अजब गजब ४८ : गुरू जम्भेश्वर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
ओउम गुरू चीन्हों गुरू चिन्ह पुरोहित , गुरू मुख धर्म बखाणी ।
जो गुरू होय वा सहज शीले शब्दे नादे वादे , तिहिं गुरू का अलिंकार पिछाणी ।
छव दशरण जिहिं कै रुपण थापण , संसार बरतण निज कर थरप्या , सो गुरू प्रत्यज्ञ जांणी ।
__ गुरू जम्भेश्वर
बिसनोई ( बिश्नोई ) पंथ का प्रवर्तक जम्भो जी को मुर नाव धनराजजी पवार होतो . गुरू जम्भेश्वर जी को जलम इ.स. १४५१ म जल्मास्टमी क दिन नागौर जिला क पीपासर गाव म पवार राजपूत परिवार म राजस्थान म भयो . जम्भेस्वर जी क दाआजी को नाव लोहट सिंग आन् माय को नाव हंसा कंवर ( केसर कंवर ) होतो . इन को गुरू गोरखनाथ जी होता . जम्भेस्वर जी न ३४ बरस की उमर म आपली सारी धनसंपद दान करी आन् महाग्यान क खोज म बिकानेर जवर क संभराथल येनऽ जागा प गया . जाम्भो जी न धरम सुधार का २९ नियम बनाया . तेकन बीस अन् नव नियम ला माननीवाला ' बिसनोई ' भया . बिसनोई नाव ' वैष्णवी ' स्यबद सिन निकऱ्यो , असी बी मान्यता स .
संत जम्भेस्वर जी ला हवा पानी , जीव जंतू ( पर्यावरण ) का जानकार ( वैज्ञानिक ) मानत होता .
१ . इतिहास : * पीपासर म इ.स. १५०१ पासीन इ.स. १५०६ पावतर मोठो अकाल पड्यो .गाव का लोग आपला ढोर डंगर लेकन ठाकुर लोहट सिंग क घर जमा भया . गाव सोडन को तय भयो . येता म च द्रोनापुर को येक राहगीर वासिन जाय रह्यतो . वोनऽ सांगे क द्रोनापुर म घाडी बरसाद भयीस , आपला ढोर डंगर लेकन वहान जावो . द्रोनापुर ला लोहट सिंग की ससुराल बी होती . पीपासर का सारा लोगना लोहट सिंग जी क संग द्रोनापुर आया .
* येक दिन वहान मोठी धुंदगराड आयी आन् जोर को पानी आये . वोमऽ लोहट सिंग जी की गायना बारबन भयी . रात भर बरसाद भयी . झुंझुरका च लोहट सिंग जी गायना ला ढुंढन साठी निकऱ्या . जोधा जाट आपलऽ पोरग्या संग पेरनी ( बुवायी ) करन साठी जाय रह्याता . आघीन लोहट सिंग ला आता देखकन् वूई वापस घर कितऽ जान ला लाग्या . तब लोहट सिंग जी न पुस्यो क ,
, ' म्हाने देख पाछो कइयां जावे ? '
तब जोधा जाट न जवाब देयो क ,
' तुमी ठाकुर होय ; तेकन बुवाई क बेरा बिना पगडी को ठाकुर आघऽ आये त अपसुगुन होस . दुसरी बात तुमी गाव को जवाई , तेकन बुवाई क बेरा जवाई आघऽ आये त तब अपसुगुन होस . तिसरी बात तुमी बांझोटा स तेकन , बुवाई क बेरा बांझोटो आघऽ आये त वू बी अपसुगुन होस . '
जाट की बात आयककन लोहट सिंग ला गह्यरो दुख भयो . संतान सुख साठी वून न अन्न - पानी सोडकन् भगवान क भक्ती करन साठी वहान च बस गया . ६ मह्यना क घोर तपस्या क बाद बिस्नु भगवान परसन्न भया . भगवान न साधू क भेस म लोहट सिंग अन् हंसा कंवर ला दरस्यन देकन संतान को वरदान देये . इ.स. १५०८ म जल्मास्टमी ला सोम्मार क दिन जम्भो जी को जलम भयो . जल्म्या बाद उमर क सात बरस तक वूई बोल्या नी , तेकन लोगना वून ला मुको , गुंगो अन गहला कव्हत होता . सात बरस क बाद जम्भेस्वर जी गायना चरावन ला लिजात होता . सोरा बरस क उमर म वून की भेट गुरू गोरखनाथ सिन भयी . वून न बिह्या बी नी कऱ्यो आन् अखंड ब्रम्हचारी रह्या .
* वून न बिसनोई पंथ की स्थापना करी . वून न उपदेस म १२० अनमोल स्यबद ( रचना ) कह्याता . जीन ला आज बी घर , मंदिर म होम हवन करन क बेरा कोस . वून न देस विदेस म बिसनोई पंथ को उपदेस कऱ्यो .
* बिसनोई खेजडी क झाड ला पवितर मानस .
* जम्भेस्वर जी को १५९३ म सर्गवास भयो .
( स्रोत : इंजि . जालमसिंग सोढा जी , जोधपूर )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
खूब साजरो लिख्यो है भाउ जी
ReplyDeleteधन्यवाद जी
Deleteखुप छान माहीती आपण पुरवत आहात 👌👌
ReplyDeleteधन्यवाद सर
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