Tuesday, September 7, 2021

घर - भाग २. Hindi language _ हिंदी भाषा

घर - भाग २
Hindi language _ हिंदी भाषा

मोहनराव ने चौंककर सिंधू की तरफ देखा . सिंधू की नम आंखों को देख कर मोहनराव उलझन में पड गये . 
' बहु और अजय बेटा हमसे क्यो कटे कटे रहेंगे भला ; मुझे तो ऐसा कुछ भी महसूस नही हुआ ...' मोहनराव ने सिंधू का हाथ अपने हाथ मे लेते हुए कहा . 
सिंधू ने बात तो छेड दी थी पर मोहनराव कोई कैसे बताना यह उस के समझ मे नही आ रहा था . मोहनराव जितने स्वाभिमानी थे , उतने ही संवेदनशील भी थे ! सिंधू को लगा की , बहु बेटे की सोच जानकर मोहनराव बिखर न जाए . उन्हे विश्वास भी होगा की नही , यह भी बात थी .
' चुप क्यो हो ? क्या सोच रही हो ? ' मोहनराव ने चिंतायुक्त स्वर मे कहा . 
' बात तो कुछ नही , लेकिन लेनदेन के मामले में बच्चों की भी राय ले लेनी चाहिए , ऐसा मुझे लगता है .' सिंधू ने भूमिका बांधते हूये कहा . 
' साफ साफ कहो सिंधू ... कौनसे लेनदेन की बात कर रही हो ?' मोहनराव ने अधीरता से पुछा . 
' आपने अभी जो खेत बेचा है , उसके बारे में कह रही हूं .' सिंधू ने आहिस्ता से कहा . 
' उसमे क्या पुछने वाली बात थी ?' मोहनराव ने तपाक् से कहा . 
सिंधू वापिस चुप हो गयी . मोहनराव गुस्से से बरसेंगे या अपने आप को कोसेंगे , यह समय के गर्भ मे था . लेकिन कुछ भी होगा , वह बुरा ही होगा , यह आशंका सिंधू के मन मे थी . 
' अरे बताओ तो सही ....' मोहनराव ने संयत भाव से कहा .
वह जानते थे की , सिंधू ने कभी भी गलत बात नहीं कही थी . जब कभी गुस्से में मोहनराव उत्तेजीत हो जाते थे , तो सिंधू ही बडे प्यार से उनको संभालती थी . मोहनराव भी मासूम बच्चे की भांति समझ जाते थे .
' बहु कह रही थी की , अजय कुछ नया काम करना चाहता है , जिसके लिए उसे पैसे की जरुरत है . आप खेत के पैसों में से आधे भी दे देते तो शायद उसे आसान हो जाता था . ' सिंधू ने मोहनराव का हाथ सहलाते हूए कहा . 
' कैसी बात करती हो सिंधू ? दोनों की दो - ढ़ाई लाख की सेलेरी महिने की आती है . अभी तक तो काफी रकम जमा हो चुकी होगी . घरखर्चा तो मेरे ही पेंशन से चलता है..' मोहनराव ने सोचते हूये कहा .
' पैसे पानी का हिसाब तो आप दोनो जानो... बेटे की होगी कुछ इच्छाएं....' सिंधू ने कहा .
' सिंधू , उसकी कुछ योजना है तो उसने मुझसे कुछ बात तो करना चाहिए . मुझे अगर सबकुछ सही लगता तो , आधे ही क्यो ... सारे पैसे देने में भी क्या दिक्कत हो सकती थी . बातचीत तो करें .. ऐसे आपस में ही कुढ़ने से क्या हासिल होगा ... यह सारी संपत्ती तो अजय की ही है ना . इकलौता बेटा है वो हमारा ! लेकिन तुम बता रही हो , ऐसा बर्ताव मै कतई बर्दाश्त नही करूंगा . इस रविवार को मै बात करता हू अजय से . तुम चिंता ना करो . ' मोहनराव ने सिंधू के गालों को थपथपाते हुए कहा .  ( क्रमशः )

लेखक : इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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