यादें _ सवाल की !
भाग - १८
कुछ सवाल दिल में टीस पैदा करते है जिंदगी भर ! ' गलती किसकी ?' इस सवाल का जवाब तकलीफदेह होगा.. यादें कसक भरी !
आज मेरी स्कूटर से एक नन्ही सी गिलहरी जान गयी . डरी हुई गिलहरी सडक पार करने की बजाए दौडती रही स्कूटर के आगे आगे..वह रास्ता छोड कर सडक पार करेगी , ऐसा मेरा अनुमान था . ... इस लिए मै हैंडिल न घुमा कर सीधा चला रहा था . मेरे स्कूटर मोडते ही वह भी दिशा न बदल ले _ यह भी डर था .
सबसे पहले वह गिलहरी सडक पार करेगी ही , यह बात मेरे दिमाग मे क्यों आई ? ' सडक इन्सान के लिए है , गिलहरी जैसे जीवजंतू को उसकी क्या जरुरत ? ' ऐसी सुप्त अहंकारी स्वामित्व की भावना पहले आई .
बाद में भूतदया जाग्रत हुई . चक्रव्यूह में फंसने के बाद मुझे ' अगर - मगर ' से समझौता करना पडा . ... लेकीन यह समझौता असफल ! और आखिर इस शोकगर्भ क्षणिका का अंत हुआ गिलहरी की मृत्यू में .
मेरे प्रभुत्व का पराक्रम मैने उस निरीह प्राणी के प्राण पर दिखाया . मै उसी समय रुक कर और गिलहरी की दिशा पहचान कर स्कूटर चला सकता था..फिर यह निर्णय मै शीघ्र क्यों नही ले पाया ? मेरा एकतरफा निर्णय एक निश्छल जान की बली के लिए कारण बना .
मेरे रस्ते से उसका चलना , यह उसकी गलती या मैने मेरा रास्ता न छोड कर चलना _ मेरी गलती ?
आत्मग्लानि की सजा तो मुझे मिल ही गयी है.....
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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