Monday, October 31, 2022

चाकोरी

चाकोरी
Marathi language _ मराठी भाषा

आज माझ्या स्कूटरखाली पिटुकली खारुताई चेंगरून ठार झाली . ... भेदरलेली खार सडक पार न करता माझ्याच चाकोरीने पळायला लागली . ती चाकोरी सोडेल , असा माझा अंदाज होता _ म्हणून मी  हॅन्डल न वळवता सरळच चालवत होतो . कदाचित मी वळतानाच ती पण वळेल , अशी पण भीती ! 
प्रथम माझ्या डोक्यात ती खार सडक पार करेलच _ असे का यावे ?
' सडक मानवासाठी आहे , खारीसारख्या क्षुद्र जीवाला त्याची काय आवश्यकता ?' , अशी सुप्त अहंकारी स्वामित्वाची जाणीव आधी झाली . 
नंतर भूतदया जागृत झाली ... चक्रव्यूहात फसल्यानंतर , जेथे मला ' जर - तर ' शी तडजोड करावी लागली . परंतू ती अयशस्वी ..
आणि ह्या शोकगर्भ क्षणिकेचा अखेर झाला खारीच्या मृत्यूत !
माझ्या वरचढपणाचा पराक्रम मी त्या दुबळ्या जीवावर असा गाजवला ( ? ). मी वेळीच थांबून व खारीची दिशा ओळखून वाहन चालवू शकलो असतो . मग हा निर्णय मला त्वरित का घेता आला नाही ? माझी एकांगी निर्णयशक्ती एका जीवाच्या हकनाक बळीला कारणीभूत ठरली . 
माझ्या चाकोरीत शिरण्याची तिची चूक की मी माझं चाकोरी न सोडता चालणे ; ह्यात माझी चूक ?
_ पश्चातापाची शिक्षा तर मला झालीच आहे......९६

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

यादें _ सवाल की ! भाग - १८

यादें _ सवाल की !
भाग - १८

कुछ सवाल दिल में टीस पैदा करते है जिंदगी भर ! ' गलती किसकी ?' इस सवाल का जवाब तकलीफदेह होगा.. यादें कसक भरी !
आज मेरी स्कूटर से एक नन्ही सी गिलहरी जान गयी . डरी हुई गिलहरी सडक पार करने की बजाए दौडती रही स्कूटर के आगे आगे..वह रास्ता छोड कर सडक पार करेगी , ऐसा मेरा अनुमान था . ... इस लिए मै हैंडिल न घुमा कर सीधा चला रहा था . मेरे स्कूटर मोडते ही वह भी दिशा न बदल ले _ यह भी डर था . 
सबसे पहले वह गिलहरी सडक पार करेगी ही , यह बात मेरे दिमाग मे क्यों आई ? ' सडक इन्सान के लिए है , गिलहरी जैसे जीवजंतू को उसकी क्या जरुरत ? ' ऐसी सुप्त अहंकारी स्वामित्व की भावना पहले आई . 
बाद में भूतदया जाग्रत हुई . चक्रव्यूह में फंसने के बाद मुझे ' अगर - मगर ' से समझौता करना पडा . ... लेकीन यह समझौता असफल ! और आखिर इस शोकगर्भ क्षणिका का अंत हुआ गिलहरी की मृत्यू में . 
मेरे प्रभुत्व का पराक्रम मैने उस निरीह प्राणी के प्राण पर दिखाया . मै उसी समय रुक कर और गिलहरी की दिशा पहचान कर स्कूटर चला सकता था..फिर यह निर्णय मै शीघ्र क्यों नही ले पाया ? मेरा एकतरफा निर्णय एक निश्छल जान की बली के लिए कारण बना . 
मेरे रस्ते से उसका चलना , यह उसकी गलती या मैने मेरा रास्ता न छोड कर चलना _ मेरी गलती ?
आत्मग्लानि की सजा तो मुझे मिल ही गयी है.....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, October 30, 2022

स्मृती चिन्ह

स्मृती चिन्ह
Marathi language _ मराठी भाषा

दग्ध व्याकूळ नयन
आहे बेलगाम मन
जाळे गुरफटलेले
प्रश्नचिन्हांचे जीवन ।

काळी गडद रजनी
धुरकट सूर्यबिंब
आशा विषण्ण हृदयात
छिन्नभिन्न प्रतिबिंब ।

भूतकाळी बघताना
येतसे भरुनी डोळे
ओठांवर अंकित ग
तुझ्या प्रीतीचे सोहळे ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, October 29, 2022

बगळ्यांची फुले

बगळ्यांची फुले
Marathi language _ मराठी भाषा

तुझ्या उष्ण श्वासाचे तरंग हेलकावित असते मला
कवटाळतो मजला स्निग्ध बाहुपाशाचा रेशमी झूला ।

आभाळाच्या ओल्याचिंब मिठीत हिरवळली दग्ध भूमी
अलौकिक अनुभूती पल्याड सखे अद्वय तू अन् मी ।

तुझ्या अनघ हृदयातून प्रीतिसुधा अविरत वाहते
माझ्या स्वप्नाचे क्षितिज हे तुझ्या डोळ्यात विस्तारत जाते ।

ह्याच डोळ्यातील स्वप्नाने भातुकलीलाच जीवन केले
मनाच्या मिलनाने जन्मोजन्मीचे वचन दिले - घेतले ।

फिरुनी भातुकली , तीच पावसाळी वेडी कागदी होडी
चिमुकल्या मुठीतील जिक्कन जीवनास देतसे गोडी ।

असेच ओलेचिंब दिवस , ओल्या वाळूत घर बांधणे
इवल्या इवल्या नखांवर ही बगळ्यांची फुले मागणे ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर ( ०२ )

Friday, October 28, 2022

निर्माण : भाग १७

निर्माण : भाग - १७
Hindi language _ हिंदी भाषा

३ दिन ढलाई का काम चला . आसमान में बादल घुमडने लगे थे . मुझे इस साइट का Bill बना कर दुसरे साइट जाना था . ढलाई खत्म होने के बाद दुसरें दिन ही मैने बाहरी शटरिंग खोलने के लिए बताया ... हल्की बारिश चालू थी. Bill बन रहा था . 
दवाखाने से ठेकेदार वापस आया . उसने एक मजदूर अस्पताल में रखा था मरीज के पास . मरीज की बीवी भी अस्पताल में आई थी . अस्पताल में और पैसे भेजने थे . सभी ठेकेदारों का हिसाब कर पेमेंट करनी थी . सब सामान और मशिनरी दुसरे साइट शिफ्ट करनी थी . 
रात में मुसलाधार बारिश शुरू हुई . हम रात भर जागते रहे . बारिश थमने का नाम ले रही थी . कोयला खदान से दो कि.मी. दूर बडी नदी थी . और खदान के रास्ते मे एक नाला था . लगातार हो रही बारिश से नदी खतरे के निशान से उपर बह रही थी . पुल के उपर से बाढ का पानी बह रहा था . खदान के रास्ते वाले नाले का पानी नदी की बाढ की वजह से रुक गया था... नाले के उपर का पुलिया भी जलमग्न हुआ था . नदी की भयंकर बाढ से छोटे - बडे नालों का पानी समुंदर की तरह खदान की चारों ओर फैल गया था . खदान की निकली मिट्टी का बांध ही खदान को बचाए रखा था . साइट एक टापू में बदल चुकी थी . आने - जाने के सारे रास्तें बंद थे . 
हम पैदल नाले तक जाते और वापस साइट पर आते थे . आज बारिश का तीसरा दिन था . खदान की चारों ओर पानी ही पानी था . मिट्टी की दिवार पानी को रोके थी . बारिश नही रुकी और मिट्टी की दिवार ढह गयी तो खदान , साइट और हमारा क्या होगा ??
नाले के उस पार हमारी जीप आई थी . ड्रायव्हर के पास ही साइट के पैसे भी थे . हम दूर से उसे देख सकते थे !! लेकीन...
डिपार्टमेंट के मजदूर और स्टाफ भी खदान में ही फंसा था . इतनी बारिश और बाढ आज तक नही आई थी . अगर खदान डूब गयी तो !!! सब चिंता में थे . साइट पर सब के लिए चाय बन रही थी.. लेकीन सब को खाना खिलाना मुश्किल था . 
बाढ की खबर फैल जाने से सब के घरवाले चिंतित थे . बिजली गुल थी ... खदान का जनरेटर चालू था , पर कितने दिन चल पाएगा !!!
सडक पर वाहनों की लंबी कतार थी.. डिपार्टमेंट ने एक आलू और चावल का ट्रक खोज लिया था . लेकीन आलू और चावल के बोरे खदान तक कैसे पहुंचाएं , यह बडी समस्या थी . 
पांचवे दिन एक  राफ्ट खदान की ओर आते दिखा . डिपार्टमेंट के सेफ्टी विभाग का दल था . वे कुछ अफसरों को ले कर गये और वापसी में आलू और चावल के बोरे ले कर आए . बडे - बडे बर्तनों में खाना पकने लगा . चाय - बिस्कुट बटने लगी . जलस्तर और बढने से राफ्ट का आना रुक गया . 
बचे लोगों के लिए आलू चावल दावत के समान था . खदान में रखे बडे बडे लकडी के खंबे जलाने के काम में आ रहे थे . सब चारों ओर बैठ कर किस्से कहानी साझा कर रहे थे . इस जलप्रलय ने सबको इकठ्ठा बांध रखा था .
 एक दिन दोपहर को हेलिकॉप्टर से खाद्यसामग्री गिराई गयी . सब मजदूरों ने उसे ऑफिस में जमा की . खदान के मैनेजर अभी भी खदान में ही रुके थे . उन्होंने अपने और हमारे मजदूरों को समान मात्रा में खाद्यसामग्री बांटी . यहॉं फंसे हुए सब अपने थे.... कोई पराया नही था !!!!
बारिश कुछ कम हुई लेकीन जलस्तर ज्यों का त्यों था . 
रेत के बोरे भरे जा रहे थे . जहॉं भी आशंका होती , वहॉं मिट्टी के बांध पर उन्हें रखा जा रहा था . सब मिट्टी की दिवार की निगरानी कर रहे थे .. अब पानी और हमारे बीच केवल यह मिट्टी की दिवार ही थी..... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, October 19, 2022

महा तिवार दिवारी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

महा तिवार दिवारी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

नान्ही सी च दिवनाल
पडी अंधार ला भारी
आयी चान्नीना ले कन
महा तिवार दिवारी ।

लक्षुमी को वरदान
भयी खंडीनअ जवारी
आंब्या बार को संतरो
महा तिवार दिवारी ।

गायगोंधन को खेल
डोयरा की आयी बारी
धुमधडाल फटाका
महा तिवार दिवारी ।

वोवारनी भाऊबीज
फरार आन् सुवारी
खानपेन की स मज्या
महा तिवार दिवारी ।

माय को हिरदो मोठो
बांधस नव नवारी
दाआजी को लाड प्यार
महा तिवार दिवारी ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, October 18, 2022

यादें _ सवाल की ! - १६

यादें _ सवाल की ! - १६
Hindi language _ हिंदी भाषा

दिव्य अस्त्र की तरह अनचाहे - अकल्पित सवाल सनसनाते हुएं धन्य कर जाते हमारे कर्णपटल को... और झनझना उठते है मस्तिष्क के तार... ऐसे अनपेक्षित सवाल का तात्काल जवाब भी नहीं होता है हमारे तूणीर में ! 
मै एक स्कूल मे अपना स्पर्धा कार्यक्रम " Express in a minute " के संचालन और " motivational speaker " के तौर पर आमंत्रित था . स्पर्धा संपन्न हुई .. मैने विजेताओं की घोषणा कर उन्हें पुरस्कार और प्रमाणपत्र बॉंटे . इसके पश्चात मैने अपनी speach दी . संपूर्ण कार्यक्रम होने के बाद मै निकल रहा था , तब बच्चों ने मुझे घेर लिया . अपनी queries पूछने लगे .. मै यथासंभव जवाब देने की कोशिश कर रहा था . 
मेरा परिचय देते हुएं मुख्याध्यापक सर ने मेरी qualifications और वर्तमान में चल रही पढाई तथा व्यवसाय की जानकारी विद्यार्थियों को दी थी . 
मै कार में बैठ ही रहा था , तब एक विद्यार्थी दौडते हुएं आया और मैने speach मे History की पढाई का जो तरीका बताया था , उसे विस्तार से पूछने लगा.. मैने उसकी जिज्ञासा की पूर्ति करने की कोशिश की.. फिर अंत में दनदनाता हुआ सवाल किया , ' सर , आप अभी भी " टाइमपास " के लिए पढाई कर रहे है क्या ?' 
नववी कक्षा के उस विद्यार्थी को क्या जवाब दू !?
' आप ऐसा क्यो सोच रहे हो...? ' मैने पूछा . 
वह झेंप गया.. 
' बस् , कुछ नहीं सर..:' वह सिर झुका कर बोला..
मै स्कूल से निकल कर नागपुर की ओर आ रहा था.. लेकीन उस विद्यार्थी का सवाल मेरे साथ ही आ रहा था.. टाइमपास !!!
ज्ञान अर्जन = टाइमपास ... यह equation अब दिमाग में भी तांडव कर रहा था...
फिर मेरे आगे के कार्यक्रमों में ज्ञानार्जन के महत्त्व का मुद्दा जुड गया.. महिने - साल बिते.. कार्यक्रम चलते रहे...
फिर ' कोरोना युग ' आया.. दो वर्ष भय में कोरे ही गुजरे..
रात के आठ बज रहे थे शायद . मै स्टडी रूम में PhD course work का assignment लिख रहा था . मुझे हॉल में आने के लिए आवाज लगाई गयी . अभी कौन आया होगा , यह सोचते सोचते मै नीचे आया . हमारी कालोनी की सोसायटी के एक बुजुर्ग सदस्य और एक वयस्क व्यावसायिक बैठे थे . मैने पधारने का प्रयोजन पूछा . कालोनी की कुछ समस्याएं थी और उसका निवेदन महानगरपालिका को देना था , उसे लिखवाने के लिए वे आए थे . मैने महानगरपालिका के नाम से एक पत्र लिखा और सब कालोनीवासियों के हस्ताक्षर लेने के लिए कहा . 
वयस्क इंजिनिअर व्यावसायिक ने मुझे  कहा की , आप भी साथ चलिए. 
' मै अभी assignment लिख रहा हूं , इस लिए क्षमा किजीएगा .' मैने कहा .
' अभी कौनसा assignment लिख रहे हो ? ' उन्होंने अचरज से पूछा . 
' जी .. PhD course work का...' मैने जवाब दिया . 
' आप का व्यवसाय है.. फिर PhD क्यो कर रहे हो ? टाइमपास के लिए..' उन्होंने सवाल दागा . 
तीन साल पहले का वही सवाल मेरा पीछा छोडने तैयार नही था !!!!
' टाइमपास ? आप ऐसा सोचते हो...' मैने सयंत स्वर में कहा.
' नही.. आप का बिझनेस है.. आप इंजिनिअर भी है.. आप नौकरी करने से तो रहे... फिर PhD का क्या फायदा ? उन्होंने अपना तर्क बताया . 
' पढाई , ज्ञानार्जन यह आपको टाइमपास लगता है और इस में फायदा - नुकसान भी खोजते हो...' मैने कहा . 
बुजुर्ग सदस्य पशोपेश मे थे...
' साहब , हम आते है.. आज जितने हस्ताक्षर मिलते है , वह लेते है और बचे कल ले लेंगे.. राम राम जी..' खडे हो कर बुजुर्ग सदस्य ने कहा . 
मै उन्हें छोडने गेट तक गया.. 
वापस आया तो वह सवाल मेरे साथ ही आया.... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, October 13, 2022

निर्माण _ भाग - १६

निर्माण _ भाग - १६
Hindi language _ हिंदी भाषा

सुबह - सुबह ऑंख लगी... सब नाश्ता कर के साइट पर गये...
' साहब , चाय लिजीए... ' खानसामा ने मुझे जगाते हुए कहा . 
' टाइम क्या हुआ ? ' मैने ऑंख मलते हुए पूछा . 
' दस बजने वाले है.. ' उसने टेबल पर चाय और पानी रखते हुए कहा . 
मै नहा - धो कर साइट पर पहुंचा . ड्रॉइंग के हिसाब से सरिया चेक कर रहा था.. कुछ गलतियां थी . साइट इंजिनिअर को बता कर कुछ सरिया और डालने के लिए बोला और नाश्ता करने वापस गया . 
आखरी सेक्शन होने की वजह से heavy reinforcement था . ३२ मि.मि.और ४० मिमि diameter की सरिया थी . एक एक बार ही ६०/७० कि.ग्र. का था . काम खत्म होने की कगार पर था और बरसात का मौसम भी शुरु होने वाला था , इस लिए हर ठेकेदार के पास बहुत कम मजदूर बचे थे . क्यों की काफी सारे मजदूर अपने अपने गांव चले गये थे . अब जितने मजदूर थे , उन्ही से काम चलाना था . 
डिपार्टमेंट के इंजिनिअर भी आ गये . अब reinforcement का measurements ले कर ढलाई ( concreting ) करनी थी . हम चाय पी रहे थे , तभी नीचे से जोर जोर से आवाज आने लगी . मुझे कुछ जबरदस्त गडबड होने की आशंका हुई . हम दौडे दौडे साइट पहुंचे . आखरी सेक्शन के स्लैब पर मजदूरों की भीड थी . सुपरवाइझर हॉंफते हॉंफते उपर आ रहा था . 
' क्या हुआ ? ' मैने पूछा . 
' साहब एक मजदूर सरिया के साथ नीचे गिरा है.. मै आपको बताने के लिए ही आ रहा था . ' सुपरवाइझर ने कहा . 
' हे भगवान !!!.... चलो नीचे...' मैने कहा . 
मुझे देख कर सब बाजू हुए.. लोहे वाले ठेकेदार का एक आदमी कंक्रिट की दिवार के बाहर गिरा था . कुछ मजदूर उसे निकालने के लिए वहॉं उतरे थे . मैने सभी मजदूरों को उपर भेजा और सबको शांत रहने की हिदायत दी . मजदूर कम होने से केवल तीन आदमी एक भारी सरिया ले कर आए थे . दो मजदूर दो कोने पर और एक ने बीच में सरिया को पकडा था . वह एक ' C ' आकार की सरिया थी . दो मजदूर इस काम के अभ्यस्त थे पर एक कोने वाला मजदूर नया था . सरिया रखते समय दो अभ्यस्त मजदूरों ने सरिया नीचे रखने के लिए छोड दी , जब की नया मजदूर उसे पकड कर ही रहा . जब भारी भरकम सरिया एक तरफ से गिरी तो दुसरी बाजू पकड कर रहने से उछली . सरिया के उछलते ही वह नया मजदूर हवा में फेंका गया और सीधा निचे गिरा . 
मजदूर उसे उपर ले कर आए . वह बाए हाथ के बल गिरा था . वह हाथ फ्रैक्चर हुआ था . साइट पर टू व्हीलर के अलावा कोई साधन नही था . मैने तुरंत अपनी स्कूटर निकाली . उस मजदूर के साथ उसके ठेकेदार को स्कूटर पर बिठा कर मै उन्हें शहर ले आया और दवाखाने मे भर्ति कराया . रात भर की थकान और यह हादसा... मै मानसिक और शारिरिक तौर पर टूट रहा था . मैने डॉक्टर से बात की , ठेकेदार को समझाया.. तब तक साइट इंजिनिअर और सुपरवाइझर वहॉं पहुंचे . मै सुपरवाइझर और ठेकेदार को वही छोड कर साइट इंजिनिअर को ले कर वापस आया . साइट आ कर डिपार्टमेंट के इंजिनिअर के साथ measurements लिए और ढलाई शुरु की . डिपार्टमेंट के इंजिनिअर को आज दिन भर साइट पर रुकने के बोला . और मै वापस दवाखाने मे पहुंचा . 
' ऑपरेशन करना होगा...' डॉक्टर ने कहा . 
' जी , आपको जो उचित लगता हो , उस हिसाब से treatment किजीए...' मैने कहा . 
' आपको अभी ५०,०००/ रुपया जमा करना होगा..' डॉक्टर ने कहा . 
' जी , मै एक घंटे के भीतर पैसे जमा करता हूं.. आप ऑपरेशन किजीए..' मैने कहा . 
अभी मेरे पास इतने पैसे नही थे.. उस शहर में मेरी एक क्लासमेट रहती थी .. वही एक उम्मीद की किरण थी . 
मै एक बार ही उसके घर गया था , इस लिए location साफ साफ याद नहीं आ रही थी.. फिर भी निकल पडा.. काफी जद्दोजहद के बाद उसका घर मिला . मुझे देख कर उसे आश्चर्य हुआ . मैने सारी राम कहानी बताई . उसने पिताजी से बात की . उसके पिताजी मेरे साथ बैंक आए .. और मुझे रकम निकाल कर दी . फिर हम दोनों अस्पताल आए . वह डॉक्टर उन से परिचित थे . हमने रकम जमा की और डॉक्टर से बातचीत की . मैने क्लासमेट के पिताजी को घर छोडा और वापस साइट पर आया . ढलाई चल रही थी . मेरे आते ही डिपार्टमेंट के इंजिनिअर ने विदा ली.. मुझे कुछ अच्छा नही लग रहा था.. शायद बुखार भी आया था.. मै साइट ऑफिस आया और कुर्सी पर बैठे बैठे ही सो गया... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, October 12, 2022

शापित यक्ष

शापित यक्ष
Marathi language _ मराठी भाषा

माझ्या स्वप्नातील इंद्रधनु तू पापणीवर झेलतेस _
अनाहुत सर ही बरसून जाते तुझ्या पापणीखाली
मग कळतं आपल्या गुलाब ताटव्याची कापणी झाली .

माझ्या डोळ्यातील उष्ण आसवे तू हृदयाने शोषतेस _ 
साथ जन्मोजन्मीची तरीही विरह अग्नी वाट्याला आली
हात रक्ताळल्यावर कळतं की धार ही काट्याला आली . 

माझ्या हृदयाची स्पंदने रोज स्व भाळावर कोरतेस _ 
रंगवून जांभळी पहाट चित्रात का अशी सांज ओली
चरणी निर्माल्य झाल्यावर कळतं वेदना वांझ झाली .

माझीच चैत्रपालवी तू रोमारोमांवर मिरवतेस _ 
परंतु मी अनिकेत तरीही कुशीत जगवून गेली
मग शापित यक्षाला कळतं ही प्रीत तगवून गेली . 

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, October 10, 2022

पारंबी होजो लेका. ( वऱ्हाडी कविता )

पारंबी होजो लेका
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

डागेल बीज नायी
निसवजो गा चोखा
चोचीले देजो दाना
बेकीले देजो धोका ।

वलीताच्या डांडाचं
पानी होजो लेका
कुपाची होजो काटी
आधार देजो लोका ।

खोट्याले सोडचिठ्ठी
खऱ्याचा घेजो ठेका
चोट्ट्यायले दनके
सावाचा होजो नाका ।

पाखरावानी राज्या
गंगनी घेजो झोका
पाय ठिव मातीचे
रुजाले देजो मोका ।

झाड मोठं वाढलं
पारंबी होजो लेका
सांजच्याले मातर
वडाले देजो टेका ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
( आगामी ' वरधामायच्या कोऱ्यात ' कवितासंग्रहातून ) 

Sunday, October 9, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - १५

यादें _ सवाल की ! भाग - १५
Hindi language _ हिंदी भाषा

प्रश्नचिन्हों का जीवन ! सुख दुःख के हिंडोले पर झूलते पल.... जीवन रस की बहती कलकल..
जन्म से मृत्यू तक का यह जीवन सफर भिन्न भिन्न रंग लिए बुनते जाता रिश्तों का जाल . सफलता - असफलता , खुशी - गम , दर्द - राहत , दोस्ती - दुश्मनी , होनी - अनहोनी , विपन्नता - संपन्नता , संतुष्टी - असंतुष्टी , प्यार - क्रोध , उपकार - फरेब ऐसी अनगिनत सीढियॉं पार करते है हम ! 
कोई भी नकारात्मक बातें - घटनाएं  जब हमारे साथ होती है , तो एक सवाल ईश्वर से हम जरूर पूछते है , " हे भगवान .. ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? " 
संपूर्ण ब्रम्हांड में सबसे भोलेभाले और सरल हम ही होते है , हमारी दृष्टि से ! हमारे साथ ही बुरा क्यो होता है , यह यक्षप्रश्न आज तक अनुत्तरित है . 
हमारी किताब ले कर जाने वाला उसे कभी वापस नही करता , हम ने किसी को पैसे की मदद की , वो पैसे लौटाता नही , कोई सहायता मांगे तो हमें बहाने बताना नही आता है , हमारा दिल जल्दी पसीजता है , हम जी तोड़ मेहनत करते है पर सफलता नही मिलती , हम सब के काम आते है पर हमारे काम कोई नहीं आता है , गलत आदत से दूर और सात्त्विक भोजन के बाद भी हम ही बीमार क्यो होते है ..... अनंत सवालों की शृंखला का सरताज _ " ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? " 
बच्चे हमारी बात नही मानते और ज्येष्ठ हमें सुनना नही चाहते... 
दुर्घटनाएं हमारे इंतजार में ! हम स्वाभिमान से सराबोर _ कटेंगे लेकीन झुकेंगे नही ! 
हम किसी दुर्घटना के शिकार हुए तो तत्काल यही सवाल बडा सा प्रश्नचिन्ह ले कर हमारे सम्मुख खडा हो जाता है... 
मै इतना दान - पुण्य करता हूं... सुबह - शाम ईश्वर की आराधना करता हूं.. फिर भी , ' ऐसा मेरे साथ ही क्यों ? ' यह प्रश्न उभरता है मनमस्तिष्क में ! हम अबोध बालक की तरह दोहराते रहते इस प्रश्न को .... 
किसी ज्योतिष बताने वाले या शुभचिंतक के पास जा कर अपनी समस्या बताते ही , वह पहले हमें ' हमारे सीधेसादे होने का प्रमाणपत्र ' प्रदान करता है .... फिर धीरे धीरे हमारी नब्ज टटोलता है और फिर हमारी दुखती रग पर हाथ रखता है... हम उसके मुरीद हो जाते है..आखिर हमें समझने वाला कोई तो है ! हम ऑंखें मूंद कर विश्वास करते है..
उसकी बातें हमें सत्य और अच्छी लगती है...
हमारा जीवन काल कभी भी सीधी रेखा नही होता.. जीवन मार्ग कभी भी चिकना और समतल नही होता... प्रश्न आसान और समस्या सरल नही होती .. यह हम भी समझते है लेकीन...!!!
इस सवाल में दो संभावनाएं होती है.. पहली संभावना की हम एकमेवाद्वितीय है ! दुसरी संभावना की यह आम बात है . और दुसरी संभावना के दायरे में हम आते है..
' ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? ' इस सवाल की पीडा से उपजी ग्लानि तार तार कर देती है विश्वास को... तिनका भी सहारा महसूस होता है..
इस सवाल की आत्मग्लानि से बाहर निकलना आवश्यक है.. यह मेरे साथ ही नही हो रहा है... असंख्य भुक्तभोगी है इस के !! अच्छा - बुरा जो भी होता है हमारे साथ , यह जीवन का हिस्सा ही है... स्याह और श्वेत पहलू निखारते है हमारी सोच - समझ को.. परिपक्व करते जाते विचार और मुसीबत की अग्नि में तप कर ही हमारा सुवर्ण व्यक्तिमत्त्व निखरता है कुंदन सा ! 
संघर्ष की आंच में तप कर ही मनुष्य ' मनुष्य ' बनता है... ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, October 8, 2022

मरगळ ( मराठी कविता )

मरगळ
Marathi language _ मराठी भाषा

अंगणी निवांत पहुडलेली दुपार
काळ जरा थांबलेला
वारा मही पांगलेला
मिहिर ही टांगलेला
कणाकणात चैतन्याचा कोण बडविल पणव ?

अंगणी भ्रांत अवघडलेली रांगोळी
रंग चुरगळलेला
सडा मरगळलेला
का बहर हा गळलेला
ठिपक्यात नक्षत्रांची ही कोण फुलविल पुनव ?

अंगणी श्रांत कोमेजलेली लक्ष्मी वृंदा
सुगंध हरवलेला
कंदील मंदावलेला
बंध हा भारावलेला
पर्णापर्णात माधवाची कोण रुजविल कणव ?

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, October 7, 2022

परंपरा ( मराठी कविता )

परंपरा
Marathi language _ मराठी भाषा

दूरवर पसरले ओसाड माळरान
मध्ये विद्रुप आणि उदास खडीची खाण ।

अकाली पावसाचे आत साचलेले पाणी
कदाचित उद्ध्वस्ततेची साश्रू ही कहाणी ।

खडीभरड यंत्राचे भग्नावशेष नक्षी
कधीकाळी नांदलेल्या जीवनाची ही एक साक्षी ।

राष्ट्रीय हमरस्त्याची किनार गर्द काळी
उकरलेल्या अंगणातली जशी रांगोळी ।

सुकलेली झुडपे , करपलेली धरती
एखादीच हिरवीकंच बाभूळ परकी ‌।

रिक्त धरणीची कूस , मी व्याकूळ अभियंता
खेकड्याच्या पिल्लावळीत मी पण करंटा ।

तरीही वसंतात लेवून लालजर्द तुरा
निष्पर्ण पळस सांभाळतो आहे परंपरा ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर



Thursday, October 6, 2022

वाट ( मराठी कविता )

वाट
Marathi language _ मराठी भाषा

स्थिर वाटेलाही प्रचंड असतो वेग
फक्त वाटसरूच्या पायी हवा आवेग ।

दृष्टीपथात काही टप्पे ही तरळते
अचानक पायवाट बाजूला वळते ।

हरवलेल्या टप्प्याची मनी हुरहुर
आटलेल्या यमुनेला कसा यावा पूर ।

वाटेत येणारे काही थांबे अकल्पित
संकल्पनेत ही कधी हार कधी जीत ।

गवसलेल्या मरूद्यानाची हिरवळ
                                                      दिशाहीन वारू वाटेला का हळहळ ।

वावटळीत उडालेला उद्देश पत्ता
वाटेवर आकाशाची निरंकुश सत्ता ।

कधी निवडुंग कधी फुलांचा ताटवा
भुलवित असतो आकांक्षेचा चकवा ।

पायाखालच्या वाटेला ना आदि ना अंत
वाटसरुची वाटचाल ही मात्र सान्त ।

दिशाहीन हेतूला क्रमणाचीच दिशा
सुरुवात सकाळी परंतु अंती निशा ।

भरगच्च स्वप्ने पण रिकामे ललाट
अगतिकपणे शून्याकडे जाते वाट ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर




Saturday, October 1, 2022

निर्माण : भाग - १५

निर्माण - भाग १५

मंझधार में फंसी नैय्या जैसी मेरी हालत थी . तूफान की तीव्रता बढ़ती जा रही थी... और पर्याय मात्र दो ही थे , आगे या पीछे , जीत या हार ! 
जो भी हो , मैने आगे जाना तय किया . अब ऑंधी - तूफान , कडकडाती बिजलियां , और बारिश के बीच चेतक स्कूटर ही साथ थी.. नक्सलियों से भरा जंगली रास्ता ! ज्यादा सोचने की बिमारी चरम पर . ऑंधी तूफान से नक्सली जंगल से निकल कर सडक पर आये तो ? पीछे हुए हादसे की तरह आज स्कूटर पंक्चर हुई तो ? पेट्रोल पंप के पहले ही पेट्रोल खतम हुआ तो ? स्कूटर फिसल कर accident हुआ तो ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर नही थे मेरे पास ! 
सडक सूखे - हरे पत्तों से ढ़क गयी थी . मै बारिश से नखशिखांत गीला हो गया था . तूफानी हवा स्कूटर को आडी तिरछी पीछे धकेल रही थी . मौसम में आया यह बदलाव अनपेक्षित था . मै ठंड से ठिठुर रहा था . एक तो इस जंगली रास्तें से रात में १७५ कि.मी. जाना यही साहस ( ? ) की बात थी... लेकीन अब मेरे साहस की अग्निपरीक्षा प्रारंभ हुई . 
दूर कही बल्ब टिमटिमाते दिखे . मन में विश्वास जगा . तूफान की तीव्रता शनै: शनै: कम हो रही थी . रोशनी नजदीक आ रही थी . अब बारिश की तकलीफ होनी बंद हुई . वह अपनी गति से बरस रही थी , मै अपनी गति दौड रहा था ! जंगल का इलाका समाप्ति की कगार पर था , पर सडक सुनसान थी . आख़िरकार टंकी में बचे हुए पेट्रोल से मै पेट्रोल पंप पहुंचा . रात के बारह बज रहे थे . टंकी फुल कराई.. एक समस्या से निजात पाई . पेट्रोल पंप के बगल में ढाबा था . वहॉं मै अकेला ग्राहक ! गिलास भर चाय मंगाई.. लेकीन बैठा नही . गर्म भट्टी के पास खडे हो कर खुद को गर्म करने कोशिश करने लगा . गरमागरम चाय गले से उतरी और अब तक के आधे सफर की थकान कुछ कम हुई . दिमाग भी थोडा शांत हुआ . यही कही लॉज या होटल में ठहरने का विचार भी मन कौंधा . उसे मैने निश्चय से दूर किया . अब रुकना नही.. बस् ! 
शरीर की कंपन कुछ कम हुई थी . चेतक को किक मारी और निकल पडा बरसात में अपने गंतव्य की ओर ! दस कि.मी. तक चाय और भट्टी की गरमी असर रहा... लगातार हो रही बारिश अपना कमाल दिखा रही थी . फिसलने के भय से स्पीड भी नही बढ़ा सकता था . हेडलाइट की रोशनी लालटेन जितनी ! परेशानी कभी अकेली नही आती ... वह अपना पूरा कुनबा ले कर तांडव नृत्य करती है ! 
अब कंपकंपी बढ़ने लगी . हाथ से हैंडिल पकडना मुश्किल हो रहा था . बारिश की बूॅंदें सीधी ऑंखों से टकरा रही थी . अब मेरा यह निर्णय खुद मुझे पागलपन लगने लगा . क्या जरूरत थी ऐसे मूर्खता की ? जंगल के रास्ते से बच गया था.... आगे का किसे पता था ? अनहोनी घटने के लिए एक पल काफी है ! मै स्कूटर चलाते चलाते सोचने लगा . 
हर माईलस्टोन और साइनबोर्ड को स्कूटर रोक कर पढ़ रहा था ... Distance देखने के लिए ! बारिश ने पीछा नही छोडा . मै बची खुची उर्जा बटोर कर गंतव्य की ओर बढ़ रहा था . रात के करीब तीन बजे साइट की रोशनी दिखी... शरीर में नव उर्जा का संचारण हुआ . मै लगातार सात घंटे से चल रहा था . 
जैसे तैसे साइट पहुंचा . चौकीदार ने  टॉर्च की रोशनी मेरी ओर डाली और उठ खडा हुआ . कुत्ते भौंकने लगे . स्टाफ की नींद खुल गयी . सब बाहर आए . 
' साहब , इतनी रात और बारिश में ? ' साइट इंजिनिअर ने कहा . 
खानसामा दौड कर टॉवेल ले कर आया . 
' आप पहले कपडे उतार लिजीए... तब तक गर्मागर्म चाय बनाता हूं ' खानसामा ने टॉवेल देते हुंए कहा . सुपरवाइझर एक नाइट पैंट ले कर आया . चौकीदार ने एक घमेले में लकडी जलाई और मेरे पास ले कर आया . एक ने कंबल लपेट दिया . सब घमेले के चारों ओर बैठे . गिलास भर कर अदरक - काली मिर्च की चाय आई . 
स्टाफ मुझे नसीहत दे रहे थे... और मै गुपचुप चाय पी रहा था..... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर