निर्माण - भाग २
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काम चालू हुआ . कॉलम के गढ्ढे खोदे जा रहे थे . सरिया के कॉलम बन रहे थे . प्लायवूड और लकडी के तख्तों से शटरिंग बन रही थी . काम जोरशोर से चल रहा था . हर एक व्यस्त था . काम की रफ्तार से उत्साह की बयार बह रही थी . निर्माण का बीजारोपण हो रहा था !
एक दिन अचानक हाथों में लाल झंडे लहराते हुए लोगों का झुंड नारे लगाते हुए साइट की ओर आते हूए देखा . मजदूर अपना काम कर रहे थे . लेकीन मुझे किसी अनिष्ट की आशंका हुई . वह झुंड नारे लगाते हुए साइट तक आए और सभी अपने मुखिया के आदेश पर वही बैठ गये . मैने मुखिया को बिठाया और सभी को पानी पिलाने के लिए खानसामा को कहा .
मुखिया तैश में था !
' आप लोग तुरंत यहाँ से निकल जाओ , इसी में आप की भलाई है . आपका टेंडर हमें दे दो . हम लोग ही यह काम करेंगे . ' मुखिया ने कहा .
' ऐसा कैसे होगा श्रीमान ? टेंडर जिसे मिलता है , उसे ही काम करना पडता है . हम भी तो मजदूर ही है . इस काम के लिए हम भी अपना घर - बार छोड के इस जंगल मे आए है . ' मैने संयत स्वर में कहा .
' हमें इस से मतलब नही . हमारे क्षेत्र में आप काम नही कर सकते . काम तो हम ही करेंगे . आप निकलो यहाँ से . ' मुखिया ने गुस्से से कहा .
हाथ मे झंडा लेकर बैठे लोग जोर जोरसे नारे लगा रहे थे .
' देखिए , हम तो गिनती के लोग आए है . यह काम करने के लिये काफी लोगों की जरूरत होगी . आपके साथ आए लोगों को भी यहाँ काम मिलेगा . ' मैने समझाते हुए कहा .
' हमें आपका एक भी आदमी यहाँ नही चाहिए . ' मुखिया ने कहा .
खानसामा तब तक चाय - बिस्कुट ले कर आया .
' आप पहले चाय लिजीए..' मैने कहा .
आप समझ नही रहे है बात की गंभीरता कोई ...' मुखिया ने चाय पिते हुए कहा .
' मै आपकी बात और परेशानी समझ रहा हू श्रीमान . लेकीन आप भी हमारी दिक्कतें समझने की चेष्टा किजीए .हम मुठ्ठी भर लोग आपकी पनाह में ही यहाँ काम करने के लिए आए है . आप चाहते है तो हम वापिस भी चले जाएंगे . लेकीन उस हालात मे यह काम बंद हो जाएगा , आपके लोगों को जो काम मिलने वाला था , वह भी जाएगा . आप शाति से सोचिए ...' मैने कहा .
काम बंद कर मजदूर अपने - अपने कैम्प में दुबक गये . साइट पर भय का वातावरण था . स्टाफ मेरे पीछे खडा था .
' देखिए साहब , मुझे आपकी नही , अपने लोगों की फिकर है . हम स्थानिक जनता के लिए लडते है और लडते रहेगे . संघर्ष ही हमारा मूलमंत्र है...' मुखिया ने कहा .
जोर - जोर से नारे लगने लगे .
' देखिए , आप जनता के लिए संघर्ष करते है , यह बहुत अच्छी बात है . हम भी आम जनता ही है , सरकार नही . अब आप ही मार्गदर्शन करें .' मैने कहा .
' हमारे लोगों के रोजगार का क्या होगा ? मुखिया ने पूछा .
' यह काम बडा है और दो - तीन साल चलेगा . इस काम के लिए आस पडोस के गांवि और लोगों की सहायता लगेगी ही .... तभी यह काम पूर्ण हो पाएगा . अगर आपकी संमती होगी तो मै कल आप से मिलता हूं .' मैने कहा .
' ठीक है . मै आज चर्चा करता हूं और फिर आपको खबर भेजता हूं .' मुखिया ने कहा .
लोगों ने फिर से नारे लगाएं , लेकीन अभी तीव्रता कुछ कम थी . वे लोग साइट से गये . स्टाफ , ठेकेदारों ने मुझे घेर लिया .
' अब क्या होगा साहब ? यहाँ काम करना जोखिम भरा लग रहा है . मजदूर भी डर गये है . ' एक ठेकेदार ने कहा .
' कल देखते है... काम चालू रखो..' मैने कहा .
रात मे जंगल डरावना लग रहा था . इस घटना से सभी के दिल में डर बैठ गया था . मजदूरों ने कैम्प के आगे आग जलाई . आज कोई सोने को राजी नही था . वे आग के पास लठ - कुल्हाडी लेकर पहरा दे रहे थे . चौकीदार चारों ओर घूम रहा था . डर की वह रात बहुत लम्बी थी . पत्तों की जरा सी सरसराहट से सभी चौकन्ने हो जाते थे और टॉर्च की रोशनी आवाज की दिशा में करते थे . क्षितिज पर लालिमा छाई . उषा का आगमन हुआ . कुछ देर बाद सूर्य नारायण ने दर्शन दिए . मजदूरों के जान में जान आई .
दोपहर मे मोटरसाइकिल से एक अनजान आदमी साइट पर आया .
' आपको बुलाया है .' उस ने मुझ से कहा .
' ठीक है , तुम आगे चलो ... पीछे पीछे हम आते है . ' मैने कहा और ड्रायव्हर को आवाज लगाई .
ड्रायव्हर जीप लेकर आया .
' हम भी साथ चले क्या ? ' स्टाफ ने पूछा .
' नही , तुम लोग काम देखो. मै जल्दी ही आ जाऊंगा . ' मैने कहा .
मोटरसाइकिल के पीछे हमारी जीप चल रही थी जंगल के टेढे - मेढे रास्तों से !
मनमस्तिष्क में विचारों का तूफान आया था . मुखिया क्या बोलेगा ? इस समस्या का समाधान कैसे होगा ? चर्चा शांति से होगी या कुछ अनहोनी होगी ?
कई अनुत्तरित प्रश्नों की उछल कुद मेरे छोटे से दिमाग मे चल रही थी . सिर भारी भारी लग रहा था . चिंताओं का मकडजाल घना होते जा रहा था...... ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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