भोयरी संस्कृति - ४४ : पठौनी , पिठौरा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
म्हरो कारजा को टुकडो बाई म्हरी पोटी
सुखी रवजे वो माय म्हरी बाई मयना
पठावूस वो पिठौरो , पठौनी की बाई रोटी ।
भाई बहिन येकच घर जलम लेस ... खेलस - कुदस - सीकस .. मोठा होस . येक दिन बिह्या क बाद बहिन - पोटी ला ससुराल म जायकन् आपरी नवी जिंदगानी चालू करनो पडस . भोयरी संस्कृती म बिह्या क बाद बी बहिन - पोटी को नातो मायका सिन खतम नी होत . नार काट्या पर बी जसो माय को नातो पोटी सिन कटत नी , वूसोच बिह्या क बाद बी बहिन - पोटी को मायका सिन टुटत नी !
भोयरी संस्कृती म असा कयी दस्तुर - रिवाज स , जेकन पोटी मायका सिन जुडी रव्हस . वोम को च येक मोठो साजरो रिवाज , " पठौनी - पिठौरो " !
* पठौनी : भोयरी संस्कृती म ब्याही बहिन - पोटी क घर नारेल , रेसमी करदोडो पठावन को रिवाज स , जेला ' पठौनी ' कोस .
नागपंचमी ला गुंजा , पापडी अन् पकवान को फुलोरो धरस . आगलऽ दिन बहुड्डो ( भुजलिया / कजलिया ) बोवस . येन बखत पकवान संगच नारेल , रेसमी करदोडो पोटी क घर पठावन को रिवाज स . पठौनी पठावन क पासऽ को हेतू असो रव्हस क , नाती पोती निरोगी , सुखी अन् धनवान रह्या पायजेन !
* पिठौरो : पोरा क दिन भाई आन् कुटुंब क भला साठी बाईलोग उपास धरस , येलाच पिठोरो कोस .
माय क घरीन पोटी क उपास साठी फरार पठावस . पिठोरा क पूंजा म माय क घरीन आयो नारेल चढावस अन् रेसमी करदोडो सुरक्स्या बंधन सरिखो काम म ल्यावस .
* हर तीज - तिवार ला बहिन - पोटी की रोटी माय क घरीन जानो , इ पोटी ला मायका सिन जोड कन् धरस . रोटी माय अन् माय क माया ममता को रूप दिखाडस . जब माय क घरीन रोटी जास तब सिरफ रोटी च नी जाति त पुरो मायको , वोकी याद संग लेकन जास . घर - परिवार , गली - येटार , खेत - खल्यान , सखी - सोबतीन , हासी खुसी , खेल खिलोना सबन जिता होय जास रोटी क रूप म ! माय क घर की रोटी , पोटी ला हर सुखदुख म संग रव्हन की हिम्मत देस . जब पोटी मायका क रोटी ला देखस तब वोला वाटस क या सिरफ रोटीच नहाय त् या माय को कोरो स , माय की ममता स , आसू पुसनीवालो माय को हात स , डोकसा पर को बाप को हात स , हिम्मत देनी वाली मायबोली स !
मायका क रोटी को येक घास पुरी करस वोकी ममता की भूक , वोक नस नस म फुलस चयतन , बरस वोक उम्मीद को दिवो , आवस वोक निरास मन म खुसी की लह्यर , झलारस वोक मन को आंगनो दिवारी सरखो !
पठौनी , पिठौरो , राखी ला पौची पठावन की परंपरा , रिवाज आब बी भोयरी संस्कृती म स . अन् याच भोयरी संस्कृती की महानता स !
( साभार : सुखवाडा इ मासिक , भोपाल - वल्लभ जी डोंगरे )
अनुवाद : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
अपनत्व को दर्शाता लेख अच्छा है।
ReplyDeleteधन्यवाद जी 🙏
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