Tuesday, April 26, 2022

कर्म. ( कविता )

कर्म 

अनवरत करनी
मनुष्य की पहचान
बुद्धिजीवी श्रमजीवी
करते भाग्य निर्माण ।

लकीरों के फकीर ही
कर्म हीनता प्रमाण
यश अपयश मात्र
कर्म गति के निशान ।

भिन्न भिन्न पैमाने की
प्रत्यंचा चढ़ी कमान
नित कर्म की शक्ति से
लक्ष्य भेदता है बाण ।

निरंतर कोशिश से
काबू मे आता तुफान
हौंसले की उडान से
झुकता है आसमान ।

अकर्मण्यता पाप है
पुण्य कर्म प्रतिमान
मेहनत ही भाग्य का
एकमेव वर्तमान ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख, नागपूर

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