Saturday, August 14, 2021

अजब गजब - ७५ : मुजावर सिवमंदिर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७५ : मुजावर सिव मंदिर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् ।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवन्हित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ।।

भोयर समाज सिवभगत स ; महादेव पाराबती की पूंजा साल भर कोनतऽ न कोनतऽ रूप म करस च ! पुराना जमाना पासिन या परंपरा आय रहिस . आपरऽ पुरखाना न देस भर म सिवमंदिर बनायास . वोम को च येक देऊर स , " मुजावर सिव मंदिर " ! 
मध्यपरदेस क छिंदवाडा पासिन ३४ कि.मी. दूर मोहखेड विकासखंड को मुजावर गाव पुरानी बसाहटी म सामिल स . छिंदवाडा - बयतूल रस्ता प २५ कि.मी. दूर सांवरी बजार - मोरडोंगरी सडक स . सांवरी पासिन ९ कि.मी. दूर मुजावर गाव स . परासिया अन् जुन्नारदेव सिन उमरेठ - मोरडोंगरी होय कन् बी मुजावर गाव ला जाता आवस . 
मुजावर गाव क येक सेला पर सिवमंदिर अन् तलाव दिसस , जी इतिहास कालीन स . 
१ . इतिहास अन् मान्यता : * इतिहासकार सांगस क , इ देऊर १२०० बरस सिन बी पुरानो स . परमार वंसी महाराजा मुंज न येन देऊर ला बांध्येस , असा बी वूई सांगस ! 
* इ.स. १८७१ क ' सेंट्रल प्रोविंसेस गजेटियर ' अन् इ.स. १९०९ क ' इंपिरियल गजेटियर आफ इंडिया ' म मुजावर सिवमंदिर की जानकारी स . 
* आजादी क बास्त लिखे ' छिंदवाडा जिला गजेटियर ' म मुजावर सिवमंदिर क खरऽ इतिहास की नोंद स . 
 
२. बांधकाम : * मुजावर सिवमंदिर ला सिरफ पत्थर कन् बांध्येस . वोकी दिवालना ३ फूट सिन बी जास्त चवडी स . देऊर ला सूर्व्यामुखी अन् महादेव मुखी दरुजा स . देऊर को बांधकाम अन् कारागीरी अनुठो स . 
* असोच येक देऊर ओंकारेश्वर ला अन् येक देऊर  देवगढ़ क पायथा जवर क तलाव क काठऽ स . 

३. उत्सव , मेला : * सरावन मह्यना म मुजावर सिवमंदिर म भगवान भोलेनाथ ला रोज अभिसेक होस . मह्यना भर अखंड रामायण , होम हवन रव्हस . 
* कारतिक मह्यना म देऊर जवर क तलाव क काठऽ मोठी यातरा भरस.. मेलो लागस . 

( सहयोग : इजि. जालमसिंह जी सोढा जोधपुर ) 
लेखक : इजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, August 5, 2021

भोयरी संस्कृती - ४४ : पठौनी, पिठौरा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ४४ : पठौनी , पिठौरा
 Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

म्हरो कारजा को टुकडो बाई म्हरी पोटी
सुखी रवजे वो माय म्हरी बाई मयना
पठावूस वो पिठौरो , पठौनी की बाई रोटी ।
भाई बहिन येकच घर जलम लेस ... खेलस - कुदस - सीकस .. मोठा होस . येक दिन बिह्या क बाद बहिन - पोटी ला ससुराल म जायकन् आपरी नवी जिंदगानी चालू करनो पडस . भोयरी संस्कृती म बिह्या क बाद बी बहिन - पोटी को नातो मायका सिन खतम नी होत . नार काट्या पर बी जसो माय को नातो पोटी सिन कटत नी , वूसोच बिह्या क बाद बी बहिन - पोटी को मायका सिन टुटत नी ! 
भोयरी संस्कृती म असा कयी दस्तुर - रिवाज स , जेकन पोटी मायका सिन जुडी रव्हस . वोम को च येक मोठो साजरो रिवाज , " पठौनी - पिठौरो " !
* पठौनी : भोयरी संस्कृती म ब्याही बहिन - पोटी क घर नारेल , रेसमी करदोडो पठावन को रिवाज स , जेला ' पठौनी ' कोस . 
नागपंचमी ला गुंजा , पापडी अन् पकवान को फुलोरो धरस . आगलऽ दिन बहुड्डो ( भुजलिया / कजलिया ) बोवस . येन बखत पकवान संगच नारेल , रेसमी करदोडो पोटी क घर पठावन को रिवाज स . पठौनी पठावन क पासऽ को हेतू असो रव्हस क , नाती पोती निरोगी , सुखी अन् धनवान रह्या पायजेन ! 
* पिठौरो : पोरा क दिन भाई आन् कुटुंब क भला साठी बाईलोग उपास धरस , येलाच पिठोरो कोस . 
माय क घरीन पोटी क उपास साठी फरार पठावस . पिठोरा क पूंजा म माय क घरीन आयो नारेल चढावस अन् रेसमी करदोडो सुरक्स्या बंधन सरिखो काम म ल्यावस . 
* हर तीज - तिवार ला बहिन - पोटी की रोटी माय क घरीन जानो , इ पोटी ला मायका सिन जोड कन् धरस . रोटी माय अन् माय क माया ममता को रूप दिखाडस . जब माय क घरीन रोटी जास तब सिरफ रोटी च नी जाति त पुरो मायको , वोकी याद संग लेकन जास . घर - परिवार , गली - येटार , खेत - खल्यान , सखी - सोबतीन , हासी खुसी , खेल खिलोना सबन जिता होय जास रोटी क रूप म ! माय क घर की रोटी , पोटी ला हर सुखदुख म संग रव्हन की हिम्मत देस . जब पोटी मायका क रोटी ला देखस तब वोला वाटस क या सिरफ रोटीच नहाय त् या माय को कोरो स , माय की ममता स , आसू पुसनीवालो माय को हात स , डोकसा पर को बाप को हात स , हिम्मत देनी वाली मायबोली स ! 
मायका क रोटी को येक घास पुरी करस वोकी ममता की भूक , वोक नस नस म फुलस चयतन , बरस वोक उम्मीद को दिवो , आवस वोक निरास मन म खुसी की लह्यर , झलारस वोक मन को आंगनो दिवारी सरखो !
पठौनी , पिठौरो , राखी ला पौची पठावन की परंपरा , रिवाज आब बी भोयरी संस्कृती म स . अन् याच भोयरी संस्कृती की महानता स !

( साभार : सुखवाडा इ मासिक , भोपाल - वल्लभ जी डोंगरे )
अनुवाद : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, August 1, 2021

ध्वज. Hindi language _ हिंदी भाषा

ध्वज
Hindi language _ हिंदी भाषा

सुवर्णमयी धूप खिली सुबह की ठंड में
बच्चों की चहचहाहट गौरेय्या जैसी...
ध्वज के चबुतरे का सूर्ख रंग भी ताजा !
चबुतरे के चारों ओर सजाई रंगोली ; 
महकते फुलों से....
भुरे मैदान में सफेद चुनें की लकिरें
कंकड पत्थर , कचरा सब साफ
घर के आंगन जैसा... अपना सा ! 
ध्वज के पिछे शिक्षक वृंद , 
लेकिन पी.टी. के शिक्षक ध्वज के समीप...
सब बच्चें खडे कतार में . 
हेडमास्टर जी ने खोली ध्वज की धवल रस्सी 
तिरंगा सर सर चढा़ आसमाॅं पर 
और लहरा समुंदर के लहरों की तरह....
वहॉं से हुई पुष्पवृष्टी !
निले आसमॉं मे फैला तिरंगे का इंद्रधनुष !!
बहती हवा ने पकडा सूर..
... जन गण मन अधिनायक जय हे...
अब तिरंगे पर राष्ट्रगीत की धुन बह रही थी , 
गंगा समान पावन !
अपने परिवार की ओर देखा तिरंगे ने , 
अशोक चक्र की आंख से...
फडऽ..... फडऽ... फडऽऽ.....
ध्वज फडफडाने लगा जोरशोर से , 
अपने बच्चों के सर पर हाथ फेरने के लिए !
तिरंगे से निकले सारे रंग और , 
हरेक के सांसों में घुल गये , 
माटी की खुशबू जैसे !
विश्वास के अंतरिक्ष से आवाज गुंजा...
जय हेऽ.... जय हेऽ... जय हेऽ....
तिरंगे का हृदय भर आया ममता से 
उस की लहर से निले आकाश का समुंदर झलका...
टप्... टप्.... टप्.....!!

रचना : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर