव न बि . संवत् १२३५ ( इ.स. ११७८ ) म किल्ला पर " बीसहथ माय " की थापना करी . परमार राज क बास्त यहान चौहान वंस को राज आयो . 
* इ.स. १३११ म जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी न हमलो कऱ्यो . तब वहान कान्हडदेव राजो होतो . राजा कान्हडदेव को पोरग्यो वीरमदेव रावल मोठो बाह्यदूर होतो . वीरमदेव ला बीसहथ माय को वरदान भेटेत्यो . जब लढाई होयेन तब वोका अस्तर स्यस्तर कब बी खतम नी होयेन ! माय बीसहथ वोला तलवार देती रहेन . पर येम येक बचन होतो.... वीरमदेव कब बी पास बीसहथ माय ला नी देखेन . आरपार की लढाई चाल रहीथी . वीरमदेव जीतन क काठा पर च होतो... तब वोन पास देख लियो... बस , बचनभंग भयो ! बीसहथ माय गुप्त भयी . अन् वीरमदेव ला वीरगति भेटी . 

* पृथ्वीराज रासो पोथी म बीसहथ माय को जिकर स . सम्राट पृथ्वीराज चौहान को परसिध्द दरबारी कवि चंद वरदाई न बीसहथ माय क सम्मान म स्तुति छंद लिख्यो स . 

* चौहान वंस क बास्त यहान राठौड वंस को राज आयो . बि. संवत् १८६० म राजा मानसिंग ला जोधपुर को राज भेट्यो . तब वून को सहयोगी मूथा सवाईराम कोचर न जालौर परीन बीसहथ माय की मूरती जोधपुर ला ल्याई . इ.स. १९३० म बीसहथ माय की जोधपुर म दुनन थापना भयी . 

२. पर्व : * नवरात म रोज माय को खास अभिसेक होस . 
* हरेक चयीत चांदनी ( उजरी ) अस्टमी ला हवन पूजन होस . 
* जेठ चांदनी ( उजरी ) पंचमी ला अभिसेक होस आन् झ्यंडो चढस . 

' जय जय बीसहथ माय '

( सहयोग : इंजि. जालम सिंह सोढा जी जोधपुर )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, October 9, 2021

उपहार. Hindi Language _ हिंदी भाषा

उपहार 
Hindi language _ हिंदी भाषा

रास्ता भटक जाऊ मै
राह सही दिखलाना
भूल जाऊ धर्म कर्म
याद बलात् दिलाना ।

टूट कर बिखरा तो
कण कण जोड देना
हारे तन मन जब
उर्जा कृपा बरसाना ।

जिस कर्म से हो ग्लानि
दूर उससे रखना
घेर ले तम निराशा
आशा के दीप जलाना ।

जाऊ किसी भी दिशा में
पैर माटी के रखना
रहे लिखती कलम
यही उपहार देना ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

पहचान ( हिंदी कविता ). Hindi language _ हिंदी भाषा

पहचान
Hindi language _ हिंदी भाषा

पुण्यभूमी हिंदुस्थान
हम उसकी संतान
कहे सब हिंदुस्थानी
मेरी यही पहचान ।

नर रूप मिला हमें
मातापिता भगवान
परमात्मा की कृपा ने
तन मन किया प्रदान ।

जिस देश , वेश में हो
सागर या आसमान
सत्कर्म की राह पर
हम बनेंगे इन्सान ।

राम सीता कृष्ण राधा
शिव सति कृपा निधान
गंगा यमुना सरस्वती
हम जलबिंदू समान ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर