Sunday, July 26, 2020

भोयरी संस्कृति- १७, भाग- ४: नरकचतुरदसी

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग - ४ : नरक चतुरदसी

ॐ नमो भगवते नन्दपुत्राय
आनन्दवपुषे
गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ।।
नरकचतुरदसी क दिन भगवान सिरीकिस्न देव न नरकासुर को वध करे . नरकासुर न मनि परबत पर १६,१०० पोटीना ला बंदी बनायकन् राखेतो . प्राग्जोतिसपूर वोकी राजधानी होती . बंदी पोटीना ला वून क घरवालाय न घर म ले नही , तेकन भगवान न वून सबन सिन ब्याह कऱ्यो आन् समाज म वून की इज्जत राखी . 
दिवारी मऽ अभ्यंग नहान को मोठो महत्त्व सऽ . झुंझुरकाच आंग ला तेल , उटनो लगायकन् आंग धोवस . सूर्व्यदेव निकरन क् पह्यले आंग धोयो त् यमदेव की आपलऽ पर नजर नही पडत , असी मान्यता सऽ . आंग धोया पर आंगधूनी म च , आरती म पाच कनिक का दिवा आन् अकसिद धरकन् माय - भाऊज नही त् बहिन वोवारस . 
गोबर क गोंधन पर तिसरो गोंधन मांडस . आंगना म चऊक पुरस . फटाका फोडस . दिवनाल म खान क तेल कन् दिवा लगावस .
नरक चतुरदसी ला काली चवदस , रूप चवदस , छोटी दिवारी , नरक निवारन चतुरदसी बी कोस . 

लेखक: सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, July 25, 2020

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग ३ : दिवारी ( धनतेरस)

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग - ३ : दिवारी

धनतेरस
ॐ भूरिदा भूरि देहिनो , मा दभ्रं भूर्या भर ।
भूरिरेदिन्द्र दित्ससि ।
ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन् ।
आ नो भजस्व राधसि ।।   ( ऋग्वेद )

' समुद्र मंथन ' क बेरा , तेरस ला भगवान धन्नात्री ( धन्वंतरि ) अमरित कलस लेकन परगट भया . तेकन येन तेरस ला धनतेरस ( धनत्रयोदशी ) कव्हस . 
भगवान धन्नात्री कलस लेकन परगट भयाता तेकन धनतेरस ला बरतन - भांडा खरीदन की परम्परा सऽ . येन दिन धन ( वस्तू ) खरीद्याकन् वोम तेरा गुना बाहाड ( वृध्दी ) होस , असी मान्यता सऽ . धनतेरस ला चांदी , चांदी का बरतन खरीदन को बी रिवाज सऽ . चांदी चंदर को प्रतिक , जी ठंढक आन् मन म संतोस को धन दान करस . 
भगवान धन्नात्री दवाई - पानी , तब्येत की देवता . चांगली तब्येत की कामना आन् संतोस साठी वून की पूंजा करस . 
धनतेरस क दिनच लक्षुमी पूंजा , मूरती ला बजार मिन घर ल्यावस . 
धनतेरस ला पह्यलऽ दिन क गोंधन पर अजून गोंधन मांडस . आंगना म चऊक पुरस आन् आंगना क दकसिन कोनटा म , यमदेव ला अरपन करन साठी दीपमाला लगावस .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, July 24, 2020

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग - २ : दिवारी : वसुबारस

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग - २ : दिवारी

वसुबारस

क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते ।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नमः ।।

दिवारी क पह्यले धुयारो लेयकन् घर - दार , कोठा की लिपाई - पुताई होस . सारऽ घर की चक चक साफसफाई होय जास .
इतिहास : देव - दानव न ' समुद्र मंथन ' कऱ्यो . समुंदर मिसिन पाच कामधेनू निकरीती . वोनऽ पाच कामधेनू मिसिन ' नंदा ' नाव क कामधेनू को इ वसुबारस को व्रत आन् पूंजा बारस ला करस .

भोयरी रिवाज :  भोयरी संस्कृति मऽ वसुबारस पासिन दिवारी चालू होस .घर पर उच्ची अगास दिवो / कंदिल लगावस . सिरिज बलब की झगमग लायटिंग करस . आंगना म सडो सारवन चऊक पुरस . गोबर का गोंधन मांडस . येला पांडव बी कोस . वसुबारस पासिन चऊक पूरनो आन् गोंधन पर , दाठ्ठा म , आंगना म दिवनाल का दिवा लगावनो चालू होस . बासरु वाली गाय आन् बासरु की पूंजा करस . खेती बाडी क चांगलऽ फसल साठी , पोटुबाटुना क चांगलऽ तब्येत पानी साठी आन् वून क सुख - उन्नती साठी वसुबारस की पूंजा करस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग १ : दिवारी

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग - १ : दिवारी

तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
भोयरी संस्कृति मऽ आसिन अवस ( महाराष्ट्र ) आन् कारतिक अवस ( मध्यप्रदेश , उत्तर भारत ) ला दिवारी की लक्षुमी पूंजा करस . बारस पासिन दूज पावतर साहा दिन अखन्ड दिवारी को तिवार / पर्व रव्हस . कठान कऽ घात मऽ आवन वाली दिवारी , सारो तिवार को राजो सोभेन असो !
दिवारी दिवा को , रोसनी को , तेज को , गाय बासरु कऽ पूंजा को , धन पूंजा को , साफसफाई को , लक्षुमी पूंजा को , गोवरधन पूंजा को , बलि राजा कऽ पूंजा को , भाई बहिन कऽ माया को , बिकरम संवत् चालू होन को , नाना पकवान आन् नाना रितीरिवाज को , फटाका फोडन को मोठ्ठो तिवार.... सुख - उन्नती को मंगल महा पर्व ! अन्धारा मिन उजारा कितऽ लेन जानी वालो दिवारी तिवार....!  
दीपावली को मतलब दिवा की वर .( रांग , कतार ) .
दिवारी ला उडिया मऽ दीपावली , बंगाली मऽ दीपाबॉली , महाराष्ट्र - कोकन - गोवा मऽ दिवाळी , पंजाबी - सिंधी मऽ दियारी , मारवाडी मऽ दियाळी , हिंदी मऽ दीपावली - दिवाली कोस .

१ . इतिहास आन् मान्यता : 
* पद्मपुरान आन् स्कंद पुरान मऽ दिवारी को उल्लेख भेटस . स्कंद पुरान मऽ दिवा ला सूर्व्यदेव को प्रतिक मानेस . जीव ला उजारो आन् उरजा देनी वालो दातो सूर्व्यदेव ! 
* उपनिस्यद मऽ यमराज आन् नचिकेत की कथा दिवारी संग जुडी सऽ . 
* सातवी सदी मऽ ' राजा हर्ष ' नऽ दिवारी ला ' दीपप्रतिपादुत्सव ' कह्येस . वोन बखत दिवारी कऽ दिन नवऽ  लाडा - लाडी ला भेटवस्तू , उपहार देन को रिवाज होतो . 
* नव्वऽ सदी मऽ दिवारी ला ' दीपमालिका ' कव्हत होता . घर की लिपाई - पुताई करकन् रात मऽ दिवा लगावत होता .
*  ११ वी सदी मऽ फारसी यातरी अल् - बेरुनी नऽ आपलऽ पुस्तक मऽ दिवारी तिवार को जिकर करेस .
* त्रेता जुग मऽ भगवान सिरी राम लंका परिन रावन ला हरायकन् अजुध्या वापिस आया दिवारी कऽ दिन .... वून कऽ स्वागत आन् खुसी मऽ तूप कऽ दिवा की रांग कन् आकासगंगा सरखी झलारी अजुध्या , वा अवस की रात ! 
* दिवारी क दिन दुरगा माय नऽ दयीतना ला मारन साठी धरेतो महाकाली को रूप .
* दिवारी क दिन पांडव आपलो बनवास पुरो करकन् घर आयाता .
* दिवारी क दिन लक्षुमी माय समुंदर मिन परगट भयी आन् दिवारी कऽ दिन च वून को भगवान बिस्नूदेव संग ब्याह भयो , असी मान्यता सऽ .
* दिवारी मऽ भगवान सिरी किसन देव नऽ इंदरदेव की पूंजा बंद करकन् गोवरधन पूंजा चालू करी .
* जमुना को भाई यमराज जी ला , जमुना कऽ घर जान साठी बखत नही भेटतो . येक डाव दूज कऽ दिन यमराज गया , तब जमुना नऽ बचन लियो क् हर साल आज कऽ दिन आवनो पडेन . 
* राजा बलि को राज सत् को होतो . असऽ राज कऽ रखवाली साठी भगवान बिस्नूदेव ' द्वारपाल ' बन्या , आन् राजा बलि कऽ धरम निस्ठा की याद राखन साठी तीन ' दिन - रात ' दीपपर्व मनायो . इ पर्व ' दीपमालिका ' कऽ नाव कन् प्रसिद्ध भयो .
* राजा बलि की दुसरी बी मान्यता सऽ . भगवान बिस्नूदेव नऽ तीन पग मऽ तीनो लोक को नाप लियो . राजा बलि की दानसिलता देखकन् वून ला पाताल लोक को राज देये , आन् वरदान दे कऽ भूलोक पर दिवारी मऽ वून की पूंजा होयेन .
* भगवान सिरीकिस्न नऽ दिवारी कऽ पह्यलऽ दिन  , चतुरदसी ला नरकासुर को वध करे . गोकुळ कऽ लोगना नऽ दिवा ना बारकन् खुसी मनायी . 
* सिंधू संस्कृती क अवसेस म , मायदेवी की दुय बाजू ला दिवा की मूरती सापडीस . इ भी दिवारी को परमान सऽ .
* समराट ' विक्रमादित्य ' को राजतिलक दिवारी कऽ दिन भयेतो . तेकन दिवारी पासिन च बिकरम संवत् चालू होस . लोगना न दिवा लगायकन् खुसी मनायीती .
* ' कौटिल्य अर्थशास्त्र ' क अनुसार दिवारी ला मंदिर आन् नदी घाट पर दिवा लगावन की परथा होती .
* अवरंगजेब नऽ इ. स. १६६५ मऽ दिवारी ला दिवा लावन की आन् फटाका फोडन की परथा पर रोक लगायती .
*  ' व्रतप्रकाश  ' नाव क पोथी म दिवारी को नाव ' सुख सुप्तिका ' सऽ .

२ . दिवारी : देस विदेस मऽ :
* दिवारी भारत , सिरी लंका , पाकिस्तान , बरमा ( म्यान्मार ) , नेपाल , थायल्यांड , मलेसिया , सिंगापूर , इंडोनेसिया , आस्ट्रेलिया , न्यूझील्यांड , फिजी , मारीस्यस , केनिया , तंजानिया , दकसिन आफरिका , गुयाना , सूरीनाम , तिरीनिनाद आन् टोब्यागो , नेदरल्यांड , कनाडा , ब्रिटन , अमेरिका मऽ मनावस .
* चिन म दिवारी वून क रिवाज कन् मनावस . दिवारी क मह्यना मऽ साफसफाई करस .दरुजा पर चिनी भास्या म ' सुभ - लाभ ' लिखस . आन् पीतर ( पूर्वज ) की याद म दिवा लगावस .
* थायल्यांड मऽ दिवारी ला ' क्रायोग ' कव्हस . केरा क पान पर दिवो धरकन् वोला नदी नही त् समुंदर म बहावस .
* नेपाल म दिवारी ला " तिवार " कोस . मारिस्यस आन् नेपाल मऽ आपल सरखीच दिवारी मनावस , पर यहान नवी लाडी दिवा लगावस .
* जपान मऽ दिवारी ला घर झाडत ( बुहारत ) नही . तीन दिन घर ला धोवस . झाडू लगाया कन् धन की देवी नाराज होस , असी जपान मऽ मान्यता सऽ .
* बरमा म कलात्मक चिज - सामान ला खरीद कन् ल्यावस आन् दिवरा पर धरस . वोपर दिवो लगावस . 
* मलेसिया मुसलमान देस होयकन् बी दिवा लगायकन् दिवारी मनावस . आन् येक दुसरा की गराभेट लेयकन् बधाई देस .
* जरमनी म दिवारी ( लक्षुमी पूंजा ) क दुसरऽ दिन सूर्व्यदेव की पूंजा करन को रिवाज सऽ .
* डेन्मार्क म दिवारी कऽ दिन गायना की पूंजा करस , आन् कोठा म दिवा लगावस . ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, July 21, 2020

विजयपथ - १ : आरंभ बिंदू

विजयपथ - १ : आरंभ बिंदू

परिक्षा के परिणाम घोषित होने पर आनंद - खुशी और विषाद के हिंडोले पर झुलता हुआ आपका मन - मस्तिष्क .अनगिनत प्रश्नचिन्हों से मची होगी हलचल , आया होगा तुफान दिमाग में ! सलाह - मशवरों की बाढ.... अपेक्षाओं का बोझ और असंमजस के बादलों से घिरा हुआ आपका इंद्रधनुषी सपना....
सपने सुहाने लडकपन के........
मेरे नैना में डोले बहार बन के..
और घर में ___
पापा कहते है , बडा नाम करेगा
बेटा हमारा ऐसा काम करेगा...
हम समाज में रहते है . हमारे जन्म से सिखते है हम बोलना , चलना , चिजों को देखना , तथ्य परखना , सपने बुनना ! हमारी बोल चाल , रंग ढंग , सोच विचार बनने में बुनियादी प्रभाव रहता है ...... परिवार , परिवेश और समाज का . हमारे सोचने के संदर्भ , परिमाण हमें प्रदान करता है परिवार और परिवेश . हमारे बनने - बिगडने मे इन की मुख्य भूमिका रहती है . 
समाज के सुचारु संचालन और उन्नती के लिये बनी है व्यवस्थाए . शिक्षाकेंद्र उसी में से एक व्यवस्था . हमारा भविष्य का मार्ग यही से गढता है ; बनता है . मनुष्य के दिमाग का 80 प्रतिशत विकास स्कूल जाने के पहले ही हो चुका होता है . फिर प्रश्न उठता है की ,  हम स्कूल , कॉलेज जाते ही क्यो ? उस का उत्तर है -- उस प्राप्त ज्ञान को संदर्भ , विश्लेषण ,तर्क , परख , तंत्र , अभ्यास से परिष्कृत करने के लिये .
सांप्रत शिक्षा व्यवस्था की परीक्षा में जादातर परीक्षा होती है स्मरणशक्ती की . फिर अंक या श्रेणी द्वारा उसे दर्शाया जाता है . एक ही स्कूल में , एक ही पाठ्यक्रम पढने वाले छात्रों को मिलती है अलग अलग श्रेणी , मिलते है अलग अलग अंक . ऐसा क्यो होता होगा ? प्रकृति ने सब को एकसमान दिमाग दिया है , फिर परिणाम भिन्न - भिन्न क्यो ? इस के कई कारण है..... परिवार , परिवेश , रुची , समय प्रबंधन ( time management ) , आर्थिक - सामाजिक परिस्थिती , स्वास्थ्य , एकाग्रता , अवसर आदि.. और सब से महत्त्वपूर्ण है , ना सपने देखना और ना लक्ष्य तय करना. इस विराट सृष्टी मे हमारा जन्म होना निरुद्देश नही ; बिना वजह नही . इसका निश्चित उद्देश है . बिनावजह मनुष्य जीवन निरर्थक है .
बिना गंतव्य मार्गक्रमण मतलब अथाह समुंदर मे बिना पतवार , बिना दिशादर्शक के नाव से घुमना . .... क्या हासिल होगा ? जब कुछ हासिल ही नही करना है !.........
सब से पहले सपने देखो ... और गंतव्य निश्चित करो . उस गंतव्य प्राप्ति के लिये सार्थक योजना बनाओ .  जब गंतव्य ( goal ) निश्चित कर लिया है तो उस के लिये बनायी गयी योजना ( plan ) पर पुरी शिद्दत से , ईमानदारी से , मेहनत से कार्य करो . इस से सभी मुश्किलों के हल भी अपने आप सामने आयेंगे . 
आज तक यशप्राप्ती का रामबाण शॉर्ट कट या सफलता की रेडिमेड कुंजी नही खोजी गयी है . लेकिन अपने गंतव्य पर पहुंचने वाले व्यक्ति देखे है सभी ने .
बडे सपने साकार करने के लिये छोटी छोटी खुशीयों की कुर्बानी दो . याद रखो ,  ' No gain without pain ' .कितनी भी मुश्किलें आये राह में , उन का डटकर मुकाबला करो....
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नही होती...

आपके मन में उभरते सवाल :
* लोग क्या कहेंगे ? ----- कम अंक मिले तो लोग क्या कहेंगे ?...
' कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम है कहना......'
आपको प्राप्त अंक , आपके व्यक्तित्व का मूल्यांकन नही है . अपेक्षित अंक प्राप्त होना , आप के गंतव्य तक जाने का रास्ता सुलभ जरुर कर सकते , लेकिन वह अंतिम पर्याय नही है . हमारे दिमाग की क्षमता इतनी अकल्पनीय है की उसे गंतव्य ( goal ) दिया तो वह किसी भी चक्रव्यूह से रास्ता खोज ही लेता  है  . केवल अपने ध्येय , योजना ,  मार्गक्रमण और खुद  से इमानदार रहना जरुरी है . आत्मविश्वास जरुरी है . अपने आप को पहचान गये तो , किसी के कहने से क्या होता है ! नजर अंदाज करीये और दृढता के साथ , संकल्प के साथ मार्गक्रमण करते रहीये . 
* अब क्या होगा , कैसे होगा ? ----+ विश्वास रखीये , ध्येयप्राप्ति निश्चित होगी .क्यों की आपने ईमानदारी से , संकल्प के साथ मेहनत की है . रुकावटे आ सकती है ; हार नही ! 
रुक जाना नही कही तू हार के...
काॅंटो पे चल के मिलेंगे साए बहार के..
सकारात्मक रहे... आपत्ति में इष्टापत्ती खोजीए . सुअवसर परखीये , उस का फायदा उठाइये और ध्येयप्राप्ती के लिये चलते रहीये.

* असफल हुये .. अब क्या ?---  इतना सब कुछ करने के बाद भी निर्धारित गंतव्य तक नही पहुंच पाये तो क्या हुआ ? .... गंतव्य के अगल- बगल कही न कही तो पहुंचे . इसे असफलता नही कहते ..... नये क्षितीज खोजना कहते है ! कोलंबस हिंदूस्थान खोजने निकल पडा अनजाने पश्चिम के नये रास्ते..... नये तर्क के साथ... पहुंचा कॅरेबियन टापूओं पर ..... वेस्ट इंडिज और दक्षिण अमेरिका के तट पर ! क्या कोलंबस असफल हुआ ? बिलकुल नही... निर्धारित लक्ष्य की ओर मेहनत , लगन से मार्गक्रमण करने वाला कभी असफल नही होता . ..... खोजता है वह नई दुनिया !.... स्थापित करता है वह सफलता के मापदंड.... नये क्षितीज पर ! जो रुकता है वह असफल होता है .... मार्गक्रमण करने वाला नही !
* मुझे उस से कम अंक क्यो ? ----- आप तुलना क्यो करते हो ..... पुरे संसार में आप एकमेवाद्वितीय ( unique ) हो . आप मे वो खुबीयां  है , वह क्षमता है ,  जो दुसरों में नहीं . और हर एक की स्वतंत्र क्षमता होती है , विशेषता होती है . जो अपनी क्षमता की सीमायें लांघते है , उन्हे हम पूजनिय मानते है . अपनी क्षमता को भलीभाॅंती जानकर अपनी विशिष्टता में निपुणता लाओ. अंक आपके विशाल व्यक्तिमत्व का बहूत छोटा सा पहलू उजागर करते है . जीवन की सफलता आपके संपूर्ण विकसित व्यक्तिमत्व पर निर्भर है , अंको पर नही ......

विजयपथ = सपना ---> संकल्प ----> ध्येय निर्धारण ----> योजना ---> पूर्ण क्षमता से मार्गक्रमण ---> बाधा , अनपेक्षित मार्ग बदलाव ----> नयी संभावनाए , अवसर का लाभ , सकारात्मकता ---> ध्येय (goal) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर . 7066911969

Sunday, July 19, 2020

भोयरी संस्कृति - १६ : आठवी ( करवाथय )

भोयरी संस्कृति - १६ : आठवी ( करवाथय )

भोयरी संस्कृति मऽ आठवी को तिवार विसेस सऽ . आठवी पासिन चवथऽ दिन दिवारी की सुरवात होस वसुबारस कन् . माडी पासिन आठवऽ दिन आवस आठवी . भोयरी संस्कृति मऽ सूर्व्यपूंजा आन् चंदरपूंजा को खास महत्त्व आन् पूंजा की पुरानी परम्परा सऽ . आठवी तिवार कऽ बखत घाडी ठंढी रव्हस . गहू , सोलो , बटानो , जवस , उनारी भुईमूंग असी कठान बोवन की धांधल रव्हस ; कोनी कोनी की बोयकन् होय जास . 
आमारी फसल आवस सूर्व्यदेव की किरपा कन् . आमारी फसल , आमारी लक्षुमी ! अगास मऽ सूर्व्य आन् चंदर कोच आकार मोठो दिसस.. आमारऽ जीवन पर वून कोच असर दिसस ... दिन - रात सूर्व्य चंदर कनच होस ... वून कच हिसाबकन् कास्तकारी को फेर चलस . 
आसिन मह्यना कऽ अंधारी अस्टमी ( महाराष्ट्र ) आन् कारतिक मह्यना कऽ अंधारी अस्टमी ( मध्यप्रदेश , उत्तर भारत ) ला येकच दिन आठवी को तिवार आवस . ( महाराष्ट्र मऽ मह्यनो अवस पासिन चालू होस . मध्यप्रदेश , उत्तर भारत मऽ मह्यनो पुनव पासिन चालू होस .) मध्यप्रदेश मऽ आठवी ला च करवाथय कोस .
१. मान्यता आन् पुरानी परम्परा :  * सिरी वेद व्यास जी नऽ गांधारी आन् कुंती ला ' गजलक्षुमी ' व्रत करन ला सांगे . येनऽ व्रत की पूंजा आसिन कऽ अंधारी अस्टमी ला करस . गांधारी कऽ सव पोटुना नऽ पूंजा साठी मोठ्ठो माती को हत्ती बनायो . गांधारी नऽ सबन बाईलोगना ला पूंजा साठी बलायो . कुंती क्यान कोनीच नही आया . जब पांडव घर मऽ आया त् माय कुंती ला उदास देखकन् पुस्या क् का भयो ? काहे उदास सऽ माय ? पूंजा की तयारी बी नही करीस ? ... तब कुंती नऽ सांगे , वून की पूंजा , हत्ती सारो मोठो .. तेकन सबन बाईलोगना गांधारी कऽ महाल मऽ गयीस . तब अरजून नऽ कह्ये , '  मोठी माय नऽ माती कऽ हत्ती पर लक्षुमी की पूंजा मांडीस , मु तोला पूंजा साठी सरग मिन अयरावत ला लायकन् देऊस . पूंजा की तयारी करो...'
अरजून नऽ बान मारकन् अयरावत ला आवतन धाडे . कुंती नऽ अयरावत ला आंगना मऽ उभो करन कऽ जागा पर चऊक पुरे . वोपर रेसम को कपडो हाथरे . सरग मिन अयरावत उतऱ्यो . सारा लोगना , पोटुबाटु वहान जमा भया . गांधारी कऽ पूंजा मऽ गयी वूई सबन बाईलोगना कुंती कऽ घर आयी . पाय धरन ला जागा नही होती .... पुरो घर ठसाठस भर गयो . बामन नऽ महालक्षुमी की मूरती अयरावत पर धरकन पूंजा मांडी . सबन नऽ पूंजा करी . अयरावत ला पाची पकवान को भोग लगायकन् जमुना को पानी पाजे . रात भर भजन - किरतन चाल्यो . दुसरऽ दिन सकारी महालक्षुमी ( गजलक्षुमी ) की मूरती ला सिराये आन् अयरावत ला बिदा करे .
आठवी कऽ फड पर गजलक्षुमी कोच चितरंग रव्हस . वोमऽ को येक माती को हत्ती गांधारी को आन् अयरावत हत्ती कुंती को !

२ . विसेसता :  * गजलक्षुमी की पूंजा मालवा , बुंदेलखंड परिन भोयर समाज नऽ संग लायीस आन् वोला सूर्व्य - चंदर पूंजा सिन जोडकन् घाडोच साजरो रूप देयेस . भोयरी संस्कृति मऽ सनतिवार , रितीरिवाज की असी इतिहास की परम्परा सऽ . 
* आंग पर मस ना आवत होयेन त् पूंजा कऽ गाडगा / करा मऽ मिरा डावस आन् उपास करस .आंग पर स्येरनी ( पांढरा डाग / चट्टा ) भयी होयेन त् पूंजा कऽ गाडगा / करा मऽ सेरनी ( फल ) डावस आन् उपास करस . येनऽ पूंजा कन् मस्सा आन् स्येरनी जास असी मान्यता सऽ .
* करनाटक मऽ येळ अवस ( वेळ अमावास्या ) को तिवार थोडोबूत असोच सऽ पन् वा पूंजा खेत मऽ होस . 
* पूंजा मऽ जी पाच खडाना धरस आन् पूंजा करस वूई पाच पांडव का प्रतिक सऽ .
* महालक्षुमी ला आंबिल कऽ निवद को नेम सऽ , तेकन आठवी ला आंबिल करस .
* गाडगा / करा यी स्यक्ति , धरती आन् गरभ का प्रतिक .

३ . पूंजा :  आंगना मऽ चऊक पुरस . वोपर पिढो धरस . वोपर जवारी कऽ पाच धांडाना की ( कनिस वाला धांडा ) खोपडी मांडस . खोपडी ला आंबाडी को डाखरो बी बांधस . पिढा पर आठवी का बान धरस . पूंजा को येक गाडगो / करो झाकन को आन् येक बिना झाकन को रव्हस . बिना झाकन वालो सूर्व्यदेव साठी आन् झाकन वालो चंदरदेव साठी ‌ . सूर्व्यदेव आन् चंदरदेव कऽ पुरी मंझार रवो - साखर को सारन भरस . पुरी कऽ काठ ला उंगल कन् दबायकन् किरन सरखी साजरी डिझाईन बनावस . वोपर कनिक को दिवो धरस . गाडगा / करा कऽ गरा ला सूत गुंडारस . हरद कुकू का पाच बोट ना लगायकन् कुकू कन् सस्तिक काढस . कनिक का गोड आन् टिखट अंगार - भंगार तरकन् बनावस , वोला च चटुरा - बटुरा बी कोस . इन ला तरा तरा कऽ आकार मऽ बनावस . जसा बेनी , फनी , नथनी , डाबलो , बंगडी.... . इन ला दोनी गाडगा / करा मऽ डावस . चिच , आरोनी , बोर , आवरो , निंबोरी इ फल बी दोनी गाडगा / करा मऽ डावस , आन् अकसिदना डावस . 
पिढा पर पाच खडा ( पांडव का प्रतिक ) धरस . बिडा कऽ पान पर सुपारी धरकन् गनेस मांडस . गजलक्षुमी कऽ चितरंग को फड मांडस . दिवो - उदबत्ती लगावस . हरद कुकू , फुल ,अकसिद कन् धांडा की खोपडी , दिवो , गाडगा / करा , पाच पांडव , गजलक्षुमी को फड , नारेल , आंबिल को भांडो इन की पूंजा करस . धूप , निवद धरस . महालक्षुमी को मान को निवद मनजे आंबिल . रात मऽ चंदर जब माथा पर आयेन तब या पूंजा करस. रात मऽ चंदरदेव , गजलक्षुमी माय आन् पाच पांडव की पूंजा होस . आरती - पूंजा करकन् नमस्कार करस . वा पूंजा उसीच धरस . 
दुसरऽ दिन दिन मऽ सूर्व्य देव की पूंजा होस . निवद , धूप , आरती , पूंजा होन कऽ बाद आंबिल को परसाद आन् सेरनी बाटस ‌ . 

निसर्ग पूंजा , गजलक्षुमी पूंजा , पांडव पूंजा को यी भोयरी संस्कृति को तिवार इतिहास , सूर्व्यदेव - चंदरदेव साठी की स्रध्दा , कास्तकारी , सुख - उन्नती की कामना , आपली महान परम्परा को सुमिरन को पवितर , अनुठो , मोठो स्रध्दा वालो तिवार सऽ .
इ अनोखोपन च भोयरी संस्कृति की महान परम्परा , इतिहास को दरस्यन घडावस . ...
जय जय गजलक्षुमी माय
जय जय सूर्व्यदेव चंदरदेव
जय जय माय कुंती , पांडव......

( सहयोग : पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

भोयरी संस्कृति - १५ : माडी

भोयरी संस्कृति - १५ : माडी

भोयरी संस्कृति मऽ आसिन पुनव ला माडी पर्व मनावस . कास्तकार आन् स्यहरी लोगना बी माडी ला धुमधामकन् मनावस . माडी कऽ बखत खरीप की फसल घर मऽ आयी रव्हस . येक परकार कन् घर मऽ आये अनाज की पूंजा करन को इ दिन . 
भोयरी संस्कृति मऽ दसरा पासिनच माडी को माहोल तयार होस . पोटुबाटुना दसरा कऽ दुसरऽ दिन पासिन कबड्डी खेलन ला लागस . दसरा पासिन पाचवो दिन माडी को ! येनऽ हफ्ताभर हासी - खुसी , खेलन को माहोल रव्हस .
माडी कऽ दिन चंदर सोरा कला कन् पुरो आन् पुरथी ( पृथ्वी ) कऽ येकदम जवर रव्हस .
माडी पुनव स्यरद रितू मऽ आवस तेकन स्यरद पुनव ! माडीला च स्यरद पुनव , कोजागिरी पुनव , रास पुनव , मानिकेथारी ( मोती तयार करनी वाली ) पुनव , कुमार पुनव , लोख्खी पूंजा कव्हस . 

१ . इतिहास :  * माडी पुनव को पर्व इ पुरानो लोक उत्सव सऽ . वात्सायन नऽ येला " कौमुदी जागर "  आन् वामन पुरान नऽ " दीपदान जागर " कह्येस . येनऽ दिन बली राजा की पूंजा करनो , असो वामन पुरान मऽ सांगेस . 
* माडी पुनव ला चंदरलोक मिन सिरी लक्षुमी देवी धरतीलोक पर आवस , असी धारना सऽ . पुरान कऽ अनुसार समुद्र मंथन मिन माडी कऽ लक्षुमी देवी परगट भयी , तेकन माडी ला लक्षुमी देवी को जलमदिन मानस .
* भगवान सिरीकिस्न सोरा कला को अवतार ! द्वापार जुग मऽ बिंदराबन ( वृंदावन ) मऽ भगवान सिरीकिस्न नऽ माडी कऽ रात गोपिका संगऽ महारासलीला रचायती . 

२ . माडी का अनोखा रूप :  
* माडी ला गुजरात मऽ रास आन् गरबा खेलकन्  ' स्यरद पुनम ' कऽ नाव कन् मनावस .
* मिथिला मऽ माडी ला  ' कोजागरहा ' या पूंजा करस .
* हिमाचल परदेस मऽ माडी कऽ निमितकन् जत्रा भरस .
* राजस्थान मऽ माडी ला बाईलोग पांढरा कपडा पेहेरकन् चांदी का अलंकार घालस . 
* हरयाना मऽ माडी ला खीर बनायकन् आंगना मऽ धरस आन् सकारी वोको परसाद लेस .
* ओडिसा मऽ माडी ला कुमार पुनव कव्हस . येनऽ दिन गजलक्षुमी देवी की पूंजा करस .
* बंगाल मऽ माडी ला लोख्खी पूंजा कव्हस . स्यंख आन् कमल कऽ फुल संग सिरीलक्षुमीनारायन की पूंजा करस . 
* माडी कऽ दिन दमा , अस्थमा की दवाई खीर मऽ डायकन् देस . 

३ . भुलाबाई :  भुलाबाई मनजे पाराबती देवी . येक कथा कऽ अनुसार सारीपाट मऽ भोल्यानाथ पारबती संग हार जास , आन् वूई रुसकन् कयलास पर चली जास . पारबती वून ला मनायकन् वापिस ल्यावस . महादेव पारबती कऽ रूप ला भुल्यो तेकन ' भुलोबा - भूलोजी राव . आन् आदिमाय पारबती नऽ वून ला भुलाये तेकन पारबती ला  ' भुलाबाई ' कोस . महाराष्ट्र मऽ अकोला जिला कऽ अकोट ला येकमातर  ' भुलजा - भुलाई ' को ३०० बरस पुरानो मंदिर सऽ .
पह्यलऽ भोयर समाज मऽ माडी को पर्व  मह्यना भर चलत होतो . बाद मऽ पाच दिन पर आये . आन् आब येक दिन पर ! 
आंगना मऽ भुलाई की पूंजा मांडस . चऊक पुरस . बिडा कऽ पान पर सुपारी को गनपति मांडस . हरद कुकू , अकसिद , फुल कन् पूंजा करस. दिवो , उदबत्ती लगावस . भुलाबाई का लोकगीत गायकन् बाईलोगना आपलो सुखदुख वोमऽ मांडस . भुलाबाई माहेरवासीन ! सासर की खिल्ली आन् माहेर को गुनगान मज्याक कऽ रूप मऽ येनऽ लोकगीत मऽ दिसस . माहेरवासीन आपलो सासुरवास येनऽ लोकगीत मिन मांडस . हासी - मज्याक बी खूब होस .
* अडकी मऽ जाऊ , खिडकी मऽ जाऊ 
खिडकी मऽ होती घागर..
भुलोजी ला पोटु भयो , नाव धरो सागर । 
अडकी मऽ जाऊ , खिडकी मऽ जाऊ
खिडकी मऽ होती दोरी...
भुलोजी ला पोटी भयी , नाव धरो गवरी ।.......

* ..आब तरी जान देव सासूबाई , बावाजी आये लिजान ला.. लिजान ला 
कारला को बी लगाव वो बू बाई , मंग जा आपलऽ माहेर ला.. माहेर ला 
कारला को बी लगाये सासूबाई , आब तरी जान देव माहेर ला... माहेर ला
कारला को बेल निकरन दे बू बाई , मंग जा आपलऽ माहेर ला ... माहेर ला
कारला को बेल निकऱ्यो सासूबाई , आब तरी जान देव माहेर ला... माहेर ला
कारला ला फुल लागन दे बू बाई , मंग जा आपलऽ माहेर ला ... माहेर ला .........
मला का पुसस बरीच दिसस , पूस आपलऽ ससरा ला... ससरा ला
मला का पुसस बरीच दिसस , पूस आपलऽ लाडा ला... लाडा ला
मालक.. मालक..
दादो आयेस लिजानला , जाऊ काजी माहेर ला.. माहेर ला
काडी हात मऽ मारी पाठ मऽ , तोला मोठो माहेर आठवस... माहेर आठवस..

* यादवराया रानी घर ला आयेन कस्सी..
सासुरवासीन बू रुसकन् बसीस कस्सी..। धृ . ।
सासूबाई गयी समजावन ला  , चल चल बू बाई आपलऽ घर ला
अरधो संसार देऊस तोला..., मु नही आवन की आपलऽ घर ला...। १।
ससरो गये समजावन ला , चल चल बू बाई आपलऽ घर ला
तिजोरी की चाबी देऊस तोला.., मु नही आवन की आपलऽ घर ला...। २।
देर गयो समजावन ला , चल चल भाऊज आपलऽ घर ला
नवी आलमारी देऊस तुमला , मु नही आवन की आपलऽ घर ला...। ३।
जाऊबाई गयी समजावन ला , चल चल जाऊबाई आपलऽ घर ला
भारी धट्टी देऊस तुमला , मु नही आवन की आपलऽ घर ला.. ।४।
नंदबाई गयी समजावन ला , चल चल भाऊज आपलऽ घर ला
चांदी को मेखलो देऊस तुमला , मु नही आवन की आपलऽ घर ला.।.५।
लाडो गये समजावन ला , चल चल रानी आपलऽ घर ला
लाल च्याबूक देऊस तोला , आब मु आऊस आपलऽ घर ला...। ६।..

आंगना मऽ मांडी भुलोबा - भुलाबाई की बाईलोग - पोटीना पूंजा करस . आंगना मऽ च मेवो डायकन् दूध आटन ला धरस . पूंजा कऽ बाद मऽ पाच बाटी पर झाकनी झाककन् लुकायकन् राखीस वोनऽ खिरापत की पह्यचान करनो लागस . ज्या जीती वोकऽ साठी टारीना बजावस . सबन ला वा खिरापत बाटस . अरधऽ रात पावतर कोनी सोवत नही . ... कोनी फुगडी खेलस..कोनी जुड्या खेलस ... खेलनो.. हासनो..कुदनो..! असी धारना सऽ कऽ कोन कोन चेता सऽ , वून ला लक्षुमी देवी देखत रव्हस . अरधऽ रात ला चंदर माथा पर आयाकन् वोकी अमरित वाली किरन दूध मऽ पडस . वोकऽ बाद मऽ इ अमरित वालो आटाये दूध को परसाद सबन ला देस .
हासी - खुसी - मज्याक - खेलनऽ - कुदना मऽ इ पर्व कसो गयो , कोनीलाच मालूम नही पडत .

( सहयोग :  पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर



Friday, July 17, 2020

भोयरी संस्कृति - १४ : दसरो

भोयरी संस्कृति - १४ : दसरो 

भोयरी संस्कृति मऽ खूब महत्त्व वालो इ साडेतीन मोह्यतूर मऽ को येक तिवार आसिन मह्यना कऽ चांदनी दसमी ला मनावस . क्षत्रिय भोयर समाज साठी येनऽ तिवार को खास महत्त्व ! 
दसरो तिवार मोठो...
खुसी ला नहाय टोटो....
दसरा लाच दसहरो , विजयादसमी , आयुध - पूजा , बिजोया बी कोस . दसरो आपलऽ देस कऽ संगच नेपाल , मारिस्यस , इंडोनेसिया , मलेसिया , सिरीलंका , चिन ,फिजी , सुरीनाम , गुयाना , थायल्यांड मऽ बी मनावस .
१ . इतिहास :  * सिरीरामजी दसरा कऽ दिन रावन सिन लढाई साठी निकऱ्या . 
* पांडव जब अग्यातवास मऽ रव्हन साठी गया त् वून नऽ आपला अवजार ( अस्त्र , शस्त्र ) भोसा ( शमी ) कऽ झाड पर लुकाया . अग्यातवास खतम भया पर वूई वापिस आया न् आपला अस्तर - स्यस्तर झाड परिन काढ्या . वोनऽ बेरा वून नऽ भोसा कऽ झाड की पूंजा करी , वू दिन आसिन मह्यना कऽ चांदनी की दसमी होतो .
* दुरगा देवी नऽ नव रात आन् दस दिन लढाई करकन् महिस्यासुर ला दसमी ला मारे . 
* वरतंतू गुरू को कौत्स नाव को चेलो होतो . चवदा बरस की पढाई होन कऽ बाद कौत्स नऽ गुरू ला गुरूदकसिना देन की इच्छा सांगी . गुरू नऽ पह्यलऽ नही कह्ये , बाद मऽ वोकी परिकस्या लेन साठी ; येक साल का येक कोटी सोना का सिक्का कऽ हिसाबकन् चवदा कोटी सिक्का मांग्या . कौत्स दानी राजो रघु कितऽ गयो . रघु राज्यानऽ आबच विस्वजीत यज्ञ करकन् सारो धन बाटेतो . राजानऽ तीन दिन की मोहलत मांगी , आन् इंदर भगवान पर चढाई करन की सोची . इंदर देव ला जब या बात मालूम पडी त् वोनऽ कुबेर ला भोसा कऽ झाड पर सोना का सिक्काना डावन ला सांगे . वूइ सिक्काना लेकन कौत्स गुरूजी कऽ जवर गयो . गुरूजी नऽ सिरफ चवदा कोटी सिक्काना लेया आन् बाकी का वापिस कऱ्या . वूई सिक्काना लोगना ला बाट देया . तब पासून भोसा का पत्ताना  ' सोनो ' मनून देन को रिवाज पड्ये . 
* पुरानऽ जमाना मऽ राजा लोगना दसरा पासून लढाई साठी निकरत होता . 

२ . नवरातरी : नवरातरी ला बहुड्डो बोवस . भोयर समाज मऽ नवरातरी का उपास करस . आसिन मह्यना कऽ चांदनी प्रतिपदा ला घटस्थापना करस . तब पासून नवरातरी चालू होस . नवरातरी मऽ महालक्षुमी , सरोसती आन् दुरगा कऽ नव रूप की पूंजा होस . पह्यलऽ तीन दिन दुरगा देवी , चवथऽ दिन पासून साव्वऽ दिन पावतर लक्षुमी देवी , सातवऽ - आठवऽ दिन सरोसती देवी आन् नववऽ दिन महानवमी ला कन्या पूंजा होस . 
गुजरात को गरबा - डांडिया आब सारऽ देस मऽ फयल गयो . बंगाल की दुरगा पूंजा को बी उसोच भयो .  गाव गाव रामलीला को आयोजन होस आन् दसमी ला रावन दहन होस .
* नवदुरगा का नव रूप : शैलपुत्री , ब्रम्हचारिणी , चंद्रघंटा , कूष्माण्डा , स्कंदमाता , कात्यायनी , कालरातरि , महागौरी , सिध्दिदात्री .

३ . दसरा का अनोखा रूप : 
* हिमाचल प्रदेस कऽ कुल्लू को दसरो खूब प्रसिद्ध सऽ . 
* छत्तिसगढ मऽ दसरो दंतेस्वरी माता कऽ पूंजा को पर्व मानस . इ पर्व पुरो अढाई मह्यना चलस . येको समापन आसिन मह्यना कऽ चांदनी त्रयोदसी ला होस.... ओहाडी पर्व पर !
* बंगाल , ओडिसा ,आसाम मऽ इ पर्व दुरगापूंजा कऽ रूप मऽ मनावस .
* तमिलनाडू , तेलंगना , आंध्रप्रदेस , करनाटक म बी शक्तीपूंजा कऽ रूप इ पर्व मनावस . मयसुर को दसरो देस विदेस मऽ प्रसिद्ध सऽ .
* गुजरात मऽ रंगीत घडा ला देवी को प्रतिक मानस . गरबा , डांडिया यहान की स्यान - पह्यच्यान सऽ .
महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश मऽ नवरातरी दुरगा देवी ला समर्पित रव्हस . सीमोलंघन आन सोनो बाटनो इ खास रिवाज .
* कस्मिर मऽ बी नवरातरी की पुरानी परम्परा सऽ .
४ . दसमी : दसरो शक्तिपूंजा को पर्व आन् शस्त्रपूंजा की तिथी सऽ . आनंद , उल्लास , विजय को पर्व सऽ . 
पुरानऽ जमाना मऽ दसरा कऽ पह्यलऽ दिन ला  " पडन " कव्हत होता . नवमी कऽ दिन सारऽ मंदिर का झ्यंडाना ला खलतऽ पाडत होता . येन दिन सातरनी ( बघारनी ) आन् दरनो वरजिक होतो . हरिजन समाज येक हल्या ला पटिल कऽ बाडा पर लिजात होता . पटिल तलवार कन् वोकऽ नाक पर वार करतो . अगर वोको वार हुके त् वोला येक चांदी को रुपो हरिजन ला देन लागतो . जेतरा बार हुकेन वोतरा रुप्या ! बाद मऽ वूई हल्या ला लेकन घर - घर जात होता आन् अनाज का दान लेत होता . ( आबऽ या परथा मुडीस .) 
दसरा कऽ दिन झ्यंडाना रंगायकन , नवो झ्यंडो लगायकन् वोला सोनो - चांदी बांधकन् उभाइ करत होता . 
दसरा कऽ दिन घर ला आंबा का पानना आन् झंडू कऽ फुलना को तोरन बांधस . खेती कऽ काम का लोहा का अवजार , स्यस्त्र ( शस्त्र ) , गाडी - मोटार ला धोवस . आपलो सिवार सोडकन् दुसरऽ सिव मऽ जास . वहान कऽ भोसा कऽ झाड की उदबत्ती - कपूर - अकसिद कन् पूंजा करस आन् वोकी डंगालना  " सोनो " मनून ल्यावस . जवारी का धांडाना " चांदी " मनून ल्यावस . 
चवरी ( दिवरा ) जवर हरदकन् पाच येढा को कुंडल पूरस . वोपर भोसा कऽ पान कोई सोनो आन् जवारी कऽ धांडा की चांदी धरस . पिडा पर धोया ती अवजारना मांडस . येक दोडक्याला काडी का तीन पाय लगायकन् वोला चवरी कितऽ देठ को मुंडो करकन् उभो करस . ( बली को जनावर मनून ) .पिडा पर सोना का भांडाना बी धरस . वून कऽ भवताल चऊक पूरस . अवजार , गाडी - मोटर ला सेंदूर का बोटना लगावस आन सस्तिक काढस . बेल फुल , उदबत्ती , हरद कुकू , अकसिद , सोना - चांदी कन् पूंजा करस . मोठऽ सुरीकन् दोडक्या को देठवालो मुंडको कापस . परसाद , पुरनपोळी को निवद आन् खोबरा की स्येरनी रखकन् पानी फिरावस . घर कऽ बुजरुक ला सोनो देस न् पाय पडस . मंदिर मऽ , दुरगा देवी ला सोनो देस . बाद मऽ येक दुसरा कऽ घर जायकन् सोनो बाटस . 
भोयरी संस्कृति मऽ नवरातरी , पडन , दसरो यी क्षत्रिय धरम आन् खेती धरम सिन जुड्यो सऽ .

( सहयोग : पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .  7066911969


Thursday, July 16, 2020

भोयरी संस्कृति - १३ : सिरी गनेस चतुरथी

भोयरी संस्कृति - १३ : सिरी गनेस चतुरथी

श्री गणेशाय नमः । ॐ गणपतये नमः ।

भोयरी संस्कृति मऽ भादवा  मह्यनाकऽ  चांदनी चउथ ला सिरी गनेस चतुरथी ला पार्थिव गनपति पूंजा होस . येको स्वरूप घरगुती बी सऽ आनऽ सार्वजनिक बी सऽ . 
भोयरी संस्कृति मऽ दस दिन को सिरी गनेस चतुरथी को पर्व / उत्सव इतिहास कऽ हिसाबकन् नवो सऽ . गनेस पूंजा मातर पुरानोच रिवाज सऽ . 
* घर बांधे त् दरुजा कऽ चवकट की वरतऽ की पाटी - ' गनेस पट्टी ' .
भीर खांदी त् वोकऽ जवर दगड ला सेंदूर लगायो - गनेस .
* पूंजा मांडी त् बिडा कऽ पान पर मांडी सुपारी - गनेस .
भोयरी संस्कृति मऽ गनेस ला आकार - उकार आन् माध्यम की भरमार ! दगुड , लकडी , मुरी , रंग , माती , धातू , फुल असो कोनतोच माध्यम वरजिक नहाय ... कोनतो बी माध्यम चलस . कोनती बी पूंजा रव्हन देव .... पह्यलो मान सिरी गनेस को ! भोयरी संस्कृति मऽ गनेस को स्थान असो अद्भूत ! 

१ . इतिहास आन् मान्यता :  
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । 
निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।
*  गनेस महादेव - पारबती को पोरग्यो होय . डिंक नाव को उंदरो गनेस जी को वाहन .
* ज्योतिस मऽ गनेस जी ला केतु ( छाया ग्रह ) को देवता मानस .
* हत्ती को मुंडो तेकन - गजानन .
* गनपति आदिदेव सऽ , जिन नऽ हर जुग मऽ अवतार लेयो . सिवमानस पूंजा मऽ सिरी गनेस ला प्रणव ( ॐ ) कह्येस . येनऽ येकाकस्यर बरमा ( ब्रम्ह ) मऽ वरतऽ को भाग गनेस मस्तक , खलतऽ को पेट , चंदर बिन्दू मोदक ( लाडू ) आन् मातरा सोंड सऽ . 
* गनपति को मतलब सबन दिस्या को स्वामी .
* रुगवेद मऽ गनपति स्यबद आयेस . यजुरवेद मऽ बी उल्लेख सऽ .
* येक मान्यता कऽ अनुसार गनेस आर्येतर देवता सऽ . येनऽ ग्रामदेवता ला रगत को अभिसेक होत होतो , तेकन सेंदूर लगावनो वोको प्रतिक सऽ .
* पुरान मऽ गनपति को नाव गनेस सऽ . पुरान कऽ अनुसार गनेस जी नऽ आठ अवतार लेयास . 
१ - वक्रतुंड : वक्रतुंड रूप मऽ गनेसजी नऽ मत्सरासुर आन् वोका दुय पोटुना ( सुंदरप्रिय आन् विस्ययप्रिय ) को संगार करे .
२ - येकदंत : महरसी च्यवन को पोरग्यो आन् सुक्राचार्य को चेलो ' मदासुर ' को संगार करन साठी गनेसजी नऽ येकदंत रूप धऱ्यो .
३ - महोदर : मोहासुर पासिन देवता कऽ मुक्ती साठी गनेसजी नऽ महोदर अवतार लेयो .
४ - विकट : जलंधर आन् वृंदा को पोरग्यो  ' कामासुर ' कऽ संगार साठी गनेसजी नऽ मोर कऽ वाहन पर को ' विकट ' अवतार लेयो .
५ - गजानन : गनेसजी नऽ कुबेर को पोरग्यो  ' लोभासुर ' ला हारवन साठी गजानन को रूप धऱ्यो .
६ - लंबोदर : क्रोधासुर कऽ संगार साठी गनेसजी नऽ लंबोदर रूप धरकन् वोला हराये .
७ - विघ्नराज : गनेसजी नऽ विघ्नेस्वर को अवतार लेकन ममतासुर को मान मर्दन करे .
८ - धूम्रवर्न : अहंतासुर कऽ संगार साठी गनेसजी नऽ धूम्रवर्न को अवतार लियो . 

पह्यलऽ पूंजा कऽ मान को अनादि गनेसजी की पूंजा दुनियाभर मऽ पाच हजार सालपासिन होय रह्यीस . इरान , अफगानिस्तान , इंडोनेसिया , बरमा , थायलंड , चिन , जपान , सिंधू घाटी सभ्यता , माया संस्कृती मऽ गनेस पूंजा का परमान सऽ . 
* गनेसजी ला तमिल मऽ विनयागार / पिल्लै , तेलुगू मऽ विनायाकुडू , बरमा मऽ पाली महा विनायक , थायल्यांड मऽ फरा फिकानेत , जपान मऽ कांगीतेन कोस . 
* गनेसजी की सार्वजनिक पूंजा को पर्व छत्रपति सिवाजी महाराज कऽ राज मऽ सुरू भये . मराठी राज खतम होन कऽ बाद सार्वजनिक पूंजा बी थांब गयी . इ . सं .  १८९३ मऽ लोकमान्य तिलक जी नऽ येला वापिस सार्वजनिक पूंजा कऽ रूप मऽ आघऽ लाये . गनपति विसरजन की रसम बी वून नऽ चालू करी .
गनपति बाप्पा मोरया ऽ ऽ ऽ ऽ..................
* येमऽ कऽ मोरया नाव को भी इतिहास सऽ . ' मोरया गुसाई ' चवदावऽ सदी म को गानपत्य संप्रदाय का मोठो संत होतो . उन को जलमगाव मोरगाव . गनपति को महाभगत .. अस्टविनायक की यात्रा वून नच चालू करीस . वून नऽ चिंचवड ( पूना , महाराष्ट्र ) ला संजीवन समाधी लेइस . महा भक्ती कऽ कारन वून को नाव गनपति कऽ नाव संग जुड्यो . 
* गनपति की आरती समर्थ रामदास स्वामी नऽ लिखीस ... :
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची ।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ।
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती......

* सूरदास जी की हिंदी आरती..:
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जा की पार्वती , पिता महादेवा....

२ . दूब ( हराळी ) की मान्यता :  पुरान कऽ अनुसार अनलासुर नाव कऽ दयीत नऽ रिसी - मुनी - मानुसना ला जिता यी गिटकनो चालू कऱ्यो . सबन ला बचावन साठी गनेसजी नऽ अनलासुरला च गिटक्यो . उनकऽ पेट मझार जलन होनला लागी . तबऽ कस्यप रुसी नऽ २१ दूब ( दूर्वा ) गनेसजी ला खान साठी दी . वोकन उनला आराम भयो . तेकन गनेसजी ला २१ दूर्वा चढावस . 
३ . मोदक : पदमपुरान कऽ अनुसार गनेसजी ला मोदक भायीच आवडस . मोदक को मतलब होस , खुसी देनी वालो . मोदक ला स्यास्तर मऽ ग्यान को प्रतिक मानस . 
* येक डाव रिसी अतरी आन् वून की लाडी अनुसूया नऽ महादेव - पारबती आन् गनेसजी ला जेवन साठी आवतन देयो . गनेसजी ला खूब जोर की भूक लागीती . गनेसजी की थाटी पह्यले लगायी . गनेसजी जेवत रह्या..... अनुसूया रांधतच रही ... वा रांधता रांधता थक गयी पर गनेसजी को पेटच नही भरे . तब अनुसूया नऽ आखरी उपाव मऽ मोदक वाहाडे . मोदक खायकन् गनेसजी खुस भया आन् जोर की डकार मारी . इ देखकन् भोल्यानाथ को बी पेट भर गयो . आन् येक नही तर २१ डाव डकार मारी . 
४ . रिवाज : घर मऽ आन् सार्वजनिक जागा पर गनपति मांडस . साजरी सजावट करस . कोनी नवस को गनपति बसाडस . सकार - झालपड्या दुय बेरा आरती - पूंजापाती करस आन् परसाद बाटस . घर कऽ गनपति को रोज कोनी न् कोनी कऽ घर जेवन को परसाद रव्हस . सार्वजनिक गनपति को आखरी दिन महापरसाद करस . सार्वजनिक गनपति को डेकोरेसन बी खूब मोठो , खूब लायटींग वालो , जत्रासरखो रव्हस. धा दिन पूंजापाती , आरती. भजन कन् घर , येटार , गाव सरग ( स्वर्ग ) सरखो लागस . सारो दम् दम्.......  घर मऽ बसाडस वा गनेसमूरती नानी रव्हस पर सार्वजनिक गनेसमूरती मोठमोठाली रव्हस . गनपति मऽ गनगोत , सेजारी पाजारी , सोबतीना की भेटभलाई होस . पोटुबाटुना , मोठा मानुसना , बाईलोगना इ सारा धा दिन भक्तिभाव , खुसी कऽ गंगा मऽ नहाय लेस . घर - गाव को वातावरन सुध्द , मंगल होय जास . जेक्यान गनपति नही बी बस्यो वूई भी रोज नाना परकार को परसाद बनायकन् गनपति ला भोग लगावस . सारऽ कितऽ येकच आवाज .....
गनपति बाप्पा मोरया
मंगलमुर्ती मोरया......

५ . अनंत चतुरदसी : महर्सी वेद व्यासजी नऽ महाभारत की रचना करीस . पर लिखन को काम गनेसजी नऽ करेस . रात - दिन लिखकन् गनेसजी थक जातो , वोकन उन ला आसुक नही आया पाह्यजेन ,  वोकऽ साठी  वेद व्यासजी नऽ गनेस चतुरथी कऽ दिन वून ला माती को लेप लगाये . लेप सुख्याकन् गनेसजी को आंग अकड गये . महाभारत लिखन को काम दस दिन चाल्यो . चतुरदसी ला लिखन को काम खतम भये  . पर लेप सुक्यो तेकन गनेसजी ला आसुक आयेच आये . गनेसजी को आंग ठंढो करन साठी वेद व्यासजी नऽ उन ला तलाव कऽ पानी मऽ बसाडे . गनेसजी ला दस दिन बेगबेगरा पकवान , फल को भोग लगाये . तेकन आपन गनेसजी की माती की मूरती सिरी गनेस चतुरथी ला बसाडकन् दस दिन बाद अनंत चतुरदसी ला मूरती को विसरजन करजे . 
पुरानऽ जमाना मऽ गीली - पिसी हरद की नानी सी गनपति की मूरती बनावत होता . वोकी दस दिन पूंजापाती करकन् बाद मऽ पानी मऽ सिराय देता . वोनऽ पानी ला झाड कऽ बुडसिन डाय देत होता . 
येला मोठो रूप देये लोकमान्य तिलकजी नऽ .
गनपति बाप्पा मोरया
आगलऽ बरस तू जल्दी आ ....
येक लाडू फुट्यो , गनपति बाप्पा उठ्यो.....
येक दुय तीन चार , गनपतिजी की जयजयकार......

लेखक :  सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर . 

Tuesday, July 14, 2020

भोयरी संस्कृति - १२ : रिसी पंचमी

भोयरी संस्कृति - १२ : रिसी पंचमी

रिसी पंचमीला च रुसी पंचमी , ऋषी पंचमी कोस . भोयरी संस्कृति मऽ भादवा कऽ पंचमीला , काजरतीज कऽ तिसरऽ दिन , गनेस चतुरथी कऽ दुसरऽ दिन " रिसी पंचमी " को व्रत करस . बाईलोगना रिसी ( ऋषी ) की पूंजा करस तेकन वोला रिसी पंचमी कोस . 

१ . दिन विस्येस :  कस्यप , भारद्वाज , विस्वमित्र , गवतम , जमदग्नी , वसिस्ठ आन् वसिस्ठ रिसी की लाडी अरुंधती कऽ नाव की आठ सुपारीना मांडकन् या पूंजा करस . रिसी पंचमीला बयील को कमाये  ( वोकऽ कस्टऽ को ) कोनतो बी अनाज खात नही . साल मऽ येकडाव / येक दिन तरी आपलऽ कस्टकन् कमाये अन्न खानो , इ येकऽ मांग को नेम सऽ . रुसी - मुनी नऽ सांगे ती ग्यान आपलऽ जीवन कऽ उन्नती साठी बाचन , चिंतन , मनन आघऽ कऽ पिढी नऽ करत रह्या पायजेन , यकी याद देन साठी या रिसिपंचमी ! 
कोनतऽ बी व्रत , तिवार की बेरा आन् नेम बनन साठी भोयरी संस्कृति मऽ भौगोलिक वातावरन को बिचार करे रव्हस . चतुरमास मऽ आवनीवाली रिसीपंचमी कऽ व्रत मऽ रिसी पूंजा कऽ सिवा आघाडा कऽ काडी कन् दातमंजन , सवासिन ला हरद न्हान , माती न्हान , तिरथ न्हान असो नेम रव्हस . बाकी उपास आन् रिसीपंचमी कऽ उपास मऽ फरक रव्हस . येनऽ उपास ला कंदमुरच चालस . तसोच रिसीपंचमी को नहान आबऽ कऽ निसर्ग उपचार पध्दत सरखोच सऽ आन् वोको फायदो बी दिसस .
रिसी पंचमी ला आपलऽ देस आन् नेपाल मऽ मनावस .

२ . रिसीपंचमी को जेवन :  रिसी पंचमीला खास भाजी करस वोला रिसी की भाजी कोस . कुम्बडो , मको , पोथी / धोपा का पानना , बाल की सेंगना , बटाना , भेंडी की मिसर भाजीला तूपकन् बघारस . तेल की बघारनी नही चलत . देवतांदुर / देवचऊर को भात अन् कढई करस . रांधन साठी कोनी बी येकच जात कऽ झाड की काडीना को इंधन बापरस . चाहा साठी गाय को दूध नही चलत  , मयीस को चलस .

३ . बाईलोग आन् रिसीपंचमी :  रिसी पंचमी की पूंजा भोयर बाईलोगना कमस कम सात बरस करस , कोनी नव बरस करस . जलम देन की स्यक्ती ला वलांडन साठी यी व्रत बाईलोगना सात बरस करस . वोकऽ बाद वोला उजवस . माहवारी कऽ दोस मिन् मुक्त होन साठी बाईलोगना  यी व्रत करस . 
रिसीपंचमी कऽ दिन बाईलोगना नदी पर , तिरथस्थान पर नहान साठी जास . नहान कऽ बाद मऽ पेहरन साठी लिया ती कपडाना पह्यले पानी मऽ भिजायकन् वारन ला डावस . हात मऽ अकसिदना लेकन पानी मऽ डुबकी मारस . नाहन कऽ बाद मऽ वोलऽ आंगकनच रेती की पिंड बनावस . उदबत्ती , कापुर , दिवो , सह्यद , मसी को दूध , वोकोच गोमतिर , तूप , दही , अकसिद , केला , नारेल , बेल फुल कन् पूंजा करस . नदी मऽ दिवो सोडस . 
कमस कम सात बरस पूंजा होन कऽ बाद आन् माहवारी जान कऽ बाद मऽ येनऽ व्रत ला उजवस . 
सबन बाईना मिरकन्  कोनऽ रिसी कऽ तिरथ ला , तिरथस्थान ला जास . रिसीपंचमी व्रत उजवन साठी पूंजा को सामान , सिधा को सामान संगंच चांदी की बेलपतरी आन् चांदी की अकसिदना घडायकन् लेस . पुजारी - बामन साठी कपडा , दकसिना बी लिजास . घाट पर न्हावन कऽ बाद मऽ पूंजा मांडस . रेती की पिंड बनावस . सवासिन आन् बुढी - म्हथारी बाईना येक जागऽ पूंजा मांडस त् विधवा बाईना बेगरऽ जागऽ पूंजा मांडस . पूंजा करकन् पुजारी - बामन की बी पूंजा करस आन् वून ला अहिर ( कपडा ) न् दकसिना देस .

४ . मान्यता : महाभारत  मऽ उत्तरा की कथा सऽ . अस्वथामा नऽ वोको गरभ नास करेतो . उत्तरा नऽ रिसीपंचमी को व्रत करे . व्रत कऱ्या बाद उत्तरा कऽ गरभ ला जीव फुट्यो , वू होय परिकसित राजो .... उत्तरा आन् अभिमन्यू को पोरग्यो ! गरभ मच दुय बेरा जलम लेन कऽ कारन परिकसित ला गरभ मच  ' द्विज ' कह्यतो . रिसी पंचमी कऽ पूंजा कन् उत्तरा गरभपात कऽ दोस मिन् मुक्त भयी . 
दोस मुक्ती कऽ संगच पोटुबाटुना को सुख - उन्नती , सुख सुविधा को लाभ आन् सौभाग साठी भोयर बाईना रिसी पंचमी की पूंजा करस .
रिसी पंचमी पर्व रिसी - मुनी साठी की स्रध्दा , समरपन , सन्मान आन् उपकार मानन की भावना दिखाडस .

( स्रोत : पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर . मो . 7066911969

Sunday, July 12, 2020

भोयरी संस्कृति - ११ : पोरो ( पोळा )

( bhoyari dialect )भोयरी संस्कृति - ११ : पोरो ( पोळा )

भोयरी संस्कृति मऽ पिठोरी अवस ला बयील पूंजा को ' पोरो ' तिवार मनावस . साल भर आपलऽ साठी राबनारा बयीलदेव को मान को तिवार . 
१ . इतिहास :  बयील ( बैल ) पूंजा बायबल आन् यहूदी लोगना मऽ बी सऽ . भगवान भोल्यानाथ को वाहन नंदी आन् रिसभ ( वृषभ ) रास को प्रतिक बी पवित्र बयील सऽ . बयील मेसोपोटेमिया आन् मिसर ( इजिप्त ) कऽ सरखो चंदर सम्बधी रहो नही त् भारत सरखो सूर्व्य सम्बधी रहो , कयी धार्मिक / सांस्कृतिक अवतार को आधार रव्हस . 
* पास्यान युग मऽ यूरोप म कऽ गुफा मऽ अवरोक्स ( औरोक्स ) का चितरंगना दिसस .
* ताम्र युग मऽ लोगना नऽ बयील ला ' वृषभ ' रास को प्रतिक कऽ रूप मऽ मान्यता देई.
* सिन्धु घाटी की सभ्यता मऽ सील ( मुद्रा ) पर बयील की आन् बयीलदेव की मुख्य आकरुती सऽ .
* बेबोलोनिया , माया , सुमेरियन , असीरिया सभ्यता मऽ बयील की पूंजा होत होती .
* वेद मऽ बयील ला धरम को अवतार मानेस .
* असी मान्यता सऽ कऽ कामस्यास्तर , धरमस्यास्तर , अर्थस्यास्तर आन् मोक्स्यस्यास्तर को रचनाकार नंदी च होतो .
मानुस नऽ जब खेती करनी चालू करीस तब पासून बयील की महिमा आन् पूंजा चालू भयी . पुरी दुनिया कऽ संस्कृती मऽ बयील पूंजा दिसस .
२ . खेतीबाडी आन् तिवार : इ तिवार खेती किसानी पर आधारित पर्व सऽ . येनऽ बखत ला बोवनी , निंदाई को काम खतम होय जास . हिवरऽ गवत कऽ चाराकन् बयीलना बी साजरा धस्टपुस्ट दिसस . 
इ तिवार महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश , तेलंगन आन् छत्तिसगढ मऽ येकच तिथी पर मनावस . महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश मऽ पूरनपोळी को निवद रव्हस त् छत्तिसगढ मऽ ठेठरी , खुरमी , चौसेला , खीर - पुडी को निवद करस . 
कर्नाटक आन् कोल्हापूर जिला मऽ पोरा ला बेंदूर कव्हस . आन् बेंदूर बडसावितरी कऽ दुसरऽ दिन मनावस .
३ . खांदसेकनी / खांदमरदन : पोरा कऽ पह्यलऽ दिनपासून बयीलना ला आराम देस . पोरा कऽ पह्यलऽ दिन गडी नदी परीन बयीलजोडी ला धोयकन् लावस .मालक आन् मालकिन पूंजा को सामान लावस . बयीलजोडी का पायना पानीकन् धोस . हरद कुकू अकसिद , बेलपतरी वाहस . परसा कऽ पाच देठना की जुडी कन् तूप आन् हरद लेस . वोला आरती कऽ दिवा पर रखकन् मंग बयील कऽ मान पासून खोंड पावतर लगावस . वोलाच चढवती खांदसेकनी कोवस . साल भर उनकऽ खांदा पर जू को बोझो रव्हस , वोला हरद - तूप कन् सेकस . 
तुत्या कन् ढोसे , कासरा कन् आवरे 
वोको राग नको मानजे
आज आतवन देऊस 
सकारकन् जेवन ला आवजे .....
येक नमन गवरा पारबती हर बोलो हर हर महादेव....
नवऽ टोपला मऽ बिडा कऽ पाच पान पर पूरन को निवद धरस . कुम्बडो , काकडी , दोडक्या , मुंग - बरबटी की सेंग की मिसरा भाजी वोपर धरस . धोपा की / पोथी की पानबडी आन् मोहा का फुलना बी वरतीन डावस . निवद मऽ फुलना डावन को खास कारन सऽ . सारो अनाज त् बयीलना  पिकवस . .... वा वोकीच कमाई ! मोहा का फुलना आपन जमा करजे वाच आपली कमाई ! वोकी कमाई आपन खायजे तेकन  आपली कमाई ( मोहा का फुलना ) बी आपन निवद पर धरजे . 
दरुजा जवर गवरी पर गुगुर डावस . निवद बयीलना ला चारस . 
बयीलक्या कऽ घोंगडा की खोर मऽ मालक गहू / जवारी दान करस .
मालक कोस ,  " खोर भरो "
बयीलक्यो कोस , " कोठा भरो " 
मंग वोला सिरपाव ( नवा कपडा , दकसिना ) बी देस .
४ . बयील पोरो : सकारीच दरुजा कऽ दुय बाजू परसा का मेढाना धरस . मेढा कऽ बुडसिन् मुरूम डावस . मेढा ला हरद कुकू का बोटना लगायकन् बेलपतरी बांधस . धूप दिखाडकन् निवद धरस . पह्यलऽ कोतवाल दरुजा ला आंबा कऽ पत्ता की तोरन बांधत होतो . देऊर म नंदी देव साठी बेगड , नानीसी मठाठी , बेल फुल लेकन जास . जू ला गेरु कन् रंगायकन् बेगड लगावस . वोला बाख को दोर बांधस आन् दाठ्ठा मऽ धरस . बयीलना नदी परीन धोयकन् घर मऽ आया पर वून पर रंग का ठप्पाना मारस . सिंग ला बेगड चिपकावस . बयीलना कऽ आंग पर साजरी रंगीत झूल डावस . नवऽ येसन ला हरद कन् रंगायकन् वून ला बांधस . बासिंग , चवर , मठाठी , घोल्लर , पितर को तोडो , कवडी की म्होरकी , बाघनख - कवडी को गजरो , कंठी - गठलम , चमडा की कपारपट्टी , बाख का नवा खांडोरना कन वूनला सजावस . नानऽ पोटुना साठी गोंडा की कुची बनावस . 
कुटी जवारी , दूध , इलायची , गुड - साखर को जी निवद बनावस वोला " ठोंबरो " कोस . बयील सज्या पर वूनकी पाय धोयकन् पूंजा करस आन् ठोंबरा को निवद देस . वोकऽ बाद बयीलना तोरन मऽ जास . 
तोरन मऽ ब्यांड बाज्या की धूम रव्हस . वहान बयीलक्यो मठाठी ला बांधी बेलपतरी काढकन् तोरन परीनि फेक देस . पटिल , मानवाईक लोगना बयीलजोडीना की पूंजा करस . मयदान मऽ लाठी - काठी , दांडपट्टा को खेल होस . येक कऽ पासऽ येक झडतीना की बानी लागस . 
बाटी रे बाटी ... खोबरा की बाटी 
महादेव रोवस दुय पयसा साठी 
पारबती ला फाटे लुगडो पेहरन साठी 
नंदी कऽ कपार की हालस मठाठी ....
येक नमन गवरा पारबती हर बोलो हर हर महादेव ऽऽ.....

आभार गडगडस 
सिंग फडफडस
सिग मऽ पड्या खडा 
तोरी माय रांधस 
सवारी बडा....
येक नमन गवरा पारबती हर बोलो हर हर महादेव ऽऽ....

सपरी रे सपरी
नानी मोठी सपरी
पह्यली ला नहाय पोटुबाटू
तेकन करीस गा दुसरी....
येक नमन गवरा पारबती हर बोलो हर हर महादेव ऽऽ...
तोरन टुट्या पर पोरो फुटस . महादेव को अंस हनुमान जी . बयीलजोडीना हनुमान कऽ मंदिर मऽ जास आन् वाहासिन मालक कऽ घर मऽ आवस . मालकीन बयीलक्यो आन् बयीलजोडी की पाय धोयकन् पूंजा करस आन् बोजारो देस . वोकऽ बाद बयील जोडी गाव मऽ फिरकन् घर मऽ आवस . 
घर मऽ आडा खलतऽ मालकीन चऊक पुरस . वोपर नवो बेरु को टोपलो धरस . टोपला मऽ कुडव का पानना हाथरस . वोपर सवारी - बडो , अनरसो , लाडू , मिसर भाजी , वरन भात , गोड , पोथी का पान आन् वरतीन मोहा का फुलना डायकन् निवद बनावस . बयीलना घर पर वापिस आया पर वोकी आरती करकन् पूंजा करस . आबऽ वोला खोंड पासून गरदन पावतर हरद - तूप लगावस , या उतरती खांदसेकनी ! घर मऽ टोपला मऽ बनाये ती निवद चारस आन् पाय लागस . 
येक नमन गवरा पारबती हर बोलो हर हर महादेव ऽऽ....
५ . पिठोरो :  घर की लक्षुमी पिठोरा को उपास धरस . पोरा कऽ दिन चवरी ( दिवरो ) जवर कऽ दिवाल पर , जेतरा भाईना होयेन वोतरा को हरद कन् चितरंग काहाडस , आन् वून की पूंजा करस . 
जब बयीलना तोरन मऽ जास तब वा लक्षुमी टोगरा पर काकडी फोडस . कुडव कऽ पत्ता पर पूरन , साखर- तूप को निवद धरस .

६. तानो पोरो ,बाड पोरो , मारबत , कर , पाडवो : पोरा कऽ दुसरऽ दिन झुंझुरकाच सातरी मिनच लोगना मारबत हाकलस . 
मच्छर.. चिलटाना लेय जागे ऽ ऽ मारबत...
राईरोग... खेसखोकलो लेय जागे ऽ ऽ मारबत....
सकारी मेढा ला बांधी बेलपतरी ( मारबत ) सोडकन् मेढाना काहाड लेस . पह्यलऽ कऽ जमाना मऽ मारबत लेन ला कोतवाल आवत होतो . 
मोठऽ पारग ला नानऽ पोटुबाटुना की नंदी ला सजावन की गडबड - धांधल चालू रव्हस . ताना पोरा मऽ पोटुबाटुना सजधज कन् नंदी लेकन जास . सबन ला कयी न् कयी इनाम भेटस . मंग पोटु - पोटीना आपलो नंदी लेकन गाव मऽ फिरस . कोनी पयसा त् कोनी चाकलेट को बोजारो देस. 
मोठा मानुसना जुवो खेलस . पोटुबाटुना संगच कयी मोठा मानुसना बी झंडी मुडी खेलस .... कोनी हारस...कोनी जितस ! 
सरावन मह्यना मऽ कोनी मास मच्छी खात नही . तेकन कयी लोगना पाडवा ( कर ) ला मास मच्छी खास . पर आरबाडी लोगना रुसी पंचमी पावतर मास मच्छी नही खात . 
बयील आन् बयीलक्या ला येनऽ तीन दिन सुट्टी रव्हस . ... खानो.. पेनो... खेलनो... ! तीन दिन हासी खुसी मऽ निकर जास . 

पोरा की येक कविता पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख कऽ  " उजळणी " कविता संग्रह मिन :
पोळा
माझ्या वावरात
काकडी वेला गेली
बंधुराजाची बहिण
पिठोरा कबुलली

पोळ्याच्या दिवशी
काकडीला मान
साळा वधला भाटव्यानं
केला सजीव बहिणाईनं

पोळ्याच्या दिवशी
काकडी नको खाऊ
काय सांगू माझे मैना
तोरणात गेले भाऊ

पोळ्याच्या दिवशी
आहे घरोघरी मेढे
केवढं दुख झालं
परसरामा तुले

( सहयोग : पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख , रामेश्वर गोरे )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर . मो : 7066911969

Friday, July 10, 2020

भोयरी संस्कृति - १० : जल्मास्टमी

भोयरी संस्कृति - १० : किस्न जल्मास्टमी

महाराष्ट्र मऽ सरावन मह्यनाकऽ अंधारी अस्टमी आन् मध्यप्रदेश मऽ भादवा कऽ अंधारी अस्टमी ला जल्मास्टमी को तिवार आवस . दिन येकच सऽ पन् बेगरऽ बेगरऽ पंचाग मऽ मह्यनो बेगरो रव्हस . 
भोयरी संस्कृति मऽ जल्मास्टमी मनावन को जुनो रिवाज सऽ . 
द्वापर जुग मऽ भगवान किस्न बिस्नु को आठवो अवतार . भगवान किस्नदेव मायबाप देवकी आन् वासुदेव पर उनला पाले पोसे यसोदा आन् नंदबाबानऽ . भारतीय उपखंड आन् आसिया कऽ लोककथा नायक किस्नदेव कऽ बिना यहान को साहित्यच नही लिखता आवत .
भगवान किस्न की ' भागवत गीता ' को उपदेस अनादी बखत पासून जनमानस ला जीवन ग्यान दे रह्येस . 
मथुरा मऽ जल्म्या कान्हा की महिमा दुनिया भर मऽ सऽ . जल्मास्टमी को तिवार आपलऽ देस , नेपाल , पाकिस्तान , बंगलादेस , फिजी , मारिसस , सुरीनाम , सिंगापूर , कनाडा , मलेसिया , न्युझिल्यांड ,आस्ट्रेलिया , गुयाना , त्रिनिदाद आन् टोबागो , जमैका , अमेरिका , युरोप , दक्षिण आफ्रिका मऽ धुमधाम कन् मनावस . नेपाल आन् बंगला देस जल्मास्टमी ला सरकारी सुट्टी रव्हस .
किस्न जल्मास्टमी ला गोकुलास्टमी , कानोबा , सिरी जयंती , यदुकुलास्टमी , सिरी किस्न जयंती बी कोस . जल्मास्टमी कऽ रात ला मोह रातरी बी कव्हस .
भोयरी संस्कृति मऽ जल्मास्टमी ला चवरी जवर तूप कन् भगवान किस्न , गोप - गोपी , गवळनना , गाय - बासरुना असो गोकुळ को चितरंग काहाडस . येला चवखुटी बॉर्डर बी बनावस . 
येनऽ दिन उपास धरस . कोनी घर कऽ किस्नदेव की पूंजा करस त् कोनी क्यान कानोबा की मूरती बसाडस . किस्नदेव ला पारना मऽ डावस . रातभर भजन - किरतन चालस . 
किस्नदेव ला दूध - दही की खूब आवड . उनकऽ भेवकन् बाईलोगना उच्ची सिका पर दूध - दही धरता . पर किस्नदेव आपलऽ सोबतीना कऽ संग येको बी तोड काढता . वूई मिरकन् येक कऽ वरतऽ येक चेंगकन् , दूध - दही काढकन् खाता . येनऽ किस्न लिला को आबऽ रिवाज भयो .गोपालकाला कऽ दिन मंदिर मऽ भजन - किरतन कऽ बाद दही हांडी फुटत होती . आबऽ उच्ची उच्ची दही हांडी बांधस . आन् वोला फोडनसाठी पोटुना की टिम आवस . ज्या टिम दही हांडी फोडस उनला इनाम भेटस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, July 9, 2020

भोयरी संस्कृति - ९ : बहुड्डो

भोयरी संस्कृति - ९ : बहुड्डो

बहुड्डा को तिवार पोह्यती कऽ दुसरऽ दिन मनावस . भोयरी संस्कृति मऽ बहुड्डा पूंजा को अनुठो रिवाज सऽ . महाराष्ट्र आन् मध्यप्रदेश मऽ भोयर समाज बहुड्डा पर्व ला धुमधाम कन् मनावस . आपली बोली भोयरी या मालवी भास्या की बोली ( dialect ) सऽ . आबऽ वर्धा , नागपूर , बैतूल , छिंदवाडा जिला मऽ रव्हनी वालो आपलो भोयर समाज मालवा परीन आयेस ,  तेकन आपली बोली , सन तिवार , संस्कृति पर मालवा , बुंदेलखंड कोच असर सऽ .
पुरऽ नरमदा अंचल मऽ बहुड्डा को पर्व पुरातन काल पासून मनावस . बहुड्डा को तिवार / पर्व मध्य भारत - उत्तर भारत कऽ मालवा , बुंदेलखंड , महाकौसल की पह्यच्यान सऽ . वहान आबऽ भी इ अनुठो पर्व मोठऽ धुमधाम कन् मनावस . 
बहुड्डा ला बहुडला , भूजलिया , भूजरिया , कजलिया , फुलरिया , धुधिया , धेगा , ज्वारा आन् भोजली बी कव्हस . 
१ . इतिहास :  * चंद्रवंसी राजा परमाल की पोटी नऽ पह्यलो बहुड्डो बोये ,  वोकऽ बाद मऽ येनऽ रिवाज की सुरवात भयी , असी मान्यता सऽ .
* छत्तिसगढ मऽ बहुड्डा ला ' भोजली ' माता कऽ सम्मान मऽ बोवन को रिवाज सऽ . 
* दिल्ली को राजो पृथ्वीराज चव्हाण नऽ बुंदेलखंड की राजकुमारी चंद्रावल , पारस पथरी आन् नवलखा हार लुटनसाठी चन्देल राजो परमाल देव कऽ ' महोबा ' पर चढाई करी . सरावन मह्यनाकऽ पुनव  ( पोह्यती ) ला या लढाई महोबा कऽ कीरत सागर मयदान मऽ भयी . राजो परमाल आन् आल्हा - उदल कऽ आघऽ राजो पृथ्वीराज चव्हाण हाऱ्यो . येनऽ लढाई कऽ कारन बुंदेलखंड की पोटीना नऽ पोह्यती कऽ दुसरऽ दिन बहुड्डा ( कजली ) ला सिराये , आन् भाईना ला पोह्यती बांधी . तेकन आज भी बुंदेलखंड मऽ राखी , पोह्यती कऽ दुसरऽ दिन बांधस .
२ . बहुड्डा को विज्ञान : जुनऽ जमाना मऽ बीज ला सम्भालकन् राखकन् बेरा - बेरा पर वोको परिक्स्यन बी करत होता .
* पह्यलो : चयीत मऽ जब बीज राखत होता त् चांगलो बीज जेनऽ खेत को होयेन वहान की माती घर मऽ लायकन् चयीत नवरातरी मऽ वोमऽ बीज बोवत होता , जेला आमी जव / जवारा कह्यजे . जेनऽ खेत कऽ माती मऽ बीज का जास्त जव उगेन , वोमीन तीन पट अनाज बीज साठी राखता . 
* दुसरो :  दुसरो परिक्स्यन सरावन मह्यना मऽ करत होता . ढोली मिसिन अनाज काढकन् देखता कऽ कही घुन / किडा तऽ नही लाग्यास . उनला चांदनी नवमी कऽ दिन मोहा कऽ पत्ता पर बेरु कऽ टोपली मऽ माती डायकन् बोवत होता . येलाच " बहुड्डा " / भुजलिया / कजलिया असो नाव पडे . वोला पोह्यती कऽ दुसरऽ दिन गाज्याबाज्या कन् नदी / तलाव पर लेकन जात होता आन् सिरावत होता . हर कास्तकार येक दुसरा को जव / जवारो देखतो कऽ बीज कसा उग्यास . जव / जवारो देखकन् येक दुसरा की बिजाई की अदला बदली बी करत होता . 
* तिसरो : दसरा ला नवरातरी मऽ सार्वजनिक बहुड्डा बोवन की परम्परा खूब जुनी सऽ . जेकऽ घर का बीज जास्त उगता वू अनाज बिजाई साठी काम मऽ लेता . दसरा - दिवारी मऽ गहू की बोवनी करता आन् बाकी को अनाज खान साठी राखता . 

३ . बहुड्डा पर्व : नागपंचमी कऽ दिन बेरु कऽ नवऽ टोपली मऽ मोहा का पत्ताना धरकन् वोपर माती भरस . वोमऽ गहू बोवस . घर मऽ जेतरी पोटीना होयेन वोतरी टोपलीना . टोपलीना झाककन् राखस .
बहुड्डा तिवार साठी कुंभार कऽ रंग कन् बहुड्डो लेकन पोटी , पालखी , हत्ती , तलवार लेकन घोडापर बस्या भाईना असा दिवाल भर चितरंग काहाडस . जेतरा भाईना होयेन वोतरा को चितरंग काढस . उनकी हरद कुकू , अकसिद लगायकन् पूंजा करस .
 इ चितरंग बुंदेलखंड की कजली की लढाई याद दिलावस .
पोह्यती कऽ दिन बहुड्डा की बेल फुल , पोह्यतो , उदबत्ती कन् पूंजा करस आन् पुरन को निवद करस .पोह्यती कऽ दुसरऽ दिन बी असीच पूंजा करस . 
पोटीना कऽ पाय ला माहुर / अल्ता लगायकन् कपार ला आडवो कुकू लगावस . दंड मऽ पोह्यतो बांधस , जुडा मऽ गजरो लगावस . पोटी , बाईना नवा कपडा पेहेरकन् , सजधज कन् बहुड्डो लेकन पटील कऽ घर जमा होस . पटलीन बहुड्डा की पूंजा करस . बाद मऽ सबन पोटीना - बाईलोग नदी/ तलाव पर बहुड्डो सिरावन ला जास . नदी / तलाव पर पूंजा करकन् जव / जवारो संगं लेस . नदी मऽ का पाच खडाना बी आनस गाय कऽ कोठा मऽ फेकन साठी . पोटी - बाईलोग जव खोपा मऽ , बेनी मऽ खोसस . मंदिर मऽ जायकन् देव ला जव चढावस . घर मऽ चवरी पर , तुरसी ला जव चढावस . येक - दुसरा कऽ घर जायकन् जव / जवारो बाटस आन् नमस्कार करस . 
बहुड्डा को पर्व नाता रिस्ता ला जपन को दिन सऽ . भोयरी संस्कृति प्रकृति प्यार , खुसहाली , खेती - बाडी कन् जुड्यो यी बहुड्डा को तिवार सऽ . .... भाई - बहिन कऽ सगुन को तिवार सऽ . 
४ . बहुड्डो उजवनो :  ब्याह भयापर पोटी बहुड्डा कऽ तिवार ला माय कऽ घर रव्हस . माय वोकऽ साठी बहुड्डो बोयकन् धरस . ढोल बाज्यो लगायकन् पोटी आपलो बहुड्डो लेकन नदी / तलाव / भीर पर जास . जव / जवारो लेकन आया पर सेजार पाजार मऽ जास . वहान वोकी वटी भरस . या पोटी सवारी - बडो , लाडू , करंजी असी पाच पकवान की पाच टोपलीना  पाच घर बाटस . 
बहुड्डो उजवन कऽ बाद वा पोटी बहुड्डो नही बोवत . 
५ . गऊर : सवासिन बाईलोग गऊर बोवस . जल्मास्टमी कऽ दिन बहुड्डा सरखीच गऊर बोवस . काजरतीज कऽ दिन वोकी पूंजा मांडस . पूंजा मऽ घट , मक्को , धतुरा को फल , काकडी , फल धरस . गऊर कऽ मंझार मऽ रेती आन् हरद की पिंड बनावस . येनऽ दिन सवासिन बाई निरजला उपास करस . हात मऽ नवा काकन - बंगडी , मेहंदी आन् पाय पर माहुर / अल्ता लगावस . नवा कपडा पेहरस . महादेव पाराबती की पूंजा की या काजरतीज . 
काजरतीज ला च कजली तीज , हरियाली तीज , सरावनी तीज आन् मधुश्रवा तीज बी कव्हस . 

( स्त्रोत : सौ . पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .  मो. 7066911969

Wednesday, July 8, 2020

भोयरी संस्कृति - ८ : पोह्यती

भोयरी संस्कृति - ८ : पोह्यती ( राखी )
पोह्यती , पोयती , राखी रक्षाबंधन

सरावन मह्यना कऽ पुनव ला पोह्यती को तिवार आवस . भाई - बहिन कऽ येनऽ तिवार को भोयरी संस्कृति मऽ खास महत्त्व सऽ . भाई - बहिन को नातो जलमकन् भेटस... जिनगानी ला पुरकन् उरस असो साजरो नातो .

१ . मान्यताये : * भविस्य पुरान मऽ असी कथा सऽ : येकडाव देव - दानव की लढाई चालू भयी . देवना को पाड्डो झुकन ला लाग्यो . राजो इंदरदेव भेबार गया . इंदरदेव ' गुरू बृहस्पती ' कऽ जवर गयो . वहान बसी इंदरदेव की लाडी ' इंद्राणी ' सबन बात आयकत होती . वोनऽ येक रेसमी धागो मंतऱ्यो . गुरू नऽ वू भारे ती धागो इंदरदेव कऽ हात ला बांधे . वू दिन होतो सरावन पुनव को . वा लढाई इंदरदेव नऽ जिती . तब पासून सरावन पुनव कऽ दिन राखी बांधन को रिवाज पड्यो .
* महाभारत मऽ भगवान किसनदेव आन् धुरपदा ( द्रौपदी ) की कथा मऽ सिसुपाल संग कऽ लढाई मऽ किसनदेव कऽ उंगल ला घाव भये . ' द्रौपदी नऽ आपलऽ पदर को कपडो फाडकन् उंगल ला बांध्यो . वू दिन बी सरावन पुनव को होतो . 
* वामन अवतार मऽ बी राखी की कथा सऽ . बिस्नूभगवान नऽ बलि राज्या ला हराये . पर राज्या बलि नऽ आपलऽ  भक्ती कऽ तप कन् भगवान पासिन रात - दिन आपलऽ आघऽ रव्हन को बचन लेयो . इतऽ बिस्नूभगवान घर नही आये तऽ लक्षुमी देवी परेस्यान भयी . तब नारदमुनी नऽ जुगत सांगी . लक्षुमी देवी नऽ राज्या बलि ला पोह्यती बांधकन् भाई बनायो , आन् बिस्नूभगवान ला घर लायो . उ दिन बी सरावन पुनव को होतो . 
* गनपती का पोटुना ( सुभ आन् लाभ ) ला येक बहिन पाह्यजे होती . तब गनपती नऽ होम करकन् संतोसी मा को आव्हान कऱ्यो . पोह्यती , सुभ , लाभ आन् संतोसी मा कऽ नाता कऽ याद मऽ बी यी तिवार मनावस . इ विधान भी सरावन पुनव कऽ दिन सकार कऽ बेरा भयो. , तेकन पोह्यती तिवार मनावस .

२. इतिहास को झरोखो :  * सिकंदर कऽ  लाडी नऽ पुरू राज्या ला पोह्यतो बांधकन् भाई बनायो आन् सिकन्दर ला नही मारन को बचन लियो .
* मेवाड की रानी कर्मावती नऽ बहादूरस्या कऽ भेवकन् हुमायून ला राखी पठायी ,  आपलो राज बाचाडन साठी . 
* राजपूत जब लढाई पर निकरता तब उनकी लाडीना उनला कुकू को टिरो लगायकन् हात मऽ रेसम को दोरो बांधत होता . 
३. पोह्यती को अनोखो रूप :  पोह्यती  ला उत्तरांचल मऽ ' श्रावणी ' कोस . महाराष्ट्र मऽ नारियल पुनव , राजस्थान मऽ राखी , कही सावनी तऽ कही सलूनो कोस . उसो येनऽ तिवार को आधिकारिक नाव रक्षाबंधन सऽ . 
राखी कच्चो सूत , रेसम , सोना - चांदी कन् बनावस .
पोह्यती भाई - बहिन कऽ नाता को खास तिवार सऽ . राखी बामन  , गुरू , परिवार की नानी पोटी बी नातलग ला बांधस . 
अमरनाथ की यात्रा आखाडी ला चालू होयकन् पोह्यती ला पूरी होस .
४ . देवराखी :  येनऽ राखी ला राजस्थान मऽ रामराखी कव्हस . लाल सूत पर पिवरऽ रंग वालऽ गुच्छा वाली देवराखी भगवान ला , दरुजा ला , आलमारी ला , मिसीन - गाडी - मोटर ला , घर ला बांधस . पूंजापाठ मऽ हात ला जी दोरो बांधस वोला बी राखी कोस . 
५. पोह्यती ला बहुड्डा की पूंजा करकन् वोला राखी वाह्यस .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
मो. 7066911969

Tuesday, July 7, 2020

भोयरी संस्कृति - ७ : नागपंचमी

भोयरी संस्कृति - ७ : नागपंचमी

सरावन मह्यना कऽ चांदनी पंचमी ( शुक्ल पंचमी ) ला ' नागपंचमी ' को तिवार आवस . नाग ला भगवान महादेव कऽ आंग को गह्यनो मानस . वासुकी भगवान महादेव आन् सेसनाग बिस्नुदेव कऽ सेवा मऽ रव्हस . पुरान कऽ अनुसार सूर्व्यदेव कऽ रथ मऽ बारा नाग सऽ , बारा मह्यना का वाहक . राम अवतार मऽ लक्षुमन आन् किस्नऽ अवतार मऽ बलराम कऽ रूप मऽ सेसनाग नऽ अवतार लियो . गनपती कऽ कंबर मऽ लिपट्यो नाग विस्व ( विश्व ) कुंडलिनी आन् वोनऽ नाग को फनो जागरुत कुंडलिनी . पुरी दुनिया सेसनाग कऽ फना पर टिकीस असी मान्यता सऽ . पुरान मऽ नाग ला पाताल लोक को राजो मानस . 
पुरान मऽ नाग का पाच कुर मान्यास : अनंत ( सेसनाग ) , वासुकी , तक्षक , कर्कोटक , पिंगला . कयी पुरान मऽ नव कुर मान्यास : वासुकी , तक्षक , कुलक , कर्कोटक , पद्म , स्यंख , चुड , महापद्म , धनंजय . 
१ . मान्यताये : येनऽ दिन जमुना नदी मऽ किस्नऽ भगवान नऽ कालिया मरदन कऱ्यो आन् वोला वरदान बी देयो कऽ पंचमी ला तोरी पूंजा होयेन . 
समुद्र मंथन मऽ वासुकी नाग ला बापरे . देव - दानव कऽ येनऽ समुद्र मंथन मऽ निकऱ्यो जह्यर भगवान महादेव नऽ पे . पर पेन कऽ बखत जह्यर का ठेंबना सरप कऽ मुंडा मऽ पड्या . तेकन नागदंस पासून बाचन साठी भगत लोगना नऽ नागपंचमी की पूंजा चालू करीस . 
नाग माय लक्षुमी , धन की रखवाली ( रक्षण ) करस . तेकन धन संपत , सुख , उन्नती साठी नागपंचमी की पूंजा करस , येकन धन लक्षुमी को आसिरवाद भेटस . 
२ . नागपंचमी पूंजा :  नागपंचमी कऽ दिन खेत मऽ नागरनो , बखरनो नही करत . भाजीपालो चिरत नही , तावो बापरत नही . 
नागपंचमी ला चवरी जवर आन् दरुजा कऽ दुय बाजू कितऽ तूप कन् नागोबा , बिचू को चितरंग काहाडस. हरद कुकू लगायकन् उनकी पूंजा करस . कढई , लाही - फुटाना को निवद धरस . घर आन् खेत कऽ चारी कोनटा पर लाही - फुटाना को निवद धरस. मध्यप्रदेश म गुजिया ( करंजी ) , पापडी , खिचडा को बी निवद धरस... नागपंचमी ला गुंजी , सवारी , बडा फुलोरो धरस .
पुरानऽ जमाना मऽ पाटी पर नागोबा काहाडकन् आन् कढई , लाही - फुटाना को निवद , बेल - फुल , उदबत्ती लेकन सिकनारा पोटु - पोटीना स्यारा मऽ जात होता . स्यारा कऽ फरा पर गुरजी मोठ्ठो नागोबा काहाडत होता . सबन झन पूंजा पाती करकन् स्येरनी बाटत होता . 
महाराष्ट्र आन् मध्यप्रदेश मऽ नागद्वार की यात्रा को को बी खूब चलन सऽ . 
पह्यले गारोडी लोगना पूंजासाठी जितऽ नाग ला गाव गाव मऽ ल्यावत होता . आबऽ येपर कायदाकन् बंदी सऽ . 
नागपंचमी ला लाही फुटाना संगच सातू को बी मोठो मान सऽ .
३ . भोयरी संस्कृति :  भोयरी संस्कृति नऽ झाड - पेड , जनावर - पाखरू , नदी - पहाड , सूर्व्य - चंदर इन सबन संगऽ आत्मीय सम्बंध जोडन की कोसिस करी . आज क दिन बहुड्डो बोवस.
आपलो देस खेती - किसानी वालो होतो आनऽ सऽ . नाग खेत की रखवाली करस तेकन वोला खेत्रपाल ( क्षेत्रपाल ) कव्हस . फसल को नुकसान करनीवाला जीव जंतू को नास करकन् नाग फसल ला बचावस / बाचाडस .

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .
मो . 7066911969

Monday, July 6, 2020

भोयरी संस्कृति - ६ : जिवती

भोयरी संस्कृति - ६
* जिवती *
आखाड कऽ अवस को जिवती तिवार भोयर समाज को खास तिवार सऽ . जिवती कऽ दुसरऽ दिन पासून सरावन मह्यनो लागस . जिवती पासून पोरा पावतर सरावन मह्यनामऽ मासमच्छी नही खात . 
सरावन मह्यनाकऽ पुनव ला सरावन नक्तिर रव्हस तेकन वोनऽ मह्यना ला सरावन कोस .
१. उसो देख्या जाय त् जिवती देवी पोटुबाटूना की राखन / रखवाली ( रक्षण ) करनी वाली माय . वा लक्षुमी को च रूप सऽ . 
कहान कहान सवासिन ला जेवाडन को बी रिवाज सऽ . येनऽ दिन पोटुबाटूना ला वोवारस . पोटुना घर पर नही होयेन त् जेनऽ दिस्याला होयेन वोनऽ दिस्या मऽ अकसिद् फेककन् पूंजा करस .जिवती ला सरावन बाळ की बी याद करस . 
२. चऊर कऽ पीठ को रंग बनायकन् चवरी जवर की दिवाल पर डवरो - डुपन , बखर , तिफन , नागर , खासर , असा खेती कऽ काम कऽ साधन को चितरंग काहाडस . वोकऽ संगच पोटुबाटूना , बयील जोडी , गडी मानुसना को बी चितरंग काहाडस . वोनऽ चितरंग ला चवखुटी रेस काहाडकन् फ्रेम बनावस . हरद कुकू , अकसिद , पिवरऽ धागा कन् उनकी पूंजा करस . 
३ . आपलो देस कास्तकारी जीवन को . येनऽ तिवार मऽ वोकी झलक दिसस . पोटूबाटूना संगच खेतीकाम का अवजार ( साधन ) गडी मानुसना , बयीलजोडी पर बी भोयर समाज पोटुबाटू सरखोच माया करस . जिवती माय ला कोस कऽ म्हरऽ पोटुबाटूना संगच इनको बी ध्यान राखो . ..... किरपा करो . 
४ . जिवती कऽ दिन बाढी / खाती उंबरा पर खिरो ठोकस . असुभ गोस्टऽ ना उंबरा कऽ अंदर नही आया पायजेन तेकऽ साठी यी सुभसकुन . सुनार जिल्याटिन कऽ कागज की जिवती बाटस आन् येक दरुजा कऽ गनेसपट्टीपर लगावस . सुनार की जिवती दरुजा पर , चवरी पर , पेटी पर , संदूक पर बी लगावस . यी आबादानी को सुभसकुन / प्रतिक सऽ . बाढी - सुनार ला घर की लक्षुमी गहू , जवारी , चऊर , दार असो सिधो ( वाढनी )  देस . 
५ . आपलऽ पोटुबाटू की जीवन जोत खूब साल पावतर चांगली रह्या पायजे , खेती - कास्तकारी चांगली रह्या पायजे / चली पायजे येको आसिरवाद जिवती माय येनऽ दिन देस .

( स्रोत : पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
7066911969


Sunday, July 5, 2020

* ढग काळे पांढुरके *

🌧️ ढग काळे पांढुरके 🌧️

ढग काळे पांढुरके
नभी आशेचा सागर
ढग काळे काजळात
डुचमळते घागर

          ढग काळे पांढुरके
          देह विठूचा आगर
          ढग माळे काळजात
          मनराऊळी जागर

ढग काळे पांढुरके
ओली फसवी सगर
ढग गाळे इंद्रधनू
पायी चुरडे तगर

          ढग काळे पांढुरके
          शब्द कालीदास भर
          ढग पाळे प्रेमधर्म
          शोधे अलका नगर

ढग काळे पांढुरके
भावनेचीया पाभर
ढग भाळे मातीवर
थेंबा कोंबात पाझर

©️✒ सुरेश महादेवराव
           देशमुख , नागपूर

Saturday, July 4, 2020

अंकिता

⚜ अंकिता ⚜

नावातच अंकित झाली ह्या पुरुषी मानसिकतेच्या गिधाडांची..
आदिम अवस्थेत असताना एका ज्येष्ठ आईच्या आज्ञेत असणारे कुटुंब आज तिच्याच मुळावर उठलेत... असे कसे ? 
निसर्गाशी तादात्म्य पावलेले आदिम जीवन कष्टाचे.. जोखमीचे होते. स्थिर नव्हते. रोज नव्या बदलांना सामोरे जाताना ते गोंधळले जरूर पण तुटले नाही. ... लवचिक राहाले. लिंगभेद माहीत नसणारा.... बाकी प्राण्यांपेक्षा शरीराने कमकुवत असणारा मानवप्राणी आज हिंस्र पशू का झाला ? 
ह्या माय माऊलींच्या कल्पकतेने , ज्ञानाने , जिज्ञासेने, निरीक्षण बुध्दीने अन्न निर्मितीचा सुलभ उपाय आपल्याला गवसला ; तो शेती ! भटक्या जीवनाला व अन्नासाठी दाही दिशा फिरणाऱ्या मानवाला स्थिरता आली ती शेतीमुळे. आजच्या प्रगतीची मुहूर्त मेढ उभारल्या गेली. साहित्य प्रसवले.. निसर्गाचे गुढ उकलले. दुसऱ्या टोळ्यांना जिंकून , गुलाम बनवून त्यांना शेतीसाठी राबवले व येथेच माशी शिंकली. गुरेढोरे , गुलाम ह्यांच्या कक्षेत भिरकावून दिली गेली स्त्री..अनंत काळासाठी. ती आता कुटुंबाची सदस्य न राहता वस्तू बनत गेली. यंत्र बनली भोगाचा. साथीच्या आजारा सारखी पसरत गेली पितृसत्ताक कुटुंबपद्धती च्या समाजाची साथ. उध्वस्त केले त्या ' स्त्री ' नावाच्या वस्तूचं जीणं . रक्ताच्या थेंबा थेंबात भिनली ती पिढ्यान् पिढ्या. वस्तू म्हटले की किंमत आपोआप चिपकते.. कपाळावरच्या कुंकू सारखी. मुलं जन्माला घालणे, एवढेंच त्या यंत्राचे काम . बाजारभावाप्रमाणे विकत घ्यायचं , नाही तर पळवून न्यायचं, नाही तर हिसकावून घ्यायचं.... उपभोगायचं.. संपलं ; ह्या पलिकडे अस्तित्वच काय तिचं ? 
सगळे नियम , संस्कार स्त्रियांसाठी. ... शील , चारित्र्य वगैरे चकचकीत वेष्टणासहित. नर आणि मादी ह्या एकाच नात्याभोवती परिक्रमा करतो आमचा मेंदू ; मग तो देव असू देत का दानव असू देत __ सगळे ह्याबाबतीत सारखेच ! 
एका सक्षम व सारख्याच असणाऱ्या सृजनशील मादीला ' नरकाचे द्वार ' म्हणण्यापर्यंत कुजलेत आमचे विचार , सडलेत मन , रडलेत पितर .
  ' मुलगी वाचवा , मुलगी शिकवा ' हा स्लोगन चक्क आरसा आमच्या प्रशासनाचा.. समाजाचा. जाहिरात करताना गहाण बुध्दी व माणुसकी सुध्दा ! 
' मुलगी वाचवा ' असे लिहिताना टराटरा बुरखा फाटतोय ह्या भुसभुशीत , विकृत पुरुषी समाजमनाचा. 
' मुलगी वाचवा ? , म्हणजे ह्याआधी ती मारायची , शिकार करायची गोष्ट होती ? डोकं सुन्न होतं.
बलात्काराचे गुन्हे वाढण्याचे कारण निर्लज्ज पणे सांगता काय ? --- फॅशन , तोकडे कपडे..
कै. विद्या बाळ विचारतात , स्त्री निर्वस्त्र असली म्हणून तिला उपभोगायचच , हे पुरुषी मनात येतच का ? 
त्याचं उत्तर आहे , हजारो वर्षांपासून तिला अलगद माणसांतून काढून वस्तूत नेवून ठेवण्याचे विखारी षडयंत्र . आणि अशा घटना म्हणजे पुरुषी मानसिकतेच्या अहंकाराचे विषारी फुत्कार. पाखंडी तर एवढे की देवीच्या मखरात ही बसवायचं आणि सरणावर जिवंत ही पेटवायचं...
___ अंकिता , तुझ्या वेदनेला आम्ही ही कारणीभूत आहो... 

©✒ सुरेश महादेवराव
             देशमुख , नागपूर

भोयरी संस्कृति - ५ : आखाडी

# भोयरी संस्कृति - ५ #
* आखाडी ( आषाढ पौर्णिमा ) *
Bhoyar people - bhoyari culture
( Article language : bhoyari _ भोयरी )

१. आबोहवा : येनऽ बखत ला ना जास्त गरमी रव्हस ना ठंडी . सारऽ माहोल मऽ हिवरो पन आन् खुसी भरकन् रव्हस. बोवनी को काम निपट्ये रव्हस . थोडी सी निचनताई आन् चारीठाव हिवरो हिवरो ! ..... नदी नाला को झुरझुर बह्यनो... सारऽ कितऽ चैतन आन् खुसी रव्हस . 
२. दिन / मह्यनो विसेस :  आखाड कऽ कर्क संगरात ला सूर्व्यदेव को ' उत्तरायण ' पुरो होयकन्  ' दक्षिणायन ' चालू होस. ' उत्तरायण ' भगवान को दिन आन् ' दक्षिणायन ' उनकी रात रव्हस . तेकन आखाड कऽ येकादसी ला ' देवशयनी ' येकादसी कोस. महाराष्ट्र मऽ इठ्ठल कऽ पंढरपूर की वारी ला खूब महत्व सऽ . इस्नुदेव को रूप इठ्ठल आपला दुय हातना कमर पर धरकन् उभो सऽ . वोकऽ हात मऽ कोनतोच अवजार ( शस्त्र ) नहाय . देव कऽ येनऽ रूप ला ' तारक स्वरूप ' कोस . तुरसी , मंजिरी आनऽ वोकी माला ला बी खास महत्त्व सऽ . तुरसी ( तुलसी ) ' श्रीलक्ष्मी ' को प्रतिक आन् वा ' विष्णूतत्व ' ला जागरुत करस . 
३ . आखाडी ( गुरूपौर्णिमा ) : गुरू पुनव कऽ दिन ' पह्यलो गुरू ' व्यास मुनी की जयंती मनावस . गुरू व्यास सावरा होता तेकन  ' कृष्ण ' आन्  द्विप पर पल्या - बढ्या तेकन द्वैपायन यी बी उनकोच नाव सऽ . गुरू व्यास की माय सत्यवती ( मत्स्यगंधा ) आन पिता ' ऋषी पराशर ' . पह्यले सबन वेद येकमच मिसर - मासर होता , तेकन उनला समझनो , अभ्यास करनो मुसकिल काम होतो . गुरू व्यास नऽ वोला चार भाग मऽ बाटकन् ढंगकन् आन् सोपो करकन् लिख्यो , तेकन आपन ला चार वेद बाचन ला भेट्यास . वोकऽ बाद मऽ पाचवो वेद लिखन को उनकऽ मन मऽ होतो , आनऽ  " महाभारत " येनऽ  महाकाव्य की रचना भयी . उन नऽ ' अठरा पुराण ' लिख्या . 
नाथ संप्रदाय मऽ बी गुरू आन् गुरू परम्परा की मोठी महत्ता सऽ . नाथ संप्रदाय को आदि गुरू भगवान ' शिव ' . मच्छिंद्रनाथ ला संप्रदाय को कुलपुरुस मानस . पर नाथ संप्रदाय को बिखराव ला जोडकन्  , देस - विदेस मऽ वको फयलाव कऱ्यो गुरू गोरखनाथ नऽ , तेकन गुरू गोरखनाथ ला नाथ संप्रदाय को संस्थापक मानस . गुरू मच्छिंद्रनाथ को भाई गुरू जालंधर नाथ . उज्जैन को आपलो राजो भर्तृहरी बी राजपाट सोडकन् नाथ संप्रदाय मऽ गुरू बन्यो . ( सम्राट विक्रमादित्य को मोठो भाई ) . आज नाथ संप्रदाय वाला जी गाना बोलस / कव्हस वूइ गुरू भर्तृहरी की च रचना ना सऽ . आपलऽ कितऽ ज्या ' बारी ' कोस वा नाथ संप्रदाय की देन सऽ . आखाडी ला गुरू ( बारी , सरप - बिचू को मंतर ) आपलऽ चेला ला गंडो बांधस , आन् वोका मंतर ना उजवस . 
उसो त् हर मानुस को पह्यलो गुरू माय बाप च रव्हस.
४. पीतर आनऽ सेंदऱ्या देवना की पूंजा :  आपन पीतर पूजक लोगना . जिन नऽ आपनला या दुनिया दिखाडीस उनको उपकार आपन कभी भी नही भूलत. आपलऽ कुर का जी लोगना परलोक गयास उनला चांदी मऽ घडायकन् उनकी पूंजा करस. उनला मानिनी कोस . इच आपला पीतर ! जी पान लागकन् मरे वोला चांदी कऽ नागोबा कऽ रूप मऽ घडावस . जेला बाघ नऽ खायतो वोको ' वाघोबा ' को ठानो बांधस . पोटु बाटुना का जावरा वहानच काढस . 
सेंदऱ्या देवना सुपारी नैतऽ तीरथ पर का खडाना का रव्हस . इनकी संख्या ' विषम ' च रव्हस , जसी पाच - सात - नव . सुपारी गनपति , बरमा ( ब्रम्हदेव ) , यमदेव , वरुणदेव , इंद्रदेव को प्रतिक रव्हस . कोनतऽ बी काज काम , सुभकार्य  मऽ पह्यली पूंजा गनपति की होस . ' ब्रम्हदेव ' नऽ  या दुनिया बनायीस . यमदेव आखरी सत्य सऽ . वरुणदेव साधारन जल देव नही तऽ वेद मऽ को प्रमुख देव सऽ . इंद्रदेव सर्ग को राजो . 
सुपारी मऽ जीता देव को स्थान रव्हस . सेंदूर ला मंगल को प्रतिक मानस . सेंदऱ्या देवना ला सेंदूर लगावस आनऽ मानिनी ला हरद कुकू वाहस . येनऽ कुर देवता की पूंजा कुरकाच लोगना कर सकस आनऽ परसाद / सेरनी बी कुरकाच लोगना ले सकस . आखाडी ला इनकी पूंजा होस . 
५. ब्याह कऽ बाद की पह्यली आखाडी : आखाड मऽ बोवनी होय जास . निंदन - डवरन को बी येक - दुय फेर होय जास . थोडी सी निचनताई भेटस तऽ तिवार की लाईन लागस . आखाडी कऽ  तिवार ला येनच साल ब्याही पोटी ला लेन ला जास . आखाडी वोको माह्यरऽ को पह्यलो तिवार . नवी जिनगानी की आपाधापी मऽ दुय चार दिन माह्येर को आराम आनऽ माय बाप कऽ लाड प्यार की सुख की बरसाद मऽ बह्य जास वोकी तकलिफ... असो साजरो रिवाज . 

 ( स्रोत : सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख ) 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 
मो . 7066911969

Friday, July 3, 2020

भोयरी संस्कृति - ४ : लोकचित्रकला

# भोयरी संस्कृति - ४ #
* लोकचित्रकला की अनोखी भोयरी संस्कृति *
लोकचित्रकला : तिवार , ब्याह, संस्कार , सुभ घडी पर होन वाली चित्रकारी भोयर समाज मऽ थोडऽबूत फरक सोडकन् येकसारखीच सऽ , मंग वूई महाराष्ट्र का वर्धा - नागपूर जिला रहे या मध्यप्रदेश का बैतूल - छिंदवाडा जिला . 
लोकचित्रकला कला कला को आदिम रूप आय. येनऽ लोकचित्रकला मऽ सूर्व्य , चंदर , पीतर , जनावर , पाखरु , बाई , मानुस , भगवान , गाय - बइल , पोटु - बाटू , भाई - बहिन ,कमल , बेल - फूल - पत्ती , भूमिती की आकृती , सस्तिक , नागोबा , हत्ती , घोडो , रथ , पालखी , झाड काहाडकन् अमूर्त ला मूर्त रूप देन को सार्थक प्रयास करना मऽ आवस. लोकचित्र कला का प्रतिक आनऽ मतलब को अभ्यास इ अलग च चिंतन को विस्यय सऽ , जी आज कऽ जुग मऽ जरुरी सऽ . येमकऽ चितरंग का कई रूप सऽ . येक ही चितरंग का लय मतलब निकरस. येनऽ चित्रकला मऽ अनगढ साजरपन आनऽ अनोखोपन सऽ . येनऽ अनगढता कऽ कारन वोमऽ फयलाव ( विस्तार ) की अनन्त सम्भावना रव्हस. या कला हर बार नवी लागस पर येमऽ कई असा तत्व बी रव्हस जी मूल स्वरूप ला बनायकन् राखस. येनऽ कला को समग्र नजरियो , या बडी बात सऽ . या कला येकलऽ मानुस साठी नही त् समाज साठी रव्हस , जी सहजीवन की प्रेरना देस. येमऽ सहज अभिव्यक्ती , जन - जन की आस्था आनऽ सुखदुख की कथा रव्हस. या कला सिरफ सुभसकुन , उपरी उपरी की सुन्दरता च नही रव्हस तऽ वोमऽ गह्यरो साजरपन , सीख , प्रेरना रव्हस .
चितरंग / चऊक काहाडन की जागा : चवरी जवर की दिवाल , चवरी आघऽ की जागा , दरुजा जवर की दिवाल , दरुजा जवर की जमीन , दाठ्ठो , तुरसी जवर की जागा , आंगनो , ज्यान पूंजा मांडी वा जागा , चवरंग कऽ खलतऽ की जागा , बोहला की जागा , मोह्यतूर की डेर - माथनी जवर की जागा , मोह्यतूर की जागा , दिवा - कलस कऽ भोवताल ....
चितरंग काहाडन को , चऊक पूरन को सामान / साधन : गेरु , चुनो , गहू को पीठ ( आटो ) , तूप , हरद , चऊर को पीठ , रांगोरी , कुंभार को रंग ,  कुची ( बरस ) , रु लपेटी आगकाडी , साच्यो , ठप्पो , आपला बोट ( उंगली ) ना ...
बेगरऽ बेगरऽ परसंग , सन तिवार ला बेगरो बेगरो रंग को माध्यम आनऽ डिझाईन का चितरंग काहाडन की / चऊक पूरन की भोयरी परम्परा आनऽ संस्कृति सऽ .
१. जीवती : चऊर कऽ पीठ को रंग बनायकन् चवरी / दिवरा कऽ जवर की दिवाल पर डवरो - डुपन , बखर , तिफन ,नागर बंडी असा खेती कऽ काम का साधन को चितरंग काहाडस . वोकऽ संगच बइल जोडी ,गडी मानुसना को बी चितरंग काहाडस . वोनऽ चितरंग ला चवखुटी रेस काहाडकन् फ्रेम बनावस . हरद - कुकू - अकसिद , पिवरं धागा कन् पूंजा करस. 
२. नागपंचमी : नागपंचमी ला चवरी जवर आनऽ दरुजा कऽ दुय बाजू कितऽ तूप येनऽ माध्यम को बापर करकन् नागोबा , बिचू का चितरंग काहाडस / लिखस . हरद - कुकू , अकसिद लगायकन् उनकी पूंजा करस . 
३. पोहती / पोयती ( रक्षाबंधन ) : पोयती कऽ दिन कुंभारी रंग बापरकन् बहुड्डो लेकन पोटी , पालखी , तलवार लेकन घोडापर बस्या भाईना , हत्ती असा दिवाल भर चितरंग काहाडस . उनकी बी हरद - कुकू , अकसिद लगायकन् पूंजा करस.
४. गोकुळाष्टमी / जन्माष्टमी : येनऽ दिन तूप कन् चितरंग काहाडस. भगवान किस्नं , गोप - गोपी , गवळनना , गाय - बासरुना असो गोकुळ को चितरंग काहाडस . येला पन् चवखुटी बाॅर्डर काहाडस . आन् इनकी पूंजा करस.
५. पोरो ( पोळा ) :  पोरा कऽ दिन गेरु कन् जू ला रंगायकन् दाठ्ठा मऽ धरस. चवरी जवर कऽ दिवाल पर जेतरा भाईना होयेन उनका हरद कन् चितरंग काहाडस . आन् वोकी बी पूंजा करस.
६. सराध ( श्राध्द ) : सराध मऽ चौथ , पंचमी , सप्तमी असो जेनऽ दिन जमेन वोनऽ दिन कागुर डावस . पीठ कन् घर मऽ आवनीवाला पीतर का पायना काहाडस . नवमी ला सवासिन पीतर की पूंजा करस. 
७ . अखरपक ( सर्वपित्री दर्श अमावास्या ) : अखरपक कऽ दिन पीठ कन् पीतर का घर कऽ बाहिर जातानी का पायना मांडस . दरुजा ला तूप लगावस . पीठ कनच जमीनपर पीतरना काहाडस . वोकऽ वरतऽ दिवाल मऽ सलाक / सरुता मऽ सवारी - बडो टोचकन् धरस . वोकऽ खलतऽ निवो धरस . बाद मऽ सवारी - बडा परीन तूप सोडस जी ठेंब ठेंब निवा पर पडस . येला पीतर की स्यिदोरी कव्हस. 
८. दिवारी / गायगोंदन : गायगोंदन कऽ दिन दुय हात की मुठना गेरु मऽ भिजायकन् आंगना मऽ वोका ठप्पा मारस. वुई गाय कऽ खुर वानी दिसस . 
९ . रथसप्तमी :  रथसप्तमी पुस मह्यनाकऽ हर इतवार की सूर्व्यपूंजा होन कऽ बाद मऽ आवस . आपलो जीवन सूर्व्याकनच सऽ . येनऽ दिन आंगना मऽ तुरसी जवर रांगोरी कन् रथ पर सवार सूर्व्यदेव को चितरंग काहाडस. पिडा पर वोकऽ नाव्हन धोवन साठी सारो सामान , आयनो , तेल , फनी - कंगवो धरस . वहानच गवरी पर गाडगा मऽ  उतू जायेन असो खीर को निवद / परसाद बनावस . हरद - कुकू , अकसिद कन् सूर्व्यदेव की पूंजा करस .

( स्रोत : सौ . पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर   मो. 7066911969

भोयरी संस्कृति - ४ : लोकचित्रकला

# भोयरी संस्कृति - ४ #
* लोकचित्रकला की अनोखी भोयरी संस्कृति *
लोकचित्रकला : तिवार , ब्याह, संस्कार , सुभ घडी पर होन वाली चित्रकारी भोयर समाज मऽ थोडऽबूत फरक सोडकन् येकसारखीच सऽ , मंग वूई महाराष्ट्र का वर्धा - नागपूर जिला रहे या मध्यप्रदेश का बैतूल - छिंदवाडा जिला . 
लोकचित्रकला कला कला को आदिम रूप आय. येनऽ लोकचित्रकला मऽ सूर्व्य , चंदर , पीतर , जनावर , पाखरु , बाई , मानुस , भगवान , गाय - बइल , पोटु - बाटू , भाई - बहिन ,कमल , बेल - फूल - पत्ती , भूमिती की आकृती , सस्तिक , नागोबा , हत्ती , घोडो , रथ , पालखी , झाड काहाडकन् अमूर्त ला मूर्त रूप देन को सार्थक प्रयास करना मऽ आवस. लोकचित्र कला का प्रतिक आनऽ मतलब को अभ्यास इ अलग च चिंतन को विस्यय सऽ , जी आज कऽ जुग मऽ जरुरी सऽ . येमकऽ चितरंग का कई रूप सऽ . येक ही चितरंग का लय मतलब निकरस. येनऽ चित्रकला मऽ अनगढ साजरपन आनऽ अनोखोपन सऽ . येनऽ अनगढता कऽ कारन वोमऽ फयलाव ( विस्तार ) की अनन्त सम्भावना रव्हस. या कला हर बार नवी लागस पर येमऽ कई असा तत्व बी रव्हस जी मूल स्वरूप ला बनायकन् राखस. येनऽ कला को समग्र नजरियो , या बडी बात सऽ . या कला येकलऽ मानुस साठी नही त् समाज साठी रव्हस , जी सहजीवन की प्रेरना देस. येमऽ सहज अभिव्यक्ती , जन - जन की आस्था आनऽ सुखदुख की कथा रव्हस. या कला सिरफ सुभसकुन , उपरी उपरी की सुन्दरता च नही रव्हस तऽ वोमऽ गह्यरो साजरपन , सीख , प्रेरना रव्हस .
चितरंग / चऊक काहाडन की जागा : चवरी जवर की दिवाल , चवरी आघऽ की जागा , दरुजा जवर की दिवाल , दरुजा जवर की जमीन , दाठ्ठो , तुरसी जवर की जागा , आंगनो , ज्यान पूंजा मांडी वा जागा , चवरंग कऽ खलतऽ की जागा , बोहला की जागा , मोह्यतूर की डेर - माथनी जवर की जागा , मोह्यतूर की जागा , दिवा - कलस कऽ भोवताल ....
चितरंग काहाडन को , चऊक पूरन को सामान / साधन : गेरु , चुनो , गहू को पीठ ( आटो ) , तूप , हरद , चऊर को पीठ , रांगोरी , कुंभार को रंग ,  कुची ( बरस ) , रु लपेटी आगकाडी , साच्यो , ठप्पो , आपला बोट ( उंगली ) ना ...
बेगरऽ बेगरऽ परसंग , सन तिवार ला बेगरो बेगरो रंग को माध्यम आनऽ डिझाईन का चितरंग काहाडन की / चऊक पूरन की भोयरी परम्परा आनऽ संस्कृति सऽ .
१. जीवती : चऊर कऽ पीठ को रंग बनायकन् चवरी / दिवरा कऽ जवर की दिवाल पर डवरो - डुपन , बखर , तिफन ,नागर बंडी असा खेती कऽ काम का साधन को चितरंग काहाडस . वोकऽ संगच बइल जोडी ,गडी मानुसना को बी चितरंग काहाडस . वोनऽ चितरंग ला चवखुटी रेस काहाडकन् फ्रेम बनावस . हरद - कुकू - अकसिद , पिवरं धागा कन् पूंजा करस. 
२. नागपंचमी : नागपंचमी ला चवरी जवर आनऽ दरुजा कऽ दुय बाजू कितऽ तूप येनऽ माध्यम को बापर करकन् नागोबा , बिचू का चितरंग काहाडस / लिखस . हरद - कुकू , अकसिद लगायकन् उनकी पूंजा करस . 
३. पोहती / पोयती ( रक्षाबंधन ) : पोयती कऽ दिन कुंभारी रंग बापरकन् बहुड्डो लेकन पोटी , पालखी , तलवार लेकन घोडापर बस्या भाईना , हत्ती असा दिवाल भर चितरंग काहाडस . उनकी बी हरद - कुकू , अकसिद लगायकन् पूंजा करस.
४. गोकुळाष्टमी / जन्माष्टमी : येनऽ दिन तूप कन् चितरंग काहाडस. भगवान किस्नं , गोप - गोपी , गवळनना , गाय - बासरुना असो गोकुळ को चितरंग काहाडस . येला पन् चवखुटी बाॅर्डर काहाडस . आन् इनकी पूंजा करस.
५. पोरो ( पोळा ) :  पोरा कऽ दिन गेरु कन् जू ला रंगायकन् दाठ्ठा मऽ धरस. चवरी जवर कऽ दिवाल पर जेतरा भाईना होयेन उनका हरद कन् चितरंग काहाडस . आन् वोकी बी पूंजा करस.
६. सराध ( श्राध्द ) : सराध मऽ चौथ , पंचमी , सप्तमी असो जेनऽ दिन जमेन वोनऽ दिन कागुर डावस . पीठ कन् घर मऽ आवनीवाला पीतर का पायना काहाडस . नवमी ला सवासिन पीतर की पूंजा करस. 
७ . अखरपक ( सर्वपित्री दर्श अमावास्या ) : अखरपक कऽ दिन पीठ कन् पीतर का घर कऽ बाहिर जातानी का पायना मांडस . दरुजा ला तूप लगावस . पीठ कनच जमीनपर पीतरना काहाडस . वोकऽ वरतऽ दिवाल मऽ सलाक / सरुता मऽ सवारी - बडो टोचकन् धरस . वोकऽ खलतऽ निवो धरस . बाद मऽ सवारी - बडा परीन तूप सोडस जी ठेंब ठेंब निवा पर पडस . येला पीतर की स्यिदोरी कव्हस. 
८. दिवारी / गायगोंदन : गायगोंदन कऽ दिन दुय हात की मुठना गेरु मऽ भिजायकन् आंगना मऽ वोका ठप्पा मारस. वुई गाय कऽ खुर वानी दिसस . 
९ . रथसप्तमी :  रथसप्तमी पुस मह्यनाकऽ हर इतवार की सूर्व्यपूंजा होन कऽ बाद मऽ आवस . आपलो जीवन सूर्व्याकनच सऽ . येनऽ दिन आंगना मऽ तुरसी जवर रांगोरी कन् रथ पर सवार सूर्व्यदेव को चितरंग काहाडस. पिडा पर वोकऽ नाव्हन धोवन साठी सारो सामान , आयनो , तेल , फनी - कंगवो धरस . वहानच गवरी पर गाडगा मऽ  उतू जायेन असो खीर को निवद / परसाद बनावस . हरद - कुकू , अकसिद कन् सूर्व्यदेव की पूंजा करस .

( स्रोत : सौ . पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर   मो. 7066911969

Thursday, July 2, 2020

भोयरी संस्कृती - ३ : चऊक पूरनो

# भोयरी संस्कृती - ३ #
* रंग कला की अनोखी भोयरी संस्कृती *
चऊक पूरनो --- चऊक पूरनो कऽ मतलब सं जमीन पर चितरंग , सुभचिन्ह काहाडनो . चऊक को डिझाईन चवकोर रव्हस. " चऊक पूरनो " ( चौक पूरनो ) इ नाव पंजाब , हरयाना , उत्तरप्रदेश मऽ बी बापरस. येला महाराष्ट्र मऽ रांगोळी , गुजरात मऽ रंगोली , आंध्रप्रदेश मऽ मुग्गुल , तामिलनाडू मऽ कोलम , हिमाचल प्रदेश मऽ अदूपना , बंगाल मऽ अल्पना , राजस्थान मऽ मांडणा , बिहार मऽ ऐपन कव्हस . हरेक सनतिवार , पूंजापाठ , ब्याह , संस्कार , सुभ अवसर पर घर - आंगन मऽ चऊक पूरनो आपलं संस्कृति को प्रतिक सं . ' चवसठ कला ' मऽ की या येक कला सं. चूनो , गेरु , पीठ ( आटो ) , हरद , चऊर , रांगोरी कऽ माध्यमकन् चऊक पूरस. या परम्परा वैदिक काल पासून सं . 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .  7066911969

भोयरी संस्कृती - २

⚜भोयरी संस्कृती - २⚜
🚩गानो सनतिवार को🚩

पह्यली आयी आखाडी
चारी तिवार ललकारी
जीवती पोहती
नागोबा कऽ भोवती
नागोबा बसे दाठ्ठा मऽ
नागोबा को मानमोरो
आघं आये पोरो
काजरतीज की कायनी
बसी महालक्षुमी
गनपती आस्याख
पक्स्या को पात्र
नवमी की सवासिन
अखजी अखरपक
पाय पखार पक
दहा ( दस) दिन को दसरो
पाच दिन मऽ माडी
आठ दिन मऽ आठवी
सात दिन मऽ दिवारी
पोटुबाटुना करस घाई
बहिन भाईला वोवारस
बहिन ला राग मोठो
राग को करे पानी
भाई की भयी हानी
बहिन की वाचा तोडो
भाई को मरे घोडो
आघं आयो कारतिक जुरगडो
कारतिक जुरगडा ला दहीहांडी फुटी
बहिन भाई ला जायकन् भेटी

--- सौ. पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख
नागपूर

भोयरी संस्कृती -- १

⚜ भोयरी संस्कृती ⚜

🥦 पंगत मं बड की पत्ता की पतराई होयेन त् धारपोड्याना ( धारपुरे आडनाव ) वोनं पतराईपर जेवत नही...
दुसरं झाड कं पत्ता की पतराई चलस नही त् थाटी मं जेवस..

( स्रोत : पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख ) 
 
✒ सुरेश महादेवराव देशमुख
       नागपूर...