Thursday, December 31, 2020

क्यालेंडर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

क्यालेंडर

Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

झुंझुरका च जाग आयी...
अंधारा क पाठ पर मध्दम मध्दम लाल बयंगनी उजिड बह्य रह्यतो...
कारो निरो अगास साफ होतो .
बाहाडत गये लाल सेंदरी उजारो...
ठंडी ठंडी हवा सूटीती .... सी बी लागत होती .
आब चांगलो च दिन फाकेतो..
अगास म बगरा की तिरकोनी रांग जाय रहीती सूर्व्या कितऽ..
सिट्टी बाजवत बाजवत राघू को झुंड बी झरकन् उड्यो .
आंगना म पिवरऽ सोना को उजिड अन् लाल पिवरी आगटी..
वोक भवताल चादर घोंगडा वोढकन् सेक रह्याता दूय चार झना..
कोनी क हात म दातून त कोनी बिडी पे रह्याता ... बगल म च खाली टम्बरेल बी...
गतसाल की बातचीत आगटी क धुपट संग वरतऽ वरतऽ जाय रह्यीती .
फड फड ऽऽ फड फड ऽऽ फड फड ऽऽ..
पुरानऽ क्यालेंडर का पानना फडफड्या..
क्यालेंडर क खलतऽ का मुड्या दूय कोन .... कयी थोडाबूत फाट्या पान..
तारीख क डब्बा म लाल निरा निस्यानना आन् कोनटा कानटा म बारीक बारीक लिखान.. 
कहान कहान लेनदेन का  नाना मोठा आकडा..
दूरीन तारीख का आकडा त दिसस पर बाकी सबन गिचमिड गिचमिड..
क्यालेंडर ला काढे आन् डिसेंबर को पानो पलटाये...
राजा भोज को झलारतो फटु आघ आये..
पान पर को धुड्डो झाडे आन् वोला खाट प धरे..
रब्बड म गुंडारकन धरेतो ती नवो क्यालेंडर काढे आन् खिरा म हिलगाये..
राजा भोज को नवो कोरो रूप...काठा कोनटा येकदम नवा ! 
हलको हलको कागद को सुगंध...
येकटक देख्यो... दूय आसू डोरामिन गाल प बह्या...
गतसाल को दुख दरद बह्य गयो वोमऽ ...
आपरंग च दूय हात जुड्या नमस्कार साठी..
साफ भया डोरा आन् डोकसा म 
आब नवी उम्मीद.... नवऽ साल की !

रचना : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Sunday, December 27, 2020

अजब गजब - ४६ : द ग्रेट वाॅल आफ इंडिया. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ४६ : द ग्रेट वाॅल आफ इंडिया
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

टायटल बाचकन नवल वाटे होयेन .... ' द ग्रेट वाॅल आफ चायना ' त मालूम स , पन ' द ग्रेट वाॅल आफ इंडिया ' या कोनती भानगड होयेन बटऽ ??? 
' द ग्रेट वाॅल आफ चायना ' को बांधकाम चीन क पह्यलऽ समराट किन सी हुआंग न इसापूर्व ( इसापूर्व २२० - २०६ ) म चालू करेतो , असी मान्यता स . पर वको बांधकाम इसापूर्व ७ व सदी पासिन चालू होतो , असी बी मान्यता स . मिंग राजघराना न ( इ.स. १३६८ - १६४४ ) वोला अनखिन बांधकन बाहाडायी . ' द ग्रेट वाॅल आफ चायना ' की लंबाई २१,१९६ कि.मी. स . 
दुनिया की दुसरी मोठी दिवाल आपलऽ देस म स , ' द ग्रेट वाॅल आफ इंडिया ' ! आन् या दिवाल परमार कार की स !
राजा भोज की नगरी भोपाल पासिन २०० कि.मी. दूर रायसेन जिला क उदयपुरा जवर क गोरखपुर पासिन या दिवाल सुरू होस आन् भोपाल पासिन १०० कि.मी. दूर बरेली ( चवकीगढ किला ) पावतर जास . विंध्याचल क जंगल सिन चवकीगढ पावतर लंबी या दिवाल ८० कि.मी. स . या ' द ग्रेट वाॅल आफ इंडिया ' १५/१८ फिट उच्ची आन १०/१५ फिट चवडी स . कहान कहान येकी चवडाई २४ फिट बी भरस . डॉ. नारायन व्यास जी न येकी खोजबिन करीस . 
दिवाल क काठ काठ कन लय देऊर होता , जे का खंडारा आब बी दिसस . दिवाल क काठ कन तलाव बी स . वोन बेरा च तलाव क काठ कन पक्का घाट बी बांध्याता , जी आब बी दिसस . मंझार मंझार म पाह्यरेदारी साठी चवकी बी बांधीती . 
या दिवाल लाल बलुआ पत्थर कन बांधीस . पर येन बांधकाम म सिमिट चुना सरखो कोनतो बी मसालो नी बापऱ्यो . येकमेक म फसेन असा दगडना घडायकन वून ला ' इंटरलॉकिंग ' तकनिक कन रच्यास . कयी जागा पर लोहा की ' डॉवेल्स ' ( चपटी पट्टी , ज्या दुय पत्थर म सेदरा करकन् वोम फसावस ) बी स . 
१. इतिहास : रायसेन क आघ का गोरखपुर , नरसिंगपुर , जबलपुर वोन बेरा कलचुरी राज म होता . कलचुरी राज पासिन बचाव साठी आन् वून पर नजर ठेवन साठी १०/११ वी सदी म या दिवाल परमार राजा न बांधीती . 
२. हालत : * जंगल , पहाड म बनी येन दिवाल को कोनी मायबाप नहाय . परमार राज को इ अनोखो वयभव लावारीस पडेस . देऊरना की हजारों मूरतीना चोरी भयी , आन् आब बी चोरी चालू च स  . १००० बरस पुरानी या दिवाल खसखुस भयीस . वोक पत्थर की बी चोरी भय रहीस . 
* दुनिया की दुसरी सबसिन मोठी दिवाल को ना आपन ला कोनतो लेनो देनो नहाय ना सरकार ला .....
ना वोकी देखरेख स ना जतन...
* येतरी अजब गजब ' द ग्रेट वाॅल आफ इंडिया ' येक नामी पर्यटन ठिकान होय सकस ... पुरखाना की येतरी साजरी निस्यानी खतम होन क रस्ता प स . मोघा डैम क जवर येन दिवाल को साजरो हिस्सो बाचेस .... बाकी जागा पर बी दिवाल को जोतो साबूत स . थोडीबूत मूरतीना बी बाचीस , पर केतरा दिन बाचेन येको भरोसो नहाय ....
( असीच येक मोठी दिवाल राजस्थान क राजसमन्द जिला म कुंभलगढ ला बी स .)

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Saturday, December 26, 2020

बोली , भास्या आन् आमी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

बोली , भास्या आन् आमी 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

स्यबद इ गतकाल आन् आब क ( वर्तमान ) लोकमानस क अमूर्त बिचार अन् भावना को मूर्त रूप . इलाखो , देस ,काल ( बेरा ) बदल को असर बिचार अन् बोलचाल , कथन प बी भया कन स्यबद बी येमिन सुटत नी . लागे उसऽ बदल क अनुसार नवा ध्वनीचिन्ह , स्यबद पयदा होस . काही दुसरऽ भास्या , बोली , समुह का स्यबदना बी बेमालूमपना कन जसा का उसा नी त नवऽ रूप म मिसरस . पुराना स्यबद गायब होस नी त् बदलकन नवऽ रूप म आवस . या घडामोड हरदम चालू रव्हस . कोनी येक बोली , भास्या म बदल होन साठी राजकारन की उठापटक , सामाजिक बदलाव , बेपार , स्थलांतर ,  नवाडऽ लोगना सी आवनी वालो संबंध , तंतरग्यान म बदलाव , पेटपानी क साधन म हेरफेर , नवा बिचार असा लय कारन रव्हस . तेकन च हर भास्या आन् वका स्यबदना बदलत जास . 
स्यबद बिना आपन मुका , कुंठित अन् अनपढ बन जाऊन . स्यबद क सहारा कन च दुनिया का सारा येव्हार ( व्यवहार ) होस . 
' आम्हां घरी धन , शब्दांचीच रत्ने....' यी संत तुकाराम महाराज को बोल केतरो समर्पक ! इ स्यबद को धन कोनी येक को च नी रवत , त वू वोला बोलनी वालऽ समाज / समूह को रवस . तसोच येनऽ ' धन ' ला बाहाडवन ला अन् नास करन ला बी समूह च जबाबदार रव्हस . मानूस क डोक्सा म को बिचार , बिकार , कल्पना , भावना या स्यबद कन च कवता आवस . दुनिया म अजपावतर जेतरा बी काम भयास , वूई सबन बोल्या / लिख्या स्यबदना को च नतिजो ! 
जेनऽ भास्या म स्यबद संख्या जेतरऽ परमान म होयेन ; वोकऽ परिन वोनऽ भास्या की ' रईसी ' मोजता आवस . इंगरजी म पाच लाख स्यबदना स आन् मराठी म पावून लाख ...
भास्या / बोली की उन्नती करन साठी आपलो दायरो मोठो कऱ्या पायजे . राजकारन कन भेटस वा सत्ता , समाज सुधारना , धंदो पानी - बेपार , मोठी सरकारी नवकरी , हर कला म आघ जात रहया पायजे . आपलो सत् जप कन् बोली ला येव्हार म बापऱ्या पायजेन . बोली , भास्या म की कमी ( कमतरता ) ढुंढ कन् , वरख कन् वोला दूर करन साठी सोपी - सुलभ तोड ढुंढ कन स्यबदसाठो हरदम बाहाडाया पायजे . बोली , भास्या साठी आवन वाली पिढी म रुची , निस्ठा पयदा होन साठी बी आरपार क मह्यनत की गरज स . 
संस्कृत , ग्रीक , ल्याटिन भास्या क जमाना मऽ इंगरजी मुठभर लोगना की बोली होती . वून लोगना न दुनिया पर राज करे आन आपलऽ भास्या ला ग्यानभास्या बनायकन पुरी दुनिया म फयलायी . वून लोगना न तंतर ग्यान नवी नवी खोज करी , बाहाड करी , वोला बापऱ्यो ... आन् आपरंग च स्यबदना बनत गया.. बाहाडत गया . आपलो दायरो दुनिया म बाहाडाय कन नवाडऽ लोगना क संपर्क म आया ... स्यबद बनत गया... बाहाडत गया ! 
असोच उधारन डोरा क आघऽ अन् डोकसा मंझार धरेन त कोनतऽ बी बोली , भास्या क उन्नती ला बखत नी लागेन !!!!!

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Thursday, December 24, 2020

अजब गजब - ४२ अ : हनुमान मंदिर , राजना. Hindi language _ हिंदी भाषा

अजब गजब - ४२ अ : हनुमान मंदिर , राजना
Hindi language _ हिंदी भाषा

मध्यप्रदेश में छिंदवाडा जिला के पांढुर्णा तहसील में राजना ग्राम है . अभी आप पुछोंगे की , कौनसा राजना ?? राजना , राजना पावर हाऊस , राजना जोड , राजना हेटी , राजना फैक्टरी की राजना टप्पर ????....
रुको..रुको.. थोडी सी साॅंस लो.. थोडा सा धीरज रखो....
भोयर समाज का ' राजना ' ऐसा इकलौता गाव है , जिस के अगल बगल राजना नाव के ही पाॅंच गाव है . 
राजना गाव की यह अजब गजब कहानी यही समाप्त नही होती !
अखिल भारतीय भोयर पवार महासंघ के अध्यक्ष डॉ. नामदेवराव दयारामजी राऊत इन का यह राजना गाव . मुल राजना गाव मे कई
पीढींयों से राऊत बाडा है . और इसी राऊत बाडे मे ११२ साल पुराना प्रसिद्ध हनुमान मंदिर है . नये धार्मिक और सामाजिक रितीरिवाज गढता प्रसिद्ध श्रध्दास्थान ! 
१. इतिहास : * राजना गाव मे बृहत राऊत बाडा है . यह कहानी प्रारंभ होती है आपाजी राऊत इन से . आपाजी राऊत यह डॉ . नामदेवराव राऊत जी के दादाजी . रामभक्त आपाजी सरल , धार्मिक और मिलनसार व्यक्तित्व  . उन्होंने हमेशा न्यायोचित , समयोचित और हितकारक ही मार्गदर्शन किया . खेतों में लहलहाती सुवर्ण फसल और बाडे मे मथुरा वृंदावन ! सुखी संपन्न परिवार ...
एक दिन वे खेत में टहल रहे थे.. मुख मे रामनाम और खयालों में सद्विचार .. खेत में टहलते समय अचानक ही उन्हे आत्मबोध / साक्षात्कार हुआ ... प्रभू राम की लिला.. अंजनीपुत्र की अद्भूत सेवा.. निराकार को आकार में पिरौती तिव्र प्रकाश शलाका ! आपाजी नतमस्तक हो गये उस दिव्य ज्योती के आगे ... बाडे मे हनुमान जी की प्राणप्रतिष्ठा करने का संकल्प लिए , उसी धुन मे खेत से घर आये . यह बात उन्होंने परिवार मे बतायी . सभी का विचार विमर्श लिया . बाडे मे खुशी की लहर आयी . 
आपाजी ने शुभमुहूर्त देख कर हनुमान  मंदिर की नींव रखी . 
* मंदिर के लिये खरफ ( वालुकाश्म ) आये . उन को घडाने का काम जोरशोर से प्रारंभ हुआ . इसी खरफ पथ्थर में हनुमान जी की मूर्तीयां तराशी गयी . एक दास हनुमान और एक वीर हनुमान की सुघड और सुंदर मूर्ती बनी . बाकी मूर्तीयां काले पथ्थर में तराशी गयी . मंदिर पुरनमासी के पूर्णचंद्र की तरह बन कर पूरा हुआ . मंदिर की उत्तरी दिवार पर दक्षिणमुखी हनुमान जी और रिध्दि सिध्दि जी विराजे . पश्चिम की दिवार पर श्रीगणेश जी , अन्नपूर्णा देवी , शेषनाग की स्थापना हुई . पूर्वी दिवार पर शिवलिंग और नंदी विराजे . मंदिर की पूर्वी बाहरी दिवार पर दिनकर सूर्व्यदेव स्थानापन्न हुए . 
२. उत्सव : * आपाजी के बेटे दयाराम जी . दयाराम जी के कार्यकाल में उन के मंझले बेटे गणपतराव जी गाव की भजन मंडली को साथ ले कर हर सोमवार और एकादशी को मंदिर मे भजन किया करते थे . कोजागिरी पुर्णिमा से कार्तिक पुर्णिमा तक गाव की दिंडीयां भोर मे हनुमान मंदिर आती थी और काकडारती करते थे . 
* इ.स. १९६० से इ.स. १९८५ तक राऊत बाडे के इस अनोखे हनुमान मंदिर मे संत श्री गुलाबबाबा महाराज जी का प्रतिवर्ष कार्तिक पुर्णिमा को किर्तन होता था . राऊत बाडा के हनुमान मंदिर ने राजना गाव में कई धार्मिक और सामाजिक परंपराओं को जन्म दिया . संत श्री गुलाबबाबा महाराज जी का प्रसिद्ध किर्तन श्रवण करने के लिये आस पास के गांवों से हजारों का जनसमुदाय उपस्थित रहता था . आपाजी राऊत ने लगाए इस धार्मिक और श्रध्दा के पौधे का अब विशाल वटवृक्ष हुआ था . राऊत बाडा स्थित हनुमान मंदिर पुरे क्षेत्र का श्रध्दास्थान है . दिपावली त्यौहार के लिये गाव में आने वाली बहू - बेटीयों का अब कार्तिक पुर्णिमा को आने की नयी परंपरा स्थापित हुई है .
* राऊत बाडा के हनुमान मंदिर मे प्रतिवर्ष दो बृहत धार्मिक आयोजन होते है . एक आयोजन कार्तिक पुर्णिमा को होता है . पुर्णिमा की पूर्व संध्या पर तुलसी विवाह संपन्न होता है और रात्रौ भजन मंडली द्वारा भजन आयोजित होता है . मध्यरात्री त्रिपुर जलाते है . दुसरे दिन सुबह से मंदिर मे भजन कीर्तन प्रारंभ होता है .दोपहर तक गाव की दिडीयां और भजन मंडली मंदिर मे इकठ्ठा होती है . दोपहर में  ' गोपाल काला गोड झाला ....' इस भजन को गाते हुये ' दही लाही ' का कार्यक्रम संपन्न होता है . 
दुसरा बडा धार्मिक आयोजन हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर होता है . इस अवसर पर मंदिर का रंगरोगन कर के उसे सुशोभित किया जाता है . हनुमान जयंती के पूर्वसंध्या को भजन मंडली द्वारा हनुमान जी पर आधारित भजन गाये जाते है . हनुमान जयंती के दिन सबेरे यज्ञ , हवन पूजन पश्चात दिंडी तथा भजन मंडली में आये भक्त जनों का पदप्रक्षालन कर राऊत परिवार स्वागत करता है . भजन पूजन , कीर्तन आरती पश्चात दही लाही का कार्यक्रम संपन्न होता है . अभी दही लाही पश्चात महाप्रसाद का आयोजन राजेश राऊत जी द्वारा किया जाता है . महाप्रसाद  शाम तक पंगत में बैठकर सेवन किया जाता है और बाद मे हनुमान जयंती कार्यक्रम का समापन होता है .
३. जिर्णोध्दार : * ११२ साल पुराने इस हनुमान मंदिर के पास पिपल के पेड उग आये थे . मंदिर भी जीर्ण हुआ था . आपाजी राऊत की चौथी पिढी के राजेश राऊत जी ने मंदिर के जिर्णोध्दार का काम करने का संकल्प किया . मंदिर सुधार का कार्य हुआ . नये से रंगरोगन हुआ . चबुतरा , मंदिर का जिर्णोध्दार इतनी बखुबी से किया है की यह विश्वास करना मुश्कील हो जाता है की यह मंदिर ११२ वर्ष पुराना है !
३० नवंबर २०२० को यहां संपूर्ण राऊत परिवार उपस्थित हुआ . होम हवन कर के यह अनोखा मंदिर पूर्ववत दर्शन और अर्चना के लिये खुला हुआ . 
# हमारे पूर्वजों ने ऐसी महान संस्कृति बनायी... वृंध्दिगत की ! अब यह संस्कृति , यह परंपरा , यह वैभव संजोकर रखना और रितीरिवाजों को निभाने की जिम्मेदारी हमारी है ...

