निर्माण - भाग ५
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साइट से ५ कि.मी. दूर एक गांव से रोज कोई न कोई छोटा - मोटा सामान लाने के लिए जाना ही पडता था . ज्यादा बड़ा काम हो या डीजल लाना हो तो ५२ कि.मी. दूर एक छोटे से शहर के अलावा दुसरा पर्याय नही था .
ट्रैक्टर , पानी की मोटर पंप , मिक्सर मशीन के लिए रोजाना डीजल की जरूरत होती थी . इसकी पूर्ति के लिए २०० लिटर के बैरल्स में डीजल भर के लाते थे .
आज डीजल खत्म हुआ था . साइट पर कैश भी नहीं थी . पास वाले गांव के एक दुकानदार से कुछ जान - पहचान हुई थी . शाम को ट्रैक्टर ट्रॉली मे खाली बैरल्स चढ़वाए और ड्रायव्हर के साथ मै पास वाले गांव आया . दुर्भाग्य से उस दिन दुकानदार के पास भी ज्यादा पैसे नही थे .
' आप काउंटर पर बैठिए . दो - एक घंटे में जितना गल्ला इकठ्ठा हो जाएगा , उस से आप का काम निकल जाएगा .' दुकानदार ने कहा .
मजबूरन ड्रायव्हर को भी रुकना पडा . जैसे ही पैसे इकठ्ठा हुएं , हम वहॉं से रवाना हुए . नक्षलवादी इलाका होने से डर भी लग रहा था . लेकीन सुबह डीजल की सख्त जरूरत थी . रात ९.३० बजे पेट्रोल पंप पहुंचे . डीजल भरवा कर रात १० बजे वहॉं से निकले . गांव आते आते रात के ११.३० बज चुके थे . ड्रायव्हर उसी गांव मे रहता था . अब वह साइट तक आने को राजी नही था .
' साहब , आधी रात हो गयी है . मै घर जाता हूं . साइट तक आप ट्रैक्टर ले जायेंगे तो अच्छा होगा .' गांव पहुंचते ही ड्रायव्हर ने कहा .
' ठीक है..' मैने सहमती जताते हुए कहा .
दर असल तब तक मैने कभी ट्रैक्टर नही चलाया था . ५ कि.मी. ही सही , लेकीन जंगली जानवर और नक्षलवादियों के डरावने जंगली रास्ते से जाना कोई खेल तो नही था ! ड्रायव्हर ने साइट की सडक पर ट्रैक्टर मोड दिया और स्टिअरिंग मुझे थमाया . ' मरता क्या न करता !'
धीरे धीरे क्लच छोडा और ट्रैक्टर घोडे जैसा उछलते हुए दौडने लगा . ड्रायव्हिंग सीट पर बैठना दूभर हो गया . खडा हुआ तो स्टिअरिंग संभालना मुश्किल हो गया और ट्रैक्टर सांप जैसे टेढ़ा - मेढ़ा चलने लगा . वीरान जंगल , सुनसान रास्ता ! ट्रैक्टर की उछल कुद और बैरल्स के हिलने - डुलने से सर्द रात मे भी पसीने छूंट गये . उपर से इस इलाके मे भालू और शेर का राज ! स्पीड बढ़ाई तो ट्रैक्टर बेकाबू हो जाता था और धीरे चलाओ तो डर बेकाबू ! जैसे तैसे राम राम जपते साइट पर पहुंचा .
' ड्रायव्हर कहा है साहब ?' आते ही स्टाफ ने पूछा .
' वह गांव मे ही उतर गया .' मैने कहा .
' इतनी रात मे आप अकेले आए ?' खानसामा ने अचरज से पूछा .
' हा भाई...' मैने कहा .
सभी खाना खाने के लिए मेरा इंतजार कर रहे थे .
' चलो , खाना लगाओ... बहुत देर हो गयी है .' मैने कहा .
' जी साहब..' खानसामा ने रोटी बनाते हुए कहा .
कैम्प के प्रांगण मे कुछ आदिवासी युवा मजदूर गोंडी गीत गा रहे थे .
बड़ा उपकार कितोल महादेव जी
बड़ा उपकार कितोले ऽऽ
इद नवा देशो ते यमुना नदी
यमुना नदी ते ताप्ती माई
संगे - संगे नर्मदल मिले माता
महादेव जी बड़ा उपकार कितोले
बड़ा उपकार कितोले ऽऽ
इद नवा देशो ता हिंदी भाषा
हिंदी भाषा ते मराठी भाषा
संगे - संगे गोंडी मिले माता
महादेव जी बड़ा उपकार कितोले
बड़ा उपकार कितोले ऽऽ
( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
रोमांचक लेख
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