उपहार
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रास्ता भटक जाऊ मै
राह सही दिखलाना
भूल जाऊ धर्म कर्म
याद बलात् दिलाना ।
टूट कर बिखरा तो
कण कण जोड देना
हारे तन मन जब
उर्जा कृपा बरसाना ।
जिस कर्म से हो ग्लानि
दूर उससे रखना
घेर ले तम निराशा
आशा के दीप जलाना ।
जाऊ किसी भी दिशा में
पैर माटी के रखना
रहे लिखती कलम
यही उपहार देना ।
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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