Wednesday, September 30, 2020

भोयरी संस्कृति - ३०: ब्याह ( बिह्या ) का गाना. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ३० : ब्याह का गाना
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली 

भोयरी संस्कृति मऽ लोकगीत ला खूब महत्व सऽ . हर पीढी क रहन सहन , बोल चाल , खान पान म बदलाव होत जास . आन् या सहज क्रिया स . बखत येकसरखो नी रव्हत . हर घडी वोको रूप बदलस . समाज येक झाड सरखो रव्हस... खूब डंगालना , फानटीना कन वोको फयलाव बाहाडस ...बेगरऽ बेगरऽ रंग का पत्ताना.. पिवरा पड्या पर खलतऽ जमीन पर पडस आन् पंचमहाभूत कन् बनी कुडी पंचमहाभूत मऽ च मिसर जास . पर येनऽ फयले झाड ( समाज ) को बूड रव्हस ' समाज की धारना ' . समाज का रितीरिवाज , लोकगीत , लोककथा , लोककला , नेग दस्तुर इ येक पीढी पासिन आघऽ क पीढी पावतर आवस आन् या साखरी हजारों बरस पासिन कयी बदलावना पचायकन् आपलऽ पावतर आवस . मानुस कयी बी जायेन त् या परम्परा आपलऽ संगच लिजास , मुरपासिन टुट्या नी पायजे मनून !! हरेक मानुस आपलऽ मुर ला .. जड ला कप्पो पकडकन् राखस . 
ब्याह इ हर समाज को महत्त्व को विधी . ... खास संस्कार ! 
ब्याह ( बिया ) का गाना : 
१. देव पितर ला आवाहन : 
 उतरो उतरो सरग का देवना
तुमारऽ घरऽ कारन काज 
तुमी आवजे राखजे लाज
तुमारो आवनो तुमीच संभारो
आवनो नी होत जी आमारो 
काटा कुटा आन् दगड दुगड
सरग की बाट घाडी अवघड
आवनो नी होत जी आमारो ।
उतरो उतरो सरग का पित्तरदेव
तुमारऽ घरऽ कारन काज
तुमी आवजे राखजे लाज
तुमारो आवनो तुमीच संभारो
आवनो नी होत जी आमारो ।
उतरो उतरो सरग का नाना देव
तुमारऽ घरऽ कारन काज
तुमी आवजे राखजे लाज
तुमारो आवनो तुमीच संभारो
आवनो नी होत जी आमारो ।
उतरो उतरो सरग का नंदलाल
तुमारऽ घरऽ कारन काज
तुमी आवजे राखजे लाज
तुमारो आवनो तुमीच संभारो
आवनो नी होत जी आमारो ।

२. नहान क बेरा : 
कोन मोठऽ नांदन की पोटी , सवा घडा दूध नाह्यो वो
आंगना म कादो चिक्खल , सखी कोनऽ कराये वो

३. काकन बांधन क बेरा : 
लुगडो धोतर देयो इनाम , हरि जो सखी न काकन बांध्या
चुलतो देयो इनाम , हरि जो सखी न काकन बांध्या

४. मांडो सूतन क बेरा : 
मंडा सूतन की बखत भयी वो नारी मंझारी , 
सवास्या कोन देव वो नारी मंझारी , सवास्या गोरे देव वो नारी मंझारी 
सवासिन कोन बाई वो नारी मंझारी , सवासिन हीरा बाई वो नारी मंझारी 

५. मांडो डावन ( छाते ) क बेरा : 
कहान सिन लायो हरद्या मोंगर वो , का सिन लायी नांगन बेलनी
आमारऽ राजकुवर घर मांडो.....
कोनतऽ बयील प लायो हरद्या मोंगर वो , चवऱ्या बयील प लायी नांगन बेलनी वो
आमारऽ राजकुवर घर मांडो.....

६. खनमिट्टी ल्यावन क बेरा : 
आरू जाजे कोयल बाई बलखंड , लाजे माती ला खोज
माती बोली म्हरऽ बिन मांडो नी सोभय , धनुती बोलय कोयल

७. सगाई को गानो : 
रान्नी म बसी बाई लाडी वो 
दाआजी ला अरज करे जी 
चांगलऽ घर देजे दाआजी 
पोटी लिल्लोरी घोडी प ल्यानी वो 
चांदी सोनो आमी लेन चले...

८. बरात आया पर : 
गाडी सिन गाडी ठील गयी रे म्हरऽ रंजन भवरा 
केतिक आवस बरात रे म्हरऽ रंजन भवरा
पयदल की नहाय गिनती रे म्हरऽ रंजन भवरा
हाथी घोडा नी मोजदाद रे म्हरऽ रंजन भवरा
बी माडी प चढ चढ देखस रे म्हरऽ रंजन भवरा
वोकी छाती धडाका लेय रे म्हरऽ रंजन भवरा
दार म डावो पानी रे म्हरऽ रंजन भवरा

९. द्वारचार को गानो : 
निकर न् वो बेटी स्याम सुंदरिया
लाडो आयो बरबल देस म 
कसी मु निकरु म्हरी माय यसोदा
दाआजी उभा दरुजा म 
डाल लेजे घूंघट बेटी
वोढ ले जे पदर निरमल झकोर रे....

१०. पडसन ( पडछन ) को गानो : 
( नवरदेव क स्वागत म सासू वोला पडसस )
निकरो न् सासू स्वागत ला , पडसो जावो मजा
पोरग्यो पडसय राजा दसरथ को , पडसो जाजो मजा 
सूपडो बन्यो माय बास को , पडसो जाजो मजा
दीवो बन्यो माय कनिक को  , पडसो जाजो मजा
बात ( बत्ती ) बनी माय रेसम की ,  पडसो जाजो मजा
नांदड बन्यो माय कनिक को ,  पडसो जाजो मजा
मूसर बन्यो माय खयीर को ,  पडसो जाजो मजा
रयी बनी वो माय बास की ,  पडसो जाजो मजा

११. दायजा को गानो : 
( दायजो डावन पर दायजो डावनी वाला को नाव लेकन गानो कोस .)
बांट ऽऽ की लाडऽऽ न लाहूऱ्या लिह्ये वो
लाहूऱ्या लिह्ये वो , डावो न गोरे देव दायजा ...

१२. बिदाई को गानो : 
चीर चीर कमडी को पिंजरो बनायो
येनऽ पिंजरा म रह्य नी पायी , म्हरा गोविंद रे...
पिंजरा की मयना म्हरी उड चली...
दाआजी रोये वोको सेला भीजे
माय की भीजे गुलसाडी रे..
म्हरऽ दाआजी की बेटी बिहानी
काय ला रोये म्हरो गहरो स दाआजी
काय ला दी परदेस जी
रे म्हरऽ दाआजी की बेटी बिहानी 

( साभार : सतपुडा की संस्कृति , २००१ , सम्पादक - वल्लभ डोंगरे )

अनुवाद लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 





Tuesday, September 29, 2020

अजब गजब , भाग - ८ : समरांगन सूत्रधार /१. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब , भाग - ८ : समरांगन सूत्रधार - १
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

महान चक्रवर्ती राजा भोज देव न ८४ ग्रंथ लिख्यास . वोमऽ को येक " समरांगण सूत्रधार " . इ भारतीय वास्तुस्यास्तर सिन संबंधित मोठो ग्यान भंडार स . 
* समरांगन सूत्रधार म ८३ अध्याय स आन् ७००० स्लोक ( श्लोक ) स , जेमऽ नगर योजना , भवन - मंदिर निरमान अन् कारागीरी , मूरती कला , मुद्रा संगच यंतर तंतर ( यंत्र विद्या ) को अचंबो करनी लाइक ग्यान स .
* अध्याय ३१ को नाव स ,' यंत्र विधान ' . येनऽ अध्याय म कयी यंतर तंतर को वरनन स . लकडी को विमान , यांत्रिक दरबान अन् सिपाई , संगच रोबोट की झलक बी देखन ला भेटस .
१. यंत्र क्रिया : विमान विद्या - यंत्र विधान म कयी स्लोक ( श्लोक ) विमान क बारा म स . 
_ लघुदारुमयं महाविहंगं दृढसुश्लिष्ट तनुं विधाय तस्य ।
उदरे रसयन्त्रमादधीत ज्वलनाधारमधोऽस्य चातिपूर्णम ।। ९५
_ तत्रारूढ पूरुषस्तस्य पक्षद्वन्द्वोच्चाप्रोज्झितेनानिलेन ।
सुप्तस्वान्त: पारदस्यास्य शक्ता चित्रं कुर्वन्नम्बरे याति दूरम ।। ९६
_ अय: कपालहितमन्दवव्हिप्रतप्ततत्कुम्भभुवा गुणेन ।
व्योम्नो झगित्याभरणत्वमेति सन्तप्तगर्जद्ररसरागशक्त्या ।।९७
२ . यंतर की क्रिया : * कोनती मसीन ( यंतर ) येकच क्रिया घडी घडी करत रव्हस .
* कोनती मसीन घडी घडी नी त् विसेस बेरा पर आपलो खास काम करस .
* कोनती मसीन आवाज करन साठी नी त् आवाज को संचालन / बदलाव साठी रव्हस .
* कोनती मसीन वस्तु को आकार नानो - मोठो करन साठी , आकार बदलवन साठी , धार लगावन साठी रव्हस .
३ . मसीन ( यंतर ) का गुन : * बखत बखत पर खुद ला चलावन साठी मसीन मिन बल ( शक्ति ) निरमान होत रव्हन ला पाह्यजेन . 
* मसीन क हरेक काम म संतुलन आन् सहकार रह्या पायजेन.
* मसीन आरामकन् , बिना आवाज कन् चली पायजे.
* मसीन ला घडी घडी वोरायलिंग की गरज नी पड्या पाह्यजे .
* मसीन अटक अटक कन् नी चल्या पायजे.
* मसीन क काम म जास्त दबाव पड्या पाह्यजे .
* मसीन मिन सावधानी वाली आवाज निकरी पायजे .
* मसीन ढीली आन् थरथरी ( कापी ) नी पायजे .
* मसीन येकदम बंद बी नी भया पायजेन .
* जेनऽ काम साठी मसीन बनाईस , वू काम भये पायजे .
* मसीन याटोम्याटिक रही पायजे .
* मसीन म ताकद रही पायजे .
* मसीन को काम सीधो आन् चलावन ला सोपी रही पायजे .
* मसीन जास्त दिन चल्या पायजे .
४ . मसीन ( यंतर ) की गति : 
तिर्यगूर्ध्वंमध: पृष्ठे पुरत: पार्श्वयोरपि ।
गमनं सरणं पात इति भेदा: क्रियोद्भवा ।। अध्याय ३१
मतलब मसीन टेढी , वरतऽ , खलतऽ , पासऽ , आघऽ , बाजू म चली पायजे .
५ . पानी पर चलनी वाली मसीन : 
धारा च जलभारश्च पयसो भ्रमणं तथा ।
यथोच्र्छायो यथाधिक्यं यथा नीरंध्रतापि च ।
एवमादीनि भूजस्य जलजानी प्रचक्षते ।। अध्याय ३१
बह्यतऽ पानी को भार आन् जोर बापरकन् ताकद ( शक्ति ) बनावन साठी टरबाईन को बापर करस . पानी की जोर की धार वस्तु ला घुमावस. धार जेतरऽ उचाई परिन पडेन वोतरी वोकी ताकद जास्त रव्हस .
६. यंतर मानव ( रोबोट ) : 
_ अथ दासादि परिजनवर्गेर्विना तत्कृत्याना सर्वेशा ।
यथावन्निर्वहणाय कल्पितस्य स्त्रीपुरुषप्रतिमायन्त्र घटना ।। 
_ मतलब घर म नवकर - चाकर , परिजन नी रह्या पर घर को काम बाई / मानुस क रूप वालो रोबोट करस .
_ दृगग्रीवातलहस्तप्रकोष्ठबाहूरुहस्तशाखादि ।
सच्छिद्र वपुरखिल तत्साधिंषु खंडशो घटयेत ।। अध्याय ३१ / श्लोक १०१ 
येनऽ रोबोट ला डोरा , गरदन , तरहात , खांदो , हात , छाती , उंगल बी रव्हन ला पाह्यजेन . जरुरत होयेन वहान सेदूर करकन् आंग क पुरजाना ला , भाग ला जोडकन् घडाई करी पायजे .
_ शिलिष्ट कीलकविधिना दारुमय सृष्टचर्मणा गुप्तं ।
पुंसोऽथवा युवक्त्या रूपं कृत्वातिरमणीयम् ।
रन्ध्रगते: प्रत्यंग विधिना नाराचसगते: सूत्रे: ।। अध्याय ३१ / श्लोक १०२
जोड जंतर साठी जी खिराना बापऱ्यास ती चिकना आन् बराबर लगाया पायजेन . रोबोट त् लकडी को रहेन पर वोपर चमढो मढकन् वोला बाई / मानुस को रूप देनो ; आन् यी रूप खूब साजरो रह्या पायजेन . रोबोट को ढांचो बनन क बाद वोकऽ सेदूरना मिन वोकऽ हालचाल साठी जुगाड कऱ्या पायजे . 
_ ग्रीवाचलनप्रसरणविकुज्चनादीनि विदधाति ।
करग्रहणाताम्बुलप्रदानजलसेचनप्रणामादि ।। अध्याय ३१ / श्लोक १०३
रोबोट की गरदन घुमी पायजे , हात फयलता - जमा करता आया पायजे , पानसुपारी देता आयी पायजे , पानी वोलन ला आये पायजे आन् राम राम बी कऱ्या पायजे .
_ आदर्श प्रतिलोकनविणवाद्यादि च करोति ।
एवमन्यद्पि चेद्दशमेतत कर्म विस्मयविधायि विधत्ते ।
जृम्भितेन विधिना निजबुध्दे:कृष्टमुक्तगुणचक्रवशेन ।। अध्याय ३१ / श्लोक १०४-१०५
रोबोट आवनीवाला ला आयनो दिखाडस , वीना सरखा साज बजावस . रोबोट यी यंतर मानव सारो काम पुरो करस . चक्रीय विधि क अनुसार , संचालक क बुध्दी नुसार रोबोट काम करन ला लागस .

* दरबान रोबोट : 
_  पुंसो दारुजमुर्ध्व रुपंकृत्वा निकेतनद्वारि ।
तत्करयोजित दंड निरुणद्घि प्रविशता वर्म्त ।। अध्याय ३१ / श्लोक १०६ 
डंडो लियो दरबान रोबोट बिना अनुमती कन् घर मऽ घुसनी वाला ला थांबाडेन .
_ खड्गहस्तमथ मुद्ररहस्त कुंतहस्तमथवा यदितत् स्यात ।
तन्निहन्ति विशतो निशि चौरान द्वारि संवृतमुख प्रभसेन ।। अध्याय ३१ / श्लोक १०७ 
रोबोट दरबान क हात म तलवार , मोगरी , भालो - बरछी दे त् वू रात म आवनी वालऽ चोर चोट्टा आन् मुंडो झाककन् घुसनीवाला ला मार सकस ........... ( क्रमशः )
( साभार : समरांगण सूत्रधार - राजा भोज देव जी )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 


Sunday, September 27, 2020

अजब गजब , भाग - ७ : रोंढा सिवमंदिर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब , भाग - ७ : रोंढा सिवमंदिर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मध्यप्रदेस बयतूल पासिन ७ कि.मी. पर स रोंढा गाव . वहान येक मोठ्ठो सिवमंदिर स , जेला गाव का लोगना देऊर , देहुर कोस . येनऽ देऊर क निरमान आन् मूरती क बारा म खूब अन् रोचक कथा , लोककथा स . भोयर , पवार मालवा मिन इत् वूत् बगऱ्या . समाज को वंस क हिसाबकन् राजा भोज अन् परमार इन सिन वंस को नातो स. सबन परमार राजा आन् राजा भोज भगवान भोलेनाथ का भगत . तेकन भगवान भोलेनाथ येक परकार कन् समाज का लोक देवता च ! 
रोंढा सिवमंदिर को आपलो येक इतिहास स . येनऽ इतिहास ला लिख्येस महान साहित्यिक स्व. गोपीनाथ कालभोर जी न . 
१ . इतिहास : रोंढा गाव म ४०० बरस क पह्यले आयकन् बसे कालभोर ( कालभूत ) परिवार का तीन भाई . बालाजी , मूंगाजी आन् कान्हा जी इ तीन भाईना को नाव . मोठो भाई बालाजी का पोटुना फागुजी आन् दल्या जी . दल्या जी को ब्याह तीन डाव भयो पर वून ला पोरग्यो  नही भयो . वून ला या बात बहुत खलत होती . मेहनती आन् खेती बाडी म हुस्यार दल्या महाजन न खूब धन कमाये . वून को पह्यलो ब्याह मटरबाई , दुसरो ब्याह बुन्दाबाई आन् तीसरो ब्याह लडियाबाई सिन भयो . मटर बाई की येक पोटी अनन्दी बाई होती , पर पोरग्यो कोनच लाडी ला नी भयो . पोरग्या क आस म च  दल्या जी भगवान घर गया . दल्याजी कालभोर क देहांत क बाद तीन बी बेवा बायकोना न धन दवलत की हिफाजत करकन् वोला संभारे . वोन बखत बेगराचार नी होतो. सबन कुटुम्ब कबिलो येक म च रव्हत होतो . तीन बी बयना न खेती बाडी , धन दवलत संभालन साठी आपलऽ देर फागुजी क पोरग्या ला गोद ल्यो , वोको नाव होतो नारायन . सन् १८९५ क जवरपास बयना न दल्याजी क इच्छा अनुसार , वून क याद म भगवान महादेव को देऊर बनावन को संकल्प कऱ्यो . असो कव्हस क , जब भी दल्याजी खेत म जाता , पयदल बदनूर जाता तब आपलऽ धोतर म रस्ता पर का गोबर का पोयटा भरकन् ल्याता आन् खेत मऽ डावत होता . याच परम्परा वून क दत्तक पोरग्यान बी चलाई . सन् १९०० स म रोंढा सिवमंदिर बनकन् तयार भयो . 
येक बार बरसाद म देऊर क करसा पर ईज ( बिजली ) पडी . वा सिखर ला चिरकन् , साखरीकन् टंगे घंटा ला स्येदूर करकन् टेढी भयी आन् जमीन म गयी ..सिवलिंग पर वोको थोडोसो बी असर नी भये .
येक बार मोठी उघाड पडी . स्व . गोपीनाथ जी कालभोर बी वोन ऽ बेरा वहान गयाता . भगत लोगना नऽ बारा घंटा ' ॐ नमः शिवाय ' को भजन करकन् जाप कऱ्यो . भगवान भोलेनाथ क किरपा कन् वोनऽ दिन रात म चार बाजता , सकारी नव बाजता आन् बाद म चार पाच दिन बरसाद भयी . झड लागी . 
२. मंदिर विसेस :  * देऊर क मुख्य दरुजा क डाखऽ हाथ पर सिलालेख स . वोमऽ देऊर बनावन की तिथी आन् बनवनी वालाना को नाव खुदेस . पह्यला तीन नाव मटरबाई , बुन्दोबाई आन् लडियाबाई को स .
* येनऽ देऊर की उचाई १०० फुट स . देऊर म जाता बराबर पह्यले नंदी देव की नक्कासीदार  मूरती दिसस . देखनी वालाना को माननो स क मध्यप्रदेस क कोनतऽ बी देऊर म येतरी मोठी नंदी देव की मूरती नहाय . 
* सिवलिंग क वरतऽ क गुम्बज म अंदरीन लाल , हिवरऽ , निरऽ रंग कन् खूब साजरा चितरंगना काहाड्यास . वोम ऽ मोर , घोडो , हरन , सिंव्ह का मुख्य स . 
* रोंढा सिवमंदिर क निरमान म आज क सरखो सिमेंट नही लागेस .  चुनखडी , पतलो गुर ( राब ) आन् बेलफल ला घोटकन् जी मसालो बने , वोला बापरेस . 
* नंदी देव , सिवलिंग आन् बाकी मूरती ना संगमरमर कन् घडाईस , जी जयपूर परिन बंडी पर  ल्यायीती . पुरो येक मह्यनो लागेतो , मूरती ल्यावन साठी !
* देऊर क रखरखाव आन् खरचा पानी साठी तीन बयना न देऊर क नावकन् खेत बी देयेतो . 
( साभार : सुखवाडा , जुलाई २००१ , सम्पादक : वल्लभ डोंगरे - भोपाल , हिंदी लेख - स्व . गोपीनाथ जी कालभोर ) 
अनुवाद लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, September 26, 2020

आंगन ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

आंगन
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

धाम घर को आंगन
तीरथ बिंदराबन
घर दार को अगास
वोला पह्यलऽ वंदन ।धृ।

झुंझुरका झाडझुड
करे सडो सारवन
पुरे चऊक साजरा
लक्षुमी ला आंगवन ।१।

सूर्व्य नारायन आयो 
सोन पिवरो आंगन
मह्यकस उदबत्ती
आवार म गा चंदन ।२।

सजे आंगना म मेढा
तुटे पोरा की तोरन
जोडी बयील की आयी
गोड निवद पुरन ।३।

आयी रास अनाज की
करे पूंजा कार् भारीन
हरखेस घर दार
आंगना म नवो दिन ।४।

ठस्सा गेरु का गोपद्म
गोंदन प गवरन
झलारस दिवारी ला 
आंगना म तारांगन ।५।

पूंजा पाचपावली की
महादेव भगवान
डाये मांडो आंगना म
देव सेंदऱ्या को मान ।६।

आयी पापड की घात
बडी उसरी सबन
खाट पर सी धापोडा
झुमकस पायजन ।७।

ढोर बासरु पाठरु
आंगना म गा गवान
पानी उब क मारा ला
थोपवस सायवान ।८।

पेव अनाज को देव
वोला आंगना म मान
आंग जमीन म रह्ये
पर बाहिर गा कान ।९।

पडे मांडव  हिवरो 
पोटी उजवयी यान
वोकऽ नान्होरा को पानी
आसू आंगन का दान ।१०।

रचना :  सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर





Friday, September 25, 2020

अजब - गजब भाग - ६ : वान्नेर कुंड. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

वान्नेर कुंड - येक पावन तीरथ    
Language of the article :  bhoyari dialect _ भोयरी बोली                                                                                           
वानर कुंड इ एक नानीसी जागा सं . वर्धा जिल्हाम s  ढगाको जंगल सं । वर्धा कारंजा रस्ता परीन अंदर जंगलमs इ वानर कुंड सं । लोगनाक s मन मं येनं जागा परती खूब आस्था सं । तसो इ वान्नरकुंड बामनवाडा गावक s सिवारमच आवस , येनं कुंड s कं पानी कन जेन आंग धोये ओका समदा दुख दूर होस,समदी बेमारी दूर होय जास  असो लोगना को समज स s। उनारा मं जवरपास कं गावम s पानी नी रवत, आसपास का नदी नालाला पानी नी रवनार तरी वानर कुंड को पानी कबच आटत नही । येलाच आपला समदा भोयर लोगना वान्नर कुंड कोवस। वाsन बाराईकाल एक मायराज रवस । वाsन स्यनकरजीको देऊर सं । वाsन मायराज रोज देऊर की सापसपाई अन पुंजापाती करस।  वान जंगलम s आसोल, बाघ , रोई असा जनावरना आवस तेकोबी ओन मायराजला भेव नही । वाsन कुंडपर जानको भयोतं  कोनतो जनावर नी  ती देखकनच जानो बारू।                                          वान्नरकुंडकी एक लय जूनी कथा चली आय रही वा कथा असी सं कं  - सतयुग मं सिरीरामला जबs वनवास भयो तब वुई जंगलमीन जात होता तबs जाता जाता उनला उनकs मारगमं धम्म नावको ऋसी तप करतानी दिसे तं सिरीराम उनको दरसन करनला थांब्या । उनला पेनला पानी पायजे होतो पर वान आसपास पानी को पतोच नइ होतो । तब धम्मरुसी नं उनला एक जागा कित s बोट दिखाडकन जिमीन पर बान मारनला लगाये । तं वायसीन पानी को झरझर झरो बह्यनला लाग्यो । तबीन पासून तं आबलुकवरी  वान्नर कुंड झराको पानीमं कबच कमी नी आयी । असो सं उ सतयुगक s सत  , तेकनच आब s बी पानी नी आटत , ना ओन पानी की चव बदली अन नी रंग बदले । पानी पेनला गोड सं । निरमय सं । समदा रोगराई ला दूर करस असी वान्नरकुंड क पानी पर लोगना की सरद्धा सं इस्वास सं । भक्तीभावकन समदा वान जास। सिरीरामनs जेन s बान कन जिमीनमीन पानी काह्यडे उ बान आबबी वान वान्नरकुड जवर धरेस । लोगना ओकी बी पुंजापाती करस । वान्नर कुंड कं भवताल लय दाट झाडी सं । पुरो जंगल सिवार सं तरी सरद्धा कं आघ कइच नही देखत अन वान्नरकुंड पर जास , उनला वा s न फायदो होस। येतरा बरीस भया पर ओन पानी मं कदी चिला नी भयो कं खराब बास नी आयी इ ईस्वरकी लिलाच सं कवनो। कुंड को पानी दुसरं टाकाम s सोडेस वाsन ढोर बासरूंना , जंगलका जनावरं ना पानी पेस । पानी को जेत्रो उपसा करे ओतरो पानी तयारच रवस । असो इ सदा पानी रवनारी एक खूब साजरी जागा सं , जी मानूस रवो , ढोरबासरू रवो कं जंगलमका जनावरना रवो समदाक जीवला सुख देस । वान्नरकुंडपर आखाडी कं एकादसला वर्धा क कोनी संकरराव अग्निहोत्री महापरासाद करस ,लय लोगना महापरासादला जास। उइच नी तं आपला भोयर पट्टा का लय लोग आस्था कन वा s न जास।     
                                           लेखिका :    सौ. प्रिया पुरुषोत्तम कालभुत ,  वरोरा जिल्हा. चंद्रपूर                       

भोयर पट्टी अन् गवराऊ गाय. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयर पट्टी अन् गवराऊ गाय
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली

त्वं यज्ञस्य त्वं माता सर्वदेवानां कारणम ।
त्वं सर्वतीर्थानां नमस्तुते अस्तु सदानघे ।
शशि सूर्यरूपा यस्या ललाटे वृषभध्वज: ।
सरस्वती च हुंकारे सर्वेनागास्च कम्बले ।
क्षुर पृष्टे च गन्धर्वा वेदाश्चत्वार एव च ।
मुखाग्रे सर्वतीर्थानी स्थावारानि चराणि च ।।
' हे निस्पाप गाय माय , तुमी सबन देव देवता की माय , होम- याग की कारन रूपा आन् तमाम तीरथ की तीरथरूपा स . आमी तुमीला हरमेस नमस्कार करूस . तुमारऽ कपार म चंदर , सूर्व्य , अरून आन् महादेव बिराजमान स . हंबर म माय सरोसती , गल कम्बल म नागगन , खूर म गन्धर्व अन् च्यार वेद आन् मुंडा पर चर - अचर तमाम तीरथ को वास स .' 

* आयुरवेद म ढवरी ( ढवळी ) गाय , गुत्समद रिसी क आसरम म की गाय या गवराऊ ( गवळाऊ ) होती , येका संदर्भ स . 
* गवराऊ गाय भोयर पट्टी म वरधा , नागपूर आन् छिंदवाडा जिला म देखन ला भेटस . या गाय काटक आन् चालन - परन साठी तुफान रव्हस . कम चारो पानी म बी गवराऊ गाय टिककन् रव्हस . उब को फरक येकऽ तब्येत आन् दूध क दरजा पर नी पडत .
* जंगल पहाडी म रवनी लाइक बांधो आन् तोंडवरो ( चेहरा पट्टी ) गवराऊ गाय की वोरख ! दगड गोटाना म चलन साठी खोल आन् जुडी खूर , लंबऽ स्येपूट को कारो गोंडो , पासऽ मुड्या सिंगना , मोठाला कारा बदामी डोरा , लंबो डोकसो , मुंडा को आगलो कारो भाग असी येकी ठेवन रव्हस . 
* सबन देसी गाय म गवराऊ गाय को तोरोच न्यारो !!!
* गवराऊ गाय क बासरू क कपार ( माथा ) पर जलमताच लाल टिको ( चांद ) रव्हस . वू टिको २१ दिन क बाद आपरंगच मिट जास .
* पांढरी भुरी गवराऊ गाय लंबी चवडी , उच्ची पुरी दिसस पन् रव्हस सिफार !!!
* स्यास्तर क भास्या म गवराऊ गाय Bos Indicus कुर की होय .
* इंग्रजी म येला Gaolao , हिंदी म गावलाव , गौलगनी आन् मराठी म गवळाऊ गाय कोस .
* दूध क दरजा साठी गवराऊ गाय आन् खेत कऽ काम साठी गवराऊ बयीलजोडी परसिध्द स .
* गवराऊ गाय ५ - ७ लिटर दूध देस . दूध की डिगरी ( फ्याट को परमान ) ५.५ रव्हस . जंगल क चाराकन् दूध म दवाई को गुन जास्त रव्हस . आयुरवेदिक दवाई म गवराऊ गाय क तूप ला च पसंद करस . गवराऊ गाय को तूप हात पर चोरे त वू चमडी म जीर जास . येनऽ तूप को सुगंध जेनऽ येक डाव ले , वू दुसरऽ तूप की याद च भूल जास . गवराऊ गाय की किंमत ५० - ६० हजार रुपया आन् बयीलजोडी को भाव ६० - ८० हजार रुपया स . तूप देड हजार रुपया किलो क भाव कन् खपस . 

१. इतिहास : * भगवान सिरी किस्न गायकी / ढोरकी क रूप म कौंडन्यपुर ला आयाता . वून क संग २००० गवराऊ गायना आन् वोतराच सोबतीना होता . वहान लढाई भयी आन् रुखमिनी हरन करकन् सिरी किस्न द्वारका ला गया पर गवराऊ गायना आन् सोबतीना यहानच रह्या . जंगल को चारो खायकन् ६००० बरस म गवराऊ गाय को वंस बाहाडे . 
* गोंड राजा पर हमलो करन साठी दुसरऽ राजानऽ गवराऊ वंस ला बापरेतो .
* इंग्रज लोगनान ऽ गवराऊ वंस को पह्यलऽ बेरा अभ्यास करकन् , पहाडी जागा पर वाह्यतुक साठी येला बापरे . 
* इ. स. १९४६ म इंग्रज राजवट म वरधा जिला क कारंजा तहसील म हेटिकुंडी ला गवराऊ वंस क जतन आन् पयदास साठी केंद्र चालू करे . तब येन केंद्र जवर ८२० येकट जागा होती . वोमीन २५० येकट म गवराऊ वंस साठी चारो बोवत होता . वहान कचेरी , कोठाना , चारो धरन की जागा , वहान काम करनी वाला बाबूलोग अन् मजूर साठी घरना बांध्याता . देस क येकलऽ गवराऊ पयदास केंद्र का दिन फिऱ्या . जुनी इमारतना टुटन ला आयी . जमीन को बटवाडो भयो . दरुजा टुट गया . छत टुट गयी . काम करन की आस्था खतम भयी . सरकारी काम क अलाली कन् केंद्र की दुरदस्या भयी . देखभाल करन साठी सिरफ तीन मजुर रह्यास . इ केंद्र मेरघाट लेन जान की कोसिस भयी . केंद्र बंद करन की बी कोसिस भयी . वोला खासगी कंपनी ला देन को बी खेल भयो . पर जागरूक लोगनान ऽ वरधा जिला को इ वयभव आंदोलन करकन् बाचाडे . पर हालत आब बी खराब च स . भोयर पट्टी को भूसन गवराऊ वंस खतम होन क रस्ता पर स .
२ . गवराऊ वंस क दुरदस्या का कारन :  * जंगल म गायना चरावन ला सरकार की मनाई .
* ' बोर अभयारण्य ' म बाघ क वंस की राखन करन कारंजा तहसील को मोठो जंगल बफर झोन म गयो .
* जूना पडितना उठित भया .
* गायना चरावन साठी गायकी / ढोरकी मानुसना की कमी .
* जास्त दूध साठी परदेसी मुलुख क वंस जरसी , होलसटीन फ्रिसियन वान को सरकारी परसार . 
* २००५ म हेटिकुंडी केंद्र ला बंद करन की बी कोसिस भयी . 
* सरकारी अनास्था . 

# गवराऊ वंस क जतन साठी , ' गवळाऊ गोवंश जतन , संवर्धन , संशोधन व पैदासकार चॅरिटेबल ट्रस्ट ' या स्वयंसेवी संस्था चांगलो काम कर रहीस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, September 24, 2020

ताप्ती माय की आरती. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

ताप्ती माय की आरती
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

जय देवी जय देवी , जय ताप्ती जया ।
करूस आरती , पडू तोरा पाया ।धृ।

आस्याढ मह्यनो , सप्तमी उजरी
भयी परगट , मुलताई नगरी
पिता सूर्व्यदेव , देवी माय छाया
जय ताप्ती देवी , मोठी तोरी माया ।१।

लेयो अवतार , भर दोयपर
बाबा सतपुडा , मुलतापी घर
भाई सनिदेव , यमदेव पाया
बाई कालिन्दनी , बहिन की माया ।२।

कुर सूर्व्यवंसी , लाडो चंद्रवंसी 
कसी बाजी माय , कान्हा की बंसी
लाडी ताप्ती को , सवरन राया
मन चंदन को , तेज जोत काया ।३।

धाम मुलतापी , कुंड अमरीत
घाट बारालिंग , मोक्ष तीरथ
नारद मुनी न , गुनगान गाया
आदि गंगा माय , स्यरन म आया ।४।

पुन्य सिमरन , सपे पाप ताप
संत रिसी मुनी , करे जप तप
सिध्दी बुध्दी दाता , किरपा की माया
करूस आरती , सुरेस नत भया ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, September 23, 2020

भोयर अन् नदी माय - ५ : बेतवा. bhoyar culture _ भोयर लोग..... bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयर अन् नदी माय - ५ : बेतवा
Bhoyar culture _ भोयर लोग
Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली

विंध्याचल परबत माला म रायसेन जिला क कुमारा गाव जवर बेतवा नदी को उगम स , " झिरी ". येनऽ झिरा मिन हजारों बरस पासिन पानी निकर रह्येस . झिरी क आसपास ५००० बरस पासिन ज्या ज्या संस्कृतिना नांदीस , वकी निस्यानी आब बी वहान सापडस.. मानुसना जब गुफा म रव्हत होता , वा कई गुफा यहान स . ताम्रपास्यान जुग का अवजार आन् अवसेस बी सापडस . 
बेतवा नदी को पुरान काल को नाव " वेत्रवती "! बेतवा बुंदेलखंड पठार की सबसिन मोठी नदी .
बेतवा नदी क सम्मान म भारतीय नौसेना न आपलऽ येक युद्ध नौका को नाव राखेस , " INS - बेतवा " .
१. इतिहास आन् मान्यता :  * रामायण - महाभारत काल म बेतवा काठऽ ' दशाण ' राज होतो , जेकी राजधानी विदिशा होती . 
* बेतवा नदी पर चक्रवर्ती राजा भोज न भीमताल बांध्येतो . भीमताल को फाडी को बांध ४० फुट उचो आन् १०० फुट चवडो होतो . भीमताल की आराजी २५० वर्ग मील स. येमऽ ३६५ जलधाराना को पानी होतो .  
* राजा भोज ला येक बिमारी भयी... दवादारु , वयीद हकिम कन् आराम नही पड्यो . तब येक बयरागी साधु न उपाव सांगे क ३६५ जलधारा ला ३६५ दिन म जोडकन्  , ३६५ दिन नहायकन् रोज सिवजी की पूंजा करन की . भोजपुर क पहाडी को आकार ओमकार रूप मऽ स .
राजा भोज को सरदार कालिया / कल्यान सिंव्ह न या जबाबदारी लेयी . वून न भोजपुर जवर बेतवा नदी म आवनवाली ३५९ जलधारा खोज्या , पायजे होता ३६५ ! वून न अनखिन् ५ झिरा को सोध लगायो... आब भयी ३६४ च ! तब वून न आब क कमला पार्क महल पासिन येक धारा बांध जवर ल्यायी , जेला कल्यान सौध / कालिया सोत कव्हस . चिरा - फाडी कन् बांध बांध्यो .. पर बिना चुना सिमिटकन् !
राजा भोज की बिमारी दूर भयी..  
* पूंजा साठी बांध क येक सिरा पर , टेकडा सरखी जागा पर भगवान भोलेनाथ को देऊर बनायो . वोला कोस '  भोजेश्वर ' मंदिर . वहान गाव बसे , ' भोजपुर ' . भोजपुर क मंदिर को बांधकाम भये राजा भोज क ' समरांगन सूत्रधार ' येनऽ वास्तुस्यास्तर क ग्रंथ क अनुसार . यहान को सिवलिंग येकच लाल पथ्थर कन् बनेस , जी आकार म पुरऽ दुनिया म मोठो स . येकी उचाई २१.५ फिट , घेरो १८ फिट ८ इंच आन् जलहरी २० x २० फिट की स . येन मंदिर क सबन  भाग का नकास्या जवरच पास्यान पर खुद्या स . पर बांधकाम अधुरो स . भोजेश्वर मंदिर ला मध्य भारत को सोमनाथ कव्हस . 
* येक मान्यता कऽ अनुसार द्वापार जुग मऽ कुंती माय साठी इ देऊर पांडव न बांध्ये. वोला येक रात म च बांधन को होतो , पर सकार भयी आन् बांधकाम अधुरो रहे. कुंती क दाआजी को नाव बी राजा भोज होतो . 
* पद्म पुरान कऽ अनुसार चम्पक नगरी को राजो विदारून को कुस्ठ रोग यहान क पानी कन् खतम भयो .
* येक मान्यता कऽ अनुसार कुंती माय न तान्हऽ करन ला बेतवा नदी म सोडेत्यो . 
* भोजपुर जवरच पाराबती गुफा आन् आस्यापुरी स . आस्यापुरी म राजा भोज न आपलऽ गुरू की समाधी बांधीती. वहान कंकाली माता की मूरती बी स. 
* भोपाल / भोजपाल नगर राजा भोज न बसाडेतो. यहान २०११ म राजा भोज की भव्य मूरती की स्थापना भयीस .
* बेतवा नदी पर कूर्मराजा की महाभारत काल की नगरी चंदेरी स . यहान की चंदेरी साडी परसिध्द स .
* चरनतीरथ पर तिरवेनी संगम स. यहान तिरवेनी मंदिर , चरन तीरथ मंदिर , भगवान सिरी राम मंदिर , च्यवन रिसी को आसरम स . 
* विदिशा राजा दसरथ को नानो बेटो स्यतरुघन क नानऽ बेटा स्यतरुघाती की राजधानी ! विदिशा जवरच भद्रावती चेदि राज आन् महाराजा सुदरक की राजधानी . बानभट्ट न यहान क रामघाट पर कादंबरी लिखीस . विदिशा को उल्लेख मेघदूत म स . 
* काल्पी ला पारास्यर रिसी आन् सारस्वत आसरम स .
* देवगढ ला परसिध्द दस्यावतार मंदिर स .
* टिकमगढ / टेहरी ला जानकी रमन मंदिर , नानी देवी मंदिर , स .
* ओरछा बुंदेला राजवंस की राजधानी . बुंदेला राजा की रानी होती परमार कुर की ' रानी गनेसकुंवर ' . वा मोठी रामभगत होती . वोन सरयु नदी मिन बाल राम की मूरती ल्यायी . राजानऽ मोठो देऊर बनायो . मुरती ल्यावता ल्यावता रानी ला झाक पडी . वोन वा मूरती आपलऽ महाल म धरी . सकारकन् मूरती ला मंदिर म मांडबो , असो बिचार करे . दुसरऽ दिन त मूरती न हालन को नावच नी ले. वोकी स्थापना वहान च भयी . इ येकलो मंदिर स ज्यान भगवान सिरी राम की " राजा राम " क रूप म पूंज्या होस आन् राजा सरखीच सकार अन् झालपड्या मान की सलामी देस . या बात स १६३१ साल की आन् येन सालच रामचरित मानस को लिखन को काम पुरो भयो . असी मान्यता सऽ कऽ भगवान सिरी राम रात म अजुध्या आन् दिन म ओरछा ला रव्हस . 
* बेतवा क काठ स परसिध्द आल्हा उदल क मामा वीर माहिल की नगरी , ' उरई ' . यहान मौनी मंदिर स्यक्तिपीठ स . 
* बेतवा नदी ज्यान यमुना नदी ला भेटस , वोनऽ संगम पर हमीरपुर स . यहान सिंव्ह महेस्वरी ( संगमेश्वर ) , चौरादेवी , बांके बिहारी मंदिर आन् निरंकारी आसरम स . 

२ . उत्सव आन् मेला :  * भोजपुर महासिवरातरी आन् संगरात ला मेलो भरस .
* बेतवा बुंदेलखंड की गंगा . ओरछा म गोधुली बेला पर  ५.३० बज्या रोज बेतवा माय की आरती होस .
* रंगाई म खूब मोठो रामलीला मेलो भरस .
* टिकमगढ म हर नवरातरी ला मेलो भरस.
* हमीरपुर म चयीत मह्यना म मेलो भरस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

 

Monday, September 21, 2020

सिपरा माय की आरती. bhoyar people _ भोयर लोग. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सिपरा माय की आरती 
Bhoyar people _ भोयर लोग
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

जय देवी जय देवी , लोक सरिता सिपरा
मानी अमरीत पानी , बिसनु देव की धारा ।धृ।

रिसी अतरी को तप , दुय निकरीस जोती
महाकाल अभिसेक , बाची किस्नदेव पोथी
राज बिकरमादित्य , महाराज कुर तारा
साल संवत् चलाये , भया दुनिया म न्यारा ।१।

सिध्दी भरतुहरि , गोरखनाथ न पायी
रिसी मुनी साधू संत , जोगी न धूनी रमायी
राम घाट पर मुक्ति , मोकस्यदायी सिपरा
सपे जलम मरन , सुटे बंधन का फेरा ।२।

कल कल निरमल , तेज बहाव सरिता
अमरीत झलकेस , धन्य सिपरा माता
कुंभमेला को सुयोग , आये बरस म बारा
महा नहान धरम , पाप ताप निपटारा ।३।

महासिवरातरी ला , डम् डम् बाजे डमरू
महाकाल की किरपा , माय सिपरा सिमरु
गाये आरती सुरेस , माय भगतना सारा
दीपदान करकन् , निभाऊस परंपरा ।४।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

 

भोयर अन् नदी माय - ४ : सिपरा. bhoyar people _ भोयर लोग. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयर अन् नदी माय - ४ : सिपरा
Bhoyar people _ भोयर लोग

महाकाल श्री शिप्रा गतिश्चैव सुनिर्मला ।
उज्जयिन्यां विशालाक्षि वास: कस्य न रोचते ।।
स्नानं कृत्वा नरो यस्तु महान घाम हि दुर्लभम् ।
महाकालं नमस्कृत्य नरो मृत्युं न शोचते ।।
-- महरसी वसिस्ठ

Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सिव की नगरी उज्जयनी , जोतिरलिंग महाकाल आन् नदी माय सिपरा भोयर संस्कृति को मानबिंदू स . सिपरा माय अनंत काल पासिन महाकाल ला अभिसेक कर रहीस . सिपरा माय को उगम इंदौर जवर क उज्जैनी मुंडला गाव क ककडी बडली स्थान / महू छावनी पासिन १७ कि.मी. पर जानापाव पहाडी जवर स . जानापाव पहाडी भगवान परसुराम जी को जलमस्थान ! 
* सिपरा नदी ला शिपरा , शिप्रा , क्षिप्रा , सोमवती , लोकसरिता नाव बी स .

१ . कुंभ मेलो :  दुनिया म को सबसिन मोठो धारमिक आयोजन मनजे ' कुंभमेलो ' . कुंभमेला को आयोजन सनातन काल पासिन होय रहेस . कुंभमेला को आयोजन हरिद्वार , परयाग , नासिक आन् उज्जैन मऽ होस . येन चार तीरथ पर ३-३ बरस बाद कुंभमेलो होस ; मतलब येकच जागा पर कुंभमेलो १२ बरस बाद आवस . कुंभमेला को मान गंगा माय , गोदावरी माय आन् सिपरा माय स . कुंभ को मतलब घडो , करसो . समुंदर मंथन मिन आखरी ला अमरीत को घडो निकऱ्यो . वोक साठी देव - दानव की काचाकिची भयी ; तब वू घडो झलके आन् अमरीत का ठेंबना येनऽ तीन नदी म पड्या . घडो जहान झलके वोनऽ जागा पर कुंभमेलो भरस . चार कुंभ भूलोक पर आन् आठ कुंभ देवलोक म होस . 
सूर्व्यदेव जब मेस रास म आन् गुरू सिंव्ह रास म रव्हस तब सिपरा नदी पर उज्जैन म कुंभमेलो भरस . 

२ . इतिहास आन् मान्यता :  * सिपरा नाव को मतलब स पावन नदी , तेज बहाव वाली नदी आन् निरमल नदी ! 
* सिपरा नदी को उल्लेख यजुर्वेद , मारखंड पुरान , स्कंद पुरान , भागवत पुरान , ब्रम्ह पुरान , अग्नि पुरान , सिव पुरान , लिंग पुरान , वामन पुरान , महाभारत , मेघदूत म स . 
* पुरान कऽ अनुसार अतरी रिसी न ३००० बरस घोर तपस्या करी . तप करन क बेरा वून न आपला दुय हात वरतऽ करकन् राख्याता . जब तप पुरो भयो आन् वून न डोरा उघाड्या तब दुय तेज जोती वून क आंग मिसिन निकरी . येक वरतऽ अगास मऽ गयी , जेमिन चंदर देव उपज्यो आन् येक जोत खलतऽ जमीन पर आयी जेमिन माय सिपरा परगट भयी . तेकन च सिपरा को येक नाव 'सोमवती ' बी स .
* येक मान्यता कऽ अनुसार भोलेनाथ महाकालेस्वर कपाल कमंडल लेकन भिकस्या मांगन ला निकऱ्या . वूइ पहुच्या भगवान बिस्नूदेव क घर ! भगवान बिस्नुदेव जी न वून ला तरजनी उंगल दिखाडी . भोलेनाथ जी ला या हरकत अपमान की लागी . वून को पारो भडक्यो . भगवान भोलेनाथ जी न तिरसूल कन् वा उंगल काट डायी . वोमिन भरभर रगत बाह्यन ला लागे . महाकाल जी न आपलो कपाल कमंडल वोकऽ खलतऽ धऱ्यो . रगत कन् कपाल कमंडल भर गयो आन् रगत जमीन पर सांडन ला लागे . वोमिन सिपरा माय परगट भयी . उगम क जागा पर सिपरा माय को पानी लाल रंग को स .
* सिपरा काठऽ सात पुरी म की येक उज्जैन पुरी स .
* नरबदा माय जसी बुध्दी - सिध्दी दाता आन् पाप विनासिनी स , उसीच सिपरा माय मोकस्यदायनी स . सिपरा माय क तीरथ पर भगत ला जलम - मरन क बंधन पासिन मुक्ती भेटस . 
* उसी त् नदीना पहाड मिसिन निकरस पर सिपरा माय धरती क गरभ मिन जलमी , तेकन वोला लोकसरिता बी कोस .
* सिपरा नदी आन् भोयर को नातो सनातन स . चक्रवर्ती राजो विक्रमादित्य की राजधानी सिपरा काठ उज्जैन म च होती . मोकस्यदायी महाकाल जी को ठानो बी सिपरा काठ च !
* भरतुहरी आन् गुरू गोरखनाथ जी न सिपरा तट पर तपस्या करकन् सिध्दी पायीती . 
* भगवान किस्नदेव , बलराम , सुदामा की पढाई उज्जैन क सांदीपनि रिसी क आसरम म भयीती .
* भगवान सिरी राम जी न सिपरा माय क रामघाट पर दसरथ राजा को सराध करम करेतो , असी मान्यता सऽ .
* सिपरा काठऽ चक्रवर्ती विक्रमादित्य आन् परमार कुर की कुलदेवी ' गढकालिका माय ' को ठानो , महाकाल जोतिरलिंग , कालभैरव मंदिर , मंगलनाथ मंदिर , भरतुहरी गुफा , सांदीपनि आसरम , सिध्दवट , रामघाट आन् कई तीरथ स .
* सिपरा तट पर उज्जैन म कुंभ , महासिवरातरी , कारतिक पुनव , गंगा दसरा ला मेलो लागस . 

३. भोयर अन् सिपरा माय : आमी जब मालवा म रव्हत होता तब पासिन आब पावतर सिपरा माय , जोतिरलिंग महाकाल , गढकालिका माय , उज्जयनी पुरी आमारा मुख्य तीरथ स . भोयरना को धारमिक ठानो मनजे उज्जयनी , महाकाल जी की नगरी ..! महाकुंभ की नगरी !!

४ . वर्तमान : सिपरा नदी लंबाई क हिसाबकन् नानीसी स , पर वोकी महिमा अपार ... अपरंपार स. नदी ला माय कव्हनु सरधा स . पर वोमऽ गंदगी , कचरा काडी डायकन् वोको जीव लेनो गलत स , या बात समजस पर उमजत नी . माय सिपरा उगम जवर सुक गयी . नरबदा माय न वोला बाचाडे . नरबदा नदी को पानी पाईप लयन कन् सिपरा नदी क उगम जवर लाये आन् सिपरा - नरबदा को आधुनिक संगम भये . सिपरा नदी म जीव आये... लोगना ला मोकस्य देन साठी आन् महाकाल जी क अभिसेक साठी...
जय जय सिपरा माय.....,,🙏

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Sunday, September 20, 2020

घर कुटुम्ब को धाम. bhoyar people _ भोयर लोग. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

घर कुटुम्ब को धाम
Bhoyar people _ भोयर लोग
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सुगरन को कोचोडो , दिन रात मह्यनत
सपना क फुलोर ला , आब धरीस गा बात ।धृ।

पेंड पेंड जोडकन् , रची धरी अवकात
पडी मन ला भरांती , समजे नी दिन रात ।१।

जीव फुटे गा घर ला , रोज बाहाडे हात हात
नवो दिन नवो रूप , आयी खुसी की गा घात ।२।

डायी आस की मयाल , खंबा उभा येकजात
सागवान क जोडी ला , भेटी चिचवा की साथ ।३।

कडी बंगई की जोडी , हिलगायी येकसाथ
धाबा पाटन लगायी , घर तसमा को सात ।४।

मास बरस बदल्या , दुनिया की रीत भात
गावगाडा कोठा बाडा , बित्या जमाना की बात ।५।

भयो नवल गयी कवल , बिना वोल बरसात
घर पक्को मन कच्चो , लुके चित् को अकात ।६।

घर कुटुम्ब को धाम , गंगा कासी को तीरथ
सगा सोयरा की माया , पुन्यवान इमारत ।७।

घर भूलोकी सरग , तेज चवरी की जोत
सुख दुख को आसरो , जीव वोको गनगोत ।८।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, September 19, 2020

नरबदा माय की आरती. bhoyar people _ भोयर लोग. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

नरबदा माय की आरती

Bhoyar people _ भोयर लोग
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

जय देवी जय देवी , जय माय नरबदा
दरसन कन् माय , टरै पाप इपदा ।धृ.।

तिथि माघ मह्यना की , सपतमी उजरी
भयी परगट माय , भूलोक किरपा करी
बिस्नु देव बरमा जी , देव देवता समदा
करे पाप निवारन , तुमीन  माय कामदा ।१।

सिव स्यंकर को अंस , मयखल की पोटी
माया चंदर की मनऽ , सूर्व्य तेज ललाटी
धाम अमरकंटक , घर माय नरबदा
महिमा अपरंपार , गाऊ आरती समदा ।२।

हर कंकर स्यंकर , हर बूंद अमरीत
आंग खांदा पर माय , दस करोड तीरथ
परिकरमा रिवाज , पून्य माय नरबदा
जप तप को ठिकानो , सिध्दी बुध्दी वायदा ।३।

मठ धाम आसरम , देऊरना को पसारो
देवगन रिसी मुनी , भगतना ला आसरो
जय पाप विनासिनी , माय देवी वरदा
ओमकार स्वरूपा , जय माय नरबदा ।४।

सोभे मगर सवारी , तुमारी सोमोद् भवा
करू जय जय कार , सिमरुस माय रेवा
गाये सुरेस आरती , निसिदिन माय सदा
आया तुमारऽ स्यरन , हर हर नरबदा ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Friday, September 18, 2020

भोयर अन् नदी माय - ३: नरबदा नदी. bhoyar people _ भोयर लोग

भोयर अन् नदी माय - ३ : नरबदा नदी

Bhoyar people _ भोयर लोग
Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पुण्या कनखले गंगा कुरुक्षेत्रे सरस्वती ।
ग्रामेवा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा ।
त्रिभि: सारस्वतं पुण्यं सप्ताहेनतुयामुनम् ।
सद्य:पुनातिगान्गेयंदर्शनादेवनर्मदाम् ।।

भोयरी संस्कृति मऽ नरबदा माय को मोठो मान आन् स्थान स . नरबदा माय न भोयरी संस्कृति बाचाडी... वोला आसरो देयो . भोयरी संस्कृति की नरबदा माय जीवन रेखा स . उत्तर आन् दकसिन भारत की नरमदा माय पारंपारिक हद ! माय नरबदा येतरी बुजरूक स क गंगा माय की उमर बी वोक आघ लय कम ! नरबदा माय को वाहन स मगर .

१ . इतिहास आन् मान्यता :  * माय नरबदा जेको नाव ' रेवा ' बी स , मयखल राजा की पोटी . अमरकंटक क पहाडी पर वोको जलम भयो . वून क घर जवरच ' सोनभद्र ' नद को बी घर होतो . नानपन दुय झना संगसंगच खेल्या . मोठा भया पर येक मेक क संगच रव्हन की बात भयी . पर ' सोनभद्र ' को मन ' जुहिला ' पर आयो . जुहिला नरबदा की सखी होती . नाराज होयकन् नरबदा दुसरी दिस्या म गयी आन् कुवारी रव्हन की कसम खायी  ; असी कथा स . दुसरऽ कथा म ' गुलबकावली ' को फुल ल्यावन को ' पन स . 
* भगवान सिवजी अंधकासुर राकस को वध करकन् मेकल परबत पर ( अमरकंटक ) समाधी म बस्याता . भगवान बरमा जी , भगवान बिस्नूदेव जी अमरकंटक ला आया आन् भगवान महादेव ला कह्ये क् आमारऽ पाप निवारन साठी उपाव सांगो . तब भगवान महादेव क कपार मिसिन जोत निकरी आन् जमीन पर पडी . वोन जोत मिसिन माय नरबदा परगट भयी , वू दिन होतो माघ मह्यना की चांदनी ( उजरी ) सपतमी , माय नरबदा को जलमदिन ! 
* पुरी दुनिया म सिरफ माय नरबदा च असी नदी स , जेकी परिकरमा करस .
* पुरान कऽ अनुसार नरबदा की नहर सोमवंसी राजा न बनाइती . तेकन नाव पड्यो , ' सोमोद्भवा '. 
* कालिदास न वोला ' सोमप्रभवा ' कह्येस . आन् मेघदूत म माय नरबदा को खूब साजरो वरनन करेस .
* पुरान कऽ अनुसार गंगा नहान कन् जी पून्य भेटस , वू माय नरबदा क सिरफ दरस्यन कन् भेटस . 
* नरबदा माय की महिमा वेदव्यास जी न स्कन्द पुरान क ' रेवाखंड ' म सांगीस . भगवान महादेव क किरपा कन् माय नरबदा १२ बरस क पोटी क रूप मऽ परगट भयीती . महारूपवती होन क कारन भगवान बिस्नूदेव आन् दुसरऽ देवताना न नामकरन कऱ्यो , 
" नर्मदा " . 
* माय नरबदा ला भेट्यास ती वरदान -- परलय म वोको नास नी होयेन , येकली च पाप - नासिनी क रूप म परसिध्द होयेन ( येकी मियाद आब खतम भयी , असो मानस .) , वोको हर कंकड ( नर्मदेश्वर ) सिवलिंग क रूप म पूंज्या जायेन , सिव - पाराबती संगच सबन देवताना वोक ऽ ठड्डी पर निवास करेन .
* सबन देवता , रिसी मुनी , गनेस जी , कारतिकेय जी , भगवान सिरी राम , लक्षुमन , हनुमान जी न नरबदा क काठ पर जप तप करकन् सिध्दी पाईस .
* अग्निपुरान , मत्स्य पुरान , पद्म पुरान , कूर्म पुरान मऽ नरबदा माय की महिमा स .

२. तीरथ :   * नरबदा माय पर १० करोड तीरथ स !
* अमरकंटक - मध्यप्रदेस म को अमरकंटक नरबदा माय को उगम स्थल . यासीन नरबदा , सोन आन् जुहिला नदी को उगम होस . अमरकंटक ला विंध्य आन् सतपुडा को मेल होस . यहान मेकल , व्यास , भृगू , कपिल रिसी मुनी न तपस्या करीस . अमरकंटक म तीन दिन ' नर्मदा जयंती उत्सव ' चलस .
* मंडला - मंडला म नरबदा - बंजर घाट पर हरसाल कारतिक पुनव ला मोठो मेलो लागस .सरावन मह्यना म बी नरबदा घाट पर धारमिक आयोजन रव्हस . 
* भेडाघाट जबलपूर --  भृगू रिसी की तप स्थली होन क कारन भेडाघाट आन् जाबालि रिसी क नाव परीन जबलपूर इ नाव पड्यो . यहान चवसठ योगिनी मंदिर , ग्वारीघाट , तिलवार घाट , लमेहटा घाट , पंचवटी घाट स . यहान नवरातरी , महासिवरातरी ला मेलो लागस .
* होसंगाबाद / नर्मदापुरम -- यहान आखाडी , गुढीपाडवो , नवरातरी , महासिवरातरी , नर्मदा जयंती महोत्सव पर्व धुमधाम कन् मनावस .
* नेमावर -- यहान सिध्देश्वर महादेव को पुरानो देऊर स . नरबदा परिकरमा को येला ' नाभिस्थान ' कव्हस . येन जागा ला पुरान मऽ ' रेवाखंड ' कह्येस . 
* धायडी कुंड -- या असी जागा स , ज्यासिन पुरऽ देस म सिवलिंगना लिजास .
* ओंकारेश्वर -- यहान नरबदा माय न ॐ क आकार को टापू बनायेस . इ जोतिरलिंग को पावन तीरथ स . यहान अहिल्याबाई को बनायो ममलेस्वर ( अमलेस्वर ) जोतिरलिंग बी स . महान देव भगत अम्बरिस आन् मुचकुंद को दाआजी सूर्व्यवंसी राजा मान्धाता न यहान सिवजी को कठोर तप करकन् सिवजी ला परसन्न कऱ्योतो . वून क नाव पर च येनऽ परबत ला मान्धाता कव्हस . यहान अखरपख , महासिवरातरी , आखाडी , नर्मदा जयंती उत्सव ला भगतना को मोठो मेलो भरस .
* महेश्वर -- यहान सिव मंदिर , महेस्वरी माता मंदिर , अहिल्याबाई मंदिर स . यहान महासिवरातरी , नवरातरी , नर्मदा जयंती उत्सव ला मेलो भरस . 
* कोटेश्वर -- नरबदा क उत्तर थडी पर कोटेस्वर महादेव मंदिर स . यहान कस्यप रुसी आसरम , करजेस्वर ( कस्यप रुसी को पोरग्यो ) आसरम , च्यवन रुसी को आसरम  आन् परसिध्द जयंती माता मंदिर स . यहान नर्मदा जयंती उत्सव , महासिवरातरी आन् नवरातरी ला मेलो लागस .
* डिंडोरी / रामगढ -- यहान हरसाल नर्मदा जयंती उत्सव धुमधाम कन् मनावस .
* मांडवगड - चक्रवर्ती राजा भोज आन् परमार वंस की राजधानी त् विंध्य परबत पर स , पर यहान क ' रेवाकुंड ' ला माय नरबदा को च हिस्सो मानस . नरबदा परिकरमा भया पर भगत लोग  ' रेवाकुंड ' ला आवस ; तब च वून की नरबदा परिकरमा पुरी होस , असी मान्यता सऽ .
* भडूच - भडूच म माय नरबदा समुंदर ला भेटस . भडूच ला ' भृगू तीरथ ' बी कव्हस . बलि राजा न यहान अस्वमेध होम कऱ्योतो . 
# नरबदा माय की हर जागा तीरथ स .. वोको हर कंकर , स्यंकर स..
करोडो तीरथ की जानकारी येक किताब म नी मायेन...
माय नरबदा म आपला जनेऊ सिरायकन् भोयर वंस न वोला वलांडे... माय नरबदा न भोयरी संस्कृति बाचाडी आन् बाहाडायी बी.. भोयरी संस्कृति पर नरबदा माय का लय उपकार स...
हर हर हर हर नमामि देवी नर्मदे....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, September 17, 2020

बासरू की माय. bhoyar people _ भोयर लोग. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

बासरू की माय

Bhoyar people _ भोयर लोग
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

घर म आवस खुसी
जब बी बेनस गाय
खुब वोको लाड प्यार
घर की बनस धाय ।१।

चिक ला तडफडस
बासरू हंबरे माय
वोकऽ भूक क दूध की
पेस घरवाला चाय ।२।

पान्हा की च उजागरी
बाद म देस भगाय
देखे मुल्मुल बासरू
जब दुहे वोकी माय ।३।

दुहन ला दे तरास
वका कडसस पाय
गरे डोरा मिन आसू
वोला का जीव नहाय ।४।

खूब करो पूंजापाती
खूब खावो दूध साय
येनऽ बात ला नी भूलो
वा स बासरू की माय ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, September 16, 2020

भोयरी. bhoyar people _ भोयर लोग

 भोयरी
Bhoyar people _ भोयर लोग

        खुस रवन को,
खुद समजन को,
         तब कवन को,
मोठा आपला स,
        ग्यानी चऽ खरा,
नानाऽ  ला कम,
       नी समजन को।।
पयले को जमानो,   
      नी रयो तऽ रयो,
मन कऽ सरको,
      नी भयो तऽभयो,
रिकामा कोनी नऽ,
    आब कयो तऽ कयो,
पन आपली बोली
       ला बचावन को।।
बोलता नी आयो,
         तऽ लिखन को,
लिखता नी आयो,
          तऽ वाचन को,
जेला आवस तेला,
         विचार पुसन को,
आपलं भोयरी को,
         मान बढ़ावन को।।

रामेश्वर गोरे , इंदौर

Tuesday, September 15, 2020

वर्धा माय की आरती. bhoyar people _ भोयर लोग. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

वर्धा माय की आरती 
Bhoyar people _ भोयर लोग
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

ॐ जय वर्धा माता , श्री वर्धा गंगा माता
जी बी आया स्यरन म , दुख वून का हरता ।धृ.।

गाव खैरवानी नाव , गढ वरधन माता
बिस्नु देव अवतार , पानी वराह भरता ।१।

तप कपिल मुनी को , भयेस सफल माता
रिसी वसिस्ठ भगत , होम कोटी न करता ।२।

सुभ पावन मंगल , टारै अमंगल माता
तोरऽ कोरा म आसरो , माय बुध्दी सिध्दी दाता ।३।

कुर भोयर संभाले , रिन नी फिटेय माता
आमी पोटुबाटूना की , तुमी च स माता पिता ।४।

देवी मायना निबजी , तोरऽ पानी कन् माता
करू तुमारी आरती , गावूस किरती माता ।५।

वरदा वरदायिनी , राम किस्न की वीरता
बोलु हर हर गंगे , वेद पुरान की गाथा ।६।

पानी तोरो अमरीत , नाद कलकल गीता
जोत चंदर तुमारी , मन भाये सितलता ।७।

गाये सुरेस नित् दिन , तुमारी किरपा कथा
पावू परमगती ला , पाय तुमारच माथा ।८।

रचनाकार : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

भोयर अन् नदी माय : २ : वर्धा नदी. bhoyar people _ भोयर लोग

भोयर अन् नदी माय - २ : वर्धा नदी
भोयरी संस्कृति ला वर्धा नदी ' वरदायिनी ' स . मध्यप्रदेस क बैतूल जिला की मुलताई तहसील क वरधन सिखर ( वर्धन शिखर ) परीन वर्धा नदी को उगम होस . मुलताई जवर को खैरवानी गाव , वर्धा नदी को जलम गाव . भोयरी संस्कृति मऽ वर्धा नदी ला खास महत्त्व सऽ . 
इरयी , वेना , पोथरा , बेंबळा , निरगुडा , जाम , कार इ वर्धा नदी की मुख्य उपनदीना स . 

१. इतिहास :  * वसिस्ठ पुरान मऽ वर्धा नदी को नाव ' वरदा ' स , आन् वसिस्ठ रिसी न वर्धा जवर क केळझर म ' वरद विनायक ' की स्थापना करीस . 
* वर्धा नदी ' वराह ' क मुंडा मिन निकरीस . वराह भगवान बिस्नूदेव को अवतार ! वर्धा नदी को पह्यलो नाव ' वराह ' . आसिरवाद देनीवाली वरदायिनी , तेकन दुसरो नाव वरदा . आबऽ आमी कव्हजे वर्धा माय .
* पूर्व इतिहास काल म विदर्भराज ' यज्ञसेन ' संगऽ वोको चुलत भाई माधवसेन आन् माधवसेन को सोबती ' अग्निमित्र ' क फऊज की लढाई भयी . येनऽ लढाई म विदर्भराज यज्ञसेन हाऱ्यो आन् वोला समझोतो करनो पड्यो . तब पासीन वरदा नदी विदर्भ राज की विभाजक सीमा बनी . 
* ' ऐन - इ - अकबरी ' म वरदा नदी को उगम ताप्ती माय क उगम पासीन १० कुरो दूर स , असो उल्लेख स .
* इंग्रज क जमाना मऽ इ. स.  १८६२ ला ' वर्धा ' जिलो बन्यो . येन जिला की उत्तर , पश्चिम , दकसिन हद वर्धा नदी कन् बनी आन् वर्धा नदी क नाव परीन नाव देयो ' वर्धा जिला ' . तब जिला की कचेरी पुलगाव जवर कवठा गाव म होती .  इ. स. १८६६ ला पालकवाडी गाव म कचेरी लायी आन् नवो वर्धा स्यहर बसाडे . तब पासिन वर्धा जिला की कचेरी वर्धा म स . 

२ . संस्कृति : आर्वी पासिन जवर च वर्धा नदी पर विदर्भ की पुरानी राजधानी  " कौंडण्यपूर " स. कौंडन्यपूर ला च कुन्डिनपूर , कुंडिनी , कुंडलपूर , विदर्भ , विदर्भा बी नाव स . यहान महापास्यान जुग पासिन ( ४००० बरस पासिन ) साहा संस्कृतीना नांदीस . पह्यली ४००० बरस पासिन , दुसरी २८०० बरस पासिन , तीसरी २३०० बरस पासिन , चवथी सातवाहन काल , पाचवी वाकाटक - राष्ट्रकुट काल , साहाव्वी मध्ययुगीन काल पासिन ! 
* भगवान सिरी राम की बय इंदुमती ( राजा दसरथ को दाआजी ' राजा अज ' की रानी ) ,  अगस्ती रिसी की लाडी लोपामुद्रा , भगवान सिरी किस्न देव की बय पद्मावती ( माय की माय ) , नल राजा की रानी दमयंती आन् गंगा माय ला भूलोक पर ल्यावनी वालो राजा भगिरथ की माय ' केशनी ' कौंडन्यपूर की च ! 
* आन् सबन ला च ठाव स वा भगवान सिरी किस्न देव की रानी रुखमनी माय बी यहान की च !!!!
* भगवान राम किस्न सिन वरदा माय को असो साजरो नातो . वर्धा माय क पोटीना न इतिहास घडाये... संस्कृति की रचना करी !!!!!!!!!
३ . उत्सव : *  वर्धा नदी को उद्गम ठिकान मुलताई पासिन ११ कि.मी. पर खैरवानी गाव जवर स . यहान कपिल मुनी न तप करेतो , असी मान्यता सऽ . राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी यहान आयाता . भूदान आंदोलन क बेरा विनोबा भावे जी बी यहान आयाता . यहान नानोसो कुंड आन् घाट स . घाट पर भगवान सिवजी आन् वर्धा माय को देऊर स . मकर संगरात् ला यहान तीन दिन की यातरा भरस . आन् ' गायत्री महायज्ञ '  बी  होस .
* देवळी जवर रोहनी ( राव ) गाव स . यहान को कोटेस्वर सिवमंदिर मनजे कासी च ! वर्धा माय यहान महादेव मुखी होयकन् देऊर ला येढो मारस . वसिस्ठ रिसी न यहान येक कोटी आहुती होम कऱ्यास , तेकन इ नाव पड्यो , असी मान्यता सऽ . नदी क वोन काठ खटेस्वर मंदिर स . महासिवरातरी ला यहान मोठी यातरा भरस .
* चंद्रपूर जिला म घुग्गुस जवर क ' वढा ' तीरथ ला इठ्ठल रखुमाई को परसिध्द देऊर स . वढा ला वर्धा , पैनगंगा आन् निरगुडा नदी को ' त्रिवेणी संगम ' स . नदी क दुसरऽ थडी पर जुगाद गाव म भगवान महादेव को पुरानो देऊर स . कारतिक पुनव येन संगम पर तीन दिन की यातरा भरस . 
* वर्धा नदी क काठ पर खांडक्या बल्लालस्या राजा न बल्लारस्या ( बल्लारपूर ) नगर बसाडकन् किल्लो ( गढ ) बांध्ये . यहान मारखंड रिसी आन् महामाया को देऊर स . 
* बल्लारपूर क आघऽ वर्धा नदी पर राजुरा इ तहसील को ठिकान स . ११ वी स्यताब्दी म यहान परमार राज होतो . वोनऽ बेरा को ' सोमेस्वर मंदिर ' राजुरा आन् आपली बी स्यान स . यहान बी महासिवरातरी ला यातरा भरस . 

# राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी न साबरमती माय पासिन देस सेवा की सुरवात करी ..बाद म  वर्धा माय क जवर सेवाग्राम ला आपलो ठिकानो बनायकन्  वोला दुनिया म मान देयो .
# वर्धा माय क कोरा म भोयरी संस्कृति ला आसरो भेट्यो . वोक ऽ सुपिक माती मऽ जवारी , गहू , कापूस , संतरा क फसलकन् भोयर समाज सधन भयो . वर्धा माय न भोयर समाज ला आसरो देकन पाले , पोसे च नी त् खूब बाहाडाये बी !
" तोरी महिमा अपार वरदा माय , तोरी किरपा अपरंपार ." 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .



Friday, September 11, 2020

bhoyar people _ भोयर लोग. bhoyari dialect _ भोयरी बोली. म्हारी माय सरोसती

Bhoyar people _ भोयर लोग
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

म्हारी माय सरोसती

म्हारी माय सरोसती , धऱ्या रूप अवतार
दिनऽ बसंत पंचमी , कऱ्या माय उपकार ।धृ।

म्हारी माय सरोसती , माया स अपरंपार
बानी देईस मुकाला , करी वोकी नैय्या पार ।१।

म्हारी माय सरोसती , भाव भावना इचार
सांगन ला दिखाडीस , जबान ला रस्ता चार ।२।

म्हारी माय सरोसती , तोरी अमरीत बोली
देया जीव जंतू बोल , ग्यान भंडार ला खोली ।३।

म्हारी माय सरोसती , हर कला तोरऽ पायी
विना ला बजायकन् , सबुदना निपजाई ।४।

म्हारी माय सरोसती , राजा भोज संग बाता
ग्यान दियो सनातन , वेद पुरान की गाथा ।५।

म्हारी माय सरोसती , मोर हंस को वाहन
काल अकाल सिमरु , सुरेस ला तोरो ध्यान ।६।

रचनाकार : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

bhoyari poem _ भोयरी कविता. येक कुसी म का गहू. bhoyar people _ भोयर लोग

Bhoyari poem _ भोयरी कविता
येक कुसी म का गहू

Bhoyar people _ भोयर लोग
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भाई बहिन को नातो , केती महिमा मु कहू
                                                             येक घर च जलम्या , येक कुसी म का गहू ।धृ.।

पाठ पर बहिन क , पाय देकन गा भाऊ
आये दुनिया म असो , लाड कौतिक को भाऊ ।१।

देखे बाई मुलमुल , बटे जब भात्को खाऊ
वोकऽ हिस्सा ला पस्तुरी , कसो गनित लगाऊ ।२।

नाय सुट्टी बहिन ला , जाय खेलन ला भाऊ
धुनो भांडो झाड झुड , मन वोमच रमाऊ ।३।

मन गंगा माय वानी , वोल हिरदा ला बहू
रहे माया क छाया म , वोक डोरा आघऽ भाऊ ।४।

अडी अडचन बेरा , बाई बनस जिजाऊ
भाई क उन्नती साठी , जसी झिजस खडाऊ ।५।

मन फिफोली क वानी , तन बाई लालबाऊ
धरे सपना गहान , वोकी मुद्दल गा भाऊ ।६।

माय बाप करे चिंता , कब पोटी परनाऊ
फाटे बाई को कलेजो , भाई सिन कसी जाऊ ।७।

बाई लागी संसार ला , बने साह्यब गा भाऊ 
भाईदूज पोह्यती ला , नही करत कलेऊ ।८।

पंचारती वोवारस , डोरा पानी देख ऽ आऊ
भाई क सुख साठी , गानो केतरो मु गाऊ ।९।

छाती सिन लगायकन् , रोवस बहिन भाऊ
चोरी बंगडी धरम , निभावस सखो भाऊ ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


Wednesday, September 9, 2020

भोयरी संस्कृति - २९ : अखजी bhoyar people _ भोयर लोग bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - २९ : अखजी

Bhoyar people _ भोयर लोग
Bhoyari culture _ भोयरी संस्कृति

अस्यां तिथौ क्षयमुपैति हुतं न दत्तं , तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया ।
उद्दिश्य दैवतपितॄन्क्रियते मनुष्यै : , तच्चाक्षयं भवति भारत सर्वमेव ।।

Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली 

भोयरी संस्कृति मऽ बैसाख मह्यना क चांदनी ( उजरी ) तीज ला अखजी को तिवार मनावस . अखजी ला अखेजी , आखा तीज , अक्षय तृतीया , अक्षय तीज बी कोस . 
१. इतिहास आन् मान्यता :  * साडेतीन सुभ महुरत म को अखजी येक सुभ महुरत... येक सुभ दिन !
* पुरान कऽ अनुसार अखजी क दिन जी बी सुभ काम करस , दान करस वोको अक्षय फल भेटस असी मान्यता सऽ .
* भविस्य पुरान कऽ अनुसार अखजी की युगादि तिथी म गिनती होस . सतयुग आन् त्रेतायुग की सुरवात अखजी ला च भयीती . द्वापार युग अखजी ला खतम भयेतो . 
* भगवान बिस्नु देव न नर - नारायन , हयग्रीव , परसुराम जी को अवतार अखजी ला च लेयेतो . भगवान बरमा जी को पोरग्यो अक्षयकुमार अखजी ला परगट भयेतो . गंगा माय अखजी क दिन भूलोक म परगट भयीती .
* अखजी ला बद्रीनाथ जी की मूरती मांडस आन् बद्रीनारायन धाम का कपाट उघडस . वृंदावन म बांके बिहारी जी क देऊर म अखजी ला विग्रह को चरन दरसन होस . 
* महाभारत की लढाई अखजी ला खतम भयीती . 
* बुंदेलखंड म अखजी पासिन पुनव पावतर धुमधाम कन् उत्सव मनावस . मालवा म घडा पर आम्बा का पत्ता आन् खरबूज्यो धरकन् पूंजा करस .
* अखजी ला सोनो चांदी खरिदन को चलन सऽ . 
* पुरान कऽ अनुसार पांडव जब बनवास म होता , तब भगवान सिरीकिस्न नऽ वून ला ' अक्षय पात्र ' देयेतो .
* अखजी ला अनपूरना माय की जयंती रव्हस . 
* अखजी क दिन बरसाद - पानी , फसल - पानी को सगुन देखस . 

२ . रिवाज :  भोयरी संस्कृति मऽ अखजी पितर ( कैलासवासी माय - बाप ) को रिन फेडन को दिन मानस . भोयर अखजी पितर ला याद करकन् , भक्तिभाव कन् पूंजा करकन् मनावस . 
* अखजी क पूंजा साठी येक करसो ( माती की घाघर / मडको ) आन् येक कयरी ( नानी घाघर / गाडगो ) पूंजस . करसो दाआजी ( पिताजी ) को प्रतिक त् कयरी ( गाडगो ) माय को प्रतिक मानस .
* अखजी क पह्यलऽ दिन बी तिवार करस , वोला अगनीघास कोस . चूल म , चवरी जवर निवद धरस . निवद साठी सवारी , भज्या , सी ( सेवरी ) , कुरोडी , आमरस करस . 
" अगनी डाये घास , सरग म जाये बास ." 
* अखजी क दिन सवारी ( सुवारी ) , बडा ,  सी ( सेवरी ) , कुरोडी , आमरस , लाडू , करंजी , गोड पापडी , टिखट पापडी करस . 
* चवरी जवर करसो आन् कयरी मांडस . दिवो , उदबत्ती लगावस . करसा आन् कयरी क गरा ला सूत का पाच येढा गुंडकन् चंदन का पाच - पाच बोट लगावस . करसा आन् कयरी म हरारी ( दुर्वा ) , वारो ( वाळा ) , अकसिद डावस . करसा आन् कयरी क आघऽ दुय पतराई / डोना म निवद धरस . पतराई ला चंदन का पाच बोटना लगावस . घाघर क मुंडा पर गोड पापडी आन् करंजी धरस . निवा पर तूप कन् धुप देस . निवद डायकन् पानी फिरावस न् पाय लागस . 

 ३. रिवाज को नेम : * माय को स्वर्गवास भयो होयेन पर दाआजी ( पिताजी ) होयेन त् अखजी ला कयरी ( गाडगो ) नही पूंजता आवत . सिरफ अगनी घास चालस . 
* दाआजी ( पिताजी ) को स्वर्गवास भयो होयेन पर माय होयेन तरी करसो पूंजता आवस . 
* माय बाप को स्वर्गवास भयो होयेन त् गाव म क नवऽ जोडपा ला ( येन साल च ब्याह भये ती लाडा - लाडी ) पितर करस . अखजी क दिन वून ला घर म ल्यावस . पाय पखारस . अकसिद लगावस .  पतराई , करसा - कयरी की पूंजा करस . निवद डावस . पूंजा भया बाद सबन संगच जेवस . जेवन भया बाद येक करसा म करंजी , पापडी , लाडू डायकन् वोला नवऽ पितर ला दान करस . आबऽ तांबा , पितर , चांदी का गडू बी दान करस . 
* पह्यलऽ क जमाना मऽ हर साल अखजी ला पितर करत होता . पितर कम आन् पितर करनी वाला जास्त , तेकन कोन कोनीक्यान पितर बनेन येला गाव का पंच ठह्यरवत होता . 

लेखिका : सौ . पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख 
सहयोग / लेखन कार्य : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Tuesday, September 8, 2020

गढ कालिका माय की आरती. bhoyar people _ भोयर लोग. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

गढकालिका माय की आरती 

Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
Bhoyar people _ भोयर लोग

जय जय जय , गढ कालिका माय
तोरऽ चरन म , महामाया उपाय । धृ.।

भैरो परबत , सती होठ ला धाऱ्यो
बाहाडे अधर्म , दानवना ला माऱ्यो
सत्जुग मूरती , गाऊ किरती माय
भगत उध्दार , करू आरती माय ।१।

आसन तुमारो , महाभारत काल
दुस्ट संगारिनि , माता जगत पाल
ग्यान कालजयी , पाऊ तुमारऽ पाय
हर इडा पिडा , टार अला बलाय ।२।

अंस देवी माय , नदी सिपरा काठ
तेज झलारस , जोत येकसो आठ
अवल आखर , नाम सुमरु माय
निसि दिन हर , जोत मु बारु माय ।३।

पावन मंगल , बुध्दी सिध्दी की दाता
टारै अमंगल , गढ कालिका माता
किरपा करजे , मुसिबत लिजाय
भजू नित दिन , तोला च आदिमाय ।४।

तेज मुंडा पर , रूप तोरो उजरो
नाक म नथनी , जुडा पर गजरो
माथा प मुकुट , सोना चांदी को माय
डोरा क जोत ला , उपमा च नहाय ।५।

चोबीस मातृका , येक ठानो तुमारो
भोयरी बोली म , गाऊ गानो तुमारो 
कुर देसमुख , सुरेस लिख्ये माय
दे आसिरवाद , किरपा कर माय ।६।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, September 7, 2020

सडक ( भोयरी कविता ). bhoyar people _ भोयर लोग

सडक ( भोयरी कविता ) 

Bhoyari dialect _ भोयरी बोली 

कच्ची पक्की या सडक
गाव गाव ला जोडस
नाय वोला आदि अंत
लात कन् खुंदाडस । धृ.।

येकपावल्या की चाल 
पांदन म बाहाडस
नाव गाव क नाता ला
माय वानी गा जोडस । १ ।

कब खेत म लिजाये
कब देस दिखाडस
माती मुरुम को धुड्डो
गड्डा खूब दचडस । २ ।

कारऽ डांबर ला लेई
पट्टा पांढरा मांडस
खुद अंधारा म रहे
पर उजिड ढुंडस । ३ ।

संगरात सवासिन
जसी बान गा बाटस
चंद्रखडी को पदर
धरतिरी को वाटस । ४ ।

धरे नागिन को रूप
लह्यरस न मुडस
झलारतो कारो पन
दुख दरद बुडस । ५ ।

वोकऽ कोरा म बस्या त 
देव तीरथ घडस
आखरी क यातरा ला
मन वोको धडधडस । ६ ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, September 6, 2020

भोयरी संस्कृति - २८ : हाडपख , अखरपख. bhoyar people _ भोयर लोग

भोयरी संस्कृति - २८ : हाडपख , अखरपख
Bhoyar people _ भोयर लोग

ॐ पितृ दैवतायै नमः ।।

Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति मऽ भादवा कऽ पुनव पासिन हाडपख लागस . भादवा कऽ चांदनी ( उजरी ) चवदस ( अनंत चतुरदसी ) ला गनपति सिराये क दुसयऽ दिन पासिन हाडपख चालू होस . 
१ . पितरपख : * हाडपख ला पितृपक्ष , पितरपख बी कोस . भोयर संस्कृति मऽ पितरपख क सोरा दिन पितर ला याद करकन् वून की पूंजा करस . 
* पितर पूंजा की परथा वेदकाल पासिन स . पितर पूंजा कन् पूंजा करनीवाला ( वंसज ) ला धन , सुख , बरकत आन् स्यक्ति भेटस , असी मान्यता सऽ . 
* माय - बाप असा परिवार का मानुस - बाई गुजऱ्या पर वून क स्यांती साठी , याद साठी सरधा कन् ज्या पूंजा करस वोलाच पितर सराध कोस . 
* पितरपख म पितर ला याद करकन् वून की सेवा करस .
* भोयरी संस्कृति मऽ मानुस पर पितर रिन , देव रिन आन् रिसी ( गुरू ) रिन ला मुख्य मानेस . 
* पह्यलो सराध : पितरपख को पह्यलो सराध अगस्त मुनी को होस . 
* पितरपख म  द्वितीया पासिन अस्टमी पावतर को सराध , पितर क मरन क तिथी अनुसार करस . ज्या तिथी होयेन वोनऽ तिथी ला सराध / पूंजा करस .
* नवमी सराध : येनऽ नवमी ला  ' मातृ नवमी ' , ' अविधवा नवमी ' कोस . ज्या सवासिन बाई येनऽ दुनिया ला जास , वोनऽ पितर की पूंजा पितरपख म नवमी ला करस . 
* दसमी पासिन तेरस पावतर को सराध बी तिथी अनुसार करस.
* चवदस सराध : चवदस क सराध ला ' शस्रदिहत् पितृ श्राध्द ' कोस . जी पितर लढाई म काम आयास , जेनऽ पितर को अकाल स्वर्गवास भयो , वून को सराध चवदस ला करस . 

२. अखरपख :  पितरपख म अखरपख को खास महत्त्व सऽ . पितरपख को आखरी दिन तेकन , ' अखरपख ' . अखरपख ला च सर्वपितरी अवस कोस . भूल्या - बिसऱ्या तमाम पितर का येनऽ अवस ला सराध करस तेकन ' सर्वपितरी अवस '. 
३ . रिवाज :  अ ] पितरपख = पितरपख म पूंजा करन साठी दुपारकन् चवरी जवर जेतरा पितर पूंजन का होयेन वोतरा पीठ कन् पितर काढस . वून को मुंडो घर क दरुजा कित आन् पायना घर क अंदर आवता काढस . दिवो , उदबत्ती लगावस . हरद , कुकू , अकसिद वाहस . जेतरा पितरना होयेन , वून क आघऽ वोतरा पात्र ( पत्तल , पतराई ) मांडस . ( या पतराई मोहा कऽ पत्ता की रव्हस . पुरानऽ बखत म कुम्बडा को पान बी धरत होता ). पतराई ला चंदन का पाच बोटना लगावस . दरुजा ला तूप का बोट लगावस . पतराई पर खीर , सवारी , बडा , कढी , भाजी रव्हस . आघऽ निवो धरस आन तूप की धुप देस . पितर क मुंडा म पतराई पर को कागुर धरकन् पानी फिरावस आन् नमस्कार करस . चुल म , चवरी पर आन् तुरसी जवर निवद धरस . 
पूंजा भया बाद पीठ कन काढ्यास ती पितर , निवद सावडकन् पतराई पर धरस आन् निवद की पतराई घर क कवल पर धरकन् पानी फिरावस . कागुर खान साठी ' आऽ आऽ ' असा बोलस . पूंजा क निवा ला आंगना म तुरसी जवर धरस आन् तूप की धुप देस . तुरसी जवर उदबत्ती लगायकन् पूंजा करस . 

आ ] अखरपख : अखरपख क दिन चवरी जवर क दिवाल जवर पीठ कन् पितर काढस . येनऽ बेरा पितर का पाय दरुजा कित रव्हस , घर क बाहिर जान साठी ! पतराई पर खीर , सवारी , बडा , कढी , भाजी , भज्या रव्हस . पतराई ला चंदन का पाच बोटना लगावस . दिवो , उदबत्ती लगावस . दरुजा ला तूप का बोट लगावस . पितर ला हरद, कुकू , अकसिद वाहस . निवा पर तूप कन् धुप देस . चुल म , दिवरा पर , तुरसी जवर निवद धरस . पितर क मुंडा म निवद धरकन् पानी फिरावस . 
सवारी काढन क सराक म सवारी बडो ओयकन् वोला पितर जेनऽ दिवाल सिन काढ्यास , वोनऽ दिवाल म खुपसस . वोकऽ खलतऽ क निवापर , सवारी बडा परीन तूप डावस , जी निवा पर पड्या पाह्यजे . येनऽ पूंजा ला पितर की सिदोरी कव्हस . सबन पाय लागस . 
पूंजा भया बाद सारी पूंजा सावडकन् जमा करस . पतराई उठायकन् घर पर धरस आन् पानी फिरावस .  ' आऽ आऽ ' आवाज देस . पूंजा को निवो तुरसी जवर धरकन् तूप की धुप देस . हरद कुकू , उदबत्ती लगायकन् तुरसी की पूंजा करस . 
* सोरा दिन पितर घर म होता . अखरपख क दुसरऽ दिन सारऽ घर - आंगन मऽ सडो सारवन करस .
* भोयरी संस्कृति मऽ कोनतो बी पर्व , तिवार पितरपख आन् अखरपख सिन मोठो नहाय . पितरपख म आमी सोरा दिन पितर ला याद करकन् पूंजा करजेन . जिन नऽ आमाला या दुनिया दिखाडीस , जलम देयेस , वून क करजा मिन त् आमी मुक्त नही होय सकत , पर साल म येकसाथ सोरा दिन वून ला याद करकन् सरधा - भक्तिभाव कन् , सराध की पूंजा करकन् वून ला नमन जरुर कर सकस .

लेखिका : सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख
लेखन कार्य : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर



Friday, September 4, 2020

भोयरी संस्कृति - २७ : मांडोस , साजवनी ( गुढीपाडवो ) bhoyar people _ bhoyari culture

भोयरी संस्कृति - २७ : मांडोस , साजवनी ( गुढीपाडवो ) 
Bhoyar people _ bhoyari culture

Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली 

अ ] मांडोस , मांडवस : भोयरी संस्कृति मऽ फाग मह्यना क आखरी अवस ( साल की आखरी अवस ) ला महाराष्ट्र मऽ मांडोस तिवार आवस . उत्तर भारत म मांडोस चयीत मह्यना क अवस ला आवस . दिन येकच स पन् महाराष्ट्र को मह्यनो ( शालिवाहन शके ) अवस ला खतम होस त् उत्तर भारत मऽ पुनव ला खतम होस , तेकन मह्यना म १५ दिन को फरक आवस . 
* मांडोस ला मांडवस , मांड अवस बी कोस . मांड को मतलब धरनो , रचनो , बिठानो , थापना करनो . अवस ला चंदर नही दिसत पन् दुसरऽ दिन पासीन थोडो थोडो दिसस आन् रोज मोठो होस . अवस म सकारकन् की आस , उमिद रव्हस . चालू साल मांडोस ला खतम होयकन् नवऽ साल की रचना यासीन होस , तेकन या मांडोस . ठंढी जायकन् उब तपन ला लागस . कठान का खेतना खाली होस . ढोर जनावर साठी खेत मऽ खाकरीना को मांडो बनावस . 
* भोयर पितर पूजक तेकन भोयरी संस्कृति मऽ साल क आखरी अवस, मांडोस ला खास महत्त्व सऽ . मांडोस क तिवार ला पुरन - आमटी आन् पकवान करस . 

आ ] साजवनी ( गुढीपाडवो ) : ब्रम्हध्वजाय नमः 
ब्रम्हध्वज नमस्तेऽ स्तु सर्वाभिष्ट फलप्रदा ।  प्राप्तेऽ स्मिन्वत्सरे नित्यं मग्दृहे मंगलं कुरु ।।
साडेतीन सुभ महुरत म को गुढीपाडवो येक सुभमहुरत .
१. इतिहास आन् मान्यता : * गुढीपाडवा पासीन  ' शालिवाहन शक ' सुरू होस . स्यालिवाहन राजो पयठन ( प्रतिष्ठान ) , महाराष्ट्र म कुंभारबाडा म नाना को मोठो भये . वोनऽ परकऽ मुलुख मिन आया ' शक ' हमलावर ला हाराये . तब पासिन ' शक कालगणना ' चालू भयी .
* भगवान सिरी राम लंका परिन रावन ला हरायकन् अजुध्या म येनऽ दिन आयाता , असी मान्यता सऽ .
* महाभारत क कथा अनुसार चेदी राजो बसू न जंगल म जायकन् जपतप कऱ्या . भगवान परसन्न भया आन् राजा बसू ला बयजयंती माला , येक उडनखटलो आन् राज सुरू करन साठी राजदंड देये . राजा न वोनऽ राजदंड क वरतऽ जरी को कपडो धरकन् वोपर सोना को गोलो बसाडे . वोकी पूंजा करी . इच गुढीपाडवा को पह्यलो सरूप होय , असी मान्यता सऽ . 
* गुढीपाडवा क सुभ महुरत ला साखरपुडो , ब्याह , वास्तुक साठी सुभ मानेस .
* तेलंगना , आंध्रप्रदेस , करनाटक म गुढीपाडवा ला ' उगादि ' ( युगादि ) कोस .
* दुरगा माय क पूंजा को नवरातरी व्रत गुढीपाडवा पासीन चालू होस . 
* मांडोस ला द्वापार युगादी अवस बी कोस .
* ' ब्रह्मपुराण ' क अनुसार भगवान बरमा जी न गुढीपाडवा ला दुनिया की रचना करीस .
* गुढीपाडवा ला युगाब्द ( युधिष्ठिर संवत् ) की सुरवात होस . युधिष्ठिर को राज्याभिसेक गुढीपाडवा ला भयेतो . 
२ . रिवाज : भोयरी संस्कृति मऽ साजवनी ( साजोनी ) ला खूब महत्व सऽ . घर ला आंबा कऽ पत्ता आन् झ्यंडू क फुल की तोरन बांधस . खेत मऽ क मांडो ला बी मोठ्ठी तोरन बांधस आन् मंझार मंझार म तुम्बडी , नारेल बी गुफस . 
घर की लक्षुमी सकारीच घाईपांजी कन् खेत मऽ क साजवनी क पूंजा साठी सी ( सेवरी ) , आमरस , कुरोडी , भाजी - भाकर ( पोळी ) , निवद आन् पूंजापाती को सामान हारा म भरकन् देस . गडीमानुस पह्यलेच बयीलना पर रंग डायकन् वून ला रंगावस आन् झूल लेकन खेत मऽ जास . ज्यान मोह्यतूर का पाच तासना बखरन का होयेन वहान बखर जूतकन् राखस . मालक , पोटुबाटूना खेत मऽ आया पर पूंजा करस . बखर पर पानी सिपडकन् वोला सेंदूर का पाच बोटना लगावस . बखर क आघऽ पान को बिडो धरस . दिवो , उदबत्ती लगावस . नारेल धरस . जूत्या बयील जोडी की पूंजा करस . हरद कुकू , अकसिद वाहस आन् कपूर बारस . मंग बखर का पाच तास हाकलस . पात हाकल्यापर बयील जोडी ला गोड पोळी को निवद देस .गडी ला दकसिना देस . पूंजा भया पर सबन झन खेत मऽ जेवस . घर म लक्षुमी की मोठी धांदल रव्हस . वोला तिवार का पकवान बी रांधन को रव्हस आन् दारपान ( दाळपान ) की तयारी बी करनो लागस . दारपान म सातऱ्या सोला / घुगरी रव्हस . पान पुडो आन् पानदान म गुलाल , गाठी ( बतासा की मार )  धरस . भोयरी संस्कृति मऽ या परंपरा खुब साजरी स . मालक घर आया बाद गडी मानुसना ला , आयकरीना ला , घर म दारपान साठी बलावस . सालदार को साल महासिवरातरी , सिमगा नही त् मांडोस ला होस . आयकरीना की काम्बरकी साजोनी क दिन ठह्यरस . माली , खाती , बाढी , चम्भार , वठ्ठी , भुमक ( आयकरीना ) दारपान साठी घर म आवस . सालदार को साल आन् आयकरीना की काम्बरकी हासी खुसी कन् ठह्यरस . साल ठह्यऱ्या पर सालदार मालक पासिन बिडो लेस . साजोनी क दिन कोनी कुनीला च नाराज नही करत . येकमेक ला गुलाल लगायकन् गाठी देस . दारपान , पानसुपारी होस . 
दारपान म गम्मतबाजी बी खूब होस . येखांदो गडीमानुस बिना दोरी क खाट ( बाज ) पर सनकाडीना धरकन् वोपर दुलयी डायकन् राखस . दारपान ला जी बी गडी , आयकरी , सेजारी पाजारी आया , वून ला वोनऽ खाट पर बसन ला कोस . जसो वू बसस उसोच धाडकन् खलतऽ पडस , आन् सबन लोगना वोकी मज्या लेस . मंग वू बी दुसरा की बाट देखस . आन् कोनी आयो त् वोला वोनच खाट पर बसाडस . सारा को हासन को येकच कल्लो रव्हस .

( सहयोग : सौ पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Thursday, September 3, 2020

भोयर अन् नदी माय - १ : माय ताप्ती bhoyar people _ भोयर लोग

भोयर अन् नदी माय - १ : माय ताप्ती
Bhoyar people _ भोयर लोग

गंगा स्नाने , नर्मदा दर्शनेश्चव , तापी स्मरणे पाप नाश्यति ।

Language of the article : bhoyari dialect _ भोयरी बोली 

भोयरी संस्कृति मऽ ताप्ती माय की मोठी महिमा स. नदी आन् मानुस को गह्यरो नातो स . नदी क पानी कन् फसलच नही होत त् नदी संस्कृति आन् सभ्यता ला बी जलम देस ; वूनला पोसस ! तेकनच भोयरी संस्कृति मऽ नदी ला माय , देवी क रूप म च देखस... पूंजस . भोयरी संस्कृति ला ताप्ती माय पालस... पोसस .
* भारत म पश्चिम वाहिनी नदी म नरमदा , चंदर की पोटी माही आन् सूर्व्यदेव की पोटी ताप्ती या तीनच नदीना स .
* थायल्यांड क तापी नदी को नाव बी इ. स. १९१५ म आपली ताप्ती माय क नाव परीन च धरेस .
* ताप्ती माय असी येकली नदी स जेकऽ नाव कन् " तापी पुरान " लिखेस .
ताप्ती माय को उद्गम ठिकान मुलताई स , जेला मूलतापी बी कोवस .
१. इतिहास आन् मान्यता : * बिस्नुपुरान म ताप्ती माय को असो उल्लेख स , " तापी पयोष्णीनिर्विध्या प्रमुखा ऋक्षसंभवा : "
* सिरीमद् भागवत म ताप्ती माय को उल्लेख स , " कृष्णा वेण्या भीमरथी गोदावरी निर्विध्या पयोष्णी तापी रेवा ." 
* रामायन क अनुसार भगवान सिरीराम जी न सीता माय आन् लक्षुमन संग सूर्व्यदेव की पोटी आदिगंगा ताप्ती माय क काठा पर बारालिंग यहान पितर न् राजा दसरथ की तरपन पूंजा करीती . 
* मान्यता सऽ कऽ ताप्ती नदी म फुलना सिराया पर मयत क आतमा ला मुक्ति भेटस .
* पुरान कऽ अनुसार भागीरथ न घोर जपतप करकन् गंगा माय ला भूलोक पर ल्यावन साठी प्रयास करे . पर वोन बेरा पुरी दुनिया म आदिगंगा ताप्तीमाय की मोठी महिमा होती , तेकन गंगा माय आवन ला तयार नहीती . तब नारदमुनी नऽ ताप्ती महिमा की सारी पोथी गायब करी , तबच गंगा माय हिमालय म परगट भयी . 
* भविस्य पुरान कऽ अनुसार सूर्व्यदेव को ब्याह बिस्वकरमा जी की पोटी संजना सीन भयो . संजना की पोटी कालिन्दनी आन् पोरग्यो यमदेव जी . सूर्व्यदेव की गरमी कन् परेस्यान संजना तप करन ला गयी न् आपली बहिन छाया ला धाडे . छाया न संजना को रूप धरकन् सूर्व्यदेव की सेवा करी . छाया को पोरग्यो सनिदेव आन् पोटी ताप्ती माय . 
* वायुपुरान क अनुसार कृत जुग म राजकुमार सवरन ( चंद्रवंसी राज्यो ऋष्य को पोरग्यो ) न् ताप्ती माय संग ब्याह करे . 
२. ताप्ती जयंती उत्सव आन् मेलो :  * मुलताई म गायतरी परिवार किथिन तरपन पूंजा बिना पयसाकन् करकन् देस .
* मुलताई म आस्याड मह्यना क चांदनी ( उजरी ) सपतमी ला ताप्ती माय को जलम दिन ( जयंती ) मोठऽ धारमिक उत्सव क रूप म मनावस .
* ताप्ती माय को जयंती उत्सव बुरहानपुर ( ब्रघ्नपुर ) म बी मोठऽ धारमिक पूंजा पाठ कन् मनावस .
* अगरितोडा गाव जवर ताप्ती माय सूर्व्यामुखी स . यहान क तीरथ पर हरसाल मकर संगरात् ला मोठो मेलो लागस . 

३. ताप्ती माय आन् भोयर समाज : ताप्ती माय न भोयर संस्कृति ला पाले - पोसे आन् बाहाडाये . आदिगंगा ताप्तीमाय की आपलऽ पोटुबाटूना पर किरपा स . वोको उपकार कब बी नही फिटेन . संजय पठाडे ' शेष ' आन् कयी लोगना न सूर्व्यदेव की पोटी ताप्ती माय पर लिख्यास . ताप्ती माय की जयंती आपलो समाज आन् इतर समाज बी मोठऽ भक्तिभाव आन् धुमधाम कन् मनावस .
....... जय ताप्ती माय...
लेखक :  सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

Wednesday, September 2, 2020

भोयरी संस्कृति - २६ : महासिवरातरी , पाच पावली. bhoyar people _ bhoyari culture

भोयरी संस्कृति - २६ : महासिवरातरी , पाच पावली
Bhoyar people _ bhoyari culture

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि ।
शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ: ।।

योग योग योगेश्वराय। भूत भूत भूतेश्वराय ।
काल काल कालेश्वराय । शिवा शिवा सर्वेश्वराय ।
शम्भो शम्भो महादेवाय ।

Language of the article : bhoyari dialect

भोयरी संस्कृति मऽ फाग मह्यना क अंधारी चवदस ला महासिवरातरी को तिवार आवस आन् दुसरऽ दिन पाच पावली पुंजस . 
* महासिवरातरी को तिवार भारत , नेपाल , बंगला देस अऊर कयी देस म मनावस .
* महासिवरातरी ला सिवरातरी , सिव चवदस , सिव चतुरदसी , हेरथ बी कोस .

१. मान्यता : *  पुरान कऽ अनुसार महासिवरातरी क दिन पुरी दुनिया को जलम भये . 
 * येनऽ दिनच भगवान महादेव न् पाराबती माय को ब्याह भयो .
 * महासिवरातरी ला आदिदेव भगवान सिव अगनी लिंग रूप मऽ परगट भया .
 * समुंदर मंथन क बेरा निकऱ्यो हलाहल ला भोल्यानाथ न गरा म धरे न् दुनिया बाचाडी . वोनऽ 
 जह्यर कन् वून को गरो निरो भयो , तेकन नाव पडे ' निलकंठ '! जह्यर क इलाज को उपाव मून सिवजी ला रातभर चेतो राखनो जरुरी होतो . देवताना न रातभर भजन - किरतन करे . सकारी भगवान न सबन ला आसिरवाद देयो . तेकन महासिवरातरी ला उपास धरकन् पूंजापाठ करस.
२. यातरा : * भोयर म पचमढी की यातरा को धारमिक महत्त्व स . गाडी - घोडा को साधन नही होतो तब या यातरा खूब कठिन होती . यातरा ला गया ती वापिस आयेन क नही , येकी खातरी नयीती . तब भगत लोगना १५ दिन पह्यलऽ पासिन पयदल पचमढी ला जान साठी निकरत होता . आब साधनना स तेकन येक दिन म पचमढी ला जाता आवस . पह्यलऽ क कठिन यातरा की झलक महादेव क गाना म दिसस ...
महादेवी जाऊस गाऽ  , हे भोल्या गा सम्भा ऽ 
चवऱ्यागड दिसस बिल्लम 
चवऱ्या पर  येंगता येंगता 
म्हरो भये गा दुसरो जलम ऽ

* यातरा क बेरा भूराभगत , जटासंकर , महादेव गुफा , नानो महादेव , चवऱ्यागड पर भगत लोगना की खूब भीड रव्हस . महादेव का गाना कवत कवत भगत लोगना पयदल पयदल पुरऽ भुवान म घुमकन् पूंजा करस . कोनी कोनी हरसाल जास . कोनी को नवस रव्हस . कयी लोगना लोहा को तिरसूल चवऱ्यागड पर चढावस . चवऱ्यागड क महादेव ला मोठो ( बडो ) महादेव कोस . येनऽ यातरा म खानपेन की सुबिधा कयी मंडल का लोगना मोठऽ भक्तिभाव कन् करस .
* उसी त् महासिवरातरी ला हर गाव क जवरपास यातरा भरस . जास्त करकन् यातरा गड पर भरस . यातरा म मेलो बी रव्हस . 
* पूंजा साठी बेल, फुल , अकसिद , नारेल , खारिक , उदबत्ती , कपूर , धोतरा को फर लेस .

३ . पाच पावली : महासिवरातरी क दुसरऽ दिन दुपारकन् आंगना म खाट को मांडो बनावस . वोपरीन चादर डावस . आन् वोकऽ सावली म सेंदऱ्या देवना न् मानिनी की पूंजा करस , वोला पाच पावली पूंजनो कोस . जी लोगना महादेव क यातरा ला जास वूई १५ दिन पह्यलेच पाच पावली पुंजस . पाच पावली पूंज्या पर उपास सोडस .
* साल भर कोनतऽ न कोनतऽ तिवार म महादेव पाराबती की पूंजा होसच . पन् महासिवरातरी क महादेव भोल्यानाथ की पूंजा को महत्त्व बेगरोच स .
 बाईलोगना खेत मऽ काम करन क वक्ती बी महादेव का गाना गास ...
खांदा पर खारवी , खारवी भयी जड 
मला आवस लड , कसो चेंगू चवऱ्यागड ...
महादेवी जाऊस , रोवस बहिन 
वापिस आऊन , तब लुगडो लेऊन .....
पानी पाऊस पडस , वरनी गरस 
पाठ की बहिनाई , मोठ्यानऽ रोवस .....

देऊर म बी महादेव क गाना को भजन चालू रव्हस . देव को देव महादेव को इ पर्व भोयर समाज महादेव पाराबती आन् कुर क देवपूंजा संगऽ मोठऽ भावभक्तिकन् मनावस . 
* सेंदऱ्या देव आन् मानिनी ( पितर ) की पूंजा चवरी जवर होस . पर महासिवरातरी क दुसरऽ दिन या पूंजा आंगना म मांडस ; आन् वोलाच पाच पावली पूंजनो कोस .
हर हर महादेव....

( सहयोग : सौ पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .


Tuesday, September 1, 2020

भोयरी संस्कृति - २५ : होरी , सिमगो - धुड्डी. bhoyar people _ bhoyari culture

भोयरी संस्कृति - २५ : होरी सिमगा - धुड्डी

Bhoyar people _ bhoyari culture
भोयर लोग _ भोयरी बोली

अहकूटा भयत्रस्ते: कृता त्वं होली बालिशै:
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति - भूति प्रदायिनीम् ।

 language of the article : bhoyari dialect 

भोयरी संस्कृति मऽ होरी बसंत रुत म को मोठो तिवार.. मोठो पर्व ! फाग पुनव ला होरी आवस आन् दुसरऽ दिन धुड्डी खेलस . धुड्डी बसंत रुत क उत्सव को पह्यलो दिन . उत्तर भारत मऽ धुड्डी पासिन नवो साल लागस त् महाराष्ट्र म यासिन १५ दिन बाद नवो साल लागस .( गुढीपाडवो ) .
* होरी भारत , नेपाल , पाकिस्तान , बंगलादेस , सिरीलंका , मारीसस , फिजी आन् क्यारेबियन देस म धुमधाम कन् मनावस .
* होरी का नाव : डोल यातरा / डोल पुर्णिमा ( प. बंगाल )
                       कामन पोडिगयी ( तमिलनाडू )
                       होला मोहल्ला ( पंजाब )
                       कामना हब्बा ( कर्नाटक )
                       फगुआ ( बिहार )
                      होळी , हुताशनी पौर्णिमा , नारळी पौर्णिमा ( महाराष्ट्र )
                      शिमगो ( गोवा ) 
                      गोविंदा होली ( गुजरात )
                      योसांग होली ( मणिपूर )
                     छारंडी ( राजस्थान )
                     फाग , फाग पुनव .....
१. मान्यता :  * पुरान कऽ अनुसार हिरन्यकसिपू की बहिन को नाव होलिका होतो . वा रोज आग कन् न्हावत होती . हिरन्यकसिपू ला भगवान बिस्नु देव को भगत , परलाद नाव को पोरग्यो होतो . राजो बिस्नुदेव ला दुसमन मानत होतो , तेकन वोनऽ परलाद ला मारन को बिचार कऱ्यो . वोनऽ आपलऽ बहिन होलिका ला कह्ये क् परलाद ला मांडीपर बसाडकन् अंगार कन् आंग धो . होलिका न उसोच कऱ्यो ; पर होलिका जर गयी न् परलाद बाच्यो . कारन होलिका भूल गयीती क अगनी नहान वा येकलीच कर सकत होती . तब पासिन येनऽ तिवार की परथा पडी . 
* होरी तिवार ला पुरानऽ बसंत उत्सव को रूपांतरन बी मानस .
* खूब पुरानऽ जमाना मऽ होरी ला ' होलाका ' कव्हत होता . 
* लिंगपुरान म फाग पुनव ला ' फाल्गुनिका ' कहेस .
* वराह पुरान मऽ येला ' पटवास - विलासिनी ' कहेस .
* येक पुरान कथा क अनुसार राजा रघु जवर लोगना गया आन् सांगे क ' ढोण्डा / धुंधी ' नाव की राकस्यसीन ला सिवजी को वरदान भेटेस क वा कुनीकन् मरनार नही , सिरफ खेलता - मस्ती करता पोटुबाटूना ला च वा भेयेन आन् ' अडाडा ' मंतरकन् भागेन .
* कयी लोगना क माननो स क होरा स्यबद नवऽ साल सिन संबंधित स . जूनऽ साल क आखरी म साल बदलवनी वालो तिवार , बसंत रुत - नवो साल आवन क रूप म रंग खेलन को तिवार असो पह्यले रूप होतो , असा मानस . 
* असी मान्यता सऽ कऽ भगवान सिवजी न होरी क दिन कामदेव ला भसम करेतो . 
* नारद पुरान आन् भविस्य पुरान मऽ बी होलाका पर्व की जानकारी स .

२ . होरी तिवार को बदलतो रूप : *  सुरवात क बेरा म होरी तिवार सवासिन बाईलोगना घर परिवार क सुख समरुध्दी साठी फाग पुनव क चांद की पूंजा करकन् मनावत होता . 
* वैदिक काल म होरी ला ' नवात्रेष्टि यज्ञ ' कवत होता . वोन बेरा खेत मिसिन निकऱ्या अनाज ला होम म दान करकन् भूंज्या अनाज को परसाद लेनको रिवाज होतो .अन्न ला होला बी कव्हस  , तेकन येनऽ तिवार ला ' होला , होलिकोत्सव ' नाव पड्ये . भुंज्या सोला ला बी हुरा , होरा , होला कव्हस .
* वेद काल क बाद म होरी क दिन गार ( गाली ) देन को रिवाज पडे . आन् होरी दहन ला मृत संवत्सर को प्रतिक माने तेकन होरी जवर बाईलोगना को जानो बंद भये .
* आब गार ( गाली ) देन को रिवाज बंद पडेस . माय बाप संगं पोटुबाटूना सबन होरी की पूंजा करन ला जास .
* बरसाना की लठमार होरी परसिध्द स .

३. होरी : भोयरी संस्कृति मऽ बसंत पंचमी पासिनच होरी को माहोल चालू होस . गोबर की चाकोली ( गूलेरी , बडगुले , भरभोलिये ) बनावनो चालू होस . इ चाकोलीना बेग - बेगरऽ आकार की रव्हस आन् मंझार म वोला मुंज क रस्सी म गुफन साठी सेदूर करस . होरी साठी खोडना जमा करनो चालू होस . मयदान मऽ जागा झाडकन् पानी सिपडस . मंझार म दर करकन् वोम मोठो खोड आन् अरंडी को झाड गाडस . वकऽ भवताल खोड , काडी , तुराटी रचस आन् सूत गुंडारस . कयी जागा पर होरा आन् होरी असी दुय बनावस . भवताल चऊक पुरस . महुरत क बेरा पर सबन आपापली पूंजा लेकन होरी जवर जमा होस . पूंजा म चाकोली आन् गाठी की मार , बत्तासा , नारेल , दिवो , हरद कुकू , कपूर , उदबत्ती , गुलाल न् पुरन को निवद रव्हस . पह्यलऽ जमाना मऽ होरी जवर कोतवाल रव्हत होतो , तेकन पुरन का दुय निवद लिजात होता ; येक कोतवाल साठी न् येक होरी साठी . होरी क भवताल पानी फिरायकन् होरी ला चाकोली आन् गाठी की मार चढावस . पूंजापाती करकन् निवद धरस आन् येकदुसरा ला गुलाल लगायकन् नमस्कार करस . 
४ . धुड्डी : होरी क दुसरऽ दिन रंग खेलस . परसा क फुल को रंग बनावस . दुकान मीन बी रंग ल्यावस . धुड्डी ला धुरड्डी , धुरखेल , धुलिवंदन , धुळवड , धुलेंडी बी कोस . होरी म जरी चाकोली की राखड घर म ल्यावस . होरी पर आंग धोन साठी पानी गरम करस . येटार येटार  म रंग खेलन साठी येक दुसरा क घर जास . नानऽ पोटुना ला गाठी मार घालस . बसंत , रंग की मऊज मस्ती म सबन रंग जास .
होरी खेलू आज किसनजी
तोरऽ संग खेलू खूब होरी ।
महाल मऽ तोला पकडू
सबन संगऽ तोला रंगावू
कसर सगरी मु निकारु
तू केतरी ले खबरदारी ।
लुक कन् आमाला रंगाये
राधा ला तू गुलाल लगाये
तोरा सोबती मला चिडाये
आब आई काना तोरी बारी ।

( सहयोग : सौ . पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर