Monday, June 29, 2020

कोरोना - हमने क्या खोया क्या पाया

कोरोना -- हमने क्या खोया , क्या पाया
पृथ्वी पर शारीरिक बनावट या प्रकृति के हिसाब से मनुष्य ' अन्नशृंखला ' में कभी भी शीर्ष पर नही था. लेकिन अपनी जिज्ञासा , तंत्र - यंत्र निर्माण शक्ती और असीम कल्पनाशक्ती के बलबूते पर आज वह शीर्ष पर है. लेकिन आज भी पृथ्वी के विषाणू और जिवाणू संख्यात्मक दृष्टीसे अव्वल है. मानव और विषाणू समय के साथ उत्क्रांत भी हो रहे है और एक दुसरे से लड भी रहे है.
प्राचिन मानव सभ्यता से लेकर आज न तक जाने कितनी महामारी आयी विषाणूओंसे. हवा , पानी , खाना , संसर्ग , पशू पक्षी , किडे , वातावरण बदलाव ऐसे कितने वाहक / प्रसारक है इन विषाणूओंके. जब तंत्र और चिकित्सा ( स्वास्थ्य) क्षेत्र उन्नत नही था तब इन अनजाने - अदृश्य विषाणूओं से होने वाली महामारी को हम ने जोड दिया धार्मिक - आध्यात्मिक आस्थाओं से . वैसे भी हमारे सांप्रत आकलन से बाहर की बात को हम मानव सहजता से या निरुपाय से जोड देते दैवीय शक्ती से. और फिर उन में से निर्माण होता है कर्मकांड का !
आधुनिक युग मे विज्ञान का क्षितीज काफी विस्तारीत हुआ है ; लेकिन चुनौतीयां भी कम नही हुयी. बढते तंत्र , जनसंख्या और उन्नत संवाद माध्यमों के बावजूद महामारी के प्रसार का दायरा दिनोंदिन बढते जा रहा है , मॉं प्रकृति के आगे हमारा बौनापन साबित करते हुये. 
अभी पुरे विश्व को बंधक बनाने वाले ' कोरोना ' विषाणू का तहलका मचा हुआ है... ऐसा पहले कभी नही हुआ था.
अब इस कोरोना के चलते हमने क्या खोया :
१. रोजगार , व्यवसाय = हर मनुष्य उपजिविका के लिये कुछ ना कुछ रोजगार , व्यवसाय , नौकरी करता है. कोरोना के चलते घर से बाहर निकलने की मनाही... मानो दुनिया का पहिया रुक गया हो. किसानों की खेत से निकली फसल घर में ही रह गयी. मंडी बंद . औने पौने दाम में खरिदारी कर के मुनाफाखोरों की चांदी ! जिन के पास बचत थी उनकी वह राशी खत्म . और दो हाथ पर जिन का पेट है ऐसे मेहनतकश मजदूरों का स्तर भिखारी पर पहुंच गया. लॉकडाऊन के चलते छोटे बडे व्यवसाय ठप . प्रायव्हेट नौकरी करने वालों की नौकरीयां लुप्त. अर्थव्यवस्था रुकने से सरकार का राजस्व का स्रोत सुख गया. हर चिज का स्वांग रचाया जा सकता है ; पैसों का नही !
२. वैज्ञानिक दृष्टिकोन = कोई भी मनुष्य एक ही विचार और आस्था लेकर नही चलता. विचार और आस्था के सतरंगी धागों के ताने - बाने से बुनता / बनता है हमारा विचार विश्व ! लेकिन आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिक दृष्टिकोन सब से प्रभावशाली और सार्थक है. थाली - ताली बजाकर इस दृष्टिकोन से हम अनेक योजन पिछे गये. असहाय अवस्था में धुंधली हो जाती है यह दृष्टी. 
३. विश्वास = कोरोना के असहाय अवस्था में विश्वास की बली चढी. हर घर , गाव , जिला , राज्य , देश एक अदृश्य भय से किले मे तब्दिल हो गया. लाखो - करोडो मजदूर , व्यावसायिक , नौकरदार वर्ग अपनी जडों की ओर .... अपने गाव की ओर लौटने को मजबूर हो गये. भय , भूख , निद्रा , मैथुन यह हर जीवधारी की नैसर्गिक प्रवृत्तीयां. भय और भूख से पिडित लोग. निद्रा की कोशिश की तो रेलगाडीने चिथडे उडा दिये अंग अंग के . इतनी परेशानीयों के बावजूद कोई घर आत है तो खुद को बचाने की जीव की प्रवृत्ती इतनी हावी की एक गाव में एक पिता ने ही ले ली अपने ही बेटे की जान ! उफ्फ...‌ रिश्तों की.... विश्वास की आहुती पडी इस भय के अग्निकुंड मे.
अंतरिक्ष में सैर करनेवाले हम भूल गये समुंदर लांघने का पवनसुत का अदम्य विश्वास. टुटता - बिखरता गया आत्मविश्वास. घरैलू हिंसा के प्रकरण भी तेजी से बढे... रिश्तों का अहसास और विश्वास खोते गये हम.
४. समय = आधुनिक मराठी काव्य प्रणेता कवी केशवसुत की पंक्तियां कुछ इस तरह है , 
" प्राप्त काल हा विशाल भूधर
सुंदर लेणी तयात खोदा ..."
अंतरिक्ष की तुलना मे हमारे पास उपलब्ध समय बहुत ही अल्प है , लेकिन हमारी कर्मधर्मिता के कारण हम समय पर अपने निशाॅं छोडने मे कामयाब हो जाते है. यह फिर से प्राप्त न होने वाला अनमोल समय हमने खोया.
कोरोना के चलते हमने क्या पाया : 
१. रोजगार , व्यवसाय =  कोरोना जैसी जागतिक आपदा मे उत्तरजीविता के लिये नये क्षेत्र , नयी राहें खोजना .... आत्मनिर्भर बनना यह आवश्यक हो गया. और इस कार्य में मनुष्य को महारत हासिल है. उसकी जिजीविषा अकल्पित परिमाणों को अंजाम देते है. एक रास्ता बंद होने के बाद दस रास्ते खोजने और खोलने की प्रतिभा हमने पायी. मितव्ययता और बचत की ओर हम बढे. रचनात्मकता , कल्पकता और आंत्रप्रेन्योरता की राह पर हम गतिमान हुये.
२. वैज्ञानिक दृष्टिकोन = स्वच्छता की वैज्ञानिक दृष्टिकोन की ओर हम तिव्रता से अग्रेसर हुये. मौजुदा मुसिबत का उपाय प्रयोगशाला में दवाई / टिके के रुप में खोजना चालू हुआ. तंत्र , उपकरण की निर्मिती की ओर हम बढे. विज्ञान के रास्ते इस विषाणू से लडने के लिये हम तय्यार हुये.
३. विश्वास = पुरे भारत के इतिहास को पलटने वाले पानीपत के युद्ध में इ . स. १७१३ मे नजीब खान ने जख्मी वीर योद्धा दत्ताजी शिंदे को उनकी हत्या करने से पहले पुछा था , ' क्यूॅं पाटील लढोगे ?. '  
' क्यूॅं नही , बचेंगे तो और भी लढेंगे ,' दत्ताजी ने यह अजरामर जबाब दिया था .
ऐसा ही  प्रबल विश्वास पैदा हुआ इस कोरोना काल में हर मनुष्य में !
' डर के आगे जीत है !' यह स्लोगन बांध लिया माथे पर हर मनुष्य ने. 
' मदद और संवेदनशीलता ' का नया रिश्ता पनपा . हर एक ने यथामति , यथाशक्ती मदद की इस कोरोना के मुसिबत मे . भाषा , धर्म , देश की सीमायें लांघकर ' मानवधर्म ' के प्रति आस्था और गहराती गयी. आत्मविश्लेषण किया हर मानव ने. विश्वास की डोर और मजबूत हुयी..... आगे आने वाले संकटों से लढने के लिये !
४. समय = पुरे विश्व ने कोरोनाकाल मे बृहद सार्वजनिक अवकाश का आनंद लिया. तंत्रज्ञान की सहायता से चर्चायें , मार्गदर्शन , साहित्य प्रसारण की बाढ आयी. इस समय ने हमारे रिश्तों को नये सिरे से खोज कर रुबरु करवाया. समय की आपाधापी मे पिछे छुट गयी थी कुछ बातें जो इस समय मे पुरी की . छोटी छोटी खुशीयां सहेजने लगे हम.
५. प्रदुषण मुक्ती = कलकारखाने , उद्योग , वाहन बंद होने से प्रदुषण फैलानेवाला वायुउत्सर्जन बंद हुआ . रसायन , गंदगी की धारायें थमने से नदी नाले , जलस्रोत स्वच्छ पानी से बहने लगे. आवागमन बंद होने से जलचर , पशू पक्षीयों को विभाजित ... विचलित करनेवाले जल - थल - वायु मार्ग सुनसान हो गये. पहली बार उन्होंने मुक्त नैसर्गिक विचरण किया. धरा ने गहरी - गहरी सांसें ली ..... कई सालों बाद. खिल उठी आबोहवा.......
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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