यादें _ सवाल की ! - १६
Hindi language _ हिंदी भाषा
दिव्य अस्त्र की तरह अनचाहे - अकल्पित सवाल सनसनाते हुएं धन्य कर जाते हमारे कर्णपटल को... और झनझना उठते है मस्तिष्क के तार... ऐसे अनपेक्षित सवाल का तात्काल जवाब भी नहीं होता है हमारे तूणीर में !
मै एक स्कूल मे अपना स्पर्धा कार्यक्रम " Express in a minute " के संचालन और " motivational speaker " के तौर पर आमंत्रित था . स्पर्धा संपन्न हुई .. मैने विजेताओं की घोषणा कर उन्हें पुरस्कार और प्रमाणपत्र बॉंटे . इसके पश्चात मैने अपनी speach दी . संपूर्ण कार्यक्रम होने के बाद मै निकल रहा था , तब बच्चों ने मुझे घेर लिया . अपनी queries पूछने लगे .. मै यथासंभव जवाब देने की कोशिश कर रहा था .
मेरा परिचय देते हुएं मुख्याध्यापक सर ने मेरी qualifications और वर्तमान में चल रही पढाई तथा व्यवसाय की जानकारी विद्यार्थियों को दी थी .
मै कार में बैठ ही रहा था , तब एक विद्यार्थी दौडते हुएं आया और मैने speach मे History की पढाई का जो तरीका बताया था , उसे विस्तार से पूछने लगा.. मैने उसकी जिज्ञासा की पूर्ति करने की कोशिश की.. फिर अंत में दनदनाता हुआ सवाल किया , ' सर , आप अभी भी " टाइमपास " के लिए पढाई कर रहे है क्या ?'
नववी कक्षा के उस विद्यार्थी को क्या जवाब दू !?
' आप ऐसा क्यो सोच रहे हो...? ' मैने पूछा .
वह झेंप गया..
' बस् , कुछ नहीं सर..:' वह सिर झुका कर बोला..
मै स्कूल से निकल कर नागपुर की ओर आ रहा था.. लेकीन उस विद्यार्थी का सवाल मेरे साथ ही आ रहा था.. टाइमपास !!!
ज्ञान अर्जन = टाइमपास ... यह equation अब दिमाग में भी तांडव कर रहा था...
फिर मेरे आगे के कार्यक्रमों में ज्ञानार्जन के महत्त्व का मुद्दा जुड गया.. महिने - साल बिते.. कार्यक्रम चलते रहे...
फिर ' कोरोना युग ' आया.. दो वर्ष भय में कोरे ही गुजरे..
रात के आठ बज रहे थे शायद . मै स्टडी रूम में PhD course work का assignment लिख रहा था . मुझे हॉल में आने के लिए आवाज लगाई गयी . अभी कौन आया होगा , यह सोचते सोचते मै नीचे आया . हमारी कालोनी की सोसायटी के एक बुजुर्ग सदस्य और एक वयस्क व्यावसायिक बैठे थे . मैने पधारने का प्रयोजन पूछा . कालोनी की कुछ समस्याएं थी और उसका निवेदन महानगरपालिका को देना था , उसे लिखवाने के लिए वे आए थे . मैने महानगरपालिका के नाम से एक पत्र लिखा और सब कालोनीवासियों के हस्ताक्षर लेने के लिए कहा .
वयस्क इंजिनिअर व्यावसायिक ने मुझे कहा की , आप भी साथ चलिए.
' मै अभी assignment लिख रहा हूं , इस लिए क्षमा किजीएगा .' मैने कहा .
' अभी कौनसा assignment लिख रहे हो ? ' उन्होंने अचरज से पूछा .
' जी .. PhD course work का...' मैने जवाब दिया .
' आप का व्यवसाय है.. फिर PhD क्यो कर रहे हो ? टाइमपास के लिए..' उन्होंने सवाल दागा .
तीन साल पहले का वही सवाल मेरा पीछा छोडने तैयार नही था !!!!
' टाइमपास ? आप ऐसा सोचते हो...' मैने सयंत स्वर में कहा.
' नही.. आप का बिझनेस है.. आप इंजिनिअर भी है.. आप नौकरी करने से तो रहे... फिर PhD का क्या फायदा ? उन्होंने अपना तर्क बताया .
' पढाई , ज्ञानार्जन यह आपको टाइमपास लगता है और इस में फायदा - नुकसान भी खोजते हो...' मैने कहा .
बुजुर्ग सदस्य पशोपेश मे थे...
' साहब , हम आते है.. आज जितने हस्ताक्षर मिलते है , वह लेते है और बचे कल ले लेंगे.. राम राम जी..' खडे हो कर बुजुर्ग सदस्य ने कहा .
मै उन्हें छोडने गेट तक गया..
वापस आया तो वह सवाल मेरे साथ ही आया.... ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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