Monday, September 19, 2022

निर्माण : भाग - १४

निर्माण : भाग - १४
Hindi language _ हिंदी भाषा

दोपहर को आए फोन काल ने मुझे कश्मकश में डाल दिया . फोन काल थी दुसरी साइट की , जो लगभग १७५ कि.मी. दूर थी ! 
संध्या की चाय पे सभी स्टाफ इकठ्ठा हुए थे . मैने दुसरी साइट की समस्या उन्हें बताई . सभी मौन थे . 
' साहब , आप खाना खा कर जायेंगे या कैसे ?' खानसामा ने बीच में टोका . 
' तुम थोडी देर तक चूप रहो.. समझे ..' अकौंटंट ने खानसामा को डांटते हुए कहा . 
' साहब , जीप सर्व्हिसिंग के लिए नागपुर गयी है . इतनी दूर आप कैसे जाओगे ? ' सुपरवाइझर ने चिंतायुक्त स्वर में पूछा . 
' देखो , incline का आखरी slab section casting है . कल डिपार्टमेंट को reinforcement चेक करा कर measurements लेने है , तभी slab casting हो पाएगी . बारिश के दिन है . अगर देरी की और शटरिंग में दिक्कत हुई या किनारे की मिट्टी slide हुई तो बहुत नुकसान होगा . जाना जरुरी है.. केवल कैसे जाना यही समस्या है..' मैने अपनी बात रखी . 
' साहब इस जंगल मे अपने पास और कोई जुगाड नही है...' स्टोर कीपर ने कहा . 
' वैसे सफर तो सिर्फ ३ घंटे का ही है ... स्कूटर से हो जाएगा ना..‌' मैने कहा . 
' साहब , अभी मौसम तो साफ है , लेकीन ७० कि.मी. रास्ता जंगल और नक्षलग्रस्त इलाके का है... यह सोचने वाली बात है. आपने पीछले हादसे के बाद रात में स्कूटर से नहीं जाने की कसम खाई थी..‌.' सुपरवाइझर ने कहा . 
' आप तडके रवाना हो जाइए.. दोपहर तक पहुंच जाएंगे... कोई तकलीफ भी नहीं होगी..' अकौंटंट ने सुझाव दिया . 
' बात तो सही है.. पर आधे दिन में reinforcement चेक करा कर measurements लेना संभव नही होगा.. ' मैने कहा . 
' स्कूटर में पेट्रोल ज्यादा नही है.. ' स्टोअर कीपर ने कहा . 
' आप अभी सचमुच जाना चाहते है..‌' सुपरवाइझर ने पूछा . 
' हां , सोच तो वैसे ही रहा हूं.. ' मैने हल्की मुस्कान के साथ कहा . 
 खानसामा चाय के कप लेने के लिए आया..
' सुनो , साहब अभी निकल रहे है , तुम जल्दी खाना लगाओ..' सुपरवाइझर ने खानसामा को कहा . 
' ठीक है.. मै वही तो पूछ रहा था..' खानसामा ने कहा . 
मैने दो तीन दिन का काम समझा दिया . खाना खाया और स्कूटर को किक मारी . सूर्यास्त हुआ था.. लेकीन संधीप्रकाश का थोडा उजाला था . 
जंगल का ५ कि.मी. का रास्ता तय किया और मुख्य सडक से मैने रफ्तार पकडी.. कुछ ही दूर गया तो , मेरा निर्णय गलत साबित होने की संपूर्ण तैयारी कर रहा था ! मौसम ने अचानक करवट बदली और तुफानी हवा बहने लगी . उसकी तीव्रता इतनी ज्यादा थी की , स्कूटर सडक की एक बाजू से दुसरी तरफ जा रही थी.. मैने हैंडिल कस कर पकडा था ‌ . तभी गायों का विशाल झुंड आया . तुफानी हवा की वजह से वो भी आडी - टेढी दौड रही थी . मै एक जगह रुक गया . लेकीन झुंड अनियंत्रित था . दो - तीन गाय तेजी से स्कूटर से उछली.. और मै स्कूटर ले कर नीचे गिर गया . 
मेरा निर्णय तो गलत साबित हुआ था.‌‌ परेशानी यह थी की , स्कूटर में इतना ही पेट्रोल था की मै पेट्रोल पंप तक जा सकता था या लौट कर साइट जा सकता था...  अगर लौट कर साइट गया तो सुबह पेट्रोल टंकी खाली... फिर दुसरी साइट कैसे जा सकता था !!!!
यह परीक्षा की घडी थी... मन विचलित था... कर्तव्य सामने था.. और पेट्रोल की परेशानी तो अलग ही मसला था....
क्या करें ??????  आगे जाएं या पीछे ??? ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

उलंगला गावगाडा. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

उलंगला गावगाडा
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

दोन पाये च्यार पाये
वाघं करते बेजार
घेते नड्डीचाच घोट
झालं जगनं उधार ।१।

भायी पयदले रानी
भेबारले कास्तकार
तीन लोक दाही दिस्या
लागे त्यायले बेकार ।२।

किड्या - मुंगीवानी गत
केलं राज्याले लाचार
उलंगला गावगाडा
गेलं झोपी सरकार ।३।

फसलीच्या इमल्याचं
ताल तुंब्याच जुकार
घेते लावून गा फासी
जीत्यापनाले नकार ।४।

सीद्यासाद्या मानसाले
नायी आकार उकार
तरहाती घोगल्यात
सारे सपले इकार । ५ ।

झाले मानसाचे आता
अजबच जनावर
करे गरीबगुद्याची
दिवसानीच सिकार । ६ ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, September 10, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - १३

यादें _ सवाल की ! 
भाग - १३

सफर यह हर मनुष्य , जीव जंतू की जरूरत है.. कुछ जगह जानी पहचानी होती है तो कुछ डगर.. कुछ नगर अनजाने ! अपरिचित जगह ढूंढने के Google map का सहारा रहता है.. लेकीन वह हर जगह , हर बार कारगर रहेगा ही इसकी गॅरंटी नही.. location map पर चलने के बावजूद भी हम निश्चित स्थान पहुंचेंगे या नही _ विश्वास नही रहता . और सही जा रहे है , फिर भी किसी राहगीर , व्यक्ति को पूछे बगैर तसल्ली नही मिलती !
ऐसी ही दुविधा में फंसे कोई जनाब या मोहतरमा से वही चिरपरिचित सवाल आ धमकता है.. रुकी हुई स्कूटी / बाइक से.. नीचे उतरे कार के शीशे से.. या राहगीर से..... ' भाई , ये सडक कहॉं जाती है ?'
अचानक आ धमके इस सवाल से हमारे दिमाग के कंपास की सुईयां भी काम करना बंद कर देती है.. पहले हमें ही तय करना पडता है की हम कहॉं खडे है ! पहले हम जिस कार्य में व्यस्त थे , उससे संबंध तोड कर नक्शे की दुनिया में कदम रखते है . प्रथम पूरब दिशा दिमाग मे लाते है और बची तीन दिशाओं ९० - ९० % का कोन बनाते है.. फिर दिमाग का हिला कंपास ठिकठाक कर एक हात सडक की एक दिशा दिखाते हुए मुख से ज्ञान के मोती झरते है... ' जी , यह उत्तर दिशा में जाती है..' 
सवालकर्ता / कर्ती थोडे हिलते है.. झुंझलाहट की तरंगे छिपाते है.. गर्दन को क्षितिज समांतर हिला कर हल्की मुस्कान का तोहफा देते हुए फिर पूछते है.. ' अ हं... किस एरिया , नगर , गांव की ओर जाती है यह सडक ?' 
हम ज्ञात स्थान का नाम बताते है.. लेकीन प्रश्नकर्ता के मुखमंडल पर वही प्रश्नचिन्ह हमें दर्शन देता है.. प्रश्नकर्ता अगल बगल देखता है , की कोई दुसरा समझदार ( ? ) बंदा दिख / मिल जाए . हमारे सिर पर चढा सेवा भाव पीछे हटने को तैयार नही . 
' आपको जाना कहॉं है ?' उत्तरदाता का सवाल . 
' अलानी फलानी.. जगह.' बेरुखी से आया जवाब . 
' तो ऐसा पूछीए ना... बस अगले चौराहे से बाए.. फिर आगे छोटी सडक से दाए... ' 
वैसे सडक स्थायी.. उसने कहॉं जाना है ?!!!
एक स्नेही के घर जाना था.. Google बाबा की सेवा ली . उसने गली कूंचों से शॉर्ट कट ले कर पहुंचा दिया एक नाले किनारे ! वहॉं पहुंचा कर Google बाबा ने सेवा बंद कर दी . नाले के उस पार एक जगह चहल पहल दिख रही थी . लेकीन सडक नदारद थी . सामने एक घर था , वहॉं पूछा , ' ये सडक कहॉं जाती है ?!!!!' उसने सिर खुजालाया... कुछ सोचा और कहा , " कही नही !' 
अब सोचने की बारी मेरी थी !!! कार वही खडी की .
रात के अंधेरे में कुदते फॉंदते नाला पार किया और पहुंच गये भाई गंतव्य स्थान तक !!!!
ज्ञान प्राप्त हुआ.. सडक कही नही जाती... जाना तो हमें ही है !!! ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, September 7, 2022

दगडं पूंजत हाये. varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

दगडं पूंजत हाये
Varhadi dialect _ वऱ्हाडी बोली

हाथरल्या सातरीत
सपनं निजत हाये
पांघरल्या घोंगड्यात
दव बी भिजत हाये ।१।

भुकेजल्या लेकरात
आसवं खिजत हाये
सातरल्या वरनात
भरोसा सिजत हाये ।२।

उतरल्या जिंदगीत
ठिगरं रुतत हाये
नागरल्या वावरात
फसल कुथत हाये ।३।

अंधारल्या सामटीत
कंदील इझत हाये
भंगरल्या खंडाऱ्यात
मयाली झिजत हाये ।४।

खंगरल्या बगिच्यात
हिंमत कुजत हाये
चेंदरल्या नसीबात
दगडं पूंजत हाये ।५।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर