घर - भाग ७
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रातभर किसी को नींद नही आई . अजय की पत्नी भी मुंह फुला के बैठी थी . ससुरजी ऐसा कुछ बोलेंगे या करेंगे इस की उसे उम्मीद ही नही थी . अजय के सर पर हथौडे चल रहे थे . सिंधू यहि अनपेक्षित वातावरण सह न सकी . उसे तेज बुखार चढ़ गया . मनोहरराव ने सिंधू को टैबलेट दी और माथे पर ठंडे पानी की पट्टीयां रखने लगे . आज किसी ने खाना नही खाया था . घर रणभूमी मे तब्दिल हो चुका था .
सुबह सुबह सिंधू का बुखार कुछ कम हुआ और उसे गहरी नींद लगी .
अजय आज जीम नही गया . मनोहरराव उठे और किचन मे आए . चाय और बिस्कुट लेकर टेरेस पर बैठे . सर भारी लग रहा था . चाय पिने से थोडी राहत मिली . उनका फोन बज उठा . वे तुरंत अपना वैलेट लेकर पार्किंग मे आए और कार लेकर निकल पडे .
आज सुबह कुछ ज्यादा ही अस्तव्यस्त थी . बहुत कुछ बिखरा पडा था ...... यादें , सपने और रिश्तों के मतलब भी ! घर की दिवारें सहमी थी .... इटें कांप रही थी किसी अनामिक भय से !
अजय बेडरूम से किचन मे आया . डायनिंग टेबल पर चाय की खाली प्याली थी . खिडकी से देखा तो टेरेस पर कोई नही था . उसने हौले से पापा की बेडरूम का दरवाजा खटखटाया . सिंधू की नींद खुल गई ; देखा तो मनोहरराव नही थे . दरवाजा खोला तो सामने अजय खडा था .
' बोलो बेटा .' सिंधू ने कहा .
' कुछ नही.... पापा कहां है ? ' अजय ने धीरे से पुछा .
' पता नही... कमरे मे तो नही है ..' सिंधू ने बताया .
अजय किचन मे गया और पिने के लिए पानी गर्म करने लगा . उदासी की हवा बह रही थी घर मे . अजय ने पत्नी को आवाज लगाई और . वह आई और चाय - नाश्ता बनाने लगी .
सिंधू ने मनोहरराव को फोन किया .
' हैल्लो... ' सिंधू ने कहा .
' हा सिंधू... जल्दी बोलो . ' मनोहरराव ने कहा .
' इतनी सुबह सुबह बिना बताए कहां गये हो ? ' सिंधू ने पुछा .
' कुछ जरूरी काम है... दोपहर के भोजन तक घर आता हू और सब बताता भी हू.. चिंता न करो .' मनोहरराव ने जवाब दिया .
अजय ने मॉं को आवाज लगाई . सिंधू किचन मे आई.
' बैठो मॉं...' अजय ने गर्म पानी का ग्लास डायनिंग टेबल पर रखते हुए कहा .
बहु चाय और नाश्ता लेकर आई . तीनों नाश्ता कर रहे थे , लेकिन ध्यान पापा की कुर्सी पर था .
दोपहर मे मनोहरराव आए . सिंधू बेडरूम मे आराम कर रही थी .
' तबीयत कैसी है अब ? ' मनोहरराव ने आते ही सिंधू के माथे को छु कर कहा .
' ठीक है... कहां थे आप ?' सिंधू ने चिंता से पुछा .
' बताता हू बाबा... जगदीश राव के बेटे का ऐक्सिडेंट हुआ है . उसे अस्पताल मे भर्ति कराया है. अभी जगदीश राव गांव से अस्पताल पहुंचे और मै घर आया हू...' मनोहरराव ने कहा .
' क्या ?? आपने मुझे बताया भी नहीं ... अभी चलो अस्पताल ..' सिंधू ने सुबकते हुए कहा .
' रोना नही सिंधू... हम भोजन करते है और तुरंत अस्पताल जाते है... चलो , उठो .' मनोहरराव ने सिंधू के आंसू पोंछ कर थपथपाते हुए कहा .
जगदीश राव सिंधू का छोटा भाई था . उनका बेटा पुना मे होस्टेल मे रह कर इंजिनिअरिंग की पढ़ाई कर रहा था . सुबह क्लास जाते समय एक वाहन ने उस के मोटरसाईकिल को टक्कर मारी . हेल्मेट की वजह से सर तो बच गया था लेकिन दाहिने हाथ और पैर मे काफी चोंटे थी . पैर मे सूजन थी . एक सज्जन ने उसे अस्पताल पहुंचाया . अस्पताल से ही उस ने मनोहरराव को किया था , और मनोहरराव तुरंत ही वहां पहुंचे थे .
अजय बाहर गया था और बहु लैपटाप पर अपना काम कर रही थी .
दोनों किचन मे आए . किचन मे हलचल सुन कर बहू आई . मनोहरराव को देख कर ठिठकी .
' खाना गर्म कर दू ? ' बहू ने सिंधू स पुछा .
' रहने दो बेटा ... मै कर लूंगा .' मनोहरराव ने बीच में बोला .
' वह कर रही है ना... आप आइएं इधर ...' सिंधू ने कहा .
भोजन पश्चात दोनों बाहर निकले .
' कही बाहर जा रहे है ? ' बहू ने पुछा .
' हां... अस्पताल जा रहे है ..' सिंधू ने जवाब दिया .
दोनों अस्पताल पहुंचे . बहन को देख कर जगदीश राव उठे और सिंधू के पैर छुएं .
' साहब ने बचा लिया आज बेटे को...' जगदीश राव रुआंसे स्वर मे हाथ जोड कर कहा .
' अरे वह भी मेरे बेटे जैसा ही है...सब ठीक हो जाएगा , चिंता ना करो... चलो बेटे के पास .' मनोहरराव ने जगदीश राव के कंधे पर हाथ रख कर कहा . ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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