Friday, October 28, 2022

निर्माण : भाग १७

निर्माण : भाग - १७
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३ दिन ढलाई का काम चला . आसमान में बादल घुमडने लगे थे . मुझे इस साइट का Bill बना कर दुसरे साइट जाना था . ढलाई खत्म होने के बाद दुसरें दिन ही मैने बाहरी शटरिंग खोलने के लिए बताया ... हल्की बारिश चालू थी. Bill बन रहा था . 
दवाखाने से ठेकेदार वापस आया . उसने एक मजदूर अस्पताल में रखा था मरीज के पास . मरीज की बीवी भी अस्पताल में आई थी . अस्पताल में और पैसे भेजने थे . सभी ठेकेदारों का हिसाब कर पेमेंट करनी थी . सब सामान और मशिनरी दुसरे साइट शिफ्ट करनी थी . 
रात में मुसलाधार बारिश शुरू हुई . हम रात भर जागते रहे . बारिश थमने का नाम ले रही थी . कोयला खदान से दो कि.मी. दूर बडी नदी थी . और खदान के रास्ते मे एक नाला था . लगातार हो रही बारिश से नदी खतरे के निशान से उपर बह रही थी . पुल के उपर से बाढ का पानी बह रहा था . खदान के रास्ते वाले नाले का पानी नदी की बाढ की वजह से रुक गया था... नाले के उपर का पुलिया भी जलमग्न हुआ था . नदी की भयंकर बाढ से छोटे - बडे नालों का पानी समुंदर की तरह खदान की चारों ओर फैल गया था . खदान की निकली मिट्टी का बांध ही खदान को बचाए रखा था . साइट एक टापू में बदल चुकी थी . आने - जाने के सारे रास्तें बंद थे . 
हम पैदल नाले तक जाते और वापस साइट पर आते थे . आज बारिश का तीसरा दिन था . खदान की चारों ओर पानी ही पानी था . मिट्टी की दिवार पानी को रोके थी . बारिश नही रुकी और मिट्टी की दिवार ढह गयी तो खदान , साइट और हमारा क्या होगा ??
नाले के उस पार हमारी जीप आई थी . ड्रायव्हर के पास ही साइट के पैसे भी थे . हम दूर से उसे देख सकते थे !! लेकीन...
डिपार्टमेंट के मजदूर और स्टाफ भी खदान में ही फंसा था . इतनी बारिश और बाढ आज तक नही आई थी . अगर खदान डूब गयी तो !!! सब चिंता में थे . साइट पर सब के लिए चाय बन रही थी.. लेकीन सब को खाना खिलाना मुश्किल था . 
बाढ की खबर फैल जाने से सब के घरवाले चिंतित थे . बिजली गुल थी ... खदान का जनरेटर चालू था , पर कितने दिन चल पाएगा !!!
सडक पर वाहनों की लंबी कतार थी.. डिपार्टमेंट ने एक आलू और चावल का ट्रक खोज लिया था . लेकीन आलू और चावल के बोरे खदान तक कैसे पहुंचाएं , यह बडी समस्या थी . 
पांचवे दिन एक  राफ्ट खदान की ओर आते दिखा . डिपार्टमेंट के सेफ्टी विभाग का दल था . वे कुछ अफसरों को ले कर गये और वापसी में आलू और चावल के बोरे ले कर आए . बडे - बडे बर्तनों में खाना पकने लगा . चाय - बिस्कुट बटने लगी . जलस्तर और बढने से राफ्ट का आना रुक गया . 
बचे लोगों के लिए आलू चावल दावत के समान था . खदान में रखे बडे बडे लकडी के खंबे जलाने के काम में आ रहे थे . सब चारों ओर बैठ कर किस्से कहानी साझा कर रहे थे . इस जलप्रलय ने सबको इकठ्ठा बांध रखा था .
 एक दिन दोपहर को हेलिकॉप्टर से खाद्यसामग्री गिराई गयी . सब मजदूरों ने उसे ऑफिस में जमा की . खदान के मैनेजर अभी भी खदान में ही रुके थे . उन्होंने अपने और हमारे मजदूरों को समान मात्रा में खाद्यसामग्री बांटी . यहॉं फंसे हुए सब अपने थे.... कोई पराया नही था !!!!
बारिश कुछ कम हुई लेकीन जलस्तर ज्यों का त्यों था . 
रेत के बोरे भरे जा रहे थे . जहॉं भी आशंका होती , वहॉं मिट्टी के बांध पर उन्हें रखा जा रहा था . सब मिट्टी की दिवार की निगरानी कर रहे थे .. अब पानी और हमारे बीच केवल यह मिट्टी की दिवार ही थी..... ( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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