Friday, April 26, 2024

चयित म आयो पानी। bhoyari dialect _ भोयरी बोली। bhoyar culture _ भोयर संस्कृति

चयित म आयो पानी 
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति 

होरी जरी धुड्डी भयी 
हासी खुसी साजवनी 
बिह्या क मोह्यतूर ला 
चयित म आयो पानी।

बाटी सारी पतरिका 
हर घर चाहा पानी 
उब कन घायीस भयो 
चयित म आयो पानी।

आयी बाजत गाजत 
बरात की आगवानी 
जोर नाचनी वाला ला 
चयित म आयो पानी।

लाडो आयो जी मांडो म 
लाडी की न्यारी कहानी 
सुटी जी धूनगराड 
चयित म आयो पानी।

उड्यो मांडो फाट्या पाल 
असी भयी धूरधानी 
चिंता लाडी क दादा ला 
चयित म आयो पानी।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख 

Wednesday, March 27, 2024

गलित गलियारा। भाग - ५। Hindi language _ हिंदी भाषा

गलित गलियारा 
भाग - ५
Hindi language _ हिंदी भाषा 

दमकल कर्मी मोबाइल के उजाले में रिपोर्ट लिखने लगा। चौकीदार चाचा काफ़ी डरे हुए थे। दमकल कर्मी के सवालों का जवाब देना भी नहीं हो रहा था उनसे । नीलेश अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश कर रहा था। उसी समय डायरेक्टर साहब वहां पहुंचे। ऑफिस का नज़ारा देख कर वो आश्चर्यचकित हो गये। 
' यह सब कैसे हुआ? ' डायरेक्टर साहब ने पूछा। 
' पता नहीं सर, शुरुआत में थोड़ी देर के लिए हल्की-हल्की आवाजें आई और बाद में यह सब अचानक ही हुआ। ' नीलेश ने बताया। 
' लेकिन आग कैसे लगी , इसका कहीं नामोनिशान तक नहीं दिख रहा है। कही ये साजिश तो नहीं ? मैंने पुलिस थाने में फोन किया है, बाकी पूछताछ वो करेंगे। ' दमकल कर्मी ने कहा। 
' कौन करेगा साजिश ? और हम हमारा ही ऑफिस क्यों जलाएंगे ? ' डायरेक्टर साहब ने कहा। 
' देखिए साहब , जो ऑंखों से दिख रहा है , वहीं बोल रहा हूं। आप खुद देख कर बताइए , कि आग कहां से लगी। आप इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कीजिए और मुझे जाने दीजिए। ' दमकल कर्मी ने कहा। 
डायरेक्टर ने नीलेश को हस्ताक्षर करने के लिए कहा। डायरेक्टर की समझ में नहीं आ रहा था कि , किसे क्या बोले! दमकल विभाग की गाड़ी मुड़ी , उसी समय पुलिस की पेट्रोलिंग गाड़ी वहां पहुंची। पुलिस कर्मियों ने तफ्तीश कर रिपोर्ट लिखी और नीलेश की साइन किया। 
' कल थाने में आ जाइए। ' पुलिस कर्मी ने कहा। 
' सर , मेरे पास समय नहीं है। ' नीलेश ने कहा। 
' तो हम क्या निठल्ले हैं ? ' एक पुलिस कर्मी ने तल्ख़ अंदाज में कहा। 
' नहीं , उनके पास वाकई समय नहीं है। नाराज़ होने की बात नहीं है , मैं आ जाऊंगा कल थाने में। आपका नंबर दे दीजिए। ' डायरेक्टर ने कहा। 
' मेरा नंबर ले कर क्या करेंगे साहब ? कल मेरी छुट्टी हैं। ' उसी पुलिस कर्मी ने कहा। 
' कितने बजे आना होगा ? ' डायरेक्टर ने फिर से पूछा। 
' वो पुलिस थाना हैं .. ..आपके ऑफिस जैसा टाइम-टेबल नहीं होता वहां ! दोपहर को आइए और हमारे साहब से मिल लीजिए। ' पुलिस कर्मी ने कहा। 
पुलिस की गाड़ी गई और डायरेक्टर ऑफिस की सीढ़ियों पर बैठ गए। चौकीदार चाचा ने नीलेश से ऑफिस बढ़ाने के बारे में पूछा। नीलेश ने सिर हिला कर ' हां ' कहा। 
' नीलेश सर , कल काम कहां करोगे ? यहां आधा दिन लग जाएगा साफ-सफाई में.. और हल्ला गुल्ला रहेगा सो अलग ! ' डायरेक्टर ने कहा। 
' मैं यही कर लूंगा सर .. आप चिंता मत करिए। ' नीलेश ने कहा। 
' नहीं ..  पास ही किसी होटल में एक कमरा बुक कर लीजिए और अपने स्टाफ को वहीं बुला लीजिए। एक एक दिन कीमती है ! अगर कॉन्फ्रेंस हॉल मिलता है तो और भी अच्छा रहेगा। ' डायरेक्टर ने कहा। 
' जैसा आप उचित समझें सर । ' नीलेश ने कहा। 
आज नीलेश के फ्लैट में अंधेरा देख कर वसुधा को आश्चर्य हुआ। उसने मन ही मन कहा , ' ये सरल महोदय आज कहां लापता हो गए हैं ? ' 
उसने कैनवास पर काले रंग के स्ट्रोक्स मारे .. फिर ग्रे और डार्क ब्लू की शेड्स दी। दिल के भाव कैनवास पर उकेरे जा रहे थे ! अब तक कैनवास पर तीन परतें चढ़ चुकी थी ! अंधकार ने समय को सोख लिया था शायद ! आधी रात गुज़र गयी थी , लेकिन वसुधा कैनवास में खो गई थी कहीं ! स्थल काल का विस्मरण हो गया था उसे! नीलेश घर पहुंचा और रोशनी में गूढ़ हंसी दीवारें ! अचानक वसुधा को नीलेश के फ्लैट में उजाला दिखा। अपनी ही धुन में उसने पैलेट पर नारंगी, लाल और पीला रंग लिया और कैनवास पर रोशनी उंडेल दीं ! कैनवास के एक कोने से .. घने गहरे रंग से प्रस्फुटित हुई रश्मि !! ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख 



Saturday, March 23, 2024

हर हर महादेव। भाग - ५१। Hindi language _ हिंदी भाषा

हर हर महादेव 
भाग - ५१
Hindi language _ हिंदी भाषा

प्रशिक्षक ने पांच योद्धाओं की सबसे छोटी इकाई बनाई। इकाई प्रमुख भी निर्धारित किए गए। चार इकाई का एक दल बनाया गया। दौलत एक दल का नेतृत्व करने वाला था। इस तरह से साठ इकाईयां बनी और पन्द्रह दल बने ! 
तीर्थयात्री बने सदस्यों की इकाई सबसे पीछे रहने वाली थी। लोककलाकार की इकाइयां सबसे आगे तथा अन्य बीच में , ऐसा नियोजन था। लोककलाकार की टोलियां प्रारंभिक जायजा ले कर , जानकारी बटोर कर पीछे वाली इकाइयों भेजेंगी और वह अंत में तीर्थयात्री वाली इकाइयों के पास पहुंचेगी। तीर्थयात्री इकाईयां यह जानकारी महाराज के साथ चल रहे गुप्तचर दल को सौंपेंगी। _ ऐसी जानकारी प्रशिक्षक ने बताई। 
' एक सवाल पूछ सकता हूं ?' दौलत ने पूछा। 
' हां बेशक ! पूछों ......' प्रशिक्षक ने कहा। 
' खुद की सुरक्षा के लिए हम कौन से हथियार साथ रख सकते हैं गुरुजी?' दौलत ने पूछा। 
' उम्दा सवाल ! आप तीन सौ योद्धा अपने साथ तलवार , ढाल , भाला ऐसे हथियार नहीं रख सकते। इससे आपकी पहचान उजागर होने की ज्यादा संभावना है। तीर्थयात्रियों के पास छोटी ध्वजा होगी , उसका डंडा.. लोककलाकार तथा बाकी लोगों के पास की छोटी मोटी चीजें , कपड़े, रस्सी तथा समयज्ञता , चपलता, चालाकी यही आपके हथियार रहेंगे ! भोजन , रास्ते खर्च के लिए मामूली रकम मिलती रहेगी , लेकिन आप लोगों को भी स्वयं इसके लिए भी इंतजाम करते रहना है। अब आप लोगों को समझ आया होगा कि आपका कार्य कितना कठिन और जोखिमभरा हैं। इसी लिए आप लोगों का चयन इस कार्य के लिए हुआ है। ' प्रशिक्षक ने बताया। 
' और संदेश वहन के कार्य की जिम्मेदारी किसकी होगी गुरुजी ?' दौलत ने फिर से पूछा। 
' चार इकाई के एक दल में एक गुप्तचर भी है। जानकारी विश्लेषण और संदेश वहन की ज़िम्मेदारी वह निभाएंगे तथा गुप्तचर विभाग से प्राप्त निर्देश दल प्रमुख को बताएंगे। हरेक दल प्रमुख अपनी चारों इकाईयों का सुयोग्य संचालन करेंगे। दल प्रमुख और गुप्तचर चर्चा कर आगे की कार्रवाई करेंगे। और कोई सवाल ?' प्रशिक्षक ने कहा।
सब योद्धाओं को कार्य की गम्भीरता समझ आई। मुगलों का कोई भरोसा नहीं कर सकते थे। एक तरह से यह तीन सौ योद्धा महाराज की राह के अदृश्य कंटक निवारक थें। यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी ! 
' और एक बात ध्यान में रखिए। राह में न किसी से दोस्ती करनी है न ही दुश्मनी ! जानकारी हासिल करने के लिए संवाद प्रश्न - उत्तर के रूप की बजाए सामान्य रोज़मर्रा की बातें जैसे होना चाहिए .. वाद-विवाद नहीं करना है । आपको कम से कम बोलना है और ज्यादा से ज्यादा सुनना है। धीरज रखना है और मानसिक संतुलन बनाए रखना है। किसी भी हालत में अपनी पहचान छिपाकर रखनी है। और गलती से पकड़े भी गए , तब भी अपना मुंह नहीं खोलना है। आखिर अपने साथियों और महाराज की जिंदगी का सवाल है ! प्रशिक्षण में सिखाएं गये कौशल और दांव-पेंच, अब तक का तजुर्बा , अपनी सुझबुझ और शौर्य के बलबूते हमें यह अभियान सफल बनाना है। और याद रखे , आपस में बातचीत करते समय भी गलती से मराठी भाषा का प्रयोग नहीं करना है। महाराज के प्रस्थान पूर्व सात दिन पहले हम आगे रवाना होंगे ।' प्रशिक्षक ने हिदायतें दी। 
सरू के मामा और मल्हार सरू के गांव के लिए रवाना हुए। मल्हार बहुत खुश था .. सरू दीदी से मिलने जो रहा था वो ! सरू के मामा के दिमाग़ में तूफान मचा हुआ था। वे सरू को बहुत चाहते थे। आज सरू के मामा ने बोरगांव में डेरा डाला ! 
आगरा अभियान महाराज के लिए अग्निपरीक्षा थी , वैसे ही दौलत और सरू की अग्निपरीक्षा की घड़ी समीप आ रही थी। इतिहास के पन्नों पर ऐसी दास्तान दर्ज होने वाली थी , जिसे सदियों तक याद रखा जाने वाला था !! यह संघर्ष था ' स्वत्व ' के लिए ! अपने कर्तृत्व और कर्तव्य की अधिकतम सीमा परखने के लिए ! प्रवाह के विरुद्ध तैरने के लिए ! 
दुसरे दिन सरू के मामा बोरगांव से रवाना हुए और रात में सरू के गांव पहुंचे। और दौलत भी अपने दल के साथ अभियान पर निकला। रात के गर्भ में कल का भविष्य था ! ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख 



Tuesday, March 19, 2024

भोयरी बोली ग्यान। भाग - ६। bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी बोली ग्यान 
भाग - ६
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

१. साथरी = 
भोयरी बोली - बिछावन, बिस्तर, वो कपड़ों / गादी ज्या खाट पर बसन ला , लेटन ला हाथरस। 
मराठी भाषा - बिछाना, गादी / दरी जी खाटेवर बसण्यासाठी/ झोपण्यासाठी अंथरतात.
हिंदी भाषा - कुश की बनी छोटी चटाई।
संस्कृत भाषा - संस्तरण
सो भूमि भई साथरी
कहिए कारण कूण।

२. कथरी/ कथडी
भोयरी बोली - जुनअ - पुरानअ धोतर, लुगड़ा ला सिय कन् बनावस ती - वाकर
मराठी भाषा - जुन्या धोतर - लुगड्यांना शिवून बनविलेले अंथरूण/ पांघरूण  - वाकळ  , गोधडी
हिंदी भाषा - पुराने कपड़ों को जोड़ कर बनाया गया बिछौना - गुदड़ी।
करी बिछावन तहॅं बड़ भारी
गादी तकिया बहुत अपारी।

३. पीढ़ा / पीढ़ो 
भोयरी बोली - काठ / लकड़ी को पाय वालों नान्हो आसन / चवकी।
पीढ़ा पर बस कन जेवन करस। 
पीढ़ा की लंबाई देढ़ - दुइ हाथ , चवडाई पाऊन - येक हाथ आनअ उचाई  चार - सा उंगल रवस। 
मराठी भाषा - लाकडापासून बनविलेले बसावयाचे आसन - पाट.
हिंदी भाषा - लकड़ी का पायेदार छोटा आसन , छोटी चौकी। लंबाई देढ़ - दो हाथ , चौड़ाई पौन या एक हाथ और उंचाई ज्यादा से ज्यादा चार - छह उंगली 
संस्कृत भाषा - पीठ , पीठक

शोधार्थी : सुरेश महादेवराव देशमुख