बोली , भास्या आन् आमी
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
स्यबद इ गतकाल आन् आब क ( वर्तमान ) लोकमानस क अमूर्त बिचार अन् भावना को मूर्त रूप . इलाखो , देस ,काल ( बेरा ) बदल को असर बिचार अन् बोलचाल , कथन प बी भया कन स्यबद बी येमिन सुटत नी . लागे उसऽ बदल क अनुसार नवा ध्वनीचिन्ह , स्यबद पयदा होस . काही दुसरऽ भास्या , बोली , समुह का स्यबदना बी बेमालूमपना कन जसा का उसा नी त नवऽ रूप म मिसरस . पुराना स्यबद गायब होस नी त् बदलकन नवऽ रूप म आवस . या घडामोड हरदम चालू रव्हस . कोनी येक बोली , भास्या म बदल होन साठी राजकारन की उठापटक , सामाजिक बदलाव , बेपार , स्थलांतर , नवाडऽ लोगना सी आवनी वालो संबंध , तंतरग्यान म बदलाव , पेटपानी क साधन म हेरफेर , नवा बिचार असा लय कारन रव्हस . तेकन च हर भास्या आन् वका स्यबदना बदलत जास .
स्यबद बिना आपन मुका , कुंठित अन् अनपढ बन जाऊन . स्यबद क सहारा कन च दुनिया का सारा येव्हार ( व्यवहार ) होस .
' आम्हां घरी धन , शब्दांचीच रत्ने....' यी संत तुकाराम महाराज को बोल केतरो समर्पक ! इ स्यबद को धन कोनी येक को च नी रवत , त वू वोला बोलनी वालऽ समाज / समूह को रवस . तसोच येनऽ ' धन ' ला बाहाडवन ला अन् नास करन ला बी समूह च जबाबदार रव्हस . मानूस क डोक्सा म को बिचार , बिकार , कल्पना , भावना या स्यबद कन च कवता आवस . दुनिया म अजपावतर जेतरा बी काम भयास , वूई सबन बोल्या / लिख्या स्यबदना को च नतिजो !
जेनऽ भास्या म स्यबद संख्या जेतरऽ परमान म होयेन ; वोकऽ परिन वोनऽ भास्या की ' रईसी ' मोजता आवस . इंगरजी म पाच लाख स्यबदना स आन् मराठी म पावून लाख ...
भास्या / बोली की उन्नती करन साठी आपलो दायरो मोठो कऱ्या पायजे . राजकारन कन भेटस वा सत्ता , समाज सुधारना , धंदो पानी - बेपार , मोठी सरकारी नवकरी , हर कला म आघ जात रहया पायजे . आपलो सत् जप कन् बोली ला येव्हार म बापऱ्या पायजेन . बोली , भास्या म की कमी ( कमतरता ) ढुंढ कन् , वरख कन् वोला दूर करन साठी सोपी - सुलभ तोड ढुंढ कन स्यबदसाठो हरदम बाहाडाया पायजे . बोली , भास्या साठी आवन वाली पिढी म रुची , निस्ठा पयदा होन साठी बी आरपार क मह्यनत की गरज स .
संस्कृत , ग्रीक , ल्याटिन भास्या क जमाना मऽ इंगरजी मुठभर लोगना की बोली होती . वून लोगना न दुनिया पर राज करे आन आपलऽ भास्या ला ग्यानभास्या बनायकन पुरी दुनिया म फयलायी . वून लोगना न तंतर ग्यान नवी नवी खोज करी , बाहाड करी , वोला बापऱ्यो ... आन् आपरंग च स्यबदना बनत गया.. बाहाडत गया . आपलो दायरो दुनिया म बाहाडाय कन नवाडऽ लोगना क संपर्क म आया ... स्यबद बनत गया... बाहाडत गया !
असोच उधारन डोरा क आघऽ अन् डोकसा मंझार धरेन त कोनतऽ बी बोली , भास्या क उन्नती ला बखत नी लागेन !!!!!
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
बहुत ही साजरो लिख्यो है भाउ जी
ReplyDeleteधन्यवाद जी
Deleteखूब साजरो मायबोली को वर्णन करेस।
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