Sunday, October 9, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - १५

यादें _ सवाल की ! भाग - १५
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प्रश्नचिन्हों का जीवन ! सुख दुःख के हिंडोले पर झूलते पल.... जीवन रस की बहती कलकल..
जन्म से मृत्यू तक का यह जीवन सफर भिन्न भिन्न रंग लिए बुनते जाता रिश्तों का जाल . सफलता - असफलता , खुशी - गम , दर्द - राहत , दोस्ती - दुश्मनी , होनी - अनहोनी , विपन्नता - संपन्नता , संतुष्टी - असंतुष्टी , प्यार - क्रोध , उपकार - फरेब ऐसी अनगिनत सीढियॉं पार करते है हम ! 
कोई भी नकारात्मक बातें - घटनाएं  जब हमारे साथ होती है , तो एक सवाल ईश्वर से हम जरूर पूछते है , " हे भगवान .. ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? " 
संपूर्ण ब्रम्हांड में सबसे भोलेभाले और सरल हम ही होते है , हमारी दृष्टि से ! हमारे साथ ही बुरा क्यो होता है , यह यक्षप्रश्न आज तक अनुत्तरित है . 
हमारी किताब ले कर जाने वाला उसे कभी वापस नही करता , हम ने किसी को पैसे की मदद की , वो पैसे लौटाता नही , कोई सहायता मांगे तो हमें बहाने बताना नही आता है , हमारा दिल जल्दी पसीजता है , हम जी तोड़ मेहनत करते है पर सफलता नही मिलती , हम सब के काम आते है पर हमारे काम कोई नहीं आता है , गलत आदत से दूर और सात्त्विक भोजन के बाद भी हम ही बीमार क्यो होते है ..... अनंत सवालों की शृंखला का सरताज _ " ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? " 
बच्चे हमारी बात नही मानते और ज्येष्ठ हमें सुनना नही चाहते... 
दुर्घटनाएं हमारे इंतजार में ! हम स्वाभिमान से सराबोर _ कटेंगे लेकीन झुकेंगे नही ! 
हम किसी दुर्घटना के शिकार हुए तो तत्काल यही सवाल बडा सा प्रश्नचिन्ह ले कर हमारे सम्मुख खडा हो जाता है... 
मै इतना दान - पुण्य करता हूं... सुबह - शाम ईश्वर की आराधना करता हूं.. फिर भी , ' ऐसा मेरे साथ ही क्यों ? ' यह प्रश्न उभरता है मनमस्तिष्क में ! हम अबोध बालक की तरह दोहराते रहते इस प्रश्न को .... 
किसी ज्योतिष बताने वाले या शुभचिंतक के पास जा कर अपनी समस्या बताते ही , वह पहले हमें ' हमारे सीधेसादे होने का प्रमाणपत्र ' प्रदान करता है .... फिर धीरे धीरे हमारी नब्ज टटोलता है और फिर हमारी दुखती रग पर हाथ रखता है... हम उसके मुरीद हो जाते है..आखिर हमें समझने वाला कोई तो है ! हम ऑंखें मूंद कर विश्वास करते है..
उसकी बातें हमें सत्य और अच्छी लगती है...
हमारा जीवन काल कभी भी सीधी रेखा नही होता.. जीवन मार्ग कभी भी चिकना और समतल नही होता... प्रश्न आसान और समस्या सरल नही होती .. यह हम भी समझते है लेकीन...!!!
इस सवाल में दो संभावनाएं होती है.. पहली संभावना की हम एकमेवाद्वितीय है ! दुसरी संभावना की यह आम बात है . और दुसरी संभावना के दायरे में हम आते है..
' ऐसा मेरे साथ ही क्यो ? ' इस सवाल की पीडा से उपजी ग्लानि तार तार कर देती है विश्वास को... तिनका भी सहारा महसूस होता है..
इस सवाल की आत्मग्लानि से बाहर निकलना आवश्यक है.. यह मेरे साथ ही नही हो रहा है... असंख्य भुक्तभोगी है इस के !! अच्छा - बुरा जो भी होता है हमारे साथ , यह जीवन का हिस्सा ही है... स्याह और श्वेत पहलू निखारते है हमारी सोच - समझ को.. परिपक्व करते जाते विचार और मुसीबत की अग्नि में तप कर ही हमारा सुवर्ण व्यक्तिमत्त्व निखरता है कुंदन सा ! 
संघर्ष की आंच में तप कर ही मनुष्य ' मनुष्य ' बनता है... ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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