Friday, April 29, 2022

निर्माण : भाग ६

निर्माण : भाग ६

क्वार्टर्स के निर्माण कार्य के साथ ही बाहरी sanitary work भी प्रारंभ करने के बारे में मै सोच रहा था . संबंधित विभाग के अभियंता से विचार विमर्श किया . मैने साइट के हिसाब से working drawings बनाई . अब ढलान के हिसाब से किधर , कितने और कितने capacity के सेप्टिक टैंक बनाने है , इसका निर्णय लेना था . यह निर्णय अधिक्षक अभियंता ही ले सकते थे . उन्होंने ढलान की ओर खाली पडी जगह दो टैंक के लिए मुकर्रर की . 
खुदाई काम करने वाली मजदूर की एक टोली को काम पर लगाया . काली मिट्टी की जमीन थी . साइट के एक बाजू मे ऊॅंची जगह थी , और उस जगह की विरुद्ध बाजू की ढलान पर भी निर्माण कार्य जारी था . उसके आगे बडा सा खेल का मैदान था . जब वहॉं से खुदाई चालू की तो आगे ऊॅंची जगह पर खुदाई बहुत गहरी जा रही थी . दोनों ओर क्वार्टर होने से बीच में काफी कम जगह बच रही थी , जो माटी फेंकने के लिए अपर्याप्त थी . 
काली मिट्टी में खुदाई होते ही धूप , हवा से नाली की दिवारों में दरारे आ रही थी . सभी मजदूर थोडी थोडी दूरी पर जोडी से काम कर रहे थे . ऊॅंचाई वाली जगह पर एक बुजुर्ग पति - पत्नि खुदाई कर रहे थे . दोपहर की खाना खाने की छुट्टी हुई लेकीन वृध्द दम्पत्ति अभी भी काम कर रहे थे . 
हम लोग ऑफिस मे भोजन कर रहे थे की , एक मजदूर हमारे पास आया और बोला की , ' साहब , जल्दी साइट पर चलिएं.
' क्या बात है ? ' मैने पूछा . 
' साहब , डोकरा - डोकरी मन नाली मे दब गये है...' मजदूर ने कहा . 
भोजन कर रहे बाकी स्टाफ भी सकते मे आ गये . हम दौड कर घटनास्थल पर गये . दिल दहला देने वाला नजारा था ! वृध्दा गले तक मिट्टी में दबी थी और उन के पति का नामोनिशान नही था . 
' पहले हमारे आदमी को निकालो जी...' वृध्दा ने रोते हुएं कहा . 
' कहॉं है वे ? ' मैने चिंता व्यक्त कर पूछा . 
' मेरे सामने ही माटी में गडे है ...' वृध्दा ने रोते - रोते बताया . 
फावडा तो चला नही सकते थे.. मजदूरों ने हाथों से ही मिट्टी निकाली .  थोडी देर बाद उस बुजुर्ग की पीठ दिखी . असल मे वह टोकरी मे मिट्टी भर कर दे रहा था और वृध्दा उसे किनारें पर फेंकती थी .वह बुजुर्ग मजदूर मिट्टी भर ही रहा था की भरभरा के नाली की दिवार ढह गयी . और किनारे पर फेंकी हुई मिट्टी ने नाली को पाट दिया . मजदूर तेजी से मिट्टी निकाल रहे थे , इस कारण और मै किसी अनुचित की आशंका की वजह से पसीने से तरबतर हो गये...
वह बुजुर्ग मजदूर जीवित है की मृत ? यह यक्षप्रश्न था..... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, April 28, 2022

अजब गजब - ९१ : महाराज जगदेव पवार

अजब गजब - ९१ : महाराज जगदेव पवार
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
यशोद्यादित्य नृप: पितासिदैव पितृव्यस्त च भोजराज:।
विरेजंतुयों वसुंधिपत्य प्राप्तप्रतिष्ठाविद पुष्पदंतो ।।
_ आदिलाबाद अभिलेख 

महान राजा भोज को भाई मालवा नरेस उदयादित्य . राजा उदयादित्य ला महान राजा भोज को वारस मानस . राजा उदयादित्य ला दुय रानी होती . येक सोलंकी राजवंस की आन् दुसरी बाघेला राजवंस की ! 
लोकगाथा नायक वीर जगदेव पवार , सोलंकी राजवंस की रानी को पोरग्यो . बाघेला राजवंस की रानी को पोरग्यो , ' रिणधवल ' . राजा उदयादित्य न रिणधवल ला युवराज बनायो . 
महान राजा भोज को पुतन्यो ( भतीजो ) वीर जगदेव पवार साहसी योध्दा आन् सेनापती क रूप म देस म परसिध्द होतो . कई लोकगाथा को नायक वीर जगदेव पवार की कथा बी खूब स . इतिहासकार म बी कई मतभेद अन् बिचार स . 
गुजराती लोकगाथा ' रास - माला ' क नुसार , रिणधवल  युवराज बनन क बास्त वीर जगदेव जी न सेनापती पद सोड कन् मालवो सोड्यो . मालवा परीन वूई गुजरात आया आन् राजा सिध्दराज क फऊज की कमान संभाली . राजा सिध्दराज को जीव बाचाडन साठी वीर जगदेव जी न कंकाली माय ला आपलो डोकसो काट कन् चढायो . देवी माय परसन्न भयी आन् वीर जगदेव जी ला वापिस जित्यो कऱ्यो . 
संवत् इग्यारह इकांनवै , चैततीज रविवार ।
सीस कंकाली भट्टनै , जगदेव दियो उतार ।।
* राजा सिध्दराज न वीर जगदेव पवार जी ला मोठी जागीर देयी , आन् आपली पोटी वीरमती / कमोला को बिह्या बी कर देयो . 
* राजा सिध्दराज न मालवा प हमलो करन की तैयारी करी . वीर जगदेव पवार जी ला येकी खबर लागी . वून न तत्काल आपलो पद सोड्यो . आन् मायभूमी मालवा क सेवा साठी गुजरात सोड्यो . वोन बेरा मालवा पर वीर जगदेव पवार जी क पिताजी को च राज होतो . राजा उदयादित्य न आपलअ पोरग्या को स्वागत कऱ्यो आन् वोला आपलो वारीस नेम्यो . राजा उदयादित्य क सर्गवास क बास्त वीर जगदेव पवार जी मालवा को राजो बन्यो . 
धारा भितर मै बसु , मेरे भितर धार ।
जो मै चलू पिठ दे , तो लाजे जात पवार ।।
_ वीर जगदेव पवार जी
* राजस्थानी लोकगाथा म वीर जगदेव पवार जी नाव ' जगदेव पवार ' स , पर मालवी लोकगाथा म वून को नाव ' लक्ष्मदेव '( लक्षुमनदेव )  स . 
* वीर जगदेव पवार जी न बंगाल क पाल राजा , चेदी क कलचुरी राजा , अंग - कलिंग क राजा , दकसिन भारत क चोल राजा , कांगडा क कीर राजा ला हारायो . मालवा पर मुसलमान को हमलो भयो तब वीर जगदेव पवार जी न मुसलमानी फऊज ला बी हारायो . 
* वीर जगदेव पवार जी का चालाया सिक्का बरार आन् दक्कन म सापड्यास . याहान च कई अभिलेख बी सापड्यास . ( मालवा म नी सापड्या ) . महाराष्ट्र आन् तेलंगणा क हद जवर को गढचांदुर  वीर जगदेव पवार जी को राजधानी को ठिकानो होतो . 
* ११ वी अन् १२ वी सदी येनअ वीर राजा की पूंजा महाराष्ट्र , मध्य प्रदेस , छत्तीसगढ , गुजरात , राजस्थान , जम्मू काश्मीर , उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेस , अमरकोट ( सिंध - पाकिस्तान ) म होस . येपरीन वून क वीरता अन् आस्कारा को अंदाजो आवस . 
* महान वीर जगदेव पवार जी को सर्गवास इ.स. ११५१ म भयो . 
* आपलअ देस म ४ राज्याना ला महादानी कोवस . राजो बलि , रघु राजो , राजो करन आन् राजो वीर जगदेव पवार जी ! समराट विक्रमादित्य आन् चक्रवर्ती राजा भोज की परम्परा वीर जगदेव पवार जी न आघअ चलाई . 
।। नमन वीर जगदेव पवार जी 🙏🙏।।

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर




जंग ( कविता )

जंग

गरल अहंकार का
स्वार्थ का काला भुजंग
पीती निष्पाप का लहू
ज़लज़ले जैसी जंग ।

उजडते घरद्वार
चारों ओर हुडदंग
सीमा पर उपजता
नासूर ये बदरंग ।

भयभीत नर नारी
जंग देख कर दंग
फ़िज़ा में घुलता जाता
निराशा का स्याह रंग ।

क्रौर्य के इस खेल में
सदाशयता बैरंग
लीलती है मानवता
यह पीडा की सुरंग ।

सर्वनाश को आतुर
बर्बरता का ये ढंग
कौन जीता कौन हारा
नही बतलाती जंग ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, April 26, 2022

कर्म. ( कविता )

कर्म 

अनवरत करनी
मनुष्य की पहचान
बुद्धिजीवी श्रमजीवी
करते भाग्य निर्माण ।

लकीरों के फकीर ही
कर्म हीनता प्रमाण
यश अपयश मात्र
कर्म गति के निशान ।

भिन्न भिन्न पैमाने की
प्रत्यंचा चढ़ी कमान
नित कर्म की शक्ति से
लक्ष्य भेदता है बाण ।

निरंतर कोशिश से
काबू मे आता तुफान
हौंसले की उडान से
झुकता है आसमान ।

अकर्मण्यता पाप है
पुण्य कर्म प्रतिमान
मेहनत ही भाग्य का
एकमेव वर्तमान ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख, नागपूर

Monday, April 25, 2022

अज्ञात..

अज्ञात

कुछ खास नर्म अहसास
खट्टे मीठे अनमोल पल
ज्ञात रोशनी में धुंधले से
राह रोके उत्तुंग अचल ।

सीमारेखा मद्धिम मद्धिम
भ्रम आभास जैसा अतल
आती रहस्यमय आवाज
धीरगंभीर सी कलकल ।

चेहरा छप न सका और
स्मृति के हुएं बंद पटल
गूढ़ता का लबादा भी स्याह
भरमाना तो है ही अटल ।

भावना कुछ संवेदनाएं
खिल रही कोमल कोंपल
अज्ञात व्यक्ति भी दृश्यमान
स्नेहबंध में झूमा कमल ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

मॉं मराठी. अ. भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन

मॉं मराठी

मराठवाडा का उदगीर
जिस का लातूर नाम जिला
अखिल भारतीय मराठी
साहित्य सम्मेलन का मेला ।

मराठी साहित्य पंढरी की
९५ वी यह मौक्तिकमाला
साहित्य दर्शन , मंथन का
यह साहित्यिक कुंभ मेला ।

सभी नवोदित , प्रस्थापित
सारस्वत का संस्कृति रेला
अभिजात मराठी का पर्व
कोई गुरूवर कोई चेला ।

झलकता शब्दों का अमृत
कही चुभता प्रखर भाला
काव्य की रिमझिम फुहार
कही धधकती शब्द ज्वाला ।

वैखरी , मध्यमा , परा , पश्यन्ति
वाणी का अद्भूत शिवाला
मॉं मराठी के ध्वजवाहक
चहुंओर फैलाये उजाला ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, April 20, 2022

डायरी २०२२ : लिफ्ट , भाग १

डायरी २०२२ : लिफ्ट , भाग १

चिलचिलाती धूप.. ट्रैफिक भी सुबह के मुकाबले बहुत कम . इक्का दुक्का वाहन थे ; और वे भी ऐसे दौड रहे थे , मानो धूप से बचने के लिए कही छांव की आस खत्म न हो जाए ! सडक का डामर पिघल रहा था लावे की तरह... मृगमरीचिका का मायावी सागर हिलोरे ले रहा था.. तेज धूप से ऑंखें भी चौंधिया रही थी. कार का A. C. Full on .. पर इस ठंडक में भी सुकून का अहसास नही था . 
अचानक एक सफेद दुपट्टा लहराया फ्लाईओवर के पहले . ऐसे लग रहा था मानो , सूर्य भगवान के प्रखर ताप से सुलह करने के लिए सफेद परचम लहरा रहा हो समझौते का !
कार की गति धीमी की . उस महिला ने लिफ्ट मांगी . 
' मुझे सदर जाना है.. please..' महिला ने पसीना पोंछते हुए कहा . 
' मै सिव्हिल लाइन्स जा रहा हूं... सदर रोड के सिग्नल तक छोड सकता हूं..' मैने कहा . 
' चलेगा.... बहुत बहुत धन्यवाद आप का...' उसने कार मे बैठते हुए कहा . 
कार मे शायद उसे A.C. की ठंडक से राहत महसूस हुयी होगी . 
' पानी पीना है ? ' मैने पूछा . 
' पानी है मेरे पास.. ' उसने हैंडबैग से पानी की बोतल निकालते हुए कहा . 
गट..गट..गट..ऽ... बोतल मे बचा आधा पानी उसने एक ही सास मे पी लिया . फिर इत्मिनान से दुपट्टे से चेहरा पोंछा . 
' मै एक घंटे से बस , रिक्षा का इंतजार कर रही थी.. हडताल जैसा माहौल लग रहा था . कोई एकाध गुजरता तो वह रुकता नही..' वह मेरी तरफ देखते हुए बोल रही थी . 
मै चुपचाप कार चला रहा था.. 
' क्या करें.. दैनिक भास्कर मे थी.. छोड दी मैने जॉब .. आज नवभारत मे साक्षात्कार था... साक्षात्कार अच्छा रहा.. वे लोग मुझे और मेरे काम को भी जानते है ... देखते है...  आज घर से निकल रही थी , तो मेरी टू व्हीलर ने असहकार आंदोलन शुरू किया.. स्टार्ट होते ही बंद पड रही थी . मजबूरन रिक्षा से आना पडा .... वैसे आप क्या करते हो ? ' उसने बात करते हुए बीच में ही पूछा . 
' जी , बस ऐसे ही.. रोजी रोटी कमाते है...' सडक पर से बिना नजरें हटाए मैने धीरे से जवाब दिया . 
अनजान लोगो से ज्यादा बातचीत नही कर सकता था मै . 
' मै पागल जैसे दौड रही हूं , इस ऑफिस से उस ऑफिस ..हमारा पुश्तैनी घर है सदर मे.. बहुत बडा है.. लेकीन हम केवल तीन प्राणी रहते है.. मै , हस्बैंड और हमारी नन्ही सी एक परी !  किरायेदार रखना हमें पसंद नहीं . अप्रैल महिने से ही उबलने लगता है नागपूर ! जलता रहता है गरम भट्टी की तरह...' वह टुकडे जोड जोड कर बोल रही थी . 
' वैसे आप इधर कहॉं गये थे ? ' उसने पूछा . 
' जी , काम से गया था..' मैने टालते हुए कहा . ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, April 18, 2022

अजब गजब - ९० : सरदार बाज सिंह जी पवार. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ९० : सरदार बाज सिंह जी पवार
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

मालवा सिन पवार / पुआर / परमार देस म चारी कितअ बगऱ्या . येनअ कडी म च , सम्राट विक्रमादित्य क २६ वी पीढी को येक परिवार मालवा सिन पंजाब म गयो . येनअ परिवार क राव नथिया जी ला ८ पोटूना होता . बडो पोरग्यो सरदार भगवंत सिंह बंगेश्वर मोठो वीर होतो . आन् नान्हो पोरग्यो बाज सिंह जी पवार ! 
पवार परिवार कितअ बंगश की सूबेदारी होती . भगवंत सिंह बंगेश्वर जी  राजपाट चल्या रह्यात्या . अन् सरकार - ए - बंगश का उमराव होता सरदार बाज सिंह जी पवार . बाज सिंह जी जवर २००० घुडसवार होता . 
गुरू गोविंदसिंग की हात कन् वीर बाज सिंह जी को संस्कार भयेतो . 
इ.स. १७०८ म वीर बाज सिंह जी दक्कन आया . गुरू गोविंदसिंग जी न बंदा बहादुर जी संगअ वीर बाज सिंह जी ला पंजाब म पठायो . 
मई इ.स. १७१० म सरहिंद की नामी लढाई छप्पर चिरी इलाका म भयी . नवाब वजीर खान संगअ वीर बाज सिंह जी को सीधो मुकाबलो भयो . वीर बाज सिंह जी न येक च वार कन् वजीर खान को घोडो माऱ्यो . वीर बाज सिंह जी बिजली सरखी चालती तलवार क आघअ वजीर खान हार गयो . वून न वजीर खान ला बंदी बनायो . 
येनअ इतिहास परसिध्द युद्ध क बाद राव सरदार बाज सिंह जी पवार खालसा राज का पह्यला गवर्नर बन्या . या इतिहास की पह्यली घटना होती . इ.स. १७१० पासीन १७१५ वरी वून न राज कऱ्यो . तब वून को राज जमुना पासीन सतलुज नदी वरी होतो . वूई  सरहिंद का बेताज बादस्या होता . वून क नाव कन् मुगल फऊज लरलर कापत होती . 
आपलअ राज म वीर बाज सिंह जी न किसान - कास्तकार क भला साठी खूब काम कऱ्यो . वून म उम्मीद आन् हिम्मत जगाई , जोस भऱ्यो ! आपलो हक खुद लड कन् लेनो लागस , भावना जगाई. वून क राज म खेती चांगलो विकास भयो . जमिनदार लोगना की मनमानी वून न खतम करी . किसान को पटियाला राज थापित भयो . 
इ.स. १७१५ म वीर बाज सिंह जी ला धोखा कन् , गुरदास नांगल जवर मुगल फऊज न पकड्यो .  ९ जून १७१६ ला वीर बाज सिंह जी , वून का ७ भाई अन् साथी बंदा बहादुर सिंह जी ला मुगल राज्या न फासी की सजा देयी . 
फासी देन क बेरा मुगल बादस्या फर्रुखसियर न कह्ये क , ' कहान स जंगी बाज बहादुर और वो की बहादुरी ?' 
' मु बाजे सिंह ! म्हरा हात पाय खोल , तब दिखाडूस तोला , कोन स बाज बहादुर आन् वकी बहादुरी ! ' वीर बाज सिंह जी पवार सिंग सरखो गरज्यो . 
मुगल बादस्या चिढ गयो . वोनअ वीर बाज सिंह जी पवार का हात पाय खोलन को आदेस देयो . जसा वीर बाज सिंह जी का हात पाय खोल्या , वून बिजली क फुरती कन १६ मुगल सयनिक  काट डाया . वीर बाज सिंह जी को अवतार देख कन् मुगल बादस्यो वहान सिन भाग गयो...
असा वीर आमारा पूर्वज ! धन्य आमारा पितर ! 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, April 7, 2022

पांडुरंग ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

पांडुरंग
( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

रंगोरंगी की दुनिया
समायीस येक रंग
नीरो अगास मंतऱ्यो
घनस्याम सिरीरंग ।१।

केतो अरज्यो नपुऱ्यो
लागी तुरसी पासंग
रासलीला खेल कन
कसो रव्हस निसंग ।२।

बाजी मुरली की धुन
भया जीव जंतू दंग
इठु सावरा की धुन
हर मुंडा म अभंग ।३।

नदी नाला जसा जास
सागर म आपरंग
उसी जिंदगानी गति
येकरूप पांडुरंग ।४।

भाव बाहिर मंझार
चित ध्यान येकरंग
देवबाप्पा न रंगायो
अनंत को चितरंग ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, April 6, 2022

सरवा - भाग २८. ‌. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

सरवा - भाग २८
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

परभ्यानं आय.टी. पार्क जवरच रूम केलती . साहा मह्यने भरकन् सरले . परभ्या अवरंगाबादले कालेजमंदी गेला . सारे सोबती भेटले . निधी आन् कनक बी आलती . पूरा दिवस धांधलीत गेला .परभ्या आन् सुनील रातरी हटेलात थांबले . रातभर दोघायच्या गोस्टीमाता चालू व्हत्या . परभ्याची नाप्पूरच्या TCS कंपनीत आन् सुनीलची मुंबईच्या येका कंपनीत मुलाखत झालती . दोघायचं बी कप्प्यावानीच व्हतं , पन येक डाव अजून फायनल सिलेक्सन आन् बोलनं करासाठी जावाचं व्हतं . 
दुसऱ्या दिवसी दोघं बी कालेजात आले . निधी आन् कनक बी आली . कालेजचं उरलं सुरलं काम निपटवून चवघं यी क्यानटीन मंदी आले . निधीचं अवरंगाबादच्याच येका कंपनीत फायनल झालतं . चवघं यी गुपचाप बसले व्हते . निधी गऱ्यातल्या पेंडटसंगं खेलून रायली व्हती . परभ्यानं लस्सीची आरडर देल्ली . 
' निधी.... काही बोलणार आहे की नाही !' परभ्यानं निधीकडं पाहात मनलं . 
' लवकर चला रे.... आई बाबा वाट बघत आहे .' निधीनं खोट्या तावानं मनलं . 
लस्सी आली . परभ्यानं गटागट पेली आन् काउंटरवर पयसे द्या साठी गेला . 
निधीची स्कुटी परभ्यानं घेतली . चवघं यी निधीच्या घरी आले . 
' हातपाय धुवून घ्या आणि डायनिंग टेबलवर बसा .' निधीच्या मायनं मनलं . 
निधीच्या बाबानं इचारपूस केली . सुनीलले लवकर जा चं व्हतं . थो जेवन करून क्याबनं गेला . परभ्याची गाडी रातच्याले व्हती . 
' आम्ही कनककडे जाऊन येऊ काय ? ' निधीनं बाबाले पुसलं . 
' ठीक आहे पण संध्याकाळी लवकर या . प्रभाकर येथेच जेवण करून जाईल . ' निधीच्या बाबानं मनलं . 
तीघं यी घरुन निंगाले . निधी येका मॉल जवर थांबली . 
' येथे कसले काम आहे ?' परभ्यानं इचारलं . 
होठावर बोट ठिवत निधीनं इसारा केला न स्कुटी स्ट्यांडवर लावली . तीघंयी मॉलमंदी आले . निधी पुढं आन् मांगं मांगं परभ्या न कनक ! 
निधीनं दोन प्यांटं आन् दोन मनिले काहाडले . 
' हे घालून दाखव बरं ..' निधीनं परभ्याले चेंजिंग रूम कडं नेत मनलं . 
' अग , पण कशाला ?' परभ्यानं मनलं . 
' मी म्हणते म्हणून ! समजलं...' निधीनं त्याले चेंजिंग रूम मंदी धकावत मनलं . 
निधी पुढं परभ्याचा कायी इलाज नोता . 
' अरे किती वेळ लागेल ! ' निधी बाह्यरुनच कातावली . 
' आलो बाबा...' परभ्यानं बाहिर येत मनलं . 
' खूप छान दिसताहेत... फिटिंग तर परफेक्ट ! ' निधीनं परभ्याकडं पाहात मनलं . 
मंग परभ्यानं बी तिले दोन प्यांटं आन् दोन टाप दाखवले . निधी कां कू कराले लागली . 
' तू घेणार नसशील तर मी पण घेणार नाही .' परभ्यानं जाहीर केलं . 
निधीचा उपावच हारपला . तिनं कोपरापासून दोनी हात जोडले आन् कपडे घेतले . 
तिथून थे कनकच्या घरी गेले . कायी येरानं निधी आन् परभ्या वापिस घराकडं निंगाले . 
' निधी... ' परभ्यानं स्कुटी चालवत मनलं . 
' काय रे...' निधीनं त्याच्या खांद्यावर हनुटी ठिवत मनलं . 
' कधी एकत्र राहू ग आपण ? ' परभ्यानं इचारलं . 
' लग्नानंतर... आणि हे तुला पण माहिती आहे . ...' निधीनं मनलं . 
' practically बघितलं तर अजून ६ वर्ष तरी नक्कीच ! मला GATE clear करून m.tech करायचे आहे . ह्यात ३ वर्ष लागतीलच . नंतर करिअर.....' परभ्या सांगत व्हता . 
' बघ , तुझे calculations तुझ्या हिशेबी ठीक आहे.. मला फार तर ३ ते ४ वर्षांची वेळ आहे . ह्यात माझे m.tech पण पूर्ण होईल . परंतु करिअरसाठी आई बाबा मला जास्त अवधी देईल , असे वाटत नाही..' निधीनं मनलं . 
' जास्त तडजोड करावी लागेल , असे वाटत नाही . सगळं काही व्यवस्थित होईल ...' परभ्यानं निधीच्या गालावर थापटत मनलं . 
बोलता बोलता थे घरी आले . 
निधीच्या मायनं परभ्याले गरम गरम वाढलं . परभ्याचा घास कायी नड्ड्याखाली जात नोता . थो कसा तरी पान्याचे घोट घेत घेत जेवला . 
परभ्या निधीच्या बाबाचे पाय लागासाठी वाकला . 
' आम्हाला विसरणार तर नाहीस प्रभाकर ?' परभ्याचा डब्बा घिवून उभी निधीच्या मायनं मनलं . 
परभ्याचा गरा दाटून आला न डोऱ्यातून टचकन पानी आलं . 
' खूप हळवा मुलगा आहे...' निधीच्या बाबानं परभ्याच्या डोऱ्यातलं पानी पाहून मनलं . 
परभ्याले लडतानी पाहून निधीचे डोरे यी आपरंगच गराले लागले . आपले आसू लपवून निधी अंदर गेली . 
निधीच्या बाबानं परभ्याले सोडून द्या साठी कार काहाडली..... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, April 1, 2022

डायरी - २०२२. पंडुक पक्षी - भाग १

डायरी - २०२२

पंडुक पक्षी - भाग १

आज सुबह सुबह बेसिन मे कचरे का ढ़ेर दिखा तो माथा ठनका . कौन यहॉं इन छोटी छोटी लकडियों को जमा करता होगा ? मैने वह फेंक दी . दोपहर मे इस बारे में बात की तो रहस्य से परदा उठा ! यह काम था पंडुक पक्षी का , जिसे भोरी भी कहते है . पंडुक यह कबूतर जैसा दिखने वाला छोटा सा पंछी . पंडुक को मराठी भाषा मे भोवरी कहते है . 
दोपहर को देखा तो डस्टबिन से वह कचरा गायब ! अरे , यह करिष्मा कैसे हुआ ! इधर उधर देखा तो राज खुल गया . ए.सी. के बाहर निकले पाइप पर रबड की स्पंजनुमा मोटी पाइप इन्सुलेशन के लिए लगाई थी , वहॉं पंडुक पक्षी ने अपना नया आशियाना बनाया था . बेतरतीब ढ़ंग से रखी छोटी छोटी लकडियों का वह उनका घोंसला था . ' अब यह कचरा , जो घोंसले मे तब्दिल हो चुका था , उसे नही निकालना है...' ऐसा मैने मन ही मन सोचा . 
शाम को घर आया तो देखा , एक पक्षी युगल हमारे घर दाखिल हो चुका था . उन्होंने अपनी छोटी सी दुनिया बना ली थी , ( बिना किराया दिए !) नन्हे जीव के आगमन के लिए ! एक पक्षी घोंसले मे ( यह मादा होगी .) और दुसरा लोहे की सीढीयों पर बैठा था . भूर्रऽऽऽ.... मेरी आवाज आते ही सीढीयों पर बैठा पक्षी उड गया . लेकीन घोंसले मे बैठा पक्षी हिम्मत से वही बैठा रहा . गर्दन टेढ़ी कर वह छोटी सी ऑंखों से मुझे देख रहा था...  मैने भी उसे छेड़ना उचित नही समझा . 
मैने स्टडी रुम मे जा कर ए.सी. ऑन किया और पढ़ने लगा . 
' खाना बन गया है , नीचे आओ...' किचन से आवाज आई . 
मैने टेरेस का बल्ब ऑफ किया... वह पक्षी अभी भी घोंसले मे बैठ कर मुझे घूर रहा था.... ( क्रमशः )