Saturday, September 10, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग - १३

यादें _ सवाल की ! 
भाग - १३

सफर यह हर मनुष्य , जीव जंतू की जरूरत है.. कुछ जगह जानी पहचानी होती है तो कुछ डगर.. कुछ नगर अनजाने ! अपरिचित जगह ढूंढने के Google map का सहारा रहता है.. लेकीन वह हर जगह , हर बार कारगर रहेगा ही इसकी गॅरंटी नही.. location map पर चलने के बावजूद भी हम निश्चित स्थान पहुंचेंगे या नही _ विश्वास नही रहता . और सही जा रहे है , फिर भी किसी राहगीर , व्यक्ति को पूछे बगैर तसल्ली नही मिलती !
ऐसी ही दुविधा में फंसे कोई जनाब या मोहतरमा से वही चिरपरिचित सवाल आ धमकता है.. रुकी हुई स्कूटी / बाइक से.. नीचे उतरे कार के शीशे से.. या राहगीर से..... ' भाई , ये सडक कहॉं जाती है ?'
अचानक आ धमके इस सवाल से हमारे दिमाग के कंपास की सुईयां भी काम करना बंद कर देती है.. पहले हमें ही तय करना पडता है की हम कहॉं खडे है ! पहले हम जिस कार्य में व्यस्त थे , उससे संबंध तोड कर नक्शे की दुनिया में कदम रखते है . प्रथम पूरब दिशा दिमाग मे लाते है और बची तीन दिशाओं ९० - ९० % का कोन बनाते है.. फिर दिमाग का हिला कंपास ठिकठाक कर एक हात सडक की एक दिशा दिखाते हुए मुख से ज्ञान के मोती झरते है... ' जी , यह उत्तर दिशा में जाती है..' 
सवालकर्ता / कर्ती थोडे हिलते है.. झुंझलाहट की तरंगे छिपाते है.. गर्दन को क्षितिज समांतर हिला कर हल्की मुस्कान का तोहफा देते हुए फिर पूछते है.. ' अ हं... किस एरिया , नगर , गांव की ओर जाती है यह सडक ?' 
हम ज्ञात स्थान का नाम बताते है.. लेकीन प्रश्नकर्ता के मुखमंडल पर वही प्रश्नचिन्ह हमें दर्शन देता है.. प्रश्नकर्ता अगल बगल देखता है , की कोई दुसरा समझदार ( ? ) बंदा दिख / मिल जाए . हमारे सिर पर चढा सेवा भाव पीछे हटने को तैयार नही . 
' आपको जाना कहॉं है ?' उत्तरदाता का सवाल . 
' अलानी फलानी.. जगह.' बेरुखी से आया जवाब . 
' तो ऐसा पूछीए ना... बस अगले चौराहे से बाए.. फिर आगे छोटी सडक से दाए... ' 
वैसे सडक स्थायी.. उसने कहॉं जाना है ?!!!
एक स्नेही के घर जाना था.. Google बाबा की सेवा ली . उसने गली कूंचों से शॉर्ट कट ले कर पहुंचा दिया एक नाले किनारे ! वहॉं पहुंचा कर Google बाबा ने सेवा बंद कर दी . नाले के उस पार एक जगह चहल पहल दिख रही थी . लेकीन सडक नदारद थी . सामने एक घर था , वहॉं पूछा , ' ये सडक कहॉं जाती है ?!!!!' उसने सिर खुजालाया... कुछ सोचा और कहा , " कही नही !' 
अब सोचने की बारी मेरी थी !!! कार वही खडी की .
रात के अंधेरे में कुदते फॉंदते नाला पार किया और पहुंच गये भाई गंतव्य स्थान तक !!!!
ज्ञान प्राप्त हुआ.. सडक कही नही जाती... जाना तो हमें ही है !!! ( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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