Saturday, February 27, 2021

सोयरिक ( भोयरी कविता ) Bhoyar culture _ भोयर संस्कृतिBhoyari dialect _ भोयरी बोली

सोयरिक  ( भोयरी कविता ) 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भूई अगास की जुडी
चिरंतन सोयरिक 
सूर्व्य चंदर चान्नीना
भायी दिखाडे हरीक ।१।

बेल झाडजुड सारा
कोनी ठोकर बारीक
खेत उगाये फसल
असी फले सोयरिक ।२।

संबा पाराबती म्हरा
परन्यास मन चित
साथ जलम जलम
नही बेगरा कुचित ।३।

नवो धरम करम
डायी असी नवी रीत
गाठ बांधी सरग म
जिंदगी ला अमरीत ।४।

नारायन लक्षुमी को
ध्यान करो जी घडीक
खेंडो स्येलो गाडजोडो
बरकस तवरीक ।५।

सारा सोयरा धायरा
करे कप्पी सोयरिक 
दुय जीव ला मिराये
काढ्ये बिह्या की तारीख ।६।

देव देवांगन आघऽ 
डोकसा प अकसिद
मन दाठ्ठा की तुरसी
सावितरी की स जिद ।७।

दुय कुर दुय जोत
जोड गुना को गनित
न्हाय भागा वजाबाकी
येक दिव् नाल पुनित ।८।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

नदी माय

नदी माय
( भोयरी बोली ) 

नदी बाई माय म्हरी पहाड म घर
लेकरुना क माया पोटं आयी भूई पर ।१।

नदी बाई माय म्हरी निरो निरो पानी
हरु लह्यर म गाये ममता की बानी ।२।

नदी माय पानी देये सारा यी तिसा ला
कोनी रव्हो , कसो रव्हो नहाय भेदभाव वोला ।३।

खेती बाडी माय कन् असी गा बह्यरस
म्हरं थाटी म भाजी भाकर को घास ।४।

सरावन , आस्याढ म आवस गा पूर
आघं वाला क भला साठी जास दूर दूर ।५।

माय सांगे नी थांबनो , आघं आघं चालो
थांबे वोकी हार , यस चालता को भलो ।६।

_ कवी कुसुमाग्रज
भास्यांतर : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, February 20, 2021

अजब गजब - ४९ : बसंतगढ़ bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ४९ : बसंतगढ़
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

राजस्थान क सिरोही जिला म पिन्डवाडा उपखंड पासिन ८ कि.मी. पर सरोसती नदी काठ बसंतगढ़ स . आपलऽ जमाना मऽ बसंतगढ धारमिक अन् सांस्कृतिक ठिकानो होतो . तांबा पीतर की मूरतीना घडवन को बसंतगढ़ म मोठो कारोबार होतो . पुरानऽ जमाना मऽ घडायी यहान की मूरतीना आब बी कई देऊर म स . आब बी बसंतगढ़ म आन् वोकऽ आसपास कई कारागीर स . बसंतगढ़ पह्यले पासिन रुसी मुनी को ठिकानो होतो . यहान देऊरना की भरमार स . बसंतगढ़ क दरुजा पर परसिध्द गनपतीजी की मूरती होती . वा आब जवर च भटेस्वर महादेव मंदिर म स . 
बसंतगढ म रिसी वसिस्ठ जी को आसरम होतो , तेकन नाव पड्ये ' वसिस्ठपुर ' ! 
बसंतगढ म बड का घाडा झाडना , तेकन नाव पड्यो ' वटपुर ' , ' वटनगर ' !

इतिहास : * बसंतगढ की स्थापना रिसी वसिस्ठ जी न करी , असी मान्यता स . वूनी न अरक आन् भरग देऊर बांधे .
* राजस्थान को सबसिन पुरानो सिलालेख बसंतगढ म च सापडेस . ( वि.स. ६२८ )
* इ.स. ६८० पावतर यहान चावड वंस को राजो ' वरमालत ' को राज होतो . 
* इ.स. ७२१ म वरमालत राज्या क सामंत राजिल्ला को पोरग्यो ' नागभट्ट ' को यहान राज होतो .
* इ.स. १०३१ म महिपाल को पोरग्यो ' राजा धुंधक ' न राज करे .  राजा धुंधक की विधवा पोटी न यहान सूर्व्यमंदिर ला साजरो बांध्ये .
* येकऽ बाद बसंतगढ़ पर परमार राज आये . इ.स. १०४२ म धनुका को पोरग्यो राजा पुरनपाल न राज करे . राजा पुरनपाल की नानी बहिन लाहिनी को बिह्या विग्रहराज संगऽ भयोतो . वोकऽ लाडा क सर्गवास क बाद राजा पुरनमल न बसंतगढ ला राजधानी बनायीती . वहान तब की बहिन लाहिनी की बावडी आज बी मवजूद स . 
* इ.स. १४३३ पासिन १४६८ पावतर यहान गुहिल राजो ' राना कुम्भा ' को राज रह्ये . 

# परमार वंस न राज करे वोनऽ बसंतगढ़ ला सबन भुल गयास . आबऽ खंडारा क खलऽ आपलो इतिहास दबे स . ना वकी ढंग की राखन स , ना जतन ! 
# खंडारा म तबदिल इ वयभवस्याली इतिहास आघऽ आये पाह्यजेन . आमारो करम , आमारऽ धरम क हिसाबकन रह्या पाह्यजेन....
जय राजा भोज....🙏

( स्रोत : इंजि . जालमसिंग जी सोढा , जोधपुर )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, February 18, 2021

राजा भोज ( भोयरी अभंग )

राजा भोज
( भोयरी अभंग )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

तेजस मूरती । सूर्व्या की किरती ।
वोवारु आरती । राजा भोज ।१।

हात तलवार । सिंव्ह ललकार ।
मन सकवार । राजा भोज ।२।

ग्यान जोत बारी । तुमी बनवारी ।
न्याव का भारी । राजा भोज ।३।

कापे लर लर । दुसमान चोर ।
डोरा म अंगार । राजा भोज ।४।

जनता क साठी । सह्या काटीकुटी ।
तुमी जगजेठी । राजा भोज ।५।

माय सरोसती । देयी हातऽ पोथी ।
ग्यान की मूरती । राजा भोज ।६।

बसंत पंचमी । परगट्या तुमी ।
जोडू हात आमी । राजा भोज ।७।

यस सुख स्यांती । गुन हिरा मोती ।
नक्तिर सवाती । राजा भोज ।८।

राम किस्नऽ वानी । बिकरम मानी ।
सिपरा को पानी । राजा भोज ।९।

सूर्व्य चंदर । उसी मांडू धार ।
मालवा को सार । राजा भोज ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, February 11, 2021

भोयरी संस्कृति - ४० : मानिनी, सेंदऱ्या देव पूंजा bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति - ४० : मानिनी अन् सेंदऱ्या देव पूंजा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

ॐ पितृ दैवतायै नमः

भोयर समाज पितर पूजक स . भोयर संस्कृति म पितर का प्रतीक सेंदऱ्या देव अन् मानिनी स . सुभ काम , सन तिवार ला इन की पूंजा होस . आपलऽ कुर म जेता बी पितर भयास , वून की मानिनी घडावस . येक पेवली म सेंदऱ्या देव आन् दुसरऽ पेवली म मानिनी ला खारी म गुंडारकन धरस . पेवलीना बी खारी कन च बांधकन रव्हस . 
पाचपावली की पूंजा सोडकन बाकी की पूंजा चवरी जवर मांडस आन् वून की पूंजा रात कन करस . चवरी क आघऽ चऊक पुरकन वोपर खारी ( लाल सुती कपडो ) डावस . वोपर सवा सेर ( नी त पाच मुठ ) चऊर की रास मांडस . पानी कन धोयकन पह्यले सेंदऱ्या देव मांडस . वून क आघऽ मानिनी मांडस . वून क भवताल पाच सुवारी ( पाती ) , बडा पर कनिक का पाच दिवा बारस . बरी गवरी प रार डावस . रार नी होयेन त् तूप डावस . उदबत्ती लगावस . सेदऱ्या देवना ला सेंदूर लगावस आन् मानिनी ला हरद कुकू वाहस . लिंबू , बेल , फुल , अकसिद कन पूंजा करस . नारेल वाहस . बडा , भात , पापड , सुवारी को कुसकर कन निवद बनावस . कापुर बारस . नारेल फोडकन् वको गुर नी त् साकर संग परसाद धरस . देवना धोस वोनऽ पानी को तीरथ लेस आन् बाचे पानी बिंदराबन म डावस . 
साल भर म का कयी खास तिवार आन् परसंग असा स जेनऽ दिन भोयर सेंदऱ्या देवना की पूंजा करस .

१. आखाडी : आस्याढ मह्यना क पुनव ला आखाडी , अखाडी , गुरूपौर्णिमा कोस . आखाडी तिवार ला सेंदऱ्या देव की पूंजा करस .
२. गायगोंधन ( दिवारी ) : कारतिक अवस ला लक्षुमी पूंजा ( दिवारी ) रव्हस . दिवारी क दुसरऽ दिन ( पडवा ला ) गायगोंधन कोस . गायगोंधन ( बलीप्रतिपदा ) क तिवार ला सेंदऱ्या देव की पूंजा करस .
३. देवमाई : पुस मह्यना क अवस ला देवमाई तिवार रव्हस . देवमाई ला पूंजा कऱ्या कन पितरना क आत्मा ला स्यांती भेटस , असी मान्यता स . देवमाई क पूंजा कन पितर संग च बरमा देव , इंदर देव , सूर्व्य देव , अगनी देव , वायु देव , रिसी मुनी , पाखरू जनावर असा तमाम परसन्न होस . देवमाई तिवार ला सेंदऱ्या देव की पूंजा करस .
४. पाचपावली ( महासिवरातरी ) : महासीवरातरी ला उपास रव्हस . महासिवरातरी क दुसरऽ दिन ला पाचपावली कोस . येनऽ दिन दुफारकन् आंगना म दुय खाटना उभी करकन् वोपर गोनो / चादर डायकन् मांडो ( सावली ) करस . वोमऽ सेंदऱ्या देव की पूंजा करस . वोकऽ बाद महासिवरातरी का उपास सोडस . 
५ . सिमगो ( होरी ) : फालगुन ( फाग ) मह्यना क पुनव ला सिमगो ( होरी ) तिवार रव्हस . सिमगा ला सेंदऱ्या देव की पूंजा करस .
६ . घर म पोटु / पोटी क जलम क बाद सवा मह्यना म सेंदऱ्या देव की पूंजा करस . 
७ . देवादेवी : घर म बिह्या स्यादी होयेन त् मांडो पडन क पह्यलऽ दिन रात म सेंदऱ्या देव की पूंजा करस . या पूंजा रात भर उसीच राखस . दुसरऽ दिन ( मांडो पडन क दिन ) पूंजा म की पाच मानिनीना नवऽ पाड्डा म लेस . वून ला लेकन भीर पर पूंजा साठी जास . भीर जवर जागा सरावस . सरायी जागा प तुराटी क डेरी को नानोसो मांडो बनावस . मांडो ला सुत गुंडारस . वोनऽ मांडो म मानिनीना मांडस . पाच पाती , पाच बडा , पाच दिवा धरकन पूंजा करस . गुर स्येरनी को परसाद बाटस . पूंजा भया बाद मानिनीना धोयकन पाड्डा म धरस . मांडो , पूंजा को सामान भीर म सिरावस . पूजा वाली जागा ला अऊर सरावस . भीर परीन वापिस आवन क बेरा पाच घर म जास . घरवाली पाड्डा म की मानिनीना जेकऽ जवर स वका पायना धोस . अकसिद लगावस आन् पाड्डा म दकसिना डावस . भीर प पूंजा साठी जान वालऽ पाच झन क खांदा पर नवा कपडा रव्हस . पाच घर की पूंजा भया बाद आपलऽ घर आवस . मानिनी वापिस पूंजा म धरस . सेंदऱ्या देव की अनखिन पूंजापाती करस आन् बाद म पूंजा उचलस .
८ ‌. आपलऽ कुर को कोनी कुटुंब दुसरऽ गाव ला होयेन आन् वून क घर बिह्या होयेन त् वूई देवना लिजान साठी आवस . वून ला पाहुनचार करस . देव की पेवलीना खोलत नी . पेवली ला च धूप , निवद दिखाडकन पाव्हना जवर देस . रेंगी , खासर , मोटारगाडी म देव ( पेवलीना ) लिजान क बेरा आघऽ धरस . 

# भोयर संस्कृति म पूंजा की रास ( सवा सेर चऊर ) की पूंजा भया बाद खीर बनायकन वको परसाद लेन को रिवाज स . स्येरनी , तीरथ , खीर , परसाद सिरफ कुर का च लोगना ला चालस . 

( स्रोत : सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, February 7, 2021

आई बसंत पंचमी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

आई बसंत पंचमी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

आई बसंत पंचमी
येनऽ दिन की किरती
रची बरमा जी माया
तारा अगास धरती ।१।

आई बसंत पंचमी
जल्मी माय सरोसती
ल्यायी ग्यान भंडार ला
हात धरकन पोथी ।२।

आई बसंत पंचमी
राजा भोज की जयंती
दिन रात सिमरुस
करू पूजन आरती ।३। 

आई बसंत पंचमी
राम बनवास गती
खाया बोर स्यबरी का
माय वानी गा पिरती ।४।

आई बसंत पंचमी
बिस्नुदेव की किरती
माया पिरती को रथ
कामदेव गा सारथी ।५।

आई बसंत पंचमी
आम्बा बार की भरती
रितुराज बसंत म
फुल परसा की जोती ।६।

आई बसंत पंचमी
नस्या हवा म सूरती
रंगोरंगी की बहार
झाड बेल म नवती ।७।

आई बसंत पंचमी
सुगंध मह्यके माती
उंबी सोला क हुरा की
कठान म सिरीमंती ।८।

आई बसंत पंचमी
भयी पिवरी धरती
झुंड फिफोली का उडे
जीव नानो हिकमती ।९।

आई बसंत पंचमी
घाडी वकी स महती
मोठो तिवार भोयरी
सुख गंगा च बह्यती ।१०।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर





Friday, February 5, 2021

अजब गजब ४८ : गुरू जम्भेश्वर. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब ४८ : गुरू जम्भेश्वर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

ओउम गुरू चीन्हों गुरू चिन्ह पुरोहित , गुरू मुख धर्म बखाणी ।
जो गुरू होय वा सहज शीले शब्दे नादे वादे , तिहिं गुरू का अलिंकार पिछाणी ।
छव दशरण जिहिं कै रुपण थापण , संसार बरतण निज कर थरप्या , सो गुरू प्रत्यज्ञ जांणी ।
__ गुरू जम्भेश्वर

बिसनोई ( बिश्नोई ) पंथ का प्रवर्तक जम्भो जी को मुर नाव धनराजजी पवार होतो . गुरू जम्भेश्वर जी को जलम इ.स. १४५१ म जल्मास्टमी क दिन नागौर जिला क पीपासर गाव म पवार राजपूत परिवार म राजस्थान म भयो . जम्भेस्वर जी क दाआजी को नाव लोहट सिंग आन् माय को नाव हंसा कंवर ( केसर कंवर ) होतो . इन को गुरू गोरखनाथ जी होता . जम्भेस्वर जी न ३४ बरस की उमर म आपली सारी धनसंपद दान करी आन् महाग्यान क खोज म बिकानेर जवर क संभराथल येनऽ जागा प गया . जाम्भो जी न धरम सुधार का २९ नियम बनाया . तेकन बीस अन् नव नियम ला माननीवाला  ' बिसनोई ' भया . बिसनोई नाव  ' वैष्णवी ' स्यबद सिन निकऱ्यो , असी बी मान्यता स .
संत जम्भेस्वर जी ला हवा पानी , जीव जंतू  ( पर्यावरण ) का जानकार ( वैज्ञानिक ) मानत होता . 
१ . इतिहास : * पीपासर म इ.स. १५०१ पासीन इ.स. १५०६ पावतर मोठो अकाल पड्यो .गाव का लोग आपला ढोर डंगर लेकन ठाकुर लोहट सिंग क घर जमा भया . गाव सोडन को तय भयो . येता म च द्रोनापुर को येक राहगीर वासिन जाय रह्यतो . वोनऽ सांगे क द्रोनापुर म घाडी बरसाद भयीस , आपला ढोर डंगर लेकन वहान जावो . द्रोनापुर ला लोहट सिंग की ससुराल बी होती . पीपासर का सारा लोगना लोहट सिंग जी क संग द्रोनापुर आया . 
* येक दिन वहान मोठी धुंदगराड आयी आन् जोर को पानी आये . वोमऽ लोहट सिंग जी की गायना बारबन भयी . रात भर बरसाद भयी . झुंझुरका च लोहट सिंग जी गायना ला ढुंढन साठी निकऱ्या . जोधा जाट आपलऽ पोरग्या संग पेरनी ( बुवायी ) करन साठी जाय रह्याता . आघीन लोहट सिंग ला आता देखकन् वूई वापस घर कितऽ जान ला लाग्या . तब लोहट सिंग जी न पुस्यो क , 
, ' म्हाने देख पाछो कइयां जावे ? ' 
तब जोधा जाट न जवाब देयो क , 
' तुमी ठाकुर होय ; तेकन बुवाई क बेरा बिना पगडी को ठाकुर आघऽ आये त अपसुगुन होस . दुसरी बात तुमी गाव को जवाई , तेकन बुवाई क बेरा जवाई आघऽ आये त तब अपसुगुन होस . तिसरी बात तुमी बांझोटा स तेकन , बुवाई क बेरा बांझोटो आघऽ आये त वू बी अपसुगुन होस . ' 
जाट की बात आयककन लोहट सिंग ला गह्यरो दुख भयो . संतान सुख साठी वून न अन्न - पानी सोडकन् भगवान क भक्ती करन साठी वहान च बस गया . ६ मह्यना क घोर तपस्या क बाद बिस्नु भगवान परसन्न भया . भगवान न साधू क भेस म लोहट सिंग अन् हंसा कंवर ला दरस्यन देकन संतान को वरदान देये . इ.स.  १५०८ म जल्मास्टमी ला सोम्मार क दिन जम्भो जी को जलम भयो . जल्म्या बाद उमर क सात बरस तक वूई बोल्या नी , तेकन लोगना वून ला मुको , गुंगो अन गहला कव्हत होता . सात बरस क बाद जम्भेस्वर जी गायना चरावन ला लिजात होता . सोरा बरस क उमर म वून की भेट गुरू गोरखनाथ सिन भयी . वून न बिह्या बी नी कऱ्यो आन् अखंड ब्रम्हचारी रह्या . 
* वून न बिसनोई पंथ की स्थापना करी . वून न उपदेस म १२० अनमोल स्यबद ( रचना ) कह्याता . जीन ला आज बी घर , मंदिर म होम हवन करन क बेरा कोस . वून न देस विदेस म बिसनोई पंथ को उपदेस कऱ्यो . 
* बिसनोई खेजडी क झाड ला पवितर मानस .
* जम्भेस्वर जी को १५९३ म सर्गवास भयो .

( स्रोत : इंजि . जालमसिंग सोढा जी , जोधपूर ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


Thursday, February 4, 2021

झलके भोयरी पानी ( भोयरी अभंग ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

झलके भोयरी पानी 
( भोयरी अभंग )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भुले माय बाप बोली ।
करम की खाली ढोली ।।

बोली अमरीत धार ।
दुय धारी तलवार ।।

दुध पाजे मायबोली ।
ग्यान भंडार ला खोली ।।

सेव भोयरी को बाई ।
खानदानी नवलाई ।।

नाना गह्यना को वान । 
करी सरोसती दान ।।

केती लेयी बोली साज ।
निभे वोकन च काज ।।

सूर्व्य चंदर क वानी ।
बोली भोयराऊ बानी ।।

झलके भोयरी पानी ।
मह्यके चंदन वानी ।।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Monday, February 1, 2021

भोयराऊ बोली. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयराऊ बोली 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सिन्धु नरबदा तापी
काठऽ सिपरा क खेली
माय वरधा की माया
गोड भोयराऊ बोली ।१।

दस हजार बरस
उमर की मायबोली
पुरखाना को आसिस
म्हरी भोयराऊ बोली ।२।

लढाई म ज्या गरजी 
खेत खल्यान म डोली
घाट घाट पेये पानी 
असी भोयराऊ बोली ।३।

राज वयभव भोगे
दूर दूर फली फुली
हिंदी मालवी की बोली
म्हरी भोयराऊ बोली ।४।

हिंदी मालवी निमाडी
बुनदेलखंडी बोली
गुजराती राजस्थानी
मराठी न भरी झोली ।५।

इंग्रजी मराठी न्
हिंदी की मुंडा म गोली
काहे करे रे पोतिरो
पुसे भोयराऊ बोली ।६।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर