डायरी २०२२ : लिफ्ट , भाग १
चिलचिलाती धूप.. ट्रैफिक भी सुबह के मुकाबले बहुत कम . इक्का दुक्का वाहन थे ; और वे भी ऐसे दौड रहे थे , मानो धूप से बचने के लिए कही छांव की आस खत्म न हो जाए ! सडक का डामर पिघल रहा था लावे की तरह... मृगमरीचिका का मायावी सागर हिलोरे ले रहा था.. तेज धूप से ऑंखें भी चौंधिया रही थी. कार का A. C. Full on .. पर इस ठंडक में भी सुकून का अहसास नही था .
अचानक एक सफेद दुपट्टा लहराया फ्लाईओवर के पहले . ऐसे लग रहा था मानो , सूर्य भगवान के प्रखर ताप से सुलह करने के लिए सफेद परचम लहरा रहा हो समझौते का !
कार की गति धीमी की . उस महिला ने लिफ्ट मांगी .
' मुझे सदर जाना है.. please..' महिला ने पसीना पोंछते हुए कहा .
' मै सिव्हिल लाइन्स जा रहा हूं... सदर रोड के सिग्नल तक छोड सकता हूं..' मैने कहा .
' चलेगा.... बहुत बहुत धन्यवाद आप का...' उसने कार मे बैठते हुए कहा .
कार मे शायद उसे A.C. की ठंडक से राहत महसूस हुयी होगी .
' पानी पीना है ? ' मैने पूछा .
' पानी है मेरे पास.. ' उसने हैंडबैग से पानी की बोतल निकालते हुए कहा .
गट..गट..गट..ऽ... बोतल मे बचा आधा पानी उसने एक ही सास मे पी लिया . फिर इत्मिनान से दुपट्टे से चेहरा पोंछा .
' मै एक घंटे से बस , रिक्षा का इंतजार कर रही थी.. हडताल जैसा माहौल लग रहा था . कोई एकाध गुजरता तो वह रुकता नही..' वह मेरी तरफ देखते हुए बोल रही थी .
मै चुपचाप कार चला रहा था..
' क्या करें.. दैनिक भास्कर मे थी.. छोड दी मैने जॉब .. आज नवभारत मे साक्षात्कार था... साक्षात्कार अच्छा रहा.. वे लोग मुझे और मेरे काम को भी जानते है ... देखते है... आज घर से निकल रही थी , तो मेरी टू व्हीलर ने असहकार आंदोलन शुरू किया.. स्टार्ट होते ही बंद पड रही थी . मजबूरन रिक्षा से आना पडा .... वैसे आप क्या करते हो ? ' उसने बात करते हुए बीच में ही पूछा .
' जी , बस ऐसे ही.. रोजी रोटी कमाते है...' सडक पर से बिना नजरें हटाए मैने धीरे से जवाब दिया .
अनजान लोगो से ज्यादा बातचीत नही कर सकता था मै .
' मै पागल जैसे दौड रही हूं , इस ऑफिस से उस ऑफिस ..हमारा पुश्तैनी घर है सदर मे.. बहुत बडा है.. लेकीन हम केवल तीन प्राणी रहते है.. मै , हस्बैंड और हमारी नन्ही सी एक परी ! किरायेदार रखना हमें पसंद नहीं . अप्रैल महिने से ही उबलने लगता है नागपूर ! जलता रहता है गरम भट्टी की तरह...' वह टुकडे जोड जोड कर बोल रही थी .
' वैसे आप इधर कहॉं गये थे ? ' उसने पूछा .
' जी , काम से गया था..' मैने टालते हुए कहा . ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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