( स्रोत एवं सहयोग : डॉ. नामदेवराव राऊत )
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर



 

Wednesday, December 23, 2020

अजब गजब - ४५ अ : मन्नाथेश्वर मंदिर , घोगरा. Marathi language _ मराठी भाषा

अजब गजब - ४५ : मन्नाथेश्वर मंदिर , घोगरा
Marathi language _ मराठी भाषा 

महाराष्ट्रामध्ये नागपूर जिल्ह्यातील नरखेड तहसील मध्ये कारंजा - भारसिंगी रोडवर सावंगा गावापुढे घोगरा हे गाव आहे . घोगरा गावापासून डाव्या बाजूला १.५ कि.मी. अंतरावर प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र मन्नाथगड आहे . 
मी आणि मनोज भाऊ गोरे प्राचिन मन्नाथेश्वर तीर्थक्षेत्र दर्शनासाठी नागपूरहून निघालो . लोहारी सावंगा वरून विक्की बन्नगरे ही सोबत आले . योगायोगाने त्याच दिवशी ' मन्नाथेश्वर मंदिर उत्सव कमिटी ' ची मन्नाथगडला सभा होती . सभेमध्ये कमेटी अध्यक्ष सुधाकर भाऊ घागरे , सचिव रामनाथ गोरे , वसंतराव चापले , डॉ संजय ढोकणे , सुरेश पठाडे , नरेश मानमोडे , डॉ प्रमोद गोरे , पंकज खवशी , उत्तमराव पेठे , सुरेश कुमेरीया , पुंजाराम मुरोडीया असे वीसेक जण होते . सभेमध्ये सर्वांचा परिचय करून देण्यात आला . माझा येथे येण्याचा उद्देश सांगितला गेला . मी लिहिलेले " भोयरी मराठी शब्दकोश आणि भाषा विज्ञान " हे पुस्तक कमेटीला सप्रेम भेट दिले . सर्वांशी ओळख झाली . कमेटीने मन्नाथेश्वर ची महिमा आणि माहिती सांगितली . 
घोगरा गावावरून मन्नाथगड ला जाण्यासाठी वळण व घाटाची डांबरी सडक आहे . मन्नाथगड ही परिसरातील सर्वात उंच जागा ! तेथून पंधरा गावांचे शिवार दिसते . मन्नाथगडला तीर्थक्षेत्राचा शासकीय दर्जा मिळाला आहे . मन्नाथेश्वर मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्व्हेक्षण विभागाच्या अखत्यारित येतो . त्यांनी माहिती फलक लाऊन आपली जबाबदारी पूर्ण केली आहे ! 
हे तीर्थक्षेत्र रामायण काळापासून प्रसिद्ध आहे . येथील मन्नाथेश्वर शंकराचे हेमाडपंथी देऊळ तर अप्रतिम ! 

१ . इतिहास आणि मान्यता : * हिंदू धर्मातील हठयोगावर आधारित नाथ संप्रदाय भगवान भोलेनाथ ला सर्वस्व मानणारा पंथ ! हजारो वर्षांपासून भारतातच नव्हे तर मक्का मदिना , अफगाणिस्तान , पाकिस्तान , श्रीलंका , नेपाळ , तिबेट , बांगलादेश , ब्रह्मदेश , थायलंड , व्हियतनाम , कंबोडिया पर्यंत भगवान महादेवाचा डंका नाथपंथाने वाजविला आणि भगवान शिवाच्या उपासनेला आणि परंपरेला खऱ्या अर्थाने पुढे नेले . आदिनाथ भगवान शंकरजी नाथपंथाचे प्रथम गुरू . नवनाथाच्या परंपरेत ८४ महासिध्द गुरू झाले . गुरू मत्सेंद्रनाथ यांना नाथ संप्रदायाचे संस्थापक मानतात . त्यांची समाधी उज्जैन येथील गढकालिका माता मंदिर आणि भर्तुहरी गुफेजवळ आहे . गुरू गोरक्षनाथ यांनी नाथ संप्रदायाची व्यवस्थित घडी बसवून जगभर प्रचार आणि प्रसार केला . गुरू मत्सेंद्रनाथ ह्यांनाच मछिंदरनाथ , मच्छिंद्रनाथ , मचिंद्रनाथ आणि ' मीननाथ ' ह्या नावांनी सुध्दा ओळखले जाते . गुरू मत्सेंद्रनाथांनी येथे तपश्चर्या केली होती . त्यांच्या नावावरूनच ह्या गडाला ' मन्नाथगड ' आणि येथील भगवान शिवशंकराला ' मन्नाथेश्वर ' असे नाव पडले , असे म्हणतात . 
* मन्नाथेश्वर मंदिराच्या उजव्या बाजूला एक नवीन देऊळ दिसते . ह्याची पण कथा अजब गजबच आहे . हे देऊळ रामदास महाराजांच्या कारकीर्दीत बांधले आहे . ह्या देवळात त्रिकोणी आकाराची शिळा आहे , हीच मन्नाथबाबा ( गुरू मत्सेंद्रनाथ ) यांची मूर्ती ! हे देऊळ बांधण्याआधी येथे घोगलीचे झाड होते आणि त्याखालीच ही मन्नाथबाबांची मूर्ती होती . मन्नाथबाबा नवसाला पावतात , असी श्रद्धा आहे . तेव्हा संततीप्राप्तीसाठी लोकं घोगलीच्या झाडाला लाल कपड्याची चिंधी / ध्वजा बांधून नवस करायचे / बोलायचे . 
* येथील ज्येष्ठ मंडळी सांगतात की , आधी मन्नाथबाबा त्रिकोणी आकारातच होते . आता त्या मूर्तीला नाक , कान , डोळे , तोंड असे अवयव दिसू लागले आहेत ... मन्नाथबाबाची महिमा अगाध आहे . 
* प्रभू श्रीराम , सीता माता आणि लक्ष्मण जी वनवासात असताना त्र्यंबकेश्वर नाशिक येथून मोझरीच्या दासटेकडी वर आले होते . तेथून ते मन्नाथगडला आले आणि येथे काही काळ वास्तव्य केले . नंतर मन्नाथगडहून रामटेककडे प्रस्थान केले , अशी मान्यता आहे . 
मन्नाथगडाच्या पायथ्याला आता पण ' सीता न्हाणी ' आहे . काळ्या कातळांनी बांधलेला हा कुंड येथील एक  तीर्थक्षेत्र आहे . प्रभू रामचंद्र , सीता माता आणि लक्ष्मणाच्या पदस्पर्शाने मन्नाथगड क्षेत्र पावन झाले आहे . 
प्रभू रामचंद्रांनीच मन्नाथगड येथे शिवशंकराची स्थापना करून पूजा अर्चना केली , अशी श्रद्धा आहे . 

* मन्नाथेश्वर मंदिराच्या परिसरात आताही एक घोगलीचे झाड आहे . मन्नाथगडच्या पायथ्याशी असलेल्या गावाचे नाव ही घोगरा आहे . पूर्वी ह्या परिसरात घोगलीची खूप झाडे होती , म्हणून गावाचे नाव घोगरा पडले , असी ही एक दंतकथा आहे .
* आपल्या देशात गुप्त राजांच्या काळापासून ( इ.स. ३२० - ५५० ) मंदिरांचे बांधकाम व्हायला लागले . 
* देवगिरीच्या यादव राजांच्या काळात इ.स. १३५९ पासून इ.स. १२७४ पर्यंत हेमाद्री उर्फ हेमाडपंत हे या राज्याचे पंतप्रधान होते . यादव राजा महादेव ( इ.स. १२६२ - १२७० ) आणि राजा रामदेव राव ( इ.स. १२७१ - १३११ ) ह्यांच्या कारगिर्दीत हेमाडपंतांनी शिवशंकराची खूप मंदिरे बांधली . त्यांच्या आधी पण इ.स. ११०० - १२५० ह्या कालखंडात अशीच मंदिरे बांधली गेली . ह्या कालखंडातील देवळाच्या बांधकामात जास्त नक्षीकाम असायचे . यादवकाळात नक्षीकाम कमी झाले परंतु देवळांची संख्या खूप वाढली . आणि ही वास्तु परंपरा मराठा राजवटीत इ.स. १८०० पर्यंत राहाली . 
* हेमाडपंथी मंदिराची वास्तुकला माळव्यातील भूमीज मंदिर कला ( राजा भोज - समरांगण सूत्रधार ) आणि नागर ( इंडो आर्यन ) मंदिर शैलीच्या मिश्रणातून विकसित झाली . हेमाडपंथी मंदिर बांधणीचे आपले एक वैशिष्ट्य आहे . ह्यामध्ये काळ्या पाषाणी किंवा वालुकाश्म दगडांचा वापर केला जातो . शिलाखंडांच्या बांधकामात चुना ,  गारा किंवा सिमेंट सदृश्य  मसाला ह्यांचा वापर नसतो . हे बांधकाम कोरडे असते . बांधकामाच्या गरजेनुसार चौकोनी , त्रिकोणी , लांब , आखुड असे दगड घडविले जातात . शिलाखंडाच्या पकडीसाठी दगडातच खोबण , खाच , खुंटी बनवितात . स्तंभ एकाच शिलाखंडात घडवितात . स्तंभ चौकोनी , षट्कोनी , अष्टकोनी असतात . मधल्या पट्ट्यात निरनिराळ्या मूर्ती , वेल फुलांची नक्षी , भौमितिक आकृत्या असतात . छताच्या कोपऱ्यापासून शिळाखंड रचून अगदी मध्यभागी कमळाच्या फुलाची किंवा झुंबराची नक्षी असलेला चौकोनी शिलाखंड ठेवतात . दरवाज्यावर गणेशपट्टी आणि तोरणाची नक्षी कोरलेली असते . अंतराळाजवळ नंदी मूर्ती असते . हेमाडपंथी मंदिर बांधणीत प्रवेशमंडप , सभामंडप , अंतराळ व गर्भगृह अशी रचना असते . मंदिराच्या बाहेरच्या बाजूला पायव्यापासूनच कणीची नक्षी असते जी सरळ आमलकापर्यंत जाते . शिखराच्या छोट्या छोट्या प्रतिकृती खालपासून कळसापर्यंत जातात आणि ह्या शिखरांपासूनच वरती निमुळते होत जाणारे मुख्य शिखर बनते . आमलकावर कळस असतो . 

२. मंदिर रचना : * मन्नाथेश्वर मंदिराचा सभामंडप १६ स्तंभी असून लांबी सुमारे २५ फुट , अंतराळ ८ फुट आणि सभामंडपाच्या पातळीपासून ३ फुट खाली १० x १० फुटाचा गाभारा आहे . मन्नाथेश्वर मंदिर पूर्वाभिमुख आहे . 
* गर्भगृहात सयोनिज शिवलिंग असून वेदीचा आकार चौकोनी आहे . वेदीचे मुख उत्तर दिशेला आहे . शिवलिंगाची पूजा दक्षिणेकडे बसून व उत्तर दिशेला तोंड करून केली पाहिजे , अशी मान्यता आहे . 
* मंदिराच्या भिंतींना बाहेरून पायथ्यापासून त्रिकोणी आकाराच्या भिंती बांधून आधार दिलेला आहे . हा आधार मंदिर बांधल्यानंतर बऱ्याच वर्षांनी दिलेला असावा . मंदिराचे शिखर बनलेच नाही किंवा कालौघात पडझड झाली असावी . सांप्रत गर्भगृह व अंतराळावर आधुनिक बांधकामांचे शिखर आहे . 

३. पूजा अर्चना व उत्सव : * राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज यांचे मन्नाथगडावर कार्यक्रम झालेले आहे . त्यांचे छोटेखानी देऊळ पण येथे आहे . राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराजांच्या जयंती व पुण्यतिथी निमित्त येथे आताही दरवर्षी कार्यक्रम होतात . 
* आधी येथे पकडगिरी महाराज सेवा करायचे . नंतर आपले जिवितकार्य संपेपर्यंत रामदास महाराज यांनी सेवा केली . रामदास महाराज लहाणपणापासूनच बुलढाण्याकडून येथे आले होते . त्यांनी ऋषीदरा येथे ११ वर्षे तपश्चर्या केली होती . येथील नवीन देऊळ व बाकी बांधकाम , विकास त्यांच्याच कारकीर्दीत झाले . येथेच त्यांची समाधी आहे . 
* प्रत्येक सोमवारी मन्नाथेश्वर शिवशंभूची मोठ्या श्रद्धेने आरती व पूजा अर्चना होते . 
* महाशिवरात्रीला मन्नाथगडावर परिसरातील सर्वात मोठी यात्रा भरते . 
* मन्नाथेश्वर मंदिर आणि उत्सव कमेटीच्या नियोजनाने येथे वर्षभर कार्यक्रम होत असतात .
* नवसाला पावणारा मन्नाथेश्वर शिवशंकर आणि मन्नाथबाबा ह्यांची मोठी महिमा आहे . 
* रामायण काळातील हे प्राचिन तीर्थक्षेत्र देशभरात विख्यात आहे . 
जय मन्नाथेश्वर शिवशंकर...
जय मन्नाथबाबा की...

( सहयोग : मनोज भाऊ गोरे , वसंतराव चापले )
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, December 21, 2020

हे राजा भोज. ( कविता ). Hindi language _ हिंदी भाषा

हे राजा भोज
Hindi language _ हिंदी भाषा

हे राजा भोज कुल शिरोमणी
हम पूजते बारं बार है ।धृ।

धधक धधक धगगती
वह दहकती अंगार है
धडक धडक धडकते
वह दिल की पुकार है ।१।

डम डम डम डमरू से
आकाश गुॅंजता ओंकार है
पावन तू मनभावन तू
करता सपने साकार है ।२।

घुमड घुमड बादलों में
बिजली का रूप साकार है
अन्याय पर ही जो बरसे
ऐसा न्याय का तू वार है ।३।

दुश्मनों को मार मार भगाये
ऐसी तिलिस्मी तलवार है
चले कलम सरस्वती की
महाज्ञानी अपरम्पार है ।४।

गरजते सागर से लडे
वो साहस की पतवार है
राह आपने जो दिखलाई
हमें उसी पे एतबार है ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, December 18, 2020

अजब गजब - ४५ : मन्नाथेश्वर मंदिर , घोग्रा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ४५ : मन्नाथेश्वर मंदिर , घोग्रा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

महाराष्ट्र म नागपूर जिला क नरखेड तहसील म कारंजा - भारसिंगी सडक प लोहारी सावंगा क आघ घोगरा गाव स . घोगरा गाव क डाखऽ हात प मन्नाथगड स . 
मु आन मनोज भाऊ गोरे पुरातन मन्नाथेस्वर क दरस्यन साठी नागपूर परिन निकऱ्या . लोहारी सावंगा परिन विक्की बन्नगरे बी संग आयो . अन्यासकरनी वोन दिन च ' मन्नाथेश्वर मंदिर उत्सव कमिटी ' की मन्नाथगड प मिटिंग होती . मिटिंग म कमेटी अध्यक्ष सुधाकर भाऊ घागरे , सचिव रामनाथ गोरे , वसंतराव चापले , डॉ . संजय ढोकणे , सुरेश पठाडे , नरेश मानमोडे , डॉ . प्रमोद गोरे , पंकज खवशी , उत्तमराव पेठे , सुरेश कुमेरीया , पुंजाराम मुरोडीया असा बीस तीस लोगना होता . मिटिंग म मला सबन न परिचय सागे . मु न कमेटी ला म्हरी लिखी पुस्तक , ' भोयरी मराठी शब्दकोश आणि भाषा विज्ञान ' इ सप्रेम भेट देयी . सबन सिन वोरख भयी . कमेटी न मन्नाथेस्वर सिव जी की महिमा सांगी . 
घोगरा परिन मन्नाथगड पर जान साठी आडीमोडी की आन् चढाई की डांबर सडक स . वोनऽ सिवार की मन्नाथगड या सबसिन उच्ची जागा ! वासिन पंधरा गाव को सिवार दिसस . चारी कितऽ भोयर समाज का गावना . मन्नाथगड ला तिर्थक्षेत्र को सरकारी दर्जो बी भेटेस . मन्नाथेश्वर मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग क हात खलतऽ आवस . वून न बोर्ड लगायकन आपली जिम्मेदारी पुरी करीस ! इ तिर्थक्षेत्र रामायण काल पासिन को स . आन् मन्नाथेस्वर सिव जी को हेमाडपंथी देऊर त दिठ लागन जोगतो ! 

१. इतिहास आन् मान्यता : * हठयोग प आधारित नाथ संप्रदाय , हिंदू धरम को भगवान भोलेनाथ ला माननी वालो पंथ . हजारों बरस पासिन भारत च नी त् मक्का मदिना , अफगाणिस्तान , पाकिस्तान , सिरी लंका , नेपाल , तिब्बत , बंगला देस , बरमा , सयाम , व्हियटनाम , कंबोडिया पावतर भगवान भोलेनाथ को डंको नाथ पंथ न बजाये आन् भगवान भोलेनाथ क परंपरा ला खरऽ रूप कन् आघऽ बढाये  . आदिनाथ भोलेनाथ नाथ पंथ का पह्यला गुरू . नव नाथ की गुरू परंपरा म ८४ महासिध्द गुरू भया . गुरू मछिंदरनाथ ला नाथ संप्रदाय का संस्थापक मानस . वून की समाधी उज्जैन म गढकालिका माय क देऊर आन् भरतरी गुफा जवर स . मछिंदरनाथ ला च मत्सेंद्रनाथ , मचिंद्रनाथ , मच्छिंद्रनाथ आन्  " मीननाथ " कोस . वून न यहान जप तप करेतो . वून क नाव परिन च येनऽ गड ला मन्नाथगड आन् यहान क सिव जी ला ' मन्नाथेश्वर सिव जी ' कोस , असी मान्यता स . 
* मन्नाथेस्वर देऊर क जेवनऽ हात प येक नवो देऊर दिसस . येनऽ देऊर की बी कथा अजब गजब च स . इ देऊर यहान क रामदास महाराज क हात पर बांधे . येनऽ देऊर म मन्नाथबाबा की तिरकोनी आकार की मूरती स . देऊर बांधन क पह्यले यहान घोगली को झाड होतो आन् वोक खलत च मन्नाथबाबा होतो . मन्नाथबाबा नवस / मन्नत ला पावस , असी मान्यता स . तब लोगना पोटुबाटु भया पायजेन , तेक साठी घोगल क झाड ला लाल कपडो बांधकन नवस बोलत होता . 
* जूना जानता लोगना सांगस क वोन बेरा मन्नाथबाबा तिरकोनी आकार म च होता . आब वोनऽ तिरकोनी मूरती ला नाक , डोरा , मुंडो असा आंग फुट रह्यास . मन्नाथबाबा की महिमा अगाध स . 
* भगवान सिरी राम , सीता माय आन् लक्षुमन बनवास क बेरा नासिक परिन मोझरी की दास टेकडी ला आयाता . वासिन मन्नाथगड ला आया आन् कयी दिन यहान रह्या . बाद मऽ यासिन रामटेक गया , असी मान्यता स . मन्नाथगड क खलतऽ आब बी सीता नहानी स . येनऽ कुंड ला फाडी कन् बांधेतो . वका चिराना आब बी दिसस . भगवान राम , सीता माय आन् लक्षुमन जी का पवितर पाय मन्नाथगड ला लाग्यास . भगवान सिरी रामजी न यहान च भगवान भोलेनाथ की स्थापना करकन् पूंजा करीस , असी मान्यता स .
* देऊर क आवार म आब बी येक घोगल को झाड स . मन्नाथगड क पायथा जवर क गाव को नाव बी घोगरा स . पह्यले यहान घोगली का खूब झाडना होता , तेकन येनऽ गाव को नाव घोगरा पडेस , असी मान्यता स . 
* आपलऽ देस म गुप्त राज ( इ.स. ३२० - ५५० ) पासिन देऊरना बांधन की सुरवात भयी . 
* देवगिरी क यादव राज म इ.स. १२५९ पासिन इ.स. १२७४ पावतर हेमाद्री उर्फ हेमाडपंत येनऽ राज को पंतप्रधान होतो . यादव राजा महादेव राव ( इ.स. १२६१ - इ.स. १२७० ) आन् राजा रामदेव राव ( इ.स. १२७१ - १३११ ) इन क कारभार क बेरा हेमाडपंत न भगवान भोलेनाथ का , चंडिका माय का खूब देऊरना बांध्या . वून क पह्यले बी इ.स. ११०० - १२५० काल म असाच देऊर बन्या . पर येनऽ देऊरना म नक्सीकाम की कारागीरी जास्त रवत होती . यादव राज क काल म ( इ.स. १२५० - १३५० ) नकसीकाम थोडो कम भयो पर देऊरना की संख्या खूब बाहाडी . आन मराठा राज क काल म इ.स. १८०० पावतर या परंपरा रही . 
* हेमाडपंथी मंदिर की वास्तुकला मालवा क भूमीज देऊर कला ( राजा भोज - समरांगण सूत्रधार ) आन् नागर ( इंडो आर्यन ) देऊर कला मिन निबजी . हेमाडपंथी मंदिर की आपली येक खासियत स . येनऽ वास्तुकला म कारो पास्यान / खरफ बापरस . फाडी क जोड साठी / दरजा भरन साठी चुनो , गारो , मसालो यको बापर नी होत . यी बांधकाम कोड्डो रव्हस . बांधकाम क अनुसार चवकोनी , तिरकोनी , लंबा , आखुड असा दगडना घडावस . दगडना क पकड साठी दगड म च खोबन , खाच , खुटी बनावस . देऊर का खंबा येक च दगुड म घडावस . खंबा चवकोनी , साहाकोनी , आठकोनी रव्हस . मंझार क पट्टी म मूरतीना , बेल , पत्ता , भूमिती की आकरुतीना रव्हस . छत म कोनटा परिन दगडी पाटीना रचस आन् मंझार म कमल क फुल नी त् झुंबर की डिझाईन वालो दगड मांडस . हेमाडपंथी मंदिर म प्रवेशमंडप , सभामंडप , अंतराल आन गाभारो असी रचना रव्हस . दरुजा पर गनेसपट्टी , तोरन रव्हस . अंतराल जवर नंदी की मूरती रव्हस . 
बाहिरीन जोतापासिन च कनी की डिझाईन बनस ज्या सीधी आमलक पावतर जास . सिखर की नानी नानी आकरुतीना बी बुड पासिन च जास .  आमलक क वरतऽ करस ( कळस ) रव्हस . 
२. देऊर की रचना : * मन्नाथेस्वर देऊर की सभामंडप ( २५ फिट आन् १६ खंबा ) , अंतराल ( ८ फिट ) आन तीन फुट खलतऽ १० x १० फुट को गाभारो , असी रचना स . मन्नाथेस्वर देऊर सूर्व्यामुखी स . 
* गाभारा म सयोनिज सिवलिंग स . वेदी ( पीठ ) को आकार गोल रव्हस पर यहान क वेदी को आकार चवकोनी स . वेदी को मुंडो उत्तर दिस्या म स . सिवलिंग की पूंजा दकसिन दिस्या म बसकन , महादेव मुखी रह्यकन कऱ्या पायजे , असी मान्यता स . 
* देऊर क दिवाल ला बाहिरीन जोतापासिन तिरकोनी बांधकाम करकन् सहारो देयेस . देऊर को सिखर ,  कोनी कव्हस क बनेच नी त् कोनी कव्हस काल क मार कन् पडझड भयीस . आब गाभारो आन अंतराल को सिमिट चुना को सिखर बनायेस . 
३. पूंजा किरतन आन् उत्सव : * राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज को कार्यक्रम मन्नाथगड प भयेतो . वून को नानोसो देऊर बी यहान स . आब बी तुकडोजी महाराज क याद म यहान कार्यक्रम आन् महापरसाद होस . 
* पह्यले यहान पकडगिरी महाराज रवत होता .वून क बाद रामदास महाराज मन्नाथेस्वर क सेवा म होता . रामदास महाराज नानपन पासिन बुलढाणा किथिन यहान आयाता . वून न रिसिदरा म ११ बरस तप करेतो . मन्नाथबाबा को देऊर आन् बाकी येवस्था वून क च हात प भयी . 
* हर सोम्मार ला मन्नाथेस्वर सिव जी की पूंजापाती आन् आरती होस . 
* महासिवरातरी ला मन्नाथगड पर मोठी यातरा भरस . 
* मन्नाथेस्वर मंदिर आन् उत्सव कमिटी क देखरेख म साल भर यहान कार्यक्रम होस . 
# नवस ला पावनी वालऽ मन्नाथेस्वर आन् मन्नाथबाबा की मोठी महिमा स . 
# रामायण काल पासिन को इ पावन , पुरातन तीरथ देस भर म परसिध्द स . 
जय मन्नाथेस्वर सिव भगवान की...
जय मन्नाथबाबा की...
( यासीन भोरगड जवरच स ... भोरगड की खोज आघ आयेनच..)

( सहयोग : मनोज भाऊ गोरे ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Monday, December 14, 2020

अजब गजब - ४४ : सर्वेस्वर सिव मंदिर , लोहारी सावंगा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ४४ : सर्वेस्वर सिव मंदिर , लोहारी सावंगा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

हिंदू धरम म भगवान न लय अवतार लेयास ; आन् वून क हर अवतार क पासऽ कोनतो न् कोनतो कारन होतो .
* बिस्नु भगवान न नरसिंव्ह अवतार लेयेतो . पुरान कऽ अनुसार हिरन्यकस्यप न कठोर जप तप करकन् भगवान बरमा जी सिन वरदान लेयेतो क , वू नी मानुस कन मरेन नी कोनऽ जीवजंतू कन मरेन . नी जमीन पर मरेन नी अगास म मरेन . कोनतो बी अस्त्र वोला नी मार सकेन नी अवजार ! वोला दिन म बी मरन नी आयेन , आन रात म बी मरन आयेन . वोला नी घर मझार मरन आयेन नी दाठ्ठा बाहिर . 
* येतरा वरदान भेट्या बास्त हिरन्यकस्यप सोताला तीन लोक को मालक समझन ला लाग्ये . वोनऽ सबन ला सांगे क भगवान बिस्नूदेव की पूंजा सोडकन वोकी च पूंजा करो आन् नाम जपो . 
* हिरन्यकस्यप ला परलाद नाव को पोरग्यो भये , जी भगवान बिस्नूदेव को भगत होतो . हिरन्यकस्यप न लाख कोसिस करी पन् परलाद पर वको असर नी पड्ये . 
* येक दिन परलाद न कह्ये क भगवान चराचर म स . तब हिरन्यकस्यप न वोला कह्ये क , तुमारो भगवान सबन जागा प स त महाल क येनऽ खंबा म काहे नी दिसत ? असो कह्यकन वोनऽ खंबा ला लात मारी . तब वोमिन भगवान बिस्नूदेव को नरसिंव्ह अवतार परगट भये ! नरसिंव्ह भगवान न हिरन्यकस्यप ला उठाये आन् महाल क दाठ्ठा म आपलऽ मांडी पर धरे . भगवान न नख कन वोकी छाती फाडी , जेकन वू मर गयो . 
* हिन्यकस्यप ला मारन क बाद बी भगवान को राग कम नी भये . वून क राग कन तीनो लोक म हाहाकार मचे . येको उपाव ढुंढन साठी सबन देवलोक भगवान भोलेनाथ ला भेटे . भगवान भोलेनाथ न मानुस , घार आन् सिंव्ह क रूप वालऽ भगवान सर्वेस्वर को अवतार लेये . भगवान भोलेनाथ को इ १६ वो अवतार ! भगवान नरसिंव्ह आन् भगवान सर्वेस्वर म १८ दिन लढाई भयी . जब भगवान नरसिंव्ह कमजोर पडन ला लाग्या तब वून को राग बी नरम पडे . तब सबन न भगवान की जयजयकार करी आन् भगवान नरसिंव्ह भगवान बिस्नूदेव म लीन भया .
१. सर्वेस्वर सिव मंदिर : * कारंजा - भारसिंगी , २४५ नंबर क राज्य सडक प कारंजा पासिन १७ कि.मी. दूर लोहारी सावंगा गाव स . लोहारी सावंगा नागपूर जिला क नरखेड तहसील म आवस . 
मु आन मनोज भाऊ गोरे लोहारी सावंगा को अनोखो सर्वेस्वर सिव मंदिर देखन साठी गया . आमी लोहारा मिन सीधा कार नदी जवर गया . लोहारा गाव कार नदी क काठ पर बसेस . कार नदी जवर डाखऽ हात प सर्वेस्वर सिव मंदिर की कमान आन आब च बांधे ती सभामंडप स . देऊर क आवार म बड को झाड स . सभामंडप क पासऽ महादेव मुखी हेमाडपंथी देऊर दिसस . यादव राज क जमाना को इ सर्वेस्वर सिव मंदिर ८०० बरस पुरानो स . महादेव मुखी प्रवेसद्वार मिन अंदर गया बास्त १० x १० फिट को पुरो दगड को सभामंडप दिसस . येनऽ सभामंडप म गनेस जी , नागदेवता , हनुमान जी , पिंड आन् नंदी की मूरतीना धरीस . सभामंडप म गया बाद जेवनऽ हात प ९० ° कोन पर अंतराल आन् गाभारो स . अंतराल ३ फिट चवडो स . वोकऽ दिवाल म डाखऽ हात प गनेस जी आन् जेवनऽ हात प नागदेवता की मूरती स . खलऽ नंदी स . अंतराल आन् सभामंडप की जमीन येक लेवल प स पर गाभारो ३ फिट खलतऽ स . हेमाडपंथी देऊर म गाभारा की लेवल सभामंडप आन् अंतराल सिन खलतऽ रव्हस . देऊर क पसचिम दिस्या म कार नदी स . गाभारा को मुंडो सूर्व्यमुखी स . 
* पह्यलऽ येनऽ देऊर को आवार आन् बांधकाम मोठो होतो . आब येतरोच बांधकाम बाचेस . बाकी जागा प आब अनखिन देऊरना बांध्यास . 
* देऊर क सूर्व्यामुखऽ पह्यले गढी होती . समय क मार कन् वकी नावनिस्यानी खतम भयी . उच्ची जागा तेतरी दिसस . लोहारा म लय पुराना बाडा स . पुरानऽ जमाना मऽ लोहारा मोठी पेठ होती . पुरानऽ वयभव की निस्यानी जागा जागा पर दिसस . समय क संग कार नदी मिन लय पानी बह्यो . भोयरी संस्कृति को लोहारी सावंगा येक गढ होतो . वोकऽ चारी कितऽ भोयर का गावना फयल्यास . 
* भगवान सिव जी को अनोखो सर्वेस्वर सिव जी अवतार , उसोच अनोखो वून को ठानो लोहारी सावंगा !
जय सर्वेस्वर सिव जी की......

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, December 13, 2020

अजब गजब - ४३ : भुयारेस्वर सिव मंदिर, वाघोडा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ४३ : भुयारेस्वर सिव मंदिर , वाघोडा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

महाराष्ट्र म वर्धा जिला क कारंजा तहसील म कारंजा - भारसिंगी सडक प कारंजा पासिन ४ कि.मी. दूर जेवनऽ हाथ प वाघोडा गाव स . गाव को नाव स वाघोडा त बाघ को कोनतो न् कोनतो नातो होयेन च ! यहान स बाघ गुफा ! वाघोडा गाव पहाडी क पायथा क काठ काठ कन बसेस . गाव त २००/३०० बरस पह्यले च आबाद भयो पर इ स्थान पुरातन स . 
१०/१२/२० तारीख ला बस्तरवार दिनऽ मु आन् मनोज भाऊ गोरे वाघोडा ला गया . वहान सिरी रामजी कामडी , तुकाराम जी कामडी , दत्तुजी कामडी संग बातचीत करी . वाघोडा म कामडी कुर का कुटुंब जास्त स . सिरी रामजी कामडी न भुयारेस्वर सिव मंदिर की महिमा सांगी . वून क घर सिन च आमी गुफा देखन साठी गया . 
वाघोडा गाव म बराबर दकसिन दिस्या म पहाडी दिसस . पानी टंकी क आघऽ सिवटेकडी प बाघ गुफा स . यहान च महादेव मुखी भुयारेस्वर सिव मंदिर स . 
१ . इतिहास : * भुयारेस्वर सिव मंदिर वाली पहाडी कप्पी मुरुम की स . तेकन यहान क भुयार म खसखुस चालूच रव्हस . पह्यलऽ येनऽ भुयार म सिवबाबा , योगीबाबा रवत होता . उन क संग च कुतराना बी होता . बाबा हरदम सिवजाप करत होता . गाव सिवार म सरप निकरे त वुई सरप ला मारन साठी मनाई करता . बाबा सरप ला पकडकन् भुयार जवर लायकन सोडत होता . महासिवरातरी ला भुयार क आघऽ गड्डो खंदकन् वोमऽ इंधन बारत होता . सकारी गड्डाभर लाल लाल निवाच निवा ! बाबाजी आन् भगत लोगना वोपरीन चालत जात होता पर कोनी का च पाय ना लासत होता ना बरत होता !
* पह्यलऽ भुयार को मुंडो निरुंद च होतो . वोमीन पेट क भार सोय कन च अंदर जाता आवत होतो . मंझार म उभऽ रवन जोगती जागा होती . लोगना न भुयार ला चवडी करन साठी खंदे . खंदन क बेरा बयील क हंबऱ्या सरखो जोर को आवाज आये . सबन येकदम दांदर गया . खलतऽ उजिड म देख्ये त वहान नंदी की मूरती होती . नंदी ला सब्बल लागीती तेकन वू हंबरेतो . भुयार म नंदी की पास्यानी मूरती सापडी , वको लोगना ला नवल वाटे . बाद मऽ झोक झोक्कन खंदे त पिंड ( सिवलिंग ) बी सापडी . वून की वहान च स्थापना करी . खुदाई म अनखिन मूरतीना सापडी . 
* इ.स‌ . १९९४/९५ म यहान पारडसिंगा का ठाकरे गुरजी आयाता . वुई दिन भर भुयार म थांब्या , दरस्यन लेये आन् गाव म आया . वून न सांगे क भुयारेस्वर सिव जी जागरूत स . 
* भुयारेस्वर सिव मंदिर म भाकरे महाराज आन् कयकाडे महाराज कयी बेरा आयाता . 
२. स्थान आन् रचना : * सिवटेकडी परीन १०/१५ गाव को सिवार दिसस . आबऽ भुयार को मुंडो चवडो करेस आन् लोखंडी गेट बी लगायेस. भुयार की रचना अजब गजब च स . महादेव मुखी भुयार म गया बाद मंझार म ९ x ९ फिट की ५ फिट उच्ची जागा स . इ अचंबो यहान च खतम नी होत . यासीन चार दिस्या म चार भुयार स . आघ की महादेव मुखी भुयार ३० फिट लंबी  , पसचिम की ४० फिट लंबी स . पसचिम वाली भुयार को मुंडो भीर कितऽ स . सूर्व्यमुखी भुयार की लंबाई कोनी ला च ठाव नहाय आन् आबऽ बांधकाम करे तब वोला बुजाई . सिवलिंग क पासऽ की दकसिन मुखी भुयार को अंत बी कोनी ला च ठाव नहाय . वोम कोनी जान की बी हिम्मत नी करत . मंझार म सिव स्यंकर भोल्यानाथ आन् वोकऽ चारी बाजू म भुयार की या अद्भूत जागा , म्हरऽ जानकारी म येकली च स . भुयार पास्यान म रव्हस . पर या भुयार मुरुम म स . भुयार २/३ फिट चवडी आन् ३/४ फिट उच्ची स . भुयार क पसचिम की भीर बी कोनऽ खंदी .... कोनऽ बांधी या बात बी कोनी ला च ठाव नहाय . 
३. मान्यता आन् चमत्कार : * सिवलिंग क पासऽ वाली भुयार म मोठो भुजंग रव्हस , आन् कुचित च भाग्यवान ला दरस्यन देस , असी मान्यता स .
* कोनी ला जर ताप , आसुक आये होयेन आन् वू तीन डाव आयो होयेन त् भुयारेस्वर सिव मंदिर म पूंजापाती कऱ्या बाद वू निकर जास ... आराम पडस , असी मान्यता स . 
* येक डाव भुयारेस्वर सिव मंदिर जवर स्याळा म का दुय चार पोटुना खेल रह्याता . वून ला अचानक ' डम डमऽ... डम डमऽ.. ' असो डमरू को आन् नाचन को आवाज भुयार मीन आयकन् ला आये . डमरू जोर जोर कन बाज रह्येतो . वून न भुयार क मुंडा मीन अंदर देखे त का नवल ! वून क मुंडा मीन आवाज निकरनो बंद भयो . डोरा उघडा का उघडा च रह्या . भुयार म साकस्यात स्यंकर भोल्यानाथ जी तांडव नाच कर रह्याता . ' डम डमऽ... डम डमऽ....डमडम डमऽऽ ...' पोटुना भेबाऱ्या आन् धुम घर कितऽ भाग्या . नाना पोटुना खोटा थोडा च बोलेन ? पोटुना ला खरो च सिव भगवान को दरस्यन भये , असी मान्यता स .
* सिरी रामजी कामडी क खेत म बोर करन को काम चालू होतो . निरो पास्यान ढुड्डो उड रह्येतो . सिरी रामजी येक झाड खलऽ सावली म नीज गया . वून क आघ पांढरऽ झक कपडा म कोनी स्यक्ति न दरस्यन देये आन् कह्ये क् चिंता की बात नहाय ... ३०० फिट प पानी च पानी स , आन् येतरो कह्यकन वूई गायब भया . सिरी रामजी बोर कितऽ गया . चारी कितऽ पानी च पानी ! वून बोर वाला ला पुसे क , केतरो फिट भयो ? बोर वाला न सांगे क २९४ फिट . वून न कह्ये क अनखिन ३०० फिट पावतर खंदो , त बोर वालो नट गयो . बोल्यो क पानी आटप च नी रह्ये , कसो खंदू ? वून की सरधा स क इ काम भुयारेस्वर सिवजी को च होय .
* येनऽ भुयार म पुरातन काल पासिन योगी - जोगी , रिसी मुनी न जप तप करेस , असी मान्यता स .
४. उत्सव : * भुयारेस्वर सिव मंदिर म हर सनवार आन् सोम्मार ला पूंजापाती न आरती होस . या पूंजा कारंजा क खेनवार जी किथिन रव्हस .
* हर सन तिवार ला भुयारेस्वर सिवजी की पूंजा करस . 
* गाव म कोनतो बी काज होयेन त् वोकी पतरिका पह्यले भुयारेस्वर सिव जी ला अरपन कर कन आसिरवाद लेस .
* महासिवरातरी ला यहान मोठी यातरा भरस . ७ दिन को भागवत सप्ता म ५००० परस बी जास्त लोगना आवस . 
# आबऽ भुयार क आघऽ मंगलभवन को काम चालू स . काम पुरो भया बास्त बिह्या स्यादी आन् दुसरऽ धारमिक , सामाजिक काम काज साठी इ भवन काम म आयेन , असो कमेटी क लोगना न सांगेस . 
जय भुयारेस्वर सिव जी की .....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Saturday, December 12, 2020

अजब गजब - ४२ : हनुमान मंदिर , राजना. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ४२ : हनुमान मंदिर , राजना
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्यप्रदेस म छिंदवाडा जिला क पांढुर्णा तहसील म राजना गाव स . 
आबऽ तुमी पुसेन क , कोनतो राजना ? राजना क राजना पावर हाऊस क राजना जोड क राजना हेटी क राजना फॅक्टरी क राजना टप्पर ????....
जरासो दम लेव ! राजना इ भोयर समाज को असो येकलो च गाव स , जेकऽ आजू बाजू न राजना नाव का अनखिन पाच गाव बस्यास .... राजना गाव की असी या गजब कथा . पर या अजब गजब कथा यहान च खतम नी होत ! 
अखिल भारतीय भोयर पवार महासंघ का अध्यक्ष डॉ नामदेवराव दयारामजी राऊत इन को इ राजना गाव . मुर राजना गाव म पुरानऽ जमाना पासिन को राऊत बाडो स . आन् येन च राऊत बाडा म  ११२ बरस पुरानो परसिध्द हनुमान मंदिर स . नवऽ धारमिक आन् सामाजिक रिवाज ला इलाखा म परसिध्द करनी वालो सरधा स्थान !
१. इतिहास : * राजना गाव म मोठ्ठो राऊत बाडो स . या कथा चालू होस आपाजी राऊत पासिन . डॉ नामदेवराव राऊत जी का आपाजी राऊत दादाजी . रामभक्त आपाजी को सोभाव सीधो साधो , धारमिक आन् मिलनसार होतो . वून न लोगना ला ज्या बी बात सांगी , जि बी सलो सांगे ; ती धरम , हित आन् न्याव को च सांगे . खेती बाडी म सोना की फसल आन् बाडा म गोकुल नांदत होतो . रोज क सरखा येक दिन आपाजी खेती बाडी को काम देखन साठी गयाता . खेत म घुमता घुमता वून ला अचानक च साकस्यात्कार भयो क , बाडा म हनुमान जी की स्थापना करेन त कुटुंब म सुख संपद , खुस्याली म अजून बरकत आयेन . वुई वोन च धुंध म घर आया . घर म या बात वून न सबन ला सांगी . सबन को आवबिचार लेये . बाडा म खुसी की लह्यर आयी . आपाजी न येक मोह्यतूर देख कन् हनुमान जी को देऊर बांधन की सुरवात करी . 
* देऊर साठी खरफ दगड आयो . देऊर साठी खरफ का दगड घडावन को काम होन ला लागे . खरफ कन च हनुमान जी की मूरतीना घडायी . येक हातजोड्या दास हनुमान जी की आन् येक द्रोनागिरी पहाड हात म लेये वीर हनुमान जी की ! देऊर क महादेव मुखी दिवाल प दकसिन मुखी या हनुमान जी की मूरतीना बसाडी . पसचिम दिवाल प गनेस जी , माय अनपुरना , सेसनाग की मूरतीना बसाडी . सूर्व्यामुखी दिवाल प सिवलिंग आन् नंदी की स्थापना करी . हनुमान जी की मूरतीना सोडकन बाकी मूरतीना कारऽ पास्यान की स . महादेव मुखी दिवाल प रिध्दि सिध्दि आन् दुसरी मूरतीना स . देऊर क सूर्व्यमुखी दिवाल प बाहिरीन सूर्व्यदेव की मूरती स . 
२. उत्सव : * आपाजी को पोरग्यो दयाराम जी मनजे डॉ नामदेवराव जी का दाआजी . दयाराम जी क कारभार पासिन च वून को मंढोट पोरग्यो गनपतरावजी गाव क भजन मंडल संग देऊर म हर सोम्मार आन् येकादसी ला भजन करत होता . माडी पासिन कारतिक पुनव पावतर गाव की डिंडीना हनुमान जी क देऊर म काकड आरती करत होता . 
* इ.स. १९६० पासिन इ.स. १९८५ पावतर राऊत बाडा क येनऽ अनोखऽ हनुमान मंदिर म संत सिरी गुलाबबाबा को हर साल कारतिक पुनव ला किरतन होत होतो . बाडा क हनुमान मंदिर कन् राजना गाव म कयी धारमिक आन् सामाजिक रिवाज पड्या . संत सिरी गुलाबबाबा को परसिध्द किरतन आयकन साठी आजू बाजू क गाव का हजारों लोगना राजना आवत होता . आपाजी राऊत न लगाये धारमिक आन् सरधा को झाड चारी आंग बाहाडेस . राऊत बाडा को हनुमान जी आब पुरऽ इलाखा को सरधास्थान स . दिवारी साठी गाव म आवन वाली बू बेटीना को आब कारतिक पुनव क बेरा म आवन को रिवाज पडेस .
* राऊत बाडा क हनुमान जी मंदिर म हर साल दुय मोठा धारमिक उत्सव होस . येक कार्यक्रम कारतिक पुनव ला होस . झालपड्या क बाद तुरसी को बिह्या लागस आन् रात म भजन होस . अरधऽ रात कन् टिपुर ( त्रिपुर ) बारस . दुसरऽ दिन सकार पासिन च भजन किरतन चालू रव्हस . सबन डिंडीना आन् भजन मंडल देऊर म आवस . दुफारकन्  ' गोपाल काला गोड झाला ' असो भजन कह्यकन् दही लाही को कार्यक्रम होस . 
दुसरो मोठो कार्यक्रम हनुमान जयंती ला होस . देऊर की लिपाई पोताई करस . हनुमान जयंती क पह्यलऽ दिन झालपड्या पासिन देऊर म भजन किरतन होस . दुसरऽ दिन सकार पासिन होम हवन चालू होस . भजन डिंडी म आया भक्त लोगना को पाय पखारकन् राऊत कुटुंब स्वागत करस . भजन पूजन , किरतन आरती भया बास्त दही लाही को कार्यक्रम होस . आबऽ दही लाही भया बाद राजेश राऊत महापरसाद को आयोजन करस . महापरसाद साठी पंगतना बसस . दिन बुड्या हनुमान जयंती कार्यक्रम को समापन होस .
३. जिर्णोद्धार : बाडा क आवार क मंझार म इ हनुमान जी को देऊर स . ११२ बरस पुरानऽ येनऽ देऊर जवर पिपर का झाडना बाहाड्याता . देऊर की टुट फुट बी होय रह्यिती . आपाजी राऊत क चवथऽ पिढी का राजेश राम राऊत इन न हनुमान मंदिर क सुधार को काम हात म लेये . वट्टो , देऊर ला नवा सरखो सुधारे .. रंगरोगन कऱ्यो . आब येनऽ देऊर ला देख्या बास्त असो वाटत च नी क इ ११२ बरस पुरानो स ... 
३० नवंबर २०२० ला पुरो कुटुंब न  यहान होम हवन कऱ्यो आन् देऊर पह्यला सरखो दरस्यन साठी खुलो भये . 

# आपलऽ पूरवजना न असी महान संस्कृति घडायी... बढायी.. ! 
आपला रिती रिवाज , बोली , परंपरा को जतन करन की जिम्मेदारी आपली स . आघ क उन्नती संग च पासऽ की परंपरा , वोको वयभव , बोली बी टिकायकन् धरी पायजेन ...

( स्रोत आन् सहयोग : डॉ नामदेवराव राऊत ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Monday, December 7, 2020

अजब गजब - ४१ : गढ सिवाना. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ४१ : गढ सिवाना
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

महाराष्ट्र आन् राजस्थान म १० - १० मील प गढ किल्ला स . 
राजस्थान क बाढमेर जिला म सिवान गढ स . जोधपूर पासिन सिवान गढ ५६ कि.मी. दूर स . सिवान गढ हलदेस्वर पहाड प स . वोक चारी कितऽ रेती च रेती . सिवान पासिन ४८ कि.मी. पावतर ५६ पहाड की माला स . सिवान क किल्ला पर तलाव स , जेको पानी कब च नी आटत . काल रवो , अकाल रवो पानी वोतरो को वोतरो च ! येनऽ तलाव क गह्यराई को ठाव आज पावतर कोनी ला च नी लाग्यो . किल्ला प राजमहाल , तिरीकलास महाल का खंडारा स . येक वट्टा प सिवलिंग आन् वोक आघऽ नंदी स . सिवाना क आसपास हल्देस्वर देऊर , भीमगोडा देऊर , मोकलसर बावडी , अमरतिया भिर , आस्यापुरी माय को देऊर , जालोर को किल्लो स .

१. इतिहास : * सिवाना को किल्लो चक्रवर्ती राजा भोज को पोरग्यो सिरी वीर नारायण न १० सदी म बनाये . तब येनऽ मुलुख पर परमार राज होतो . 
* बाद मऽ सिवाना पर जालोर क सोनगरा चौहान को राज रह्ये . 
* सिवाना पर बाद मऽ राव मल्लिनाथ को भाई राठौड जेतमल को कब्जो भये . 
२ . जौहर : सिवाना म दुय बेरा जौहर भये . २ जुलाई १३०६ म सिवान गढ पर अलाउद्दीन को हमलो भयो , तब पह्यलो जौहर भये . राजा शितलदेव की रानी आन् गढ क बाईना न जौहर करेतो . वोकऽ बाद अकबर क हमला क बेरा कल्लाजी राठौड की रानी आन् गढ क बाईना न जौहर करेतो .
३ . मान्यता : पांडव जब अग्यातवास म होता तब यहान आयाता . यहान भीम न आपलो टोंगरो जमीन पर मार कन् पातार मिसिन पानी काढ्येतो , असी मान्यता स . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, December 6, 2020

अजब गजब - ४० : बिहार को मालवो. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ४० : बिहार को मालवो 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
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बिहार म तीन परमार पाती को राज रह्ये .
१. उज्जैनी परमार : भोजपुर , बक्सर , डुमराव , रोहतास  , औरंगाबाद , चमपारन म कयी मालगुजारी , राजघराना , ठिकाना येनऽ पाती का होता .

२ . धार परमार : इ घरानो धार परिन आयो . औरंगाबाद , रोहतास , बेगुसराय , छपरा म मोठी मालगुजारी आन् ठिकाना धार परमार जवर होता .

३ . गढवरिया परमार : या धार परमार की च स्याखा स . धार परिन आय कन तिरहुट क गन्ढवार पर राज करन क कारन येनऽ स्याखा को नाव ' गन्ढवरिया / गढवरिया / गनवरिया ' पड्यो . तिरहुट , सहरसा , सोनबरसा , पन्चगचिय , दुरगापुर  , स्याहपुर की मालगुजारी इन क जवर होती . 

# बिहार क मोठऽ भाग प परमार राज होतो . राजा भोज क नाव परिन जेनऽ भास्या को नाव भोजपुरी पड्यो , वा यहान की भास्या ! तेकन येन भाग ला बिहार को मालवो कव्हन म हरकत नहाय .
जय राजा भोज.....🙏

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .

Saturday, December 5, 2020

जय जवान जय किसान. bhoyari poem _ भोयरी कविता. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

जय जवान जय किसान
Bhoyari poem _ भोयरी कविता
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

रह्या भूखा न कऱ्या उपास
दिन दसरो उठ्यो तुफान
लाल बहादूर शास्त्री जी बोल्या
जय जवान जय किसान ।धृ।

धोको देये सरहद पर
लागे चीन को जह्यरी पान
फुल गुलाब को कोमाये जी
भाईबंदकी को टुट्यो मान ।१।

भयी तंगी पयसा पानी की
दानापानी कन परेस्यान
डेंडू हिवरो सरप काचे
माय भारत की उजरी स्यान ।२।

करे कब्जो लाहोर पातुर
वीर फऊज न बढाये मान
ठेसे मुंडो पापी राकस को
भये पाकिस्तान दानोफान ।३।

बारे पुतरो रावन को जी
देखे रामलीला मयदान
देस साठी कऱ्या अरपन
तन मन धन को जी दान ।४।

देस भारत को नवो नारो
जय जवान जय किसान
करे रकस्यन भरे पेट
गारे घाम करे बलिदान ।५।

उभा अटल सरहद प
म्हरा देस का वीर जवान
दिन रात कस्ट करकन
लाये अनाज म्हरो किसान ।६।

घाम रगत रोज बहाये
धरे आमारो केतरो ध्यान
म्हरऽ देस का जय विजय
जय जवान जय किसान ।७।

राम लक्षुमन देव तुमी
किस्न बलराम को स मान
भोज बिकरम क रूप म
जय जवान जय किसान ।८।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

अजब गजब - ३९ : चंद्रावती नगरी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३९ : चंद्रावती नगरी 
Bhoyar culture_ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

चंद्रावती - - परमार राज की येक अवध नगरी सरखी पवितर आन् लंका सरखी वयभवस्याली राजधानी ! अचलगढ आन् चंद्रावती परमार वंस को मोठो ठिकानो .
राजस्थान क नानसऽ सिरोही जिला म राजस्थान - गुजरात क हद जवर चंद्रावती नगरी स . 
 ११ वी सदी पासिन इ.स‌. १३११ पावतर यहान परमार राज होतो . आबू क पायथा जवर आबू रोड पासिन ६ कि.मी. प बनास , सुकडी आन् सिवरनी नदी क तिरवेनी संगम पर परऽ दुनिया म परसिध्द चंद्रावती नगरी होती . परमार राज क बेरा चंद्रावती को दबदबो होतो . वोनऽ बेरा की चंद्रावती नगरी धनी , रयीस नगरी क गनती म आवत होती . चंद्रावती नगरी राजपाट , लढाई आन् बेपारी रस्ता  क केंद्र म होती . 
चंद्रावती ( चंद्रोती ) को आब चंदेला नाव स . 
आपन ला मोहेंजोदडो आन् हडप्पा को वयभव आन् संस्कृती मालूम स . वून क तोड को वयभव आन् संस्कृती चंद्रावती नगरी की होती . वहान की वास्तुकला जमाना क आघऽ की होती . चंद्रावती नगरी की वास्तुरचना भुकम्परोधी होती . वोनऽ बेरा चंद्रावती नगरी सरखो दुसरो आधुनिक नगर नी होतो . चंद्रावती नगरी म ९९९ देऊरना होता . ३३ कोटी भगवान को भुवान होतो चंद्रावती नगरी म ! जब सकार - झालपड्या देऊर म आरती होत होती , तब झांज - नगाडा - स्यंख आन् आरती को आवाज माऊंट अबू क सबसिन उच्ची जागा , गुरू शिखर पर आयकु आवत होतो . आब बी यहान का दगुडना बजाया त वोमिन आरती सरखो आवाज निकरस .
बेपार की चहल पहल , धन को लेनदेन , देव धरम को आगाज , आवनी जावनी वाला की भीड , आधुनिक तंतर की वास्तुकला कन् चंद्रावती नगरी को वयभव  पुनव क चंदर आन् चांदनी सरखो चमचम झलारत होतो . १२५ येकट म फयली या राजधानी धरम ,  सुख , धनसंपद की खदान होती . चारी किथिन पहाडीना आन् मंझार म हिरा सरखी दमकती चंद्रावती नगरी ! चंद्रावती नगरी वैग्यानिक ढंग कन् बनायीती . नाना मोठा उद्योग धंदा की भरमार होती . चंद्रावती बेपार संगच औद्योगिक नगरी बी होती . 

* येतरऽ वयभवस्याली परसिध्द नगर प दुस्मान की नजर नी पडेन , असो त होय नी सकत .. पसचिम को बेपार चंद्रावती परिन च होत होतो . मध्य काल म तुरक डकाइतना को हमलो चंद्रावती पर होतच होतो . 
* इ.स. १०२४ म महमुद गझनी को हमलो भयो . मारकाट आन् भयंकर लुटपाट भयी .
* इ.स. ११९२ म मुसलमान हमलावरना की मार चंद्रावती पर पडी . 
* इ.स. ११९६ म कुतुब उद्दीन आयबक सेनापती खुसराव खान की  येक लाख फऊज को हमलो चंद्रावती पर भयो . वोन बेरा वीर धरावर्षा परमार को राज होतो . वीर धरावर्षा जवर ३२०० पयदल फऊज आन् १२७५० घुडसवार होता . चंद्रावती की तमाम जनता लाठीकाठी , दातरा - कुराड लेकन राजा संग आया . वीर धरावर्षा न लढाई की छापामार कला कन् खुसराव खान ला मारे आन् वोकऽ येक लाख फऊज ला यमलोक म धाडे . 
वीर धरावर्षा आन् भाई यशोधवल मोठा वीर राजा होता . 
* चंद्रावती की खोज इ.स. १८२२ म करनल जेम्स टॉड न करी . वोनऽ आपलऽ किताब ' वेस्टर्न इंडिया ' म चंद्रावती की माहिती लिखीस . 
* परथा : परमार राज म यहान येक अनोखी परथा होती . राजा को असो आदेस होतो क जब कोई नवो कुटुंब चंद्रावती म रव्हन साठी आयेन तब हरेक घर वालो वोला येक इट आन् येक रुप्यो देन . वोकन नवो कुटुंब को घर आपरंग च बनत होतो .
* इ.स. १३११ म राव लूमा न चंद्रावती प कब्जो करे . तब पासिन यहान देवडा चौहान को राज रह्ये .
* इंदिरा गांधी जब पंतप्रधान होती तब वून क हत्या क तीन मह्यना पह्यले , ८ जुलाई १९८४ म यहान आयीती . वोनऽ बेरा क राज्यपाल मा . ओ. पी . मेहरा आन् मुख्यमंत्री सिवचरन माथूर ला चंद्रावती की सभ्यता , इतिहास को जतन आन् विकास करन साठी सांगेतो . 
# आज चंद्रावती म  ज्यान खोदेन वहान परमार राज क इतिहास की निस्यानी निकरस . आज चंद्रावती को खंडारो च दिसस .. दुनिया की या अनोखी राजधानी की नगरी राजनितिक उथल पुथल म नास भयी .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Thursday, December 3, 2020

अजब गजब - ३८ : नवरतन गढ. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३८ : नवरतन गढ
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली 

बिहार म भोजपुर नाव को जिलो स , पर जिला म भोजपुर नाव को गाव नहाय ! स न अजब गजब बात ... भोजपुर जिला को मुख्यालय आरा स . पुरानऽ भोजपुर जिला म भोजपुर होतो . पर वका दुय जिला भया . येक बक्सर आन् दुसरो आरा . तब भोजपुर गयो बक्सर जिला म .... नवो भोजपुर आन् पुरानो भोजपुर नाव को नानासा गाव स . बक्सर पासिन २३ कि.मी. दूर भोजपुर - सिमरी सडक प नवरतन गढ स . डुमराव ठेसन परिन ३ कि.मी. दूर नवरतन गढ पह्यले १०० येकड म बन्योतो . 

इतिहास : * इ.स‌ १३२० पावतर दिल्ली को सुलतान राज मालवा पर आयो . सबन ला इतऽ उतऽ जानो पडे . चक्रवर्ती राजा भोज को मंढोट ( दुय नंबर को ) पोरग्यो देवराज आपलऽ संगी साथी संगऽ मालवा परिन पूरब दिस्या म  निकऱ्या . चालता चालता वून न सोन नदी क पसचिम थडी प डेरो डाले . वहान तब सिव पूजक नागवंसी राज्या को राज होतो . वोपर राजा देवराज न कब्जो करे . आन् वहान च आपलऽ दाआजी , चक्रवर्ती राजा भोज क नाव पर " भोजपुर " बसाडे . 
* राजा देवराज क आघऽ क  पिढी म राजा रुद्रपरताप नाव को मोठो वीर राजो भयो . वून न इ.स. १६३३ म " नवरतन गढ " इ किल्लो बांधे . १०० येकड क येनऽ किल्ला म ५२ गली आन् ५६ हाट बजार होता . पुरी बसती च किल्ला म होती . 
* राजा रुद्र परताप क बेरा आगरा म स्यहाजहान को राज होतो . वोला परमार को इ वयभव खुपे . इ.स. १६३६ म स्यहाजहान न राजा रुद्र परताप ला बागी घोसित करे आन् वोन अजिमाबाद क निजाम नियामत खान ला भोजपुर , नवरतन गढ पर हमलो करन को आदेस देयो . वोनऽ लढाई म राजा रुद्र परताप हारे . नियामत खान न राजा रुद्र परताप ला पकडकन् अजीमाबाद लायो . वहान वोनऽ राजा रुद्र परताप ला मार डाये . 
* येनऽ लढाई म नवरतन गढ क किल्ला को खूब नुकसान भये . आन् पूरब को परमार राज बी खतम भयो . 

आपलऽ वंस की पूरब की नवरतन गढ की निस्यानी आखरी सास ले रहीस . ना वकी देखभाल स , ना कोनी ला वको सोयर सुतुक स . 
# वोनऽ जागा क बोली ला " भोजपुरी " कव्हस . राजा भोज क नाव की बोली त आब बी स . पर आपलऽ संस्कृति क अवसेस , धरोहर को सत्यानास भय रहेस ....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, December 2, 2020

भास स्वप्नाचिये दास. Marathi language _ मराठी भाषा

भास स्वप्नाचिये दास 
Marathi language _ मराठी भाषा

अंतहिन हा दिगंत
झेप धर्म अनमोल
बळ पंखात अनंत
ऊभा आसमंत तोल ।धृ।

संथ सारा आसमंत
चरा टिटवीचे बोल
पार पापणीचा संत
सदा पाझरते ओल ।१।

दाह सरणाचा मोह
धर्म मरणाचा फोल
गळा विलाप आरोह
वेळ अवरोह खोल ।२।

भास स्वप्नाचिये दास
गुढ पाताळी सखोल
सत्य चंदनाचा वास
त्याचे भुजंगाला मोल ।३।

घसा पोकळच वासा
शब्द आवंढा अबोल
सुन्न डोकी अवदसा
वाजे प्रलयाचा ढोल ।४।

वळवळ चळवळ
फेरा गरागरा गोल
घरी दारी वावटळ
आता सावर रे तोल ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर







Tuesday, December 1, 2020

अजब गजब - ३७ : महारानी कर्नावती. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३७ : महारानी कर्नावती
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

उत्तराखंड क गढवाल म कयी साल परमार राज होतो . गढवाल क महाराजा महिपाल सिंग की महारानी कर्नावती ला " नाक काटी रानी " क नाव कन् इतिहास वरखस . नाव त अजब गजब स च पन् महारानी कर्नावती को काम आन् बहादुरी बी अजब गजब च स .
गढवाल राज ला मुगल कब बी जित नी सक्या . गढवाल म बी सिरी नगर स . इ.स. १६६२ म महाराजा महिपाल सिंग न गढवाल राज की राजधानी देवालगढ परीन सिरीनगर ला ल्यायी . 
महाराजा महिपाल सिंग आन् महारानी कर्नावती मोठा बाह्यदूर होता . 
* १४ फरवरी १६२८ म स्याहजहान आगरा क राजगादी पर बसे . वोकऽ ताजपोसी प देसभर क राजा लोगना न आगरा ला अहिर पठाये आन् खुद बी वहान गया . पर गढवाल क राजा न ना अहिर पठाये आन् ना खुद गया . स्याहजहान ला येको लय राग आये . राज्या क चमच्या लोगना न सांगे क , गढवाल म सोना की खदानना स आन् महिपाल सिंग राजा जवर खूब धनसंपद स .
स्याहजहान न गढवाल पर लय डाव हमलो करे पर गढवाल ला वू जीत नी सके . 
* मंझार म च इ.स. १६३१ ला कुमांऊ क लढाई म महाराजा महिपाल सिंग घायल भया , आन् वोम च वून को जीव गयो . वून क सात साल क पृथ्वीपति स्याह नाव क पोरग्या ला राजगादी पर बसाडे . नानऽ पोरग्या क कारन राजपाट की जबाबदारी महारानी कर्नावती प आयी . वून क संगऽ गढवाली फऊज को सेनापती लोदी रिखोला , माधोसिंग , बनवारीदास तंवर , बेग असा भरोसा वाला वीर होता . 
* महाराजा महिपाल सिंग क मरन क बाद स्याहजहान नि इ.स. १६४० म वापिस गढवाल प हमलो करे . वून क सेनापती नजाबत खान संग ३०००० घोडसवार आन् पयदल फऊज होती . महारानी कर्नावती न वून ला आपलऽ राज म त घुसन दे पर चंडीघाटी म ,आबऽ जहान लकसुमन झुलो स , वहान वोकऽ फऊज ला दुय आंगऽ किथिन घेऱ्यो . रसद बंद भयी . नजाबत खान की फऊज भूकी मरन ला लागी ‌ . हार मानकन् नजाबत खान न समझोता साठी इतल्लो धाडे , जेला महारानी कर्नावती न ततकाल ठुकराये . महारानी कर्नावती न येक अजब समझोतो पठाये . जेला जितो आगरा ला जान को होयेन , वोला आपली नाक काटकन् जानो लागेन ! इ इतल्लो महारानी कर्नावती उ आगरा ला पठाये , आन् कह्ये क वा सबन को गरो बी काट सकस ! 
स्यहाजहान सरमिंदो भये , अपमानित भये आन् वोला राग बी लय आये . पर वोकऽ जवर कोनतो च उपाव नी होतो . 
* महारानी कर्नावती न पह्यले त नजाबत खान की नाक आपलऽ तलवार कन् काटी , आन् बाद म सबन मुगल फऊज की नाक काटकन् वून ला वापिस पठाये . तब पासिन महारानी कर्नावती को नाव " नाक काटी रानी " पड्ये . 
* असोच नाक काटन को कारनामो महारानी कर्नावती न मुगल हमलावर अरीज खान आन् वोकऽ फऊज संग करे . येकऽ बाद कोनी की बी हिम्मत नी भयी गढवाल कितऽ देखन की ! 
* महारानी कर्नावती न च राजपुर नहर बनवायो . इ नहर रिपसना नदी पासिन सुरू होस आन् देहरादून पावतर पानी पोहोचवस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Monday, November 30, 2020

सरवा - भाग १९

सरवा - भाग १९
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

परभ्या लिवून रायला व्हता . माय मजूर घिवून वावरात गेलती . झाक पडल्या माय घरी आली . 
' दाआजी अजून आले नाही का बापू ? ' मायनं हातपाय धुता धुता इचारलं . 
' नायी नं... थांब फोन लावतो .' परभ्यानं मनलं .
' दाआजी , किती येळ हाये अजून घरी याले ? ' परभ्यानं मोबाइलवर पुसलं .
' आलो बटा.. गावाजवरच हावो.' दाआजीनं मनलं.
माय रान्नीत सयपाक करत व्हती .
' डगऽ ... डगऽ.....डगऽ....' असा आवाज करत दाआजीची फटफटी आवारात आली . 
' बापू... इकडे ये मा .' दाआजीनं आवाज देल्ला . 
फटफटीवर दाआजीच्या मांगं येक पोरगा कायीतरी सामान घिवून बसला व्हता . परभ्यानं थ्या पोराजवरचे येक येक खोके घिवून मोठ्या सपरीत आनले . दोन मोठे खोके आन् दोन लहान खोके व्हते . दाआजीसंगं थो नवाडा पोरगा सपरीत आला . मायनं गरम पानी आंगधुनीत निऊन ठिवलं . दाआजी हातपाय धुवाले गेले . 
' काय हाये याच्यात ? ' परभ्यानं हरुच थ्या पोराले इचारलं .
' काम्पुटर हाये ...' थ्या पोरानं मनलं . 
' काय ? ' परभ्यानं अचंब्यानं मनलं . 
परभ्याचे दाआजी हातपाय पुसत सपरीत आले , तसाच परभ्या त्यायले जावून बिलंगला .
' तुमी काम्पुटर आनला ! ' परभ्यानं वरतं पाहात इचारलं . 
' हो... तुले पायजे व्हता नं.' दाआजीनं हरदमवानी त्याच्या केसातून बोटं फिरवत मनलं .
परभ्या तसाच रान्नीकडं पराला . माय ग्यासजवर कपात चाहा वतत व्हती . परभ्या पाठमोऱ्या मायले बिलंगला . 
' माय ऽ... माय... दाआजीनं काम्पुटर आनला.. लवकर चाल नं सपरीत .' परभ्यानं मायचा हात वढत मनलं .
' अरे... चाहा त गारु दे .. ह्या चाहा बाहिर निऊन दे.. मी येतो .' मायनं कवतिकानं मनलं .
परभ्यानं दाआजी आन् थ्या पोराले चाहा देल्ला आन् दाआजीच्या मांडीवर जावून बसला . 
' बापू... खाली उतर.. चाहा पिऊ दे नायी त सांडसुंड व्हयीन . ' मायनं परभ्याले मनलं .
' मी नायी जा...' परभ्यानं दाआजीले कप्पं पकडत मनलं .
दाआजीनं इस्याऱ्यानच मायले समजावलं .
' बापू तुह्या टेबलावरचं सामान उचल आंदी.... तिथं काम्पुटर लावाचा हाये .' दाआजीनं परभ्याचा लाड करत मनलं आन् चहाचा घोट घेतला . 
चटकन् उतरत परभ्यानं टेबलावरचं सारं सामान उचलून ठिवलं . थो पोरगा येकेक खोका उघडाले लागला . परभ्या त्याच्या जवरच उभा व्हता . थ्या पोरानं सारं सामान टेबलावर मांडलं आन् वायरं जोडाले लागला . परभ्या येकेक गोस्ट ध्यान दिवून पाहात व्हता . थ्या पोरानं येक वायर पलग मंदी लावाले सांगतलं . परभ्याचा काम्पुटर चालू झाला . थोड्या येळानं त्यानं तीन चार सीड्या परभ्याजवर देल्ल्या आन् बराबर ठिवाले सांगतलं . त्यानं परभ्याले कायी जोड जंतर आन् काम्पुटर चालवाचे मंतर सांगतले . मायनं आरती आनली . 
' तुमी करा पूंजा , मी ह्या पोराले सोडून येतो .' दाआजीनं हासत हासत मनलं .
परभ्या आन् मायनं पूंजा केली . गायीच्या टिनमन्याच्या आवाज आला. माय आंगनात गेली . बंडी बी आलती . तेवढ्यात सद्या आन् वस्या बी हाजर झाले . त्यायले कसं मालुम झालं त देव जाने !
' पानी घ्या जी उलिसं .' गड्यानं सपरीत येत मनलं .
' बाप्पा ! का आनलं गा बापू ?' गड्यानं परभ्याच्या टेबलाकडं पाहात इचारलं . 
' काम्पुटर व्हय ... आत्ताच आनला दाआजीनं ! ' परभ्यानं काम्पुटरकडं पाहातच मनलं . 
माय पानी घिवून आली . गायकी बी गाई बांधून आला . परभ्यानं साऱ्यायले काम्पुटर कसा चालते , थे दाखवलं .
' चाहा घ्या जी .' मायनं दोनी गड्यायले आवाज देल्ला . 
' आता बापू नायी आटपत ! ' गड्यानं चाहा पेता पेता मायले मनलं .
' आपला बापू हायेच हुस्यार ! ' गायक्यानं मनलं .
' तुमाले का समजते बे त्याच्यातलं .' गड्यानं सद्या आन् वस्याले मनलं .
' समजन न त्.. .. बापू सिकवते आमाले .' सद्यानं मनलं .
' बापू तुमाले सिकवन का आपला अभ्यास करन रे ...' गड्यानं दुधासाठी बालटी घेत मनलं . 
परभ्यानं मोबाईलच्या हाॅटस्पॉट वर काम्पुटर चालू केलता . टिचभर मोबाईल आन् दिड हात मॉनिटर ... परभ्या त हरखूनच गेलता ! परभ्याच्या मायनं तिघायसाठी तीन वाटीत बासुंदी आनून देल्ली . तीघयी माकोड्यासरखे काम्पुटरले चिपकले व्हते . 
' हे खाऊन घ्या रे पोर हो ..' मायनं त्यायले वाट्या देत मनलं आन् रान्नीत गेली .
परभ्याचे दाआजी आले . सद्या न वस्या घरी गेले .
' कापसाचा चुकारा भेटला आज . मनलं बापू साठी पह्यले काम्पुटर घिवून घ्याव . लय नांदा लावला व्हता न...' दाआजीनं जेवता जेवता मायले सांगतलं . 
' बरं केलं जी ... त्याले पायजेच व्हता मना तसा ..' मायनं गरम गरम पोळी वाढत मनलं .
परभ्या पट्कन जेवन करून उठला आन् काम्पुटर जवर येऊन बसला . 
आता काम्पुटरच परभ्याचा गुरजी झालता . सारे कलास , परिकस्या आता काम्पुटरवरच !
होते , नायी होत मनता मनता परभ्याची येक मह्यना लेट परिकस्या झाली . मांग पुढं व्हता व्हता येकडावचा निकाल लागला . 
परभ्या त्याच्या स्याळंतूनच नायी त तालुक्यातून पह्यला आलता . परभ्याचा पेपरात फटु आला . त्याच्या स्याळंच्या आन् कलासच्या बाहिर यी मोठ्ठ्या बोरडावर परभ्याचा फटु लागला व्हता . स्याळंत , गावात परभ्याचीच चरचा व्हती . परभ्याच्या मायले त का आन् कसं बोलाचं , हेच सुधरुन नायी रायलं व्हतं . मांगच्या साली कोरोनानं कोनताच सनतिवार ढंगानं केला नोता . पन् आता त परभ्याच्या घरी दसरा - दिवारीच व्हती . परभ्याच्या कवतिकात त्याचे मायबाप आपली तंगी , दुख दरद सारेच इसरुन गेलते . पुढच्या सिकस्यनासाठी त्यायले सल्ल्यावर सल्ले भेटून रायले व्हते . थे अरधे त सल्ल्यानच दांदरुन गेलते ..... ( क्रमशः ) 

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 
     

Friday, November 27, 2020

उम्मीद को कठान. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

उम्मीद को कठान
( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

घाटो पूंजे पाचवी ला
लागी मांगऽ लसटान
असो भूलाये चकवो
सपनो च दानोफान ।धृ।

भयी बरसाद असी
बसुली को च पठान
माती म च सप गयी
भरोसा की सोयाबीन ।१।

आंबिया का गा संतरा
वोला कोन उतारेन
माती मोल वको भाव
कोन खेत ला तारेन ।२।

पराटी ला वोले पानी
तीसो कारी को कठान
ठंडी को नहाय पत्तो
उदासे गा गोयठान ।३।

गोंडा पिवरा पिवरा
तूर मिरवस मान
गहू सोला की वरना
देस हिरवा को दान ।४।

धुयार क दुलयी म
रोगराई आवतन
खुलऽ अगास क खल
करू केतरो जतन ।५।

कास्तकारी की कमान
दुय फसल को बान
कब लागे निस्याना प
कब अंधारी खदान ।६।

आस की च कास्तकारी
उम्मीद को स कठान
डांड भरू गा केतरा
जागो जाग स गठान ।७।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Thursday, November 26, 2020

चहुंओर कृष्ण , मैं बिना चावल लिये सुदामा. Hindi language _ हिंदी भाषा

*चहुंओर कृष्ण , मैं बिना चावल लिये सुदामा* 

 *शिक्षा के लिये गांव के बाहर कदम रखते ही कारंजा के सखा मिला लेते है मुझ सुदामा को ' सांदीपनि ' गुरूकुल के समूह में* 

 *मैं रिक्त हाथ!... बटोर लेता हूं कुछ छांव के टुकड़े... कुछ धुप के अहसास , कुछ सृजन की बूंदें...* 

जब मैं पीछे मुडकर देखता हूं , तब जीवन में आये ; मानवीयता की परिभाषा बनकर -- रिश्तें- नातों की सुखद अनुभुति देने वाले व्यक्तित्व मेरे मानसपटल पर चित्र की भांति कोलाज बन कर उभर आते हैं। मेरे जनक , सहोदरों के लिये मैं सुदामा न रहकर ' कान्हा ' रूप रहता हूं। लेकिन जैसे ही दहलीज से पैर बाहर रखता हूं...समाज आंगन में ; मुश्किलें घेर लेती हैं... मैं हतप्रभ ; महाभारत के चक्रव्युह में फंसे अभिमन्यु की तरह ! ... तभी कानों में गुंजती है पांचजन्य की ध्वनि... कृष्ण आते हैं मुस्कुराते हुये... छंट जाती है धुंध..... सांसें भी नियंत्रित हो जाती हैं । मेरा ' कर्म' बताकर कृष्ण बजाते है जगतमोहिनी बांसुरी... मैं खो जाता हूं... समाहित हो जाता उस सूरसरिता में... कितनी आसान हो जाती है जिंदगी... मै एकांत में सोचता रहता हूं उन कृष्ण के बारे में -- जो कभी दिग्दर्शक , सखा , तीर्थस्वरूप अवतरित हो , मंगलमय कर जाते इस जीवन को.. गले लगाते मेरे जैसे सुदामा को बिना चावल लिये !
शिक्षा के लिये गांव के बाहर कदम रखते ही कारंजा के सखा राजेश काळबांडे , विजय मस्की , दिनेश महल्ले , भारती भांडवलकर मिला लेते है मुझ सुदामा को ' सांदीपनि ' गुरूकुल के समूह में. 
इंजिनियरिंग कॉलेज में प्रवेश के पहले दिन ही वहां के अकाउंटेंट मेरी ३५० रुपये की फीस खुद भरकर बन आते हैं कृष्ण ; मै चकित... व्यवहारिक ज्ञान से अपरिचित.। वहीं और गोप आते हैं जीवन में ; राजू बेले , सुनील बोकडे , महेंद्र सोनटक्के , संजय धोटे... मै गुम हो जाता हूं इस कोलाहल में.. राजू बेले वापिस ढूंढता है  ; बांध दोस्ती की अनंत डोर !
स्थापत्य अभियांत्रिकी का प्रात्यक्षिक अनुभव करता हूं। मनोजकुमार अग्रवाल जी के संग.. उन्हीं के फर्म में । वे कृष्ण बनकर बताते हैैं व्यवसाय और व्यवहार। गीता.व्यवसाय के कुरुक्षेत्र में सखा तो साथ है ; और एक जगह इंजि. दिलीप तिळगुळे बंधाते हैं ढांढस इस रण में कृष्ण बनकर।
बालसखा श्रावण फरकाड़े दिल में बोते हैं बीज समाज सेवा के।  तभी इंजि. मुरलीधर टेंभरे बढ़ाते हैं साहस ; घर से लेकर व्यवसाय तक तत्पर मदद लिये कृष्ण की भांति। स्व. कन्हैयालाल बोवाडे जी का सुदर्शनचक्र बढाता गया दायरा सेवा का।अग्रज वल्लभ जी डोंगरे का स्नेह उतरता गया मनमस्तिष्क और लेखणी में भी जन्मजन्मांतर से द्वैपायन की तरह। ' बलराम ' डहारे , ' बलवंत ' कडवेकर जी नाम के अनुरूप ही साफ करते गये मुसीबतों के बादल. ' युवा मंच ' के सखा , सखी , हितचिंतक बढ़ाते गये सुदामा का कारवाॅं। धार- मांडू दर्शन यात्रा में जगह जगह के संगठन और पदाधिकारी यजमान बनकर आगे आये इस गोकुल के।
रविंद्र दादा डोंगरदेव साहित्यिक हलचल के ऊर्जावान प्रगाढ सखा। अवशेष को शेष बनाने वाले भागीरथ डॉ ज्ञानेश्वर टेंभरेजी ने उंगली पकड़कर चलाया ; योगेश्वर बनकर. सखा का।  रा. चव्हाण ने लेखनी को निर्देशित किया वऱ्हाडी की ओर तो अंजली कारंजकर मॅडम ने लेखनी को दिया पूरा फलक. शुभदा फडणवीस मॅडम, सुनीती देव मॅडम , संजीवनी पावडे मॅडम का सरल स्नेह .. आशिष पाकर धन्य हुआ. 
उज्जैन से एक धागा मंगाने पर हनुमान की भांति द्रोणागिरि... मतलब धागों का बंडल ही लाने वाले सखा युवराज जी हिंगवे. रामलाल जी देशमुख का दुलार तो नामदेवराव जी बारंगे की आत्मियता. नामदेवराव बोबडे , रामेश्वर गोरे आत्मीय सखा। सरिता बोबड़े और विजय बोबड़े दम्पत्ति का स्नेह। मदद के लिये तत्पर युवा सखा नंदलाल बारंगे , अतुल राऊत, राजेश बारंगे , नीरज पवार , डॉ. उदय चौधरी, अजय डहारे , योगेश झाड़े, नितिन नायगांवकर, मनोज गोरे, संजय ढोले .....
मस्तमौला सखा विद्यानंद हुलके, देवेंद्र चौधरी, जगदीश्चंद्र पवार, सुभाष तुलसीता , सु.पु. अढाऊकर...
स्थानाभाव के कारण नाम नहीं लिख पा रहा हूं , लेकिन दिल में रहनेवाले सखा.. हितचिंतक इनकी लंबी फेहरिश्त...
मेरे सभी रिश्तेदार तो मेरी जान , मेरी पहचान.. उनके बिना जग सूना !
--- सभी कृष्ण , सखा , गोप अलग अलग क्षेत्र, परिवेश, विचार, भाषा, उम्र के !
कृष्ण के सखा सुदामा के पास मुठ्ठीभर ही सही चावल तो थे.... मैं रिक्त हाथ!... बटोर लेता हूं कुछ छांव के टुकड़े... कुछ धुप के अहसास , कुछ सृजन की बूंदें... कुछ याद के मोती , कुछ विचारों की बौछारें... कुछ सत्य- असत्य की दूरियाॅं , कुछ बुनते जाता सपनें... कुछ चुनते जाता वास्तव ! गढ़ता जाता कुछ गंतव्य के लिये सोपान... बढ़ता जाता क्षितिज की ओर ! 
लेकिन जब सिंहावलोकन करता ... पाता , अनेक हाथों का सहारा... मैं ; मैं नही रह जाता ... हरेक दायित्व की छोटी बड़ी ध्वजा कंधे पर लेकर उसमें मिटता जाता , जैसे खोडरबर (रबर) मिटाता है पेन्सिल के अक्षरों को.... दूर से केवल दिखते हैं रंगबिरंगी... छोटे बडे़ केतु... आकाश की  पृष्ठभूमि पर थोड़े धुंधले.... कुछ अस्पष्ट से.....
 *--- सुरेश महादेवराव देशमुख*

  (अद्भूत। मनोभावों से देशमुखजी कहीं से भी अभियांत्रिकी नहीं अपितु शुद्ध साहित्यिक लगते हैं। आपने जिस निपुणता से अपने सहपाठियों और सहराहगीरों के प्रति अपने शुद्ध सात्विक भाव अर्पित किए हैं निश्चित ही वे नमन योग्य है। मां सरस्वती आपकी लेखनी में ऐसे ही विराजमान रहकर नित नई ऊंचाइयां प्रदान करें। "सुखवाड़ा" से अपने मनोभावों को साझा कर आपने सुखवाड़ा के पाठकों को एक उच्चस्तरीय शुद्ध सात्विक भावों से परिचित कराया है।सादर।)
आपका *"सुखवाड़ा"* ई-दैनिक और मासिक भारत।

Tuesday, November 24, 2020

अजब गजब - ३६ : कंकाली माता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३६ : कंकाली माता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

माय कंकाली को नाव ल्या बराबर आमाला जगदेव परमार राजा की याद आवस . जगदेव राजा न आपलो मस्तक काटकन् माय कंकाली ला अरपन करेतो . वून क बलिदान कन् माय कंकाली परसन्न भयी आन् राजा जगदेव ला जितो कऱ्यो . राजस्थानी लोककथा म जगदेव परमार क नाव कन् परसिध्द जगदेवजी मालवा म लक्ष्म देव ( लक्षुमनदेव ) क नाव कन् परसिध्द भया . वून को राज इ.स. १०९५ पावतर रहे . 
आज माय कंकाली की अजब गजब कथा सांगुस . मध्यप्रदेस क रायसेन जिला म गुदावल क्षेत्र म माय कंकाली को देऊर स . माय कंकाली को देऊर भोपाल पासिन २० कि.मी. आन् रायसेन पासिन ३० कि.मी. दूर स . कंकाली माय क मूरती की गरदन ४५ ° टेढी स , ज्या साल भर म येक डाव दसरा क दिन सीधी होस , असी मान्यता स . 
मध्यप्रदेस को इ पह्यलो अस्टकोनी देऊर स . देऊर क १० हजार वर्ग फिट हॉल म येक बी पिलर नहाय . 
कंकाली माय को देऊर इ.स‌. १७३१ क आसपास बन्यो . गुदावल क हरलाल मेडा क सपना म कंकाली माय आयी . सपना क हिंद्यान कन् ज्यान खंदे वहान माय कंकाली की या परमार काल की मूरती सापडी . मूरती जमीन म दबीती , वोला खंदकन् निकारे , असी मान्यता स . ज्यान मूरती सापडी , वहान च वकी स्थापना करीस . 
जी बी भगत यहान बंधन बांधकन् मन्नत मांगस , वा पुरी होस असी मान्यता स . मन्नत / नवस पुरो भया बास्त बांधे ती बंधन खोल देस . 
संतान सुख साठी हजारों लोगना माय कंकाली को आसिरवाद लेन साठी यहान आवस . संतान सुख साठी बाईलोगना देऊर पर गोबर क उलटऽ हाथ की निस्यानी लगावस . आन् मनोकामना पुरी भया बाद सीधऽ हाथ को निस्यान लगावस . 
नवरातरी म यहान मोठो मेलो लागस . 
जय माय कंकाली ऽ......

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Monday, November 23, 2020

अजब गजब - ३५ : मंडोर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३५ : मंडोर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

राजस्थान क जोधपूर जिला म फलौंदी तहसील म नागोदरी नदी क काठ पर मंडोर स . मंडोर जोधपूर पासिन ९ कि.मी. दूर स . 
मंडोर ला माण्डवपुर , मांडव्यपुर , मांडव्याश्रम , मंडोदर बी कोस . येक जमाना मऽ मंडोर मारवाड की राजधानी होती . 
मंडोर मंडोरबाग आन् मंडोर क उलटा ( उरफाटा ) किल्ला साठी मसहूर स . 
मंडोर बाग म बारा यी काल घुमनवालऽ , देखनऽ वालऽ लोगना की भीड रव्हस . मंडोर बाग म वहान क राजाना की लय समाधी / छतरीना स . वून ला देवल कोस . बाग म नहर , महाल , फुयारा , रंगोरंगी का झाडपेड , बावडी , येकथम्बा महाल , चंडिका माय को देऊर आन् ' हाॅल आफ हिरोज ' स . येक मोठ्ठजात पास्यानी चट्टान पर १५ देवी देवता की मूरतीना कोरीस . 
मंडोर बाग क पासऽ ईस्यान दिस्या म  ' अहिशैल ' पहाडी प मंडोर को किल्लो स . कबऽ मारवाड की राजधानी रह्यो इ किल्लो आबऽ खस्ताहाल म स . कोनीला च वकी सुध नहाय . मंडोर किल्ला क वयभव की कथा खंडारा को येक येक दगुड सांगस . 

इतिहास : * मंडोर किल्लो पह्यलंपार ४ थ सदी म नागवंसी राजा न बांध्ये . नागवंस को राज कयी सदी पावतर रह्ये . यहान क खुदाई म विक्रम संवत ८९४ को सिलालेख सापड्येस . नागोदरी ( नागाद्री ) नदी , नागकुंड , नागादडी तलाव , अहिशैल पहाडी क नाव परिन नागवंस क राज को पतो चालस . 
* यहान मांडव्य रिसी को आसरम होतो तेकन येनऽ जागा को नाव ' मंडोर ' पड्ये , असी मान्यता स .
* मंडोर म नागवंस , गुप्त , प्रतिहार , परमार , चव्हान , राठौड वंस न राज करे . चुण्डाजी राठौड को बिह्या प्रतिहार राजकुमारी संग भयो . प्रतिहार राज्यानऽ दायजा म मंडोर जवाई ला देये . तब पासिन यहान राठौड वंस को राज रह्ये . 
* मंडोर की आनखी खास बात स . यहान रावन को ससरो राजा मन्द को राज होतो , असी मान्यता स . राजा मन्द की पोटी मंदोदरी ! वको बिह्या लंकापती रावन संग मंडोर म च भयेतो . मंडोर म दसरा ला रावन दहन नी होत . वहान रावन की पूंजा करस . 
* राव जोधा ला मंडोर राज करन क आन् लढाई क हिसाबकन् ठीक नी लाग्ये . वून न चिडिया कूट पहाड प मेहरानगढ आन् आपलऽ नाव कन् जोधपूर बसाड्ये . तब पासिन मंडोर का दिन फिऱ्या आन् हालत खस्ताहाल भयी . 
* करनल टाड यहान इ.स. १८१८ म आयोतो .
* इ.स. १८९० म महाराजा जसवंतसिंग न मंडोर क टुट्या फुट्या देऊर , महाल , समाधी ला सुधारे . 
# असो अजब गजब मंडोर आन् वहान को उलटो किल्लो ! 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Saturday, November 21, 2020

अजब गजब - ३४ : मेंढागड. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३४ : मेंढागड
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

वर्धा जिला क कारंजा तहसील म नारा - सावरडोह सडक प डाखऽ हाथ प ' मेंढागड ' इ येक रिठो गाव स . खडकी नदी काठ को मेंढागड आपरऽ पेट म इतिहास , सरधा आन् अचंबा ला लुकायकन् पहाड क रूप म उभो स . अगल बगल क नारा , आजनादेवी , सावरडोह , पाड्डी ( पारडी ) सुसुंद्रा , बेलगाव , रिधापूर ( रिठ ) , खराळा , खापरी , तरोडा , वाघोडा , काकडा परसोडी असा १५/१६ गाव प मेंढागड की नजर रव्हस . 
मेंढागड क मोठ्ठजात सिवार म दयतोबा , धनगवडी बुवा , सागाड्या देव बी स . 
मेंढागड क इतिहास आन् मेंढागड बाबा की सरधा को बुलावो येनऽ दिवारी म आयो . १७/११/२०२० तारीख ला मु , मनोज भाऊ गोरे आन् विरु भाऊ चोपडे कारंजा परिन मेंढागड साठी निकऱ्या . पह्यलऽ गया सावरडोह ला नानेसर जी धंडाडे ( ज्ञानेश्वर धंडाळे ) क घर . वून न आन् नाना बावाजी साळुंके न मेंढागड की महिमा सांगी . वासिन अमोल धंडाळे ला संगऽ लेयकन् मेंढागड ला रवाना भया . नारा - सावरडोह सडक परिन मेंढागड की पांदन लागी . पांदन कन् जंगल म गया . रस्ता प सांबर की लेंडीना जागा जागा पर बगरीती . सिवार म सांबर , डुक्कर , हरन , बांदराना को उबद्रो फसल को नास करस . जंगल मिन खडकी नदी जवर गया . नदी म रेती क जागा प गोल गोल गोटाना को सातरोच सातरो . दगड खलतऽ उलिसी रेती . आजन का मोठा मोठा झाडना... नदी क दुसरऽ थडी प चमत्कारी मेंढागड बाबा क देऊर को दरस्यन भयो . देऊर क पासऽ कारऽ पास्यान की पाच तल्ला क बिलडिंग जेतरी उभी ठड्डी ! देऊर क जेवनऽ हाथ प उभी ठड्डी म वरतऽ जान साठी पायरीना स . मेंढागड बाबा की पूंजापाती करी , आसिरवाद लेये आन् आमी चार झन मेंढागड प पायरीना कन् चेंग्या . पुरऽ सिवार म या उच्ची जागा स . वासिन १५/१६ गाव को सिवार दिसस . या उच्ची जागा वरतऽ सवान स . किल्लो , गढ , बस्ती साठी येकदम साजरी जागा . आपलऽ पूरवजना न सुरकस्या आन् राज क हिसाबकन् बराबर जागा निवडीती . खलतऽ पानी , वरतऽ सुरकस्या ! यहान इतऽ उतऽ दिसस इतिहास काल का खंडाराना... १५ /१६ गाव की रखवाली करतो मेंढागड आन् मेंढागड बाबा ! 
मेंढागड क चारी बाजू न भोयर समाज का गावना . मेंढागड क माथा पर कयी मकान का दगडी जोताना दिसस . नानऽ मोठऽ मकान का जोताच जोता ! मातामाय , मरामाय को ठानो आन् हनुमान जी , सिवलिंग , गनेस जी की मोठी मूरतीना , नांदतऽ मेंढागड की निस्यानी ! आबाद मेंढागड की कथा कहानी ! पटवारी रिकार्ड को रिठो मेंढागड . कबअ येनच मेंढागड न देये भोयर संस्कृति ला आसरो . खडकी नदी न पाजे ममता को पानी ... कार नदी क कोरा म फली फुली जिंदगानी ! मेंढागड क माथा परिन दिसस भोयर संस्कृति को आयनो . येक येक जोतो ... वकऽ येक येक दगुड म दिसस बिन लिखी इतिहास की कहानी . तलवार आन् नागर बखर की भयी होयेन यहान पूंजा घर घर म ... मंग बगऱ्या चारी कितऽ ... जंगल साफ करे.. खेती करी.. पर मेंढागड आन् मेंढागड बाबा साठी की सरधा मन म धरकन् च ! वा सरधा आब बी स . जेनऽ मेंढागड न रखवाली करी ... पाले पोसे , वोला पूंजस भोयर ! 
पर यहान कोनती केतरी लढाई भयी , कोनती महामारी - अकाल आयो , कसो कोनतो राजपाट पलट्यो , येको भेद सिरफ मेंढागड बाबा ला च ठाव स ! 
मेंढागड बाबा : * मेंढागड बाबा किल्लेदार होतो , राजो होतो , संत महात्मा होतो क अजून कोनी , येकी जानकारी नहाय . पर वून को स्थान चमत्कारी जरुर स . मेंढागड बाबा की मूरतीना स्वयंभू स . 
* पांढरो घोडो आन् वोपर पांढरी दाढी वाला मेंढागड बाबा क रूप को कयी लोगना ला साकस्यात आन् सपना म दरस्यन भयेस . पुरऽ तहसील म मेंढागड आन् मेंढागड बाबा को आस्कारो आन् वूसोच दरारो बी स . 
* सिधऽ मानुस साठी सिधा आन् टेढा साठी बखेडा , असी मेंढागड बाबा की मान्यता स . 
* मेंढागड बाबा को इतवार आन् बुधवार इ दिन स . चयीत मह्यना म हर इतवार आन् बुधवार ला मेंढागड बाबा की यातरा भरस . चयीत , बयस्याख म खडकी नदी को पानी आटस . तब सयपाक करनी वाला नदी म का गोटा रेती बाजू करकन् येक दुय फुट को भिरो / हिरो खंदस . वोमिन साफ उज्जर पानी आवस . वोमिन पानी भऱ्या बास्त थोडऽ बेरा म वू पानी गायब होस . दुसरो कोनी आयेन त वोला दुसरो भिरो खंदनो लागस . 
* नदी क झाड प आग्या मोह्यरजना स . पन सयपाक , पूंजापाती करनी वाला ला वूई तरास नी देत . पर धरम को रिवाज तोड्ये त् वूई सोडत नी , असी मान्यता स . 
* आखाडी , दसरो - दिवारी , पोह्यती असऽ हर तिवार ला लोगना मेढागड बाबा की पूंजा करस . कोनीक्यान बिह्या - वास्तुक आन् कोनतो बी काज होयेन त् वोकी पतरिका पह्यले मेंढागड बाबा ला चढावस . खेत फसल को काम होयेन , देस परदेस जान को होयेन त् पह्यले मेंढागड बाबा को आसिरवाद लेस . बयसाख म यहान महापरसाद रव्हस . 
* मेंढागड बाबा नवस / मन्नत ला पावस , असी लोगना की आस्था स . वहान खुकडा - बकरा की कंदुरी करस . मेंढागड बाबा पह्यलऽ उघडाच होता . जेला पूंजा करन की होयेन वूई चार डेरी - खाकरीना को मांडो डावत होता . आब वहान देऊर बनेस . 
दुरघटना : इ. स. २०१७ क मयी मह्यना म यहान नागपूर को उकल्ले कुटुंब कंदुरी साठी आयाता . संजय उकल्ले की लाडी नलिनि बोरी ( म्हरो गाव ) क चौधरी कुटुंब की . कंदुरी साठी बोरी आन् बडचिचोली ( पाठे ) का नातलग बी होता . नलिनी बाई मोबाईल प बोलत होती . तबच वहान इज पडी . नलिनी बाई को जागा पर च जीव गयो . बाकी लोगना ला दवाखाना म भरती करनु पडे . 
# मेंढागड ला साल भर लोगना पूंजापाती करन साठी जास . यातरा बी भरस . पर रस्ता आन् सुबिधा को अभाव स . 
# मेंढागड इतिहास को खजानो स पर सरकार आन् नेता लोगना ध्यान देयेन त वोको जतन होयेन . 
जय मेंढागड बाबा.... 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .

Friday, November 20, 2020

भोयरी संस्कृति - ३८ : गोंदन. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३८ : गोंदन
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

गोंदन ला गुदनो , गोदनो , ट्याटू , पछेना , अंकन असऽ नाव कन् बी वोरखस . आंग पर ( हात , बोट , मनगट , पाय , गरदन , दंड , पाठ , मुंडो ) चितरंग , चिन्ह , आकरूती काढन साठी चमडी प टोच कन् रंगवन की कला ला गोंदन कोस . 
गोंदन को चलन : गोंदन कला धारमिक जीवन , संस्कृति , कुल , रिवाज , परंपरा , सामाजिक मोल , मान्यता ,  फ्यासन असी कयी रूप म दिसस . गोंदन ला सिंगार , साजरपन , प्रेम , स्यील , बहादुरी को प्रतिक , हिंद्यान साठी बी काढस . 
जेनऽ काल म कला आन् कलाकार या संकल्पना च नी होती  , वोनऽ जमाना पासिन आदिवासी लोगना न कला आन् साजरपन को साजरी बानगी गोंदन कला क रूप म दुनिया ला देयीस . 
इतिहास : * वेद म गोंदन को उल्लेख नहाय . या आदिवासी कला बाद मऽ हिंदू संस्कृती म आयी . 
* ५३०० बरस पुरानऽ ' ओत्सी द आईस मॅन ' येनऽ आदिमानव क आंग पर ५७ गोंदन का चिन्ह सापड्यास . मिसर ( इजिप्त ) क ममी क आंग पर बी गोंदन दिख्येस . 
* बायबल , कुरान न गोंदन ला वरजिक मानेस . हिंदू संस्कृती न आदिवासी क गोंदन कला ला रिवाज म डाये . 
* छत्तिसगढ म रामनामी समाज आंगभर रामनाम गोंदस . या परंपरा १०० बरस पासिन स . 
* गोंदन की चाल भेव आन् सरधा पासिन पडी . भूतखेत  , बिचुकाटा - जनावर , देवता क नाराजी पासिन गोंदन रखवाली करस , या भावना होती . बाद मऽ कुर कबिला का चिन्ह आया . वोकऽ बाद सिंगार , हिंद्यान साठी गोंदनो आयो . आब त फ्यासन स ! आब ट्याटू ( tattoo ) काढकन्  # inked असो ट्याग बापरकन् Instagram पर डावस ! 
* कपडा पेहरन ला सुरवात होन क पह्यले पासिन गोंदन ला सुरवात भयी . 

मान्यता : * आदिवासी गह्यना परस गोंदन ला महत्व देस .
* आंग पर गोंदे रह्ये त सर्ग म जागा भेटस , असी मान्यता स .
* आदिवासी आपलऽ कुर को चिन्ह गोंदस . गोंदन को चिन्ह देख्या बास्त देखनी वाला ला आपरंग च वोकी जात , कबिला की जानकारी होस . 
* गोंदन क बेरा पोरग्यो गोंदन को दुख , अगिन सह्यन नी करत होयेन , त वू पोरग्यो लढाई क काम म नी आयेन . आन् पोटी ला गोंदन की तकलिफ सह्यन नी होत होयेन त वोला बारतपन म तकलिफ जायेन , असी मान्यता स . 
_ भारत म गोंदन क रंग साठी बाई को दूध / कारला को रस , खान को तेल , काजर , बिवला झाड को रंग असा कयी परकार का रंग बापरस . चमडी का सात थर रव्हस . वोमऽ क वरतऽ क तीन थर गोंदन को रंग जास . कारो , निरो , हिवरो , लाल रंग गोंदन म जास्त दिसस . 
पह्यले आदिवासी बाईलोग ना गोंदन को काम करत होती . आब गोंदन करनी वाला लय कलाकार भेटस . पुरानऽ जमाना मऽ गोंदन क बेरा पोटी बाटीना रोवत होती . तब गोंदनी वाली आदिवासी बाईलोगना वून ला समजावन साठी गाना गावत होती . 
भोयरी संस्कृति मऽ बाईलोग , पोटीना थोडोबूत गोंदस . 
* जलमभर सवासिन रह्या पायजेन येक साठी माथा पर कुकू क जागा पर नानोसो टिक्को गोंदस .
* जेवनऽ हात क मनगट पर तरहात कितऽ भाऊबीज गोंदस . येक चंदर कोर आन् वरतऽ खलतऽ येकेक बिंदी असो भाऊबीज को चिन्ह रव्हस .
* जेवन हात क अंदर वाली जागा ( मनगट पासिन ढोपर पावतर ) प भावली ( बाहुली ) गोंदस . मंझार म येकच मुंडो आन् दुय आंगऽ चिन्ह रव्हस . 
* डाखऽ हात क अंदर वाली जागा ( मनगट पासिन ढोपर पावतर ) प सीता नहानी गोंदस . मंझार म गोल भिर आन् चारी बाजू पायरी की डिझाईन असो भूमिती सरखो चिन्ह रव्हस . 
* डाखऽ हाथ क पंजा पर आंगठा कितऽ बिचू , चिल्हंगठी कितऽ चार नानी रेघना ( जेला गहू कोस ) आनं मंझार म फुल क डिझाईन वाली भिर गोंदस . मंझार की बिंदी ठोकर आन् वोकऽ भवताल साहा बिंदीना , असी भिर की डिझाईन रव्हस . 
* गोंदन क बेरा दुखसच . अगिन होस . गोंद्या बाद वोपर येरंडी को तेल आन् हरद को लेप लगावस . 
_ असी गोंदन की अदभूत कारागीरी आन् बदलतऽ जमाना संग वोको बदलतो रूप रंग !
# येक छत्तिसगढी लोकगीत ----
तोर नाव के गोंदणा गोंदाएव ,
मारे मया के चिन्हारी बर ,
अब्बडमया तोला करभव , 
मया पिरत के फुलबारी बर , 
गोंदाफुल करू हमर मया , 
फुलत रहय मया के बगिया मऽ . 

# लागं वतरा खणाई पणन कमी कोनी धणाई  (खूब गोंदाये पर बाटी नी )
# तोर नाव को गोंदन , डाखऽ हाथ प मिरवून .
# नांद कन् आयी पर गोंद कन् नी आयी .



लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Friday, November 13, 2020

डोयरा ( भोयर संस्कृति _ भोयरी बोली )

गायगोंधन क दिन आन् पंचमी पावतर भोयरी संस्कृति म डावस ती डोयरा

डोयराना म हासी मज्याक , चिडवन की बात च जास्त रव्हस . 
होऽऽ .... असो बोल्या बास्त बजावनी वाला बजावन को थांबाडस . आन् डोयरो डायकन् भया पर वापिस बजावन ला लागस...

१. कारो कारो खेत , खेत म लगायो दादा ऊसऽ....
दस रुप्या निकरत नी , पटिल मोठो दादा कंजूस ऽ....होऽ...
२. कारी रे कुतरी..कारी रे कुतरी , वोपर डायी झूऽल....
म्हथारपनऽ लेकरु भयो दादा , चमेली को फुल ऽ....हो ऽ..
३. खोबरा को डोल भाऊ , दादा खोबरा की बाटी ऽ...
( नाव ) पटिल की बेटा बेटी गा भाऊ , खास तूप रोटी ऽ...हो ऽ...
४. पाट्या को रे पारनो ऽ...आजी पाट्या को पारनो ऽ...
वोमऽ लगायी गा काच...
मोठऽ बाडा की आरती आयी बापू , अगर बगर नाचऽ... होऽ...
५. टाको रे टाको दादा.., सिमिट को टाको ऽ...
वोमऽ भरे पानी ऽ....
सेम्बर रुप्या की नोट नी निकरत..
कसी होयेन जिंदगानी ऽ.....होऽ...
६. सात तस्मा की माडी बांधीस , मालकीन तरी रोस...
बारा मह्यना म फानकी आवस , धड धड छाती होस ऽ... होऽ....
७. इथिन बी काटा न् उथिन बी काटा , मंझार मिन पड्यो रस्तो ऽ...
आपलऽ घर को मह्यंगो दिसस , आन् दुसरा घर को सस्तो ऽ....होऽ...

संकलन : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, November 12, 2020

अजब गजब - ३३ : गोबर गनेस. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३३ : गोबर गनेस

Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

गोबर गनेस बाचकन् तुमाला वाटे होयेन क इ त विसेसन स . पर मुनऽ विसेसन नी लिखेस.. या बात स अजब गजब गोबर गनेस भगवान क देऊर की !!! मध्यप्रदेस क आगर मालवा जिला को नलखेडा गाव . राजा नल की नगरी नलखेडा म महाभारत काल को पीतांबरा सिध्दपीठ माय बगलामुखी क देऊर कन् नलखेडा देस भर म परसिध्द स . नलखेडा क बीच चवरस्ता प गनेस दरुजा जवर गनेस मंदिर म पुरानऽ जमाना की १० फिट उच्ची गोबर कन् बनी भगवान गनपति की मूरती स . स न अचंबा वाली बात ! दगुड की , संगमरमर की , धातू की , लकडी की मूरतीना त देखी होयेन पन् गोबर कन् बनी या गनेस जी की मूरती पुरी दुनिया म येकच स ! 
५०० बरस पुरानी येनऽ मूरती क संगच दुय आंगऽ रिध्दि सिध्दि आन् पाय जवर उंदरो स . भगवान गनेस जी कमल क फुल प बस्यास . गनेस जी क हर सिरी रूप सरखी च येनऽ मूरती क हात म लाडू स . 
या गोबर कन् बनायी भगवान गनेस जी की मूरती कोनऽ बसाडीस , यकी जानकारी कोनी ला च ठाव नहाय . 
गोबर कन् बन्या इ भगवान गनेस जी आपलऽ कोनतऽ बी भक्त ला निरास नी करत , असी मान्यता स . 
गनेस जी की पुरानी आन् परसिध्द मूरती क कारन राज्य सरकार न येनऽ देऊर ला धारमिक स्थान सामिल करेस . 
साल भर भक्त लोगना दरस्यन साठी यहान आवस . पर गनेस चतुरथी पासिन धा दिन त भक्त लोगना की दरस्यन साठी खूब च भीड रव्हस . येन दिन भगवान गनेस जी को अलग तरीका कन् सिंगार करस , जेला देख कन् मन परसन्न होय जास . 
गोबर आन् माती म पंचतत्व आन् लक्षुमी को वास रव्हस , असी मान्यता स . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, November 11, 2020

अजब गजब - ३२ : चांदपुर गढी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३२ : चांदपुर गढी
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उत्तराखंड क मुख्य गढ म को येक चांदपुर गढ स . चमोली जिला क चांदपुर भाग म ' आदिबदरी ' क परसिध्द देऊर पासिन ३ कि.मी. प येक पहाड प चांदपुर गढ स . पायथा जवर चांदपुर गाव स . पहाडी प १.५ येकट म चांदपुर गढी फयलीस . येकदम वरतऽ खूब मोठो फाडी को चबुतरो स . गढी को खंडारो आन् येक देऊर स . चांदपुर की आटागाड नदी गढी क पहाडी ला अरधी ( १८०° ) घेरकन् आघऽ जास . गढी क दिवाल प कयी चितरंग आन् देवी देवता की मूरतीना स . जमीन पर वहान क चट्टान ला काटकन च पानी की नालीना बनायीस . गढी क चवडी दिवाल म खिडकीना बनीस . अंदरीन वा ३ वर्ग फिट पन् बाह्येरीन १/२ वर्ग फिट की च स. तेकन येमीन बाहिरवालो आव नी सकस  पन् अंदरवाला ला बाहिर को सबन दिसस . 

इतिहास : * गढी प येक मोठऽ भीर का अवसेस स . भीर मिन नदी पावतर येक भूयार होती , जेमिन नदी को पानी गढी पर आनत होता , असी मान्यता स . 
* इ. स. ८८८ म धारा नगर सिन गढवाल आया राजकुमार कनक पाल को बिह्या गढवाल क राजा भानुपरताप की नानी पोटी सिन भयो . गढवाल क परमार राजवंस को कनकपाल ला मूल पुरुस मानस . कनकपाल ला चांदपुर को राज बी भेटे . कनकपाल को ३७ वो वंसज अजयपाल होतो . राजा अजयपाल न गढवाल क नानऽ नानऽ गढना ला जीत कन् गढवाल राज की स्थापना करी आन् देवलगढ क जागा पर इ.स. १५१७ म सिरीनगर ला आपली राजधानी बनायी . चांदपुर परीन देवलगढ जान की तारीख मालूम नहाय पर चांदपुर गढ ला कयी सदी पावतर  उत्तराखंड क इतिहास म खास जागा भेटत होती . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Tuesday, November 10, 2020

अजब गजब - ३१ : भानगढ की भानगड. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३१ : भानगढ़ की भानगड
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
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राजस्थान म अलवर जिला क अरावली पहाडी म सरिस्का अभयारन्य क हद पर ' भानगढ़ ' स . भानगढ जवर गोला गाव स . भानगढ पहाडी क ढलान पर स . वोकऽ आघऽ तलाव स . 
भानगढ किल्लो भेव लागन जोगती स . यहान भूत पिसाच्च , आतमा रव्हस , असी लोगना की धारना स . वसाड पडे येनऽ किल्ला म दिनबुड्या बाद कोनी थांबत नी . भानगढ क रस्ता प दुय आंग दुय मजली दुकान का खंडारा स . 
इतिहास : * इ.स. १५७३ म आमेर का राजा भगवत दास न भानगढ ला आपलऽ नानो पोरग्यो माधो सिंग साठी बनायतो . माधो सिंग वहान इ.स. १६१३ ला रव्हन ला गये . 
* माधो सिंग न वहान रव्हनी वालऽ बाला नाथ नाव साधू ला बिचारकन् येला बांधेतो . साधू बाबा की की येकच अट होती क किल्ला की सावली ( छाया ) वोकऽ घर प नी पड्या पाह्यजे . माधो सिंग क वंसज न किल्ला ला अजून उच्ची करे . जेकन वोकी सावली साधू बाबा क घर प पडी . तब साधू बाबा न सराप देये आन् भानगढ किल्लो बरबाद भये... उजड गयो . 
* दुसरी बात बी अजब गजब च स . भानगढ किल्ला की राजकुमारी रतनावती  देखन ला घाडी च चांगली रूपवान होती . जवर च रव्हनी वालऽ तांतरिक सिंधिया सेवडा को राजकुमारी प मन बसे . वोनऽ आपलऽ जादू टोना कन् राजकुमारी ला वस म करन की बात सोची . वोनऽ तेल ला मंतऱ्यो . जब राजकुमारी की सोबतीन वोकऽ साठी तेल लेन ला हाट म आयी तब तांतरिक न जादू टोना वालो तेल वोला देये . वापिस आवता आवता वा तेल सिसी खलतऽ पडकन फुटी . जेनऽ चट्टान प वा सिसी फुटी , वा जादू क तेल कन् फुटी आन् घसरन ला लागी . वोनऽ चट्टान क खलतऽ तांतरिक चेप्यो . मरन क पह्यले वोन भानगढ ला सराप दे क यहान कोनी च नी रह्येन ... भानगढ वसाड पडेन..! 
* येन घटना क बाद अजबगढ संग क लढाई म भानगढ हाऱ्यो . बाद म इ.स. १७२० म जयपूर क महाराजा सवाई जय सिंग न वून ला मार कन् भानगढ पर कब्जो करे . इ.स. १७८३ म यहान अकाल पडे आन् पुरो भानगढ उजड गयो . 
* येक मान्यता कऽ अनुसार भानगढ मान सिंग ( पह्यलो ) न आपलऽ नानो भाई माधो सिंग साठी बनायतो . किल्ला को नाव आपलऽ दाआजी ( भान सिंग ) क नाव पर ' भानगढ़ ' ठेये . तब माधो सिंग अकबर क फवूज म जनरल पद प होतों . 
देऊर : भानगढ म भगवान सोमेस्वर , गोपीनाथ , मंगला देवी आन् केसव राय को देऊर स . आब सोमेस्वर क देऊर म वोन च सिंधु सेवडा तांतरिक का वंसज पूंजा पाठ करस . 

# असी अजब गजब भानगड स भानगढ़ की..!!!
पधारो म्हारे देस....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .

Monday, November 9, 2020

अजब गजब - ३० : ईडाना माता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ३० : ईडाना माता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
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राजस्थान क उदयपुर पासिन ६० कि.मी. दूर कुराबड - बम्बोरा रस्ता पर अरावली की पहाडी म मेवाड को मुख्य स्यक्तिपीठ ईडाना माता को दरबार स . राजपूत समाज आन् पुरऽ मेवाड की ईडाना माय आराध्य स . यहान भक्त लोगना मन्नत ( नवस ) पुरी भया पर तिरसूल चढावस . संतान की मन्नत पुरी भया पर भक्त लोगना झुलो ( पारनो ) चढावस . लकवा की बिमारी ठीक भया पर चांदी नी त् लकडी कन् बनायो ती आंग को भाग चढावस . 
मूरती को इतिहास यहान क पुजारी ला बी ठाव नहाय . कयी बरस पह्यले यहान कोनी सिध्द बाबा तप करत होता . बाद मऽ लोग आवन ला लाग्या . 
ईडाना माय को दरस्यन २४ घंटा खुलो रव्हस . लकवा क बिमारी वाला रात म माय क आघऽ चवूक म सोवस . दुय नवरातरी म त यहान भारी भीड रव्हस . 
अग्निनहान : ईडाना माय की मूरती मह्यना म दुय तीन डाव जागरूत होस आन् आग कन् आंग धोवस . येनऽ उबारा म माय ला चढायी वा चुनरीना , धागा भसम होस . असा चमत्कारी अग्निनहान क कारन यहान माय को देऊर नी बने . आब पावतर या आग कसी लागस , येकी मालुमात कोनी ला च नहाय . जसी लोगना ला खबर लागस , बातच ईडाना माय को अग्निनहान देखन साठी भीड जमा होस . 
ईडाना माय को पुजारी सांगस क ईडाना माय पर जास्त बोझो भयो त माय खुदच ज्वालादेवी को रूप धारन करस . या आग हरु हरु खूब मोठीजात होय जास . येकी लपटना २० - २० फिट उठस . पर येक बात अऊर खास स क येन आग कन् माय को सिरफ सिंगार च जरस . बाकी चीज ला जरासी बी आस नी लागत . तेकन भक्त लोग येनऽ आग ला माय को ' अग्निनहान ' कोस . जी बी येनऽ आग का दरस्यन करस , वून की सबन इच्छा पूरी होस , असी मान्यता स . 
आस्था आन् चमत्कार की देवी ईडाना माय को ' ईडाना ' नाव उदयपुर मेवल की महारानी क नावकन् परसिध्द भये . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Saturday, November 7, 2020

दोस्त दिवा की गा बाती ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

दोस्त दिवा की गा बाती
( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

म्हरा दोस्तना सोबती
गाऊ केतरी महती
मोठ पन म आसरो
नान पन का खबती ।धृ।

घरबार नातगोत
दिठ लागन जोगती
अडी अडचन आये
धाये जीव का सोबती ।१।

नानऽ मोठऽ उमर का
हम उमर बी साथी
गोड टिखट खारट
कोनी चिटी कोनी हाथी ।२।

कब रुसे रागो भरे
जीवलग संगी साथी
दुय स्यबद को फेर
मन भर धूरमाती ।३।

कट्टी दो को खेल न्यारो
मन सम् जावन साठी
आब रुस्या आब मिऱ्या
चमकस गारगोटी ।४।

जिंदगानी को आयनो
दिखाडस गा सोबती
नातगोत गुताडा म
नाय दोस्त बिना गती ।५।

खावो केतो पकवान
लोन कन् सजे थाटी
सुखदुख क अलोनी
चव आनस सोबती ।६।

नातगोत धरम का
दोस्त करम की नीती
करो केतो बी दांगडो
कुडी की आखर माती ।७।

जल्म्या बास्त झुगझुग
जरे जीवन की जोती
मायबाप गोत तेल
दोस्त दिवा की गा बाती ।८।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

अजब गजब - २९ : हिंगलाज गढ. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २९ : हिंगलाज गढ
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

हिंगलाज गढ मध्यप्रदेस क पसचिम मालवा क मन्दसौर जिला म भानपुरा तहसील म स . ११ वी सदी म परमार राजाना न मन्दसौर पासिन १६५ कि.मी. आन् भानपुरा पासिन २६ कि.मी. दूर येनऽ अदभूत गड ला बनाये . 
हिंगलाज गढ मध्यप्रदेस आन् राजस्थान क हद जवर स . 
हिंगलाज गढ ८०० बरस पावतर मूरती कला को केंद्र रह्ये . किल्ला म सापडी वा मूरतीना गुप्त आन् परमार काल की स . यान सापडीस मूरतीना म सबसिन पुरानी मूरती १६०० बरस पुरानी स . 
यासीन नंदी आन् उमा - महेस्वर की मूरती फ्रांस आन् वासिंगटन म भये ' इंडिया फेस्टीवल ' पठायती . 
इतिहास : * भानपुरा तहसील क नावली गाव म पहाडी प बन्यो हिंगलाज गढ को इतिहास लय पुरानो स . गढ म सापड्या सिलालेख यहान को पुरो इतिहास सांगस . पुरानऽ जमाना मऽ चित्तौड पर राज करनी वाली तक / तक्षक जाती को सम्बध मोरी जात संग होतो . परमार येनच मोरी जात का वंसज होय , असी मान्यता स . परमार काल म हिंगलाज गढ लढाई क हिसाबकन् खूब काम को होतो , तेकन परमार राजाना न येला मजबूत बनाये . 
* इ.स. १२८१ म हाडा राजा न येपर कब्जो करे . बाद मऽ इ गढ चंदरावत राजा को भये . 
* इ. स. १७७३ म महारानी अहिल्याबाई होलकर न लछमन सिंग चंदरावत ला हाराये . होलकर काल म यहान क हिंगलाज माता मंदिर , राम मंदिर , सिव मंदिर ला सुधारकन् साजरा बनाया . 
* हिंगलाज गढ म पाटन पोल , सूरज पोल , कटरा पोल आन् मंडलेस्वरी पोल क नाव का चार दरुजा स . पह्यला तीन सूर्व्यमुखी आन् चवथो पसचिम मुखी स .
* गढ प पानी साठी सूरजकुंड स . 
* परमार काल म इ गढ खूब नावाजेतो आन् मूरती कला खूब वयभवस्याली होती . 
* राज क लढाई म इ.स. १५२० पासिन इ.स. १७७२ पावतर इ गढ निरवासित राजाना की राजधानी रह्यो .
* गढ क भवताल घोडा क नाल सरखी ३०० फिट गह्यरी खाई स .
* हिंगलाज गढ पह्यले पासून को स्यक्तिपीठ स . यहान कयी देवीना की मूरतीना सापडीस . पर वोमऽ ' गवरी ( गौरी ) ' की मूरतीना जास्त स . 
* हिंगलाज गढ परमार वास्तु कला को बेजोड नमुनो स .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .

Friday, November 6, 2020

अजब गजब - २८ : भादवा माता धाम. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २८ : भादवा माता धाम
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्यप्रदेस क निमच पासिन १८ कि.मी. दूर ' भादवा माता धाम ' को चमत्कारी उपचार तीरथ स्थान स . पांढरऽ संगमरमर क स्यानदार देऊर म महामाया भादवा माता बिराजित स . चांदी क आसन प माय की मूरती स . आसन क आधार म नव दुरगा की मूरतीना दिसस . यहान आवनी वाला बिमार लोग , निरोगी होयकन् वापस आवस . भादवा माय क दरस्यन कन् सबन दुख को नास होस , आन् मन म भक्तिभाव जागरूत होस . देऊर म माता की अखंड जोत जर रहीस . भादवा माता धाम ला लकवा , कोढ , अंधरा भया लोगना साल भर आवस आन् सुदा होयकन् जास . 

मान्यता : * भादवा माय रात म देऊर मिसिन निकरकन् बाहिर फिरस . बाहिर घुमन क बेरा जेपर माय की किरपा होस , वकी बिमारी खतम होस , असी मान्यता स . 
* देऊर क आघऽ बावडी स . यहान को पानी पवितर गंगा जल सरखो च स . यी कुंड माय न खुद बनाये . बावडी क पानी कन् आंग धोये त बिमारी खतम होस . लोगना की बिमारी दूर करन साठी भादवा माय न येमिन पानी काढेतो , असी मान्यता स . 
* जिन ला बिमारी पासिन आराम लागस वूई देऊर म खुकडो , बकरो दान करस . माय क आरती क बेरा मानुसना संग च वूई खुकडा , बकरा बी असा उभा रव्हस , जसा वूई बी आरती कर रह्यास , असोच लागस . 
* कोनी कोनी भक्त आपली मुराद पुरी भया पर सोना , चांदी को डोरो बी चढावस .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Thursday, November 5, 2020

अजब गजब - २७ : दुरगा माता , गडियाघाट. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २७ : दुरगा माता , गडियाघाट
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्यप्रदेस मालवा क सुजालपूर जिला की नलखेडा तहसील म , नलखेडा पासिन १५ कि.मी. दूर गडियाघाट गाव स. गडियाघाट गाव म कालीसिंध नदी क काठ प दुरगा माय को देऊर स . यहान की दुरगा माय को चमत्कार , सत अचंबा वालो च स . दुनिया म दिवा तेल / तूप कन् जरस पन् गडियाघाट क दुरगा माय की महिमा अजब गजब स ! यहान दुरगा माय को दिवो जरस पानी कन् ! स न अचंबा वाली बात ?....
गडियाघाट क दुरगा माय देऊर की कालीसिंध नदी क पानी कन् अखंड जोत जर रहीस . 

१ . इतिहास आन् मान्यता : * दुरगा माय का पुजारी ' सिध्दूसिंग सोंधिया ' नानपन पासिन च माय क सेवा म स . कयी दिन पह्यले दुरगा माय वून क सपना म आयी . आन कह्ये क् , आज पासिन पानी कन् दिवा बारो . पुजारी जी ला नवल वाटे . वून न माय क दिवा म कालीसिंध नदी को पानी डाये . अचंबा वाली बात भयी... दिवो पह्यल ऽ सरखो च जरन ला लागे . गाव वाला को येनऽ चमत्कार पर भरोसो नी बसे . वून न खुद पानी डायकन् देखे त नवल च भयो जी..!! दिवो रोज क सरखो च जरन ला लागे . 
* रोज बरसाद पावतर माय क दिवा म कालीसिंध नदी को पानी डावस . बरसाद पावतर च काहे ?? येको बी कारन अचंबा वालो च स ! बरसाद म दुरगा माय को इ चमत्कारी देऊर पानी म डुब जास !!! 
स न दुरगा माय क चमत्कार की अजब गजब गोस्ट !!!
जय दुरगा माय की ऽ ऽ ऽ......

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Wednesday, November 4, 2020

अजब गजब - २६ : माय हरसिध्दि , बीजा नगरी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २६ : माय हरसिध्दि मंदिर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्यप्रदेस म पग पग प कयी धारमिक मान्यता आन् चमत्कार वाला मंदिर स . मध्यप्रदेस म आगर मालवा जिला क बीजानगरी म असोच माय हरसिध्दि को चमत्कारी देऊर स . यहान दुय हजार बरस पासिन अखंड जोत जर रहीस . येनऽ देऊर ला उज्जयनी समराट विक्रमादित्य को भासो विजय सिंग न बनायेस . आगर मालवा पासिन बीजा नगरी २० कि.मी. दूर स . 
१. इतिहास आन् मान्यता : समराट विक्रमादित्य को भासो विजय सिंग माय हरसिध्दि को मोठो भगत होतो . जब विजय सिंग राजो होतो तब वूई रोज उज्जयनी ला माय हरसिध्दि क दरस्यन साठी जात होता . दरस्यन भया बास्तच वूई जेवत होता . वून की भक्ति देखकन् माय हरसिध्दि परसन्न भयी . माय हरसिध्दि न सपना म राजा ला दरस्यन देयकन् कह्ये क् , तुमी बीजा नगरी म म्हरो देऊर बनावो आन् वोकऽ दरुजा ला सूर्व्यमुखी धरो . राजा न वूसोच करे . बाद म माय हरसिध्दि राजा विजय सिंग क सपना म आयी आन् कह्ये क् , तुमारऽ बनायऽ देऊर म मु बिराजमान भयीस . तुमी न जी दरुजो सूर्व्यमुखी बनायतो वू पसचिम मुखी भयेस . राजो सकारीच उठकन् देऊर म गयो त का देखस ! देऊर को दरुजो खरच पसचिम म भयोतो . 
* साल भर यहान भक्तलोग की भीड रव्हस . नवरातरी ला त लाखों लोगना दरस्यन साठी आवस . माय क दरबार म हर मन्नत पुरी होस . जी भक्त नवस बोलस , वूई देऊर प गोबरकन् उलटो सस्तिक काढस . आन् नवस ( मन्नत ) पुरो भया बास्त सीधो सस्तिक काढस .
* माय हरसिध्दि सकारी नानोपन , दुफारकन् जवानी आन् दिनबुड्या बुजरूक क रूप म नजर आवस . 
* माय हरसिध्दि की दुय हजार बरस पासिन जर रहीस वा अखंड जोत हवा कन् नी बुझत . 
* नवरातरी म घट स्थापना पासिन अस्टमी पावतर यहान नारेल नी फोडत . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, November 3, 2020

रुत मातला मातला ( वऱ्हाडी कविता )

रुत मातला मातला
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली भाषा

रुत मातला मातला
उतमातला कोपला
रुते कायजात काटा
उभा संसार पेटला ।धृ।

घाती पेरणीच्या भाऊ
माह्या कापूस खपला
माल बेपाऱ्याचं सोनं
माह्या मातीमोलातला ।१।

स्याया कालेज यी बंद
सिकस्यनाचा घपला
डवंडरते गा पोट्टे
तुमी किती बी हाकला ।२।
केलं करजं काढून
पेरनीचा झोलझाल्या
रदवलं गा पान्यानं
यम देवाचाच हल्या ।३।

सोयाबीन कुईजली
येचा कापसाचा गेला
सोन्यावानी फसलीचा
कसा सत्यानास केला ।४।

गरसोरी इकूनच
मोबाईल ह्या आनला
पोट्टे गुतले त्याच्यात
खेव घराले आनला ।५।

धीर ठेवाचा गा किती
जीव आदमुस्या आला
कोन्या जलमाचं पाप
भोग नसीबाले आला ।६।

वर चंदर माडीचा
त्याले कोनं भुलवला
भुलाबाईच्या गान्यात
फुल दुखाचा ओयला ।७।

किती सुख लपवतं
खिरापती आता खोला
गडीसाकरीचा खडा
असा कसा उबजला ।८।

नाही जीव रे आंगात
इरे मनाचा यी ढेला
डोये लागले झुरनी
जीव मातीत सपला ।९।

येड्याबांगड्याची सेवा
निवद रे गोपालकाला
आता लक्षुमी रूसली
सन दिवायीचा आला ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Sunday, November 1, 2020

अजब गजब - २५ : टेकरी धाम , देवास bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - २५ : टेकरी धाम , देवास
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्यप्रदेस क देवास को माता कि ५२ स्यक्तिपीठ म को येक स्यक्तिपीठ ' टेकरी धाम ' परसिध्द स . इंदौर पासिन ३४ कि.मी. प देवास म इ स्यक्तिपीठ स . उच्ची पहाडी पर को माता को इ भवन देसभर म परसिध्द स . अजब गजब बात असी क यहान दुय देवीमाता को दरबार स . यहान क अनोखऽ दरबार म माय तुरजा भवानी आन् माय चामुंडा देवी बिराजमान स . येनऽ धाम ला ' टेकरी ' क नाव कन् वरखस . माता तुरजा भवानी ला मोठी माय आन् चामुंडा देवी ला नानी माय कोस . माय क देऊर म जान साठी ४१० पायरीना चेंगनो पडस . देऊर म जान साठी पक्की सडक आन् रोप - वे को झुलो बी स . 

१. इतिहास आन् मान्यता : * माय तुरजा भवानी आन् चंडिका माय म बहिन को नातो होतो . दुयी झनी संगमंग च रव्हत होती . येक डाव वून म झगडो भयो . झगडो येतरो बाहाडे क दुयी मायना आपापरो स्थान सोडकन् जान ला लागी . मोठी माय पाताल म आन् नानी माय टेकरी सिन जान ला लागी . वून को रागतम देखकन् वून का संगी हनुमान जी आन् भैरोबाबा न घुस्सो सोडकन् यहान च थांबन ला बिनती करी . दुयी मायना थांबी , पर मोठी माय अरधी पाताल म गयीती आन् नानी माय टेकरी सिन उतर रयीती . दुय मायना वोनच रूप म बिराजमान भयी . 
* पुरान कऽ अनुसार यहान सतिमाता को रगत सांडेतो , तेकन यहान चामुंडा माय परगट भयी . तुरजा भवानी की थापना मराठी राजपरिवार होलकर न करीस .
* इतिहास क जानकारी क अनुसार चामुंडा माय की मूरती चट्टान ला सिलकन् घडायीस . या मूरती परमार काल की स .
* टेकरी प येक गुफा बी स . या गुफा देवास पासिन उज्जैन क भरतुहरी गुफा पावतर जास , असी मान्यता स . येनऽ गुफा मिनच भरतुहरी चामुंडा माय क पूंजा साठी आवत होता , असी मान्यता स . 
* यहान दुय माय क दरस्यन क बाद च मन्नत पुरी होस , असी मान्यता स .
* दुय मायना स्वयंभू आन् जागरुत स , असी मान्यता स . 
* दुय माय क दरस्यन संगच भैरोबाबा को दरस्यन बी जरुरी स , वोकऽ बिगर पूंजा पुरी नी होत , असी मान्यता स . 
* देवास असो पह्यलो ठिकान होतो ज्यान दुय राजपाट होता . येक होलकर आन् दुसरो पंवार राजवंस . तुरजा भवानी होलकर राजघराना की आन् चामुंडा माय पंवार राजघराना की कुलदेवी होती . 

२. उत्सव : *  टेकरी धाम ला साल भरच भक्त लोगना की भीड रव्हस . पर नवरातरी म यहान पाय धरन ला जागा नी रवत . 
* नवरातरी म यहान विसेस पूंजा रव्हस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

भुलाबाई को गानो ( भोयरी )

भुलाबाई को गानो

येक लिंबू झेलू बाई , दुय लिंबू झेलू
दुय लिंबू झेलू बाई , तीन लिंबू झेलू
तीन लिंबू झेलू बाई , चार लिंबू झेलू
चार लिंबू झेलू बाई , पाच लिंबू झेलू...
पाच लिंबू को पानोठो
हनुमंत को हार मोठो
हनुमंत की निरी घोडी
आवता जावता कमल तोडी
कमल क पासऽ लुकी रानी
अवो अवो रानी , यान कहान पानी
पानी नी यमुना जमुना
यमुना जमुना की बारीक रेती
वहान खेलस नानो मारोती
मारोती ला भूक लागीस
मु त् जावूस सुनार बाडा
सुनार दादा सुनार दादा
गवरी का मोती भयास का
गवरी क घर तांबा की चुल
आवरा खलऽ जेवन की भुल
उस्टी पतराई चिच खलऽ

पान सुपारी सकारकन्...सकारकन्..

प्रस्तुती : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर