Monday, February 21, 2022

निर्माण - भाग ३. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण - भाग ३
Hindi language _ हिंदी भाषा

साइट से ५ कि.मी. दूर जंगल मे ही एक छोटासा गांव था . लेकीन विशिष्ट इलाका होने से वहाॅं पुलिस थाना भी था . मोटरसाइकिल चर्च के बगल से गल्ली मे मुडी . इस घने जंगल के इस छोटेसे गांव मे चर्च भी ! मुझे अचरज हुआ . गहरे रंग से पुते हुएं घर के आंगन मे मोटरसाइकिल रुकी . उसके पीछे हम भी रुके . ड्रायव्हर को जीप मोड कर लाने को कहा और मै उतरा . चाय के साथ मुखिया से बातें हो रही थी . मुखिया मेरे व्यक्तिगत जीवन के उत्खनन मे लगा था . मै गोल मोल परतें चढ़ा रहा था . आखिरकार बात लेन देन की पटरी पर आई . वह बोले की महिने का ५०,००० रुपया लगेगा . मैने साफ इन्कार किया . जोड तोड होता रहा . अंत मे ५,००० रुपये मे बात तय हुई . 
मै वापिस साइट आया . स्टाफ , ठेकेदार सभी साइट ऑफिस मे इकठ्ठा हुएं . 
' क्या हुआ साहब ?' स्टाफ ने पूछा . 
' कुछ नहीं.... उसे हर महिने कुछ रकम देनी होगी.. बस् !' मैने पानी पिते हुए कहा . 
' अजीब बात है..' ठेकेदार ने कहा . 
' जैसा देश वैसा भेष ! तेज रफ्तार से काम करो और यहाँ से निकलो , यही एक उपाय है .' मैने कहा . 
अब साइट तणावमुक्त थी . डिपार्टमेंट को इस बात के बारें मे अवगत कराया . वैसे तो डिपार्टमेंट के स्टाफ भी यहाँ खूश नही थे . वे भी इसी कोशिश मे रहते थे की , जल्द से जल्द यहाँ से ट्रान्स्फर हो . 
पानी के बोरवेल खुदवाई . काम के लिए गढ्ढे का पानी इस्तेमाल करने लगे . बिजली की सप्लाई भी आई . अब दो शिफ्ट मे काम होने लगा . साइट के बीच पानी के लिए तीन टंकियां बनवाई . गांव के मजदूर भी काम पर आने लगे . जंगल मे निर्माण पर्व चल रहा था . 
लेकीन बिना बाधा कोई पर्व संपन्न हो , ऐसा तो हो नही सकता ! मै साइट से ५० कि.मी. दूर शहर मे डिपार्टमेंट के ऑफिस गया था . इंजिनिअर से बातचीत ही कर रहा था की सुपरवाइझर मुझे खोजते हुएं वहॉं पहुंचा . 
' साहब , जल्दी साइट पर चलिएं . फॉरेस्ट के साहब ने काम बंद करवाया है , और आपको तुरंत बुलाया है .' सुपरवाइझर ने कहा . 
' ठीक है , तुम चलो , मै आ रहा हू .' मैने कहा . 
अब यह कौनसा नया पंगा खडा हुआ है ? , मै मन ही मन बुदबुदाया . 
मैने इस बारें मे कार्यपालक इंजिनिअर से बात की . उन्हे साथ लेकर मै साइट पहुंचा . फॉरेस्ट ऑफिसर गुस्से मे था . 
' किस की इजाजत से यहाँ काम चल रहा है ? आप सभी को अभी के अभी अंदर करवा सकता हूं .' फॉरेस्ट ऑफिसर ने आते ही धमकी भरे लहजे मे कहा . 
' साहब , यह जगह हमारे प्रोजेक्ट के लिए अलॉट हुई है . ' कार्यपालक इंजिनिअर ने कहा . 
' कहॉं है डिमार्केशन , अलॉटमेंट लेटर ?' फॉरेस्ट ऑफिसर ने पूछा . 
' साहब , लेटर तो ऑफिस मे है , अभी मंगाते है . और लेटर के अनुसार ही डिमार्केशन हुआ था , वह सफाई कर के कल आपको दिखाता हूं .' कार्यपालक इंजिनिअर ने कहा . 
' यह काम तो आपको पहले करना चाहिए था . काम बंद रखो . अब यहाँ बाहर से ना कोई मटेरियल आएगा , ना ही बाहर जाएगा . मै दो दिन का समय देता हूं . तब तक पूरी कार्यवाही हो जानी चाहिए . नही तो यहाँ का सामान , मटेरियल , मशिनरी सब जब्त होगा और आप लोगों पर मुकदमा दायर होगा .' फॉरेस्ट ऑफिसर ने कहा . 
फॉरेस्ट ऑफिसर गया . काम बंद हो गया . 
' मै ऑफिस से लेटर , ड्रॉइंग , इंजिनिअर भेजता हूं . डिमार्केशन के कुछ प्वॉइंट तो मिल ही जाएंगे . आप चिंता न करें .' कार्यपालक इंजिनिअर ने कहा . 
जीप उन्हे लेकर गयी और हमारा पुराने डिमार्केशन प्वॉइंट खोजने का अभियान शुरू हुआ .   ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, February 19, 2022

निर्माण - भाग २. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण - भाग २
Hindi language _ हिंदी भाषा

काम चालू हुआ . कॉलम के गढ्ढे खोदे जा रहे थे . सरिया के कॉलम बन रहे थे . प्लायवूड और लकडी के तख्तों से शटरिंग बन रही थी . काम जोरशोर से चल रहा था . हर एक व्यस्त था . काम की रफ्तार से उत्साह की बयार बह रही थी . निर्माण का बीजारोपण हो रहा था !
एक दिन अचानक हाथों में लाल झंडे लहराते हुए लोगों का झुंड नारे लगाते हुए साइट की ओर आते हूए देखा . मजदूर अपना काम कर रहे थे . लेकीन मुझे किसी अनिष्ट की आशंका हुई . वह झुंड नारे लगाते हुए साइट तक आए और सभी अपने मुखिया के आदेश पर वही बैठ गये . मैने मुखिया को बिठाया और सभी को पानी पिलाने के लिए खानसामा को कहा . 
मुखिया तैश में था ! 
' आप लोग तुरंत यहाँ से निकल जाओ , इसी में आप की भलाई है . आपका टेंडर हमें दे दो . हम लोग ही यह काम करेंगे . ' मुखिया ने कहा . 
' ऐसा कैसे होगा श्रीमान ? टेंडर जिसे मिलता है , उसे ही काम करना पडता है . हम भी तो मजदूर ही है . इस काम के लिए हम भी अपना घर - बार छोड के इस जंगल मे आए है . ' मैने संयत स्वर में कहा . 
' हमें इस से मतलब नही . हमारे क्षेत्र में आप काम नही कर सकते . काम तो हम ही करेंगे . आप निकलो यहाँ से . ' मुखिया ने गुस्से से कहा . 
हाथ मे झंडा लेकर बैठे लोग जोर जोरसे नारे लगा रहे थे . 
' देखिए , हम तो गिनती के लोग आए है . यह काम करने के लिये काफी लोगों की जरूरत होगी . आपके साथ आए लोगों को भी यहाँ काम मिलेगा . ' मैने समझाते हुए कहा . 
' हमें आपका एक भी आदमी यहाँ नही चाहिए . ' मुखिया ने कहा . 
खानसामा तब तक चाय - बिस्कुट ले कर आया . 
' आप पहले चाय लिजीए..' मैने कहा . 
आप समझ नही रहे है बात की गंभीरता कोई ...' मुखिया ने चाय पिते हुए कहा . 
' मै आपकी बात और परेशानी समझ रहा हू श्रीमान . लेकीन आप भी हमारी दिक्कतें समझने की चेष्टा किजीए .हम मुठ्ठी भर लोग आपकी पनाह में ही यहाँ काम करने के लिए आए है . आप चाहते है तो हम वापिस भी चले जाएंगे . लेकीन उस हालात मे यह काम बंद हो जाएगा , आपके लोगों को जो काम मिलने वाला था  , वह भी जाएगा . आप शाति से सोचिए ...' मैने कहा . 
काम बंद कर मजदूर अपने - अपने कैम्प में दुबक गये . साइट पर भय का वातावरण था . स्टाफ मेरे पीछे खडा था . 
' देखिए साहब , मुझे आपकी नही , अपने लोगों की फिकर है . हम स्थानिक जनता के लिए लडते है और लडते रहेगे . संघर्ष ही हमारा मूलमंत्र है...' मुखिया ने कहा . 
जोर - जोर से नारे लगने लगे . 
' देखिए , आप जनता के लिए संघर्ष करते है , यह बहुत अच्छी बात है . हम भी आम जनता ही है , सरकार नही . अब आप ही मार्गदर्शन करें .' मैने कहा . 
' हमारे लोगों के रोजगार का क्या होगा ? मुखिया ने पूछा . 
' यह काम बडा है और दो - तीन साल चलेगा . इस काम के लिए आस पडोस के गांवि और लोगों की सहायता लगेगी ही .... तभी यह काम पूर्ण हो पाएगा . अगर आपकी संमती होगी तो मै कल आप से मिलता हूं .' मैने कहा . 
' ठीक है . मै आज चर्चा करता हूं और फिर आपको खबर भेजता हूं .' मुखिया ने कहा . 
लोगों ने फिर से नारे लगाएं , लेकीन अभी तीव्रता कुछ कम थी . वे लोग साइट से गये . स्टाफ , ठेकेदारों ने मुझे घेर लिया . 
' अब क्या होगा साहब ? यहाँ काम करना जोखिम भरा लग रहा है . मजदूर भी डर गये है . ' एक ठेकेदार ने कहा . 
' कल देखते है... काम चालू रखो..' मैने कहा . 
रात मे जंगल डरावना लग रहा था . इस घटना से सभी के दिल में डर बैठ गया था . मजदूरों ने कैम्प के आगे आग जलाई . आज कोई सोने को राजी नही था . वे आग के पास लठ - कुल्हाडी लेकर पहरा दे रहे थे . चौकीदार चारों ओर घूम रहा था . डर की वह रात बहुत लम्बी थी . पत्तों की जरा सी सरसराहट से सभी चौकन्ने हो जाते थे और टॉर्च की रोशनी आवाज की दिशा में करते थे . क्षितिज पर लालिमा छाई . उषा का आगमन हुआ . कुछ देर बाद सूर्य नारायण ने दर्शन दिए . मजदूरों के जान में जान आई . 
दोपहर मे मोटरसाइकिल से एक अनजान आदमी साइट पर आया . 
' आपको बुलाया है .' उस ने मुझ से कहा . 
' ठीक है , तुम आगे चलो ... पीछे पीछे हम आते है . ' मैने कहा और ड्रायव्हर को आवाज लगाई . 
ड्रायव्हर जीप लेकर आया . 
' हम भी साथ चले क्या ? ' स्टाफ ने पूछा . 
' नही , तुम लोग काम देखो. मै जल्दी ही आ जाऊंगा . ' मैने कहा . 
मोटरसाइकिल के पीछे हमारी जीप चल रही थी जंगल के टेढे - मेढे रास्तों से !
 मनमस्तिष्क में विचारों का तूफान आया था . मुखिया क्या बोलेगा ? इस समस्या का समाधान कैसे होगा ? चर्चा शांति से होगी या कुछ अनहोनी होगी ? 
कई अनुत्तरित प्रश्नों की उछल कुद मेरे छोटे से दिमाग मे चल रही थी . सिर भारी भारी लग रहा था . चिंताओं का मकडजाल घना होते जा रहा था...... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Wednesday, February 16, 2022

लगनसराई ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

लगनसराई
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भयी गो उलंगवाडी
आब स निचनताई
निपट्यो साखरपुडो 
आब बिह्या की जी घाई ।१।

मोह्यतूर क ठोक ला
हाल वाला की कमाई
सोनो - नानो , अहिर ला
खरचीस पाई - पाई ।२।

उधारी पर किरानो
सहारो बहिन भाई
हात उसनी रकम
सूट , दायजा म गयी ।३।

घरदार म धांधल
हरद न् देवादेवी
घराती बराती कन् 
घाडी रवनक आई ।४।

हर रोज की खरिदी
बाटी पतरिका भायी 
दाहा डेरी क मांडो ला
सूते बहिन - जवाई ।५।

बिह्या वरी हासी खूसी
होस आसू न बिदाई
दुय कुटुम्ब को मेर
करस लगनसराई ।६।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, February 15, 2022

निर्माण - भाग १. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण - भाग १
Hindi language _ हिंदी भाषा

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृध्दश्रवा : ।
स्वस्ति न : पूषा विश्ववेदा : ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि : ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।

कारवां चल रहा था.. आगे हमारी जीप , पीछे सामान से लदा ट्रक , ट्रैक्टर और मजदूरों से भरी गाडी . शहर पीछे छूट गये... जंगल के पहाडी रास्तों से गुजर रहे थे . 
' कहॉं है साहब साइट ?' पीछे बैठे स्टाफ ने पूछा . 
' बस , देखते जाओ...' मैने जवाब दिया . 
राज्यों के सीमावर्ती इलाके का घना जंगल . आखिरकार सडक से भीतर जाती पगडंडी पे हमारी जीप मुडी . यह जंगल का रास्ता था.. पीछे सामान से लदा ट्रक हिलते - डुलते आ रहा था . एक बडे से गढ्ढ के पास जीप रुकी . वही कम झाडीवाली जगह थी . 
' यहॉं जंगल मे साइट है ? ' स्टाफ ने पूछा . 
' हॉं , यही है...' मैने कहा . 
स्टाफ , ड्रायव्हर , ठेकेदार , मजदूर सभी मुझे घेर कर खडे थे . सामान उतारते - उतारते अंधेरा हो गया . 
' आज तिरपाल टान लो ... कल से कैम्प बनाएंगे . ठीक है !' मैने सभी को हिदायत देते हुए कहा . 
' साहब , पीने का पानी कहॉं से लाना होगा . यहॉं आसपास तो गांव भी नहीं है .' ठेकेदार ने पूछा . 
' अभी पीछे वाले गढ्ढे से काम चलाओ . कल किसी गांव से पानी लायेंगे . ' मैने कहा . 
चारों ओर चूल्हें जले . खानसामा ने भी गैस सिलिंडर वाला चूल्हा जलाया और खाना बनाने मे जुट गया . अंधेरी रात , खूला आसमान और जंगल के बीच यह चहल - पहल ! डर नही पर बडा अजीब और उदास लग रहा था . जंगल से आती अजीबोगरीब आवाज की परेशानी अलग थी . 
स्टाफ ने कॉट लगाई... बातचीत करते - करते सभी सो गये . 
सुबह - सुबह खानसामा मुझे गढ्ढे के पास ले गया . वहॉं मवेशीयों का झुंड पानी पी रहा था . पानी का रंग मंगल ग्रह से भी लाल ! 
' तो यह पानी पीया था सबने! ' मैने चौंक कर कहा . 
' हा साहब जी....' खानसामा ने कहा . 
' ड्रायव्हर को उठाओ पहले और टैंकर ले कर भेजो उसे पानी के लिए . ' मैने वापिस आते हूए कहा . 
दो घंटे बाद टैंकर पानी ले कर आया . फिर सभी के चूल्हें जले . 
' साहब , ऐसे जंगल मे तो कभी काम नही किया हम ने . कैसे होगा ? ' स्टाफ ने चिंता जताई . 
' यह भी कर के देखते है.... टेन्शन मत लो..' मैने उसे समझाया . 
अंदर से तो मुझे भी फिकर हो रही थी... लेकीन मै किसे बताऊ ? 
ठेकेदार , स्टाफ , मजदूरों के चेहरे पर चिंता स्पष्ट देखी जा सकती थी . मै मुस्कुराकर सभी को हौंसला दे रहा था . 
कुछ देर बाद डिपार्टमेंट के इंजिनिअर आए . उन से साइट का अन्दाजन लोकेशन लिया . कुछ मजदूरों को साइट साफ करने के लिये लगाया और कुछ को कैम्प बनाने के लिए..  सभी काम कर रहे थे , लेकीन उस में सहजता नही थी . अनामिक तणाव या भय का साया मंडरा रहा था . उत्साह का लवलेश नही था  . .. मै भरकस प्रयास कर रहा था रूचि जगाने की ! 
कैम्प तैयार हो गया . साइट ऑफिस , किचन , स्टाफ के कमरे , स्टोअर रूम , लेबर कैम्प बनने से छोटेसे गांव का आभास हो रहा था . साइट मशिनरी , ट्रक , ट्रैक्टर , जीप , बाइक से उस मे चार चांद लग गये थे ! चारों ओर चहल - पहल थी . साइट सफाई का काम चलता रहा . मेकैनिक और हेल्पर मशिनरी को चालू कर चेक कर रहे थे...
अंत मे ले - आउट का रेखांकन हुआ ... उस सुनसान घने जंगल मे ले - आउट की चूने की रंगोली सजी.....    ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, February 10, 2022

अंकिता. Marathi language _ मराठी भाषा

अंकिता
Marathi language _ मराठी भाषा
स्त्री जन्मा तुझी अजब कहाणी
हृदयी अमृत नयनी पाणी......

नावातच अंकित झाली ह्या पुरुषी मानसिकतेची...
आदीम अवस्थेत असताना एका ज्येष्ठ आईच्या आज्ञेत राहणारे कुटुंब आज तिच्याच मुळावर उठलेत... असे कसे ?
निसर्गाशी तादात्म्य पावलेले आदीम जीवन कष्टाचे , जोखमीचे होते . स्थिर नव्हते . रोज नव्या बदलांना सामोरे जाताना ते गोंधळले जरूर पण तुटले नाही.. लवचिक राहाले . लिंगभेद माहीत नसणारा ... बाकी प्राण्यांपेक्षा शरीराने कमकुवत असणारा मानव प्राणी आज हिंस्र पशू का झाला ?
ह्या माय माऊलींच्या कल्पकतेने , ज्ञानाने , जिज्ञासेने , निरीक्षण बुध्दीने अन्न निर्मितीचा सुलभ उपाय आपल्याला गवसला ; तो शेती ! भटक्या जीवनाला व अन्नासाठी दाही दिशा फिरणाऱ्या मानवाला स्थिरता आली ती शेतीमुळे . आजच्या प्रगतीची मुहूर्त मेढ उभारल्या गेली . साहित्य प्रसवले . ... निसर्गाचे गूढ उकलले . दुसऱ्या टोळ्यांना जिंकून , गुलाम बनवून त्यांना शेतीसाठी राबवले व येथेच माशी शिंकली . गुरेढोरे , गुलाम ह्यांच्या कक्षेत भिरकावून दिली गेली स्त्री ... अनंत काळासाठी . ती आता कुटुंबाची सदस्य न राहता वस्तू बनत गेली . यंत्र बनली भोगाचा . साथीच्या आजारासारखी पसरत गेली पितृसत्ताक कुटुंबपद्धतीच्या समाजाची साथ . उध्वस्त केले त्या ' स्त्री ' नावाच्या वस्तूचे जीणे . रक्ताच्या थेंबा - थेंबात भिनली ती पीढ्यान पीढ्या . 
वस्तू म्हटले की किंमत आपोआप चिकटते.. कपाळावरच्या कुंकू सारखी . मुलं जन्माला घालणं , एवढंच त्या यंत्राचे काम . बाजारभावाने विकत घ्यायचं , नाही तर पळवून न्यायचं , नाही तर हिसकावून घ्यायचं .... उपभोगायचं... संपलं ; ह्या पलीकडे अस्तित्वच काय तिचं ? सगळे नियम , संस्कार स्त्रियांसाठी .... शील , चारित्र्य वगैरे चकचकीत वेष्टणासह . 
नर आणि मादी ह्या एकाच नात्याभोवती परिक्रमा करतो आमचा मेंदू ; मग तो देव असू देत का दानव असू देत -- सगळे ह्याबाबतीत सारखेच !
एका सक्षम व सारख्याच असणाऱ्या सृजनशील मादीला ' नरकाचे द्वार ' म्हणण्यापर्यंत कुजलेत आमचे विचार .... सडलेत मन... रडलेत पीतर .
' मुलगी वाचवा , मुलगी शिकवा ' हा स्लोगन चक्क आरसा आमच्या प्रशासनाचा .... समाजाचा . जाहिरात करताना गहाण बुध्दी व माणुसकी सुध्दा !
' मुलगी वाचवा ' असे लिहिताना टराटरा बुरखा फाटतोय ह्या भुसभुशीत , विकृत पुरुषी समाजमनाचा . 
' मुलगी वाचवा ' ? , म्हणजे ह्या आधी ती मारायची , शिकार करायची गोष्ट होती ? डोकं सुन्न होतंय . 
बलात्काराचे गुन्हे वाढण्याचे कारण निर्लज्जपणे सांगता काय ? _ फॅशन , तोकडे कपडे... कै . विद्या बाळ विचारतात , स्त्री निर्वस्त्र असली म्हणून तिला उपभोगायचच , हे पुरुषी मनात येतंच का ?  त्याचं उत्तर आहे , हजारो वर्षांपासून तिला अलगद माणसांतून काढून वस्तूत नेऊन ठेवण्याचे विखारी षडयंत्र . आणि अशा घटना म्हणजे पुरुषी मानसिकतेच्या अहंकाराचे विषारी फुत्कार . पाखंडी तर एवढे की देवीच्या मखरात ही बसवायचं आणि सरणावर जिवंत ही पेटवायचं ....
_ अंकिता , तुझ्या वेदनेला ... मृत्यूला कोण कारणीभूत ? 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, February 7, 2022

अजब गजब - ८७ : मांडवरायजी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ८७ : मांडवरायजी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

कंकुवर्णि भोमका सरवो सालेमाळ ।
नर पटाधर निपजे भोय देव को पांचाल ।।
नदी खळके नीझरणा मलपता पीए माल ।
गाळे कसुम्बा गोवालिया पड जोवो पांचाल ।।
ठांगो मांडव ठीक छे कदी न आंगन काल ।
चारपगा चरता फरे पड जोवो पांचाल ।।

गुजरात क सुरेंद्रनगर जिला म , सुरेंद्रनगर पासीन २१ कि.मी. अन् अहमदाबाद पासीन १४७ कि.मी. दूर ' मुली ' गाव स . परमार राज की मुली येक रियासत होती , जे म २४ गाव होता . तेकन च वोला ' मुली चौबिसी ' नाव पड्योतो . मुली रियासत , मांडवरायजी को इतिहास मोठो गवरवस्याली स . 
मुली म परसिध्द ' मांडवरायजी ( सूर्व्य भगवान ) ' को देऊर स . 
इतिहास : * थरपारकर , अमरकोट ( सिंध प्रांत ) , जी आबअ पाकिस्तान म स , यहान परमार राजपूत को राज होतो . यहान क राजघराना को पह्यलो राजो ' सोढाजी ' , तेकन नाव पड्यो ' सोढा परमार ' !
* सोढाजी ला ४ पोटुना होता . १. आखोजी २. आसोजी ३. लखधीर ४. मुंजोजी . सोढाजी क रानी को नाव ' जोम बाई ' . 
* संवत् १४७४ म थरपारकर म ( सिंध ) मोठो अकाल पड्यो . २००० सोढा परमार क जीव की बात होती . आबअ का करनु ? मोठो भाई आखोजी न कह्ये क , लखधीर मुंजाजी ला संग लेय कन् सुबिधा वालो इलाखो खोजेन... अन् मु आसोजी संगअ यहान च रव्हूस . 
* लखधीर ला भाई की बात पटी ( जंची ) . पर माय जोम बाई न कह्ये क , परमुलुख म इन ला माय कहान भेटेन ? तेकन मु बी लखधीर क संग जावूस . 
* लखधीर आपलऽ हंसली घोडी पर बस्यो आन् निकर पड्यो नवो देस खोजन साठी ! पर लखधीरजी को येक नेम होतो . वूई पीलू क देवी माय की पूंजा कऱ्या बिगर जेवत नी होता . वूई रोज आघअ जाता , पर लखधीरजी पूंजा साठी रोज पासअ आवत होता . तेकन रोज को पल्लो जास्त बाहाडत नी होतो . येक दिन लखधीरजी ला सपना म देव न दरस्यन देये अन् कह्ये क , सकारी सकारी येक काऱ्होड खुर कन् जमीन खांदती दिसेन . वहान तुमी खांदो... वासीन तुमाला म्हरी मूरती सापडेन . वोनअ मूरती ला तुमी संग लेय कन् जावो. वोकी पूंजापाती कर कन् तुमी भोजन कर सकेन. पर येक बात ध्यान म धरो क , जब तुमारो रथ कही फसेन त तब वहान च म्हरी थापना करो आन् गाव बसाडो .
दुसरअ दिन उसोच भयो . वून न मूरती रथ म धरी आन् आघअ चालन ला लाग्या . चालता - चालता भोगवो नदी म वून को रथ फस्यो . घाडी कोसिस करी पर रथ गुंजा भर बी नी सरक्यो . लखधीर जी न कह्ये , हे देव येनअ नदी म कसो गाव बसाडू आन् तुमारी थापना करू ? थडी पावतर त चालो देव ! 
देव की किरपा भयी आन् रथ थडी पावतर आयो . लखधीर जी न आदेस देयो क यहान च आपरो गाव बसाडजेन . भोगवो नदी क किनारा पर सबन सामान उताऱ्यो . 
* लखधीर जी न बिचार कऱ्यो क जेनअ राजा को इ इलाखो होयेन , वून ला पुसनो जरूरी स . वून न सबन ला रव्हन - खावन की येवस्था करन ला सांग्यो आन् आपलअ हंसली घोडी पर सवार होय कन् निकऱ्या . यहान राज होतो वढवान क वाघेला राजो वीसलदेव को . लखधीरजी वढवान पुग्या . राजो चोपाट खेल रह्योतो . वून न लखधीरजी ला बी खेलन ला कह्यो . लखधीरजी को खेल देख कन् राजो वीसलदेव परसन्न भयो . वून न लखधीरजी न मांगीती वोकअ परस जास्त जमीन देई , पर येक अट धरी क , लखधीरजी ला रोज वढवान आय कन् चोपाट खेलनो पडेन . लखधीर जी राजी भया .  राजा क दरबार म या बात कयी लोगना ला साजरी नी लागी . वूई खुन्नस पकड कन् रह्या . 
* येक चभाड राजपूत लोगना न जानबुज कन लखधीरजी क इलाखा जवर सिकार करी. वून क मार कन् येक तेतर पाखरू घायल भयो अन् वू जीव बाचाडन साठी लखधीरजी क गाव म आयो . अन्यासकरनी वू तेतर मांडवरायजी क मूरती पासअ लुक्यो . माय जोम बाई न वोला देख्यो आन् आपलअ पल्लू म धऱ्यो . लोकअ पासअ ५०० चभाड लोगना आया आन् तेतर ला मांगन लाग्या . रानी जोमबाई न कह्ये क , कोनतो बी राजपूत स्यरनागत को जीव बाचाडस . इ तेतर म्हरअ स्यरन म स , वोला बाचाडनो म्हरो धरम स . तुमी वापस जावो . चभाड लोगना न लढाई साठी ललकाऱ्यो . डेरा पर मुंजाजी जवर सिरफ १४० परमार लोग होता . रानी जोमबाई न कह्ये क , म्हरा वीर आपलो धरम निभायेन . ५०० चभाड संग १४० झन भिड्या आन् येक - येक ला काटता काटता वीरगती ला प्राप्त भया . लखधीर जी ला वढवान म या बात मालूम पडी . वूई आया तब वरी ५०० चभाड की लासना जमीन पर पडीती . भाई मुंजाजी बी देव क घर गयाता . मुंजाजी पोरग्या संग माय जोम बाई सती गयी . 
* लखधीर जी ला येक रबारन ( गोपालक क्षत्रिय जात की बाई ) न भाई मानेतो  , वोको नाव ' मुली ' . वोक च नाव पर लखधीरजी येनअ नवो गाव को नाव धऱ्यो , ' मुली ' . या मुली च '  मुली रियासत ' की राजधानी ! लखधीर जी न यहान च वून ला सापडीती वोनअ सूर्व्य देव की मूरती साठी मोठो देऊर बांध्यो , जी मांडवरायजी क नाव कन् परसिध्द भयो . 
# येक तेतर पाखरू साठी आपरा जीव देन वाला आपलअ पीतर / पूर्वज को आमाला अभिमान वाटे पाह्यजे...
# जेनअ कुर - वंस म जल्म्या , वोकअ  धरम साठी आपरअ जीव की बाजी लगावनी वाला पूर्वजना ला सव सव नमन .
# जय मांडवरायजी की....

( सहयोग : इंजि. जालम सिंह सोढ़ा जी , जोधपुर ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर