सीता और स्त्री
आदिम अवस्था में केवल मातृ कुल रहते थे. ज्येष्ठ मॉं के आज्ञा में रहनेवाला परिवार प्रकृति से एकरूप , कष्टमय , अस्थिर था. रोज नये नये बदलाव को झेलते हुये वे अचरज में जरुर थे ; लेकिन अतुट थे. नये बदलावों के अनुसार ढालते गये खुदको. लिंगभेद और योनिशुचिता से कोसों दूर !
स्त्री जाति की कल्पकता, ज्ञान , जिज्ञासा और निरिक्षण बुध्दी से अन्न निर्मिती का सुलभ रास्ता हमें ज्ञात हुआ ; वह खेती ! भटकते जीवन को स्थिरता के पल प्राप्त हुये. आज की प्रगती का बीजारोपण हुआ. उपलब्ध समय का उपयोग शस्त्र, यंत्र , प्रकृति के रहस्य तथा उत्कृष्ट जीवनयापन - समाज जीवन की सोच खोजने में हुआ. वेदों की रचना हूयी. परिवार बढते गये... खेती और गोधन के लिये नयी जमीन , नये चारागाह खोजने जरुरी हूये. कबिलाई संस्कृती से राजसंस्कृती की ओर बढते गये. नारी का अवमूल्यन नही हुआ था. घर , कृषी , तत्वज्ञान से लेकर युद्ध तक उनका महत्त्व था... उपयोगिता थी.
रामायण इसी संक्रमण काल में घटित होता है. नये जीवनमूल्यों को खोजते , अपनाते है रामायण की व्यक्तिरेखाएं. नारी को हमेशा ही ' उर्वरता ' का प्रतिक माना गया... धरा के समकक्ष. राजा को भूपती , आकाश का प्रतिक माना गया. और सीता का धरती से उत्पन्न होना महज एक प्रतिक , जन्मकथा न रहकर यह अत्युच्च सम्मान... उसकी सृष्टी निर्माण की अद्भूत , ममतामयी शक्ती के आगे नतमस्तक समाज और प्रतिभा दर्शन बन उभर कर सामने आता है.
यज्ञभूमी तयार करने के लिये हल चलाते विदेह के राजा जनक को सीता उसी भूमी से प्राप्त होती है... मॉं प्रकृति के रूप में ! प्रात:स्मरणीय स्त्री शक्ति में से सीता यज्ञभूमी से तो द्रौपदी यज्ञकुंड से अवतरित होती है. पंचतत्व की यह सृष्टी... ब्रम्हांड से पिंड तक व्यापक और सूक्ष्मतम भी! .... परिमाण रहित... अनंत !
हल से भूमी पर जो नालीनुमा लकीर बनती है सृजन की ; वह भी सीता. इस लिये राजा जनक नामकरण करते है , " सीता " . जनकपुत्री जानकी , विदेह देश की राजकुमारी वैदेही , विदेह का दुसरा नाम मिथिला - इस लिये मैथिली... शिवधनुष्य के साथ खेलती सीता....
सीता स्वयंवर में उसी शिवधनुष्य को खंड भंग करते मर्यादा पुरुषोत्तम राम ! सीताराम... सीताराम...
राजकुमारी का राजकुमार से मीलन... धरती का आकाश से मीलन... यहॉ तक सब ठिक ठाक... नये जीवनमूल्यों का अंगिकार कर, राम से मर्यादा पुरुषोत्तम बने राम मॉं और पिता की आज्ञा पालन कर बनवास स्विकारते हूये...
विश्व के सभी समुदाय में प्राथमिक मूल्यों को छोड बाकी में बहुत भेद होते है. भिन्न भिन्न समूह की भिन्न भिन्न परंपराएं , रितीरिवाज...समय के साथ बदलते हूये.
प्रेम और निष्ठा की पराकाष्ठा सीता. कर्तव्य और प्रेम की मूर्ति राम. लेकिन समय बलवान. बीस साल में एक पीढी बदलती है. चौदा साल बनवास का समय इस का 3/4 . समय तो बदला... समय का असर आचार विचार , परंपरा , जनभावना पर तो पडता ही है. प्रेम और निष्ठा साबित करने के लिये दहकते पितृसत्ताक व्यवस्था के अग्निदिव्य को पार करती सीता... फिर भी झुलसे हुये मन - मस्तिष्क से लंका से अयोध्या आती हुयी सीता... खरा सोना अग्निदिव्य में तप कर कुंदनसा दमकते हुये.
अब अयोध्या में दिवाली और अयोध्या के राजकुमार राम बनते है अयोध्या के राजा. प्रजा से जुडा हुआ राजधर्म , नये संकेतों को जन्म देता हुआ. इधर सीता के कोख में सृजन उत्सव. प्रजा के मन में कुछ संदेह के बादल.... खुद राजा धर्म संकट में. पति और राजा के द्वंद में पति पराभूत..पिता पराभूत. पति , पिता का दायरा छोटा - राजा का दायरा बडा. दायरा बडा तो जिम्मेदारी और निर्णय की सार्थकता और परिमाण भी बृहद्. पति का हारना तो तय था.. साथ ही दम्पती भी हार गये. दम्पती यह पति पत्नी के लिये वैदिक शब्द. वेद और अवेस्ता में दम्पती का अर्थ है ; घर गृहस्थी के सामाईक मालक. पती-पत्नी की अद्वैतता को परिभाषित करता यह समर्पक शब्द.
प्रजा संदेह के कारण राजा राम का सीता त्याग.. दम्पती भी पराभूत.... सृजनमयी मॉं का हृदय विशाल. सहनशीलता की पराकाष्ठा... पती के लिये निष्ठापूर्वक जीवन अर्पण कर खुद के व्यक्तिमत्व को सूक्ष्म... शून्य वत करती सीता. यह शरीर केवल दु:ख भोगने के लिये ही अवतरीत हुआ है , ऐसी वेदना व्यक्त कर; राजा ने राजधर्म अनुसार ही प्रजा पर प्रेम करना चाहिए , सही इच्छा सीता ने व्यक्त की.
वाल्मीकी ॠषी के आश्रम रहते हुये लव - कुश इन जुडवॉ बच्चों को जन्म दिया. राज चलता रहा. बच्चे बडे होते रहे. राज बढाना भी था. अश्वमेध यज्ञ के समय राजा राम की लव- कुश से भेंट हुई. राजा राम हर्षित हुये. वाल्मीकी ॠषी के आश्रम से मॉं सीता को अयोध्या लाया गया. अभी भी राम केवल पती ही न थे.... महाराजा थे अयोध्या के. प्रजा के समाधान के लिये सीता ने फिर से अग्निदिव्य करना चाहिए , ऐसी राजा राम की अपेक्षा... सीता के , नारी के , मॉं के आत्मसम्मान पर यह घातक चोट थी. सच में बदल गयी थी दुनिया. ..... सोच और विचारों से भी. इतने वर्ष जंगल में बिताने के बाद ना सीता को महाराणी के पद की लालसा थी , ना सुख की आशा थी , ना जीने की चाह थी. लेकिन उनके मातृत्व को संदेह के घेरे में रखकर मॉं के सम्मान... आत्मसम्मान को दांव पर लगाया जाय , यह उस सृजनशक्ती को नामंजूर था , चाहे वह राजा राम रहे या अयोध्या की प्रजा. आसक्ति , ग्लानी और असहायता के भाव उनके मातृ हृदय पर हावी नही हो सके. अब वह केवल मॉं थी... सदा शुद्ध... सदा पवित्र... धरती सम विशाल... मंगलमय... तीनों लोक में सर्वश्रेष्ठ स्थान - मॉं . अविकारी... अनंत . यहॉ ना कोई दिव्य की आवश्यकता थी ना कोई परीक्षा की. वह अजेय मॉं थी. अब ना उन के आंखों में आसू थे न चेहरे पर कोई शिकन. उन का दिल जोर जोर से धडक रहा था पर मुद्राभाव शांत थे. पल भर में संपूर्ण जीवन पट उन के आंखों के सामने आया. असंख्य प्रजा , राजा राम , रिश्तेदार , वाल्मीकी ॠषी इन की भीड में उन की आंखें निहार रही थी अपने सुकोमल बालकों को.... लव - कुश को स्नेहार्द भाव से देखते हुये एक निर्धार उनके मस्तिष्क में बिजली की भांती कौंधा..... अनंत उर्जा से.... अजेय भाव से.... अचानक दोनो घुटने जमीन पर टिकाये और दोनो हाथ फैला कर एक मॉं की पीडा - प्रेम , स्त्रीत्व का सुख - दु:ख और मनुष्य जीव की य:किश्चितता का कोलाज उन के मुख से फट् पडा......
" हे धरती मॉं.... अगर मै शुद्ध हू तो मुझे अपने में समा ले मॉं ऽऽऽ....."
इस अकल्पित वाणी से प्रजा से लेकर राजा राम तक कांप गये. प्रकृति मॉं ने उन की बेटी की यह आर्त ... दर्दभरी वाणी सुनी. ... महा प्रलय आया हो ऐसा आवाज हुआ.... गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ गड् ऽ ऽ ऽ...
फट गया उस का दिल.... एक मॉं ही समझ सकती थी एक मॉं को... एक बेटी को....
दोनो हाथों से पकड कर गले लगाया सीता को... जैसे हजारों साल से बिछडे हो.... एकाकार हो गये.... गहन शांत....
आज भी पुजती है नारीयॉ खेत में , सीता देवी को झुले में झुला कर... गीत गा कर..
' सीता देवी ले दुख झाले बहु
तिनं थे येचले गहू गहू...
- जोड कर रिश्ता मॉं सीता के दुःख से...
पिसती है अनाज को दु:खों के साथ गाते गाते....
आज भी इस पितृसत्ताक व्यवस्था में अनगिनत माताएं वैसे ही पुकारती है.... कभी अग्नि में , कभी कुये में , तालाब - नदी में , छत को टंगे पंखे में.....
" ... हे मॉं ऽ ऽ ऽ मुझे समा ले... मुझे समा ले..."
इंजि. सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर.
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