घर - भाग ६
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रास्ते मे मार्केट से कुछ सामान लेकर दोनों पुना पहुंच रहे थे . सिंधू सुकून महसूस कर रही थी . मोहनराव एफ एम के गानों पर इशारें कर कर सिंधू को सता रहे थे... मस्ती में थे .
दोपहर हुई थी . मनोहरराव ने सडक किनारे एक रेस्टॉरंट के आगे कार खडी की . दोनों खाना खाकर निकल पडे .
पार्किंग मे कार आते ही चौकीदार ने बडे अदब से नमस्कार किया . मनोहरराव ने डिकी से बैग और गांव से दिया हुआ सामान बाहर निकाला . सिंधू कुछ सामान लेकर लिफ्ट मे गई . चौकीदार कार के पास आया . मनोहरराव और चौकीदार बाकी सामान लेकर फ्लैट मे आये . अजय बाहर था और बहू अपने कमरे मे ऑफिस के कार्य में व्यस्त थी . सिंधू किचन से चाय लेकर आई . मनोहरराव और चौकीदार हॉल मे बैठे थे . सिंधू ने चाय रखी और एक कप लेकर बहू के कमरे मे गई .
' आपने क्यो तकलिफ की.... मै ने अभी अभी चाय ली थी...' बहू ने लैपटाप हटाते हुए कहा .
' और ले लो...' सिंधू ने मुस्कुरा कर कहा और वापिस मुडी .
' अरे सिंधू , गांव से सामान आया है , उस में से कुछ इसे भी दे दो..' मनोहरराव ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा .
' रहने दिजीए साहब... ' चौकीदार ने सकुचाते हुए कहा .
' नही , दो मिनट रूको... गांव की चीजें बार- बार थोडे ही मिलती है...' सिंधू ने कहा .
कुछ संतरे , सब्जीयां एक थैली मे भर कर सिंधू ने चौकीदार को दी .
शाम को अजय आया . मनोहरराव बाहर ओपन टेरेस मे बैठे थे . अजय पापा के पास गया . दोनों बातचीत कर रहे थे . दोनों को सिंधू किचन से देख रही थी .
दुसरे दिन अजय शाम को लौटा तो कम्पाउंड पर लगी तख्ती पढ़ कर सकते मे आ गया . वह तेजी से उपर आया . मनोहरराव और सिंधू टहलने गये थे . अजय ने तख्ती वाली बात पत्नी को बताई . उसका भी माथा ठनका ! मनोहरराव और सिंधू घर आए और टेरेस मे बैठे . अजय तमतमाते हुए आया .
' यह क्या चल रहा है पापा ?' अजय ने बगल की कुर्सी पर बैठते हुए कहा .
' क्या हुआ ?' सिंधू ने पुछा .
' बाहर ' पेईंग गेस्ट ' की तख्ती लगी है . हमारे पास जगह कहां है और परायों को हम घर मे क्यों रखेंगे ? वैसे जरूरत भी क्या है ?' अजय ने गुस्से से कहा .
' बात जरूरत की नही है बेटा , समय की है . तुमने जो फ्लैट लिया है , वह किराये से चढ़ाया है . अगर तुम्हे यहाँ कुछ असुविधा महसूस होती है तो तुम वहां रहने के लिए जा सकते हो . नही तो वहां का किराया घर मे घरखर्चे के लिए उपयोग में लाओ . अभी एक बेडरूम खाली पडा है , उस मे पेईंग गेस्ट रखेंगे तो क्या दिक्कत है ?' मनोहरराव ने कहा .
' यह क्या बात हुई ! हम उधर रहने गये तो आपकी देखभाल कौन करेगा ? और पेईंग गेस्ट रखा तो हमारी प्रायव्हसी का क्या होगा ? आपके पास तो इतने पैसे है.... यह सब करने की क्या जरूरत है ?' अजय ने सवालों की झडी लगा दी .
' देखभाल ! यह बात तो रहने दो . मैने जो पर्याय बताए है, उन में से तुम्हे कौनसा ठीक लगता है , यह बताओ . ' मनोहरराव ने कहा .
' आप क्या बोल रहे है , मेरी समझ के बाहर है.... इसे सठीयाना कहते है..' अजय बुदबुदाया .
' क्या बोल रहे हो अजय ? अपनी मर्यादा में रहो...' सिंधू ने डांटते हुए कहा .
' क्या बोला ?..' मनोहरराव ने पुछा .
' कुछ नही... आप शांत रहो..' सिंधू ने कहा .
अजय जाने के लिए उठा .
' रूको.. यह मेरा घर है... और तुम बेटे जैसे रहोगे तो ही यह घर तुम्हारा है... बदतमीज का हरगीज नही... ' मनोहरराव ने गुस्से से कहा .
सिंधू उन्हे शांत करने की कोशिश करने लगी.... अजय तेजी से अंदर गया . ( क्रमशः )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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