हर हर महादेव
भाग - ५१
Hindi language _ हिंदी भाषा
प्रशिक्षक ने पांच योद्धाओं की सबसे छोटी इकाई बनाई। इकाई प्रमुख भी निर्धारित किए गए। चार इकाई का एक दल बनाया गया। दौलत एक दल का नेतृत्व करने वाला था। इस तरह से साठ इकाईयां बनी और पन्द्रह दल बने !
तीर्थयात्री बने सदस्यों की इकाई सबसे पीछे रहने वाली थी। लोककलाकार की इकाइयां सबसे आगे तथा अन्य बीच में , ऐसा नियोजन था। लोककलाकार की टोलियां प्रारंभिक जायजा ले कर , जानकारी बटोर कर पीछे वाली इकाइयों भेजेंगी और वह अंत में तीर्थयात्री वाली इकाइयों के पास पहुंचेगी। तीर्थयात्री इकाईयां यह जानकारी महाराज के साथ चल रहे गुप्तचर दल को सौंपेंगी। _ ऐसी जानकारी प्रशिक्षक ने बताई।
' एक सवाल पूछ सकता हूं ?' दौलत ने पूछा।
' हां बेशक ! पूछों ......' प्रशिक्षक ने कहा।
' खुद की सुरक्षा के लिए हम कौन से हथियार साथ रख सकते हैं गुरुजी?' दौलत ने पूछा।
' उम्दा सवाल ! आप तीन सौ योद्धा अपने साथ तलवार , ढाल , भाला ऐसे हथियार नहीं रख सकते। इससे आपकी पहचान उजागर होने की ज्यादा संभावना है। तीर्थयात्रियों के पास छोटी ध्वजा होगी , उसका डंडा.. लोककलाकार तथा बाकी लोगों के पास की छोटी मोटी चीजें , कपड़े, रस्सी तथा समयज्ञता , चपलता, चालाकी यही आपके हथियार रहेंगे ! भोजन , रास्ते खर्च के लिए मामूली रकम मिलती रहेगी , लेकिन आप लोगों को भी स्वयं इसके लिए भी इंतजाम करते रहना है। अब आप लोगों को समझ आया होगा कि आपका कार्य कितना कठिन और जोखिमभरा हैं। इसी लिए आप लोगों का चयन इस कार्य के लिए हुआ है। ' प्रशिक्षक ने बताया।
' और संदेश वहन के कार्य की जिम्मेदारी किसकी होगी गुरुजी ?' दौलत ने फिर से पूछा।
' चार इकाई के एक दल में एक गुप्तचर भी है। जानकारी विश्लेषण और संदेश वहन की ज़िम्मेदारी वह निभाएंगे तथा गुप्तचर विभाग से प्राप्त निर्देश दल प्रमुख को बताएंगे। हरेक दल प्रमुख अपनी चारों इकाईयों का सुयोग्य संचालन करेंगे। दल प्रमुख और गुप्तचर चर्चा कर आगे की कार्रवाई करेंगे। और कोई सवाल ?' प्रशिक्षक ने कहा।
सब योद्धाओं को कार्य की गम्भीरता समझ आई। मुगलों का कोई भरोसा नहीं कर सकते थे। एक तरह से यह तीन सौ योद्धा महाराज की राह के अदृश्य कंटक निवारक थें। यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी !
' और एक बात ध्यान में रखिए। राह में न किसी से दोस्ती करनी है न ही दुश्मनी ! जानकारी हासिल करने के लिए संवाद प्रश्न - उत्तर के रूप की बजाए सामान्य रोज़मर्रा की बातें जैसे होना चाहिए .. वाद-विवाद नहीं करना है । आपको कम से कम बोलना है और ज्यादा से ज्यादा सुनना है। धीरज रखना है और मानसिक संतुलन बनाए रखना है। किसी भी हालत में अपनी पहचान छिपाकर रखनी है। और गलती से पकड़े भी गए , तब भी अपना मुंह नहीं खोलना है। आखिर अपने साथियों और महाराज की जिंदगी का सवाल है ! प्रशिक्षण में सिखाएं गये कौशल और दांव-पेंच, अब तक का तजुर्बा , अपनी सुझबुझ और शौर्य के बलबूते हमें यह अभियान सफल बनाना है। और याद रखे , आपस में बातचीत करते समय भी गलती से मराठी भाषा का प्रयोग नहीं करना है। महाराज के प्रस्थान पूर्व सात दिन पहले हम आगे रवाना होंगे ।' प्रशिक्षक ने हिदायतें दी।
सरू के मामा और मल्हार सरू के गांव के लिए रवाना हुए। मल्हार बहुत खुश था .. सरू दीदी से मिलने जो रहा था वो ! सरू के मामा के दिमाग़ में तूफान मचा हुआ था। वे सरू को बहुत चाहते थे। आज सरू के मामा ने बोरगांव में डेरा डाला !
आगरा अभियान महाराज के लिए अग्निपरीक्षा थी , वैसे ही दौलत और सरू की अग्निपरीक्षा की घड़ी समीप आ रही थी। इतिहास के पन्नों पर ऐसी दास्तान दर्ज होने वाली थी , जिसे सदियों तक याद रखा जाने वाला था !! यह संघर्ष था ' स्वत्व ' के लिए ! अपने कर्तृत्व और कर्तव्य की अधिकतम सीमा परखने के लिए ! प्रवाह के विरुद्ध तैरने के लिए !
दुसरे दिन सरू के मामा बोरगांव से रवाना हुए और रात में सरू के गांव पहुंचे। और दौलत भी अपने दल के साथ अभियान पर निकला। रात के गर्भ में कल का भविष्य था ! ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख
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