गलित गलियारा
भाग - ५
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दमकल कर्मी मोबाइल के उजाले में रिपोर्ट लिखने लगा। चौकीदार चाचा काफ़ी डरे हुए थे। दमकल कर्मी के सवालों का जवाब देना भी नहीं हो रहा था उनसे । नीलेश अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश कर रहा था। उसी समय डायरेक्टर साहब वहां पहुंचे। ऑफिस का नज़ारा देख कर वो आश्चर्यचकित हो गये।
' यह सब कैसे हुआ? ' डायरेक्टर साहब ने पूछा।
' पता नहीं सर, शुरुआत में थोड़ी देर के लिए हल्की-हल्की आवाजें आई और बाद में यह सब अचानक ही हुआ। ' नीलेश ने बताया।
' लेकिन आग कैसे लगी , इसका कहीं नामोनिशान तक नहीं दिख रहा है। कही ये साजिश तो नहीं ? मैंने पुलिस थाने में फोन किया है, बाकी पूछताछ वो करेंगे। ' दमकल कर्मी ने कहा।
' कौन करेगा साजिश ? और हम हमारा ही ऑफिस क्यों जलाएंगे ? ' डायरेक्टर साहब ने कहा।
' देखिए साहब , जो ऑंखों से दिख रहा है , वहीं बोल रहा हूं। आप खुद देख कर बताइए , कि आग कहां से लगी। आप इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कीजिए और मुझे जाने दीजिए। ' दमकल कर्मी ने कहा।
डायरेक्टर ने नीलेश को हस्ताक्षर करने के लिए कहा। डायरेक्टर की समझ में नहीं आ रहा था कि , किसे क्या बोले! दमकल विभाग की गाड़ी मुड़ी , उसी समय पुलिस की पेट्रोलिंग गाड़ी वहां पहुंची। पुलिस कर्मियों ने तफ्तीश कर रिपोर्ट लिखी और नीलेश की साइन किया।
' कल थाने में आ जाइए। ' पुलिस कर्मी ने कहा।
' सर , मेरे पास समय नहीं है। ' नीलेश ने कहा।
' तो हम क्या निठल्ले हैं ? ' एक पुलिस कर्मी ने तल्ख़ अंदाज में कहा।
' नहीं , उनके पास वाकई समय नहीं है। नाराज़ होने की बात नहीं है , मैं आ जाऊंगा कल थाने में। आपका नंबर दे दीजिए। ' डायरेक्टर ने कहा।
' मेरा नंबर ले कर क्या करेंगे साहब ? कल मेरी छुट्टी हैं। ' उसी पुलिस कर्मी ने कहा।
' कितने बजे आना होगा ? ' डायरेक्टर ने फिर से पूछा।
' वो पुलिस थाना हैं .. ..आपके ऑफिस जैसा टाइम-टेबल नहीं होता वहां ! दोपहर को आइए और हमारे साहब से मिल लीजिए। ' पुलिस कर्मी ने कहा।
पुलिस की गाड़ी गई और डायरेक्टर ऑफिस की सीढ़ियों पर बैठ गए। चौकीदार चाचा ने नीलेश से ऑफिस बढ़ाने के बारे में पूछा। नीलेश ने सिर हिला कर ' हां ' कहा।
' नीलेश सर , कल काम कहां करोगे ? यहां आधा दिन लग जाएगा साफ-सफाई में.. और हल्ला गुल्ला रहेगा सो अलग ! ' डायरेक्टर ने कहा।
' मैं यही कर लूंगा सर .. आप चिंता मत करिए। ' नीलेश ने कहा।
' नहीं .. पास ही किसी होटल में एक कमरा बुक कर लीजिए और अपने स्टाफ को वहीं बुला लीजिए। एक एक दिन कीमती है ! अगर कॉन्फ्रेंस हॉल मिलता है तो और भी अच्छा रहेगा। ' डायरेक्टर ने कहा।
' जैसा आप उचित समझें सर । ' नीलेश ने कहा।
आज नीलेश के फ्लैट में अंधेरा देख कर वसुधा को आश्चर्य हुआ। उसने मन ही मन कहा , ' ये सरल महोदय आज कहां लापता हो गए हैं ? '
उसने कैनवास पर काले रंग के स्ट्रोक्स मारे .. फिर ग्रे और डार्क ब्लू की शेड्स दी। दिल के भाव कैनवास पर उकेरे जा रहे थे ! अब तक कैनवास पर तीन परतें चढ़ चुकी थी ! अंधकार ने समय को सोख लिया था शायद ! आधी रात गुज़र गयी थी , लेकिन वसुधा कैनवास में खो गई थी कहीं ! स्थल काल का विस्मरण हो गया था उसे! नीलेश घर पहुंचा और रोशनी में गूढ़ हंसी दीवारें ! अचानक वसुधा को नीलेश के फ्लैट में उजाला दिखा। अपनी ही धुन में उसने पैलेट पर नारंगी, लाल और पीला रंग लिया और कैनवास पर रोशनी उंडेल दीं ! कैनवास के एक कोने से .. घने गहरे रंग से प्रस्फुटित हुई रश्मि !! ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख
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