Monday, June 29, 2020

कोरोना - हमने क्या खोया क्या पाया

कोरोना -- हमने क्या खोया , क्या पाया
पृथ्वी पर शारीरिक बनावट या प्रकृति के हिसाब से मनुष्य ' अन्नशृंखला ' में कभी भी शीर्ष पर नही था. लेकिन अपनी जिज्ञासा , तंत्र - यंत्र निर्माण शक्ती और असीम कल्पनाशक्ती के बलबूते पर आज वह शीर्ष पर है. लेकिन आज भी पृथ्वी के विषाणू और जिवाणू संख्यात्मक दृष्टीसे अव्वल है. मानव और विषाणू समय के साथ उत्क्रांत भी हो रहे है और एक दुसरे से लड भी रहे है.
प्राचिन मानव सभ्यता से लेकर आज न तक जाने कितनी महामारी आयी विषाणूओंसे. हवा , पानी , खाना , संसर्ग , पशू पक्षी , किडे , वातावरण बदलाव ऐसे कितने वाहक / प्रसारक है इन विषाणूओंके. जब तंत्र और चिकित्सा ( स्वास्थ्य) क्षेत्र उन्नत नही था तब इन अनजाने - अदृश्य विषाणूओं से होने वाली महामारी को हम ने जोड दिया धार्मिक - आध्यात्मिक आस्थाओं से . वैसे भी हमारे सांप्रत आकलन से बाहर की बात को हम मानव सहजता से या निरुपाय से जोड देते दैवीय शक्ती से. और फिर उन में से निर्माण होता है कर्मकांड का !
आधुनिक युग मे विज्ञान का क्षितीज काफी विस्तारीत हुआ है ; लेकिन चुनौतीयां भी कम नही हुयी. बढते तंत्र , जनसंख्या और उन्नत संवाद माध्यमों के बावजूद महामारी के प्रसार का दायरा दिनोंदिन बढते जा रहा है , मॉं प्रकृति के आगे हमारा बौनापन साबित करते हुये. 
अभी पुरे विश्व को बंधक बनाने वाले ' कोरोना ' विषाणू का तहलका मचा हुआ है... ऐसा पहले कभी नही हुआ था.
अब इस कोरोना के चलते हमने क्या खोया :
१. रोजगार , व्यवसाय = हर मनुष्य उपजिविका के लिये कुछ ना कुछ रोजगार , व्यवसाय , नौकरी करता है. कोरोना के चलते घर से बाहर निकलने की मनाही... मानो दुनिया का पहिया रुक गया हो. किसानों की खेत से निकली फसल घर में ही रह गयी. मंडी बंद . औने पौने दाम में खरिदारी कर के मुनाफाखोरों की चांदी ! जिन के पास बचत थी उनकी वह राशी खत्म . और दो हाथ पर जिन का पेट है ऐसे मेहनतकश मजदूरों का स्तर भिखारी पर पहुंच गया. लॉकडाऊन के चलते छोटे बडे व्यवसाय ठप . प्रायव्हेट नौकरी करने वालों की नौकरीयां लुप्त. अर्थव्यवस्था रुकने से सरकार का राजस्व का स्रोत सुख गया. हर चिज का स्वांग रचाया जा सकता है ; पैसों का नही !
२. वैज्ञानिक दृष्टिकोन = कोई भी मनुष्य एक ही विचार और आस्था लेकर नही चलता. विचार और आस्था के सतरंगी धागों के ताने - बाने से बुनता / बनता है हमारा विचार विश्व ! लेकिन आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिक दृष्टिकोन सब से प्रभावशाली और सार्थक है. थाली - ताली बजाकर इस दृष्टिकोन से हम अनेक योजन पिछे गये. असहाय अवस्था में धुंधली हो जाती है यह दृष्टी. 
३. विश्वास = कोरोना के असहाय अवस्था में विश्वास की बली चढी. हर घर , गाव , जिला , राज्य , देश एक अदृश्य भय से किले मे तब्दिल हो गया. लाखो - करोडो मजदूर , व्यावसायिक , नौकरदार वर्ग अपनी जडों की ओर .... अपने गाव की ओर लौटने को मजबूर हो गये. भय , भूख , निद्रा , मैथुन यह हर जीवधारी की नैसर्गिक प्रवृत्तीयां. भय और भूख से पिडित लोग. निद्रा की कोशिश की तो रेलगाडीने चिथडे उडा दिये अंग अंग के . इतनी परेशानीयों के बावजूद कोई घर आत है तो खुद को बचाने की जीव की प्रवृत्ती इतनी हावी की एक गाव में एक पिता ने ही ले ली अपने ही बेटे की जान ! उफ्फ...‌ रिश्तों की.... विश्वास की आहुती पडी इस भय के अग्निकुंड मे.
अंतरिक्ष में सैर करनेवाले हम भूल गये समुंदर लांघने का पवनसुत का अदम्य विश्वास. टुटता - बिखरता गया आत्मविश्वास. घरैलू हिंसा के प्रकरण भी तेजी से बढे... रिश्तों का अहसास और विश्वास खोते गये हम.
४. समय = आधुनिक मराठी काव्य प्रणेता कवी केशवसुत की पंक्तियां कुछ इस तरह है , 
" प्राप्त काल हा विशाल भूधर
सुंदर लेणी तयात खोदा ..."
अंतरिक्ष की तुलना मे हमारे पास उपलब्ध समय बहुत ही अल्प है , लेकिन हमारी कर्मधर्मिता के कारण हम समय पर अपने निशाॅं छोडने मे कामयाब हो जाते है. यह फिर से प्राप्त न होने वाला अनमोल समय हमने खोया.
कोरोना के चलते हमने क्या पाया : 
१. रोजगार , व्यवसाय =  कोरोना जैसी जागतिक आपदा मे उत्तरजीविता के लिये नये क्षेत्र , नयी राहें खोजना .... आत्मनिर्भर बनना यह आवश्यक हो गया. और इस कार्य में मनुष्य को महारत हासिल है. उसकी जिजीविषा अकल्पित परिमाणों को अंजाम देते है. एक रास्ता बंद होने के बाद दस रास्ते खोजने और खोलने की प्रतिभा हमने पायी. मितव्ययता और बचत की ओर हम बढे. रचनात्मकता , कल्पकता और आंत्रप्रेन्योरता की राह पर हम गतिमान हुये.
२. वैज्ञानिक दृष्टिकोन = स्वच्छता की वैज्ञानिक दृष्टिकोन की ओर हम तिव्रता से अग्रेसर हुये. मौजुदा मुसिबत का उपाय प्रयोगशाला में दवाई / टिके के रुप में खोजना चालू हुआ. तंत्र , उपकरण की निर्मिती की ओर हम बढे. विज्ञान के रास्ते इस विषाणू से लडने के लिये हम तय्यार हुये.
३. विश्वास = पुरे भारत के इतिहास को पलटने वाले पानीपत के युद्ध में इ . स. १७१३ मे नजीब खान ने जख्मी वीर योद्धा दत्ताजी शिंदे को उनकी हत्या करने से पहले पुछा था , ' क्यूॅं पाटील लढोगे ?. '  
' क्यूॅं नही , बचेंगे तो और भी लढेंगे ,' दत्ताजी ने यह अजरामर जबाब दिया था .
ऐसा ही  प्रबल विश्वास पैदा हुआ इस कोरोना काल में हर मनुष्य में !
' डर के आगे जीत है !' यह स्लोगन बांध लिया माथे पर हर मनुष्य ने. 
' मदद और संवेदनशीलता ' का नया रिश्ता पनपा . हर एक ने यथामति , यथाशक्ती मदद की इस कोरोना के मुसिबत मे . भाषा , धर्म , देश की सीमायें लांघकर ' मानवधर्म ' के प्रति आस्था और गहराती गयी. आत्मविश्लेषण किया हर मानव ने. विश्वास की डोर और मजबूत हुयी..... आगे आने वाले संकटों से लढने के लिये !
४. समय = पुरे विश्व ने कोरोनाकाल मे बृहद सार्वजनिक अवकाश का आनंद लिया. तंत्रज्ञान की सहायता से चर्चायें , मार्गदर्शन , साहित्य प्रसारण की बाढ आयी. इस समय ने हमारे रिश्तों को नये सिरे से खोज कर रुबरु करवाया. समय की आपाधापी मे पिछे छुट गयी थी कुछ बातें जो इस समय मे पुरी की . छोटी छोटी खुशीयां सहेजने लगे हम.
५. प्रदुषण मुक्ती = कलकारखाने , उद्योग , वाहन बंद होने से प्रदुषण फैलानेवाला वायुउत्सर्जन बंद हुआ . रसायन , गंदगी की धारायें थमने से नदी नाले , जलस्रोत स्वच्छ पानी से बहने लगे. आवागमन बंद होने से जलचर , पशू पक्षीयों को विभाजित ... विचलित करनेवाले जल - थल - वायु मार्ग सुनसान हो गये. पहली बार उन्होंने मुक्त नैसर्गिक विचरण किया. धरा ने गहरी - गहरी सांसें ली ..... कई सालों बाद. खिल उठी आबोहवा.......
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, June 27, 2020

कारी कारीच बदली

🌧️ कारी कारीच बदली 🌧️

कारी कारीच बदली
वलो वलोच अंधारो
थब् थब् पानीमिन
डोकसा पर सं भारो

          कारी कारीच बदली
          चिबडेस गा भाबरो
          मेंडकीना फुदकस
          भये आभार डोबरो

कारी कारीच बदली
पानी डोरा को मावरो
गज् गज् आवार मऽ
रोये भोकनो कावरो

            कारी कारीच बदली
            रंगं माती को हिवरो
            नदी नाला ला हुइक
            माल पडे गा पिवरो

कारी कारीच बदली
भये मन बी डोवरो
आस उघाड की डोरा
थांबाड गा इ भोवरो

©️✒ सुरेश महादेवराव
           देशमुख , नागपूर

Thursday, June 25, 2020

कंदी तपला सन्नाट



⚜ कंदी तपला सन्नाट ⚜

कंदी तपला सन्नाट
कंदी गाजला भिजला
करोन्याले घेऊन थो
उनारा गा बह्यकला

           रागो भरे सूर्व्यदेव
           त्याले चिडवे सिरवे
           माट्या करे धिंगामस्ती
           गोल गोल गा फिरवे

लोकं घरामंदी बंद
काम धंद्याले मनाई
चिंता कास्तकारायले
कसी भराची बिजाई

           किती आले किती गेले
           पर ह्या साली तितंबा
           ह्या उनारा उनाड
           नाही झाडाले यी आंबा

गेली लगनसराई
आले तोंडाले मुसके
वर खाली दचडलं
असे दावले हिसके

✒ सुरेश महादेवराव देशमुख
       नागपूर

Sunday, June 21, 2020

गानो सन तिवार को

गानो सनतिवार को

पह्यली आयी आखाडी
चारी तिवार ललकारी
जीवती पोहती
नागोबा कऽ भोवती
नागोबा बसे दाठ्ठा मऽ
नागोबा को मानमोरो
आघं आये पोरो
काजरतीज की कायनी
बसी महालक्षुमी
गनपती आस्याख
पक्स्या को पात्र
नवमी की सवासिन
अखजी अखरपक
पाय पखार पक
दहा ( दस) दिन को दसरो
पाच दिन मऽ माडी
आठ दिन मऽ आठवी
सात दिन मऽ दिवारी
पोटुबाटुना करस घाई
बहिन भाईला वोवारस
बहिन ला राग मोठो
राग को करे पानी
भाई की भयी हानी
बहिन की वाचा तोडो
भाई को मरे घोडो
आघं आयो कारतिक जुरगडो
कारतिक जुरगडा ला दहीहांडी फुटी
बहिन भाई ला जायकन् भेटी

--- सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख
नागपूर

गानो सन तिवार को

गानो सनतिवार को

पह्यली आयी आखाडी
चारी तिवार ललकारी
जीवती पोहती
नागोबा कऽ भोवती
नागोबा बसे दाठ्ठा मऽ
नागोबा को मानमोरो
आघं आये पोरो
काजरतीज की कायनी
बसी महालक्षुमी
गनपती आस्याख
पक्स्या को पात्र
नवमी की सवासिन
अखजी अखरपक
पाय पखार पक
दहा ( दस) दिन को दसरो
पाच दिन मऽ माडी
आठ दिन मऽ आठवी
सात दिन मऽ दिवारी
पोटुबाटुना करस घाई
बहिन भाईला वोवारस
बहिन ला राग मोठो
राग को करे पानी
भाई की भयी हानी
बहिन की वाचा तोडो
भाई को मरे घोडो
आघं आयो कारतिक जुरगडो
कारतिक जुरगडा ला दहीहांडी फुटी
बहिन भाई ला जायकन् भेटी

--- सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख
नागपूर

Saturday, June 20, 2020

पानी जीव की कहानी

पानी जीव की कहानी

पानी जीव की कहानी
पानी जीव ला आधार
करम को भागिरथ
गंगा पुंजस पीतर.   ।१।

पानी जीव की कहानी
दूध माऊली को सार
बहे नस नस मिन्
रगत को उपकार. ।२।

पानी जीव की कहानी
वोलऽ माती ला पाझर
वटी हिवरं खन की
भयी पेट ला भाकर. ।३।

पानी जीव की कहानी
झलारस मुंडा पर
सूर्व्य चंदर को नातो
नाव गोंद्यो आंग पर. ।४।

पानी जीव की कहानी
करे चर्रऽ  चर्रऽ धार
गुन हिरा को दिखाडे
जिंदगी की तलवार. ।५।

पानी जीव की कहानी
वको अगास मऽ घर
माया माती पर वोकी
झलकावे समिंदर. ।६।

पानी जीव की कहानी
वकी भावना अपार
मन टिचकेच जरा
बहे पापनी को पार. ।७।

पानी जीव की कहानी
सुख दुख ला हाजर
चव मीठ की हिरदा
भाव बोवस साखर. ।८।

पानी जीव की कहानी
दिसे स्यांत खालऽ वर
समायकन् साराला
धरी ताकत वज्जर.  ।९।

पानी जीव की कहानी
इंद्रधनुस फुलोर
आस बादल की झरे
नाचवस मनमोर  ।१०।

पानी जीव की कहानी
संगऽ जिंदगानी भर
सऱ्यो सरन को दाह
जीव पानी कोच घर. ।११।

-- सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, June 16, 2020

शियान -- ग्रामीण प्रेमकथा

शियान ----  ग्रामीण प्रेमकथा!
' प्रदीर्घ भाषिक अवकाश असलेली , सामाजिक आशयसूत्रांचे नानाविध पदर अनेक पात्रप्रसंगासह साकल्याने मांडणारी विस्तृत संरचना म्हणजे कादंबरी ' , ही भालचंद्र नेमाडे यांची कादंबरीची व्याख्या मला अधिक जवळची वाटते. कथात्मकता आणि वास्तवता प्रमुख गुणधर्म कादंबरीत असतात.
लेखकाने निर्मिलेले कल्पित रूप तसेच विशिष्ट व्यक्तींच्या संदर्भात आणि विशिष्ट कालावधीत घडलेली भाषिक घटना म्हणजे कादंबरी....
कोणतीही कादंबरी वाचताना , प्रतिक्रिया देताना ती कादंबरी ' वाङ् मय प्रवाहाच्या.... प्रवासाच्या ' कोणत्या टप्प्यात येते , हे बघने प्राथमिक कर्तव्य ठरते... 
सातव्या शतकात बाणभट्टाने संस्कृतमध्ये ' कादंबरी ' लिहिली तेव्हापासून कादंबरी हा शब्द रूढ आहे. कादंबरीचे मूळ रूप जरी कथा परंपरेत मिळते तरी अर्वाचीन उदयास आलेला कादंबरी हा वाङ् मय प्रकार ठरतो. आपल्या कडे मराठी कादंबरी ही इंग्रजी राजवटीत जन्माला आली असली तरी पूर्वी पासून पुराणे , आख्याणे , बखरी इ. तून कादंबरीची अंगोपांगे जाणवत होती. हरीभाऊ आपटे काळात वास्तव वादी कादंबरीची सुरुवात झाली. ह्याच काळात धनुर्धारींची पहिली ग्रामीण कादंबरी म्हणजे " पिराजी पाटील ". ग्रामीण कादंबरी ला समांतर अशी प्रादेशिक कादंबरी ही उदयास आली. स्वातंत्र्य पूर्व काळातील प्रेरणा व स्वातंत्र्य उत्तर काळातील प्रेरणा ह्यात महद् अंतर आहे. नव्वदीपर्यंतचे ग्रामीण जीवन , गावगाडा , संपन्न कृषी जीवन नव्वदीनंतर पार उध्वस्त झाले. विसाव्या शतकाच्या अंतीचे रम्य ग्रामजीवनाचे चित्रण आपल्याला ' शियान ' मध्ये अनुभवायला मिळते. ग्रामीण भाषेचा लहेजा , वऱ्हाडी बोलीची सहजता , शब्द माधुर्य , त्या त्या वयातील भावभावनांचा कोलाज ' शियान ' समर्थपणे प्रस्तुत करतो.  अमरावती - अकोला जिल्ह्यातील अस्सल ग्रामजीवनाचा धांडोळा घेताना ही कादंबरी तेथील भावभावनांसोबतच विविध नात्यांचा गुंता ही सहजपणे मोकळा करते. ह्या कादंबरीचा अवकाश जरी दीर्घ कथेसारखा असला , घटनांची पुनरावृत्ती असली तरीही भुतकाळाला कवेत घेऊन वाङमय विश्वाच्या जत्रेत ती लेखकाच्या खांद्यावर बसून कुतुहलाने हा शब्द पसारा निरखत आहे. प्रादेशिकतेची झालर लेवून , ओच्यात वऱ्हाडीच्या अविट शब्द कळ्या घेऊन मोठ्या अवखळ आत्मविश्वासाने ही कादंबरी आपले छोटुले सकवार पाऊल मराठी वाङमयाच्या सृजनशील काळ्या मातीत उमटवित जाईल. रिध्दपुर ह्या मायमराठीच्या माहेरात अंकुरलेली ही कादंबरी जन्मजात गुण घेऊन वाचकाला भूतकाळाची मधुर उत्कट अनुभूती देते. कुठे कुठे धक्के ही देते ! कादंबरीतील स्त्री पात्रे ग्राम्य आक्रमकपणा तसेच पुरुषी बोल ( जसे " बे " ) घेऊन वाचकाला सामोरे जाते.  वाचक दचकतो . प्रसंगांची विपुलता कमी जाणवते. 
प्रेम ही चिरंतन जाणिव व भावना आहे. १९६० नंतर कादंबरीच्या प्रवाहात काही नव्या जाणिवा दिसू लागतात . त्यात अस्तित्व वादी , जनवादी, ग्रामीण, ऐतिहासिक, चरित्रात्मक, दलित व मनोविश्लेषणात्मक अशा विचारधारा दिसतात. त्यातील ग्रामीण विचारधारेशी ही कादंबरी नाते सांगते. वास्तव तसेच वंचना, वासना, विकार ह्यातून माणूस शोधण्याचा अल्पसा प्रयत्न ह्या कादंबरीतून केला आहे. ती कलावाद , बोधवाद यांचेपर्यंत पोचत नसली तरीही रंजनाचे व शब्द विन्यासाचे पुट लेवून ती उभी आहे. 
राजकारण, समाजकारण व अर्थकारण यांनी नव्या दिशा लाभलेल्या ग्रामीण जीवनात जी गुंतागुंत निर्माण झाली आणि ग्रामीण जीवन ढवळायला सुरुवात झाली , नवी आव्हाने निर्माण झाली याचे मंद पडसाद ह्या कादंबरीत जाणवतात. 
भाषिक आविष्कार लेखकाच्या समृद्ध अनुभवाची शिदोरी तसेच त्याच्या वैचारिक व प्रगल्भ जाणिवेतून सिध्द होत जातो... सुरुवातीच्या साहित्य कृती रांगत्या बाळाप्रमाणे मोहक असतात. नंतर त्या प्रौढ होत जातात. व शेवटी वाङमय पटलावर ताऱ्यांप्रमाणे अढळ स्थान प्राप्त करतात....
लेखक तीव्र ग्रामीण भावना बाळगून आहे. वऱ्हाडाचे वास्तव व वऱ्हाडीचे शब्द त्यांचा अविभाज्य भाग असल्याने सकस शब्द कृती ते लीलया निर्माण करतात. उत्तरोत्तर ह्या साहित्य कृती प्रगल्भ वैचारिक मंथन व तीव्र सामाजिक जाणिवा घेऊन वाचकांपर्यंत पोहोचतील अशी आशा व्यक्त करतो.  

सीता और स्त्री

सीता और स्त्री
आदिम अवस्था में केवल मातृ कुल रहते थे. ज्येष्ठ मॉं के आज्ञा में रहनेवाला परिवार प्रकृति से एकरूप , कष्टमय , अस्थिर था. रोज नये नये बदलाव को झेलते हुये वे अचरज में जरुर थे ; लेकिन अतुट थे. नये बदलावों के अनुसार ढालते गये खुदको. लिंगभेद और योनिशुचिता से कोसों दूर !
स्त्री जाति की कल्पकता, ज्ञान , जिज्ञासा और निरिक्षण बुध्दी से अन्न निर्मिती का सुलभ रास्ता हमें ज्ञात हुआ ; वह खेती ! भटकते जीवन को स्थिरता के पल प्राप्त हुये. आज की प्रगती का बीजारोपण हुआ. उपलब्ध समय का उपयोग शस्त्र, यंत्र , प्रकृति के रहस्य तथा उत्कृष्ट जीवनयापन - समाज जीवन की सोच खोजने में हुआ. वेदों की रचना हूयी. परिवार बढते गये... खेती और गोधन के लिये नयी जमीन , नये चारागाह खोजने जरुरी हूये. कबिलाई संस्कृती से राजसंस्कृती की ओर बढते गये. नारी का अवमूल्यन नही हुआ था. घर , कृषी , तत्वज्ञान से लेकर युद्ध तक उनका महत्त्व था... उपयोगिता थी. 
रामायण इसी संक्रमण काल में घटित होता है. नये जीवनमूल्यों को खोजते , अपनाते है रामायण की व्यक्तिरेखाएं. नारी को हमेशा ही ' उर्वरता ' का प्रतिक माना गया... धरा के समकक्ष. राजा को भूपती , आकाश का प्रतिक माना गया. और सीता का धरती से उत्पन्न होना महज एक प्रतिक , जन्मकथा न रहकर यह अत्युच्च सम्मान... उसकी सृष्टी निर्माण की अद्भूत , ममतामयी शक्ती के आगे नतमस्तक समाज और प्रतिभा दर्शन बन उभर कर सामने आता है. 
यज्ञभूमी तयार करने के लिये हल चलाते विदेह के राजा जनक को सीता उसी भूमी से प्राप्त होती है... मॉं प्रकृति के रूप में ! प्रात:स्मरणीय स्त्री शक्ति में से सीता यज्ञभूमी से तो द्रौपदी यज्ञकुंड से अवतरित होती है. पंचतत्व की यह सृष्टी... ब्रम्हांड से पिंड तक व्यापक और सूक्ष्मतम भी! .... परिमाण रहित... अनंत ! 
हल से भूमी पर जो नालीनुमा लकीर बनती है सृजन की ; वह भी सीता. इस लिये राजा जनक नामकरण करते है , " सीता " . जनकपुत्री जानकी , विदेह देश की राजकुमारी वैदेही , विदेह का दुसरा नाम मिथिला - इस लिये मैथिली... शिवधनुष्य के साथ खेलती सीता....
सीता स्वयंवर में उसी शिवधनुष्य को खंड भंग करते मर्यादा पुरुषोत्तम राम ! सीताराम... सीताराम...
राजकुमारी का राजकुमार से मीलन... धरती का आकाश से मीलन... यहॉ तक सब ठिक ठाक... नये जीवनमूल्यों का अंगिकार कर, राम से मर्यादा पुरुषोत्तम बने राम मॉं और पिता की आज्ञा पालन कर बनवास स्विकारते हूये...
विश्व के सभी समुदाय में प्राथमिक मूल्यों को छोड बाकी में बहुत भेद होते है. भिन्न भिन्न समूह की भिन्न भिन्न परंपराएं , रितीरिवाज...समय के साथ बदलते हूये. 
प्रेम और निष्ठा की पराकाष्ठा सीता. कर्तव्य और प्रेम की मूर्ति राम. लेकिन समय बलवान. बीस साल में एक पीढी बदलती है. चौदा साल बनवास का समय इस का 3/4 . समय तो बदला... समय का असर आचार विचार , परंपरा , जनभावना पर तो पडता ही है. प्रेम और निष्ठा साबित करने के लिये दहकते पितृसत्ताक व्यवस्था के अग्निदिव्य को पार करती सीता... फिर भी झुलसे हुये मन - मस्तिष्क से लंका से अयोध्या आती हुयी सीता... खरा सोना अग्निदिव्य में तप कर कुंदनसा दमकते हुये.
अब अयोध्या में दिवाली और अयोध्या के राजकुमार राम बनते है अयोध्या के राजा. प्रजा से जुडा हुआ राजधर्म  , नये संकेतों को जन्म देता हुआ. इधर सीता के कोख में सृजन उत्सव. प्रजा के मन में कुछ संदेह के बादल.... खुद राजा धर्म संकट में. पति और राजा के द्वंद में पति पराभूत..पिता पराभूत. पति , पिता का दायरा छोटा - राजा का दायरा बडा. दायरा बडा तो जिम्मेदारी और निर्णय की सार्थकता और परिमाण भी बृहद्. पति का हारना तो तय था.. साथ ही दम्पती भी हार गये. दम्पती यह पति पत्नी के लिये वैदिक शब्द. वेद और अवेस्ता में दम्पती का अर्थ है ; घर गृहस्थी के सामाईक मालक. पती-पत्नी की अद्वैतता को परिभाषित करता यह समर्पक शब्द. 
प्रजा संदेह के कारण राजा राम का सीता त्याग.. दम्पती भी पराभूत.... सृजनमयी मॉं का हृदय विशाल. सहनशीलता की पराकाष्ठा... पती के लिये निष्ठापूर्वक जीवन अर्पण कर खुद के व्यक्तिमत्व को सूक्ष्म... शून्य वत करती सीता. यह शरीर केवल दु:ख भोगने के लिये ही अवतरीत हुआ है , ऐसी वेदना व्यक्त कर; राजा ने राजधर्म अनुसार ही प्रजा पर प्रेम करना चाहिए , सही इच्छा सीता ने व्यक्त की. 
वाल्मीकी ॠषी के आश्रम रहते हुये लव - कुश इन जुडवॉ बच्चों को जन्म दिया. राज चलता रहा. बच्चे बडे होते रहे. राज बढाना भी था. अश्वमेध यज्ञ के समय राजा राम की लव- कुश से भेंट हुई. राजा राम हर्षित हुये. वाल्मीकी ॠषी के आश्रम से मॉं सीता को अयोध्या लाया गया. अभी भी राम केवल पती ही न थे.... महाराजा थे अयोध्या के. प्रजा के समाधान के लिये सीता ने फिर से अग्निदिव्य करना चाहिए , ऐसी राजा राम की अपेक्षा... सीता के , नारी के , मॉं के आत्मसम्मान पर यह घातक चोट थी. सच में बदल गयी थी दुनिया. ..... सोच और विचारों से भी. इतने वर्ष जंगल में बिताने के बाद ना सीता को महाराणी के पद की लालसा थी , ना सुख की आशा थी , ना जीने की चाह थी. लेकिन उनके मातृत्व को संदेह के घेरे में रखकर मॉं के सम्मान... आत्मसम्मान को दांव पर लगाया जाय , यह उस सृजनशक्ती को नामंजूर था , चाहे वह राजा राम रहे या अयोध्या की प्रजा. आसक्ति , ग्लानी और असहायता के भाव उनके मातृ हृदय पर हावी नही हो सके. अब वह केवल मॉं थी... सदा शुद्ध... सदा पवित्र... धरती सम विशाल... मंगलमय... तीनों लोक में सर्वश्रेष्ठ स्थान - मॉं . अविकारी... अनंत . यहॉ ना कोई दिव्य की आवश्यकता थी ना कोई परीक्षा की. वह अजेय मॉं थी. अब ना उन के आंखों में आसू थे न चेहरे पर कोई शिकन. उन का दिल जोर जोर से धडक रहा था पर मुद्राभाव शांत थे. पल भर में संपूर्ण जीवन पट उन के आंखों के सामने आया. असंख्य प्रजा , राजा राम , रिश्तेदार , वाल्मीकी ॠषी इन की भीड में उन की आंखें निहार रही थी अपने सुकोमल बालकों को.... लव - कुश को स्नेहार्द भाव से देखते हुये एक निर्धार उनके मस्तिष्क में बिजली की भांती कौंधा..... अनंत उर्जा से.... अजेय भाव से.... अचानक दोनो घुटने जमीन पर टिकाये और दोनो हाथ फैला कर एक मॉं की पीडा - प्रेम , स्त्रीत्व का सुख - दु:ख और मनुष्य जीव की य:किश्चितता का कोलाज उन के मुख से फट् पडा......
" हे धरती मॉं.... अगर मै शुद्ध हू तो मुझे अपने में समा ले मॉं ऽऽऽ....."
इस अकल्पित वाणी से प्रजा से लेकर राजा राम तक कांप गये. प्रकृति मॉं ने उन की बेटी की यह आर्त ... दर्दभरी वाणी सुनी. ... महा प्रलय आया हो ऐसा आवाज हुआ.... गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ...
फट गया उस का दिल.... एक मॉं ही समझ सकती थी एक मॉं को... एक बेटी को....
दोनो हाथों से पकड कर गले लगाया सीता को... जैसे हजारों साल से बिछडे हो.... एकाकार हो गये.... गहन शांत....
आज भी पुजती है नारीयॉ खेत में , सीता देवी को झुले में झुला कर... गीत गा कर..
' सीता देवी ले दुख झाले बहु
तिनं थे येचले गहू गहू...
- जोड कर रिश्ता मॉं सीता के दुःख से...
पिसती है अनाज को दु:खों के साथ गाते गाते....
आज भी इस पितृसत्ताक व्यवस्था में अनगिनत माताएं वैसे ही पुकारती है.... कभी अग्नि में , कभी कुये में , तालाब - नदी में , छत को टंगे पंखे में.....
" ... हे मॉं ऽ ऽ ऽ मुझे समा ले... मुझे समा ले..."
         इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर.

सीता और स्त्री

सीता और स्त्री
आदिम अवस्था में केवल मातृ कुल रहते थे. ज्येष्ठ मॉं के आज्ञा में रहनेवाला परिवार प्रकृति से एकरूप , कष्टमय , अस्थिर था. रोज नये नये बदलाव को झेलते हुये वे अचरज में जरुर थे ; लेकिन अतुट थे. नये बदलावों के अनुसार ढालते गये खुदको. लिंगभेद और योनिशुचिता से कोसों दूर !
स्त्री जाति की कल्पकता, ज्ञान , जिज्ञासा और निरिक्षण बुध्दी से अन्न निर्मिती का सुलभ रास्ता हमें ज्ञात हुआ ; वह खेती ! भटकते जीवन को स्थिरता के पल प्राप्त हुये. आज की प्रगती का बीजारोपण हुआ. उपलब्ध समय का उपयोग शस्त्र, यंत्र , प्रकृति के रहस्य तथा उत्कृष्ट जीवनयापन - समाज जीवन की सोच खोजने में हुआ. वेदों की रचना हूयी. परिवार बढते गये... खेती और गोधन के लिये नयी जमीन , नये चारागाह खोजने जरुरी हूये. कबिलाई संस्कृती से राजसंस्कृती की ओर बढते गये. नारी का अवमूल्यन नही हुआ था. घर , कृषी , तत्वज्ञान से लेकर युद्ध तक उनका महत्त्व था... उपयोगिता थी. 
रामायण इसी संक्रमण काल में घटित होता है. नये जीवनमूल्यों को खोजते , अपनाते है रामायण की व्यक्तिरेखाएं. नारी को हमेशा ही ' उर्वरता ' का प्रतिक माना गया... धरा के समकक्ष. राजा को भूपती , आकाश का प्रतिक माना गया. और सीता का धरती से उत्पन्न होना महज एक प्रतिक , जन्मकथा न रहकर यह अत्युच्च सम्मान... उसकी सृष्टी निर्माण की अद्भूत , ममतामयी शक्ती के आगे नतमस्तक समाज और प्रतिभा दर्शन बन उभर कर सामने आता है. 
यज्ञभूमी तयार करने के लिये हल चलाते विदेह के राजा जनक को सीता उसी भूमी से प्राप्त होती है... मॉं प्रकृति के रूप में ! प्रात:स्मरणीय स्त्री शक्ति में से सीता यज्ञभूमी से तो द्रौपदी यज्ञकुंड से अवतरित होती है. पंचतत्व की यह सृष्टी... ब्रम्हांड से पिंड तक व्यापक और सूक्ष्मतम भी! .... परिमाण रहित... अनंत ! 
हल से भूमी पर जो नालीनुमा लकीर बनती है सृजन की ; वह भी सीता. इस लिये राजा जनक नामकरण करते है , " सीता " . जनकपुत्री जानकी , विदेह देश की राजकुमारी वैदेही , विदेह का दुसरा नाम मिथिला - इस लिये मैथिली... शिवधनुष्य के साथ खेलती सीता....
सीता स्वयंवर में उसी शिवधनुष्य को खंड भंग करते मर्यादा पुरुषोत्तम राम ! सीताराम... सीताराम...
राजकुमारी का राजकुमार से मीलन... धरती का आकाश से मीलन... यहॉ तक सब ठिक ठाक... नये जीवनमूल्यों का अंगिकार कर, राम से मर्यादा पुरुषोत्तम बने राम मॉं और पिता की आज्ञा पालन कर बनवास स्विकारते हूये...
विश्व के सभी समुदाय में प्राथमिक मूल्यों को छोड बाकी में बहुत भेद होते है. भिन्न भिन्न समूह की भिन्न भिन्न परंपराएं , रितीरिवाज...समय के साथ बदलते हूये. 
प्रेम और निष्ठा की पराकाष्ठा सीता. कर्तव्य और प्रेम की मूर्ति राम. लेकिन समय बलवान. बीस साल में एक पीढी बदलती है. चौदा साल बनवास का समय इस का 3/4 . समय तो बदला... समय का असर आचार विचार , परंपरा , जनभावना पर तो पडता ही है. प्रेम और निष्ठा साबित करने के लिये दहकते पितृसत्ताक व्यवस्था के अग्निदिव्य को पार करती सीता... फिर भी झुलसे हुये मन - मस्तिष्क से लंका से अयोध्या आती हुयी सीता... खरा सोना अग्निदिव्य में तप कर कुंदनसा दमकते हुये.
अब अयोध्या में दिवाली और अयोध्या के राजकुमार राम बनते है अयोध्या के राजा. प्रजा से जुडा हुआ राजधर्म  , नये संकेतों को जन्म देता हुआ. इधर सीता के कोख में सृजन उत्सव. प्रजा के मन में कुछ संदेह के बादल.... खुद राजा धर्म संकट में. पति और राजा के द्वंद में पति पराभूत..पिता पराभूत. पति , पिता का दायरा छोटा - राजा का दायरा बडा. दायरा बडा तो जिम्मेदारी और निर्णय की सार्थकता और परिमाण भी बृहद्. पति का हारना तो तय था.. साथ ही दम्पती भी हार गये. दम्पती यह पति पत्नी के लिये वैदिक शब्द. वेद और अवेस्ता में दम्पती का अर्थ है ; घर गृहस्थी के सामाईक मालक. पती-पत्नी की अद्वैतता को परिभाषित करता यह समर्पक शब्द. 
प्रजा संदेह के कारण राजा राम का सीता त्याग.. दम्पती भी पराभूत.... सृजनमयी मॉं का हृदय विशाल. सहनशीलता की पराकाष्ठा... पती के लिये निष्ठापूर्वक जीवन अर्पण कर खुद के व्यक्तिमत्व को सूक्ष्म... शून्य वत करती सीता. यह शरीर केवल दु:ख भोगने के लिये ही अवतरीत हुआ है , ऐसी वेदना व्यक्त कर; राजा ने राजधर्म अनुसार ही प्रजा पर प्रेम करना चाहिए , सही इच्छा सीता ने व्यक्त की. 
वाल्मीकी ॠषी के आश्रम रहते हुये लव - कुश इन जुडवॉ बच्चों को जन्म दिया. राज चलता रहा. बच्चे बडे होते रहे. राज बढाना भी था. अश्वमेध यज्ञ के समय राजा राम की लव- कुश से भेंट हुई. राजा राम हर्षित हुये. वाल्मीकी ॠषी के आश्रम से मॉं सीता को अयोध्या लाया गया. अभी भी राम केवल पती ही न थे.... महाराजा थे अयोध्या के. प्रजा के समाधान के लिये सीता ने फिर से अग्निदिव्य करना चाहिए , ऐसी राजा राम की अपेक्षा... सीता के , नारी के , मॉं के आत्मसम्मान पर यह घातक चोट थी. सच में बदल गयी थी दुनिया. ..... सोच और विचारों से भी. इतने वर्ष जंगल में बिताने के बाद ना सीता को महाराणी के पद की लालसा थी , ना सुख की आशा थी , ना जीने की चाह थी. लेकिन उनके मातृत्व को संदेह के घेरे में रखकर मॉं के सम्मान... आत्मसम्मान को दांव पर लगाया जाय , यह उस सृजनशक्ती को नामंजूर था , चाहे वह राजा राम रहे या अयोध्या की प्रजा. आसक्ति , ग्लानी और असहायता के भाव उनके मातृ हृदय पर हावी नही हो सके. अब वह केवल मॉं थी... सदा शुद्ध... सदा पवित्र... धरती सम विशाल... मंगलमय... तीनों लोक में सर्वश्रेष्ठ स्थान - मॉं . अविकारी... अनंत . यहॉ ना कोई दिव्य की आवश्यकता थी ना कोई परीक्षा की. वह अजेय मॉं थी. अब ना उन के आंखों में आसू थे न चेहरे पर कोई शिकन. उन का दिल जोर जोर से धडक रहा था पर मुद्राभाव शांत थे. पल भर में संपूर्ण जीवन पट उन के आंखों के सामने आया. असंख्य प्रजा , राजा राम , रिश्तेदार , वाल्मीकी ॠषी इन की भीड में उन की आंखें निहार रही थी अपने सुकोमल बालकों को.... लव - कुश को स्नेहार्द भाव से देखते हुये एक निर्धार उनके मस्तिष्क में बिजली की भांती कौंधा..... अनंत उर्जा से.... अजेय भाव से.... अचानक दोनो घुटने जमीन पर टिकाये और दोनो हाथ फैला कर एक मॉं की पीडा - प्रेम , स्त्रीत्व का सुख - दु:ख और मनुष्य जीव की य:किश्चितता का कोलाज उन के मुख से फट् पडा......
" हे धरती मॉं.... अगर मै शुद्ध हू तो मुझे अपने में समा ले मॉं ऽऽऽ....."
इस अकल्पित वाणी से प्रजा से लेकर राजा राम तक कांप गये. प्रकृति मॉं ने उन की बेटी की यह आर्त ... दर्दभरी वाणी सुनी. ... महा प्रलय आया हो ऐसा आवाज हुआ.... गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ...
फट गया उस का दिल.... एक मॉं ही समझ सकती थी एक मॉं को... एक बेटी को....
दोनो हाथों से पकड कर गले लगाया सीता को... जैसे हजारों साल से बिछडे हो.... एकाकार हो गये.... गहन शांत....
आज भी पुजती है नारीयॉ खेत में , सीता देवी को झुले में झुला कर... गीत गा कर..
' सीता देवी ले दुख झाले बहु
तिनं थे येचले गहू गहू...
- जोड कर रिश्ता मॉं सीता के दुःख से...
पिसती है अनाज को दु:खों के साथ गाते गाते....
आज भी इस पितृसत्ताक व्यवस्था में अनगिनत माताएं वैसे ही पुकारती है.... कभी अग्नि में , कभी कुये में , तालाब - नदी में , छत को टंगे पंखे में.....
" ... हे मॉं ऽ ऽ ऽ मुझे समा ले... मुझे समा ले..."
         इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर.

Sunday, June 14, 2020

पायी अलकाच्या वारा

⚜पायी अलकाच्या वारा⚜

धबधबा पाठी ओठी
वाहे चैतन्य गहन
निळ्या काळ्या लाल रेघी
शांत निवांत हे मन..

          केशसंभार रेशमी
          वश मेघ अवखळ
          प्रभा सोनेरी तरंगे
          पाठशिवणीचा खेळ..

चंद्र झुंबर गळ्यात
दूर क्षितिज लोभस
जलप्रपात प्रतली
जलपरीचा हा भास...

          ओठ बंद हे बोलके
          जसे धनुष्य कमान
          बोट बोटात गुंफूनी
          साहे प्रत्यंचेचा ताण...

ओला कातळ भाळला
जळबिंदूंना माळतो
पायी अलकाच्या वारा
शीळ घालूनी वळतो...

©️✒ सुरेश महादेवराव
            देशमुख , नागपूर

वोको जलम खंबुरो

## वोको जलम खंबुरो ##

पोटी जीव को टुकडो , रीतीरिवाज मऽ बंधी
घर सोडकन् जाये,संगऽ सिदोरी वो बांधी।१।

सुदा इचार आचार, गाय सोनोनानो चांदी
धरे खंबुरा गाठला,संगऽ सिदोरी वो बांधी।२।

मायबाप पठावस , स्येरी बकरी न् नंदी
करे जिंदगानी दान, संगऽ सिदोरी वो बांधी।३।

भाग लेकन जलमी ,भाग लेकन वो नांदी
राबे मायबाप साठी,संगऽ सिदोरी वो बांधी।४।

वोको जलम खंबुरो ,सहे सौंसार की आंधी
घिसे चंदनकी काया,संगऽ सिदोरी वो बांधी।५।

गंगा जमुना डोरामऽ , माया ममताला रांधी
बोट जरे निवापर,संगऽ सिदोरी वो बांधी।६।

जर आसुक बिमारी , नही आराम ला संधी
पोटुबाटुला जेवाडे, संगऽ सिदोरी वो बांधी।७।

गुन धरतिरीवानी , मनऽ अगास की धुंदी
दुय घर बारे जोत,संगऽ सिदोरी वो बांधी।८।

-- सुरेश महादेवराव देशमुख, नागपूर

Thursday, June 11, 2020

जीव चैतन को बीज

# जीव चैतन को बीज #

जीव चैतन को बीज
असा भूई पर बह्या
कसो तंतर मंतर
रची भगवान माया.।। धृ ।।

माय धरतिरी तिसी
ठेंब मिरुगनं डाया
कारऽ आभारला देख
वोकी हरखीस काया ।।१।।


खेत सिवार खुसी मऽ
झाड पेड भरमाया
लालबाऊ लालभर्र
वोकी मखमली काया ।।२।।

करी बोवनी रोवनी
खत सलफेट डाया
माती कुस गरभार
दान हिवरा ला पाया ।।३।।

कोंब दुय हात जोडे
वोनऽ राम राम कह्या
नानो येतरो सो जीव
नाव केतरा कमाया ।।४।।

ज्यान चुका ना पडस
वान टोपन ला धाया
बेरा बखतच पर
काम सारा निपटाया ।।५।।

-- सुरेश महादेवराव देशमुख, नागपूर

धाक भेवानं घेरलं ( मराठी)


धाक भेवानं घेरलं
मन साहते पराणी
एकांताची ही सोबती
गर्दी वाहते विराणी     ।। धृ. ।।
                                             वर्दी पोशाखाची छाया
                                             इतिहासाची कहाणी
                                             काय रयतेचा गुन्हा
                                             रंगा रंगाची निशाणी.      ।। १ ।।
वर्ण वणवा पेटला
त्याला अडवे ना कोणी
राख रांगोळी स्वप्नांची
झाली घरट्याची हानी.    ।। २ ।।
                                               कळपात कलहाची
                                               धुरकऱ्याची पेरणी
                                                रोप भांगेचं लावलं
                                                 नाही तुळस अंगणी.   ।। ३ ।।
नाव धनासाठी सारं
खाई टाळू चे ही लोणी
सत्ता हातात घेऊन
साळसूद आव आणी.     ।। ४ ।।
                                                सर्व साधारण जन
                                                त्यांचा वाली नाही कोणी
                                                गर्द आमावस्ये ची च
                                                बोटी शाईची निशाणी.       ।। ५ ।।
वणवण पोटासाठी
तळमळते रांधणी
भान समूहाचं सैल
कशी करावी बांधणी    ।। ६ ।।
                                              महाभारत मोठ्यांचं
                                              धूळधाण रणांगणी
                                              रक्त सैनिकांचे साक्षी
                                              पोटासाठी जिंदगानी     ।। ७ ।।
हाव आसुरीच्या पायी
युगे युगे मनमानी
चिरडले भरडले
कथा गाथा पानोपानी.     ।। ८ ।।
                                                  जीव किडा मुंगीचा ही
                                                  पशू पक्षी झाड दानी
                                                  कधी माणूस गाईल
                                                  निसर्गाची बोध गाणी.       ।। ९ ।।
काय आभाळाचा गुन्हा
एकसारखा दे पाणी
पोट सर्वांचं भरते
दोषी आहे का धरणी.       ।। १० ।।
                                --- सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
           
                          

Monday, June 8, 2020

माही उभवली तूर ( वऱ्हाडी)

माही उभवली तूर
माही उभवली तूर
डोऱ्या लय आला पूर
माह्या घासाचं सपन
झालं देवा चूरचूर ।। धृ.।।
                                  लाल्या पराटी वरचा
                                   बोंड अरीचा यी मार
                                   वावरातल्या अगासी
                                    लडे चंदरा ची कोर ।। १।।
संतराच्या बगिच्यात
लिंबा वानी गा संतर
घामाच्याच वलीताचं
कुठं चुकलं तंतर    ।। २ ।।
                                     घेंग गेली गा सोल्याले
                                      चिमे वटान्याची वर
                                      साजवनीच्या दिसाचा
                                       रुसला गा मोह्यतूर.   ।। ३ ।।
जलमो जलमीचा ह्या
मरे पावतर घोर
कोन्या दुस्माना च्यानं
दिठावलं गा वावर.   ।। ४ ।।
                                         कास्तकाराचा जलम
                                          इठू नामाचा गजर
                                           वावरात वारी वानी
                                            माह्या चालते वखर. ।। ५ ।।
संबा पाराबती माहे
हाये गनगोत थोर
हात पाय हे मातीचे
त्याले पान्या वानी जोर.  ।। ६ ।।
                                            माहे बोटं कोंबावते
                                             मनऽ हिरवं वावर
                                             मातीच्या गरभा तून
                                             पिकवतो गा भाकर. ।। ७ ।।
माह्यं सिकस्यन् मातीचं
उभे आडवे काकर
धरतिरीच्या कुसीत
माहे हिरवे अकस्यर.    ।। ८ ।।
                                             हमी भावाचं गनित
                                             कोन्या येड्याचं मंतर
                                              चाल चालता सपेना
                                                तोंड पोटाचं अंतर.  ।। ९ ।।
मले ग्यान नको पाजू
तुही चोट्ट्याची नजर
माह्या मनात गुनीले
तुह्या मनी भागाकार.   ।। १० ।।

                                            कवी : सुरेश महादेवराव देशमुख
                                                                             नागपूर

Sunday, June 7, 2020

डोरा मिरुग सपन

🌧️ डोरा मिरुग सपन 🌧️

नातो भूई आभार को
रहे माय बाप वानी
जीव जंतू को आसरो
वोकनच जिंदगानी

        पंचमहाभूत सार
        घरं दारं आबादानी
        भेदे तमाम असार
        भारे तन मन पानी

डोरा मिरुग सपन
बहे जीवन कहानी
झड भावना की लागी
मन आये ना बरानी

        भूई कुस उजयेन
        नवो जीव धरे बानी
        ढेलो माती को धकाडे
        दुय हात जोडस्यानी

ठेंब ठेंब अमरित
तिस समिंदर वानी
उबडाये हिरदाला
असो मिरुग गा दानी

©️✒ सुरेश महादेवराव
            देशमुख , नागपूर

Friday, June 5, 2020

झाड पेड गनगोत

🥦 झाड पेड गनगोत 🥦

आयी बड सावितरी
झाड कुडी की गुफन
नातो जलम जलम
बड देव को पूंजन

       सूत पिवरो गुंडारे
       साजे नाता को बंधन
       बाजे पायपट्टी पाय ऽ
       आंग ऽ मह्यके चंदन

झाड पेड गनगोत
रह्ये सिवार आंगन
फेरा माऱ्या सातडाव
हरख्यास देवांगन

        मुरी अगास मऽ धरे
        जीव धरितरी दान
        झाड पाखरू कऽ संगऽ 
        नाता गोताला आंदन

चाले जलम जलम
असी जनुक तिफन
नाद अनाहत गुंजे
भिर् भिरस गोफन

©️✒ सुरेश महादेवराव
           देशमुख , नागपूर