Wednesday, September 29, 2021

लक्ष्य ( कविता ). Hindi Language _ हिंदी भाषा

लक्ष्य ( कविता )
Hindi language _ हिंदी भाषा

जिंदगी का लक्ष्य सामने
रास्तें नित नये आजमाना ।

तपना श्रम की भट्टी मे
व कुंदनसा चमकना ।

धर्म अर्थ काम मोक्ष के
चारों पुरुषार्थ निभाना ।

खोज लेना अपने हिस्से की
जमीं , आसमां , आशियाना ।

काल के भाल पट पर
कुछ निशान छोड जाना ।

रचना : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, September 28, 2021

टप्या रस्ता पर काटा ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

टप्या रस्ता पर काटा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

दिठ लागेन वो तोला
तूच म्हरी जिंदगानी
आये आंग पर काटा
जब लह्यराये बेनी ।१।

देख कसो रुत्यो काटो 
डोरा म झलके पानी
तोर काटा क सल की 
म्हर आंग झनझनी ।२।

रुत्यो काटो बोराटी को
म्हरी सकवार रानी
तोर नाजूक पाय ला
भूली काटा की च अनी ।३।

धर मांडी पर पाय
वोकी देखूस निस्यानी
काटा कन च काढूस
पुस डोरा म को पानी ।४।

रोय रोय कन् मुंडो
तोरो गांजर क वानी
पापनी क केस कन
वोला अध्धर टांगनी ।५।

सोस उलीसो चटको
म्हरी हिरदा की रानी
न्हाय कुरूप को धोखो
डाग बिब्बा को कारनी ।६।

तोरी मखमाली काया
तोर चाल म हरनी
टप्या रस्ता पर काटा
बोर भराटी क वानी ।७।

म्हर पाडुकल्या बस
काहे लाजस दिवानी
तोर दुख ला झेलून
या स म्हरी वाली बानी ।८।

रचना : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Sunday, September 26, 2021

अजब गजब - ७७ : माय माल्हण बाई. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७७ : माल्हण बाई
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

देवी दूलाईह , सुरराई शग त्यां शिरै ।
मालण मंहमाईह , वसै विराई विसहय ।।
( डिंगळ बोली - दोहा )
राजपूतां मां राजवी प्रबल वंश परमार 
म्हालण धरा माड री आय लियो अवतार ।
धिन हो परमारां धीवडी , रंग हो जानरै राय 
वेरू घर वीस हाथी , अवतरी म्हालण माय ।

राजस्थान क जयसलमेर वालऽ इलाखा ला पह्यल ' माड देस ' कवत होता . १२ व सदी क सुरवात पासिन यहान राजा वेरू ( बेरीसाल ) परमार को राज होतो . आन् माड देस क राज की राजधानी होती ' जानरा '!
* उसो त जानरा कयी नाव कन् परसिध्द स : जानरागढ़ , जानरा पाटण , जूना जानरा , जूनागढ़ . 
* बेरीसाल परमार राजा का दुय पोटूना परसिध्द भया . १. जागा २. वरण . 
जागाजी का वंसज जानरा का राज संभालता आन् वरण जी का वंसज वरणागांव का राज संभालत होता . जागाजी का वंसज हरया जागाजी न वि.स. १४५५ म धाट ( पाकिस्तान ) म ' हरयार ' नाव की जागीर की स्थापना करी . 
हरयो हरयाणै , अमराणै अवतार 
दो घर धज बंधी , पृथ्वी बडा परमार ।
* असा राजा वेरू ( बेरीसाल ) क  कुर म म्हालण बाई क रूप म माय जगदम्बा न अवतार लेयो . जागा , वरण की बहिन ' माय म्हालण बाई '! म्हालण स्यबद डिंगल बोली को होय . म्हालण को मतलब होस :  खुसी , बरकत , मंगल !
* म्हालण बाई का कयी नाव परचलित स : मालू म्हालण बाई , म्हालण आई , वेराई म्हालण माई , मुगटाली , माडेची , तलैरी धणियाली , चंवरै री धणियाणी , पटोला परमार , नवलाख लोहडीयाली , हरयारराय , म्हालण सरराय , जानरैराय , धोळा मढ़ धणियाणी . हरयार धाम ( पाकिस्तान ) म म्हालण बाई की पूंजा म्हालण आई क नाव कन् करस . 
* म्हालण बाई का मूलधाम : १. जानरागढ़ २. हरयार धाट ( पाकिस्तान ) ३. धोळा मढ़ ( वरणा ) . 
* जगदम्बा अवतार म्हालण बाई न नाना लीला अन् आसिरवाद  कन्  लोगना को उध्दार करे आन् समाज म धरम नीति , न्याव की थापना करी . लोगना को भरम आन् भेव निकार कन् धरम उन को धरम म बिसवास पयदा करे . म्हालण बाई क वंसजना को भक्तिभाव म झुकाव जास्त स . 
* राजा वेरू ( बेरीसाल ) का वंसज राज करन साठी जहान बी गया , वहान वून न म्हालण बाई ला कुर देवी मान कन् पह्यल माय का ठाना  बनाया  ! 
* म्हालण बाई क गवरव गाथा को यसगान जयसलमेर , बाढ़मेर , बिकानेर , जोधपुर , गुजरात , धाट ( सिंध ) आन् कयी इलाखा म गावस . हर जागा प म्हालण बाई का भव्य देवरा ( देऊर ) , मंदिर स . येकऽ बास्त रोहिडाला ( हरसाणी ) , हरसाणी , मगरा ( कोठाधाम ) , दवाडा , म्हालणसर ( बिकानेर ) , संतोसनगर ( बिकानेर ) , जयसलमेर , बाडमेर , जोधपुर , झिनझिनयाली , लापूदडा यहान बी म्हालण बाई का परसिध्द देऊर स . 
१. मेलो : * जानरागढ़ : भादवा सुदी १४ , हरयार : माघ सुदी १४ . 
२. पेई की महिमा : हरयार धाट ( पाकिस्तान ) क धाम म आब बी म्हालण बाई को भाई जागाजी का वंसज सेवा करस . म्हालण बाई माताजी की मूरती चंवरा ( झोपडा ) म येक काठ ( लकडी ) क संदूक म बिराजस . संदूक ( पेटी ) ला सिंधी भास्या म " पेई " कोस ! या पेई ( पेटी ) हर तीसरऽ साल खुलस , तब च मातेस्वरी का दरस्यन होस . येन संदूक ला तालो लाग्येस पर वोकी चाबी ( किल्ली ) नहाय . तीन बरस बाद इ तालो ( कुलूप ) आपरंग च उघडस . येला ' पेई खुलना ' कोस . 
* या बंद पेटी जगा कुम्भार ला सापडी . तब पासिन ( ९०० बरस पासिन ) या परंपरा स . 
३. म्हालण बाई की ओरण : म्हालण बाई का जहान जहान देऊरना ( ठाना ) स , वहान देऊर क भवताल मोठो पडित ( गायरान )  अन् जंगल स . ( महाराष्ट्र म जसी देऊर की ' देवराई ' रव्हस उसी .) येन गायरान ( गोचर भूमि ) अन् रमनिक रान ला ' ओरण ' कोस . यहान गाय , बकरी , ढोर डंगर संगच हरन , ससा , सांबर , निलगाय सरखा जीव जनावर आन् मोर , बगला , चिरैय्या असा केतरा क पाखरूना रव्हस / चरस . येन देऊर क ओरण ला चवकीदार नी रवत . माय माल्हण बाई क नाव क महिमा कन् च झाड झडुला , ढोर जनावर , जीव जंतू , पाखरूना को बचाव होस . 
* मुख्य ओरण : जानरा , हरयार धाट ( पाकिस्तान ) , रोहिडाला , मगरा ओरण .
🚩 माता म्हालण बाई की जय .🚩

( सहयोग : इंजि. जालिमसिंह जी सोढा जोधपुर )
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


Saturday, September 25, 2021

यादें ( कविता ). Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें
Hindi language _ हिंदी भाषा

स्वाती नक्षत्र मे सीप में बस जाती
रंगीन पलों के इंद्रधनुष में रच जाती
सावन की फुहार , फुलों की बहार
रोम रोम में यादें रच बस जाती ।

रोज उगता सूरज सुनहरी यादें लिए
रोज नींद की आगोश मे सोती है यादें
सुहाने ख्वाबों की सुरदीर्घिका मे 
दुधीया रोशनी मे जगमगाती है यादें ।

बेहद प्रिय सभी यादों के हिरे मोती
याद नहीं , यादों का खजाना है
दिल में संजोये है हर पल को
यादों के संग संग ही जीना है ।

रचना : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Thursday, September 23, 2021

यादें. Hindi Language _ हिंदी भाषा

यादें
Hindi language _ हिंदी भाषा

स्वाती नक्षत्र मे सीप में बस जाती
रंगीन पलों के इंद्रधनुष में रच जाती
सावन की फुहार , फुलों की बहार
रोम रोम में यादें रच बस जाती ।

रोज उगता सूरज सुनहरी यादें लिए
रोज नींद की आगोश मे सोती है यादें
सुहाने ख्वाबों की सुरदीर्घिका मे 
दुधीया रोशनी मे जगमगाती है यादें ।

बेहद प्रिय सभी यादों के हिरे मोती
याद नहीं , यादों का खजाना है
दिल में संजोये है हर पल को
यादों के संग संग ही जीना है ।

रचना : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Saturday, September 18, 2021

भोयरी संस्कृति ४५ : खेंडो. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

भोयरी संस्कृति ४५ : खेंडो
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

सिंधू नदी माय क कोरा म भोयर खेल्या... नाना का मोठा भया . ४५०० बरस पह्यलऽ पासिन सिंधू संस्कृति म पराटी ( कापूस / कपास ) की खूब खेती होत होती.. कापूस को मोठो बेपार होत होतो . कपडा साठी कापूस ,  ऊन अन् रेसम को बापर होत होतो . सुती कपडा प पक्को रंग चढावन की कला बी मालूम होती . वासिन दुनिया म कपडा को मोठो बेपार होतो . सिंधू संस्कृति क पतन क बाद बी कपडा को बेपार होत च होतो . 
कपडा पेहरन को परकार जाति , भूगोल , हवा पानी , संस्कृति परंपरा क हिसाब कन् रव्हस ‌.
१ . इतिहास : * उत्तर वयदिक कार म पेहराव का निवी , वास अन् अधिवास इ भाग होता . 
* ' शतपथ ब्राह्मण ' म रेसम अन् ऊन क बापर को उल्लेख स .
* रामायन कार म लाडा -  लाडी बिह्या म रेसम का कपडा च पेहरत होता . 
* बौद्ध साहित्य म कपडा का नाव : सन का कपडो = खोमन , सूती कपडो = कप्पासीकम , रेसमी कपडो = कोस्सेयम . 
* इजिप्त देस क ' ममी ' ला भारत क मलमल क कपडा म लपेटत होता ‌ .
* २७०० बरस पह्यले आयो चीनी भिकसू यातरी ह्युन सियांग न लिख्येस क भारत देस म पांढरा कपडा च जास्त पेहरस . 
* गृत्समद रिसी न कपास पासिन कपडो बनावन की कला सिखाई , असी मान्यता स . 
* राज क हिसाब कन् पेहराव म बदलाव भयो . मौर्य , कुस्यान , गुप्त , सातवाहन राज म पेहराव को तरीको बदल्यो . पेहराव प मंगोल , यूनानी , अफगानी , मध्य आसिया क तरीका को बी असर पड्यो . 
२. पीतांबर : * पीतांबर को मतलब कोसा को ( रेसम ) धोतर . धारमिक विधी म अन् मंगल काज म रेसमी धोतर पेहरस . जेन कोसा क धोतर ला जरी काठ रव्हस , वोला ' पीतांबर ' कोस . पीतांबर  मानुस अन् बाई बी पेहरस . मानुस को साडे पाच वार को  ' मरदाना पीतांबर ' अन् बाई को आठ वार को  ' जनाना पीतांबर ' ! 
* पीतांबर ला पवितर मानस . कोसो ( रेसम ) बिगर धोये पानी सिपडकन् सुध्द होस , असी धारना स . बिह्या क बेरा ससरो नवरदेव ला पीतांबर को आहेर करन को रिवाज होतो . बिह्या साठी मामो भासी ला ( लाडी ला ) पीतांबरी साडी देत होतो , नी त खेंडो ( पिवरी साडी ) देत होतो . सब सिन सस्ती पिवरी साडी मनजे हरद कन् पिवरी करी ती पांढरी साडी ! येला मराठी म ' अष्टपुत्री ' कोस . हिंदी म येला ' पियरी ' कोस . पीतांबरी रवो क खेंडो रवो , लाडी क डोकसा पर अकसिदना येन पिवरी साडी म च पड्या पायजेन , येको नेम होतो . उत्तर भारत म बी बिह्या क बेरा लाडी पिवरी साडी च पेहरत होती . 
* पिवरो रंग देवी -  देवता क पसंद को रंग स . भगवान बिस्नु देव बी पीतांबर च पेहरस . पिवरऽ रंग ला सूर्व्य देव , मंगल - बृहस्पती गिऱ्या को रंग मानस . पिवरो रंग मनजे ' उजिड ' को रंग ! पिवरो रंग मनजे सादगी अन् निरमलता को रंग ! 
* बिह्या भया बास्त लाडी ला प्यार अन् माय ला दुत्कार साठी कहावत स , ' माय क लुगडा ला बारा गाठी , लाडी ला पीतांबर धट्टी ' . 
📝 असो इ भुल्यो बिसऱ्यौ ' खेंडा ' को पुरान ! 

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 


Thursday, September 9, 2021

वर्धा माय , खैरवानी. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

वर्धा माय , खैरवानी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

9 सितंबर 2021, दिन बुधवार ला धनगवरी ( नांगदेव ) , खैरवानी दरस्यन को मोह्यतूर निकरे ! संगऽ सुरेश मानमोडे , प्रकाशजी आन् विकास बी होता . आभार कारोकिटाड होतो . दुय तीन दिन पासिन झड लागीती . मानमोडे जी न कार की पूंजा करी , अन् मुनऽ इस्टेरिंग संभाल्यो . सकारी 8 बज्या नागपूर सिन निकऱ्या . बरसाद कन् सारोळा सद् सद् होतो आन् ठंडी बी बाजत होती . नागपूर परीन पांढुरना पुग्या . काल च यहान परसिध्द ' गोटमार मेलोइ ' भयेतो . नदी क दुय आंग गोटा का ढीग पड्याता . येक JCB अन् ट्र्याक्टर गोटाना सावडकन् फेक रह्याता . नदी काठ क देऊर ला टट्टाना कन् झाकेतो . 
पांढुरना पार करकन् मल्हारा पंखा पासिन जेवनहात ला नानी सडक प पलट्या आन् धनगवरी को रस्तो पकड्यो . चिखलीकला पासिन ' मुलताई - छिंदवाडा ' सडक वलांडकन् डाखऽ हात प पलट्या . झमाझम बारिस होय रह्यीती . गोस्टीमाता करता करता धनगवरी आयो . देऊर ला टालो लाग्येतो . बाह्यरीन च पूंजापाती करी आन् हात जोड्या . धनगवरी जवर क नदी पर च डोमनसेस को देऊर स . 
धनगवरी जवर च ढाकरबाडी ला मानमोडेजी की आतोबहिन रव्हस . नारायण देशमुख कितऽ खानोपेनो भयो . इत उत की बातचीत भयी . 
नागद्वार , पचमढी यातरा की ' धनगवरी ' ला पह्यली पायरी मानस , यासिन जुन्नारदेव ला जास . 
ढाकरबाडी परिन मोरनढाना ला आया . मानमोडेजी को परिवार यहान को च स . चारी कितऽ खेत म मका च मका ! ( भुट्टा ). येक क पास येक दुय चार घर च्या पानी भयो . वहान ' भोयरी संस्कृति ' किताब बाटी . मुलताई - दुनावा को पट्टो खोवा साठी परसिध्द स . वासिन चार पाच किलो खोवो लेयो . 
आब वापसी म खैरवानी ला जान को होतो . मध्य परदेस क बयतूल जिला म क मुलताई तहसील म खैरवानी गाव जवर वर्धा नदी को उद्गम स . ८११ मीटर उचाई को वरधन सिखर वर्धा माय को जलमस्थान . मध्य परदेस म ३२ कि.मी. को सफर कर कन् वर्धा नदी मोवाड जवरीन महाराष्ट्र म आवस . घुग्घुस जवर ( वढा संगम ) वर्धा नदी ला पैनगंगा नदी मिरस . आघ वैनगंगा नदी ला वर्धा नदी मिरस आन् या दुय नदीना गोदावरी नदी ला भेटकन् प्राणहिता म समाहित होय जास . 
सतपुडा परबत क साजरपन म वर्धा अन् सूर्व्यपुत्री ताप्ती चार चांद लगाय देस . वर्धा माय आन् ताप्ती नदी ( मुलताई ) को उद्गम मेक दुसरा पासिन सिरफ ११ कि.मी. दूर स. 
वर्धा नदी क उद्गम स्थल पर कपिल मुनी न जप तप करेतो , असी मान्यता स . वर देन क कारन नदी को नाव ' वरदा ' पड्यो ; जी कालांतर म वरधा... वर्धा भयो . 
भूदान आंदोलन क बखत यहान विनोबा भावे जी आयाता . महात्मा गांधी जी बी यहान आयाता . 
खैरवानी गाव क सरकारी दवाखाना पासिन वर्धा नदी उद्गम स्धल वरी कच्ची सडक बनीस . किचड कादा क डर कन् आमी न कार दवाखाना जवर च उभी करी . वासिन १ कि.मी. पयदल गया . आमारो डर बेकार च होतो . कार उद्गम स्थल वरी आराम कन् आई रह्यीती . पर आब इलाज नी होतो . रस्ता पासिन उच्ची जागा प वर्धा माय को पक्को चवकोनी बांध्ये  पवितर कुंड स . येन कुंड म पाच गह्यरा भीर सरखा कुंड स . वून मिन कब कब पानी को उबाल आवस . कुंड क वरतऽ क बाजू वर्धा माय की नानीसी मूरती आन् देऊर स . कुंड क काठा प आब भगवान भोल्यानाथ की साजरी अन् उच्ची मूरती बनाईस . कुंड क येक सेला प ' श्री वर्ध्यश्वर महादेव मंदिर ' स . वर्धा माय देऊर क येक आंग कपिल मुनी की मूरती स . कुंड आन् देऊरना सवान रफाड म स . कुंड पासिन येक दुय खेत दूर बंधारो स . रस्ता क काठा पर च खैरवानी क कसलीकर कोई कोठो स . वून कोई दूय चार येकट खेत पानी म गयेस . 
वर्धा माय क उद्गम स्थल प तीर संगरात ला तीन दिन को मेलो लागस ‌. कलस यातरा आन् ' पंचकुंडीय गायत्री महायज्ञ ' बी होस . 
वापसी म पानी को जोर बाहाडे . कार पावतर आवत वरी आमी वला भया . झाक पडीती . दिनबुड्या आमी नागपूर ला आवन साठी निकऱ्या . वर्धा माय क उद्गम स्थल ( खैरवानी ) का दरस्यन कर कन् आमी धन्य भया . 

वर्धा माय की आरती 

ॐ जय वर्धा माता , श्री वर्धा गंगा माता
जी बी आया स्यरन म , दुख वून का हरता ।धृ।

गाव खैरवानी नाव , गढ वरधन माता
बिस्नु देव अवतार , पानी वराह भरता ।१।

तप कपिल मुनी को , भयेस सफल माता
रिसी वसिस्ठ भगत , होम कोटी न करता ।२।

सुभ पावन मंगल , टारै अमंगल माता
तोरऽ कोरा म आसरो , माय बुध्दी सिध्दी दाता ।३।

कुर भोयर संभाले , रिन नी फिटेय माता 
आमी पोटुबाटूना की , तुमी च स माता पिता ।४।

देवी मायना निबजी , तोर पानी कन् माता
करू तुमारी आरती , गावूस किरती माता ।५।

वरदा वरदायिनी , राम किस्न की वीरता
बोलु हर हर गंगे , बेद पुरान की गाथा ।६ ।

पानी तोरो अमरित , नाद कलकल गीता 
जोत चंदर तुमारी , मन भाये सितलता ।७।

गाये सुरेस नित् दिन , तुमारी किरपा कथा
पावू परमगती ला , पाय तुमार च माथा ।८।

लेखक / रचना : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Tuesday, September 7, 2021

घर - भाग २. Hindi language _ हिंदी भाषा

घर - भाग २
Hindi language _ हिंदी भाषा

मोहनराव ने चौंककर सिंधू की तरफ देखा . सिंधू की नम आंखों को देख कर मोहनराव उलझन में पड गये . 
' बहु और अजय बेटा हमसे क्यो कटे कटे रहेंगे भला ; मुझे तो ऐसा कुछ भी महसूस नही हुआ ...' मोहनराव ने सिंधू का हाथ अपने हाथ मे लेते हुए कहा . 
सिंधू ने बात तो छेड दी थी पर मोहनराव कोई कैसे बताना यह उस के समझ मे नही आ रहा था . मोहनराव जितने स्वाभिमानी थे , उतने ही संवेदनशील भी थे ! सिंधू को लगा की , बहु बेटे की सोच जानकर मोहनराव बिखर न जाए . उन्हे विश्वास भी होगा की नही , यह भी बात थी .
' चुप क्यो हो ? क्या सोच रही हो ? ' मोहनराव ने चिंतायुक्त स्वर मे कहा . 
' बात तो कुछ नही , लेकिन लेनदेन के मामले में बच्चों की भी राय ले लेनी चाहिए , ऐसा मुझे लगता है .' सिंधू ने भूमिका बांधते हूये कहा . 
' साफ साफ कहो सिंधू ... कौनसे लेनदेन की बात कर रही हो ?' मोहनराव ने अधीरता से पुछा . 
' आपने अभी जो खेत बेचा है , उसके बारे में कह रही हूं .' सिंधू ने आहिस्ता से कहा . 
' उसमे क्या पुछने वाली बात थी ?' मोहनराव ने तपाक् से कहा . 
सिंधू वापिस चुप हो गयी . मोहनराव गुस्से से बरसेंगे या अपने आप को कोसेंगे , यह समय के गर्भ मे था . लेकिन कुछ भी होगा , वह बुरा ही होगा , यह आशंका सिंधू के मन मे थी . 
' अरे बताओ तो सही ....' मोहनराव ने संयत भाव से कहा .
वह जानते थे की , सिंधू ने कभी भी गलत बात नहीं कही थी . जब कभी गुस्से में मोहनराव उत्तेजीत हो जाते थे , तो सिंधू ही बडे प्यार से उनको संभालती थी . मोहनराव भी मासूम बच्चे की भांति समझ जाते थे .
' बहु कह रही थी की , अजय कुछ नया काम करना चाहता है , जिसके लिए उसे पैसे की जरुरत है . आप खेत के पैसों में से आधे भी दे देते तो शायद उसे आसान हो जाता था . ' सिंधू ने मोहनराव का हाथ सहलाते हूए कहा . 
' कैसी बात करती हो सिंधू ? दोनों की दो - ढ़ाई लाख की सेलेरी महिने की आती है . अभी तक तो काफी रकम जमा हो चुकी होगी . घरखर्चा तो मेरे ही पेंशन से चलता है..' मोहनराव ने सोचते हूये कहा .
' पैसे पानी का हिसाब तो आप दोनो जानो... बेटे की होगी कुछ इच्छाएं....' सिंधू ने कहा .
' सिंधू , उसकी कुछ योजना है तो उसने मुझसे कुछ बात तो करना चाहिए . मुझे अगर सबकुछ सही लगता तो , आधे ही क्यो ... सारे पैसे देने में भी क्या दिक्कत हो सकती थी . बातचीत तो करें .. ऐसे आपस में ही कुढ़ने से क्या हासिल होगा ... यह सारी संपत्ती तो अजय की ही है ना . इकलौता बेटा है वो हमारा ! लेकिन तुम बता रही हो , ऐसा बर्ताव मै कतई बर्दाश्त नही करूंगा . इस रविवार को मै बात करता हू अजय से . तुम चिंता ना करो . ' मोहनराव ने सिंधू के गालों को थपथपाते हुए कहा .  ( क्रमशः )

लेखक : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

Friday, September 3, 2021

अजब गजब - ७६ : लोद्रवा. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७६ : लोद्रवा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

काली रे काली काजळिये रे रीख दूर
ओ जी रे कोई मोरिये रे बाखर में चमके बिजली रे
ढोले रे मूमल हाजी रे पिया रे प्यारे रे मूमल
हाले हाले रे ले चालू ओन्दा थारे देस में ।

हा दो टेड मूमल रा आडा मियल रे
ओ जी रे कोई होठ मूमल रा कसमूल डोर रा
ढोले रे मूमल हाजी रे पिया रे प्यारे रे मूमल
हाले हाले रे ले चालू ओन्दा थारे देस में ।

लोद्रवा क इलाखा ला मांढ ( मांड ) कव्हत होता , आन् मांढ इलाखा क बोली ला बी मांढ बोली च कव्हत होता . जयसलमेर क येन इलाखा क गाव गाव म गुंजस लोद्रवा की राजकुमारी ' मूमल ' अन् अमरकोट क राजकुमार ' महेंद्र ' की अमर प्रेम कथा लोकगीत मिन !
राजस्थान म जयसलमेर पासिन १५ कि.मी. दूर स लोद्रवा गाव , जहान कबऽ नांदत होतो परमार वंस को वयभवस्याली राज !!
सरस्वती नदी की उपनदी ' काक ' नदी , आन् वोक काठा प बसेतो लोद्रवा ! लोद्रवा पुरानऽ बेपारी रस्ता पर को मुख्य ठानो होतो. १० मयील फयलाव वालऽ येन नगर ला १२ दरुजा होता .वोन जमाना म  खेती कास्तकारी कन् पुरो इलाखो हिवरो हिवरो होतो . आब रेत क खलतऽ दबे इ लोद्रवापुर  ,  वोन बेरा को मोठो धनसंपन राज होतो . जब जयसलमेर बने बी नी होतो , वोक पह्यले पासिन लोद्रवा को मोठो आसकारो होतो !
१. इतिहास अन् मान्यता : * धारानगरी क परमार राजा धंधमार को पोरग्यो ' राजा भाण ' ( नृपभान / भानुप्रताप ) न बिकरम संवत् ६७५ म ' लोद्रवा नगर अन् राज ' की थापना करीती . या परमार वंस की लोढा / लोद्रवा पाती बनी .  तब जयसलमेर को नावनिस्यान बी नी होतो . 
* आघ क पीढी म राजा लोद्र भयो . वोन लोद्रवा म सिवमंदिर बांध्ये . 
राजा लोद्र ला चार पोटूना होता . सागर , परताप , राज अन् लोद्र ( दुसरो ). राजा लोद्र क बास्त , मोठो पोरग्यो सागर राजो बन्यो . 
* राजा सागर परमार ला ११ पोटूना भया . पर बयीद क पकड नी आवनी वाली बिमारी कन् वोम का ८ पोटूना देव घर गया . बाच्या तीन पोटूना की तब्येत बी तोरा मासा च होती , वूई बाचेन क नी बाचेन यको भरोसो नी होतो . 
तेकन राजा सागर परमार हरदम दुखी रवत होता . तब राजधानी म जैन संत सिरी जिनदत्त सूरी आपलऽ दलबादल सगट आया . येन संत की मोठी महिमा गाज रयीती . राजा न बिचार करे क , संत क आसिरवाद कन् बाच्या तीन पोटूना की तब्येत ठीक होय जायेन . संत न कह्ये क तुमारा पोटूना बिमारी काहाडूस परि तुमाला जैन धरम लेनो पडेन . पोटूना की तब्येत आन् राज साठी राजो राजी भये . संत न आपलऽ स्यक्ति कन् सबन पोटूना की तब्येत चांगली करी . राजा सागर परमार न मोठो पोरग्यो कुलधर ला राजपाट देये आन् सिरीधर , राजधर येन पोटूना संग जैन धरम लेयो . लोद्रवा म जैन देऊर बांध्या . 
* आघ क पीढी म राजो नृपभानु सिंह बन्यो . वोपर यदु वंसी देवराज भाटी न धोखा कन् हमलो कऱ्यो , आन् परमार वंस क राज ला खतम कऱ्यो . बाद म लोद्रवा प मुसलमान का हमला बी भया . येन दुय हमला कन् लोढा / लोद्रवा वंस ला राजस्थान सोडनो पड्यो . वून न आपरी पह्यच्यान / वरख लुकावन साठी दलवी ( दलपति ) इ नाव धऱ्यो . वासिन वूई गुजरात , महाराष्ट्र अन् मध्य परदेस म फयल्या . 
* १२ व सदी म दलवी देवगीरी क यादव राज म दलपति ( सेनाप्रमुख ) बन्या . 
* १३ व सदी म यादव राज को मुसलमान हमलावर न नास करे . तब दलवी बहामनी राज घोडादल का परमुख बन्या . 
* १७ व सदी म दलवी छत्रपती सिवाजी महाराज क फऊज म भरती भया . येन कार म वून ला ' देसमुखी ' भेटी . तब पासिन वून की वरख ' दलवी देशमुख ' पडी . 

( सहयोग : इंजि. जालम सिंह सोढा जी जोधपुर )
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर