Thursday, March 31, 2022

मांडवस ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मांडवस ( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

गयो कोरोना दयीत
आयी दादा मांडवस
देखो साल की आयीस
आज आखरी अवस ।

अवस क गरभ म
नवअ साल की जी आस
कठान म फुलारस
जसी जांभरी जवस ।

साजवनी मोह्यतूर
नवअ साल को दिवस
उम्मीद क तोरन ला
पत्ता आम्बा का च खास ।

माय धरती की पूंजा
दस्तूर का पाच तास
झूल पांघऱ्या बयील
राजा वानी झलारस ।

बखरवाही की घाई
तन मन म उल्लास
तकदीर की किरना
उब म जी तपावस ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, March 28, 2022

भारतीय रेल. Hindi language _ हिंदी भाषा

भारतीय रेल
Hindi language _ हिंदी भाषा

ना थकती कभी ना थमती
रेल हमारी सदा चलती
रोजगार का विशाल स्त्रोत
दिलों को ये दिलों से जोडती ।

देश के हर कोने को जोडे
यात्री को गंतव्य तक छोडे
रात - दिन अविराम दौडे
फर्ज से कभी मुंह ना मोडे ।

सामग्री , खनिज पहुंचाए
प्यासे के लिए ढ़ोती पानी
चैतन्य वाहिका भारत की
जनता की जीवनदायिनी ।

सेवा में लोहपथगामिनी
सुरक्षित सफर सुहाना
हर दिल अजीज दुलारी
गुनगुनाए कौमी गाना ।

कर्मचारी , अफसर तत्पर
हर मौसम में करते काम
रेल परिवार की सेवा को
देशवासी करते सलाम ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

आखिरी बार. Hindi language _ हिंदी भाषा

आखिरी बार

आखिरी बार देखा गया था
आसमान से टूटता तारा
टूटे प्यार के कसमे - वादें
डूब गया प्रीति का सितारा ।

आखिरी बार देखा गया था
बुझता सिसकता अंगारा
राख मे खोजता फिरता
स्मृति अवशेष का जखीरा ।

आखिरी बार देखा गया था
शुभ्र दुपट्टे का उजियारा
मजबूरी का आलम देखो
चारों ओर फैला अंधियारा ।

आखिरी बार देखा गया था
टूटे पंख का नादान भौरा
जलना उसकी फितरत
सांसों का बन गया धुंवारा ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख, नागपूर

Sunday, March 27, 2022

कान्हो ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

कान्हो ( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मुलमुल देखे बाई
गयो भुकीज वो तान्हो
दाटी हिरदा म माया
फुट्यो भरभर पान्हो ।१।

म्हरो गोविंद गोपाल
माय यसोदा को कान्हो
घडी भर निज्या बास्त
इर भर को धिंगानो ।२।

वोकअ मुंडा बरमांड
भऱ्यो माती को बकानो
हासे मुखऱ्या मुखऱ्या
तेज सूर्व्या को ठिकानो ।३।

बंद सकवार मुठ्ठी
लुकायेस वो खजानो
माय बाप क माया को
लायो संग हरजानो ।४।

धऱ्यो मुंडा म आंगठो
भक्ति सगुन की जानो
गह्यरी या बाललीला
बाजे मुरली प गानो ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, March 24, 2022

निर्माण - भाग ५

निर्माण - भाग ५
Hindi language _ हिंदी भाषा

साइट से ५ कि.मी. दूर एक गांव से रोज कोई न कोई छोटा - मोटा सामान लाने के लिए जाना ही पडता था . ज्यादा बड़ा काम हो या डीजल लाना हो तो ५२ कि.मी. दूर एक छोटे से शहर के अलावा दुसरा पर्याय नही था . 
ट्रैक्टर , पानी की मोटर पंप , मिक्सर मशीन के लिए रोजाना डीजल की जरूरत होती थी . इसकी पूर्ति के लिए २०० लिटर के बैरल्स में डीजल भर के लाते थे . 
आज डीजल खत्म हुआ था . साइट पर कैश भी नहीं थी . पास वाले गांव के एक दुकानदार से कुछ जान - पहचान हुई थी . शाम को ट्रैक्टर ट्रॉली मे खाली बैरल्स चढ़वाए और ड्रायव्हर के साथ मै पास वाले गांव आया . दुर्भाग्य से उस दिन दुकानदार के पास भी ज्यादा पैसे नही थे . 
' आप काउंटर पर बैठिए . दो - एक घंटे में जितना गल्ला इकठ्ठा हो जाएगा , उस से आप का काम निकल जाएगा .' दुकानदार ने कहा . 
मजबूरन ड्रायव्हर को भी रुकना पडा . जैसे ही पैसे इकठ्ठा हुएं , हम वहॉं से रवाना हुए . नक्षलवादी इलाका होने से डर भी लग रहा था . लेकीन सुबह डीजल की सख्त जरूरत थी . रात ९.३० बजे पेट्रोल पंप पहुंचे . डीजल भरवा कर रात १० बजे वहॉं से निकले . गांव आते आते रात के ११.३० बज चुके थे . ड्रायव्हर उसी गांव मे रहता था . अब वह साइट तक आने को राजी नही था . 
' साहब , आधी रात हो गयी है . मै घर जाता हूं . साइट तक आप ट्रैक्टर ले जायेंगे तो अच्छा होगा .' गांव पहुंचते ही ड्रायव्हर ने कहा . 
' ठीक है..' मैने सहमती जताते हुए कहा . 
दर असल तब तक मैने कभी ट्रैक्टर नही चलाया था . ५ कि.मी. ही सही , लेकीन जंगली जानवर और नक्षलवादियों के डरावने जंगली रास्ते से जाना कोई खेल तो नही था ! ड्रायव्हर ने साइट की सडक पर ट्रैक्टर मोड दिया और स्टिअरिंग मुझे थमाया . ' मरता क्या न करता !' 
धीरे धीरे क्लच छोडा और ट्रैक्टर घोडे जैसा उछलते हुए दौडने लगा . ड्रायव्हिंग सीट पर बैठना दूभर हो गया . खडा हुआ तो स्टिअरिंग संभालना मुश्किल हो गया और ट्रैक्टर सांप जैसे टेढ़ा - मेढ़ा चलने लगा . वीरान जंगल , सुनसान रास्ता ! ट्रैक्टर की उछल कुद और बैरल्स के हिलने - डुलने से सर्द रात मे भी पसीने छूंट गये . उपर से इस इलाके मे भालू और शेर का राज ! स्पीड बढ़ाई तो ट्रैक्टर बेकाबू हो जाता था और धीरे चलाओ तो डर बेकाबू ! जैसे तैसे राम राम जपते साइट पर पहुंचा . 
' ड्रायव्हर कहा है साहब ?' आते ही स्टाफ ने पूछा . 
' वह गांव मे ही उतर गया .' मैने कहा . 
' इतनी रात मे आप अकेले आए ?' खानसामा ने अचरज से पूछा . 
' हा भाई...' मैने कहा . 
सभी खाना खाने के लिए मेरा इंतजार कर रहे थे . 
' चलो , खाना लगाओ... बहुत देर हो गयी है .' मैने कहा .
' जी साहब..' खानसामा ने रोटी बनाते हुए कहा . 
कैम्प के प्रांगण मे कुछ आदिवासी युवा मजदूर गोंडी गीत गा रहे थे . 
बड़ा उपकार कितोल महादेव जी
बड़ा उपकार कितोले ऽऽ

इद नवा देशो ते यमुना नदी
यमुना नदी ते ताप्ती माई
संगे - संगे नर्मदल मिले माता
महादेव जी बड़ा उपकार कितोले
बड़ा उपकार कितोले ऽऽ

इद नवा देशो ता हिंदी भाषा
हिंदी भाषा ते मराठी भाषा
संगे - संगे गोंडी मिले माता
महादेव जी बड़ा उपकार कितोले
बड़ा उपकार कितोले ऽऽ

( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, March 22, 2022

पदर ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पदर ( भोयरी कविता ) 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

माय की माया बाप की छाया
भेटस त कदर नी होत
भारी पेहऱ्या कपडालत्ता
माय को त पदर नी होत ।१।

दुय बात समझदारी की
कान टोच्या गदर नी होत
आयक ले सुदा पन कन्
हाल दरबदर नी होत ।२।

सोला क झाड प चेंग कन्
कोनी च अकादर नी होत
चींटी माकोडा को हर घर
सरप को च दर नी होत ।३।

मुंडा पर मानपान कन्
खरो सच आदर नी होत
पीठ पासअ की चुगली कन्
आपरो अनादर नी होत ।४।

जुगनू केतरा बी झलारे
अगास का चंदर नी होत
जुलूम जबरदस्ती कन्
कोनी देव इंदर नी होत ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, March 21, 2022

येक नान्ही सी कविता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

येक नान्ही सी कविता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

_ येक नान्ही सी कविता
अगास म उड कन्
मन क झुला प झुली
दुनियादारी मंझार
सुख दुख म जी घुली ।१।

_ येक नान्ही सी कविता
फूल को सुगंध लेय
घर दार म फयली
सिलसिलो सवाल को
सीग भर कन् पायली ।२।

_ येक नान्ही सी कविता
आंगवन की घाडीच
टावर टिवर टाली
दुडदुड दवडस
पैरी पयजन बाली ।३।

_ येक नान्ही सी कविता
फूल वानी सकवार
गाल प गूंजा की लाली
दुय बेनी भावना की
काकन की खलबली ।४।

_ येक नान्ही सी कविता
हिरा मोती की खदान
नवरस भरी ढोली
वोकअ मुंडा मिन झरे
गोड भोयराऊ बोली ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, March 18, 2022

रंग धुड्डी को निरालो. ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

रंग धुड्डी को निरालो
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

रंग धुड्डी को निरालो 
आयो मोसम रंगीलो
राधा संग कान्हा खेले
रुत बसंत को खेलो ।१।

रंग धुड्डी को निरालो
नान्हा मोठा को होहल्लो
हर आंगना म धुड्डी
रंगी गल्ली न मोहोल्लो ।२।

रंग धुड्डी को निरालो
इतअ उतअ भायी कल्लो
पोती गुलाल की लाली
तन मन चीप वोलो ।३।

रंग धुड्डी को निरालो
झगडो होरी म घालो
हासी खुसी मान पान
मन का दरुजा खोलो ।४।

रंग धुड्डी को निरालो
रंग म उम्मीद घोलो
बत्तासा सी गोड मीठी
बोली हिरदा की बोलो ।५। 

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, March 16, 2022

तुम हो तो ही हम है ( कविता )

तुम हो तो ही हम है
Hindi language _ हिंदी भाषा

यह अनंत दुनिया
अजब भूलभुलैया
कुछ कुछ वहम है
_ तुम हो तो ही हम है ।

रिश्तें - नाते अनगढ़
कुछ भ्रांतियां सुघड़
कुछ मीठे भरम है
_ तुम हो तो ही हम है ।

श्रध्दा रहित बंदगी
बेतरतीब जिंदगी
तुम्हारे ही करम है
_ तुम हो तो ही हम है ।

कुछ अनकहे बोल
प्रीत सदा अनमोल
बाहु झुला क्या कम है
_ तुम हो तो ही हम है ।

कंकन किंकिनि धुन
पैंजनी की रुनझुन
बातों में सरगम है
_ तुम हो तो ही हम है ।

समर्पण की आहुति
अद्वैत की परिणति
साथ हर जनम है
_ तुम हो तो ही हम है ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, March 14, 2022

स्त्री मुक्ती की स्त्री विकास ? Marathi language _ मराठी भाषा

स्त्री मुक्ती की स्त्री विकास ?
Marathi language _ मराठी भाषा

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।

( स्त्री मुक्ती ह्या विषयावर आलेल्या लेखावरील माझी प्रतिक्रिया . इ.स. १९९६ ) 

स्त्री मुक्ती म्हणजे काय ? _ आपण ग्रामीण स्त्रियांवर जुन्या विचारांच्या गर्तेत पडल्याचा जो निष्कर्ष काढता , त्यातील जुने विचार म्हणजे काय ? _ पतीशी , पतीच्या व्यक्तिमत्वाशी वा पतीच्या घराशी एकरूप होणे ; पती व पतीचं घर सर्वस्वी आपलं मानून त्या घराशी राब - राब राबणे ; प्रसंगी गैरसमजुती मुळे , स्वभावामुळे , संतापामुळे शारीरिक वा मानसिक त्रास - त्राण सहन करणे ; पितृसत्ताक कुटुंबपद्धती मुळे घराचा सुकाणू पतीच्या हाती असणे ( पितृसत्ताक कुटुंबपद्धतीचे प्राबल्य असले तरीही कुठे - कुठे मातृसत्ताक कुटुंबपद्धतीचे अवशेष काही जमातींमध्ये आजही आढळून येतात .) ... इत्यादी काय ? 
संपूर्ण भूतलावर मानवनिर्मित नात्यांमध्ये पती - पत्नी इतकं दुसरं श्रेष्ठ नातं नाही . मध्यमवर्गीय व उच्च वर्गीय स्त्री पेक्षा निम्नवर्गीय व ग्रामीण स्त्री ची घरासाठी राबणे , कष्ट करणे ह्याची क्षमता किती तरी जास्त आहे . परंतु अतिकष्टाच्या जीवनामुळे ह्या वर्गातील स्त्री - पुरुषांच्या कोमल भावना करपून एक रांगडेपणा आलेला असतो व त्यांच्या भावनांची अभिव्यक्ती शिष्ट , औपचारिक व सुसंस्कृत न राहता त्यात एक प्रकारची प्रखरता आलेली असते व आपला दृष्टिभ्रम होतो . 
प्रेमभावनेचा सात्त्विक आविष्कार म्हणजे श्रध्दा !
प्रेमभावनेचा राजस आविष्कार म्हणजे स्नेहभावना !
प्रेमभावनेचा तामस आविष्कार म्हणजे असहिष्णुता ! 
_ ह्यात श्रध्दा व असहिष्णुता अगदी टोकाच्या भावना आहेत ; ज्या ग्रामीण व निम्नजनांमध्ये आढळतात व आपला गैरसमज होतो . 
अधिकार , हक्क व कर्तव्याची सापेक्ष भावना कृत्रिम , हिशोबी व कागदी आहे . 
जर पती पत्नीचे व्यक्तिमत्त्व खरोखरच एकरूप झालेले असेल तर त्याला पाण्याची उपमा देणे उचित ठरेल . पाण्यालाच आपण जीवन म्हणतो . पाणी हायड्रोजन व ऑक्सिजन मिळून बनलेला आहे . ( आता त्यात हायड्रोजनचे दोन अणू व ऑक्सिजनचा एक अणू  _ असा हिशेब मांडू नये . ऑक्सिजनचा एकच अणू असला तरीही प्राणवायू तोच आहे . ) . आता येथे कसली मुक्ती पाहिजे ? कारण मुक्ती म्हणजे पाणी ( जीवन ) नष्टच होणार ! आणि जर शुध्दता पाहिजे असेल तर ती तुमच्या मानसिकतेच्या गाळणीवर अवलंबून आहे . 
स्त्री वरील अन्याय कायद्याच्या मदतीने दूर करणे म्हणजे ' आग रामेश्वरी आणि बंब सोमेश्वरी ' असेच होईल . पती - पत्नीचे तरल भावबंध कायद्याच्या रुक्ष दोरखंडाने सांधताच येणार नाही . 
कृत्रिम , जीवनाच्या हिशेबी बंधात कायद्याच्या मदतीने जगण्यापेक्षा नैसर्गिक जीवनाच्या उत्कट भावबंधाची एक - दुसऱ्या प्रति  
" हद से गुजर जाना " ची उर्मीच जास्त गरजेची !

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Sunday, March 13, 2022

अजब गजब - ८९ : राजगढ़ रियासत. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ८९ : राजगढ़ रियासत
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्य प्रदेस म राजगढ़ को जिलो स . राजगढ़ या उमठ परमार राजपूत की रियासत होती . मालवा पठार क महादेव मुखी काठ प , मान्यागढ़ पहाडी क पायथा सीन , नेवाज - पारबती नदी क मंझार ' राजगढ़ रियासत ' होती . राजगढ़ छतरपुर पासीन ५९ कि. मी. दूर स . 
राजगढ़ पह्यले भील राज की राजधानी होती . वून की कुलदेवी ' माय जालपा ' . माय जालपा को देऊर आबअ बी राजगढ़ म स . मान्यादेवी को खंडारो भयो देऊर आन् एक कुंड क काठा पर स्वर्गेस्वर महादेव देऊर स . राजगढ़ म तकिया ताल , भवानी धरन , कजालिया तलाव स . राज राजेस्वर देऊर , चतुरभुजनाथजी देऊर , नरसिंह जी देऊर , हनुमान जी को देऊर , इ पुराना देऊर राजगढ़ की सोभा स . 
राजगढ़ म बडामहल ( मोठो महाल ) इ.स. १६४५ म बांध्यो आन् राजमहल इ.स. १९३१ म रावत विरेंद्र सिंह राजा क कारकीर्द म बांध्यो . 
राजगढ़ को पुरानो नाव झंझनीपुर , झंझेपुर , उमठवारा होतो . 
इतिहास : * पन्ना को राजो हिरदे स्याह न पह्यले यहान बसती बसाई , असी मान्यता स . 
* यहान क उमठ परमार राजाना ला इ.स. १४४८ म " रावत " या उपाधि भेटी . 
* राजा छतर सिंग ला तीन पोटूना होता . मोठो मोहन सिंग , मंडोट जगन्नाथ सिंग आन् नान्हो प्रेम सिंग ! राजा छतर सिंग क बास्त राजगादी प मोठो पोरग्यो मोहन सिंग बस्यो ( इ.स. १६३८ - इ.स. १६९७ )  , तब वून की उमर सिरफ १५ बरस की होती . तेकन राज कारभार की जिम्मेदारी दीवान अजब सिंग न संभाली . राजमाता ( रावत मोहन सिंग की माय ) क अनुमती कन् इ.स. १६४५ म दीवान अजब सिंग न राजगढ़ क पहाडी भाग बस्यो भील राज संग लढ़ाई कर कन् वून ला हाराये . अन् वोकअ बास्त वहान बडामहल ( मोठो महाल ) बांध्यो . महाल ला ५ दरुजा स . ( इतवारिया , भुडवारिया , सूरजपोल , पनराडिया अन् नया दरवाजा ) .
* झांझरपुर म राजधानी बसाडी , महाल बांध्यो तब पासीन नाव पड्यो - " राजगढ़ "!
* इ.स. १९०८ म राजगढ़ रियासत का ७ परगना होता . ( नयालगंज , बियोरा , कालीपीठ , करनवास , कोटरा , सोगरगढ़ , तलेन ) .
* इ.स. १९३७ म रावत विरेंद्र सिंग को पोरग्यो रावत विक्रमादित्य सिंग राजगादी प बस्यो , तब वून की उमर १ बरस की होती . जब वूई जवान भया , तब देस आजाद भयो ‌ . वून क राज म च इ.स. १९४८ म राजगढ़ रियासत को स्वतंत्र भारत देस म विलय भयो . 
* राजगढ़ क राजगादी ला ११ बंदूक की सलामी को मान होतो . वून ला १,४०,००० रुप्या को प्रिविपर्स ( तनखो ) लागू होतो . 
* आबअ राजा रावत वरूणादित्य सिंग बहादुर परमार ( उमठ ) जी राजो स . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, March 9, 2022

निर्माण - भाग ४

निर्माण - भाग ४
Hindi language _ हिंदी भाषा

अनिश्चितता के बादल साइट पर मंडरा रहे थे . एक कदम आगे जाना और दो कदम पीछे आना , ऐसी हालत लग रही थी . फिर भी चलती का नाम गाडी ! अब हमारी एक साइट के लिए संपूर्ण प्रोजेक्ट का ' डिमार्केशन प्वॉइंट खोजो अभियान ' प्रारंभ हुआ . सभी मजदूर , स्टाफ काम मे जुट गये . निर्माण कार्य के schedule and specifications में ऐसे काम का कही भी जिकर नही होता है , लेकीन करना ही पडता है.. और ऐसे छूपे खर्च के कारण समय और धन का बहुत नुकसान होता है . और यह तो केवल झॉंकी थी ! 
प्रोजेक्ट ड्रॉइंग के अनुसार प्वॉइंट खोजे गये . और जो प्वॉइंट नदारद थे , उन्हे स्थापित किया . 
' सर , कल फॉरेस्ट ऑफिसर को साथ लेकर आइए .' मैने कार्यपालक इंजिनिअर से कहा . 
' हां , उन्हे तो लाना ही होगा . आप चिंता न करें .' कार्यपालक इंजिनिअर ने कहा . 
दुसरे दिन सुबह डिपार्टमेंट के सभी इंजिनिअर , प्रोजेक्ट मॅनेजर , फॉरेस्ट ऑफिसर और उन का स्टाफ साइट पर पहुंचे . किसी उत्सव जैसा माहौल लग रहा था . 
चाय पिते हुए इंजिनिअर फॉरेस्ट ऑफिसर को ड्रॉइंग समझा रहे थे . फॉरेस्ट ऑफिसर को ड्रॉइंग कितनी समझ में आई , यह तो यक्षप्रश्न था ‌!
थिओडोलाइट यंत्र , लेवल स्टाफ , मेजरिंग टेप , रेंजिंग रॉड , चुना , कुल्हाडी , फावडे लेकर सभी सीमा दर्शन के लिए निकल पडे जंगल मे ! दोपहर तक आधा कार्य हुआ . खानसामा ने सहायता के लिए कुछ मजदूरों को साथ लेकर सभी के लिए खाना तैयार किया था . कैम्प आ कर सभी ने भोजन किया और फिर जुट गये अपने अभियान मे ! अंधेरा छाने लगा था . अभी भी कुछ प्वॉइंट देखना और चेक करना बचा था . 
' बाकी प्वॉइंट कल चेक कर लेंगे सर ...' कार्यपालक इंजिनिअर ने फॉरेस्ट ऑफिसर से कहा . 
' ठीक है.. अभी तक तो आपकी सीमाएं ठीकठाक ही दिख रही है.. आप मुझे प्रोजेक्ट ड्रॉइंग , अलॉटमेंट लेटर , सैंक्शन लेटर की एक - एक कापी दे दिजीए..' फॉरेस्ट ऑफिसर ने कहा . 
' कल से कार्य शुरू कर सकते है ना ? ' कार्यपालक इंजिनिअर ने पूछा . 
' हां , कोई दिक्कत नही है सर ... देखिएं , हमें जांच - पडताल तो करना जरूरी है.. आप अन्यथा न ले.. ' फॉरेस्ट ऑफिसर ने कहा . 
' जी सर.. यह तो ड्युटी का हिस्सा है.. आपके सहयोग के लिए आभार ! ' कार्यपालक इंजिनिअर ने हाथ मिलाते हुए कहा . 
सभी ने राहत की सांस ली . 
चांदनी रात की दुधिया रोशनी में जंगल नहा रहा था . लेबर कैम्प के आगे चुल्हें जल रहे थे . चुल्हों की लाल - पीली लहराती रोशनी मॉं अन्नपूर्णा की आरती कर रही थी . कैम्प के मैदान मे लगे हैलोजन बल्ब के उजाले में कुछ युवक डफ बजा कर गा रहे थे छत्तीसगढी लोकगीत ! 
आज अध - रतिहा
मोर फूल बगिया मा
आज अध - रतिहा हो....
चन्दा के डोली मा
तोला संग लेगिहव
बादर के सुग्घर
चुनरिया मा रानी
आज अध - रतिहा
मोर फूल बगिया मा....
चन्दा के डोली मा
बड ड - र लागे
बड निक लागे
तोर गलबहियां मे
बड़ निक लागे
तोर गलबहियां मे
आज अध - रतिहा
मोर फूल बगिया मा
आज अध - रतिहा हो.....

( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, March 7, 2022

नान्हो - सो गाव ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

नान्हो - सो गाव 
( भोयरी कविता ) 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव 
मुखडो बदलाय कन् बाहाड्यो
फयलावत गयो आपरो पाव ।

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
दसरो - दिवारी चहल पहल
लगनसराई म मोठी धांदल
बाहिर गया पोटुबाटूना म च
ढुंढस आपरअ माती को भाव ।

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
अकाल , तकलीफ को हर साल
बिजली - पानी को बेगरो च ताल
तंगी की फुन्सी , करजा को खांडुक
हास कन् लुकावस पिक्यो घाव ।

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव

चितरंग सरखो घाडो साजरो
वोला नहाय रोवन को मावरो
सेव - पदर , फेटा - टोपी को मान
रीतिरिवाज को साजरो लगाव ।

स दूर घाटि क मंझार 
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
उपी सिमिट कन् माती की धडी
खसी आजा वानी रुवाब की गढी
ढोर - बासरू को गोहन बी सप्यो
आबअ कावरा करस काव काव । 

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
वीर मारोती , माता माय को ठानो
गाव सिवार  भोल्यानाथ को गानो
सप्तो , दही लाही , भजन - किर्तन
मन रमावन ला देव को नाव ।

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव........

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, March 5, 2022

अजब गजब - ८८ : सूर्व्य मंदिर , भाटुन्द. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ८८ : सूर्व्य मंदिर , भाटुन्द
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
आदित्य : सविता सूर्य : खग: पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ।।

राजस्थान म पाली जिला क बाली तहसील म भाटुन्द गाव स . बाली पासीन २१ कि.मी. दूर येनअ गाव की आबादी ६/७ हजार की स . भाटुन्द गाव पह्यले सिरोही रियासत म होतो . इ गाव सिरोही दरबार किथीन ३६०० बिघा जमीन दान क रूप म सिरी आदोरजी महाराज ला भेटीती . गाव को नाव धरन साठी आदोरजी महाराज न येक भाट ला बलायो . भाट न महाराज क मुंडा मिन बार बार वोकअ जात को नाव लेन क कारन , वोनअ ' भाटुन ' नाव सुझायो . बाद म भाटुन को भाटुन्द नाव पड्यो . 
भाटुन्द देवी - देवताना का मोठा मोठा देऊर स . तेकन भाटुन्द ला ' देव की नगरी ' बी कव्हस . 
भाटुन्द गाव अरावली पहाडी क पच्चीम अन् जवाई बॉंध क पूरब म स . 
भाटुन्द गाव म खेमकरण माता , सीतला माता , पोरी ढार हनुमान जी , चेतन बालाजी , लक्षुमी नारायण , भदरेस्वर महादेव , परसुराम , वाराई माता , रामदेव बाबा , आसापुरा माता , सिरी बाला हनुमान , बरमा जी , कालभयरव का परसिध्द देऊर स . सती माता की छतरी , आदोरजी महाराज की छतरी स . 
६ व सदी वरी सूर्व्य पूंजा को घाडो रिवाज होतो . इ.स. ६०० पासीन १४०० वरी सिरोही रियासत क हर गाव म सूर्व्य मंदिर होता . 
भाटुन्द म बी परसिध्द सूर्व्य मंदिर स . 
इतिहास अन् मान्यता : * ११ वी सदी म , भाटुन्द गाव म चक्रवर्ती राजा भोज देव न येक मोठो तलाव खांद कन् वोकअ काठा प परसिध्द सूर्व्य मंदिर बांध्यो . 
* कई सदी पह्यले यहान येक राकस को उबद्रो होतो . वोकअ भेव कन् गाव म येक बी बिह्या नी होत होतो . बिह्या म फेरा क बखत वू लाडा ( वर ) ला खाय डावतो . तेकन यहान क पोटी संग कोनी बी बिह्या करन साठी राजी नी होत होता . इ हाल देख कन् पंडित लोगना न सीतला माय की घोर तपस्या करी . सीतला माय परसन्न भयी . माय न कह्ये क , तुमी बिह्या की तयारी करो , मु तुमाला बाचाडून . फेरा क बखत जसो राकस आयो , उसो च सीतला माय न तिरसूल कन् वको वध कऱ्यो . मरन क बेरा राकस न कह्ये , माय म्हरी खान - पेन की इच्छा स . सीतला माय न राकस ला वरदान देयो क , साल म दुय डाव तोला अन - पानी भेटेन . तेकन हर साल चयीत मह्यना क उजरी ( चांदनी ) सपतमी ( सीतला सपतमी ) अन् जेठ पुनव ला यहान सीतला माय को मोठो मेलो भरस . सीतला माय क आघअ येक फिट गहऱ्यो दगडी उखर ( ऊखली ) स . पुरो गाव वोमअ घडा कन् पानी डावस , पर वू भरत नी . येतरो पानी कहान जास , यको पत्तो नहाय ! इ पुरो पानी राकस पेस , असी मान्यता स . आबअ वरी वोमअ ५० लाख लिटर परस जास्त पानी डावना म आयेस . 
* १३ वी सदी म अलाउद्दीन खिलजी को कहर बरप्यो . चित्तोडगढ जितन क बास्त वोनअ जालौर रियासत पर हमलो कऱ्यो . जालौर जान क बेरा अलाउद्दीन खिलजी भाटुन्द गाव परीन च गयो . तब आपरो धरम बाचाडन साठी आदोरजी महाराज न १८ परिवार सहित लाखा जौहर कऱ्यो . या घटना रानी पद्मिनी क जौहर क बास्त ६ मह्यना बाद की स . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर