निर्माण - भाग १५
मंझधार में फंसी नैय्या जैसी मेरी हालत थी . तूफान की तीव्रता बढ़ती जा रही थी... और पर्याय मात्र दो ही थे , आगे या पीछे , जीत या हार !
जो भी हो , मैने आगे जाना तय किया . अब ऑंधी - तूफान , कडकडाती बिजलियां , और बारिश के बीच चेतक स्कूटर ही साथ थी.. नक्सलियों से भरा जंगली रास्ता ! ज्यादा सोचने की बिमारी चरम पर . ऑंधी तूफान से नक्सली जंगल से निकल कर सडक पर आये तो ? पीछे हुए हादसे की तरह आज स्कूटर पंक्चर हुई तो ? पेट्रोल पंप के पहले ही पेट्रोल खतम हुआ तो ? स्कूटर फिसल कर accident हुआ तो ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर नही थे मेरे पास !
सडक सूखे - हरे पत्तों से ढ़क गयी थी . मै बारिश से नखशिखांत गीला हो गया था . तूफानी हवा स्कूटर को आडी तिरछी पीछे धकेल रही थी . मौसम में आया यह बदलाव अनपेक्षित था . मै ठंड से ठिठुर रहा था . एक तो इस जंगली रास्तें से रात में १७५ कि.मी. जाना यही साहस ( ? ) की बात थी... लेकीन अब मेरे साहस की अग्निपरीक्षा प्रारंभ हुई .
दूर कही बल्ब टिमटिमाते दिखे . मन में विश्वास जगा . तूफान की तीव्रता शनै: शनै: कम हो रही थी . रोशनी नजदीक आ रही थी . अब बारिश की तकलीफ होनी बंद हुई . वह अपनी गति से बरस रही थी , मै अपनी गति दौड रहा था ! जंगल का इलाका समाप्ति की कगार पर था , पर सडक सुनसान थी . आख़िरकार टंकी में बचे हुए पेट्रोल से मै पेट्रोल पंप पहुंचा . रात के बारह बज रहे थे . टंकी फुल कराई.. एक समस्या से निजात पाई . पेट्रोल पंप के बगल में ढाबा था . वहॉं मै अकेला ग्राहक ! गिलास भर चाय मंगाई.. लेकीन बैठा नही . गर्म भट्टी के पास खडे हो कर खुद को गर्म करने कोशिश करने लगा . गरमागरम चाय गले से उतरी और अब तक के आधे सफर की थकान कुछ कम हुई . दिमाग भी थोडा शांत हुआ . यही कही लॉज या होटल में ठहरने का विचार भी मन कौंधा . उसे मैने निश्चय से दूर किया . अब रुकना नही.. बस् !
शरीर की कंपन कुछ कम हुई थी . चेतक को किक मारी और निकल पडा बरसात में अपने गंतव्य की ओर ! दस कि.मी. तक चाय और भट्टी की गरमी असर रहा... लगातार हो रही बारिश अपना कमाल दिखा रही थी . फिसलने के भय से स्पीड भी नही बढ़ा सकता था . हेडलाइट की रोशनी लालटेन जितनी ! परेशानी कभी अकेली नही आती ... वह अपना पूरा कुनबा ले कर तांडव नृत्य करती है !
अब कंपकंपी बढ़ने लगी . हाथ से हैंडिल पकडना मुश्किल हो रहा था . बारिश की बूॅंदें सीधी ऑंखों से टकरा रही थी . अब मेरा यह निर्णय खुद मुझे पागलपन लगने लगा . क्या जरूरत थी ऐसे मूर्खता की ? जंगल के रास्ते से बच गया था.... आगे का किसे पता था ? अनहोनी घटने के लिए एक पल काफी है ! मै स्कूटर चलाते चलाते सोचने लगा .
हर माईलस्टोन और साइनबोर्ड को स्कूटर रोक कर पढ़ रहा था ... Distance देखने के लिए ! बारिश ने पीछा नही छोडा . मै बची खुची उर्जा बटोर कर गंतव्य की ओर बढ़ रहा था . रात के करीब तीन बजे साइट की रोशनी दिखी... शरीर में नव उर्जा का संचारण हुआ . मै लगातार सात घंटे से चल रहा था .
जैसे तैसे साइट पहुंचा . चौकीदार ने टॉर्च की रोशनी मेरी ओर डाली और उठ खडा हुआ . कुत्ते भौंकने लगे . स्टाफ की नींद खुल गयी . सब बाहर आए .
' साहब , इतनी रात और बारिश में ? ' साइट इंजिनिअर ने कहा .
खानसामा दौड कर टॉवेल ले कर आया .
' आप पहले कपडे उतार लिजीए... तब तक गर्मागर्म चाय बनाता हूं ' खानसामा ने टॉवेल देते हुंए कहा . सुपरवाइझर एक नाइट पैंट ले कर आया . चौकीदार ने एक घमेले में लकडी जलाई और मेरे पास ले कर आया . एक ने कंबल लपेट दिया . सब घमेले के चारों ओर बैठे . गिलास भर कर अदरक - काली मिर्च की चाय आई .
स्टाफ मुझे नसीहत दे रहे थे... और मै गुपचुप चाय पी रहा था..... ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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