कान्हो ( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
मुलमुल देखे बाई
गयो भुकीज वो तान्हो
दाटी हिरदा म माया
फुट्यो भरभर पान्हो ।१।
म्हरो गोविंद गोपाल
माय यसोदा को कान्हो
घडी भर निज्या बास्त
इर भर को धिंगानो ।२।
वोकअ मुंडा बरमांड
भऱ्यो माती को बकानो
हासे मुखऱ्या मुखऱ्या
तेज सूर्व्या को ठिकानो ।३।
बंद सकवार मुठ्ठी
लुकायेस वो खजानो
माय बाप क माया को
लायो संग हरजानो ।४।
धऱ्यो मुंडा म आंगठो
भक्ति सगुन की जानो
गह्यरी या बाललीला
बाजे मुरली प गानो ।५।
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
धन्यवाद जी 🙏
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