Tuesday, February 15, 2022

निर्माण - भाग १. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण - भाग १
Hindi language _ हिंदी भाषा

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृध्दश्रवा : ।
स्वस्ति न : पूषा विश्ववेदा : ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि : ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।

कारवां चल रहा था.. आगे हमारी जीप , पीछे सामान से लदा ट्रक , ट्रैक्टर और मजदूरों से भरी गाडी . शहर पीछे छूट गये... जंगल के पहाडी रास्तों से गुजर रहे थे . 
' कहॉं है साहब साइट ?' पीछे बैठे स्टाफ ने पूछा . 
' बस , देखते जाओ...' मैने जवाब दिया . 
राज्यों के सीमावर्ती इलाके का घना जंगल . आखिरकार सडक से भीतर जाती पगडंडी पे हमारी जीप मुडी . यह जंगल का रास्ता था.. पीछे सामान से लदा ट्रक हिलते - डुलते आ रहा था . एक बडे से गढ्ढ के पास जीप रुकी . वही कम झाडीवाली जगह थी . 
' यहॉं जंगल मे साइट है ? ' स्टाफ ने पूछा . 
' हॉं , यही है...' मैने कहा . 
स्टाफ , ड्रायव्हर , ठेकेदार , मजदूर सभी मुझे घेर कर खडे थे . सामान उतारते - उतारते अंधेरा हो गया . 
' आज तिरपाल टान लो ... कल से कैम्प बनाएंगे . ठीक है !' मैने सभी को हिदायत देते हुए कहा . 
' साहब , पीने का पानी कहॉं से लाना होगा . यहॉं आसपास तो गांव भी नहीं है .' ठेकेदार ने पूछा . 
' अभी पीछे वाले गढ्ढे से काम चलाओ . कल किसी गांव से पानी लायेंगे . ' मैने कहा . 
चारों ओर चूल्हें जले . खानसामा ने भी गैस सिलिंडर वाला चूल्हा जलाया और खाना बनाने मे जुट गया . अंधेरी रात , खूला आसमान और जंगल के बीच यह चहल - पहल ! डर नही पर बडा अजीब और उदास लग रहा था . जंगल से आती अजीबोगरीब आवाज की परेशानी अलग थी . 
स्टाफ ने कॉट लगाई... बातचीत करते - करते सभी सो गये . 
सुबह - सुबह खानसामा मुझे गढ्ढे के पास ले गया . वहॉं मवेशीयों का झुंड पानी पी रहा था . पानी का रंग मंगल ग्रह से भी लाल ! 
' तो यह पानी पीया था सबने! ' मैने चौंक कर कहा . 
' हा साहब जी....' खानसामा ने कहा . 
' ड्रायव्हर को उठाओ पहले और टैंकर ले कर भेजो उसे पानी के लिए . ' मैने वापिस आते हूए कहा . 
दो घंटे बाद टैंकर पानी ले कर आया . फिर सभी के चूल्हें जले . 
' साहब , ऐसे जंगल मे तो कभी काम नही किया हम ने . कैसे होगा ? ' स्टाफ ने चिंता जताई . 
' यह भी कर के देखते है.... टेन्शन मत लो..' मैने उसे समझाया . 
अंदर से तो मुझे भी फिकर हो रही थी... लेकीन मै किसे बताऊ ? 
ठेकेदार , स्टाफ , मजदूरों के चेहरे पर चिंता स्पष्ट देखी जा सकती थी . मै मुस्कुराकर सभी को हौंसला दे रहा था . 
कुछ देर बाद डिपार्टमेंट के इंजिनिअर आए . उन से साइट का अन्दाजन लोकेशन लिया . कुछ मजदूरों को साइट साफ करने के लिये लगाया और कुछ को कैम्प बनाने के लिए..  सभी काम कर रहे थे , लेकीन उस में सहजता नही थी . अनामिक तणाव या भय का साया मंडरा रहा था . उत्साह का लवलेश नही था  . .. मै भरकस प्रयास कर रहा था रूचि जगाने की ! 
कैम्प तैयार हो गया . साइट ऑफिस , किचन , स्टाफ के कमरे , स्टोअर रूम , लेबर कैम्प बनने से छोटेसे गांव का आभास हो रहा था . साइट मशिनरी , ट्रक , ट्रैक्टर , जीप , बाइक से उस मे चार चांद लग गये थे ! चारों ओर चहल - पहल थी . साइट सफाई का काम चलता रहा . मेकैनिक और हेल्पर मशिनरी को चालू कर चेक कर रहे थे...
अंत मे ले - आउट का रेखांकन हुआ ... उस सुनसान घने जंगल मे ले - आउट की चूने की रंगोली सजी.....    ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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