कर्म
अनवरत करनी
मनुष्य की पहचान
बुद्धिजीवी श्रमजीवी
करते भाग्य निर्माण ।
लकीरों के फकीर ही
कर्म हीनता प्रमाण
यश अपयश मात्र
कर्म गति के निशान ।
भिन्न भिन्न पैमाने की
प्रत्यंचा चढ़ी कमान
नित कर्म की शक्ति से
लक्ष्य भेदता है बाण ।
निरंतर कोशिश से
काबू मे आता तुफान
हौंसले की उडान से
झुकता है आसमान ।
अकर्मण्यता पाप है
पुण्य कर्म प्रतिमान
मेहनत ही भाग्य का
एकमेव वर्तमान ।
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख, नागपूर
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