निर्माण : भाग - १४
Hindi language _ हिंदी भाषा
दोपहर को आए फोन काल ने मुझे कश्मकश में डाल दिया . फोन काल थी दुसरी साइट की , जो लगभग १७५ कि.मी. दूर थी !
संध्या की चाय पे सभी स्टाफ इकठ्ठा हुए थे . मैने दुसरी साइट की समस्या उन्हें बताई . सभी मौन थे .
' साहब , आप खाना खा कर जायेंगे या कैसे ?' खानसामा ने बीच में टोका .
' तुम थोडी देर तक चूप रहो.. समझे ..' अकौंटंट ने खानसामा को डांटते हुए कहा .
' साहब , जीप सर्व्हिसिंग के लिए नागपुर गयी है . इतनी दूर आप कैसे जाओगे ? ' सुपरवाइझर ने चिंतायुक्त स्वर में पूछा .
' देखो , incline का आखरी slab section casting है . कल डिपार्टमेंट को reinforcement चेक करा कर measurements लेने है , तभी slab casting हो पाएगी . बारिश के दिन है . अगर देरी की और शटरिंग में दिक्कत हुई या किनारे की मिट्टी slide हुई तो बहुत नुकसान होगा . जाना जरुरी है.. केवल कैसे जाना यही समस्या है..' मैने अपनी बात रखी .
' साहब इस जंगल मे अपने पास और कोई जुगाड नही है...' स्टोर कीपर ने कहा .
' वैसे सफर तो सिर्फ ३ घंटे का ही है ... स्कूटर से हो जाएगा ना..' मैने कहा .
' साहब , अभी मौसम तो साफ है , लेकीन ७० कि.मी. रास्ता जंगल और नक्षलग्रस्त इलाके का है... यह सोचने वाली बात है. आपने पीछले हादसे के बाद रात में स्कूटर से नहीं जाने की कसम खाई थी...' सुपरवाइझर ने कहा .
' आप तडके रवाना हो जाइए.. दोपहर तक पहुंच जाएंगे... कोई तकलीफ भी नहीं होगी..' अकौंटंट ने सुझाव दिया .
' बात तो सही है.. पर आधे दिन में reinforcement चेक करा कर measurements लेना संभव नही होगा.. ' मैने कहा .
' स्कूटर में पेट्रोल ज्यादा नही है.. ' स्टोअर कीपर ने कहा .
' आप अभी सचमुच जाना चाहते है..' सुपरवाइझर ने पूछा .
' हां , सोच तो वैसे ही रहा हूं.. ' मैने हल्की मुस्कान के साथ कहा .
खानसामा चाय के कप लेने के लिए आया..
' सुनो , साहब अभी निकल रहे है , तुम जल्दी खाना लगाओ..' सुपरवाइझर ने खानसामा को कहा .
' ठीक है.. मै वही तो पूछ रहा था..' खानसामा ने कहा .
मैने दो तीन दिन का काम समझा दिया . खाना खाया और स्कूटर को किक मारी . सूर्यास्त हुआ था.. लेकीन संधीप्रकाश का थोडा उजाला था .
जंगल का ५ कि.मी. का रास्ता तय किया और मुख्य सडक से मैने रफ्तार पकडी.. कुछ ही दूर गया तो , मेरा निर्णय गलत साबित होने की संपूर्ण तैयारी कर रहा था ! मौसम ने अचानक करवट बदली और तुफानी हवा बहने लगी . उसकी तीव्रता इतनी ज्यादा थी की , स्कूटर सडक की एक बाजू से दुसरी तरफ जा रही थी.. मैने हैंडिल कस कर पकडा था . तभी गायों का विशाल झुंड आया . तुफानी हवा की वजह से वो भी आडी - टेढी दौड रही थी . मै एक जगह रुक गया . लेकीन झुंड अनियंत्रित था . दो - तीन गाय तेजी से स्कूटर से उछली.. और मै स्कूटर ले कर नीचे गिर गया .
मेरा निर्णय तो गलत साबित हुआ था. परेशानी यह थी की , स्कूटर में इतना ही पेट्रोल था की मै पेट्रोल पंप तक जा सकता था या लौट कर साइट जा सकता था... अगर लौट कर साइट गया तो सुबह पेट्रोल टंकी खाली... फिर दुसरी साइट कैसे जा सकता था !!!!
यह परीक्षा की घडी थी... मन विचलित था... कर्तव्य सामने था.. और पेट्रोल की परेशानी तो अलग ही मसला था....
क्या करें ?????? आगे जाएं या पीछे ??? ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर